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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

हमारे देश का नाम भारतवर्ष

हमारे देश का नाम  भारतवर्ष

हमारे देश का भारतवर्ष नाम होने के सम्बन्ध में एक सामान्य जनधारणा है कि महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। लेकिन वही पुराण इससे अलग कुछ दूसरी साक्षी प्रस्तुत करता है। इस ओर हमारा ध्यान नही गया, जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था। तनक विचार करें इस विषय पर:-आज के वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था। लेकिन सात महाद्वीप किसने बनाए क्यों बनाए और कब बनाए गये। इस ओर अनुसंधान नही किया गया। अथवा कहिए कि जान पूछकर अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी। लेकिन वायु पुराण इस ओर बड़ी रोचक कहानी हमारे सामने पेश करता है।
वायु पुराण की कहानी के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में अर्थात अब से लगभग 22 लाख वर्ष पूर्व स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भरत खंड को बसाया था। प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नही था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद लिया था। जिसका लड़का नाभि था, नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इस ऋषभ का पुत्र भरत था। इसी भरत के नाम पर भारतवर्ष इस देश का नाम पड़ा। उस समय के राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था। राजा का अर्थ इस समय धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था। राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नीन्ध्र को बनाया था। बाद में भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वह भारतवर्ष कहलाया। भारतवर्ष का अर्थ है भरत का क्षेत्र। भरत के पुत्र का नाम सुमति था। इस विषय में वायु पुराण के निम्न श्लोक पठनीय हैं—
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)
इन्हीं श्लोकों के साथ कुछ अन्य श्लोक भी पठनीय हैं जो वहीं प्रसंगवश उल्लिखित हैं। स्थान अभाव के कारण यहां उसका उल्लेख करना उचित नही होगा।
हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं तो उसमें पंडित जी संकल्प कराते हैं। उस संकल्प मंत्र को हम बहुत हल्के में लेते हैं, या पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मानकर छोड़ देते हैं। लेकिन उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है। जैसे उसमें उल्लेख आता है-जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….। ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं। इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्याव्रत कहलाता है। इस संकल्प के द्वारा हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं।
अब प्रश्न आता है शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है? इस विषय में हमें ध्यान देना चाहिए कि महाभारत नाम का ग्रंथ मूलरूप में जय नाम का ग्रंथ था, जो कि बहुत छोटा था लेकिन बाद में बढ़ाते बढ़ाते उसे इतना विस्तार दिया गया कि राजा विक्रमादित्य को यह कहना पड़ा कि यदि इसी प्रकार यह ग्रंथ बढ़ता गया तो एक दिन एक ऊंट का बोझ हो जाएगा। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस ग्रंथ में कितना घाल मेल किया गया होगा। अत: शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा किसी घालमेल का परिणाम हो सकता है। जब हमारे पास साक्षी लाखों साल पुरानी है और आज का विज्ञान भी यह मान रहा है कि धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें? दूसरी बात हमारे संकल्प मंत्र में पंडित जी हमें सृष्टिï सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि अब एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है। बात तो हम एक एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करें और अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ें या मानें तो यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है? जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण भी उपलब्ध हो, साथ ही तर्क भी हों तो फिर उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों के
आधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है।
हमारे देश के बारे में वायु पुराण में ही उल्लिखित है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है। इस विषय में देखिए वायु पुराण क्या कहता है—-
हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।
तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:।।
हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है। यदि किसी पश्चिमी इतिहास कार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है, और यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें तो रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है । यह सोच सिरे से ही गलत है। अब आप समझें राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है। हमने यह नही सोचा कि एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है? विशेषत: तब जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे और वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था। तब ऐसी परिस्थिति में उसने केवल इतना काम किया कि जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं उन सबको संहिताबद्घ कर दिया। इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा। जिससे यह धारणा रूढ हो गयीं कि राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है। ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं। अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए। अपने देश के नाम के विषय में भी हमें गंभी चिंतन करना चाहिए, इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है, जैसा कि इसके विषय में माना जाता है, बल्कि इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है। ‘वृहद देवता’ ग्रंथ में कहा गया है कि ऋषियों द्वारा कही गयी पुराने काल की बात इतिहास है। ऋषियों द्वारा हमारे लिये जो मार्गदर्शन किया गया है उसे तो हम रूढिवाद मानें और दूसरे लोगों ने जो हमारे लिये कुछ कहा है उसे सत्य मानें, यह ठीक नही। इसलिए भारतवर्ष के नाम के विषय में व्याप्त भ्रांति का निवारण किया जाना बहुत आवश्यक है। इस विषय में जब हमारे पास पर्याप्त प्रमाण हैं तो भ्रांति के निवारण में काफी सहायता मिल जाती है। इस सहायता के आधार पर हम अपने अतीत का गौरवमयी गुणगान करें, तो सचमुच कितना आनंद आएगा?

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

पुरातन भारतीय परम्परा के अनुसार जीवन के लक्ष्य

पुरातन भारतीय परम्परा के अनुसार जीवन के लक्ष्य

पुरातन भारतीय परंपरा के अनुसार आर्य सनातन वैदिक हिन्दू धर्म ने सांसारिक सुखों को सर्वथा त्यागने की वकालत कभी नहीं की। हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन का मुख्य लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष वह स्थिति है जब मन में कोई भी अतृप्त कामना ना रह गयी हो तथा समस्त इन्द्रीय भोगों की धर्मानुसार पूर्ण संतुष्टि हो चुकी हो। इसी स्थिति को पाश्चात्य संदर्भ में ‘टोटल सेटिस्फेक्शन ’ कहते हैं।

हिन्दू जीवन शैली स्दैव इस सत्य के प्रति सजग रही है कि प्रत्येक प्राणी में इच्छायें तथा भावनायें हमेशा पनपती रहती हैं। बिना तृप्ति के कामनाओं को शान्त करना व्यावहारिक नहीं। अतः हिन्दू धर्म प्रत्येक व्यक्ति को धर्मपूर्वक पुरुषार्थ कर के अपनी समस्त कामनाओं की तृप्ति करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

यह हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपनी निजि आवश्यक्ताओं के साथ साथ अपने परिवार तथा मित्रों के लिये भी पर्याप्त सुख सम्पदा अर्जित करे और उस का सदोपयोग भी करे। अनिवार्यता केवल इतनी है कि यह सब करते हुये प्रत्येक स्थिति में धर्म, स्थानीय मर्यादाओं तथा निजि कर्तव्यों की अनदेखी नहीं हो।

पुरुषार्थ अर्जित जीवन लक्ष्य

हिन्दू धर्म के मतानुसार किसी भी प्रकार के इन्द्रीय सुख भोगने में कोई पाप नहीं है। ईश्वर ने मानव को किसी भी फल के खाने से मना नहीं किया है। प्रत्येक मानव को यह अधिकार है कि वह अपने और अपने परिवार, मित्रों, तथा सम्बन्धियों के इन्द्रीय सुखों के लिये अतुलित धन सम्पदा अर्जित करे जिस से सभी जन अपनी अपनी अतृप्त कामना से मुक्त हो जाये। अतः मानव को जीवन के चार मुख्य उद्देश हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, तथा इन चारों लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये मानवों को यत्न करते रहना चाहिये।

धर्मः- सृष्टि के सभी जीवों का प्रथम लक्ष्य है – स्वयं जियो। अपने जीवन की रक्षा करना सभी जीवों के लिये ऐक प्राकृतिक और स्वभाविक निजि धर्म और अधिकार है। ‘दूसरों को भी जीने दो’ का मार्ग कर्तव्यों से भरा है जिस को साकार करने के लिये मानव नें निजि धर्म का विस्तार कर के अपने आप को नियम-बद्ध किया है। उन नियमों को ही धर्म कहा गया है। जीने दो के मूल मंत्र को क्रियात्मिक रूप देने के लिये मानव समुदायों ने अपनी अपनी भूगौलिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सभ्यता के विकास की परिस्थितियों को ध्यान में रख कर अपने अपने समुदायों के लिये धर्म सम्बन्धी नियम बनाये हैं। यह नियम आपसी सम्बन्धों में शान्ति तथा भाईचारा बनाये रखने के लिये हैं तथा उन का पालन करना सभी का कर्तव्य है।

श्रष्टि के सभी जीवों में मानव शरीर श्रेष्ट और सक्षम है इस लिये जीने दो का उत्तरदाईत्व  पशु-पक्षियों की अपेक्षा मानवों पर अधिक है। इसी लिये दूसरों के प्रति धर्म के नियमों का पालन करना ही मानवों को पशु-पक्षियों से अलग करता हैः-

           आहार निद्राभय मैथुन च सामान्यमेतस शाभिर्वरीणम्

                    धर्मो ही तेषामधिसो धर्मेणहीनाः पशुभिसमाना ।। (-हितोपदेश)

आहार, निद्रा, भय और मैथुन – यह प्रवृतियाँ मनुष्य और पशुओं में समान रुप से पाई जाती हैं। परन्तु मनुष्य में धर्म विशेष रुप से पाया जाता है। धर्म विहीन मनुष्य पशु के समान ही है। 

जिस प्रकार सभी पशु पक्षी अपने अपने कर्तव्यों का स्वाचालित रीति से पालन करते हैं उसी प्रकार मानव भी जिस स्थान पर जन्मा है वहाँ के पर्यावरण की रक्षा तथा वृद्धि करे। अपने पूर्वजों की परम्परा का निर्वाह करे अपनी आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपना उत्तरदाईत्व निभाये और विश्व कल्याण में अपना योगदान देने के लिये स्दैव सजग एवं तत्पर रहै।

इन चारों लक्ष्यों में धर्म सर्वोपरि है। प्रत्येक परिस्थिति में धर्म का पालन करना अनिवार्य है। यदि किसी अन्य लक्ष्य की प्राप्ति में धर्म के मूल्यों का उल्लंधन होता हो तो मानव का कर्तव्य है कि उस लक्ष्य को त्याग दे। जो निजि धर्म का पालन करते करते किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करे वह स्दैव पापमुक्त रहता है तथा जो धर्म की अवहेलना करते हुये निष्क्रिय हो बैठे वही पापी है।

अर्थः- अर्थ से तात्पर्य है जीवन के लिये भौतिक सुख सम्पदा अर्जीत करना। मानव को ना केवल अपने शारीरिक सुखों के लिये पदार्थ अर्जित करने चाहियें अपितु संतान, माता पिता, सम्बन्धी, जीव जन्तु तथा स्थानीय पर्यावरण के उन सभी प्राणियों के लिये भी, जो उस पर आश्रित हों उन के प्रति भी अपने कर्तव्यों को निभा सके। धन सम्पदा अर्जित करना तथा उस का उपयोग करना कर्तव्य है, किन्तु धन सम्पदा ऐकत्रित कर के संचय कर लेना अधर्म है। हिन्दू धर्म शास्त्रानुसार –      

       शत हस्त समोहरा सहस्त्र हस्त संकिरा

(अर्थात मानव यदि एक सौ हाथों से कमाये तो उसे हज़ार हाथों से समाज कल्याण के लिये दान भी करना चाहिये।)

अर्थ लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भी धर्म तथा पुरुषार्थ दोनों का निर्वाह अनिवार्य है। धर्म उल्लंधन कर के अर्थ अर्जित करना पाप है तथा सक्षम होते हुये भी निष्क्रिय हो कर निजि आवश्यक्ताओं के लिये दूसरों से अर्थ प्राप्ति की अपेक्षा करते रहना भी पाप है। सुखी जीवन तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये धन-सम्पदा केवल साधन मात्र हैं, किन्तु वह जीवन का परम लक्ष्य नहीं हैं। धर्म पालन ( कर्तव्य पालन) करने से अर्थ हीन को भी मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है। अधर्म से अर्थ जुटाने वालों को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।

कामः- काम से तात्पर्य है समस्त ज्ञान इन्द्रियों तथा कर्म इन्द्रियों के सुखों को भोगना। इस के अन्तर्गत स्वादिष्ट खाना-पीना, संगीत, नाटक, नृत्य जैसी कलायें, वस्त्र, आभूषण, बनाव-सिंगार और रहन-सहन के साधन, तथा सहवास, संतानोत्पति, खेल कूद और मनोरजंन के सभी साधन आते हैं। इन साधनों के अभाव से मानव का जीवन नीरस हो जाता है और वह सदैव अतृप्त रहता है और उसे पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति होना अत्यन्त कठिन और अस्वाभाविक है। जो लोग काम इच्छाओं का दमन कर के किसी अन्य कारण से सन्यास ग्रहन कर लेते हैं, अकसर वही लोग जीवन भर अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिये ललायत भी रहते हैं। इस प्रकार के लोग अवसर मिलने पर पथ भृष्ट हो जाते हैं और दुष्कर्म कर के अपना सम्मान भी गँवा बैठते हैं। काम इच्छाओं का दमन नहीं अपितु शमन कर के ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। काम तृप्ति के बिना प्रत्येक प्राणी का जीवन अधूरा रहता है। कुछ लोग इस तथ्य को नकार कर भले ही अपवाद होने का दावा करें परन्तु उन की संख्या लग भग शून्य के बराबर ही होती है। इसी सच्चाई को मान्यता देते हुये हिन्दू धर्म ने काम दमन के बजाये काम शमन को प्राथमिक्ता दी है और जीवन में वैवाहिक सम्बन्धों को सर्वोच्च माना है। काम शमन के साथ धर्म तथा अर्थ, तीनो का पालन करना अनिवार्य है अन्याथ्वा सभी कुछ अधर्म होगा। किसी कारण वश यदि धर्म, अर्थ तथा काम का समावेश सम्भव ना हो तो क्रमशा सर्वप्रथम काम का त्याग करना चाहिये, फिर अर्थ का त्याग करना चाहिये। धर्म का त्याग किसी भी स्थिति में कदापि नहीं करना चाहिये

मोक्षः- मोक्ष से तात्पर्य है जीवन में पूर्णत्या संतुष्टि प्राप्त करना है। सुख और शान्ति की यह चरम सीमा है जब मन में कोई भी इच्छा शेष ना रही हो, किसी प्रकार के संसारिक सुख की कामना, किसी से कोई अपेक्षा या उपेक्षा का कोई कारण ना हो तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है। उस के लिये कोई यत्न नहीं करना पड़ता। किये गये कर्मों के फलस्वरूप ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह अवस्था मानव जीवन की सफलता की प्राकाष्ठा है। निस्संदेह यह शुभावस्था बहुत कम लोगों को ही प्राप्त होती है। अधिकतर व्यक्ति पहले तीन लक्ष्यों के पीछे भागते भागते असंतुष्ट जीवन बिता देते हैं। अज्ञानी, अधर्मी, निष्क्रय, असंतुष्ट, ईर्शालु, क्रूर, रोगी, भोगी, दारिद्र तथा अप्राकृतिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति कभी नहीं होती।

मर्यादित संतुलन

‘दूसरों को भी जीने दो’ के सिद्धान्त पर जब भी हम किसी कर्तव्य को निभाने के लिये निष्काम भावना से अगर कोई कर्म करते हैं तो वह ‘धर्म’ के अन्तर्गत आता है। इसी ‘जीने दो’ के सिद्धान्त पर ही अगर  स्वार्थ भी मिला कर यदि कोई कर्म किया जाता है तो वह व्यापार या ‘अर्थ’ बन जाता है और यदि किसी कर्म को केवल अपने मनोरंजन या खुशी के लिये किया जाये तो वही ‘काम’ बन जाता है।

धर्म, अर्थ, और काम में से केवल धर्म ही सशक्त है जो अकेले ही मोक्ष की राह पर ले जा सकता है। यदि किसी मानव नें अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह किया है तो वह अर्थ के अभाव में भी मानसिक तौर पर संतुष्ट ही हो गा। इसी प्रकार यदि किसी नें अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह किया है परन्तु उसे अपने लिये इन्द्रीय सुख नहीं प्राप्त हुये तो भी ऐसा व्य़क्ति निराश नहीं होता। इस के विपरीत यदि किसी के पास अपार धन तथा सभी प्रकार के काम प्रसाधन उपलब्ध भी हों तो भी निजि कर्तव्यों का धर्मपूर्वक निर्वाह किये बिना उसे पूर्ण संतुष्टि – मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। जीवन में अर्थ तथा काम संतुष्टि के पीछे अति करना हानिकारक है तथा अधर्म के मार्ग से इन लक्ष्यों की प्राप्ति करना भी पाप और दण्डनीय अपराध है। अन्ततः मोक्ष के स्थान पर दुख, निराशा तथा अपयश ही प्राप्त होते हैं।

जीवन में इन लक्ष्यों के लिये पुरुषार्थ करते समय मानव को स्दैव अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ सुननी चाहिये और जब भी मन में कोई शंका अथवा दूविधा उतपन्न हो तो स्दैव धर्म का मार्ग ही सभी परिस्थितियों, देश और काल में कष्ट रहित मार्ग होता है। मानव को अपनी रुचि और क्षमता अनुसार तीनों लक्ष्यों का एक निजि समिश्रण स्वयं निर्धारित करना चाहिये जो देश काल तथा स्थानीय वातावरण के अनुकूल हो। निस्संदैह इस समिश्रण में दूसरों के प्रति धर्म की मात्रा ही सर्वाधिक होनी चाहिय

हिन्दू धर्म ने जीवन के जो लक्ष्य अपनाये हैं वही लक्ष्य विश्व भर में अन्य मानव समाज भी अपनाते रहे हैं। जहाँ भी इन लक्ष्यों की अवहेलना हुयी है वहाँ पर सभ्यताओं का विध्वंस भी हुआ है। यह उल्लेखनीय है कि हिन्दू धर्म के सभी देवी देवता स्दैव धर्मपरायण, साधन सम्पन्न तथा वैवाहिक परिवार में दर्शाये जाते हैं। सभी ऋषि भी अपने अपने परिवारों के साथ वनों में सक्रिय जीवन व्यतीत करते रहे हैं। हिन्दू धर्म प्रकृतिक, सकारात्मक, कर्तव्यनिष्ट तथा सुख सम्पन्न जीवन व्यतीत करने को प्रोतसाहित करता रहा है जो विश्व कल्याण के प्रति कृतसंकल्प है। जीवन के यही लक्ष्य सभी धर्मों और जातियों के लिये ऐक समान हैं ।