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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

वैदिक ग्रंथों में वर्ण - व्यवस्था

वैदिक ग्रंथों में वर्ण-व्यवस्था

वैदिक ग्रंथों के अनुसार वर्ण-व्यवस्था गुण-कर्म-स्वभावानुसार होती है, जन्म से नहीं | क्षत्रिय,
वैश्य और शुद्र कुल में उत्पन्न होकर भी वह ब्राह्मण हो सकता है | छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित जाबाल ऋषि अज्ञात कुल के, महाभारत में
विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण और मातंग ऋषि चाण्डाल कुल के होने पर
भी ब्राह्मण हो गये | अब भी जो उत्तम स्वभाववाला है वही ब्राह्मण के
योग्य और मुर्ख शुद्र के योग्य होता है और आगे भी ऐसा ही होगा | रज-
वीर्य के संयोग से ब्राह्मण शरीर नहीं बनता अपितु-
स्वध्यायेन जपैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः |
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्यीयं क्रियते तनु; || -मनु० २ |२८
पढ़ने-पढ़ाने विचार करने-कराने, नानाविधि होम के अनुष्ठान, सम्पूर्ण
वेदों को शब्द, अर्थ, सम्बन्धपूर्वक तथा स्वरोच्चारण के साथ पढ़ने-पढ़ाने,
पौर्णमास आदि यज्ञों के करने, धर्म से सन्तानों की उत्पत्ति, पञ्च
महायज्ञों और अग्निष्टोमादि यज्ञों के करने, विद्वानों का संग एवं सत्कार
करने, सत्यभाषण, परोपकार आदि सत्कर्म और शिल्पविद्या आदि पढ़कर
दुष्टाचार को छोड़कर श्रेष्ठाचार में वर्त्तने से यह शरीर ब्राह्मण
का किया जाता है |
जो कोई रजवीर्य के योग से वर्णाश्रम व्यवस्था माने और गुण-कर्मों के
योग से न माने तो उससे पूछना चाहिए कि जो कोई अपने वर्ण को छोड़
नीच, अन्त्यज अथवा क्रिश्चयन या मुसलमान
हो गया हो तो उसको भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते? वह
यही कहेगा कि उसने ब्राह्मण के कर्म छोड़ दिये, इसलिए वह ब्राह्मण
नहीं है | इससे यह सिद्ध हुआ है कि जो ब्राह्मणादि उत्तम कर्म करते हैं वे
ही ब्राह्मण आदि और जो नीच भी उत्तम गुण-कर्म-स्वभाववाला होवे
तो उसको भी उत्तम वर्ण में गिनना चाहिए और जो उत्तम वर्णस्थ होकर
नीच काम करे तो उसे नीच वर्ण में गिनना चाहिए | वेद में भी गुण-कर्म-
स्वभावानुसार वर्ण-व्यवस्था का वर्णन है -
ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः |
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यांशूद्रो अजायत || -यजु० ३१ | ११
परमात्मा की इस सृष्टि में जो मुख के सदृश सबमें मुख्य, अर्थात् सर्वोत्तम
हो वह ब्राह्मण, जिसमें बल-वीर्य अधिक हो वह क्षत्रिय, कटी के
अधो भाग और जानु के ऊपर वाले भाग का नाम ऊरू है | अतः जो सब
देशों में व्यापार के निमित्त ऊरू के बल से आए-जाए वह वैश्य और पग
अर्थात् नीचे अंग के सदृश मूर्खत्वादि गुणवाला शूद्र है |
चारों वर्णों में जिस-जिस वर्ण के सदृश जो-जो पुरुष या स्त्री होँ वे
उसी वर्ण में गिने जाएँ | महर्षि मनु ने भी कहा है-
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् |
क्षत्रीयाज्ज्तमेवं तू विद्याद्वैश्या त्तथैव च || -मनु० १० | ६५
जो शूद्रकुल में उत्पन्न होके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान गुण-
कर्म-स्वभाववाला हो तो वह शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाए |
वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकुल में उत्पन्न हुआ हो, परन्तु
उसके गुण-कर्म-स्वभाव शूद्र के तुल्य होँ तो वह शूद्र हो जाए |
इसी प्रकार क्षत्रिय या वैश्य के कुल में उत्पन्न होके ब्राह्मण अथवा शूद्र
के समान होने से ब्राह्मण और शूद्र भी हो जाता है |
इस विषय में आपस्तम्ब के निम्नलिखित दो सूत्र द्रष्टव्य हैं-
धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृतौ |
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृतौ ||
अर्थात् धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम-उत्तम वर्ण को प्राप्त
होता है और वह उसी वर्ण में गिना जाता है, जिस-जिस वर्ण के वह योग्य
होता है | अधर्माचरण से पूर्व-पूर्व अर्थात् उत्तम-उत्तम वर्णवाला मनुष्य
अपने से नीचे-नीचे वर्णों को प्राप्त होता है और उसी वर्ण में गिना जाता है
|
जैसे पुरुष अपने गुण कर्मों के अनुसार अपने वर्ण के योग्य होता है,
वैसी ही व्यवस्था स्त्रियों के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिए |
वर्ण-व्यवस्था के लाभ
गुण-कर्म-स्वभावानुसार वर्ण-व्यवस्था होने से सब वर्ण अपने-अपने गुण-
कर्म और स्वभाव से युक्त होकर शुद्धता के साथ रहते हैं | वर्ण-
व्यवस्था के ठीक परिपालन से ब्राह्मण के कुल में ऐसा कोई व्यक्ति न रह
सकेगा जोकि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के गुण-कर्म-स्वभाववाला हो |
इसी प्रकार अन्य वर्ण अर्थात् क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी अपने शूद्ध
स्वरूप में रहेगें, वर्णसंकरता नहीं होगी |
गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था में किसी वर्ण
की निन्दा या अयोग्यता का भी अवसर नहीं रहता |
ऐसी अवस्था रखने से मनुष्य उन्नतिशील होता है, क्योंकि उत्तम
वर्णों को भय होगा कि यदि हमारी सन्तान मुर्खत्वादि दोषयुक्त
होगी तो वह शूद्र हो जाएगी और सन्तान भी डरती रहेगी कि यदि हम उक्त
चाल-चलनवाले और विद्यायुक्त न होंगे तो हमें शूद्र होना पड़ेगा |
गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था होने से नीच वर्णों का उत्तम वर्णस्थ होने
के लिये उत्साह बढ़ता है |
गुण-कर्मों से वर्णों की यह व्यवस्था कन्याओं की सोलहवें और
पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिए और इसी क्रम
से अर्थात् ब्राह्मण का ब्राह्मणी और शूद्र का शूद्रा के साथ विवाह
होना चाहिए तभी अपने-अपने वर्णों के कर्म और परस्पर
प्रीति भी यथायोग्य रहेगी |
वर्णों के कर्तव्य
इन चारों वर्णों के कर्तव्य-कर्म और गुण ये हैं | ब्राह्मण-
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा |
दानं प्रतिग्रहश्चेव ब्राह्मणानामकल्प्यत् || -मनु० १ | ८८
शमो दमस्तपः शौचं क्षन्तिरार्जवमेव च |
ज्ञानं विज्ञानमास्तिवयं ब्रह्मकर्मस्वभावजम् || -गीता० १८ | ४२
ब्राह्मण के पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान
लेना- ये छह कर्म हैं, परन्तु इनमे दान लेना नीच कर्म है | इनके साथ
ही (शमः) मन से बुरे काम की इच्छा भी न करनी उसे अधर्म में कभी प्रवृत
न होने देना (दमः) आँख, नाक, कान आदि इन्द्रियों को अन्यायाचरण से
रोककर धर्म में चलाना (तपः) सदा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होके धर्मानुष्ठान
करना (शौच) जल से बाहर की अपवित्रता और राग-द्वेष आदि को दूर कर
भीतर से पवित्र रहना, (क्षान्ति) निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख, हानि-लाभ में
हर्ष-शोक छोड़कर धर्मानुष्ठान में दृढ रहना (ज्ञान)
वेदादि शास्त्रों को सांगोपांग पढ़के पढ़ाने का सामर्थ्य और विवेक-
सत्यासत्य का निर्णय, जो वस्तु जैसी हो अर्थात् जड़ को जड़ और चेतन
को चेतन मानना, (विज्ञान) पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त
पदार्थों को जानकर उनसे यथायोग्य उपयोग लेना, (आस्तिक्य) वेद, ईश्वर,
मुक्ति, पुनर्जन्म, धर्म, माता-पिता आदि की सेवा को न छोड़ना और
इनकी निन्दा कभी न करना- ये कर्म और गुण ब्राह्मण-वर्णस्थ मनुष्यों में
अवश्य होने चाहिएँ |
क्षत्रिय- प्रजानां रक्षणम् दानमिज्याध्ययनमेव च |
विषयेश्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः || -मनु० १ | ८९
शोर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् |
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् || -गीता० १८ | ४३
(प्रजारक्षण) न्याय से प्रजा का पालन, (दान) विद्या और धर्म
की वृद्धि के लिये सुपात्रों को दान देना, (इज्या) अग्निहोत्र आदि यज्ञ
करना वा कराना, (अध्ययन) वेदादि शास्त्रों का पढ़ना-पढ़वाना,
(विषयेश्वप्रसक्तिः) विषयों में न फँसकर जितेन्द्रिय रहके सदा शरीर और
आत्मा से बलवान् रहना, (शौर्य) अकेला होने पर भी सैकड़ों, सहस्त्रों से
भी युद्ध करने में भयभीत न होना, (तेजः) सदा तेजस्वी, दीनता रहित होना,
(धृतिः) धैर्यवान् होना, (दाक्ष्यम्) राजा और प्रजा-सम्बन्धी व्यवहार और
सब शास्त्रों में अति चतुर होना, (युध्ये चाप्यपलायनम्) युद्ध से पीठ न
दिखाना, निर्भय और निःशंक होकर इस प्रकार से युद्ध
करना कि अपनी विजय होवे और आप बचें | इसके लिए भागने और शत्रुओं
को धोखा देने से जीत होती हो तो वैसा ही करना, (दानम्)
दानशीलता रखना, (ईश्वरभावः) पक्षपातरहित होके सबके साथ यथायोग्य
बर्त्तना, विचार के दण्ड देना, प्रतिज्ञा पूरी करना- ये ग्यारह क्षत्रिय
वर्ण के कर्म और गुण हैं |
वैश्य- पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च |
वाणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च || -मनु० १ | ९० (पशुरक्षा) गाय
आदि पशुओं का पालन और वर्धन, (दानम्) विद्या और धर्म
की वृद्धि करने-कराने के लिए धनादि का व्यय करना, (अध्ययनम्)
वेदादि शास्त्रों का पढ़ना, (वाणिक्पथम्) सब प्रकार के व्यापार
करना (कुसीदम्) एक सैकडे में चार, छह, बारह, सोलह, वा बीस आनों से
अधिक व्याज और मूल से दुगुना अर्थात् एक रूपया दिया हो तो सौ वर्ष में
भी दो रुपये से अधिक न लेना, न देना और (कृषि) खेती करना- ये वैश्य के
गुण-कर्म हैं |
शुद्र- एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् |
ऐतेषामेव वर्णानां शुश्रुषामनसूयया || -मनु० १ | ९१
शूद्र को योग्य है कि निन्दा, ईर्ष्या, अभिमान आदि दोषों को छोड़के
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा करते हुए अपने जीवन का निर्वाह
करे | यही एक शूद्र का गुण-कर्म है |
ये चार वर्ण प्रत्येक देश और समाज के लिए आवश्यक हैं | इनके
बिना राष्ट्र में सुव्यवस्था हो ही नहीं सकती | आधुनिक भाषा में
इनका नामकरण इस प्रकार किया जा सकता है- १. अध्यापक=Teachers,
२. रक्षक= Warriors, ३. पोषक= traders, और ४. सेवक= Servant.

पुराणों के कृष्ण बनाम महाभारत के कृष्ण

पुराणों के कृष्ण बनाम महाभारत के कृष्ण

स्वामी दयानंद सरस्वती अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में श्री कृष्ण
जी महाराज के बारे में लिखते हैं की पूरे महाभारत में श्री कृष्ण के चरित्र में
कोई दोष नहीं मिलता एवं उन्हें आपत पुरुष कहा हैं.स्वामी दयानंद श्री कृष्ण
जी को महान विद्वान सदाचारी, कुशल राजनीतीज्ञ एवं सर्वथा निष्कलंक
मानते हैं फिर श्री कृष्ण जी के विषय में चोर, गोपिओं का जार (रमण करने
वाला), कुब्जा से सम्भोग करने वाला, रणछोड़ आदि प्रसिद्द
करना उनका अपमान नहीं तो क्या हैं.श्री कृष्ण जी के चरित्र के विषय में
ऐसे मिथ्या आरोप का अधर क्या हैं? इन गंदे आरोपों का आधार हैंपुराण.
आइये हम सप्रमाण अपने पक्ष को सिद्ध करते हैं.
पुराण में गोपियों से कृष्ण का रमण करना ....??
विष्णु पुराण अंश ५ अध्याय १३ श्लोक ५९,६० में लिखा हैं,वे गोपियाँ अपने
पति, पिता और भाइयों के रोकने पर भी नहीं रूकती थी रोज रात्रि को वे
रति “विषय भोग” की इच्छा रखने वाली कृष्ण के साथ रमण “भोग”
किया करती थी. कृष्ण भी अपनी किशोर अवस्था का मान करते हुए रात्रि के
समय उनके साथ रमण किया करते थे.
कृष्ण उनके साथ किस प्रकार रमण करते थे पुराणों के रचियता ने श्री कृष्ण
को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हैं. भागवत पुराण स्कन्द १०
अध्याय ३३ शलोक १७ में लिखा हैं -
कृष्ण कभी उनका शरीर अपने हाथों से स्पर्श करते थे, कभी प्रेम
भरी तिरछी चितवन से उनकी और देखते थे, कभी मस्त हो उनसे खुलकर
हास विलास ‘मजाक’ करते थे.जिस प्रकार बालक तन्मय होकर
अपनी परछाई से खेलता हैं वैसे ही मस्त होकर कृष्ण ने उन ब्रज सुंदरियों के
साथ रमण, काम क्रीरा ‘विषय भोग’ किया.
ऐसे अभद्र विचार कृष्णा जी महाराज कोकलंकित करने के लिए भागवत के
रचियता नें स्कन्द १० के अध्याय २९,३३ में वर्णित किये हैं
जिसका सामाजिक मर्यादा का पालन करते हुए मैं वर्णन नहीं कर रहा हूँ.
राधा और कृष्ण का पुराणों में वर्णन........??
राधा का नाम कृष्ण के साथ में लिया जाता हैं. महाभारत में राधा का वर्णन
तक नहीं मिलता. राधा का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में अत्यंत अशोभनिय
वृतांत का वर्णन करते हुए मिलता हैं.
ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खंड अध्याय ३ शलोक ५९,६०,६१,६२ में
लिखा हैं की गोलोक में कृष्ण की पत्नी राधा ने कृष्ण को पराई औरत के
साथ पकरलिया तो शाप देकर कहाँ – हे कृष्ण ब्रज के प्यारे , तू मेरे सामने
से चला जा तू मुझे क्यों दुःख देता हैं –हे चंचल , हे अति लम्पट कामचोर मैंने
तुझे जान लिया हैं. तू मेरे घर से चला जा. तू मनुष्यों की भांति मैथुन करने में
लम्पट हैं, तुझे मनुष्यों की योनी मिले, तू गौलोक से भारत में चला जा. हे
सुशीले, हे शाशिकले, हे पद्मावती, हे माधवों! यह कृष्ण धूर्त हैं इसे निकल
कर बहार करो, इसका यहाँ कोई काम नहीं.
ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खंड अध्याय १५ में राधा का कृष्ण से रमण
का अत्यंत अश्लील वर्णन लिखा हैं जिसका सामाजिक मर्यादा का पालन
करते हुए में यहाँ विस्तार से वर्णन नहीं कर रहा हूँ.
राधा का कृष्ण के साथ सम्बन्ध भी भ्रामक हैं. राधा कृष्ण के बामांग से
पैदा होने के कारण कृष्ण की पुत्री थी अथवा रायण से विवाह होने से कृष्ण
की पुत्रवधु थी चूँकि गोलोक में रायणकृष्ण के अंश से पैदा हुआ था इसलिए
कृष्ण का पुत्र हुआ जबकि पृथ्वी पर रायण कृष्ण की माता यसोधा का भाई
था इसलिए कृष्ण का मामा हुआ जिससे राधा कृष्ण की मामी हुई.
कृष्ण की गोपिओं कौन थी..............?
पदम् पुराण उत्तर खंड अध्याय २४५ कलकत्ता से प्रकाशित में लिखा हैं
कीरामचंद्र जी दंडक -अरण्य वन में जब पहुचें तो उनके सुंदर स्वरुप
को देखकर वहां के निवासी सारे ऋषि मुनि उनसे भोग करने की इच्छा करने
लगे. उन सारे ऋषिओं ने द्वापर के अंत में गोपियों के रूप में जन्म लिया और
रामचंद्र जी कृष्ण बने तब उन गोपियोंके साथ कृष्ण ने भोग किया. इससे उन
गोपियों की मोक्ष हो गई. वर्ना अन्य प्रकार से उनकी संसार
रुपी भवसागर से मुक्ति कभी न होती.
क्या गोपियों की उत्पत्ति का दृष्टान्त बुद्धि से स्वीकार
किया जा सकता हैं.........?
श्री कृष्ण जी महाराज का वास्तविक रूप :अभी तक हम पुराणों में
वर्णित....गोपियों के दुलारे, राधा के पति, रासलीला रचाने वाले कृष्ण के
विषय में पढ़ रहे थे जो निश्चित रूप से असत्य हैं.
================
अब हम योगिराज, निति निपुण , महान कूटनीतिज्ञ श्री कृष्ण जी महाराज
के विषय में उनके सत्य रूप को जानेगे.आनंदमठ एवं वन्दे मातरम के
रचियता बंकिम चन्द्र चटर्जी जिन्होंने ३६ वर्ष तक महाभारत पर
अनुसन्धान कर श्री कृष्ण जी महाराज पर उत्तम ग्रन्थ लिखा ने कहाँ हैं
की महाभारत के अनुसार श्री कृष्ण जी की केवल एक
ही पत्नी थी जो की रुक्मणी थी, उनकी २ या ३ या १६००० पत्नियाँ होने
का सवाल ही पैदा नहीं होता. रुक्मणी से विवाह के पश्चात श्री कृष्ण
रुक्मणी के साथ बदरिक आश्रम चले गए और १२ वर्ष तक तप एवं
ब्रहमचर्य का पालन करने के पश्चात उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम
प्रदुमनथा. यह श्री कृष्ण के चरित्र के साथ अन्याय हैं की उनका नाम
१६००० गोपियों के साथ जोड़ा जाता हैं.
महाभारत के श्री कृष्ण जैसा अलोकिक पुरुष , जिसे कोई पाप
नहीं किया और जिस जैसा इस पूरी पृथ्वी पर कभी-कभी जन्म लेता हैं.
स्वामी दयानद जी सत्यार्थ प्रकाश में वहीँ कथन लिखते हैं जैसा बंकिम
चन्द्र चटर्जी ने कहाँ हैं. पांड्वो द्वारा जब राजसूय यज्ञ
किया गया तो श्री कृष्ण जी महाराज को यज्ञ का सर्वप्रथम अर्घ प्रदान
करने के लिए सबसे ज्यादा उपर्युक्त समझा गया जबकि वहां पर अनेक
ऋषि मुनि , साधू महात्मा आदि उपस्थित थे.वहीँ श्री कृष्ण जी महाराज
की श्रेष्ठता समझे की उन्होंने सभी आगंतुक अतिथियो के धुल भरे पैर धोने
का कार्य भार लिया. श्रीकृष्ण जी महाराज को सबसे बड़ा कूटनितिज्ञ
भी इसीलिए कहा जाता हैं क्यूंकि उन्होंने बिना हथियार उठायेन केवल दुष्ट
कौरव सेना का नाश कर दिया बल्कि धर्म की राह पर चल रहे
पांडवो को विजय भी दिलवाई.
ऐसे महान व्यक्तित्व पर चोर, लम्पट, रणछोर, व्यभिचारी, चरित्रहीन ,
कुब्जा से समागम करने वाला आदि कहना अन्याय नहीं तो और क्या हैं और
इस सभीमिथ्या बातों का श्रेय पुराणों को जाता हैं.
इसलिए महान कृष्ण जी महाराज पर कोई व्यर्थ का आक्षेप न लगाये एवं
साधारणजनों को श्री कृष्ण जी महाराज के असली व्यक्तित्व को प्रस्तुत
करने के लिए पुराणों का बहिष्कार आवश्यक हैं और वेदों का प्रचार
आती आवश्यक हैं.
और फिर भी अगर कोई न माने तो उन पर यह लोकोक्ति लागु होती हैं-
जब उल्लू को दिन में न दिखे तो उसमें सूर्य का क्या दोष है?

सोमवार, 9 सितंबर 2013

वैदिक ऋषि मंत्रकर्ता नहीं वरण मंत्रद्रष्टा हैं.

वैदिक ऋषि मंत्रकर्ता नहीं वरण मंत्रद्रष्टा हैं.

वेदों के विषय में एक विभ्रांति यह प्रचलित हैं कि वेद के मन्त्रों, सूक्तों अथवा अध्यायों की रचना उन ऋषियों ने की हैं जिनके नाम उनके आरंभ में लिखे रहते हैं. इस धारणा का मूल स्रोत्र मेक्स मूलर , कीथ , मेक डोनल और वेबर हैं.कुछ मन्त्रों के जो ऋषि हैं उनके नाम स्वयं उन मन्त्रों के भीतर पाए जाते हैं. इससे पाश्चात्य विद्वान और अधिक दृढ़ता से यह परिणाम निकालते हैं की ऋषि वेद मन्त्रों के रचियता ही हैं अर्थात ऋषियों को पाश्चात्य विद्वान मंत्रकृत: मानते हैं.
वैदिक मत के प्रख्यात समर्थक और प्रकांड विद्वान स्वामी दयानंद सरस्वती का मंतव्य इससे भिन्न हैं क्यूंकि स्वामी जी वेदों को ईश्वर का दिया ज्ञान मानते हैं और उन्हें अपौरूषेय अर्थात किसी मानव विशेष अथवा ऋषि द्वारा वेदों के मन्त्रों की रचना को अस्वीकार करते हैं.स्वामी दयानंद जी का वेद के मन्त्रों के ऋषि के विषय में जिनका उल्लेख वेदों की अनुक्रमनियों में पाया जाता हैं मानना हैं कि प्राचीन काल में इन ऋषियों ने अमुक अमुक मंत्र या सूक्तों का मनन किया था, उनके अर्थों को समझा था, उनके भाष्य उस व्याख्याएं लिखी थी और उनका प्रचार किया था. उनकी स्मृति आदरार्थ वेद के अध्येता आर्य लोग उन उन मन्त्रों और सूक्तों पर उनके नाम लिखते चले आ रहे हैं. स्वामी दयानंद जी कि इस मान्यता कि सप्रमाण पुष्टि इन तथ्यों कि समीक्षा करने से होती हैं-
१. एक मंत्र कि रचना अनेक ऋषि नहीं कर सकते
२. एक ही मंत्र के दूसरे स्थान पर पुनरावृति होने पर अलग ऋषि का वर्णन
३. मन्त्रों में दिया गए ऋषियों के नामों का समाधान
४. ऋषि यास्क वेदमंत्रों के साक्षात्कार और द्रष्टा ऋषियों के विषय में मान्यता
१. एक मंत्र कि रचना अनेक ऋषि नहीं कर सकते !
अगर हम ऋषियों को वेद मन्त्रों का रचियता माने तो एक वेद मंत्र की रचना एक ही ऋषि के द्वारा होनी चाहिए जबकि वेदों में अनेक मंत्र ऐसे हैं जिनके दो (ऋग्वेद ३.२३) अथवा तीन (सामवेद ९५५, १०३१ मंत्र संख्या ) अथवा चार (ऋग्वेद ५/२४ सूक्त) अथवा पञ्च (ऋग्वेद ५/२७ सूक्त) अथवा सात (ऋग्वेद ९./०७) अथवा एक सौ (ऋग्वेद ९/६६) अथवा हज़ार हज़ार तक (ऋग्वेद ८/३४/१६-१८  ) ऋषि हैं.
एक ही मंत्र को बनाने वाले एक से अधिक ऋषि नहीं हो सकते. जिस प्रकार कहीं भी एक ही कविता को बनाने वाले एक से अधिक कवि सुनने को नहीं मिलते उसी प्रकार अगर वेद के मन्त्रों के रचियता ऋषियों को माने तो एक वेद मंत्र का ऋषि एक ही होने चाहिए पर ऐसा नहीं हैं , इससे स्वामी दयानंद के इस कथन कि पुष्टि होती हैं कि वेद मन्त्रों कि रचना ऋषियों द्वारा नहीं अपितु ईश्वर द्वारा हुई हैं.
२. एक ही मंत्र के वेद में दूसरे स्थान पर पुनरावृति होने पर अलग ऋषि का वर्णन हैं.
अगर हम मान भी ले की वेद के मन्त्रों की रचना ऋषियों द्वारा हुई हैं तो भी अगर एक ही मंत्र वेद में दूसरे स्थान पर दोबारा आया हैं अर्थात अगर उसकी पुनरावृति हुई हैं तो दोनों स्थानों पर उस मंत्र के ऋषि एक ही होने चाहिए परन्तु ऐसा नहीं हैं. जैसे ऋग्वेद १.२३.२१-२३ में आप: पृणीत भेषजं आदि मन्त्रों के ऋषि मेधातिथि काण्व हैं जबकि ऋग्वेद १०.९.७-९ में इन ही मन्त्रों के ऋषि वाम्बरीष: हैं. इसी प्रकार ऋग्वेद १.१३.९ के ऋषि मेधातिथि काण्व हैं जबकि ऋग्वेद ५.५८ में इसी मंत्र के ऋषि वसुश्रुत आत्रेय: हैं. इसी प्रकार अग्ने नय सुपथा मंत्र के ऋषि यजुर्वेद ५.३६ में अगस्त्य ऋषि हैं, यजुर्वेद ७.४३ में अंगिरस हैं और यजुर्वेद ४०.१६ में दीर्घतमा हैं.इस प्रकार के अनेकों प्रमाण हैं जिनसे यह स्पष्ट होता हैं की वेदों में एक ही मंत्र के अनेक ऋषि हैं जोकि उन मन्त्रों के रचनाकार नहीं अपितु मंत्रद्रष्टा अथवा भाष्यकार हैं.
३. मन्त्रों में दिया गए ऋषियों के नामों का समाधान
वेद के कुछ मन्त्रों में ऋषियों का नाम आता हैं जिनसे पाश्चात्य विद्वान यह निष्कर्ष निकल लेते हैं की यह इस मंत्र के ऋषि का नाम हैं जिनके द्वारा इस मंत्र की रचना हुई थी. जैसे वेद मन्त्र में वशिष्ट पद आया हैं अत: वशिष्ट ऋषि को उनका रचियता क्यूँ नहीं माना जाये. इसका समाधान मीमांसा दर्शन के रचियता ऋषि जैमिनी सूत्र १.१.३१ में देते हुए कहते हैं की वेद कें व्यक्ति विशेष का नाम नहीं हुआ करता. वे सब शब्द यौगिक हुआ करते हैं. प्रसंग, प्रकरण और धातु अर्थ के नाम पर उनका योगिक अर्थ लेकर उनका कोई संगत और उपयुक्त अर्थ कर लेना चाहिए. जैसे वसिष्ट शब्द का अर्थ अपने अन्दर उत्तम गुणों को बसाने वाला और दूसरे लोगों को बसने में सहायता देने वाला हैं. जिन ऋषि ने वसिष्ठ मंत्र वाले पद की व्याख्या करी उन्हें यह नाम इतना पसंद आया की उन्होंने अपना उपनाम वसिष्ठ ही रख लिया. इस प्रकार मंत्र के द्रष्टा का नाम मंत्र में भी मिलने लगा पर उसकी तूलना मंत्र के भाष्यकार से करना गलत हैं.

४. ऋषि यास्क वेदमंत्रों के साक्षात्कार और द्रष्टा ऋषियों के विषय में मान्यता

ऋषि यास्क वेदों के अति प्राचीन कोशकार और व्याख्याकार हैं. उनके द्वारा रचित निघंटु और निरुक्त का अध्ययन किये बिना कोई व्यक्ति वेद के महान सरोवर में प्रवेश करते की क्षमता प्राप्त नहीं कर सकता.निरुक्त में दिए गए नियमों और सिद्धांतों के आधार पर ही वेद को समझा जा सकता हैं. ऋषि यास्क ने स्पष्ट लिखा हैं आदिम ऋषि साक्षात्कृतधर्मा थे- निरुक्त १.१९ अर्थात आदिम ऋषियों ने परमात्मा द्वारा उनके उनके ह्रदयों में प्रकाशित किये गए मन्त्रों और उनके अर्थों का दर्शन, साक्षात्कार किया और फिर आने वाले ऋषियों ने ताप और स्वाध्याय द्वारा मन्त्रों के अर्थों का दर्शन किया. ऋषि की परिभाषा करते हुए यास्क लिखते हैं की ऋषि का अर्थ होता हैं द्रष्टा, देखने वाला, क्यूंकि स्वयंभू वेद तपस्या करते हुए इन ऋषियों पर प्रकट हुआ था, यह ऋषि का ऋषित्व हैं – निरुक्त २.११. अर्थात वेद का ज्ञान नित्य हैं और सदा से विद्यमान हैं. उसे किसी ने बनाया नहीं अपितु ऋषियों ने ताप और स्वाध्याय से उनके अर्थ को समझा हैं.  इस प्रकार स्वामी दयानंद की वेद मन्त्र के द्रष्टा रुपी मान्यता का मूल स्रोत्र यास्क ऋषि द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत हैं.

इन तर्कों से यह सिद्ध होता हैं की ऋषि वेद मन्त्रों के कर्ता नहीं अपितु द्रष्टा हैं.