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रविवार, 2 मार्च 2014

आर्यों की भारत में घुसपैठ के झूठ की जड़


आर्यों की भारत में घुसपैठ के झूठ की जड़

आर्यों की भारत में घुसपैठ के झूठ की जड़

(एक) मूल कारण है, एशियाटिक सोसायटी।  
कितने वर्षों से यह प्रश्न मुझे सता रहा था। प्रश्न था, कि कहां से यह “आर्यन इन्वेज़न ऑफ इंण्डिया” का झूठ फैलाया गया?  इसके पीछे कौनसा उद्देश्य और कौन सी शक्तियां काम कर रही थीं? भारतीय मानस को इसने, ऐसे विषैले झूठ से सराबोर कर दिया कि आज तक इस कुटिल धारणा से सामान्य भारतीय जानकार, मुक्त नहीं हो पाया है। जाने अनजाने हम अपने ही देश में पराए होते चले गए; विभाजित होते चले गए।
==>इस झूठ का  कारण है, एशियाटिक सोसायटी। 
जो एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल, १७८६ में विलियम जोन्स ने स्थापी थीं,  उसी की लन्दन शाखा में आगे, १८६६ में, जो षड्यंत्र रचा गया, वही इस मिथ्या-अवधारणा का कारण है।
प्रत्येक वर्ष एशियाटिक सोसायटी अपनी बैठकों के वृत्तान्तों का वार्षिक (Yearly Reports of Society’s Proceedings) संचयन प्रकाशित किया करती थीं।अनुमान है, कि, उन्हीं वृत्तान्तोंमें से इस झूठ को पकड़ा गया है। यह है, आर्य-अतिक्रमण’ का  झूठ। प्राकृत रिसर्च इन्स्टिट्यूट, वैशाली, बिहार के, डॉ. डीएस त्रिवेदी ने इस झूठ का स्फोट किया। संक्षेप में मैं इसी वृत्तान्त का आधार लेकर आलेख प्रस्तुत करता हूं।
डॉ.त्रिवेदी नें एक बड़े झूठ का भंडाफोड़ कर, क्रान्तिकारी सच्चाई को उजागर  किया है। यह जानकारी डॉ. त्रिवेदी नें अंग्रेज़ी शोधपत्रों में १९९२ में छपवाई, परिणाम, वह छपी तो सही, पर छपकर ही रह गयी।
(दो) इसे हिंदी में छपना चाहिए था।
ऐसे महत्त्वपूर्ण शोधपत्रों के  कम से कम, संक्षिप्त समाचार, भारतीय संचार माध्यमों मे छपने चाहिए। हिंदी में छपते तो कुछ तो हमारा समाज जाग्रत होता, कुछ जानकारी पाता, तो मानसिक रीति से मुक्त भी होता। फिर प्रादेशिक भाषाओं में भी फैल जाता। ऐसी जानकारी, भारतीय मानस को शनैः शनैः ही स्वतंत्र होने में सहायता अवश्य करती। उन पत्रों में उन्हें कई गुना परिश्रम करना पडता है। डॉ. त्रिवेदी ने अंग्रेज़ को रंगे हाथ पकडा है। रक्त रंजित हाथ है और छुरी भी है।
बाकी शोधपत्र  भी ढेरों लिखे गए हैं, पर वे सारे परोक्ष भी हैं, और अंग्रेज़ी में भी होते हैं। सुई खोई है, घास की गंजी में, पर ढूंढ़ते हैं हम उसे अंग्रेज़ी के दीप तले।इस लिए भी हम स्वतंत्र नहीं हो रहे।
(तीन) कड़वे रस में डुबा गुलाब जामुन
सोचता हूं कि यदि गुलाब जामुन को शक्कर के बदले, कड़वे रस में  डुबाया जाए तो वह पूरा का पूरा कड़वा हो जाएगा। बस वैसे ही भारतीय मानस को अंग्रेज़ आत्म-द्वेष, स्वभाषा-द्वेष, स्व-संस्कृति द्वेष, इत्यादि के कड़वे अंग्रेज़ी रस में सराबोर कर चला गया है। अंग्रेज़ी के सारे पुरस्कर्ता जब संसद में बोलते हैं, तो ग्लानि से मन भर जाता है।
सबेरे से रात तक, जो भी सोचता हूं तो अपनी सोच पर ही संदेह होता है। कहीं मेरी ही मानसिकता से निकलता हुआ चयन, दास्यता की, गुलामी की अभिव्यक्ति तो नहीं?
इतने सारे कुटिल मिशनरियों की, प्राच्यविदों की, विद्वानों की सेना हमें आत्मद्वेष से भरकर गयी है कि भारत मानसिक रीति से यदि स्वतंत्र हो जाए तो उसे संसार का आठवां आश्चर्य मानूंगा। जब हमारे विद्वान ही ब्रेनवॉश्ड (जान बूझकर लिखा) हुए हैं तो सामान्य जन की क्या कहें? जान लीजिए कि, आप-हम-भारत आज भी स्वतंत्र नहीं है। और ऐसे “ब्रेन वॉश्ड विद्वान” ही जब शिक्षक होते हैं, तो बालकों को भी क्या पढ़ाएंगे?  

(चार) लन्दन, रॉयल एशियाटिक सोसायटी की १८६६ की गुप्त बैठक

भारत को मतिभ्रमित (ब्रेन वॉश) करने के लिए, एक गुप्त बैठक १० अप्रैल १८६६ में, लन्दन की, रॉयल एशियाटिक सोसायटी में हुयी थी। वहां षड्यंत्र रचा गया था। जिसके अंतर्गत भारत में ’आर्य-अतिक्रमण’ के झूठे सिद्धान्त को तैराया गया था। उद्देश्य था उसके  परिणामस्वरूप भारत की प्रजा अंग्रेज़ों को परदेशी ना मानें। आर्य बहार से घुसे और अंग्रेज़ भी बहार से घुसे। दोनों का भारत पर समान अधिकार है; यह प्रमाणित करना।
A Secret meeting was held in the Royal Asiatic Society on April 10 1866, London when a conspiracy was hatched to induct the theory of Aryan Invasion of India, so that no Indian may say that the English are foreigners. “India was, ruled all along by outsiders and so the country must remain a slave under the Christian benign rule.”( The British wanted to justify their rule in India. To that end they tried to show all people here are outsiders,)
इस गुप्त बैठक में, इसाई पादरी एडवर्ड थॉमस ने ’आर्यन इन्वेज़न थियरी’ [ आर्य घुसपैठ का सिद्धान्त ] का  कपोलकल्पित सिद्धान्त  प्रस्तुत किया। लॉर्ड स्ट्रेंगफोर्ड बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।
धीरे-धीरे सुझाया गया कि तथाकथित आदिवासी, द्राविडी, आर्य, हूण, शक, राजपूत, और इस्लामपंथी इत्यादि, गुट अलग अलग ऐतिहासिक कालावधि में, भारत में, घुसकर शासन करते रहे हैं। इस प्रकार दिखाया गया कि जब भारत, सदा परदेशी घुसपैठियों से ही शासित हुआ है तो अंग्रेज़ी शासन से भारत को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भारतीयों को स्वतंत्रता की मांग करने का भी कोई कारण नहीं है।
(डॉ. डी, एस. त्रिवेदी, प्राकृत रिसर्च इन्स्टिट्यूट, वैशाली, बिहार)
” A clever clergyman Edward Thomas spelled the theory with Lord Strangford in the chair. Slowly and Slowly it was suggested that the so-called aborigines, Dravidians, Aryans, Hunas, Sakas, Rajputs and Muslims came at different epochs and ruled the country. Thus it was suggested that the country had been ruled by the foreign invaders and so there is nothing wrong if the Britishers are ruling the country. And, therefore, Indians had no right to demand independence.”
{Dr. D. S. Triveda, Professor, Prakrit Research Institute, Vaisali,Bihar}
(पांच) डॉ. अम्बेडकर का निरीक्षण-विश्लेषण 
एक अलग और तर्क शुद्ध प्रमाण डॉ. अम्बेडकर भी, वेदों का अध्ययन करने के पश्चात प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. अंबेडकरजी कहते हैं:
“आर्यों की भारत में घुसपैठ’ का सिद्धांत एक मन गढंत झूठी कहानी है। ऐसा झूठ आवश्यक था, एक दूसरे झूठ को पुष्ट करने के लिए। यह दूसरा झूठ, जो उन्हें वास्तव में प्रमाणित करना था; वह था:
====>” इन्डो-जर्मेनिक जाति शुद्ध आर्य वंश का प्रतिनिधित्व करती  है;” इस झूठ को प्रस्थापित करने के लिए, फिर भारत में आर्यों की घुसपैठ आवश्यक हो गयी। भारत में तथाकथित “इंडो जर्मेनिक आर्य” घुसकर आए बिना, जर्मन जाति का भारत से संबंध कैसे जुड़ता?  और इसलिए ऐसा झूठा सिद्धान्त फैलाया गया। इस  सिद्धान्त को प्रस्थापित करने के लिए फिर अन्य तर्क-कुतर्क भी लड़ाए गये।<==
– डॉ. अंबेडकर जी के उद्धरण का भावानुवाद है यह।
(छः)  आर्य, दास और दस्युं — डॉ. अम्बेडकर 
डॉ. अम्बेडकर जी ही आगे लिखते हैं।
(१) वेदों में  आर्य शब्द है, पर उस नाम से किसी प्रजाति का उल्लेख नहीं होता।
{वेदों में आर्य शब्द प्रयोग अवश्य है। उसका अर्थ होता है, उच्च संस्कारित व्यक्तित्व —जैसे  कृण्वन्तु विश्वं आर्यं –का अर्थ होता है, हम विश्व को संस्कारित कर ऊंचे उठाएंगे। —लेखक}
(२) वेदों में, आर्य प्रजाति की भारत में घुसपैठ का कोई प्रमाण नहीं है। और मूल निवासी दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त किए जाने का भी, कोई प्रमाण नहीं है।
(३) आर्यों, दासों  और दस्युओं में कोई प्रजातिगत भेद की पुष्टि  करता प्रमाण भी नहीं मिलता।
वैदिक आर्य, दास और दस्युओं से अलग रंग के थे इस की पुष्टि भी वेदों में नहीं मिलती।
यदि *मानवमिति* नामका कोई विज्ञान माना जाता है, जिसके आधारपर मनुष्य की प्रजाति सुनिश्चित की जा सकती है……..(और उसके उपयोग से)  यदि ब्राह्मण आर्य प्रजाति का प्रमाणित होता है, तो अस्पृश्य भी आर्य प्रजाति का ही प्रमाणित होगा। और  यदि ब्राह्मण द्राविड प्रजाति का प्रमाणित होता है, तो अस्पृश्य भी द्राविडी  प्रजाति का ही प्रमाणित होगा।
* मानवमिति* एक शास्त्र है। जैसे भूमिति का अर्थ होता है, भू (भूमि) को  (मापन का) मापने का  विज्ञान; उसी प्रकार मानवमिति का अर्थ = मनुष्यके शरीर और अंगों का मापन कर उसकी प्रजाति सुनिश्चित करने का शास्त्र। अंग्रेज़ी में इसे  Anthropometry कहा जाता है। और माना जाता है कि हिटलर ने इसी का उपयोग कर जर्मनियों को भारत से जोड़ने का प्रयास किया था। शरीर के अंगों का अनुपात (प्रमाण ) इस में मह्त्व का होता है, रंग नहीं।
(सात) विवेकानंदजी की चुनौती
सबसे पहले, स्वामी विवेकानन्दजी ने इस आर्य-अतिक्रमण’ के झूठे सिद्धान्त  को चुनौती दी थी। उन्हों ने कहा था “ये सिद्धांत निरी मूर्खता है।”
“किस वेद में, वेद के किस सूक्त में, आप को आर्यों के, परदेश से यहां आकर भारत में बसने की बात का उल्लेख या प्रमाण मिलता हैं? कहां से ऐसी झूठी कल्पना करने के लिए भी आप को, प्रमाण प्राप्त होता है कि यहां के वनवासी आदिवासियों का नरसंहार किया गया था? आप को ऐसे मूर्खतापूर्ण ढपोसले से क्या मिलने वाला है?
आपकी सारी रामायण की पढ़ाई वृथा है, बेकार है। उसमें जो है ही नहीं, उस विषय में क्यों झूठी कपोल कथा खड़ी कर  रहे हो?”
(आठ) युरोप और भारत की सभ्यता का अंतर
विवेकानंद जी आगे कहते हैं;
“युरप की सभ्यता का उद्देश्य है अन्य सभी का जड़मूल से, नाश; मात्र अपने और अपने ही सुखी-जीवन के लिए। अन्यों का संहार कर अपनी समृद्धि का स्वप्न पश्चिम देखता है। पर हमारी आर्य संस्कृति का लक्ष्य है, सभी को अपने स्तर से भी ऊपर उठाकर, संस्कारित करना।
युरोपियन सभ्यता का साधन है तलवार;  हमारा साधन है, वर्ण व्यवस्था।
यह वर्ण व्यवस्था ही संस्कृति की ऊर्ध्व गामिनी सीढ़ी है। प्रत्येक को ऊंचा उठनेका अवसर उपलब्ध है। प्रत्येक (व्यक्ति और जाति )अपने आप को ऊपर उठाती चली जाए, अपने ज्ञान और और संस्कार के आधार पर। ऐसे संस्कारित होने को ही आर्यत्व माना गया है और सभी को ऐसे संस्कारित करने की घोषणा है, ॥ऋण्वन्तु विश्वं आर्यं॥ { Ref: Castes Culture and Socialism-Vivekaanand}
युरोप में हर जगह बलवान की विजय और दुर्बल की मृत्यु है।
पर इस भारत भूमि पर, प्रत्येक सामाजिक नियम, दुर्बल की रक्षा के लिए गढ़ा जाता है। हमारी समानता हर कोई को, ऊंचे स्तर पर उठाकर उस स्तर पर समानता का आदर्श रखती है। हमारी जातिका सदस्य सभी के साथ रहते हुए  ऊपर उठता है, अपनी उन्नति में सभीको सहभागी बनाकर।
सभीके लिए आदर्श है, ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य। { Castes Culture and Socialism-Vivekaanand} 

(नौ ) पश्चिम की जाति धन पर आधारित है। 

युरोपीय अमरिका में कोई निर्धन बस्ती का वासी यदि धनी हो जाता है, तो, तुरंत उस बस्ती से उठकर धनिकों की बस्ती में घर खरिदकर अलग हो जाता है।जिन के साथ वह रहकर समृद्ध हुआ, उनसे ही अलग हो जाता है। पर, हमारे यहां जाति का सदस्य यदि उन्नति कर लेता है, तो वह अपनी जाति के साथ साथ ऊपर उठता है। साथ जाति को भी ऊपर उठाता है। {अम्बेडकर जी का ही उदाहरण लीजिए।} उनका त्याग कर, अलग होकर धनिकों के साथ रहने नहीं चला जाता। यह सभी को ऊपर उठाना, संस्कारित करना, यही है, ॥कृण्वन्तु विश्वं आर्यं॥ इसी लिए विवेकानंद जी कहते हैं, हमारा साधन है, वर्ण व्यवस्था। हमने अपनी स्वतंत्रता के लिए संहार नहीं किया। यह “कृण्वन्तु विश्वम आर्यम” की प्रक्रिया (जो शतकों तक चलती है) की सफलता का परिचायक है। {यह सब कुछ आप पृष्ठ १४० के आस पास “कास्ट्स ऑफ माइंड” में देख पाएंगे।} जिसका अर्थ, सारे विश्व को “आर्य” अर्थात सुसंस्कृत बनानेसे है, न कि किसी भेद-भाव की दूषित मनो वृत्ति से।
(दस) समन्वयकारी विचारधारा। ऋण्वन्तु भारतं आर्यं।
भारत (हिंदुत्व) की विचार-धारा समन्वय कारी है। हमारे बीच असंख्य देवी देवता, कुछ तो वनवासी, आदिवासी समाज की प्रथाएं, पहाड पत्थर की पूजा, नाग-पूजा, वृक्ष-पूजा, हमारे देवी देवताओं के वाहन रूपी चूहा, हंस, बाघ, सिंह, हाथी के मुख वाले देव, वानर-मुख वाले देव, इत्यादि इत्यादि इसी समन्वयकारी “कृण्वन्तु विश्वम्‌ आर्यम्‌” की अभिव्यक्ति है। जब हमारे पूरखें किसी वनवासी क्षेत्र में गए और वहां के लोगों को वन्य वस्तुओं के प्रति आदर भाव से प्रेरित पाया, तो उन्होंने उनका , गोरे लोगों की भांति संहार नहीं किया, पर उनके भी देवी देवताओं को सम्मानपूर्वक अपने असंख्य देवों के गणों में सम्मिलित कर लिया।
हमारा “एकं सत विप्राः बहुधा वदन्ति” भी हमें काम आता है। यह है समन्वयकारी परम्परा।
हमारी इसी सहिष्णुता के आयाम का अतिरेक कभी कभी हमारे दुर्गुण में परिवर्तित हुआ है। इसे ही “सदगुण-विकृति” कहा जाता है।
हजार वर्ष के परदेशी थपेड़ों से शिथिलता अवश्य आयी है। उसी के परिणामस्वरूप समाज में विकृतियाँ भी घुस चुकी है। इन विकृतियों को दूर करना हर जगे हुए भारतीय का काम है।
घोष है, ।ऋण्वन्तु विश्वं आर्यं। साथ साथ-ऋण्वन्तु भारतं आर्यं।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

वेदों से प्रभावित ईसा मसीह की शिक्षा !

वेदों से प्रभावित ईसा मसीह की शिक्षा !

इस्लामी मान्यता   के अनुसार्   अल्लाह   लोगों   का  मार्गदर्शन   करने  के  लिए  समय  समय   पर  अपने  नबी  ( Prophets )  या  रसूल    भेजता   रहता   है  ,और अल्लाह  ने   फरिश्तों   के  द्वारा द्वारा  कुछ  रसूलों   को   किताब   भी   दी   है  , इसी  तरह्   से  इस्लाम  में  मुहम्मद   को   भी  ईसा  मसीह    की  तरह  एक   रसूल  माना   गया   है  . और अल्लाह    ने ईसा  मसीह   को   जो  किताब   दी  थी , मुसलमान  उसे इंजील  और  ईसाई   उसे नया  नियम    (New Testament )  कहते   हैं , चूँकि  मुसलमान  मुहम्मद   को  भी  अल्लाह   का  रसूल    मानते   हैं  , लेकिन  मुहम्मद  और ईसामसीह    की शिक्षा   में   जमीन   आसमान    का  अंतर   है  ,  जबकि  इन  दौनों   को  एक   ही  अल्लाह   ने   अपना  रसूल   बना  कर  भेजा   था, इसका असली   कारण  हमें  बाइबिल   के  के नए  नियम   से  और   ईसा  मसीह  की  जीवनी    से   नहीं  बल्कि कुछ  ऎसी  किताबों  से  मिलता  है , जिनकी   खोज  सन  1857 ईस्वी    में   हुई  थी।

1-ईसा के जीवन  के अज्ञात वर्ष

ईसा  मसीह  के अज्ञात  वर्षों   को  दो  भागों  में  बांटा  जा  सकता  है ,जिनके बारे में अभी  तक  पूरी  जानकारी   नहीं  थी, पहला भाग 14  साल  से 30  साल  तक  है  , यह 18  साल   ईसा  के  क्रूस  पर  चढाने  तक   का   है  .  दूसरा   काल  क्रूस   पर  चढाने   से  ईसा   की  म्रत्यु   तक   है ,

ईसाई  विद्वानों   के अनुसार  ईसा  मसीह  का  जन्म 25 दिसंबर सन  1  को   इस्राएल  के  शहर  नाजरथ   में हुआ  था , उनके  पिता  का  नाम  यूसुफ  और  माता   का  नाम  मरियम  था ,ईसा    बचपन  से  ही कुशाग्र  बुद्धि  थे  ,   इसका  प्रमाण   बाइबिल   में   इस प्रकार  दिया  गया   है ,
"जब  ईसा  12  साल  के  हुए तो माता  पिता  के साथ  त्यौहार  मानाने  यरूशलेम  गए. और वहीं  रुक  गए , यह  बात उनके   माँ  बाप  को पता   नहीं  थी  ,  वह  समझे   कि  ईसा   किसी  काफिले  के  साथ   बाहर  गए   होंगे  ,लेकिन  खोजने  के  बाद ईसा  मंदिर   में विद्वानों  के साथ चर्चा  करते  हुए  मिले , ईसा   ने   माता  पिता से  कहा आप  मुझे  यहाँ  देखकर  चकित  हो  रहे  हो  ,लेकिन  आप   अवश्य  एक  दिन   मुझे अपने   पिता के  घर  पाएंगे
बाइबिल - लूका 2 :42  से  50  तक  ,
इसके  बाद   30  साल   की  आयु तक यानि   18  साल  ईसा   मसीह  कहाँ  रहे   और  क्या  करते  रहे इसके  बारे  में कोई  प्रमाणिक   जानकारी   न  तो  बाइबिल   में  मिलती  और  न  ईसाई   इतिहास      की   किताबों   में   मौजूद  है ,ईसा  मसीह    के  इन 18 साल  के अज्ञातवास को  इतिहासकार "ईसा  के  शांत  वर्ष (Silent years) ,खोये  हुए  वर्ष ( Lost years  ) और और " लापता  वर्ष  (Missing years ) के  नाम  से  पुकारते   हैं  .

2-ईसा  की पहली   भारत यात्रा 

इस्राएल  के राजा  सुलेमान   के  समय से ही    भारत  और  इजराइल   के  बीच  व्यापार   होता  था  .  और काफिलों    के  द्वारा   भारत के  ज्ञान  की  प्रसिद्धि  चारों तरफ   फैली   हुई  थी  . और  ज्ञान प्राप्त  करने  के लिए ईसा  बिना  किसी   को  बताये  किसी   काफिले  के साथ  भारत चले  गए  थे.इस बात    की खोज सन 1887  में  एक  रूसी शोधकर्ता "निकोलस  अलेकसैंड्रोविच  नोतोविच  ( Nikolaj Aleksandrovič Notovič )   ने   की  थी .इसने   यह   जानकारी  एक  पुस्तक  के  रूप  में प्रकाशित  करवायी   थी  ,  जिसमे 244 अनुच्छेद   और  14  अध्यायों   में  ईसा की  भारत  यात्रा का  पूरा विवरण  दिया  गया  है पुस्तक  का नाम "  संत  ईसा  की  जीवनी  (The Life of Saint Issa )  है .पुस्तक में  लिखा  है ईसा   अपना शहर  गलील  छोड़कर  एक  काफिले  के साथ  सिंध   होते  हुए  स्वर्ग  यानी  कश्मीर गए , वह उन्होंने " हेमिस -Hemis"   नामके बौद्ध  मठ  में  कुछ  महीने  रह  कर  जैन और  बौद्ध  धर्म  का ज्ञान  प्राप्त  किया और संस्कृत  और  पाली  भाषा भी  सीखी  . यही  नही ईसा मसीह  ने संस्कृत  में अपना  नाम " ईशा " रख  लिया था  ,जो यजुर्वेद  के  मंत्र 40:1  से   लिया  गया  है  जबकि  कुरान   उनक नाम  "  ईसा - (عيسى  "   बताया  गया   है  .नोतोविच ने अपनी  किताब  में ईसा  के बारे में  जो महत्त्वपूर्ण   जानकारी  दी  है  उसके कुछ अंश  दिए  जा रहे  हैं  ,

तब ईसा  चुपचाप अपने पैतृक    नगर यरूशलेम  को छोड़कर एक  व्यापारी  दल के साथ सिंध   की  तरफ  रवाना  हो  गए "4:12
उनका उद्देश्य धर्म  के  वास्तविक  रूप के बारे  में  जिज्ञासा  शांत  करना  , और खुद को परिपक्व   बनाना   था "4:13
फिर  ईसा  सिंध और  पांच  नदियों  को  पार  करके राजपूताना    गए ,वहाँ  उनको जैन  लोग  मिले , जिनके साथ  ईसा ने  प्रार्थना   में  भी  भाग  लिया "5:2
लेकिन  वहाँ   इसा को समाधान   नही  मिला, इसलिए  जैनों   का साथ  छोड़कर  ईसा उड़ीसा  के  जगन्नाथ  मंदिर  गए , वहाँ उन्होंने  भव्य  मूर्ती  के दर्शन   किये  , और काफी  प्रसन्न  हुए "5:3

फिर  वहाँ   के पंडितों   ने उनका आदर  से  स्वागत   किया  , वेदों   की  शिक्षा   देने   के साथ  संस्कृत   भी  सिखायी "5:4
पंडितों   ने  बताया   कि   वैदिक  ज्ञान  से सभी  दुर्गुणों   को   दूर  करके  आत्मशुद्धि    कैसे    हो सकती   है "5:5

फिर  ईसा राजगृह    होते  हुए  बनारस  चले गए  और वहीँ  पर  छह  साल  रह  कर  ज्ञान  प्राप्त  करते  रहे  " 5:6
और जब   ईसा  मसीह    वैदिक  धर्म   का  ज्ञान  प्राप्त   कर  चुके  थे  तो उनकी  आयु  29  साल   हो  गयी  थी  ,  इसलिए   वह  यह  ज्ञान  अपने  लोगों  तक   देने के  लिए   वापिस  यरूशलेम    लौट    गए  ., जहाँ   कुछ   ही  महीनों  के  बाद  यहूदियों   ने     उनपर  झूठे  आरोप     लगा लगा  कर  क्रूस पर  चढ़वा    दिया  था , क्योंकि  ईसा     मनुष्य   को  ईश्वर   का  पुत्र      कहते थ  .

http://reluctant-messenger.com/issa1.htm

3-ईसा मसीह  को  क्रूस  पर चढ़ाना
जब ईसा   मसीह   अज्ञातवास  से  लौट  कर  वापिस  यरूशलेम   आये  तो  उनकी  आयु  लगभग  30  साल    हो  चुकी  थी  .  और बाइबिल  में  ईसा मसीह   के बारे में उसी काल  की  घटनाओं   का  विवरण  मिलता   है  ,  चूँकि  ईसा  मसीह यहूदियों   के  पाखंड     का  विरोध   किया  करते  थे ,   जो  येहूदी पसंद   नही  करते  थे  .  इसलिए  उन्होंने   ईसा  मसीह   को  क्रूस पर  चढ़ा   कर  मौत  की  सजा  दिलवाने की  योजना   बनाई  थी ,ईसा  मसीह   को शुक्रवार 3 अप्रेल  सन  30  को  दोपहर   के समय  चढ़ाया   गया  था  , और  सूरज  ढलने  से  पहले क्रूस  से उनके  शरीर  को उतार  दिया  गया था  ,
  बाइबिल   के अनुसार ईसा    के  क्रूस  पर   जो आरोपपत्र   लगाया   गया   था   वह  तीन  भाषाओं   "  लैटिन  ,ग्रीक  और हिब्रू  "  भाषा  में  था  , जिसमे  लिखा  था  .

(Latin: Iēsus Nazarēnus, Rēx Iūdaeōrum

एसुस नाजारेनुस  रेक्स यूदाओरुम

Greek-  Basileus ton Ioudaion .

Hebrew-ईशु  मिन  नजारेत  मलेक ह यहूदियीम

"ישו מנצרת, מלך היהודים"

अर्थात -नाजरथ  का  ईसा यहूदियों   का  राजा -बाइबिल -यूहन्ना 19 :19

4-ईसा क्रूस   की  मौत  से  नहीं  मरे

बाइबिल  के अनुसार ईसा  को  केवल  6  घंटे  तक  ही  क्रूस  पर  लटका  कर  रखा  गया  था , और  वह जीवित  बच गए  थे  ,  उनके एक शिष्य  थॉमस   ने  तो  उनके  हाथों  में कीलों   के छेदों  में उंगली  डाल  कर  देख  लिया  था   कि वह  कोई  भूत नहीं  बल्कि  सचमुच  ईसा   मसीह  ही  हैं.यह पूरी घटना  बाइबिल की  किताब यूहन्ना  20: 26   से 30  तक  विस्तार  से  दी  गयी   है. बाइबिल   में  यह  भी  बताया  गया   है  कि ईसा बेथनिया  नाम   की   जगह  तक अपने  शिष्यों  के  साथ  गए थे , और उनको आशीर्वाद  देकर स्वर्ग    की  तरफ  चले  गए ,(  बाइबिल - लूका 24:50 )
यद्यपि  बाइबिल  में  ईसा   के  बारे में  इसके  आगे  कुछ  नहीं   लिखा   गया   है  ,  लेकिन   इस्लामी  हदीस " कन्जुल उम्माल- كنج العمّال "  के  भाग  6 पेज 120 में   लिखा है  कि  मरियम    के  पुत्र  ईसा  इस   पृथ्वी  पर   120  साल  तक    जीवित  रहे ,
عيسى ابن مريم عاش لمدة 120 سنة،  "Kanz al Ummal, part 6, p.120
"

5--कुरान  की  साक्षी

और यह लोग  कहते  हैं  कि हमने  मरियम  में बेटे ईसा  मसीह   को  मार डाला ,हालाँकि न तो  इन्होने उसे क़त्ल  किया और  न  सूली  पर  चढ़ाया   ,बल्कि यह  लोग  एक ऐसे  घपले  में  पड़  गए कि  भ्रम  में  पड  गए " सूरा -निसा -4 :157

नोट -इस आयत   की  तफ़सीर में  दिया  है  कि यहूदियों   ने  जिस व्यक्ति  को  क्रूस  पर  चढ़ाया  था वह  कोई  और  ही  व्यक्ति  था  जिसे  लोगों   ने ईसा  मसीह  समझ   लिया  था।

6- ईसा  की अंतिम  भारत यात्रा 

इस्लाम  के  कादियानी  संप्रदाय   के स्थापक  मिर्जा  गुलाम  कादियानी (1835 -1909 )    ने  ईसा मसीह  की  दूसरी  और अंतिम  भारत यात्रा   के बारे में  उर्दू में  एक शोधपूर्ण    किताब  लिखी   है , जिसका नाम " मसीह  हिंदुस्तान   में "  है  . अंगरेजी  में  इसका  नाम  " Jesus in India "  है। इस  किताबों  में अनेकों ठोस  सबूतों   से प्रमाणित  किया  गया  है  कि , ईसा  मसीह क्रूस  की  पीड़ा सहने  के बाद  भी   जिन्दा  बच  गए  थे   . और जब  कुछ दिनों   बाद उनके   हाथों , पैरों  और   बगल    के घाव  ठीक  हो  गए थे  तो  फिर से यरूशलेम  छोड़  कर ईरान  के  नसीबस   शहर   से होते  हुए  अफगानिस्तान    जाकर  रहने   लगे , और   वहाँ  रहने वाले इजराइल   के  बिखरे हुए 12   कबीले  के  लोगों  को उपदेश    देने   का   काम   करते  रहे  . लेकिन अपने जीवन  के अंतिम  सालो   में  ईसा   भारत   के स्वर्ग  यानि  कश्मीर  में  आकर  रहने   लगे  थे  , और 120  साल  की आयु  में उनका  देहांत  कश्मीर  में  ही हुआ , आज  भी  उनका  मजार  श्रीनगर   की  खानयार स्ट्रीट    में  मौजूद   है ,

http://www.alislam.org/library/books/jesus-in-india/intro.html

7-ईसा मसीह कश्मीर में दफ़न है ,
ईसा  मसीह   के समय कश्मीर  ज्ञान  का  केंद्र था,वहाँ  अनेकों  वैदिक   विद्वान्  रहते  थे  . इसीलिये  जीवन  के अंतिम समय   ईसा  कश्मीर  में बस   गए  थे  उनकी  इच्छा   थी  कि  मरने  के बाद  उनको  इसी  पवित्र  में  दफ़न  कर  दिया  जाये  . और ऐसा   ही  हुआ  था  , यह  खबर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में  दिनांक  8  मई 2010 में  प्रकाशित   हुई  थी  .

"That Jesus survived crucifixion, travelled to Kashmir, eventually died there and is buried in Srinagar ,. Every season hundreds of tourists visit the Rozabal shrine of Sufi saint Yuz Asaf in downtown Srinagar, believed by many to be the final resting place of Christ.

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-05-08/india/28322287_1_srinagar-shrine-jesus

http://www.tombofjesus.com/index.php/en/the-rozabal-tomb/photos

8-वेदों और ईसा  की शिक्षा  में समानता

ईसा मसीह  भारतीय  अध्यात्म  और ज्ञान  से  इतने अधिक प्रभावित थे  कि  छोटी  सी आयु  में  ही   यरूशलेम   छोड़ कर   हजारों   मील  दूर   भारत  आये थे ,  और  यहाँ   ज्ञान   प्राप्त   किया  था.तुलसी दास   जी  ने  कहा  है " एक घड़ी  , आधी घडी  , आधी  में  पुनि आधि , तुलसी संगत  साधु  की  कोटक  मिटे उपाधि " और  ईसा मसीह  तो  भारत   में  छह साल  रहे थे  . इसलिए उनके स्वभाव  और  विचारों   में  मुहम्मद  जैसी  कूरता   और  दूसरे   धर्म   के  लोगों   के  प्रति  इतनी   नफ़रत   नही     थी    , यह   बात   मुहम्मद  , ईसा   मसीह    की   शिक्षा      की  तुलना   करने  से  स्पष्ट    हो  जाता  है     जिसके  संक्षिप्त  में  कुछ  उदाहरण  दिए   जा  रहे   हैं  ,पहले  मुहम्मद   की  शिक्षा   फिर ईसा  मसीह    के वह  वचन   दिए  हैं  ,जो  वेदों   में  दिए   गए   हैं ,

मुहम्म्द -"जान  लो  कि अल्लाह कफिरों  से  प्रेम  नही  करता " सूरा- आले इमरान  3 :32

(Allah hates those who don’t accept Islam. (Qur’an  3:32,)

ईसा  मसीह - ईश्वर  संसार  के  हरेक  व्यक्ति  से  प्रेम रखता   है " बाइबिल -नया  नियम  यूहन्ना 3 :16

(God loves everyone. (John 3:16)

वेद -ईश्वर  हमें  पिता ,माता  और  मित्र  की  तरह  प्रेम  करता  है .ऋगवेद -4 /17 /17

मुहम्म्द -"रसूल  ने कहा   कि मुझे  लोगों से तब तक  लड़ते रहने  का   हुक्म  दिया  गया  है   जब  तक  यह  लोग स्वीकार  नहीं  करते  कि अल्लाह   के आलावा  कोई  भी  इबादत  के योग्य  नहीं  , और  मुहम्मद  उसका रसूल   है  "

(“I have been commanded to fight against people till they testify that there is no god but Allah, and that Muhammad is the messenger ofAllah.”

"‏ أُمِرْتُ أَنْ أُقَاتِلَ النَّاسَ حَتَّى يَشْهَدُوا أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ

सही मुस्लिम -किताब  1  हदीस 33

ईसा  मसीह -"यीशु  ने  कहा  तुम  अपनी  तलवार  मियान  में  ही  रखो। क्योंकि  जो लोग दूसरों  पर तलवार उठाएंगे  वह तलवार   से  ही  मरेंगे "बाइबिल . नया  नियम- मत्ती- अध्याय 26 :52

( “He who lives by the sword will die by the sword” (Matthew 26:52)

वेद -जिस प्रकार द्युलोक  और पृथ्वी  न  तो  किसी  को डराते  हैं ,और न  किसी  से हिंसा  करते  हैं  वैसे  ही मानव  तू  भी  किसी  को  नहीं  डरा  और  न   किसी  पर  हथियार उठा -अथर्ववेद -2/11

http://shariaunveiled.wordpress.com/2013/07/28/the-teachings-of-muhammad-v-jesus-christ/

यह लेख उन  लोगों की ऑंखें   खोलने  के लिए  बानाया   है  ,जो जिहाद यानी   निर्दोषों   की  हत्या     को  ही  असली   धर्म    मान  बैठे   हैं  .  जबकि  उसी  अल्लाह  के रसूल   ईसा   ने हजारों  मील दूर   भारत   से  सच्चे  धर्म  यानी  वैदिक धर्म   का  ज्ञान   बिना   जिहाद  कट्टर  यहूदियों    तक  पहुँचाने का  प्रयास    किया  था  . हम  ईसा   मसीह  के  भारत  प्रेम और   वेदों     पर  निष्ठा   को  नमन  करते  हैं.
लेकिन बड़े दुःख   की  बात  है  कि  इतने  पुख्ता  प्रमाण  होने  पर  भी ईसाई इस सत्य  को स्वीकार   करने   से हिचकिचाते  हैं

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

"आर्य" हिन्दू राजाओं का चारित्रिक आदर्श


“आर्य” हिन्दू राजाओं का चारित्रिक आदर्श


भारत देश की महान वैदिक सभ्यता में नारी को पूजनीय होने के साथ साथ “माता” के पवित्र उद्बोधन से संबोधित किया गया हैं।

मुस्लिम काल में भी आर्य हिन्दू राजाओं द्वारा प्रत्येक नारी को उसी प्रकार से सम्मान दिया जाता था जैसे कोई भी व्यक्ति अपनी माँ का सम्मान करता हैं।

यह गौरव और मर्यादा उस कोटि के हैं ,जो की संसार के केवल सभ्य और विकसित जातियों में ही मिलते हैं।

महाराणा प्रताप के मुगलों के संघर्ष के समय स्वयं राणा के पुत्र अमर सिंह ने विरोधी अब्दुरहीम खानखाना के परिवार की औरतों को बंदी बना कर राणा के समक्ष पेश किया तो राणा ने क्रोध में आकर अपने बेटे को हुकुम दिया की तुरंत उन माताओं और बहनों को पूरे सम्मान के साथ अब्दुरहीम खानखाना के शिविर में छोड़ कर आये एवं भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करे।

ध्यान रहे महाराणा ने यह आदर्श उस काल में स्थापित किया था जब मुग़ल अबोध राजपूत राजकुमारियों के डोले के डोले से अपने हरम भरते जाते थे। बड़े बड़े राजपूत घरानों की बेटियाँ मुगलिया हरम के सात पर्दों के भीतर जीवन भर के लिए कैद कर दी जाती थी। महाराणा चाहते तो उनके साथ भी ऐसा ही कर सकते थे पर नहीं उनका स्वाभिमान ऐसी इज़ाज़त कभी नहीं देता था।



औरंगजेब के राज में हिन्दुओं पर अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। हिन्दू या काफ़िर होना तो पाप ही हो गया था। धर्मान्ध औरंगजेब के अत्याचार से स्वयं उसके बाप और भाई तक न बच सके , साधारण हिन्दू जनता की स्वयं पाठक कल्पना कर सकते हैं। औरंगजेब की स्वयं अपने बेटे अकबर से अनबन हो गयी थी। इसी कारण उसका बेटा आगरे के किले को छोड़कर औरंगजेब के प्रखर विरोधी राजपूतों से जा मिला था जिनका नेतृत्व वीर दुर्गादास राठोड़ कर रहे थे।



कहाँ राजसी ठाठ बाठ में किलो की शीतल छाया में पला बढ़ा अकबर , कहाँ राजस्थान की भस्म करने वाली तपती हुई धुल भरी गर्मियाँ। शीघ्र सफलता न मिलते देख संघर्ष न करने के आदि अकबर एक बार राजपूतों का शिविर छोड़ कर भाग निकला। पीछे से अपने बच्चों अर्थात औरंगजेब के पोता-पोतियों को राजपूतों के शिविर में ही छोड़ गया। जब औरंगजेब को इस बात का पता चला तो उसे अपने पोते पोतियों की चिन्ता हुई क्यूंकि वह जैसा व्यवहार औरों के बच्चों के साथ करता था कहीं वैसा ही व्यवहार उसके बच्चों के साथ न हो जाये। परन्तु वीर दुर्गा दास राठोड़ एवं औरंगजेब में भारी अंतर था। दुर्गादास की रगो में आर्य जाति का लहू बहता था। दुर्गादास ने प्राचीन आर्य मर्यादा का पालन करते हुए ससम्मान औरंगजेब के पोता पोती को वापिस औरंगजेब के पास भेज दिया जिन्हें पाकर औरंगजेब अत्यंत प्रसन्न हुआ। वीर दुर्गादास राठोड़ ने इतिहास में अपना नाम अपने आर्य व्यवहार से स्वर्णिम शब्दों में लिखवा लिया।



वीर शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण जीवन आर्य जाति की सेवा,रक्षा, मंदिरों के उद्धार, गौ माता के कल्याण एवं एक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के रूप में गुजरा जिन्हें पढ़कर प्राचीन आर्य राजाओं के महान आदर्शों का पुन: स्मरण हो जाता हैं। जीवन भर उनका संघर्ष कभी बीजापुर से, कभी मुगलों से चलता रहा। किसी भी युद्ध को जितने के बाद शिवाजी के सरदार उन्हें नजराने के रूप में उपहार पेश करते थे। एक बार उनके एक सरदार ने कल्याण के मुस्लिम सूबेदार की अति सुन्दर बीवी शिवाजी के सम्मुख पेश की। उसको देखते ही शिवाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हो गए और उस सरदार को तत्काल यह हुक्म दिया की उस महिला को ससम्मान वापिस अपने घर छोड़ आये। अत्यंत विनम्र भाव से शिवाजी उस महिला से बोले ” माता आप कितनी सुन्दर हैं , मैं भी आपका पुत्र होता तो इतना ही सुन्दर होता। अपने सैनिक द्वारा की गई गलती के लिए मैं आपसे माफी मांगता हूँ”। यह कहकर शिवाजी ने तत्काल आदेश दिया की जो भी सैनिक या सरदार जो किसी भी ऊँचे पद पर होगा अगर शत्रु की स्त्री को हाथ लगायेगा तो उसका अंग छेदन कर दिया जायेगा।

कहाँ औरंगजेब की सेना के सिपाही जिनके हाथ अगर कोई हिन्दू लड़की लग जाती या तो उसे या तो अपने हरम में गुलाम बना कर रख लेते थे अथवा उसे खुले आम गुलाम बाज़ार में बेच देते थे और कहाँ वीर शिवाजी का यह पवित्र आर्य आदर्श।

इतिहास में शिवाजी की यह नैतिकता स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई हैं।

इन ऐतिहासिक प्रसंगों को पढ़ कर पाठक स्वयं यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं की महानता और आर्य मर्यादा व्यक्ति के विचार और व्यवहार से होती हैं। धर्म की असली परिभाषा उच्च कोटि का पवित्र और श्रेष्ठ आचरण हैं। धर्म के नाम पर अत्याचार करना तो केवल अज्ञानता और मुर्खता हैं।

रविवार, 29 दिसंबर 2013

मुस्लिम मत ने हिंदू मत को क्या-क्या दिया या हिंदू मत ने मुस्लिम मत से क्या-क्या लिया

मुस्लिम मत ने हिंदू मत को क्या-क्या दिया या हिंदू मत ने मुस्लिम मत से क्या-क्या लिया

मुस्लिम-मत ने, हिंदू-मत को क्या दिया ????

प्रथम स्पष्ट कर दूँ कि ऊपर के शीर्षक में मैंने “मुस्लिम-धर्म” या “हिंदू-धर्म” शब्द का प्रयोग नहीं किया है परन्तु “मत” शब्द का प्रयोग किया है क्यों कि संसार में धर्म तो एक ही है – वैदिक धर्म, और बाकी सारे तो मत, पंथ, मार्ग, विचार, परिवार, समुदाय या दल हैं | इसलिए हिंदू धर्म को धर्म नहीं पर “मत” कहा जाना चाहिए, वैसे भी हिंदू मत वाले “मतवाले” ही होते हैं | इस वैदिक धर्म को ही आप मानव-धर्म कह सकते है और इसी धर्म को आप सत्य-सनातन धर्म भी कह सकते हैं| ५११२ वर्ष पहलें कोई समय था जब सारी धरती पर एक ही धर्म था – वैदिक धर्म | ना ईसाई, ना मुस्लिम,ना जैन, ना बौद्ध,  ना सिक्ख या कोई और |



किसी भी दो अलग-अलग परिवेश में पले-बढ़े व्यक्ति या परिवार के मिलने पर कुछ नया सीखना-सिखाना, विचार-व्यवहार का होना स्वाभाविक है | एक परिवार कि पुत्री विवाहित होकर दूसरे परिवार कि सदस्य (बहु) बनती है तब ससुराल में अपने साथ कुछ नया संस्कार, विचार, व्यवहार लाती है और साथ ही ससुराल से कुछ सीखकर जब माँ के घर जाती है तब भी कुछ ससुराल के संस्कार, विचार मायके में बताती है और इस प्रकार एक सम्बन्ध के साथ-साथ अन्य बातों का भी आदान-प्रदान होता है | विवाह के बाद आदान-प्रदान होता है रहन-सहन, खान-पान आदि का ठीक उसी प्रकार दो मतों के बीच में भी द्वन्द चलता है और आदान-प्रदान भी चलता रहता है | मुस्लिम मत के दीर्घ शासन काल में हिंदू मत के ऊपर बहुत सारे अत्याचार किये गए और इस दौरान हिंदू मत ने क्या-क्या अपनाया, मुस्लिमों ने हमको क्या-क्या दिया, उसका एक संकलन नीचे प्रस्तुत किया है, कृपा कर विचार करें और अच्छी बातों के समूह (वैदिक धर्म) में प्रवेश कर चुकी बुराइयों (अन्य सारे मतों) को छोडें |



प्रस्तुत है मुस्लिम मत ने हिंदू मत को क्या-क्या दिया या हिंदू मत ने मुस्लिम मत से क्या-क्या लिया :-

    हिंदू नाम :- सबसे पहले अपने आप को –“गर्व से कहो हम हिंदू है” कहने वाले हिंदू को “हिंदू” नाम मुस्लिमों ने दिया | कभी स्वामी विवेकानंद ने कहा होगा “गर्व से कहो हम हिंदू है” बस फिर क्या था सब के सब लग गए रटने “गर्व से कहो हम हिंदू है”…. “गर्व से कहो हम हिंदू है” | किसी ने फुर्सत से सोचा नहीं कि आखिर हम अपने आपको हिंदू क्यों कहें ??? विवेकानंद को हिंदू धर्म का आदर्श पुरुष बताया जाता है पर किसी के पास समय नहीं है विवेकानंद का साहित्य पढ़ने का और सच्चाई जानने का | विवेकानंद ने क्या सच में हिंदू धर्म के लिए काम किया था ?? या अन्य धर्म के समर्थन में भी काम किया था ?? इन सारी बातों पर हमें विचार करना चाहिए | (इस पर मैं कभी स्वतंत्र लेख लिखूंगा) पर ये हिंदू शब्द आया कहाँ से ? किस भाषा का शब्द है ये ? इसका क्या अर्थ है ? हम कब से हिंदू कहलाने लग गए ? क्या राम और कृष्ण हिंदू थे क्या ? यदि नहीं थे तो वे कौन थे ? क्या हमारे शास्त्रों में हिंदू शब्द का उल्लेख आता है क्या ? रामायण, रामचरितमानस, महाभारत, गीता, वेद, उपनिषद, दर्शन ….. अरे हनुमान चालीसा…. आदि किस पुस्तक में हिंदू नाम आता है ? यदि नहीं आता तो हम कितने वर्ष पूर्व हिंदू कहलाने लग गए ? इन सारे प्रश्नों का उत्तर खोजे बिना सब अपने आपको हिंदू कह और लिख रहे हैं | मैं मानता हूँ कि आज अपने-आपको हिंदू लिखना और कहना हमारी मजबूरी है | ये मजबूरी हमारी ही पैदा कि हुई है, अगर हमारे पूर्वजों ने अपना असली नाम “आर्य” कहना/लिखना छोड़ा न होता तो आज हम अपने आपको हिंदू क्यों कहते? अपने-आपको हिंदू लिखना और कहना हमारी मजबूरी है क्यों कि सरकारी दस्तावेजों में कहीं हिंदू के अलावा और कोई विकल्प नहीं है तो मजबूरन हमें हिंदू लिखना पड़ता है जैसे जनगणना के दस्तावेज में न चाहते हुए भी हिंदू लिखवाना मजबूरी है, हम चाह कर भी अपने आप को वैदिक धर्मी नहीं कह सकते, पर हिंदू कहने पर गर्व करना ? यह कैसी मजबूरी ? ये कैसी मूर्खता ? आइये ! ऊपर के प्रश्नों के उत्तर खोजे |

हिंदू शब्द हमें मुस्लिमों ने दिया और हमने बड़े प्रेम से उसे स्वीकार कर लिया | यह शब्द फारसी भाषा का है, जिसका अर्थ होता है – काला, काफ़िर, लुटेरा | क्या हम सब काले और/या लुटेरे हैं ?? काफ़िर का मतलब होता है जो मुसलमान नहीं है वह व्यक्ति | हिंदू कि परिभाषा क्या है ?? जो व्यक्ति मुसलमान या ईसाई नहीं है वे सब हिंदू हैं | ये कैसे परिभाषा है ? यह परिभाषा नकारात्मक है क्यों कि हिंदू कि एक सर्वमत सम्मत मान्यताएँ नहीं हैं | आप ईश्वर को निराकार या साकार मानते है तब भी आप हिंदू है, जड़ या चेतन कि पूजा करते है तब भी आप हिंदू है| हिंदुओं को अपना सर्व सम्मत धर्मग्रन्थ कोई नहीं है, कोई सुनिश्चित नहीं है, कोई कहेगा वेद, तो कोई गीता, कोई रामायण तो कोई पुराण भी, और किसी किसी को तो पता भी नहीं| जब कि ईसाई का एक ही ग्रन्थ है – बाईबल, मुसलमान का एक ग्रन्थ है कुर्-आन| और हमारा ? सब कुछ अनिश्चित |



हाल ही में हिंदू शब्द कि एक और व्याख्या कि गयी और बताया गया कि यह एक जीवन शैली का नाम है | जब से माननीय न्यायालय ने बताया तब से हिंदू कहने लगे कि ये एक जीवन शैली है पर मैं पूछता हूँ कि ये कौन सी जीवन शैली है ? किस जीवन शैली कि बात कर रहे हैं आप ? सबेरे ४ बजे उठने वाली या ८-९ बजे उठने वाली ? सूर्य ढलने से पहले खाना खा लेने वाली या १२ बजे तक चरते (खाते) रहने वाली ? भुत-प्रेत, बलिप्रथा आदि बुराइयों को मानने वाली?   पीपल के पेड़ पर धागा बांधने वाली ? जिन्दा-स्त्री को मृत-पति के साथ जला कर ठंडी हत्या कर देने वाली? और सती-प्रथा को शास्त्र-सम्मत बताने वाली ? देवी-देवता को शराब व मांस का भोग लगाने वाली? साधु-सन्यासी चिलम, अफीम, गांजा पीते है वह जीवन शैली ? मृत्यु के बाद शव को जलाना, गाडना, पानी में बहाना? कौन सी जीवन शैली? तो निष्कर्ष ये निकला कि ये परिभाषा गलत है |



फिर एक और परिभाषा दी जाती है कि “जो कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक रहते हैं वे सारे हिंदू | हिंदुस्तान में जो रहे वो हिंदू” | ये परिभाषा भी लचर और कमजोर है | यदि इस परिभाषा को मान लिया जाय तो फिर श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश, अरब, अफ्रीका, अमेरिका आदि में रहने वालों का क्या होगा ? वे हिंदू नहीं रहेंगे | और हिंदुस्तान में तो मुस्लिम व ईसाई भी रह रहे है वे इस परिभाषा के अनुसार अपने आप को हिंदू तो कहेंगे नहीं तो फिर उनका क्या करेंगे ?



एक और व्याख्या की जाती है कि “हिनस्ति दुरितानि इति हिंदू” जो दुर्गुणों का नाश करें वह हिंदू | हिंदू शब्द के “हि” और “दू” दोनों कि व्याख्या कर दी पर व्याख्या करने वाला ये भूल गया कि ये हिंदू शब्द संस्कृत का नहीं है | जब शब्द संस्कृत का नहीं है तो फिर व्याख्या संस्कृत के नियमों के अनुसार कैसे होगी ?

  हिंदू शब्द कि दी जाने वाली सारी की सारी व्याख्याएँ, परिभाषाएँ गलत है | एक गलत को सही साबित करने कि बिन-जरुरी कसरत है और कुछ नहीं | आवश्यकता है सच्चाई को स्वीकार करने की, कि हम हिंदू नहीं है |



गर्व करने योग्य एक ही नाम है “आर्य” | राम और कृष्ण हिंदू नहीं थे, वे आर्य थे | हमारे किसी भी शास्त्र में हिंदू शब्द का उल्लेख नहीं है पर आर्य शब्द का उल्लेख तो बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी मिलता है | हम कुछ सौ वर्षों से हिंदू अपने-आपको कहते चले गए और सामने वाला हमें हिंदू कहता चला गया असलियत में वो तो हमारा अपमान कर रहा था, पर हम थे कि समझे ही नहीं |



अपने इस झूठे गर्व करने योग्य शब्द पर गर्व न करते हुए हिंदू नाम को छोड़ कर अपने सच्चे नाम “आर्य” पर आ जाओं | पर क्या करें हम ! रास्ता इतना लंबा काट लिया है कि अब शुरुआत करने के लिए बहुत शक्ति चाहिए | पर भैया ! कही से तो करनी ही होगी शुरुआत, तो क्यों ना आज से ही शुरुआत करें | आर्य का अर्थ होता है महान्, उत्तम पुरुष, श्रेष्ठ पुरुष | आइये ! मुस्लिमों द्वारा दिए गए इस भेंट में मिले नाम को छोड़ दें, त्याग दें | जहाँ जरुरत नहीं वहाँ उसका प्रयोग ना करें और कम से कम गर्व तो ना ही करें | मजबूरी में किसी जगह लिखना पड़े तो -लिखें, पर गर्व तो नहीं ही |

    ताबीज :- आज लगभग हर हिंदू के गले में और/या भुजा में ताबीज सुशोभित है वह भी मुसलमानों की ही देन है | हमारे में से बहुत सारे भाई-बहन सबेरे या शाम या सप्ताह में कम से कम एक बार हनुमान चालीसा का पाठ किया करते हैं और कहते हैं “काँधे मूँज जनेऊ साजे” |  जिसका अर्थ होता है कि चार वेदों के विद्वान हनुमान जी अपने शरीर पर जनेऊ पहनते थे और उनका शरीर जनेऊ से सुशोभित लगता था | पर हनुमान चालीसा का पाठ करने वाला भक्त स्वयं जनेऊ नहीं पहनता | अगर वह पहनता है तो फिर मुस्लिमों का दिया हुआ ताबीज ही पहनता है | अपने गले में या बांह में लटकाए या बांधे ताबीज को क्या कभी आपने तोड़ कर या खोल कर देखा है ??? आखिर इसमें है क्या ?? यदि नहीं ! – तो अब कर के देखें | आप पाएंगे वो अक्षर या लकीरें जो समझ नहीं आने वाली | इन ताबीजों में अरबी भाषा में लिखा होता है | इस अरबी भाषा को पढ़ना और उसका अर्थ बताना आपके परिवार या आसपड़ोस के हर सदस्य के लिए कठिन काम हो जायेगा | यदि हम इसे पढ़ नहीं सकते या अर्थ नहीं जानते तो फिर बाँधने / पहनने से क्या लाभ ? क्यों पहने हम ? अरे ! बाँधना ही है तो आप गायत्री मंत्र लिख कर बाँध लें ! पन्डित रुचिराम जी ने अरब देश में सात साल रह कर अनेक मुस्लिमों के गलें में गायत्री मंत्र का ताबीज बना-बना कर पहनवाया था | क्या हम ऐसा नहीं कर सकते ? अगर हम गायत्री मंत्र का ताबीज मुसलमान को नहीं पहना सकते तो फिर अरबी में लिखी कुर्-आन की एक आयत से बना ताबीज अपने गले क्यों ???? और वो भी जनेऊ उतारने कि कीमत पर ???? कभी नहीं | ऐसा कभी नहीं होना चाहिए | दूसरा, यदि एक मंत्र को ही गले या बाँह में बाँधने से लाभ मिलता है तो फिर तो पूरी कि पूरी पुस्तक ही क्यों न बांध ली जाये ? जरा ठहरें ! और किसी काम को करने से पहले विचार करें |



हमारे कुछ हिंदू भाई भी नक़ल करने में बहुत माहिर हैं, ताबीज का हिंदू संस्करण भी निकाल लिया गया है | आपने सुना होगा “हनुमान सिद्ध मंत्र अभिषिक्त लॉकेट” आदि आदि | ये सब क्या है ? ये सब के सब ताबीज के ही तो रूपांतरण हैं | यदि हनुमान लॉकेट पहनने से हमारे दुःख दूर होंगे तो फिर हनुमान जी अपने दुःख दूर करने के लिए क्या पहनते थे ? क्या हनुमान जी भी कोई मन्त्र अभिषिक्त यन्त्र या लॉकेट पहना करते थे ? नहीं | हनुमान जी स्वयं चारों वेदों के पण्डित थे और सारे के सारे मंत्र उनको याद थे तो फिर वे कौन सा लॉकेट पहनते ?? आप भी एक मंत्र याद करें और फिर उसका अर्थ याद करें जब मन्त्र और उसका अर्थ याद हो जाय तब दूसरा मंत्र याद करना शुरू कर दें और यह क्रम सतत चलता रहना चाहिए  | जब सारे मंत्र याद करते-करते सिद्धि प्राप्त हो जायेगी तब मुक्ति अर्थात् सुख आनंद खुद ही मिल जायेगा | तो फिर आज से ही लग जाइये वेद मंत्र याद करने में, उतार कर छोड़ दें ताबीज को और धारण करें जनेऊ जो हनुमान चालीसा में कहे अनुसार आपकी कंचन काया (शरीर) पर शोभा देगा |

    कबर :- मुस्लिम मत ने हमें दी “कबर” और “कबर पूजा” | हम नकलची हिंदू क्यों पीछे रहते तो हम भी लग गए कबर बनाने/बनवाने और पुजवाने | पर हम हिंदुओं ने इस कबर को सुन्दर सा नाम दिया “समाधि” | हर अनपढ़ साधु (घर का भगौड़ा) के मरने के बाद हमने उसे गाडना शुरू कर दिया और कहने लगे “समाधि” जब कि वेद में साफ़ लिखा है कि मरने के बाद शरीर को गाडना नहीं, जलाना चाहिए ताकि शरीर अपने मूल पाँच तत्वों में जल्दी से जल्दी मिल जाये पर “हिंदू” अपनी मान्यताओं को छोडकर अन्यों कि बातों / प्रथाओं को स्वीकार करने में ही अपनी धन्यता समझता है | “कबर” को “समाधि” बता बता कर जब ये कबरें सामान्य हो गयी तो तब भी हमने हार नहीं मानी और किसी बड़े साधु के मरने पर बनी कबर को “महासमाधि” तक कहने लगे जैसे पुट्टपर्थी के साईं बाबा को हाल ही में दी गयी समाधि(कबर) को समाधि न कह कर हम उसे महासमाधि कहते है जैसे तो बहुत बड़ी उपलब्धि न हो | आपको याद होगा कुछ वर्षों पूर्व जब दूरदर्शन पर महाभारत धारावाहिक आता था तब सारे विज्ञापनों में महाभारत कि नक़ल कर के अपने उत्पाद को “महा” बताते थे | तो अब अगला चलन होगा “महासमाधि” का, जब भी कोई प्रसिद्ध साधु मृत्यु को प्राप्त होगा तो उसकी कबर(समाधि)नहीं, पर महाकबर (महासमाधि) बनेगी | “महासमाधि” की तुलना हम मुस्लिम मत द्वारा बनाई जा रही “गाजी-कबर” से कर सकते है | गाजी कबर में शरीर के नाप के अनुसार नहीं, पर कबर, गज के अनुसार बनाई जाती है | जहाँ-जहाँ आप शरीर के नाप से लंबी कबर देखें तो समझ लें कि वह गाजी-कबर है | ये गाजी कबरें केवल जमीन घेरने के लिए ही बनाई जाती है और मूर्खों के सामने उसकी महिमा गा- गाकर लूटने के लिए ही बनाई जाती है | कृपा कर कबर (समाधि) बनने से बचें | आज तक आपने आदि शंकराचार्य की, पाणिनि, संदीपनी, शंकर, हनुमान, राम, कृष्ण, अम्बा, गुरु नानक जी, आदि देवी-देवताओं या किसी विद्वान कि कबर नहीं सुनी होगी और नहीं देखी होगी क्यों कि ये सारे देवी-देवता, विद्वान वेद के अनुसार अपने शरीर को अग्नि को सौप देते थे न कि जमीन को | ये ऊपर गिनाये सारे विद्वान, देवी-देवता किसी न किसी महान् कार्य के लिए या उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक के लिए याद किये जाते है पर आज के अनपढ़ साधुओं ने तो कुछ भी ऐसा नहीं किया जिसके कारण वे याद किये जाय इसलिए अपना स्मारक कबर बनवा कर लोगों से पुजवाते हैं | पाणिनि अपनी अष्टाध्यायी के कारण याद किये जाते है पर आज के साधु ?? कबर के कारण | कृपा कर कबर बनाने/बनवाने से बचे और अन्यों को भी प्रेरित करें कि जमीन में नहीं, शरीर को मरने के बाद जला देना ही उत्तम है |
    कबर पूजा :- कबर पूजा भी हमने मुस्लिमों से सीखी है | आप सब अपने आस-पड़ोस, नगर में देखते होंगे कि बहुत से हिंदू भाई, कबरों को पूजने जाते है | क्या कभी आपने सोचा या पूछा, कौन थे ये लोग जो कबरों में दबाएँ गए हैं ? नहीं ? तो आज ही पूछें | पहले जानें और फिर कोई कार्य करें | ये जितनी भी कबरें बनी है उन सारी कबरों में किसी ना किसी ऐसे मुस्लिम को दबाया गया है जो विद्वान नहीं मुर्ख थे | हमारी संस्कृति में विद्वानों को आदर दिया जाता है न कि मूर्खों को | ये कबरों में दफनाए गए लोग दिन में तो निकम्मे बैठे-बैठे रहते थे और हमारी-आपकी माँ,बहन,बेटी को ताकते रहते थे या किसी मुस्लिम सुल्तान, आक्रमणकारों का जासूस हवा करता था | जो जितना ज्यादा दुराचारी, अनपढ़, ठग होता था या जिसने जासूसी करके ज्यादा से ज्यादा लाभ सुल्तान या आक्रमणकारों को दिलवाया होता था उसकी कबर उतनी ही बड़ी, सुन्दर, सजी-धजी बनाई जाती थी | कमाल कि बात तो ये है कि ये कबरें बनाई भी जाती थी तो हमारे ही मंदिरों में, गुरुकुलों में और फिर कहते थे कि ये अमुक भवन हमने बनवाया …. इसलिए भाइयों आप खुद बचे और दूसरों को बचाएं | कबर पूजा कोई अच्छा काम नहीं है | भारत में जब गजनवी आया था तब सोमनाथ के ऊपर १७ बार हमला किया था, हर बार वह हारा, इसने बलवान्  थे हम, पर जब मुस्लिमों ने पाया कि ऐसे हम हारने वाले नहीं है तो कुछ जासूस भेजे गए | इन जासूसों ने अपने आपको सूफी संत बताया | हम भोले भले लोग थे, साधुओं को मान-सम्मान देना हमारे स्वाभाव में था तो लग गए इनके पीछे जैसे तो हमारे विद्वान, तपस्वी संतो से ये सूफी ज्यादा विद्वान् व सदाचारी न हों | हमारे पास अपने विद्वान, सदाचारी, तपस्वी, योगी सन्यासियों कि कोई कमी नहीं थी और न आज है पर हम लगे रहते है ऐसे धूर्तों के पीछे | जासूस को तो बनी-बनाई, पकी-पकाई बातें, रिपोर्ट मिल गयी और भेज दी अपने सुलतान तक, जनता भी सूफी संत पर लट्टू और बातें भी पता चल गयी तो सुलतान आ कर धमक गया राजा पर, सारे के सारे सैनिक मारे गए, माँ-बहन-बेटियों कि इज्जत लूट-लूट कर विधवाएँ बनाई गयी | और ऐसे-ऐसे तथाकथित सूफी संतों को हमने उनके मरने के बाद “पीर” घोषित कर दिया, उनकी कबरों को पूजना शुरू कर दिया मानों हम सब एहसान मान रहे हो कि आपने कितना अच्छा किया हमारी माँ-बहन-बेटी के साथ बलात्कार करके | धिक्कार है उस हर हिंदू को जो कबर पर अपना सिर पटकता है और माँगता है संतान, सुख, धन, वैभव | ये धन, वैभव माँगते उनसे, – जो कभी फटीचर थे, भिखारी थे, मंगेतर थे, दर-दर भटकने वाले या दुराचारी, अत्याचारियों से – अपने लिए माँगना कितनी शर्म और लज्जा की बात है | कृपा कर इससे बचें | हमारे हिंदू भाई कबर से संतान माँगते हैं, उस लाश से जो वर्षों पहले जमीन के अंदर गाड़ दी गयी थी और अब उसके शरीर का रक्त, हड्डी व वीर्य किसी का नमूना भी नहीं मिल सकता | संतान तो किसी चेतन से ही माँगनी चाहिए पर हम हिंदू तो कही भी, कभी भी, किसी से भी व कुछ भी माँग लेते हैं | जरा विचार करें |
    मृत्यु दिवस मनाना :- हमारी संस्कृति के अनुसार हम महापुरुषों का जन्म दिवस मानते हैं कभी भी किसी महापुरुष का मृत्यु दिवस नहीं मनाते | हमारे सारे त्यौहार आनंद व प्रसन्नता के हैं, कोई ऐसा त्यौहार नहीं जिसमें हम रुदन, दुःख प्रकट करते हैं, पर मुस्लिम सभ्यता के प्रभाव में रह-रह कर हमने भी कुछ-कुछ सीख ही लिया | आज हिंदू समाज का कोई-कोई वर्ग अपने संत-महंत का मृत्यु दिवस, पुण्यतिथि के नाम पर मनाने लगा है | क्या कभी आपने श्री कृष्ण जी या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम कि मृत्यु तिथि सुनी ??? राम नवमी या कृष्ण अष्टमी उनकी जन्म तिथि का उत्सव है | गुरु नानक जयंती, महावीर जयंती, बुद्ध जयंती ये सब जन्म तिथियाँ ही हैं | हमारी परंपरा जन्म जयंती मनाने कि है न कि मृत्यु तिथि | कृपा कर ध्यान दें और इस बुराई से बचें |
    स्त्री सम्मान :- हमारे शास्त्र बताते है कि स्त्री का सम्मान करों | शास्त्र कहता है कि “जहाँ नारी कि पूजा अर्थात् सम्मान होता है वह घर, परिवार, समाज, राष्ट्र सुखी होता है और वह देवता रहते हैं” | लेकिन आज उल्टा हो रहा हैं | मुस्लिम प्रभाव में आ कर हम सब स्त्री का सम्मान नहीं कर रहे और सब दुखी है | आइये ! नारी का सम्मान करें |
    लोबान :- पहले के समय में मंदिरों में अगर-तगर-गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थ जलाये जाते थे पर आज मुस्लिम प्रभाव में हिंदू लोबान का प्रयोग करने लगे हैं  | यज्ञ कुंड कि जगह लोबान जलाने के पात्र ने ले ली है | आइये ! आज से ही यज्ञ कुंड का प्रयोग करें और लोबान पात्र का नहीं | सुगन्धित पदार्थ में सामग्री का प्रयोग करें, गुग्गुल, अगर-तगर का प्रयोग करें ना कि लोबान का |
    पाँच बार कि नमाज :- नकलची हिंदुओं ने मुस्लिमों से पाँच बार कि नमाज कि तरह आरती भी सीख ली है | कई मंदिरों में दिन के अलग-अलग  समय आरती होती है और उसको नाम दिया जाता है – शयन आरती, भोग आरती, मंगल आरती आदि | ईश्वर सोता ही नहीं तो फिर कैसे शयन आरती ? खाता ही नहीं तो फिर कैसे भोग आरती ? सबको जगाने वाले के लिए मंगल आरती क्यों ? आइये ! इससे बचें | संध्या, वंदन दो समय किया जाता है – सबरे और शाम |

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

हमारे देश का नाम भारतवर्ष

हमारे देश का नाम  भारतवर्ष

हमारे देश का भारतवर्ष नाम होने के सम्बन्ध में एक सामान्य जनधारणा है कि महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। लेकिन वही पुराण इससे अलग कुछ दूसरी साक्षी प्रस्तुत करता है। इस ओर हमारा ध्यान नही गया, जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था। तनक विचार करें इस विषय पर:-आज के वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था। लेकिन सात महाद्वीप किसने बनाए क्यों बनाए और कब बनाए गये। इस ओर अनुसंधान नही किया गया। अथवा कहिए कि जान पूछकर अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी। लेकिन वायु पुराण इस ओर बड़ी रोचक कहानी हमारे सामने पेश करता है।
वायु पुराण की कहानी के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में अर्थात अब से लगभग 22 लाख वर्ष पूर्व स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भरत खंड को बसाया था। प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नही था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद लिया था। जिसका लड़का नाभि था, नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इस ऋषभ का पुत्र भरत था। इसी भरत के नाम पर भारतवर्ष इस देश का नाम पड़ा। उस समय के राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों के अलग-अलग राजा नियुक्त किया था। राजा का अर्थ इस समय धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था। राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नीन्ध्र को बनाया था। बाद में भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वह भारतवर्ष कहलाया। भारतवर्ष का अर्थ है भरत का क्षेत्र। भरत के पुत्र का नाम सुमति था। इस विषय में वायु पुराण के निम्न श्लोक पठनीय हैं—
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)
इन्हीं श्लोकों के साथ कुछ अन्य श्लोक भी पठनीय हैं जो वहीं प्रसंगवश उल्लिखित हैं। स्थान अभाव के कारण यहां उसका उल्लेख करना उचित नही होगा।
हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं तो उसमें पंडित जी संकल्प कराते हैं। उस संकल्प मंत्र को हम बहुत हल्के में लेते हैं, या पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मानकर छोड़ देते हैं। लेकिन उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है। जैसे उसमें उल्लेख आता है-जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….। ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं। इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्याव्रत कहलाता है। इस संकल्प के द्वारा हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं।
अब प्रश्न आता है शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है? इस विषय में हमें ध्यान देना चाहिए कि महाभारत नाम का ग्रंथ मूलरूप में जय नाम का ग्रंथ था, जो कि बहुत छोटा था लेकिन बाद में बढ़ाते बढ़ाते उसे इतना विस्तार दिया गया कि राजा विक्रमादित्य को यह कहना पड़ा कि यदि इसी प्रकार यह ग्रंथ बढ़ता गया तो एक दिन एक ऊंट का बोझ हो जाएगा। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस ग्रंथ में कितना घाल मेल किया गया होगा। अत: शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा किसी घालमेल का परिणाम हो सकता है। जब हमारे पास साक्षी लाखों साल पुरानी है और आज का विज्ञान भी यह मान रहा है कि धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें? दूसरी बात हमारे संकल्प मंत्र में पंडित जी हमें सृष्टिï सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि अब एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है। बात तो हम एक एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करें और अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ें या मानें तो यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है? जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण भी उपलब्ध हो, साथ ही तर्क भी हों तो फिर उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों के
आधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है।
हमारे देश के बारे में वायु पुराण में ही उल्लिखित है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है। इस विषय में देखिए वायु पुराण क्या कहता है—-
हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।
तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:।।
हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है। यदि किसी पश्चिमी इतिहास कार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है, और यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें तो रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है । यह सोच सिरे से ही गलत है। अब आप समझें राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है। हमने यह नही सोचा कि एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है? विशेषत: तब जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे और वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था। तब ऐसी परिस्थिति में उसने केवल इतना काम किया कि जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं उन सबको संहिताबद्घ कर दिया। इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा। जिससे यह धारणा रूढ हो गयीं कि राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है। ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं। अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए। अपने देश के नाम के विषय में भी हमें गंभी चिंतन करना चाहिए, इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है, जैसा कि इसके विषय में माना जाता है, बल्कि इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है। ‘वृहद देवता’ ग्रंथ में कहा गया है कि ऋषियों द्वारा कही गयी पुराने काल की बात इतिहास है। ऋषियों द्वारा हमारे लिये जो मार्गदर्शन किया गया है उसे तो हम रूढिवाद मानें और दूसरे लोगों ने जो हमारे लिये कुछ कहा है उसे सत्य मानें, यह ठीक नही। इसलिए भारतवर्ष के नाम के विषय में व्याप्त भ्रांति का निवारण किया जाना बहुत आवश्यक है। इस विषय में जब हमारे पास पर्याप्त प्रमाण हैं तो भ्रांति के निवारण में काफी सहायता मिल जाती है। इस सहायता के आधार पर हम अपने अतीत का गौरवमयी गुणगान करें, तो सचमुच कितना आनंद आएगा?