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रविवार, 16 नवंबर 2014

ईश्वर व उसकी उपासना पद्धतियां – एक वा अनेक?

ईश्वर व उसकी उपासना पद्धतियां – एक वा अनेक?


हम संसार में देख रहे हैं कि अनेक मत-मतान्तर हैं। सभी के अपने-अपने इष्ट देव हैं। कोई उसे ईश्वर के रूप में मानता है, कोई कहता है कि वह गाड है और कुछ ने उसका नाम खुदा रखा हुआ है। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न भाषाओं में एक ही संज्ञा – माता के लिए मां, अम्मा, माता, मदर, मम्मी या अम्मी आदि नाम हैं उसी प्रकार से यह ईश्वर के अन्य-अन्य भाषाओं व उपासना पद्धतियों में ईश्वर के नाम हैं। क्या यह ईश्वर, ळवक व खुदा अलग-अलग सत्तायें हैं? कुछ ऐसे मत भी हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करते तथा अपने मत के संस्थापकों को ही महान आत्मा मानते हैं जिनकी स्थिति प्रकारान्तर से ईश्वर के ही समान व ईश्वर की स्थानापन्न है। जहां तक सभी मतों का प्रश्न है, हमने अनुभव किया है कि सभी मतों के सामान्य अनुयायी अपनी बुद्धि का कम ही प्रयोग करते हैं। उन्हें जो भी मत के प्रवतर्कों व उसके नेताओं द्वारा कहा या बताया जाता है या जो उन्हें परम्परा से प्राप्त हो रहा है, उस पर आंखें बन्द कर विश्वास कर लेते हैं। उनकी वह आदत, कार्य व व्यवहार उनके अपने जीवन के लिए हानिकर ही सिद्ध होती है एवं इसके साथ यह देश व समाज के लिए भी अहित कर सिद्ध होती है। यहां यदि विचार करें तो यह ज्ञात होता है कि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को बुद्धि तत्व लगभग समान रूप से दिया है। इस बुद्धि तत्व का प्रयोग व उपयोग बहुत कम लोग ही करना जानते हैं। आजकल बहुत से लोग ऐसे हैं जो विद्या का अध्ययन धनोपार्जन के लिए करते हैं। उनके जीवन का एक ही उद्देश्य है कि अधिक से अधिक धन का उपार्जन करना और उससे अपने व अपने परिवार के लिए सुख व सुविधा की वस्तुओं को उपलब्ध करना तथा उन सबका जी भर कर उपयोग करना। यह मानसिकता व सोच हमें बहुत ही घातक अनुभव होती है। एकमात्र धन की ही प्राप्ति में मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य को भूलकर उससे इतनी दूर चला जाता कि जहां से वह कभी लौटता नहीं है और उसका यह जीवन एक प्रकार से नष्ट प्रायः हो जाता है।
हम यह मानते हैं कि धन की जीवन में अत्यन्त आवश्यकता है परन्तु जिस प्रकार से हर चीज की सीमा होती है उसी प्रकार से धन की भी एक सीमा है। उस सीमा से अधिक धन, धन न होकर हमारे पतन व नाश का कारण बन सकता है व बनता है। इस धन को अर्थ नहीं अपितु अनर्थ कहा जाता है। जिस प्रकार से भूख से अधिक भोजन करने पर उसका पाचन के यन्त्रों पर कुप्रभाव पड़ता है उसी प्रकार से आवश्यकता से कहीं अधिक धन का उपार्जन व संचय, जीवन व उसके उद्देश्य की प्राप्ति पर कुप्रभाव डालता है। हमारे ऋषि-मुनि-योगी साक्षात्कृतधर्मा होते थे जिन्हें अपने ज्ञान व विवेक से किसी भी क्रिया के परिणाम का पूरा ज्ञान होता था। उन्होंने एक सूत्र दिया कि जो व्यक्ति धन व काम की एषणा से युक्त है, उसे धर्म का ज्ञान नहीं होता। धर्म का सम्बन्ध हमारे दैनिक कर्तव्यों एवं आचार, विचार व व्यवहार से होता है। दैनिक कर्तव्य क्या हैं यह आज के ज्ञानी व विद्वानों तक को पता नहीं है। इन दैनिक कर्तव्यों में प्रातः उठकर शारीरिक शुद्धि करके ईश्वर के गुणों व स्वरूप का ध्यान कर निज भाषा एवं वेद मन्त्रों से अर्थ सहित सर्वव्यापाक व निराकार ईश्वर प्रार्थना की जाती है। उसका धन्यवाद किया जाता है जिस प्रकार से हम अपने सांसारिक जीवन में किसी से कृतज्ञ होने पर उसका धन्यवाद करते हैं। ईश्वर ने भी हमें यह संसार बना कर दिया है। हमें माता-पिता-आचार्य-भाई-बहिन-संबंधी-मित्र-भौतिक सम्पत्ति-हमारा शरीर-स्वास्थ्य आदि न जाने क्या-क्या दिया है। इस कारण वह हम सब के धन्यवाद का पात्र है। इन्हीं सब बातों पर विचार व चिन्तन करना, ईश्वर के गुणों व उपकारों का चिन्तन व ध्यान करना ही ईश्वर की उपासना कहलाती है। इससे मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। इससे निराभिमानता का गुण प्राप्त होता है। निराभिमानता से मनुष्य अनेक पापों से बच जाता है। दूसरा कर्तव्य यज्ञ व अग्निहोत्र का करना है। तीसरा कर्तव्य माता-पिता आदि के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन है जिससे माता-पिता पूर्ण सन्तुष्ट हों। इसे माता-पिता की पूजा भी कह सकते हैं। इसके बाद अतिथि यज्ञ का स्थान आता है जिसमें विद्वानों व आचार्यों का पूजन अर्थात् उनका सम्मान व उनकी आवश्यकता की वस्तुएं उन्हें देकर उनको सन्तुष्ट करना होता हैं। अन्तिम मुख्य दैनिक कर्तव्य बलिवैश्वदेव यज्ञ है जिसमें मनुष्येतर सभी प्राणियों मुख्यतः पशुओं व कीट-पतंगों को भोजन कराना होता है।

हम बात कर रहे थे कि अनेकानेक मतों में अपने अपने गुरू व अपने-अपने भगवान हैं। सबकी पूजा पद्धतियां अलग-अलग हैं। क्या वास्तव में ईश्वर भी अलग-अलग हैं व एक है? यदि एक है तो फिर सब मिलकर उसके एक सत्य स्वरूप का निर्धारण करके समान रूप से एक ही तरह से पूजा या उपासना क्यों नहीं करते? इसका उत्तर ढूढंना ही इस लेख का उद्देश्य है। ईश्वर केवल एक ही है, पहले इस पर विचार करते हैं। संसार में ईश्वर वस्तुतः एक ही है। एक से अधिक यदि ईश्वर होते तो न तो यह संसार बन सकता था और न ही चल सकता है। हम एक उदाहरण के लिए एक बड़े संयुक्त परिवार पर विचार कर सकते हैं। यदि परिवार का एक मुख्या न हो, समाज का एक प्रतिनिधि न हो, प्रान्त का एक मुख्य मंत्री न हो और देश का एक प्रधान न होकर अनेक प्रधान मंत्री हों तो क्या देश कभी चल सकता है? कदापि नहीं। आज हमारे देश में जितने राजनैतिक दल हैं, यदि सभी दलों के या एक से अधिक दलों के दो-चार या छः प्रधान मंत्री बना दें तो देश की जो हालत होगी वही एक से अधिक ईश्वर के होने पर इस संसार या ब्रह्माण्ड की होने का अनुमान आसानी से कर सकते हैं। हम पौराणिक भगवानों को देखते हैं कि पुराणों की कथाओं में उनमें परस्पर एकता न होकर कईयों में इस बात का विवाद हो जाता है कि कौन छोटा है और कौन बड़ा है। वैष्णव स्वयं को शैवों से श्रेष्ठ मानते हैं और शैव स्वयं को वैष्णवों से श्रेष्ठ। अतः हमें हमारे प्रश्न का उत्तर मिल गया है कि संसार व ब्रह्माण्ड केवल एक सर्वव्यापक, चेतन सत्ता ईश्वर स ेचल सकता है, उनके सत्ताओं से कदापि नहीं। संसार का रचयिता, संचालक, पालक व प्रलयकर्ता ईश्वर केवल एक ही सत्ता है जो पूर्ण धार्मिक और सब प्राणियों का सच्चा हितैषी है और वह माता-पिता-सच्चे आचार्य के समान सबके कल्याण की भावना से कार्य करता है।

अब उपासना पद्धतियों की चर्चा करते हैं। उपासना का अर्थ होता है पास बैठना। जैसे विद्यालय में एक कक्षा में विद्यार्थी अगल-बगल में बैठते हैं। जहां गुरू सामने बैठ या खड़ा होकर उपदेश दे रहा होता है तो वह गुरू-शिष्य एक दूसरे की उपासना कर रहे होते हैं। ईश्वर सर्वव्यापक होने से सबके पास पहले से ही उपस्थित व मौजूद है। उसे मिलने या प्राप्त करने के लिए कहीं आना-जाना नहीं है। हमारा मन व ध्यान सांसारिक वस्तुओं में लगा रहता है जिसका अर्थ है कि हम उन-उन सांसारिक वस्तुओं की उपासना कर रहे होते हैं। यदि हम सभी सांसारिक विषयों से अपना मन व ध्यान हटाकर ईश्वर के गुणों व उसके स्वरूप में स्थिर कर लेते हैं तो यह ईश्वर की उपासना होती है। इसके अलावा ईश्वर की किसी प्रकार से उपासना हो नहीं सकती है। योग दर्शन में महर्षि पतंजलि जी ने भी ईश्वर की उपासना का यही तरीका व विधि बताई है। ध्यान अर्थात् ईश्वर के स्वरूप वा उसके गुणों का विचार व चिन्तन ध्यान करलाता है जो लगातार करते रहने से समाधि प्राप्त कराता है। समाधि में ईश्वर के वास्तविक स्वरूप व प्रायः सभी मुख्य गुणों का साक्षात् व निभ्र्रान्त ज्ञान होता है। नान्यः पन्था विद्यते अयनायः, अन्य दूसरा कोई मार्ग या उपासना पद्धति इस लक्ष्य को प्राप्त करा ही नही सकती। यही मनुष्य जीवन का और किसी जीवात्मा का परम लक्ष्य या उद्देश्य है। अतः ईश्वर की पूजा, उपासना, स्तुति व प्रार्थना आदि सभी की विधि केवल यही है और इसी प्रकार से उपासना करनी चाहिये व की जा सकती है। बाह्याचार आदि जो सभी मतों में दिखाई देता है वह पूर्ण उपासना न होकर आधी-अधूरी व आंशिक उपासना ही कह सकते हैं जिससे परिणाम भी आधे व अधूरे ही प्राप्त होते हैं। अतः सभी मनुष्यों को चाहें वह किसी भी मत, धर्म, सम्प्रदाय या मजहब के ही क्यों न हों, सत्यार्थ प्रकाश, आर्याभिविनय एवं वेदादि सत्य शास्त्रों का अध्ययन, स्वाध्याय, विचार व चिन्तन करना चाहिये। यही ईश्वर की सही उपासना पद्धति है और इसी से ईश्वर की प्राप्ति अर्थात् साक्षात्कार होगा। ईश्वर केवल एक ही है और नाना भाषाओं में उसके नाना व भिन्न प्रकार के नाम यथा, ईश्वर, राम, कृष्ण, खुदा व गौड आदि शब्द उसी के लिए प्रयोग किये जाते हैं। ईश्वर का मुख्य नाम केवल एक है और वह है “ओ३म्” जिसमें ईश्वर के सब गुणों का समावेश है। इस ओ३म् नाम की तुलना में ईश्वर का अन्य कोई नाम इसके समान, इससे अधिक व प्रयोजन को प्राप्त नहीं कर सकता। “ओ३म्” का अर्थ पूर्वक ध्यान व चिन्तन करने से भी उपासना होती है और इससे समयान्तर पर मन की शान्ति सहित अनेकानेक लाभ होते हैं। रोगों का शमन व स्वास्थ्य लाभ भी होता है।

नास्तिकता बनाम् आस्तिकता

नास्तिकता बनाम् आस्तिकता


हमारे देश व समाज में कुछ बन्धु स्वयं को नास्तिक कहते हैं। उनसे पूछिये कि नास्तिक का क्या अर्थ होता है तो वह कहते हैं कि हम ईश्वर और जीवात्मा के अस्तित्व को नहीं मानते। यदि उनसे पूछा जाये कि क्या आपने ईश्वर व जीवात्मा से सम्बन्धित उपलब्ध सभी साहित्य का अनुसंधानात्मक अध्ययन किया है तो हमें लगता है कि एक व्यक्ति भी इसका उत्तर हां में नहीं देगा। अपने आप को नास्तिक कहना भी एक प्रकार का फैशन हो गया है। जैसे हमने टीवी या चलचित्र में कुछ देखा, हमें अच्छा लगा और हमने उसे स्वीकार कर लिया। यह बात अलग है कि हमने जिसे स्वीकार किया वह हमारा निर्णय विवेक पूर्ण है या नहीं। वैज्ञानिक ईश्वर व जीवात्मा को नहीं मानते तो उसके पीछे के कारण और हैं और सामान्य लोगों के अन्य। वैज्ञानिक हर चीज को मानने से पूर्व उसे अपनी प्रयोगशाला में सिद्ध करते हैं। वह ईश्वर को प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं कर सके तो उन्होंने कहा कि ईश्वर नहीं है। दो बातें हैं, पहली तो यह कि वैज्ञानिकों ने विगत 40-50 वर्षों में जो नई खोजें की हैं वह इससे पूर्व अस्तित्व में नहीं आईं थीं। इसका मतलब यह है कि इससे पूर्व वह इन खोजों को भी नहीं मानते थे कि यह हो सकेंगी? उन्होंने प्रयास किया और वह सफल हो गये अतः एक असम्भव व कठिन लगने वाला कार्य सिद्ध हो गया। हम इसके लिए वैज्ञानिकों का साधुवाद ही करेंगे और साथ में यह कहेंगे कि जो वस्तु प्रयोगशाला में सिद्ध की ही नहीं जा सकती उसको प्रयोगशाला में सिद्ध करने का प्रयास करना और अससफल होना बेमानी व निरर्थक है। तो फिर ईश्वर का अस्तित्व कहां सिद्ध हो सकता है?

इसके लिए हमें विज्ञान का कारण-कार्य-कारण सिद्धान्त लेना होगा। विज्ञान के अनुसार हर कार्य का एक या अनेक कारण होते हैं जिससे वह कार्य अस्तित्व में आता है। दर्शन शास्त्र में कहा गया है कि एक मिट्टी का घड़ा, एक कुम्हार (कुम्भकार), मिट्टी और कुम्हार के चाक आदि उपकरणों से अस्तित्व में आता है। अन्य प्रकीर्ण कुछ और साधनों की सहायता भी कुम्भ या घड़ा बनाने में ली जाती है। इस उदाहरण में घड़ा कार्य है और कुम्हार, मिट्टी, कुम्हार के घड़ा बनाने के उपकरण यथा चाक आदि कारण कहलाते हैं। यह कारण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं एक निमित्त कारण, दूसरा उपादान और तीसरा साधारण कारण। यहां निमित्त कारण कुम्हार है और मिट्टी उपादान कारण तथा उपकरण आदि साधारण कारण कहे जाते हैं। अब हम इस सृष्टि या ब्रह्माण्ड पर विचार करते हैं। यहां सृष्टि या ब्रह्माण्ड “कार्य” हैं। अब इनके सम्भावित व आवश्यक कारणों पर विचार करते हैं।  सृष्टि के पदार्थों में पंच महाभूत यथा पृथिवी, अग्नि, वायु, जल और आकाश का मुख्य अस्तित्व है। पृथिवी के जड़ पदार्थों यथा एक पत्थर का जब हम विभाजन व खण्डन करते हैं तो वह छोटे-छोटे टुकड़ों, फिर कणों और उसके बाद सूक्ष्म कणों में विभाजित होता जाता है। यह छोटे से छोटा कण या तो अणु समूह होता है या अणु। यह अणु विज्ञान के अनुसार कुछ परमाणुओं से मिलकर बना है। यह परमाणु भी इससे सूक्ष्म कणों व पदार्थ जिसे कारण प्रकृति कहा जाता है और जो सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था है, उससे बने हैं। इस सत्व, रज व तमो गुणवाली मूल प्रकृति को कोई बनाता नहीं है। यह शाश्वत, सनातन, नित्य, अनादि, अविनाशी है जो सदा व हमेशा से है। यह मूल प्रकृति ही इस सृष्टि का उपादान कारण है अर्थात् इसी से वर्तमान सृष्टि अस्तित्व में आई है। इसी मूल प्रकृति से अग्नि, वायु व जल भी अस्तित्व में आते हैं।



अब सृष्टि के उपादान कारण को जान लेने के बाद हमें इसके निमित्त कारण पर विचार करना है। घड़े को बनाने वाला जिस प्रकार से कुम्हार निमित्त कारण है उसी प्रकार से इस सृष्टि को मूल अनादि प्रकृति से बनाने वाला भी इस सृष्टि के अन्दर, जगत में, ब्रह्माण्ड में एक निमित्त कारण है। वह हमें दिखाई दे या न दे, समझ में आये या न आये, यह हमारे ज्ञान व बौद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है, परन्तु वह है अवश्य। यदि न हो तो मूल प्रकृति से परमाणु, परमाणु से अणु, अणुओं से विभिन्न पदार्थ यथा पृथिवी, अग्नि, वायु, जल आदि कैसे अस्तित्व में आये इसका उत्तर न तो हमारे नास्तिक बन्धुओं के पास है और न ही हमारे वैज्ञानिक मित्रों के पास है। इसका उत्तर वेद, हमारे दर्शन और उपनिषदें प्रमाण पुरस्सर देती हैं। यह उत्तर पूरी तरह से वैज्ञानिक है, तर्क संगत है, युक्ति प्रधान, बुद्धि संगत है, इसका इसके विपरीत व अन्य और कोई उत्तर नहीं है। इसलिये इसी उत्तर को स्वीकार करना ही उचित है। अब बात केवल यही है कि इसको और किस प्रकार से सिद्ध किया जा सकता है। इसका उत्तर भी हमारे पास है और वह है कि इसके लिए योग की शरण में जाना होगा। योगासन और योग में बहुत अन्तर है। आजकल योगासनों तथा प्राणायाम को ही योग मान लिया गया है। जबकि यह दोनों अंग योग का 2/8 भाग या हिस्सा है। योग के आठ अंग में से दो अंग आसन व प्राणायाम है और शेष छः अंग, यम, नियम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं। इन अंगों को जानने व समझने के लिए किसी ताम-झाम की आवश्यकता नहीं है। एक योग गुरू के सान्निध्य में जाकर इन्हें जाना जा सकता है।



योग दर्शन ईश्वर व आत्मा के अस्तित्व व आत्मा द्वारा ईश्वर के साक्षात्कार करने-कराने के ज्ञान व विधि का एक वैज्ञानिक ग्रन्थ है। अष्टांग योग के अन्तर्गत यम से आरम्भ कर समाधि की अवस्था पर पहुंच कर ईश्वर का साक्षात्कार अर्थात् ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान व अनुभूति योग-साधक को होती है। जिन लोगों ने समाधि अवस्था प्राप्त की है उनमें से किसी ने यह नहीं कहा कि ईश्वर नहीं है या समाधि में भी उन्हें ईश्वर दिखाई नहीं दिया है। समाधि में ईश्वर का निभ्र्रान्त ज्ञान योगी को होता है। समाधि में योगी का आत्मा द्रष्टा बन कर ईश्वर की सत्ता को दृश्य की भांति प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है। मुण्डकोपनिषद के ऋषि बताते हैं कि इस अवस्था को प्राप्त होने पर योग द्रष्टा कहता है कि “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे पराऽवरे।।“ अर्थात् समाधि में ईश्वर-साक्षात्कार की अवस्था सिद्ध हो जाने पर जीवात्मा के हृदय की अविद्या-अज्ञानरूपी गांठ कट जाती है और सब संशय छिन्न होकर उसके दुष्ट व पाप कर्म क्षय को प्राप्त होते हैं। तभी आत्मा के भीतर और बाहर व्यापक हो रहे परमात्मा में उस योगी का जीवात्मा निवास करता है और आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। महर्षि दयानन्द ने समाधि को सिद्ध किया और उनके ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करने वाले शब्द हैं कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। वही सब मनुष्यों के द्वारा उपासना करने योग्य है। अन्य कोई जन्मधारी मनुष्य, महापुरूष या अवतार उपासना के योग्य नहीं है।



योग व समाधि में ईश्वर के दर्शन व साक्षात्कार कहां व किस प्रकार से होता है इस विषय में भी स्वामी दयानन्द के शब्द उद्धृत हैं। वह कहते हैं कि ‘‘कण्ठ के नीचे और उदर से ऊपर तथा दोनों स्तनों के बीच में जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाश रूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से (अर्थात् योग रीति से उपासना के द्वारा समाधि प्राप्त हाने पर) मिल जाता है। दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है।’’



ईश्वर कोई भौतिक पदार्थ नहीं है जिसे कि वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा प्रयोगशाला में सिद्ध कर सके। यह सर्वातिसूक्ष्म, एकरस, निरवयव एवं विशुद्ध आध्यात्मिक चेतन तत्व है। इसको तो केवल अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर योग साधना द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। अन्य कोई विधि, मार्ग व साधन आदि ईश्वर को प्राप्त करने का नहीं है। यही कारण है कि किसी भी मत में प्रयोग में लाई जाने वाली उपासना पद्धतियों से यह प्राप्त नहीं होता है। आज संसार की यदि 7 अरब जनसंख्या मान ली जाये तो हम समझते हैं कि योगियों के अतिरिक्त अन्य कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसे ईश्वर का साक्षात्कार हुआ है। ईश्वर का साक्षात्कार केवल योगी को ध्यान के द्वारा समाधि प्राप्त होने की अवस्था में ही होता है। जिसे साक्षात्कार करना है, उसे योगाभ्यास करना चाहिये। चूहे द्वारा बिल्ली के सामने आंखे बन्द करके यह कहने से यहां कोई बिल्ली दिखाई नहीं दे रही है, समस्या का हल नहीं है। वैज्ञानिकों ने इसलिए भी ईश्वर के अस्तित्व से इनकार किया कि वह सभी यूरोप में हुए हैं। यूरोप में ईसाई मत का प्रचार था। वहां ईश्वर को सातवें आसमान पर मनुष्यों की भांति आकार वाला निवासी बताया गया है। यह कथा वैज्ञानिकों की दृष्टि में अप्रमाणित है। वेद और वैदिक साहित्य की दृष्टि में भी इस विवरण की सत्यता अपुष्ट एवं अस्वीकार्य है। इस मत के किसी मतावलम्बी ने इस पर अनुसंधान कर इस आख्यान या मान्यता को सत्य व यथार्थ सिद्ध नहीं किया है जबकि वेद और योग के अनुयायियों में से अनेकों ने समाधि को सिद्ध कर ईश्वर का साक्षात्कार किया है। योग दर्शन स्वयं ईश्वर के सत्यस्वरूप का वर्णन करता है और वह महर्षि दयानन्द के पूर्व उल्लिखित विचारों के अनुरूप है। अतः ईश्वर व जीवात्मा का अस्तित्व सिद्ध है। विस्तार से जानने के लिए सत्यार्थ प्रकाश, 11 उपनिषद्, 6 दर्शन, मनुस्मृति एवं चारों वेदों का अध्ययन करना उचित है।



एक आख्यान देकर हम इस लेख का उपसंहार करते हैं। एक परिवार में पिता नास्तिक थे और उनका पुत्र आस्तिक था। पिता को सीख देने के लिए पुत्र ने एक दिन पिता के कार्यालय जाने पर घर की बैठक की दीवार पर लगे अपने दादाजी का चित्र को उतार कर घर में कहीं रख दिया। शाम को पिता जी कार्यालय से घर आये तो बैठक में अपने पिताजी के चित्र को न देखकर पुत्र से पूछा कि वह चित्र कहां है? पुत्र ने कहा कि पिताजी, मुझे नहीं पता कि चित्र कहां गया। बार-बार पूछने पर उसने कहा कि कहीं चला गया होगा। इस पर पिता ने निश्चयात्मक रूप से कहा कि चित्र अपने आप कहीं नही जा सकता। वह जो जड़ है कोई चेतन पदार्थ नहीं है जिसे कुछ ज्ञान हो। इस पर समझदार व ज्ञानी पुत्र ने कहा कि पिताजी, जब यह सारा ब्रह्माण्ड अपने आप बिना किसी परमात्मा, ईश्वर व सृष्टिकर्ता के बन सकता है और व्यवस्थित रूप से सृष्टि-नियमों का पालन करते हुए चल सकता है तो क्या यह छोटा सा चित्र स्वमेव दीवार से उतर कर कहीं आसपास भी नहीं आ-जा सकता? इससे पिता की आंखे खुल गई और उन्होंने संसार की उत्पत्ति, इसका संचालन व प्रलय करने के लिए ईश्वर के अस्तित्व व उसकी महत्ता समझ में आ गई और उसने ईश्वर के अस्तित्व का होना स्वीकार कर लिया। एक अन्तिम बात कह कर लेख को विराम देते हैं। यदि ईश्वर नहीं भी है तो उसे मानने में किसी को कोई हानि नहीं होगी क्योंकि वह तो है ही नहीं, हानि कहां से पहुंचायेगा। परन्तु यदि ईश्वर है और हम उसे नहीं मानेगें तो हमारी हानि होना स्वाभाविक व अपरिहार्य है। हम उससे प्राप्त होने वाली सुख-शान्ति व मृत्यु के बाद मिलने वाले जन्म में सुधार व उन्नति के प्रयासों से वंचित रह जायेगें जो कि एक बड़ा आत्मघाती कार्य होगा, इससे कुछ कम नहीं। 

रविवार, 9 नवंबर 2014

“भाषा, भाषा से बनती है और आदि व मूल भाषा ईश्वर से प्राप्त होती है”

“भाषा, भाषा से बनती है और आदि व मूल भाषा ईश्वर से प्राप्त होती है”


आज संसार में जितनी भी भाषायें हैं इनका अस्तित्व अपनी पूर्व भाषा में अपभ्रंशों, विकारों, सुधारों व भौगोलिक कारणों से हुआ है। हम बचपन में जो भाषा बोलते थे उसमें और हमारे द्वारा वर्तमान में बोली जाने वाली भाषा में शब्दों के प्रयोग व उच्चारण की दृष्टि से काफी अन्तर आया है। कुछ भाषायें हमने विद्यालयों में या पुस्तकों आदि से भी सीखी हैं। जिस या जिन भाषाओं को सीखा है उनका भी पहले से अस्तित्व है। अब हम उस भाषा पर विचार करते हैं जो वर्तमान भाषाओं का कारण है। हमें यह तथ्य ज्ञात होता है कि आज की भाषाओं के पूर्व स्वरूप को हमारे पूर्वजों ने अपने समय की भाषा में कुछ अपभ्रंशों, विकारों व उनमें सुधार करके अस्तित्व प्रदान किया था। उन्होंने अपने समय में पहले से विद्यमान भाषा के बिना ही उन भाषाओं को पहली बार स्वयं नहीं बनाया था। इस प्रकार से यदि पीछे की ओर चलते जायेंगे तो हम सृष्टि की आदि में पहुंच जायेंगे। सृष्टि की आदि में यह एक और समस्या आयेगी कि सबसे पहले जो मनुष्य उत्पन्न हुए, उनके माता-पिता तो रहे नहीं होंगे फिर उनका जन्म कैसे हुआ होगा, यह प्रश्न तो बहुत अच्छा है परन्तु इस प्रश्न के लोगों के भिन्न-भिन्न उत्तर होते हैं। कई लोग नाना प्रकार की कल्पना करते हैं और हमारे ऋषि कोटि के विद्वान जन कहते हैं कि आदि कालीन मनुष्य अमैथुनी सृष्टि में पैदा हुए थे। यदि मनुष्य को कुछ देर के लिए छोड़कर हम अन्य प्राणी – पशु व पक्षियों पर विचार करें तो वहां भी यही समस्या आती है। सबका उत्तर एक ही है कि अमैथुनी सृष्टि जिसको सर्वव्यापक व सृष्टिकर्ता ईश्वर ने कार्य रूप में अंजाम दिया। यह अमैथुनी सृष्टि होती क्या है? यह बिना माता-पिता के सन्तानों के जन्म को कहते हैं। बिना माता-पिता के क्या सन्तान हो सकते हैं? जी हां, हो सकते हैं, इसका प्रमाण यह संसार है। तर्क से भी यह सिद्ध है कि एक न एक दिन यह जगत, सृष्टि बनी अवश्य है। सृष्टि बनने से पूर्व इसका अस्तित्व नहीं था। जब अस्तित्व नहीं था तो बनायेगा कौन? इसका उत्तर है कि किसी एक सत्य, चित्त, आनन्दयुक्त, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, अनादि, अजन्मा, अमर, सृष्टि रचना की अनुभवी सत्ता ने ही इस संसार को बनाया है। यही उत्तर हमें वेदों से मिलता है कि एक ईश्वर है जिसमें यह सभी गुण है और वही इस सृष्टि को बनाता है और आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में मनुष्यों सहित सभी प्राणियों को उत्पन्न करता है। यह उत्तर पूर्णतः वैज्ञानिक उत्तर है। यदि वैज्ञानिक कहे जाने वाले लोग इसे स्वीकार न करें तो इसका अर्थ यह है कि उन्हें ईश्वर व जीव का ज्ञान नहीं है जबकि इनकी सत्ता यथार्थ है। कुछ समय लगेगा और अन्त में उनका यही निष्कर्ष होगा क्योंकि सभी अनुमान, कल्पनायें, मान्यताओं, सिद्धान्तों व थ्योरियों पर विचार किया जा चुका है और ईश्वरेतर कोई भी कल्पना व विचार सन्तोषजनक नहीं मिला है। ईश्वर, जीवात्मा व कारण प्रकृति — अनादि, नित्य, सत्य, अजर, अमर तत्व हैं, इनकी न तो उत्पत्ति होती है और न ही नाश होता है। विज्ञान भी इस अमरता के सिद्धान्त को मानता है। ईश्वर, जीवात्मा व कारण प्रकृति अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण चर्म चक्षुओं से देखे नहीं जा सकते। इस न दिखने के कारण ही विज्ञान इनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। कारण प्रकृति की कार्य अवस्था क्योंकि स्थूल है और वह आंखों से दिखाई देती है, इसलिये विज्ञान व वैज्ञानिकों को वह स्वीकार्य है। ईश्वर चेतन तत्व है अर्थात् वह हमारी आत्मा जैसा हमसे कहीं बड़ा, अनन्त परिमाण वाला है अर्थात् सर्वव्यापक व निराकार है। इसके साथ ही ईश्वर व जीवात्मा के प्रकृति के मूल स्वरूप से भी अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण इन दोनों पदार्थों का आंखों से दिखाई देना सम्भव नहीं है। आंखों का काम तो स्थूल पदार्थों को देखना है अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थों को नहीं। जब हम परमाणु व अणु जो कि प्रकृति के विकार हैं व मूल प्रकृति से स्थूल हैं, उन्हीं को नहीं देख पाते तो परमाणु व प्रकृति से भी सूक्ष्म पदार्थ ईश्वर व जीवात्मा को कदापि नहीं देख सकते। हां, विवेक से इन्हें जाना जा सकता है और यही इनको देखना कहलता है। ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व से इनकार करना, यह बुद्धि की संकीर्णता व घोर अज्ञानता है। इस ब्रह्माण्ड और प्राणियों के शरीरों को देख कर ईश्वर व जीवात्मा का अस्तित्व निभ्रान्त रूप से सिद्ध है।



हम जब सृष्टि के आरम्भ में पहुंचते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि आरम्भ में ईश्वर ने अमैथुनी सृष्टि की थी जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। ईश्वर ने ही इस चेतनारहित जड़ ब्रह्माण्ड तथा चेतनायुक्त प्राणी जगत को बनाया है। प्राणी जगत में सभी प्राणियों की आंखे, मुंह, वाणी, जिह्वा, श्रोत्र या कान के साथ शरीर के अन्दर बुद्धि भी बनाई है जो सत्य व असत्य व करणीय व अकरणीय का विवेचन करती है। जो सत्ता अदृश्य रहकर ब्रह्माण्ड व मनुष्यों के शरीर बना सकती है वह सत्ता मनुष्य को बोलने व भाषा का ज्ञान भी दे सकती है जिससे मनुष्य बोलने में समर्थ होता है। यदि ऐसा न होता तो शायद् ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियों की रचना न की होती जिसमें कान व मुंह के अतिरिक्त अन्य इन्द्रियां भी सम्मिलित हैं। अब विचार करते हैं कि आत्मा में विद्यमान ईश्वर, भाषा का ज्ञान करा सकता है या नहीं? हम जानते हैं कि बोलने वाले की सुनने वाले के कान से जितनी अधिक दूरी होती है, उतना ही अधिक जोर से बोलना होता है और यदि बोलने वाला कान में बोले तो बहुत धीरे से बोलने पर भी व्यक्ति सुनकर समझ लेता है। बोलना तब होता है जब बोलने वाला और सुनने वाला दोनों अलग-अलग हैं। अब यदि बोलने वाला आत्मा के भीतर है तो बोलने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा में उसके द्वारा प्रेरणा कर देने मात्र से ही पहले आत्मा को ज्ञान होता है और ज्ञान का उपयोग कर मनुष्य भाषा को बुद्धि व मन के सहयोग से मुंह द्वारा उच्चारित कर सकता है। हमें जब कुछ बोलना होता है तो उसमें हम अपनी आत्मा, मन व बुद्धि के साथ मुंह का प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार आत्मा में उपस्थित यदि ईश्वर ज्ञान प्रदान करता है तो आत्मा से वह मन को, बुद्धि को प्राप्त होकर मुख के अंतर में निहित वाणी द्वारा उच्चारित हो सकता है। इस बात को हमें जानना व समझना है। आत्मा में विद्यमान वा उपस्थित ज्ञान को वाणी द्वारा व्यक्त करना वा बोलना सम्भव है। यह असम्भव नहीं है। ऐसा ही सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में हुआ था या हुआ होगा। ईश्वर ने आदि सृष्टि में प्रथम चार ऋषियों की आत्माओं में वेदों का ज्ञान, भाषा ज्ञान सहित दिया था और बोलने की प्रेरणा भी ईश्वर ने ही की थी। हम जानते हैं कि ज्ञान का आधार भाषा होती है। यदि भाषा न हो तो ज्ञान हो ही नहीं सकता। वेदों का ज्ञान भी संस्कृत भाषा में है और इस कारण संस्कृत का ही ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में कराया था। यह सम्भावना है कि भाषा का ज्ञान अर्थात् बोलने के लिए भाषा का ज्ञान तो सभी अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को कराया गया था। इसका कारण हमारा यह चिन्तन है कि यदि ईश्वर सभी को बोलना न सिखाता तो हम ऋषियों से ज्ञान भी प्राप्त नहीं कर सकते थे। पहले भाषा पढ़़ते जिसमें काफी समय लगता। सम्भवतः कामचलाऊ  भाषा के ज्ञान के लिए एक-दो सप्ताह तो लग ही जाते। इस अवधि में मनुष्य अपना सामान्य व्यवहार कैसे करते? इसका उत्तर नहीं मिलता है। क्या बिना भाषा के ज्ञान के मनुष्य दो-चार दिन भी अपना निर्वाह कर सकते हैं, वह भी तब, जब उनका पालन करने के लिए उनके माता-पिता या कोई अभिभावक न हो। हमें लगता है कि यह सम्भव नहीं है। अतः यह स्वीकार करना पड़ता है कि ईश्वर ने जब मनुष्यों को जीवित जागृत बना दिया तो उनके क्रियाशील होते ही उन्हें परमात्मा ने भाषा व सामान्य व्यवहार का ज्ञान भी दिया।



भाषा के विषय में हमारा चिन्तन बताता है कि सृष्टि के आरम्भ में जब मनुष्य उत्पन्न हुए तो उन्हें बोलने के लिए भाषा की आवश्यकता थी। उस समय यदि ईश्वर उन्हें भाषा का ज्ञान न कराता तो वह स्वयं व कालान्तर में भाषा को उत्पन्न या उसकी रचना नहीं कर सकते थे। इसका कारण है कि भाषा के लिए वाक्य, उससे पूर्व शब्द, शब्द से पूर्व अक्षर या सभी प्रकार की ध्वनियों के लिए एक एक अक्षर व उन ध्वनियों को जोड़ने के लिए उन ध्वनियों के संकेतक अक्षर व मात्राओं की न्यूनतम आवश्यकता होती है। क्या वह मनुष्य व मनुष्य समूह जो भाषा व ज्ञान से पूर्णतः शून्य हैं, अक्षर व शब्दों की रचना कर सकते हैं? इसके सभी पहलुओं पर विचार व चिन्तन करने पर ज्ञात होता है कि मनुष्यों के लिए यह सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि अक्षरों को निर्धारित करने के लिए भी भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है और क्योंकि आदि काल में अमैथुनी मनुष्यों को भाषा का ज्ञान नहीं है, तो वह अक्षरों के निर्धारण का कार्य कदापि नहीं कर सकते और न हि किस अक्षर के लिए तालु, जिह्वा, कण्ठ, नासिका आदि का उच्चारण में कैसे प्रयोग करना है, यह ही जान सकते हैं। इस स्थिति में ईश्वर का होना सत्य सिद्ध होने के साथ यह प्रमाण कोटि का विचार, मान्यता या सिद्धान्त है कि अक्षर, मात्राओं, शब्द, वाक्य वा भाषा का ज्ञान एवं अन्य सभी विषयों का ज्ञान जिसकी मनुष्य के जीवन के लिए अपरिहार्य आवश्यकता है, वह सत्य, चित्त, आनन्द स्वरूप, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्राप्त होता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस ईश्वर व सत्ता ने इस संसार को बनाया है उसे भी तो विज्ञान व ज्ञान की आवश्यकता थी। ज्ञान क्योंकि भाषा में ही निहित होता है, अतः ईश्वर को भी अपने सभी कार्य करने के लिए एक भाषा की आवश्यकता होती है। यदि ऐसा न हो अर्थात् ईश्वर की अपनी भाषा न हो तो वह ज्ञानहीन ठहरेगा। तब इस संसार की रचना ईश्वर द्वारा कदापि सम्भव नहीं हो सकती, ऐसा हमारा अनुमान व विवेक कहता है। ईश्वर की वह भाषा कौन सी है तो इसकी एक ही सम्भावना है कि ईश्वर की भाषा वही भाषा ‘‘संस्कृत’’ है जो उसने वेदों का मनुष्यों को ज्ञान देने के अवसर पर प्रयोग की है। हम इस विषय में सभी विद्वानों के विचार आमंत्रित करते हैं।



हमारे इस लेख का प्रयोजन यह बताना है कि प्रत्येक भाषा अपनी किसी पूर्व भाषा में अपभ्रंस के द्वारा या विकारों व सुधारों व कई भाषाओं का समन्वय कर बनाई जाती है। पीछे चलते चलें तो एक अनवस्था दोष आता है। वहां केवल एक ही भाषा होती है। वह भाषा वेदों की भाषा अर्थात् संस्कृत है। वह संस्कृत मनुष्यों द्वारा बनाई गई नहीं है। वह परमात्मा प्रदत्त भाषा है जिसका विस्तार पूर्वक उल्लेख पूर्व पंक्तियों में किया जा चुका है। हम आज भी देख रहे हैं कि सृष्टि को बने हुए लगभग 2 अरब वर्ष व्यतीत होने को हैं और इतनी लम्बी अवधि में, आज तक भी संसार के सभी मनुष्य संस्कृत से उत्कृष्ट भाषा नहीं बना सके। संसार की सभी भाषाओं में अनेक दोष हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सका परन्तु संस्कृत पहली भाषा होकर भी निर्दोष है। यही इस भाषा का अपौरूषेयत्व या ईश्वरत्व है। इस सिद्धान्त को मान लेने पर भाषा विषयक सभी प्रश्नों का समाधान हो जाता है।

मनुष्यों की सूरत हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के अनुरूप

मनुष्यों की सूरत हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के अनुरूप


सूरत मनुष्य की आकृति को कहते हैं। भारत की जनसंख्या लगभग 125 करोड़ और सारे संसार की लगभग 7 अरब से कुछ अधिक है। यह एक बड़ा आश्चर्य है कि सभी स्त्री व पुरूषों, बुजुर्गं, जवान या बच्चे, की मुखों की सूरत, चेहरा, आकृतियां, शकल, कद-काठी, रंग-रूप अलग-अलग हैं। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है? कौन इन्हें बनाता है? हम अपने उद्योगों में नाना प्रकार के उत्पाद बनाते हैं, वह सब एक जैसे होते हैं। एक ही प्रकार के उत्पादों में आकृति की दृष्टि से अन्तर करना कठिन होता है। इसलिए उन पर संख्या डालनी पड़ती है जिससे उन्हें पहचाना जा सके। परन्तु संसार में हम देखते हैं कि मनुष्य योनि में अगणित वा 7 अरब से अधिक लोग हैं। सबकी सूरत व चेहरे भिन्न-भिन्न हैं। एक ही माता-पिता से जन्म लेने वाली सन्तानें भी रूप, रंग, आकार, प्रकार, आकृति व प्रकृति में एक दूसरे से भिन्न होती हैं। इसका कारण क्या हो सकता है? इस पर धर्म को यथार्थ रूप में जानने वाले लोगों की मान्यतायें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। धार्मिक लोग भी अनेक मतों, मजहबों, सम्प्रदायों आदि में बंटे हुए है। सबकी आस्थायें, मान्यतायें व सिद्धान्त पृथक-पृथक या भिन्न-भिन्न हैं। यदि सबका तुलनात्मक अध्ययन करें और फिर गुण-दोष, युक्ति व प्रमाणों के आधार पर विवेचना करें तो यह तथ्य सामने आता है कि मनुष्य की सूरत व आकृति अर्थात् चेहरा एक ऐसी सत्ता द्वारा निर्मित है जो मनुष्य से भिन्न है व इससे अधिक ज्ञानी, शक्ति-सम्पन्न या सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अनुभवी है। वह पूर्व कल्प-कल्पान्तरों-युगों से ऐसा ही करती चली आ रही है तथा उसे इस कार्य को अर्थात् प्राणी जगत की उत्पत्ति करने व मनुष्यों के शरीर व उनकी सूरत बनाने का पूर्ण अनुभव व ज्ञान है। जब वह सत्ता पहले से ऐसा करती आ रही है तो भविष्य में भी करती रहेगी। “उस सत्ता व कर्ता को ही ईश्वर कहते हैं।“

यह बात तो ईश्वर के बारे में हुई। अब आकृति भेद या अलग-अलग सूरत होने का कारण क्या है? इस पर भी विचार करना आवश्यक है। इसका उत्तर हमें यह मिलता है कि जन्म से पूर्व जीवात्मा अन्यत्र कहीं मनुष्य या अन्य किसी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि योनियों में रहा है। हम नित्य-प्रति देखते हैं कि मनुष्य, पशु, पक्षी आदि मरते हैं और उससे भी अधिक या बराबर संख्या में नये जीव-प्राणधारी सृष्टि क्रम व नियमों के अनुसार उत्पन्न होते हैं। मृत्यु होने पर सबके शरीरों में से चेतन तत्व अर्थात् “जीवात्मा” निकल जाता है एवं निर्जीव पार्थिव शरीर जिसे मृत्यु के बाद “शव” की संज्ञा दी जाती है, हमारे सामने होता है जिसकी अन्येष्टि करके उसे पंच-तत्वों में विलीन कर दिया जाता है। यह मृत्यु को प्राप्त होकर जो चेतन तत्व शरीर से निकलता है, यह स्वभाविक है कि वह निकलने के बाद इस ब्रह्माण्ड या आकाश में रहता है। हम सब अनुभव से यह भी जानते हैं कि चेतन तत्व जीव अल्पज्ञ व सूक्ष्म तत्व है, यह प्रत्यक्ष व निर्विवाद है। जब इसका जन्म हुआ था तो यह माता-पिता के संयोग व प्राकृतिक अन्य नियमों के अनुसार जन्मा था। उसी प्रकार से अब मृतक जीवात्मा आकाश से माता के गर्भ में जाता है। यह कार्य ईश्वर करता है जिसका आधार उसकी पूर्व योनि व उससे भी पूर्व के शेष व अभुक्त कर्म, जिन कर्मों का भोग नहीं हो सका व जिनको भोगा जाना है, होते हैं जो प्रारब्ध कहलाते हैं और इस जन्म में इसी को भाग्य भी कहा जाता है। इसी के आधार पर जहां जीवात्मा को किस योनि में जन्म देना है, इसका निर्धारण ईश्वर करता है। उस जीवात्मा की उस नई, पुनर्जन्म की, योनि की आकृति क्या हो, उसका निर्धारण भी ईश्वर के द्वारा ही किया जाता है जिसका प्रमाण हमें संसार के सभी मनुष्यों व अन्य योनियों के प्राणियों को देखकर होता है। एक माता की सभी सन्तानें अलग-अलग आकृति व सूरत वाली होती हैं। इसका कारण उन जन्म लेने वाले शरीरों की आत्माओं का प्रारब्ध व भाग्य ही है। इसका अन्य कोई कारण है ही नहीं और न किसी ने सूरत की भिन्नताओं पर कोई मान्यता व सिद्धान्त अब तक स्थापित किया है।

हम प्रायः यह भी देखते हैं कि सन्तानों की सूरत में अपने माता या पिता से कुछ-कुछ साम्यता होती है। भाई व बहिनों की सूरतों में भी परस्पर साम्यता देखी जाती है। हमने दो जुड़वा बहिनें ऐसी भी देखी हैं कि जिनमें बाल्यावस्था में हम भेद नहीं कर पाते थे कि इनमें से कौन सी ऋजु नाम वाली है और कौन ऋतु नाम वाली। लेकिन माता-पिता को कभी भ्रम नहीं होता था, तो हमें आश्चर्य होता था।  यह हमें ईश्वर का करिश्मा प्रतीत होता है। ईश्वर ने यह अपवाद किया होता है, शायद् यह जताने के लिए कि मैं यद्यपि सबकी सूरतें अलग-अलग बनाता हूं परन्तु मैं दो बच्चों की सूरतें एक जैसी भी बना सकता हूं लेकिन माता-पिता भ्रमित न हों, इसलिए उन्हें भ्रम नहीं होने देता अन्यथा उन्हें उनके पालन-पोषण में कठिनाई होगी। ऐसा भी होता है कि हमारा परिचय व निकट सम्बन्ध किसी व्यक्ति से होता है तो हम उसके भाई या बहिन से अन्यत्र मिलने पर उसके हाव-भाव से उसको उस व्यक्ति से निकट सम्बन्ध के कारण अनुमान से जान लेते हैं। एक बार ऐसा हुआ कि एक बालक किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाषण दे रहा था। हम ध्यान से सुन रहे थे। उसके हाव-भाव व बोलने के तरीके से हमें लगा कि यह हमारे मित्र श्री नरेश बंसल का छोटा भाई हो सकता है। हमने श्री नरेश बंसल के माता व पिताजी को भी देखा हुआ था। जब उस बालक का भाषण समाप्त हुआ तो वह हमारे पास आकर बैठ गया। हमने धीरे से उससे पूछा कि क्या वह श्री नरेश बंसल का छोटा भाई तो नहीं है तो उसने बताया कि हां, मैं श्री नरेश बंसल जी का छोटा भाई हूं। इससे यह लगता है कि यह संसार कुछ रहस्यपूर्ण भी है। हम इसका जितना अध्ययन करते हैं उतने ही अधिक रहस्यों का हमें ज्ञान होता जाता है।

हम लोग अपने व्यवहार में “प्रकृति” शब्द का प्रयोग करते हैं। हमारा जन्म व मृत्यु, सुख व दुख, संसार की रचना व उसका संचालन, प्राकृतिक प्रकोप व विपदायें सभी को नेचर या प्रकृति का नाम देकर कह देते हैं यह सब प्रकृति करती है। अतः यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि प्रकृति जड़ है या चेतन। संसार में दो प्रकार के पदार्थ देखें जाते हैं, एक जड़ पदार्थ हैं व दूसरे चेतन पदार्थ। जड़ पदार्थों को हमारे सत्य शास्त्रों में जड़, सूक्ष्म, सत्व-रज-तम गुणों वाली प्रकृति का विकार व कार्य कहा जाता है। यह विकार स्वमेव नहीं होता अपितु सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर जो कि सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान है, उसके द्वारा किया जाता है। वह सूक्ष्म जड़ प्रकृति से कार्य जगत यथा सूर्य, चन्द्र, पृथिवी एवं पृथिवीस्थ सभी पदार्थ अग्नि, जल, वायु व आकाश आदि को बनाता है। उसी के द्वारा वन व पर्वत बनायें गये हैं और उसी ने समुद्र भी बनाया है। मनुष्य का जन्म भी उसी सत्ता ईश्वर से होता है, होता आ रहा है और होता रहेगा। यदि ईश्वर को न माने तो जड़ पदार्थों में स्वमेव संयोग करके किसी प्रयोजन को पूरा करने वाला पदार्थ बनाने की योग्यता या क्षमता तो होती नहीं है जिससे कोई भी रचना अस्तित्व में नहीं आ सकती। ईश्वर को मानना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। घर में रोटी बनाने के लिए ईधन, आटा, जल, बर्तन आदि सभी कुछ हो। उन्हें आस-पास रख दिया जाये परन्तु रोटी, कितना ही काल क्यों न बीत जाये, कभी नहीं बन सकती जिसका कारण यह है कि जड़ पदार्थो में किसी विशेष प्रयोजन को जानने व उसे पूरा करने का ज्ञान नहीं है। चेतन तत्व जीवात्मा व परमात्मा ईश्वर को यह ज्ञान है कि उन्हें प्रयोजन के अनुसार जड़ पदार्थ कारण प्रकृति व कार्य प्रकृति का प्रयोग करके इच्छित प्रयोजन को पूरा करना व सिद्ध करना है। यदि रोटी बनाने का कहीं सब समान उपस्थित हो और वहां कोई मनुष्य पहुंच जाये जिसे रोटी बनाने का ज्ञान हो तथा उसे भोजन करना हो तो वह अपने ज्ञान, बल, संस्कारों व अभ्यास को दोहरा कर रोटी बनाकर अपनी क्षुधा को तृप्त कर सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हम व्यवहार में जिसे नेचर व प्रकृति कहते हैं, वह जड़ नहीं अपितु चेतन है। जो कार्य हम संसार में देखते हैं उनकी दो श्रेणियां होती है एक अपौरूषेय कार्य व दूसरे पौरूषेय कार्य।  जिन कार्यों को संसार का काई भी मनुष्य नहीं कर सकता तथा ऐसे सभी कार्य जो हमें आंखों से दिखायी देते हैं, यथा सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि का निर्माण व संचालन तथा मनुष्य व अन्य प्राणियों को जन्म देना और उन्हें व्यवस्था में रखना आदि कार्य, वह ईश्वर व परमात्मा द्वारा किये जाते हैं जिन्हें अपौरूषेय कार्य कहते हैं। मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले व सम्भव कार्यों को पौरूषेय कार्य कहते हैं। अतः जिन कार्यों के लिए नेचर या प्रकृति शब्द का प्रयोग किया जाता है वह कार्य प्रायः ईश्वर जो कि चेतन व सर्वव्यापक तत्व है, उसके लिए प्रयोग किया जाता है। अतः हमें विदेशी लोगों का अन्धानुकरण न कर प्रकृति, नेचर व ईश्वर के अन्तर को जानना व समझना चाहिये।

हमने मनुष्यों की सूरत व उसमें भिन्नता के कारणों को समझने का प्रयास किया है। जिस प्रकार ईश्वर ने प्रकृति में भिन्न-भिन्न प्रकार के पुष्प जो मन व हृदय को आकर्षित व सम्मोहित करते हैं, जिनके रूप व सुगन्ध का शब्दों में पूरी तरह से वर्णन व मूल्याकंन करना शब्द विज्ञानियों-शास्त्रियों के लिए भी सम्भव नहीं है, उसी प्रकार से मनुष्य की नाना रंग व रूपों वाली सूरत को देख कर ईश्वर की रचना शक्ति के ज्ञान का अनुमान होता है। इस आश्चर्य को देखकर हृदय से शब्द प्रस्फुटित होते हैं, कि हे ईश्वर, ‘तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं, दृष्टि किसी की भी आया नहीं, तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं।’ईश्वर संसार का सबसे बड़ा व महान रचयिता, कारीगर, निर्माता, चिन्तक व सृष्टि को बनाने, धारण करने, चलाने व व्यवस्था करने वाली एक ऐसी महान सत्ता है जिसकी उपमा हम किसी अन्य वस्तु व सत्ता से नहीं दे सकते। वह अपनी उपमा आप ही है। इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि वह ईश्वर सत्य, चित्त व आनन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र व सृष्टिकर्ता है। उसने हमें मानव जीवन देकर, इस सृष्टि को बनाकर तथा हमारे उपयोग के लिए नाना सुखदायक पदार्थ बनाकर हम पर जो उपकार किए हैं उसके कारण इन गुणों व स्वरूप वाला ईश्वर ही हमारी स्तुति व प्रार्थना के द्वारा हमारा उपास्य देव हैं। हम उसी ईश्वर को मन, वचन व कर्म से स्वयं को समर्पित करके, उसका ध्यान व चिन्तन द्वारा गुणगान करते हुए देश, समाज व प्राणीमात्र के कल्याण के कार्यों को करके उसके कृपा पात्र बन सकते हैं। ऐसा करके हम उसके निकट पहुंच जायेगें और उसकी कृपा को प्राप्त करके उसके द्वारा प्राप्त होने वाले सुख व आनन्द का अनुभव कर सकेगें। मोह व माया में न फंस कर त्याग व समर्पण का जीवन व्यतीत कर अपने जीवन को सफल व उपयोगी सिद्ध कर सकेगें। विभिन्न मनुष्यों की भिन्न-भिन्न मुखाकृतियां व सूरतें ईश्वर की रचनायें हैं जो मुखाकृति की ओट में ईश्वर के होने व सौन्दर्यपूर्ण रचना द्वारा उसको जानने व प्राप्त करने का सन्देश दे रही हैं। आईये, सूरत बनाने वाले ईश्वर की ओर प्रस्थान करें और उसे प्राप्त करने का प्रयास करें


रविवार, 8 सितंबर 2013

स्वामी दयानंद सरस्वती की दृष्टि में ईश्वर

स्वामी दयानंद सरस्वती की दृष्टि में ईश्वर

चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिससे अनेक ईश्वर सिद्ध हों। किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है। देवता दिव्य गुणों के युक्त होने के कारण कहलाते हैं जैसा कि पृथ्वी, परन्तु इसको कहीं ईश्वर तथा उपासनीय नहीं माना है।जिसमें सब देवता स्थित हैं, वह जानने एवं उपासना करने योग्य देवों का देव होने से महादेव इसलिये कहलाता है कि वही सब जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्ता, न्यायाधीश, अधिष्ठाता है।

ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से।

दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंध होकर दुखों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दुख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दुख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना।

संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।

ईश्वर यदि साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वाज्ञादि गुण भी ईश्वर में नहीं घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण, क्षुधा, तृष्णा और रोग, दोष, छेदन, भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता। अतः निश्चित है कि ईश्वर निराकार है। जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आँख आदि अवयवों को बनाने वाला ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता हो उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन आवश्य होना चाहिये। कोई कहता है कि ईश्वर ने स्वैच्छा से आप ही आप अपना शरीर बना लिया। तो भी यही सिद्ध हुआ कि शरीर बनाने के पूर्व वह निराकार था। इसलिये परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता। किन्तु निराकार होने से सब जगत को सूक्ष्म कारणों से स्थूलाकार बना देता है।

सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि ईश्वर अपने काम अर्थात उत्पत्ति, पालन, प्रलय आदि और सब जीवों के पाप पुण्य की यथा योग्य व्यवस्था करने में किंचित भी किसी की सहायता नहीं लेता अर्थात अपने अनंत सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर लेता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है की परमेश्वर वह सब कर सकता है जो उसे नहीं करना चाहिये। जैसे- अपने आपको मारना, अनेक ईश्वर बनाना, स्वयं अविद्वान, चोरी, व्यभिचारादि पाप कर्म कर और दुखी भी हो सकना। ये काम ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव से विरूद्ध हैं।

ईश्वर आदि भी है और अनादि भी। ईश्वर सबकी भलाई एवं सबके लिये सुख चाहता है परन्तु स्वतंत्रता के साथ किसी को बिना पाप किये पराधीन नहीं करता।

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करने से लाभः- स्तुति से ईश्वर से प्रीति, उसके गुण, कर्म, स्वभाव से अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारना। प्रार्थना से निरभयता, उत्साह और सहाय का मिलना। उपासना से परब्रह्म से मेल और साक्षात्कार होना।

ईश्वर के हाथ नहीं किन्तु अपने शक्ति रूपी हाथ से सबका रचन, ग्रहण करता। पग नहीं परन्तु व्यापक होने से सबसे अधिक वेगवान। चक्षु का गोलक नहीं परन्तु सबको यथावत देखता। श्रोत नहीं तथाकथित सबकी बातें सुनता। अंतःकरण नहीं परन्तु सब जगत को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं। उसको सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सबमें पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं। वह इन्द्रियों और अंतःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामर्थ्य से करता है।

न कोई उसके तुल्य है और न उससे अधिक। उसमें सर्वोत्तम शक्ति अर्थात जिसमें अनंत ज्ञान, अनंत बल और अनंत क्रिया है। यदि परमेश्वर निष्क्रिय होता तो जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय न कर सकता। इसलिये वह विभू तथापि चेतन होने से उस क्रिया में भी है।

ईश्वर जितने देश काल में क्रिया करना उचित समझता है उतने ही देशकाल में क्रिया करता है। न अधिक न न्यून क्योंकि वह विद्वान है।

परमात्मा पूर्ण ज्ञानी है, पूर्ण ज्ञान उसे कहते हैं जो पदार्थ जिस प्रकार का हो उसे उसी रूप में जानना।

परमेंश्वर अनंत है। तो उसको अनंत ही जानना ज्ञान, उसके विरुद्ध अज्ञान अर्थात अनंत को सांत और सांत को अनंत जानना भ्रम कहलाता है। यथार्थ दर्शन ज्ञानमिति, जिसका जैसा गुण, कर्म, स्वभाव हो उस पदार्थ को वैसा जानकर मानना ही ज्ञान और विज्ञान कहलाता है और उससे उल्टा अज्ञान।

ईश्वर जन्म नहीं लेता, यदुर्वेद में लिखा है ‘अज एकपात्’ सपथर्यगाच्छुक्रमकायम।

यदा यदा…………..सृजाम्यहम्।

यह बात वेद विरुद्ध प्रमाणित नहीं होती। ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्मात्मा धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग युग में जन्म लेके श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ तो कुछ दोष नहीं। क्योंकि ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ परोपकार के लिये सत्पुरुषों का तन, मन, धन होता है। किन्तु इससे श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हो सकते।

वेदार्थ को न जानने, सम्प्रदायी लोंगो के बहकावे और अपने आप अविद्वान होने से भ्रमजाल में फँसके ऐसी ऐसी अप्रमाणिक बातें करते और मानते हैं।

जो ईश्वर अवतार शरीर धारण किये बिना जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता है उसके लिये कंस और रावणादि एक कीड़ी के समान भी नहीं हैं। वह सर्वव्यापक होने से कंस रावणादि के शरीर में भी परिपूर्ण हो रहा है। जब चाहे उसी समय मर्मच्छेदन कर नाशकर सकता है। भला वह अनंत गुण, कर्म स्वभावयुक्त परमात्मा को एक शूद्र जीव को मारने के लिये जन्म मरण युक्त कहने वाले को मूर्खपन से अन्य कुछ विशेष उपमा मिल सकती है और जो कोई कहे कि भक्तजन के उद्धार करने के लिये जन्म लेता है तो भी सत्य नहीं है। क्योंकि जो भक्तजन ईश्वर की आज्ञानुकूल चलते हैं उसके उद्धार करने का पूरा सामर्थ्य ईश्वर में है। क्या ईश्वर पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रादि जगत के बनाने से कंस रावाणादि का वध और गोवर्धनादि का उठाना बड़े कार्य हैं।

जो कोई इस सृष्टि में परमेश्वर के कर्मों का विचार करे तो ‘न भूतो न भविष्यति’ ईश्वर के सद्श्य न कोई है न होगा। इस युक्ति से भी ईश्वर का जन्म सिद्ध नहीं होता। जैसे कोई अनंत आकाश को कहे कि गर्भ में आया और मुठ्ठी में भर लिया, ऐसा कहना कभी सच नहीं हो सकता। क्योंकि आकाश अनंत और सब में व्यापक है इससे न आकाश बाहर आता और न भीतर जाता, वैसे ही अनंत सर्वव्यापक परमात्मा के होने से उसका आना जाना कभी सिद्ध नहीं हो सकता। आना और जाना वहाँ हो सकता है जहाँ न हो। क्या परमेशवर गर्भ में व्यापक नहीं था जो कहीं से आया और बाहर नहीं था जो भीतर से निकला। ऐसा ईश्वर के विषय में कहना और मानना विद्याहीनों के सिवाय कौन कह और मान सकेगा। इसलिये परमेश्वर का आना जाना और जन्म-मरण कभी सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये ईसा आदि को ईश्वर का अवतार नहीं समझना चाहिये। वे राग, द्वेष, क्षुधा, तृष्णा, भय, शोक, दुख, सुख, जन्म,मरण आदि गुणायुक्त होने से मनुष्य थे।

ईश्वर पाप क्षमा नहीं कर सकता। ऐसा करने से उसका न्याय नष्ट हो जाता है और मनुष्य क्षमा दान मिलने की आशा से महापापी बन सकता है। तथा वह निर्भय एवं उत्साह पूर्वक पाप कर्म करने में संलग्न हो जायगा।

जिस प्रकार अपराधी को यह भरोसा हो जाय कि कानून के द्वारा उसके अपराध करने पर कोई सजा नहीं मिल सकती तो वह निर्भय पूर्वक अपराध करता है।

सभी प्रणियों को कर्मानुसार फल देना ईश्वर का कार्य है, क्षमा करना नहीं। मनुष्य अपने कर्मों में स्वतंत्र एवं ईश्वर की व्यवस्था में परतंत्र है।

मजदूर ने पहाड़ से लोहा निकाला, दुकानदार ने खरीदा, लौहार ने तलवार बनाई, सिपाही ने तलवार ली, उसने किसी को मार दिया। अब अपराधी लोहे का निकालने वाला मजदूर, खरीदने वाला दुकानदार और बनाने वाला लौहार नहीं होगा। बल्कि केवल वह सिपाही होगा जिसने किसी की हत्या की। इसलिये शरीर आदि की उत्पत्ति करने वाला ईश्वर व्यक्ति के कार्यों का भोक्ता नहीं होगा। क्योंकि कर्म करने वाला परमेशवर नहीं होता। यदि ऐसा होता तो क्या किसी को पाप करने की प्रेरणा देता। अतः मनुष्य कार्य करने के लिये स्वतंत्र है। उसी तरह ईश्वर भी कर्मानुसार फल देने के लिये स्वतंत्र है।

जीव और ईश्वर दोंनो चेतन स्वरूप हैं। स्वभाव दोनों का पवित्र, अविनाशी एवं धार्मकिता आदि है। परन्तु परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सबको नियम में रखना, जीवों का पाप पुण्य के फल देना आदि धर्मयुक्त कार्य हैं। और जीव में पदार्थों को पाने की अभिलाषा (इच्छा), द्वेष दुखादि की अनिच्छा, बैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, बल, (सुख) आनन्द, (दुख) विलाप, अप्रसन्नता, (ज्ञान) विवेक पहचानना ये तुल्य हैं। किन्तु वैशेषिक में प्राण वायु को बाहर निकालना, फिर उसे बाहर से भीतर लेना, (निमेष) आँख को मींचना, (उन्मेष) आँखों को खोलना, (जीवन) प्राण धारण करना, (मनन) निश्चय स्मरण अहंकार करना, (गति) चलना, (इन्दिय) सब इन्दियों को चलाना, (अंतर्विकार) भिन्न-भिन्न सुधा, तृष्णा, हर्ष, शोकादि युक्त होना, ये जीवात्मा के गुण परमात्मा से भिन्न हैं।

ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं। क्योंकि जो ईश्वर होकर न रहे वह भविष्यकाल कहलाता है। क्या ईश्वर को कोई ज्ञान रहके नहीं रहता? तथा न होके होता है? इसलिये परमात्मा का ज्ञान एक रस अखण्डित वर्तमान रहता है। भूत, भविष्यत् जीवों के लिये है। जीवों के कर्म की अपेक्षा से त्रिकालज्ञाता ईश्वर में है, स्वतः नहीं। जैसा स्वतंत्रता से जीव करता है, वैसा ही सर्वज्ञता से ईश्वर जानता है और जैसा ईश्वर जानता है वैसा जीव करता है अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञान और फल देने में ईश्वर स्वतंत्र और जीव किंचित वर्तमान और कर्म करने में स्वतंत्र है। ईश्वर का अनादि ज्ञान होने से जैसा कर्म का ज्ञान है वैसा ही दण्ड देने का भी ज्ञान अनादि है। दोनों ज्ञान उसके सत्य हैं। क्या कर्म ज्ञान सच्चा और दण्ड ज्ञान मिथ्या कभी हो सकता है। इसलिये इसमें कोई भी दोष नहीं आता।

परमेश्वर सगुण एवं निर्गुण दोनों है। गुणों से सहित सगुण, गुणों से रहित निर्गुण। अपने अपने स्वाभाविक गुणों से सहित और दूसरे विरोधी के गुणों से रहित होने से सब पदार्थ सगुण और निर्गुण हैं। कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जिसमें केुवल निर्गुणता या केवल सगुणता हो। किन्तु एक ही में निर्गुणता एवं सगुणता सदा रहती है। वैसे ही परमेश्वर अपने अनंत ज्ञान बलादि गुणों से सहित होने से सगुण रूपादि जड़ के तथा द्वेषादि के गुणों से प्रथक होने से निर्गुण कहलाता है। यह कहना अज्ञानता है कि निराकार निर्गुण और साकार सगुण है।

परमेश्वर न रागी है, न विरक्त। राग अपने से भिन्न प्रथक पदार्थों में होता है, सो परमेश्वर से कोई पदार्थ प्रथक तथा उत्तम नहीं है, अतः उसमें राग का होना संभव नहीं है। और जो प्राप्त को छोड़ देवे उसको विरक्त कहते हैं। ईश्वर व्यापक होने से किसी पदार्थ को छोड़ ही नहीं सकता। इसलिये विरक्त भी नहीं है।

ईश्वर में प्राणियों की तरह की इच्छा नहीं होती।

जो स्वयंभू, सर्वव्यापक, शुद्ध, सनातन, निराकार परमेश्वर है वह सनातन जीवरूपी प्रजा के कल्याणार्थ यथावत् रीतिपूर्वक वेद द्वारा सब विद्याओं का उपदेश करता है।

परमेश्वर के सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने से जीव को अपनी व्याप्ति से वेदविद्या के उपदेश करने में कुछ भी मुखादि की अपेक्षा नहीं है। क्योंकि मुख जिव्हा से वर्णोंच्चारण अपने से भिन्न को बोध होने के लिये किया जाता है, कुछ अपने लिये नहीं। क्योंकि मुख जिव्हा के व्यावहार करे बिना ही मन के अनेक व्यावहारों का विचार और शब्दोंच्चारण होता रहता है। कानों का उँगुलियों से मूँद कर देखो, सुनों कि बिना मुख जिव्हा ताल्वादि स्थानों के कैसे कैसे शब्द हो रहे हैं?

जब परमात्मा निराकार, सर्वव्यापक है तो अपनी अखिल वेद विद्या का उपदेश जीवस्थ स्वरूप से जीवात्मा में प्रकाशित कर देता है। फिर वह मनुष्य अपने मुख से उच्चारण करके दूसरे को सुनाता है। इसे ही वेद ज्ञान कहते हैं जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए ईश्वर द्वारा दिया गया हैं.

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

क्या वैदिक ग्रंथों में बहुदेवतावाद और मांसाहार का अंकन हैं ?

क्या वैदिक ग्रंथों में बहुदेवतावाद और मांसाहार का अंकन हैं ?


आधुनिक युग में महर्षि दयानंद का नाम समाज सुधारको के साथ साथ वेदों के भाष्यकार के रूप में भी जाना जाता हैं. महर्षि दयानंद ने यजुर्वेद का संपूर्ण एवं ऋग्वेद का सप्त मंडल तक भाष्य किया था जिसे वे अकाल मृत्यु के कारण पूर्ण नहीं कर पाए थे. कुछ जिज्ञासुओं का कहना हैं की जब पहले से ही सायण,महीधर आदि के भाष्य उपलब्ध थे तो महर्षि दयानंद को नवीन भाष्य की क्या आवश्यकता पड़ी अथवा यह भी कह सकते हैं की महर्षि दयानंद के वेद भाष्य में ऐसा क्या नवीन था.

महर्षि दयानंद के भाष्य से पहले वेदों के विषय में जनमानस की धारणाओं कुछ इस प्रकार थी-

१. वेदों में अनेक ईश्वरों की उपासना का विधान हैं क्योंकि वेदों में अग्नि, इन्द्र, रूद्र,पितर, अश्विनौ, अदिति , मरुत आदि अनेको देवों का वर्णन हैं.

२. वेदों में मांसाहार एवं हवन में पशु बलि जैसे अश्वमेध में अश्व की, अजमेध में अज की , नरमेध में नर बलि का विधान हैं जिससे वेद मात्र बोझिल कर्मकांड की पुस्तक प्रतीत होती हैं

महर्षि दयानंद के वेद भाष्य का प्रयोजन भी यही था की चारो और आर्यव्रत में फैले अंधकार का मुख्य कारण वेदों के सही अर्थ का प्रकाश नहीं होना हैं इसलिए उन्होंने वेद का नवीन भाष्य करने का निश्चय किया. सायण ,महीधर आदि के भ्रामक भाष्यों को पढ़ कर विदेशी भाष्यकारों जैसे मोक्षमूलर, ग्रिफ्फिथ, विल्सन आदि भी वेदों का सही अर्थ न जान सके और पूरा विश्व वेदों के ज्ञान के प्रकाश से वंचित रह गया. महर्षि दयानंद ने वेदों का नवीन भाष्य कर पूरे विश्व में क्रांति का किस प्रकार प्रचार किया पूरे लेख को पड़ कर हम जान जायेंगे.

१. वेदों में अनेक ईश्वरों की उपासना का विधान हैं क्योंकि वेदों में अग्नि, इन्द्र, रूद्र,पितर, अश्विनौ, अदिति , मरुत आदि अनेको देवों का वर्णन हैं.

वेदों में अग्नि, वायु, इन्द्र, अश्विनो, मित्र, वरुण, अर्यमा, रूद्र, सविता, अदिति, सरस्वती, पृथ्वी आदि देवताओ का वर्णन आता हैं. उवट, सायण, महीधर आदि भाष्यकारों ने इन्हें अलग स्वतन्त्र देव स्वीकार किया हैं जिससे वेदों में बहुदेवतावाद प्रतीत होता हैं . यज्ञों में आवाहन करने पर ये देवता प्रसन्न होकर यजमान को पुत्र, पोत्र, धन आदि प्रदान करते हैं. महर्षि दयानंद ने कहाँ की वेदों के विभिन्न देवता एक ही परमेश्वर के गुण- कर्म बोधक विभिन्न नाम हैं जैसे अग्नि के अग्रणी , विज्ञानस्वरुप, स्वयं प्रकाशमान, प्रकाशक परमेश्वर, विद्वान अध्यापक, उपदेशक, नायक राजा, वीर सेनापति अर्थ हैं, इन्द्र के ऐश्वर्याशाली परमेश्वर, शत्रु विदारक राजा, सेनापति, गुरु, बिजुली आदि अर्थ हैं. रूद्र का शत्रु संहारक सेनापति, ब्रहमचारी, जीवात्मा, वैद्य, वायु , प्राण आदि अर्थ हैं.अदिति के माता, जगदम्बा, राज रानी, पृथ्वी, अविनाशी आत्मा, विद्या, क्रिया, गौ आदि अर्थ हैं. महर्षि दयानंद ने जो अर्थ देव शब्दों के किये हैं वे वेदों से , निरुक्त से और ब्राह्मण आदि ग्रंथो से प्रमाणित हो जाते हैं.

वेदों में एक ईश्वर होने के प्रमाण-

१. जो एक ही सब मनुष्यों का और वसुओ का ईश्वर हैं- ऋग्वेद १.७.९

२. जो एक ही हैं और दानी मनुष्य को धन प्रदान करता हैं- ऋग्वेद १.८४.६

३. जो एक ही हैं और मनुष्यों से पुकारने योग्य हैं- ऋग्वेद ६.२२.१

४. हे परमेश्वर (इन्द्र), तू सब जनों का एक अद्वितीय स्वामी हैं , तू अकेला समस्त जगत का राजा हैं – ऋग्वेद ६.३६.४

५. हे मनुष्य, जो परमेश्वर एक ही हैं उसी की तू स्तुति कर, वह सब मनुष्यों का द्रष्टा हैं – ऋग्वेद ६.४५.१६

६. तो एक ही अपने पराकर्म से सबका इश्वर बना हुआ हैं- ऋग्वेद ८.६.४१

७. विश्व को रचने वाला एक ही देव हैं, जिसने आकाश और भूमि को जन्म दिया हैं- ऋग्वेद १०. ८१.३

८. हे दुस्तो को दंड देने वाले परमेश्वर, तुझ से अधिक उत्कृष्ट और तुझ से बड़ा संसार में कोई नहीं हैं, न ही तेरी बराबरी का अन्य कोई नहीं हैं- ऋग्वेद ४.३०.१

९. वह ईश्वर अचल हैं,एक हैं, मन से भी अधिक वेगवान हैं. यजुर्वेद ४०.४

१०. पृथ्वी आदि लोकों का धारण करने वाला ईश्वर हमें सुख देवे,जो जगत का स्वामी हैं, एक ही हैं, नमस्कार करने योग्य हैं, बहुत सुख देने वाला हैं. अथर्वेद २.२.२.

११. आओ , सब मिलकर स्तुति वचनों से इस परमात्मा की पूजा करो, जो आकाश का स्वामी हैं, एक हैं, व्यापक हैं और हम मनुष्यों का अतिथि हैं. अथर्वेद ६.२१.१

१२. वह परमेश्वर एक हैं, एक हैं , एक ही हैं. उसके मुकाबले में कोई दूसरा , तीसरा, चौथा परमेश्वर नहीं हैं, पांचवां, छठा , सातवाँ नहीं हैं, आठवां, नौवां, दसवां नहीं हैं. वही एक परमेश्वर चेतन- अचेतन सबको देख रहा हैं. अथर्वेद १६.४.१६-२०

इस प्रकार वेदों में दिए गए मंत्रो से यह सिद्ध होता हैं की परमेश्वर एक हैं. अब एक समस्या उत्पन्न होती हैं. एक और तो वेदों में मित्र, वरुण, अग्नि , इन्द्र आदि नाना देवों की सत्ता का वर्णन हैं दूसरी और वेदों में एक ही ईश्वर का वर्णन हैं तो इस परस्पर विरोधी बातो का समन्वय कैसे करे. एक उदाहरण लेते हैं देश के राजा का नाम प्रधानमंत्री होता हैं, प्रान्त के राजा का नाम मुख्यमंत्री होता हैं. जिले के राजा का नाम कमिश्नर होता हैं, पंचायत के राजा का नाम सरपंच होता हैं. अगर कोई यह कहे की भारत का एक राजा हैं तो वह भी ठीक हैं और कोई यह कहे भारत में अनेक राजा हैं तो वह भी ठीक हैं. यहीं बात वेदों के विषय में भी हैं. सबसे बड़ा देवता एक परम ब्रह्मा ईश्वर हैं बाकि सब देवता उसके नीचे काम करने वाले हैं. परमेश्वर और बाकि देवों में किस प्रकार का सम्बन्ध हैं यह इस मंत्र से सिद्ध होता हैं. जैसे वृक्ष के तने के आश्रित सब शाखाएं होती हैं, वैसे ही उस परम देव के आश्रय में अन्य सब देव रहते हैं.(अथर्वेद १०.७.३८)

वेदों में एक ईश्वर के विभिन्न नाम होने की साक्षी भी दी गयी हैं जैसे-

१. परमेश्वर एक ही हैं ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामो से पुकारते हैं , उसे इन्द्र कहते हैं, मित्र कहते हैं, वरुण कहते हैं, अग्नि कहते हैं, और वही दिव्या सुपर्ण और गरुत्मान भी हैं, उसे ही वे यम और मातरिश्वा भी कहते हैं.(ऋग्वेद १.१६४.४६)

२. एक होते हुए भी उस सुपर्ण परमेश्वर को ज्ञानी कविजन बहुत नामो से कल्पित कर लेते हैं (ऋग्वेद १०.११४.५)

३. यहीं भाव ऋग्वेद ३.२६.७,ऋग्वेद २.१.३-७,ऋग्वेद १०.८२.३, यजुर्वेद ३२.१, अथर्वेद १३.४ में भी कहाँ गया हैं.

जिस प्रकार बाईबिल में ईश्वर को god, almighty,lord आदि अनेको नाम से पुकारा गया हैं उसी प्रकार वेदों में ईश्वर को भी विभिन्न नाम से पुकारा गया हैं. इस प्रकार यह सिद्ध होता हैं की वेदों में एक ईश्वर का वर्णन हैं इसलिए जो लोग अंध विश्वास में आकर विभिन्न देवी देवताओ की उपासना में लगे हुए हैं वे वेदों में वर्णित एक ईश्वर के यथार्थ को समझे.


वेदों में मांसाहार एवं हवन में पशु बलि जैसे अश्वमेध में अश्व की, अजमेध में अज की , नरमेध में नर बलि का विधान हैं जिससे वेद मात्र बोझिल कर्मकांड की पुस्तक प्रतीत होती हैं
स्वामी दयानंद जी का वेदभाष्य यूँ तो कई पहलुओं में क्रांतिकारी हैं पर इसमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली विचार मांस भक्षण ,पशुबलि, कर्मकांड आदि को लेकर जो अन्धविश्वास हमारे देश में फैला था उसका निवारण कर स्वामी जी ने साधारण जनमानस के मन में वेद के प्रति श्रद्दा भाव उत्पन्न कर दिया. सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देख कर मोक्ष मुलर, विल्सन , ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्र वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दोष प्राणियो को क़त्ल करवा कर मनुष्य जाति को पापी बना दिया. मध्य काल में हमारे देश में वाम मार्ग का प्रचार हो गया था जो मांस, मदिरा, मैथुन, मीन आदि से मोक्ष की प्राप्ति मानता था. आचार्य सायण आदि यूँ तो विद्वान थे पर वाम मार्ग से प्रभावित होने के कारण वेदों में मांस भक्षण एवं पशु बलि का विधान दर्शा बैठे. निरीह प्राणियों के इस तरह कत्लेआम एवं भोझिल कर्मकांड को देखकर ही महात्मा बुद्ध एवं महावीर ने वेदों को हिंसा से लिप्त मानकर उन्हें अमान्य घोषित कर दिया जिससे वेदों की बड़ी हानि हुई एवं अवैदिक मतों का प्रचार हुआ जिससे क्षत्रिय धर्म का नाश होने से देश को गुलामी सहनी पड़ी. इस प्रकार वेदों में मांसभक्षण के गलत प्रचार के कारण देश की कितनी हानि हुई इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.
सर्वप्रथम तो स्वामी दयानंद ने चार वेद संहिताओ को परम प्रमाण माना. उन्होंने कहाँ की दर्शन,उपनिषद, ब्राह्मण, सूत्र, स्मृति, रामायण, महाभारत, पुराण आदि तभी मान्य हैं जब वे वेदानुकुल हैं. स्वामी दयानंद ने आवाहन किया की चारों वेदों में कहीं भी मांस भक्षण का विधान नहीं हैं, न देवताओं को मांस खिलाने का, न मनुष्यों को खिलाने का विधान हैं.
वेदों में गाय के नाम
यजुर्वेद ८.४३ में गाय को इडा (स्तुति की पात्र) , रनता (रमयित्री), हव्या (उसके दूध की हवन में आहुति दिए जाने से ), काम्या (चाहने योग्य होने से) , चंद्रा (अह्ह्यादायानि होने से ) , ज्योति (मन आदि को ज्योति प्रदान करने से ), अदिति (अखंडनिय होने से) , सरस्वती (दुग्ध्वती होने से ) , मही (महिमा शालिनी होने से), विश्रुती (विविध रूपों में श्रुत होने से) और अघन्या (न मारी जाने योग्य) कहा गया हैं.
इन नामों से यह स्पष्ट सिद्ध होता हैं की वेदों में गाय को सम्मान की दृष्टि से देखा गया हैं क्यूंकि वो कल्याणकारी हैं.!वेद किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा प्रणीत कृतियाँ नहीं हैं और न ही ये लेख बद्द किये गये थे। ये श्रुतियों द्वारा अगली पीढ़ी तक पहुँचते थे और बीच-2 मै तमाम माँसभक्षी ऋषि मुनि भी हुये होंगें जिन्होंने ऋग्वेद मे गौमांस भक्षण से सम्बन्धित ऋचाओं को डाला रहा होगा। अन्यथा अचानक हिन्दू सनातन धर्म मे गाय पूज्यनीय कैसे हो जाती???? जो भी स्थिति रही हो पर आज का सत्य यही है कि भारत सहित अन्य देशों मे कोई भी हिन्दू धर्मी  माँस भक्षण को धार्मिक अनुस्ठानों से नहीं जोड़ते।
गाय पूज्य हैं
अथर्ववेद १२.४.६-८ में लिखा हैं जो गाय के कान भी खरोंचता हैं, वह देवों की दृष्टी में अपराधी सिद्ध होता हैं. जो दाग कर निशान डालना चाहता हैं, उसका धन क्षीण हो जाता हैं. यदि किसी भोग के लिए इसके बाल काटता हैं, तो उसके किशोर मर जाते हैं.
अथर्ववेद १३.१.५६ में कहाँ हैं जो गाय को पैर से ठोकर मरता हैं उसका मैं मूलोछेद कर देता हूँ.
गाय, बैल आदि सब अवध्य हैं
ऋगवेद ८.१०१.१५ – मैं समझदार मनुष्य को कहे देता हूँ की तू बेचारी बेकसूर गाय की हत्या मत कर, वह अदिति हैं अर्थात काटने- चीरने योग्य नहीं हैं.
ऋगवेद ८.१०१.१६ – मनुष्य अल्पबुद्धि होकर गाय को मारे कांटे नहीं.
अथर्ववेद १०.१.२९ – तू हमारे गाय, घोरे और पुरुष को मत मार.
अथर्ववेद १२.४.३८ -जो (वृद्ध) गाय को घर में पकाता हैं उसके पुत्र मर जाते हैं.
अथर्ववेद ४.११.३- जो बैलो को नहीं खाता वह कस्त में नहीं पड़ता हैं
ऋगवेद ६.२८.४ – गोए वधालय में न जाये
अथर्ववेद ८.३.२४ – जो गोहत्या करके गाय के दूध से लोगो को वंचित करे , तलवार से उसका सर काट दो
यजुर्वेद १३.४३ – गाय का वध मत कर , जो अखंडनिय हैं
अथर्ववेद ७.५.५ – वे लोग मूढ़ हैं जो कुत्ते से या गाय के अंगों से यज्ञ करते हैं
यजुर्वेद ३०.१८- गोहत्यारे को प्राण दंड दो
वेदों से गो रक्षा के प्रमाण दर्शा कर स्वामी दयानन्द जी ने महीधर के यजुर्वेद भाष्य में दर्शाए गए अश्लील, मांसाहार के समर्थक, भोझिल कर्म कांड का खंडन कर उसका सही अर्थ दर्शा कर न केवल वेदों को अपमान से बचा लिया अपितु उनकी रक्षा कर मानव जाती पर भारी उपकार भी किया.
उदहारण के लिए

महीधर अपने भाष्य में यजुर्वेद २३/१९ का अर्थ इस प्रकार करते हैं- सब ऋत्विजों के सामने यजमान की स्त्री घोरे के पास सोवे, और सोती हुई घोरे से कहे की, हे अश्व ! जिससे गर्भ धारण होता हैं, ऐसा जो तेरा वीर्य हैं उसको मैं खैंच के अपनी योनी में डालूं , तथा तू उस वीर्य को मुझमें स्थापन करने वाला हैं.

ऐसे अश्लील एवं व्यर्थ अर्थ को नक्कारते हुए स्वामी दयानंद इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार करते हैं जो परमात्मा गणनीय पदार्थो का पालन करने हारा हैं उसको हम लोग पूज्य बुद्धि से ग्रहण करते हैं जो की हमारे मित्र और मोक्ष सुख आदि का प्रियपति तथा हमको आनंद में रख कर सदा पालन करने वाला हैं, उसको हम लोग अपना उपास्य देव जन के ग्रहण करते हैं. जो की विद्या और सुख आदि का निधि अर्थात हमारे कोशो का पति हैं, उसी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को हम अपना राजा और स्वामी मानते हैं. तथा जो की व्यापक होके सब जगत में और सब जगत उसमें बस रहा हैं, इस कारण से उसको वसु कहते हैं. हे वसु परमेश्वर! जो आप अपने सामर्थ्य से जगत के अनादिकरण में गर्भ धारण करते हैं, अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों को आप ही रचते हैं.

महीधार अपने भाष्य में यजुर्वेद २३/२० का अर्थ इस प्रकार करते हैं- यजमान की स्त्री घोरे के लिंग को पकड़ कर आप ही अपनी योनी में डाल देवे.

ऐसे अश्लील एवं व्यर्थ अर्थ को नक्कारते हुए स्वामी दयानंद इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार करते हैं राजा और प्रजा हम दोनों मिल के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के प्रचार करने में सदा प्रवित रहे. जिससे हम दोनों परस्पर तथा सब प्राणियो को सब सुख से परिपूर्ण कर देवें. जिस राज्य में मनुष्य लोग अच्छी प्रकार ईश्वर को जानते हैं, वही देश सुख युक्त होता हैं. इससे राजा और प्रजा परस्पर सुख के लिए सद्गुणों के उपदेशक पुरुष की सदा सेवा करे, और विद्या तथा बल को सदा बदावे.

यजुर्वेद के २३ वें अध्याय का इसी प्रकार महीधर ने अत्यंत अश्लील अर्थ किया हैं जिसका सही अर्थ भाष्यकार-शंका-समाधान-आदि-विषय नामक पाठ में स्वामी दयानंद द्वारा रचित ऋगवेदादि भाष्य भूमिका में पड़ा जा सकता हैं.