रविवार, 9 नवंबर 2014

जेहाद

गौरवमयी भारतवर्ष - जेहाद 

जेहाद

बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिष्र के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा।

और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिष्ला भी उन्हीं भागनेवालों में था। दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो। दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे जोर से न रोते थे।

दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है; इसका ख़ज़ाँचन्द।

धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ?

ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं,
हाँ, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।
‘तो अब क्या करोगे ?’
‘जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें।
तुमने क्या सोचा है ?’
‘मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’
‘आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।’
‘मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दरजन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।’

इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी।

दोनों युवक उसकी ओर बढ़े लेकिन ख़ज़ाँचंद तो दो-चार कदम चल कर रुक गया, धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा-डोर ले लिया और ख़ज़ाँचंद की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएँ की ओर चला। ख़ज़ाँचंद ने फिर बंदूक सँभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा। इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों पराजित हो चुका था। शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था। अब इसमें लेशमात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्रा धर्मदास है। ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति धर्मदास के रूपवैभव के आगे तुच्छ थी। परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार ख़ज़ाँचंद को हताश कर चुकी थी; पर वह अभागा निराश हो कर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था। तीनों एक ही बस्ती के रहनेवाले थे। श्यामा के माता-पिता पहले ही मर चुके थे। उसकी बुआ ने उसका पालन-पोषण किया था। अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी। उसकी अभिलाषा थी कि ख़ज़ाँचंद उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी जीवन के अंतिम दिनों के लिए कुछ सहारा हो जाये; लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी। उसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है, वही उसका एकमात्र अवलम्ब है। ख़ज़ाँचंद ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती। उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटा कर फकीर हो जाता।

धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दग़ाबाज़ काफिर।

दूसरा-नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ; लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।

धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे …
पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।
तीसरा-कुफ्र है ! कुफ्र है !

पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार।
दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ?
धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं।

दूसरा-कलामे शरीफ़ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।
धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे।
इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।
इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ?

धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ?

दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे।
पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ?
धर्मदास ने जहर का घूँट पी कर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ।
पाँचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।
श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।

ख़ज़ाँचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।
श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है !
ख़ज़ाँ.-जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।
श्यामा-अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है ?
ख़ज़ाँ.-कुछ समझ में नहीं आता।
श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ?
ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।
श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।
ख़ज़ाँ.-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय।

श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी।
ख़ज़ाँ.-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास …

श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो ? क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान हो कर जान बचाओ ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना।
ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर !’ की हाँक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर !’ की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया; पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ाँचंद के सिर पर पहुँच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली।

एक सवार ने ख़ज़ाँचंद की ओर बंदूक तान कर कहा-उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है।
दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। ख़ज़ाँचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है ?

चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो ‘नहीं’ का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी !

ख़ज़ाँचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला-तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं ! चारों पठानों ने कहा-काफिर ! काफिर !

ख़ज़ाँ.-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूँ। मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल …

चारों पठानों के मुँह से निकला ‘काफिर ! काफिर !’ और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही ख़ज़ाँचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये। उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।

ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।

धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा-श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा ? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ?

श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा-तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊँगी। हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो।

धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं ? मुझे खुद ख़ज़ाँचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है ?
श्यामा-अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह ख़ज़ाँचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी।

चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये। सरदार ने धर्मदास से कहा-तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।

धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहाँ से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूँ। खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी। ख़ज़ाँचंद की दोैलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं।

श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है ?

धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या ?
श्यामा-ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ाँचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं ! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी।

पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।

पठानों ने ख़ज़ाँचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ाँचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। ख़ज़ाँचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये; पर उसका वहाँ पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।

साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था ! आकाश पर लालिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो।

उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूँक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास !

धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा-हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूँ। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ; पर मौत भी नहीं आती।
धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ ! तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया !

श्यामा ने उदासीन भाव से कहा-मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।
‘मैं अब भी हिंदू हूँ। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’
‘जानती हूँ !’
‘यह जान कर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती !’

श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती ! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया ! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।

धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया ! चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया।
प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जा कर देखा और पहचान गयी। यह धर्मदास की लाश थी।

साभार -मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी जेहाद. ..


टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया उसका नाम है सरदार बल्लभ भाई पटेल

लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल 

टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया
उसका नाम है सरदार बल्लभ भाई पटेल 


आधुनिक भारत के शिल्पी सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचार, कर्म और उनकी स्मृतियां मन को रोमांच और गौरव से भर देती हैं। वे ऐसे राष्ट्रभक्त महापुरुष थे जिनके लिए ‘राष्ट्र सबसे पहले’ था। सरदार सही मायने में राष्ट्रीय एकता के प्रतीक थे और हैं। उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लेने के लिए भाजपानीत राजग सरकार की सराहना की जानी चाहिए। भारत की संप्रभुता, एकता और अखण्डता के लिए जीने-मरने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की सूझबूझ का ही नतीजा है कि आज हम एक शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिक हैं। दुनिया में भारत एक महाशक्ति है। वरना तो हम अपने महान राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े पकड़कर रो रहे होते।

तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर कई दफा तरस आता है जो यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत को एक देश और राजनीतिक इकाई का रूप देने का श्रेय अंग्रेजों को है। कांग्रेस के ही नेता एवं पूर्व मंत्री पी. चिदम्बरम किसी कार्यक्रम में इंदौर आए हुए थे, तब उन्होंने कहा था कि भला हो अंगे्रजों का जो वे भारत आए और हमें बेहतर बना दिया। वरना हम तो अंधेरे में ही जी रहे थे। लगभग यही बातें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तब कहीं थीं जब वे इंग्लैण्ड गए थे, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए। तमाम वामपंथी विद्वान भी यही सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं कि भारत को सभ्य और एक तो अंग्रेजों ने बनाया। अंग्रेज न आते तो भारत होता ही नहीं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों को भारतीयों से कोई मोहब्बत नहीं थी, न ही वे मानवता में विश्वास करते थे, जो वे भारतीयों के हित की चिन्ता करते। वे लुटेरे थे। लूटने के लिए आए थे। जब वीर प्रसूता मां भारती के लड़ाकों ने अंग्रेजों को ललकारा तब आखिरकर उन्हें यहां से जाना पड़ा। लेकिन, जाते-जाते भारत का सर्वनाश करने के लिए वे अपनी कुटिल चाल चल गए थे। उन्होंने भारत को एक राजनीतिक इकाई नहीं बनाया था बल्कि उन्होंने तो भारत को कई टुकड़ों में बांट दिया था। देशभक्त सरदार वल्लभ भाई पटेल न होते तो आज भारत 562 से भी अधिक टुकड़ों में बंटा होता। वे सरदार पटेल ही थे जिन्होंने भारत को एक किया। अपनी सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता के बल पर ही सरदार अलग-अलग झण्डा थामे 562 रियासतों को तिरंगे के नीचे ला सके। यह आसान काम नहीं था। सरदार पटेल के हाथ में यह काम न होता तो शायद यह संभव भी न हो पाता। सरदार के दृढ़ के आगे, उनकी लौह पुरुष की छवि के आगे भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद के निजामों की भी एक न चली। सरदार पटेल के कारण ही ये सब आज भारत का अभिन्न अंग हैं और यहां कोई विवाद नहीं। वहीं, जम्मू-कश्मीर मसले में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के कारण आज तक विवाद की स्थितियां बनी हुई हैं। अगर जम्मू-कश्मीर के मामले में नेहरू ने टांग न फंसाई होती, सरदार पटेल को अपने तरीके से समस्या को हल करने दिया गया होता तो आज जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन होता। वह अपने नाम के अनुरूप वाकई ‘धरती पर स्वर्ग’ होता।

भारत-पाकिस्तान अलगाव के कारण उपजीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोर अनुशासन प्रिय और मितभाषी सरदार वल्लभ भाई पटेल के लिए राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चुनौतीपूर्ण कार्य था। लेकिन, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने देश जोड़कर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा दिया। दरअसल, निर्णय लेते वक्त उनके दिमाग में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं रहती थी। उनकी सोच एकदम स्पष्ट थी- राष्ट्र सबसे पहले। किसी भी कीमत पर देश की एकता जरूरी है। राष्ट्र को एकजुट करने के लिए उन्हें कितनी ही तोहमत झेलनी पड़ी। सरदार सांप्रदायिक हैं, असमझौतावादी हैं, पूंजीपतियों के समर्थक हैं, मुस्लिम विरोधी हैं, वामपक्ष के विरोधी हैं। इस तरह के तमाम आरोप उन पर लगाए गए। लेकिन, आरोपों की परवाह न करते हुए सरदार पूरी तल्लीनता के साथ अपने काम में लगे रहे। निश्चित ही वे अपनी छवि और आरोपों की फिक्र करते तो देश कहीं पीछे छूट जाता। राष्ट्रीय एकता को हम पा नहीं सकते थे। भारत एक देश नहीं बन पाता। सरदार पटेल का ऋण हमेशा भारतीयों के माथे पर रहेगा। उस ऋण से उऋण होना संभव नहीं है। हां, एक तरीका है सरदार पटेल के विचारों और कर्मों को सार्थकता प्रदान करने का। राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए हम ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के मौके पर शपथ लें कि हमारे मन-वचन-कर्म से कभी भी, किसी तरह भी राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और संप्रभुता को क्षति न पहुंचे। राज्यों के आपसी विवाद खत्म करने के लिए हमें आगे आएं। भाषाई विवाद से पार पाएं। इन्सानों में धर्म-जाति के आधार पर कोई भेद न करें। सब स्तर पर एकजुट हों। देश की आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने में अपना योगदान थे। राष्ट्र विरोधी विचारों और कार्यों से दूर रहें। राष्ट्र विरोधी तत्वों का पुरजोर विरोध करें। भारत के गौरव को बढ़ाने के लिए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाहन करें।

भारत सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लेकर एकता की भावना के महत्व का भी प्रतिपादन किया है। स्वयं सरदार पटेल एकता को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। उनका स्पष्ट कहना था- ‘एकता के बिना जनशक्ति शक्ति नहीं है।’ उनका यह भी मानना था कि कोई भी विश्वास तब तक मजबूत नहीं होता जब तक उसके पीछे एकता की ताकत न हो। वे कहते थे- ‘शक्ति के अभाव में विश्वास किसी काम का नहीं है। विश्वास और शक्ति, दोनों ही किसी भी महान कार्य को करने के लिए अनिवार्य हैं।’ उन्होंने भाषणों से ही नहीं बल्कि अपने व्यवहार से भी इन बातों को आगे बढ़ाया था। कई मसलों को लेकर जवाहरलाल नेहरू से उनकी मतभिन्नता थी लेकिन अपनी ओर से उन्होंने यह कभी भी जाहिर नहीं होने दिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आपसी एकता और सामंजस्य जरूरी है। व्यक्तिगत हित, मन-मुटाव और मतभिन्नता को उन्होंने कभी अपने पास फटकने नहीं दिया। वे तो देश के लिए सर्वस्व समर्पित करने को निकले थे। उनके लिए बड़े से बड़ा पद प्राप्त करना उद्देश्य नहीं था। देश का मानस उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहता था लेकिन महात्मा गांधी ने अपने प्रिय जवाहरलाल नेहरू का नाम आगे बढ़ाया। सरदार पटेल ने पद-प्रतिष्ठा की दौड़ से खुद को बाहर रखकर गांधी के सम्मान को बढ़ाया और किसी मौन तपस्वी की तरह वे राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने में लगे रहे। आज के राजनीतिक दलों को सरदार पटेल से यह सीख लेनी चाहिए कि वे राष्ट्रीय एकता के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आगे आएं। एकजुट हों। देश के सम्मान पर आंच आए तो मिलकर आवाज बुलंद करें। भारत की सुरक्षा के लिए नासूर बन चुकी अवैध घुसपैठ की समस्या पर राजनीति बंद करें। घटनाओं और समस्याओं को अलग-अलग चश्मे से देखना बंद करें। खुली आंखों से स्थितियों को एक समान रूप से देखें। समस्या का समाधान करते समय राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर राष्ट्र को पहले रखकर देखें। स्वतंत्र भारत के समस्त नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि सरदार पटेल के काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। उनकी जयंती को सार्थक बनाएं, इसे कर्मकाण्ड तक सीमित न करें। भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के सरदार पटेल के स्वप्र को हम साकार करें।

इस्लामी सेकुलर आतंकवाद !

इस्लामी सेकुलर आतंकवाद !


 मुसलमानों के वोटबैंक पर नजर रखने वाले धूर्त और सत्तालोभी नेता खुद को धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रभक्त नेताओं को सम्प्रदायवादी साबित करने में लगे रहते हैं . और इनका मुख्य निशाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं . यदि कांगरेस या जे डी यू और कम्युनिस्ट ऐसा कहते हैं तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है लेकिन जब मुसलमान नेता भी धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते है , तो हमें उनकी नीयत पर शंका होती है .क्योंकि कुरान या हदीस में न तो धर्मनिरपेक्ष शब्द मिलता है . और न इस शब्द का आशय प्रकट करने के लिए कोई परिभाषा ही मिलती है .अरबी में ” धर्मनिरपेक्ष ” के लिए “ला मजहबियत ” शब्द है . जिसका सही अर्थ है किसी धर्म को नहीं मानना .चूँकि धर्म का अर्थ ईमान भी होता है .और नेताओं का कोई ईमान नहीं होता यह सब जानते हैं . इसी लिए यह लोग खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं .जब से सविधान में “धर्मनिरपेक्ष ” शब्द जोड़ा गया है तब से ही मुस्लिम नेताओं ने हिन्दू विरोध को ही ” धर्मनिरपेक्षता ”मान लिया है .वह कांगरेस का सहारा लेकर हिन्दुओं को प्रताड़ित करने ,उनमे फुट डालने ,हिन्दू युवा लडके लड़कियों को गुमराह करने का हर प्रकार का प्रयत्न करते रहते हैं .जो मुसलमानों के इतिहास से सिद्ध होता है .मुस्लमान न तो कभी धर्मनिरपेक्ष थे , और न आज है और न कभी होंगे . वास्तव में मुस्लिम नेता “धर्मनिरपेक्षता ” की आड़ में ” इस्लामी सेकुलर आतंकवाद ” फैला रहे हैं

1-मुसलमान और धर्मनिरपेक्षता

जो मुसलमान और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते रहते हैं ,क्या वह इन तथ्यों से इनकार कर सकते हैं कि इसलाम प्रेम से नहीं अत्याचार से फैला है .किसी भी मुस्लिम शासक ने हिन्दुओं के साथ समानता का व्यवहार नहीं किया .
यह संसार का अद्‌भुत आद्गचर्य ही है कि इस्लाम के जिस आतंक से पूरा मध्य पूर्व और मध्य एशिया कुछ दशाब्दियों में ही मुसलमान हो गया वह 1000 वर्ष तक पूरा बल लगाकर भारत की आबादी के केवल 1/5 भाग ही धर्म परिवर्तन कर सका।
इन बलात्‌ धर्म परिवर्तित लोगों में कुछ ऐसे भी थे जो अपनी संतानों के नाम एक लिखित अथवा अलिखित पैगाम छोड़ गये-‘हमने स्वेच्छा से
अपने धर्म का त्याग नहीं किया है” यदि कभी ऐसा समय आवे जब तुम फिर अपने धर्म में वापिस जा सको तो देर मत लगाना। हमारे ऊपर किये गये अत्याचारों को भी भुलाना मत।’
बताया जाता है कि जम्मू में तो एक ऐसा परिवार है जिसके पास ताम्र पत्र पर खुदा यह पैगाम आज भी सुरक्षित है। किन्तु हिन्दू समाज उन लाखों उत्पीड़ित लोगों की आत्माओं की आकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहा है। काद्गमीर के ब्रहाम्णों जैसे अनेक दृष्टांत है जहाँ हिन्दूओं ने उन पूर्वकाल के बलात्‌ धर्मान्तरित बंधुओं के वंशजों को लेने के प्रश्न पर आत्म हत्या करने की भी धमकी दे डाली और उनकी वापसी असंभव बना दी और हमारे इस धर्मनिरपेक्ष शासन को तो देखो जो मुस्लिम शासकों के इन कुकृत्यों को छिपाना और झुठलाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य समझता है.

2-विश्नोई संप्रदाय का उदाहरण

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विश्नोई संप्रदाय के अनेक परिवार रहते हैं। इस सम्प्रदाय के लोगों की धार्मिक प्रतिबद्धता है कि हरे वृक्ष न काटे जाये और किसी भी जीवधारी का वध न किया जाये। राजस्थान में इस प्रकार की अनेक घटनाएँ हैं, जब एक-एक वृक्ष को काटने से बचाने के लिये पूरा परिवार बलिदान हो गया।सऊदी अरब के कुछ आगुन्तकों को ग्रेट बस्टर्ड नामक पक्षी का राजस्थान में शिकार करने की जब भारत सरकार द्वारा अनुमति दी गई तो इन विद्गनोइयों के तीव्र विरोध के कारण यह प्रोग्राम रद्‌द हो गया था। वह विद्गनोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक संत जाम्भी जी की समाधि पर बनी छतरी पर मुस्लिम काल में लोधी मुस्लिम सुल्तानों द्वारा अधिकार कर लिया गया था। अकबर जैसे उदार बादशाह से जब फरियाद की गई तो उसने भी इन पाँच शर्तों पर यह छतरी विश्नोई सम्प्रदाय को वापिस की थी .
1. मुर्दा गाड़ो,
2. चोटी न रखो,
3. जनेऊ धारण न करो,
4. दाढ़ी रखो,
5. विष्णु के नाम लेते समय विस्मिल्लाह बोलो
विश्नोइयोँ ने मजबूरी की दशा में यह सब स्वीकार कर लिया। धीरे-धीरे जैसा कि अकबर को अभिष्ट था, विश्नोई दो तीन सौ वर्ष में मुसलमान अधिक, हिन्दू कम दिखाई देने लगे। हिन्दुओं के लिये वह अछूत हो गये। परन्तु उन्होंने अपनी मजबूरी को भुलाया नहीं। आर्य समाज के जन्म के तुरंत बाद ही उन्होंने उसे अपना लिया। बिजनौर जनपद के मौहम्मदपुर देवमल ग्राम के द्गोख परिवार और नगीना के विश्नोई सराय के विश्नोई इसके उदाहरणहैं।
प्रो. मौहम्मद हबीब के अनुसार 1330 ई. में मंगोलों ने आक्रमण किया। पूरी काद्गमीर घाटी में उन्होंने आग लगाने बलात्कार और कत्ल करने जैसे कार्य किये। राजा और ब्राहम्ण तो भाग गये। परन्तु साधारण नागरिक, जो रह गये, दूसरा कोई विकल्प न देखकर धीरे-धीरे मुसलमान हो गये.
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इस प्रकार युद्ध से कैदी प्राप्त होते थे। कैदी गुलाम और फिर मुसलमान बना लिये जाते थे। नये मुसलमान दूसरे हिन्दुओं की लूट, बलात्कार और बलात्‌ धर्मान्तरण में उत्साहपूर्वक लग जाते थे क्योंकि वह अपने समाज द्वारा घृणित समझे जाने लगते थे।
मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा दी गई उपरोक्त घटनाओं के विवरण को पढ़कर जिनके अनेक बार वे प्रत्यक्ष दर्शी थे, किसी भी मनुष्य का मन अपने अभागे हिन्दू पूर्वजों के प्रति द्रवित होकर करुणा से भर जाना स्वाभाविक है.

3-अत्याचारी औरंगजेब

इस बात से कोई भी व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि इस्लाम की शिक्षा के कारण ही मुसलमान क्रूर , अत्याचारी और हिंसक हो जाते हैं , और उनके दिमाग में गैर मुस्लिमों के प्रति नफ़रत कूट कूट कर भरी होती है .इसीलिए जब भी भारत में कहीं भी कोई मुस्लिम शासक हुआ है .उसने हिन्दुओं पर अत्याचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी .ऐसे शासकों के बारे में कई किताबें लिखी जा सकती हैं . लेकिन औरंगजेब को मुसलमान ” गाजी ” यानि धर्मयोद्धा ” मानते हैं ,इसलिए उसके अत्याचार के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं .
औरंगजेब जन्म गुजरात के दोहद नामकी जगह में 4 नवम्बर 1 6 1 8 में हुआ था .इसका पूरा नाम “अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन औरंगजेब आलमगीर: ابو المظفر محي الدين محمد اورنگزیب عالمگیر” था .गद्दी पर बैठने के बाद इसने अपने नाम में यह उपाधि लगा ली “सुल्तानुल आजम अल खाकान अल मुकर्रम हजरत अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाजी: السلطان الاعظم والخقان المكرم حضرت ابو المظفر محي الدين محمد اورنگزیب بہادر عالمگیر پادشاہ غازی”गाजी का अर्थ धर्मयोद्धा होता है . यानि ऐसा व्यक्ति जिसने गैर मुस्लिमों को हरा दिया हो .औरंगजेब खुद को हिन्दुओं और मुगलों का शहंशाह मानता था . इसलिए उसने यह उपाधि भी जोड़ ली “शहंशाहे सल्तनते अल हिंदिया वल मुगलिया: شاہنشاہ سلطنت الہنديہ والمغليہ”औरंगजेब के गद्‌दी पर आते ही लोभ और बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण ने भीषण रूप धारण किया। अप्रैल 1667 में चार हिन्दू कानूनगो बरखास्त किये गये। मुसलमान हो जाने पर वापिस ले लिये गये। औरंगजेब की घोषित नीति थी ‘कानूनगो बशर्ते इस्लाम’ अर्थात्‌ मुसलमान बनने पर कानूनगोई.

पंजाब से बंगाल तक, अनेक मुस्लिम परिवारों में ऐसे नियुक्ति पत्र अब भी विद्यमान हैं जिनसे यह नीति स्पष्ट सिद्ध होती है। नियुक्तियों और पदोन्नतियों दोनों के द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का प्रलोभन दिया जाता था।.

अनेक लोग, जो मुसलमान बनने को तैयार नहीं हुए, नौकरी से निकाल दिये गये। नामदेव को इस्लाम ग्रहण करने पर 400 का कमाण्डर बना दिया गया और अमरोहे के राजा किशनदास के पोते द्गिावसिंह को इस्लाम स्वीकार करने पर इम्तियाज गढ़ का मुशरिफ बना दिया गया। ‘समाचार पत्रों में नेकराम के धर्मान्तरण का जो राजा बना दिया गया और दिलावर का, जो 10000 का कमाण्डर बना दिया गया का वर्णन है।(17) के.एस. लालK.S.Lal “अपनी पुस्तक ‘इंडियन मुस्लिम व्हू आर दे': Indian Mislims who are they “में अनेकों उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं कि इस प्रकार के लोभ के कारण और जिजिया कर से बचने के लिये बड़ी संखया में हिन्दुओं का धर्मान्तरण हुआ।
मराठों के जंजीरा के दुर्ग को जीतने के बाद सिद्‌दी याकूब ने उसके अंदर की सेना को सुरक्षा का वचन दिया था। 700 व्यक्ति जब बाहर आ गये तो उसने सब पुरुषों को कत्ल कर दिया। परन्तु स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाकर उनके मुसलमान बनने पर मजबूर किया.

4-हिन्दू लड़कियों का अपहरण

अय्याशी के बिना इस्लाम अधुरा होता है .और इसके लिए लड़कियों की जरुरत होती है .आज भी जताने भी बलात्कार और अपहरण हो रहे है . अधिकांश में मुसलमान दोषी पाए गए हैं .यह परम्परा आज भी चल रही है . क्योंकि कुरान में जिहादियों को जन्नत में औरतें देने का वायदा किया गया है . यही काम औरंगजेब ने किया था .
हिन्दू गृहस्थों और रजवाड़ों की लड़कियाँ, किस प्रकार बलात्‌ उठाकर गुलाम रखैल बना ली जाती थी, उसका एक उदाहरण मनुक्की की आँखों देखा अनुभव है। वह नाचने वाली लड़कियों की एक लम्बी सूची देता है जैसे – हीरा बाई, सुन्दर बाई, नैन ज्योति बाई, चंचल बाई, अफसरा बाई, खुशहाल बाई, केसा बाई, गुलाल, चम्पा, चमेली, एलौनी, मधुमति, कोयल, मेंहदी, मोती, किशमिश, पिस्ता, इत्यादि। वह कहता है कि ये सभी नाम हिन्दू हैं और साधारणतया वे हिन्दू हैं जिनको बचपन में विद्रोही हिन्दू राजाओं के घरानों में से बलात उठा लिया गया था। नाम हिन्दू जरूर है, अब पर वे सब मुसलमान हैं।(97 )

5-मठ मंदिर तुडवाये

औरंगजेब ने खुद को असली गाजी साबित करने के लिए जिन मंदिरों , पाठशालाओं . और धर्म स्थलों का ध्वंस किया उनकी सूची काफी बड़ी है . जिन में से कुछ प्रसिद्द मंदिरों के नाम इस प्रकार हैं .
1.सन्‌ 1648 ई. में मीर जुमला को कूच बिहार भेजा गया। उसने वहाँ के तमाम मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी।(102)
2.सन्‌ 1666 ई. में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा में दारा द्वारा लगाई गई पत्थर की जाली हटाने का आदेश दिया-‘इस्लाम में मंदिर को देखना भी पाप है और इस दारा ने मंदिर में जाली लगवाई?'(103)
3.सन्‌ 1669 ई. में ठट्‌टा, मुल्तान और बनारस में पाठशालाएँ और मंदिर तोड़ने के आदेश दिये। काशी में विद्गवनाथ का मंदिर तोड़ा गया और उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया।(104)
4 .सन्‌ 1670 ई. में कृष्णजन्मभूमि मंदिर, मथुरा, तोड़ा गया। उस पर मस्जिद बनाई गई। मूर्तियाँ जहाँनारा मस्जिद, आगरा, की सीढ़ियों पर बिछा दी गई।(105
5.सोरों में रामचंद्र जी का मंदिर, गोंडा में देवी पाटन का मंदिर, उज्जैन के समस्त मंदिर, मेदनीपुर बंगाल के समस्त मंदिर, तोड़े गये।(106)
6. सन्‌ 1672 ई. में हजारों सतनामी कत्ल कर दिये गये। गुरु तेग बहादुर का काद्गमीर के ब्राहम्णों के बलात्‌ धर्म परिवर्तन का विरोध करने के कारण वध करवाया गया।(107)
7.सन्‌ 1679 ई. में हिन्दुओं पर जिजिया कर फिर लगा दिया गया जो अकबर ने माफ़ कर दिया था। दिल्ली में जिजिया के विरोध में प्रार्थना करने वालों को हाथी से कुचलवाया गया। खंडेला में मंदिर तुड़वाये गये।(108)
8.जोधपुर से मंदिरों की टूटी मूर्तियों से भरी कई गाड़ियाँ दिल्ली लाई गईं और उनको मस्जिदों की सीढ़ियों पर बिछाने के आदेश दिये गये।(109)
9.सन्‌ 1680 ई. में ‘उदयपुर के मंदिरों को नष्ट किया गया। 172 मंदिरों को तोड़ने की सूचना दरबार में आई। 62 मंदिर चित्तौड़ में तोड़े गये। 66 मंदिर अम्बेर में तोड़े गये। सोमेद्गवर का मंदिर मेवाड़ में तोड़ा गया। सतारा में खांडेराव का मंदिर तुड़वाया गया।'(110)
10.सन्‌ 1690 ई. में एलौरा, त्रयम्वकेद्गवर, नरसिंहपुर एवं पंढारपुर के मंदिर तुड़वाये गये।(111)
11.सन्‌ 1698 ई. में बीजापुर के मंदिर ध्वस्त किये गये। उन पर मस्जिदें बनाई गई।(112)

6-इस्लाम की दोगली धर्मनिरपेक्षता

जब मुस्लिम बादशाह बलपूर्वक भारत के सभी हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बना सके तो उन्होंने हिन्दुओं को इस्लाम के प्रति आकर्षित करने के लिए एक नयी तरकीब निकाली . सब जानते हैं कि इस्लाम में शायरी , हराम है , क्योंकि जब मुहम्मद साहब ने खुद को अल्लाह का रसूल घोषित कर दिया था तो अरब के लोग कुरान को मुहम्मद की शायरी कहते थे . और अरब के शायर कुरान का मजाक उड़ाते थे . इसी तरह इस्लाम में संगीत , गाना बजाना,वाद्ययंत्रों का प्रयोग करना भी हराम है ,क्योंकि यह हिदू धर्म में भजन कीर्तन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है . इसलिए चालाक मुसलमानों ने सोचा कि यदि संगीत के माध्यम से हिन्दुओं में इस्लाम के प्रति रूचि पैदा की जाये तो उनका धर्म परिवर्तन करना सरल होगा .इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ हिन्दुओं ने तो मुसलमानों के आचार विचार , खानपान अपना लिए , लेकिन मुसलमान हिन्दुओं से हमेशा दूरी बनाये रखे. फिर मुसलमानों ने एक ऐसी कृत्रिम वर्णसंकर “धर्मनिरपेक्षता ” तहजीब बना डाली , जिसका नाम गंगाजमुनी तहजीब रख दिया . इसे हिन्दू मुस्लिम एकता ,प्रतीक बता दिया ,बाद में मुसलमानों और दोगले हिन्दुओं ने इसका नाम “धर्मनिरपेक्षता ” का नाम दे दिया .मुस्लिम शासकों ने तो हिन्दुओं की खतना करा कर मुस्लमान बना दिया था . लेकिन इस “धर्मनिरपेक्षता ” ने हिन्दुओं की खस्सी कर दी . जिस से उनमे अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ने की शक्ति समाप्त हो गयी .इसमे संगीत का भी बड़ा योगदान है ,जिसे” सूफी संगीत “कहा जाता है .मूर्ख हिन्दू अरबी फारसी जाने बिना ही इस संगीत को एकता का मानते हैं . भारत में इसे कव्वाली भी कहा जाता है .जिसका अविष्कार अमीर खुसरो ने किया था जो कट्टर हिन्दू विरोधी था .

7-अमीर खुसरो की धर्मनिरपेक्षता ?

इसका पूरा नाम “अबुल हसन यमीनुद्दीन ख़ुसरौ : ابوالحسن یمین‌الدین خسرو‎” था .इसका जन्म सन 1253 में उत्तर प्रदेश के शहर बदायूँ में हुआ था .इसके पिता का नाम अमीर सैफुद्दीन था . जो ईरान के बलख शहर से भारत में सैनिक बनने के लिए आया था .अमीर खसरो को संगीत शायरी का शौक था ,लोग उसे “अमीर ख़ुसरौ दहलवी :امیر خسرو دہلوی “भी कहते थे .बड़े दुःख की बात है कि जो लोग खसरो की बनायीं गजलों को सुन कर झुमने लगते हैं . और उसी को हिन्दू मुस्लिम एकता का साधन बताते हैं , वह नहीं जानते कि खुसरो संगीत से एकता नहीं नफ़रत फैलाता था . और एक क्षद्म जिहादी था , हमारे धर्मनिरपेक्ष शासकों द्वारा बहुधा प्रशंसित धर्मनिरपेक्ष अमीर खुसरो अपनी मसनवी” Qiranus-Sa’dain ” में लिखता है-

जहां रा कि दीदम ईँ रस्म पेश ,
कि हिन्दू बुवद सैदे तुर्कां हमेश .1
अज बेहतरे निस्बते तुर्को हिन्दू ,
कि तुर्क अस्त चूँ शेर हिन्दू चूं आहू .2
जि रस्मे कि रफ्त अस्त चर्खे र वाँ रा ,
वुजूद अज पये तुर्क शुद हिंदुआं रा .3
कि तुर्क अस्त ग़ालिब बर ईशां चूँ कोशद ,
कि हम गीरद हम खरद औ हम फ़रोशद .4
अर्थात्‌ ‘संसार का यह नियम अनादिकाल से चला आ रहा है कि हिन्दू सदा तुर्कों का अधीन रहा है. 1
तुर्क और हिन्दू का संबंध इससे बेहतर नहीं कहा जा सकता है कि तुर्क सिंह के समान है और हिन्दू हिरन के समान.2
आकाश की गर्दिश से यह परम्परा बनी हुई है कि हिन्दुओं का अस्तित्व तुर्कों के लिये ही है. 3

क्योंकि तुर्क हमेशा गालिब होता है और यदि वह जरा भी प्रयत्न करें तो हिन्दू को जब चाहे पकड़े, खरीदे या बेचे।’ 4

अब हिन्दू समाज को खास तौर पर युवकों को गंभीरता से सोचना चाहिए कि वह सेकुलर बनकर इस्लाम के सेकुलर आतंकवाद के जाल में तो नहीं फसते जा रहे हैं . या सेकुलर बन कर गांधी , और अन्ना जैसे कायर बनना पसंद करेंगे जो भूख से मर जाने को ही हर समस्या का हल बताता है . या आप गुरु गोविन्द सिंह , शिवाजी , बोस , आजाद और ऊधम सिंह जैसे धार्मिक बनना पसंद करंगे और हाथ फ़ैलाने की जगह अपने अधिकार छीन लेंगे .और ईंट का जवाब पत्थर से देंगे .

याद रखिये धर्मनिरपेक्षता जिहाद का ही एक रूप है .


राष्ट्र के वृत्त की परिधि का केन्द्र है हिंन्दुत्व

गौरवमयी भारतवर्ष 


राष्ट्र के वृत्त की परिधि का केन्द्र है हिंन्दुत्व


यह समाचार छनकर आ रही है कि मुजफ्फरनगर और सहारनपुर दंगों की आड़ में अलकायदा ने भारतीय मुसलमानों से जिहाद में सम्मिलित होकर अपनी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करने की भावुक अपील की है। भारत में इस आतंकी संगठन का प्रमुख असीम उमर है। जिसके विषय में सुरक्षा एजेंसी का मानना है कि उसके तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े हैं। उसने अपने संगठन की पत्रिका में लेख लिखा है कि भारत के मुसलमानों को जिहाद का एक भाग बनना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी पिछले दिनों जब अमेरिका गये थे तो उन्होंने वहां के राष्ट्रपति ओबामा के साथ अपनी बातचीत में कहा था कि भारत के मुसलमानों  की देशभक्ति असंदिग्ध है। मोदी के विषय में यह सच है कि वे जो कुछ बोलते हैं, उसको अवसर के अनुकूल करके बोलते हैं। उन्होंने भारतीय मुसलमानों के विषय में सही समय पर सधा सधाया बयान दिया, जिससे देश की एकता और अखण्डता को नष्ट करने के षडय़ंत्रों में लगी शक्तियों को करण्ट का झटका लगा। हम देख रहे हैं कि पी.एम. नरेन्द्र मोदी के उक्त बयान का सकारात्मक परिणाम आया है।

पर यह भी सच है कि इस देश में पहले से ही कई आतंकी संगठन चल रहे हैं। जिनकी ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए, अच्छा हो कि राष्ट्रभक्त मुसलमान भी सरकार के कार्यों में अपना सक्रिय सहयोग दें। सरकार को अटल सरकार के समय लिये गये पोटा कानून के निर्माण संबंधी निर्णय की समीक्षा करनी चाहिए। बात किसी समुदाय को अपमानित करने की नही है, बात देश को सम्मानित करने की है और देश तभी सम्मानित होगा जब ‘सबका साथ और सबका विकास’ के प्रधानमंत्री के आदर्श नारे की परिधि में ‘आतंक में जिसका हाथ, उसका विनाश’ को भी सम्मिलित कर लिया जाए। इसके लिए विपक्ष भी यदि अपना अपेक्षित सहयोग दे तो आतंकवाद के विरूद्घ एक कारगर रणनीति बनायी जा सकती है। जब अटल सरकार पोटा लायी थी तो उस समय जिन आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी की गयी थी, उनमें पंजाब से बब्बर खालसा इंटरनेशनल, खालिस्तान कमांडो फोर्स, खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, जम्मू कश्मीर से लश्कर ए-तैयबा या सवांए-अहले-हदीस, जैश-ए-मौहम्मद/तहरीक-ए-फुरकान, हरकत उल मुजाहिद्दीन/हरकत उल अंसार। हरकत उल जेहादी-ए-इस्लामी, हिजबुल मुजाहिद्दीन/हिजबुल मुजाहिद्दीन सीर पंजाब रेजीमेंट, अल उमर मुजाहिदीन और जम्मू कश्मीर इस्लामी फ्रंट सम्मिलित थे। इसी प्रकार उत्तर पूर्वी राज्यों में सक्रिय जिन आतंकी संगठनों को उस सूची में रखा गया था, उनके नाम थे-यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) नेशनल डेमोक्रेटिक फं्रट ऑफ बोडोलैण्ड, पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी कांगली पाक, काललीमाक कम्युनिस्ट पार्टी,कांगलेई याओल कानवा लुप, मणीपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट, ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा जबकि दक्षिणी भारत में सक्रिय आतंकी संगठनों में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिलईलम का नाम उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में सक्रिय आतंकी संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) व दीनदार ए अंजुमन और नक्सली संगठनों में पीपुल्स वार ग्रुप माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के नाम सम्मिलित थे।

जब कांग्रेस की मनमोहन सरकार 2004 में आयी तो उसने पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के पोटा को निरस्त कर दिया और धीरे-धीरे आतंकवाद को देश में जिस प्रकार एक राष्ट्रीय समस्या मानने का मार्ग प्रशस्त हो रहा था, कांग्रेस के इस निर्णय से उस प्रयास को भारी धक्का लगा। यह दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य है कि हम स्वतंत्रता के बीते 67 वर्षों में अपनी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के शत्रुओं को भी नही पहचान पाये हैं। दुखपूर्ण तथ्य ये भी है कि राजनीति ही राष्ट्रनीति बनकर हमें आतंकवाद के विरूद्घ कठोर होने की प्रेरणा देती है तो राजनीति ही वोटों के लालच में आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों को दूध पिलाती है। इसलिए कई लोग जब देशद्रोहियों के और राजनीति के अपवित्र गठबंधन को देखते हैं तो वे राजनीतिज्ञों को भी ‘देशद्रोही’ कहने से नही चूकते हैं।

हम भारतीय लोग राजनीति में राष्ट्रनीति नही खोज पा रहे हैं। यहां अनैतिक हठबंधन (गठबंधन नही) बनाये जाते हैं जो राजनीति को भी दबाव समूहों की भांति कार्य करने की स्थिति तक हम गिरा देते हैं। राजनीति अपना मार्ग भूल जाती है और उन अपवित्र मार्गों के बीहड़ों में जा भटकती है, जिन्हें देखकर लोग राजनीति पर देशद्रोही और राष्ट्रद्रोही होने के आरोप लगाते हैं। देश में राजनीति और राष्ट्रीय मूल्यों की स्थापना के लिए 67 वर्ष का समय बहुत होता है, पर हमने ये समय लगता है व्यर्थ की बातों में ही व्यतीत कर दिया है। हमने शासन को उच्चता नही दी, राजनीतिज्ञों को राष्ट्र के प्रति समर्पण नही दिया, और नागरिकों को मर्यादित आचरण नही दिया। इसलिए सर्वत्र अशांति है। शांति के पुजारी देश में अशांति को अस्तित्व उसकी उपलब्धि नही कही जा सकती। निश्चित रूप से हमने 67 वर्ष में बहुत कुछ खोया है। स्वातंत्रय वीर सावरकर ने जिस भारत का सपना संजोया था उसकी झलक ‘क्रांतिकारी चि_ियां’- पृष्ठ 96 पर मिलती हैं। वह लिखते हैं-‘‘हम ऐसे सर्वन्यायी राज्य में विश्वास करते हैं, जिसमें मनुष्य मात्र का भरोसा हो सके और जिसके समस्त पुरूष और स्त्रियां नागरिक हों, और वे इस पृथ्वी सूर्य और प्रकाश से उत्तम फल प्राप्त करने के लिए मिलकर परिश्रम करते हुए फलों का समान रूप से उपयोग करें, क्योंकि यही सब मिलकर वास्तविक मातृभूमि या पितृभूमि कहलाती है। अन्य भिन्नताएं यद्यपि अनिवार्य हैं तथापि वे अस्वाभाविक हैं। राजनीति शास्त्र का उद्देश्य ऐसा मानवी राज्य है या होना चाहिए जिसमें सभी राष्ट्र अपना राजनीतिक अस्तित्व अपनी पूर्णता के लिए मिला देते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे सूक्ष्मपिण्ड इंद्रिय मय शरीर की रचना में, इंद्रिमय शरीर पारिवारिक समूह में तथा पारिवारिक समूह संघ में तथा संघ राष्ट्र राज्यों में मिल जाते हैं।’’

स्वतंत्र भारत इस सर्वन्यायी राज्य की स्थापना को अपना लक्ष्य घोषित नही कर सका। यह एक कड़वा सच है, जिसे हम सबको स्वीकार करना चाहिए। हमने सर्वन्यायी राज्य के स्थान पर एक ऐसे राज्य की स्थापना कर डाली जिसमें पग-पग पर तुष्टिकरण होता दीखता है, तुष्टीकरण के माध्यम से एक बड़े वर्ग के अधिकारों का हनन करके उन्हें कथित अल्पसंख्यक वर्ग को देने के लिए हर राजनीतिक दल उतावला दिखता है। यह तो एक अन्यायपरक स्थिति है और यह स्थिति किसी राज्य का अंतिम लक्ष्य नही हो सकती। अंतिम लक्ष्य है मानवतावाद का विकास और विस्तार, जिसे राष्ट्रवासियों के रोम-रोम में बसा दिया जाए। उस मानवतावाद में ‘पहले मैं…., पहले मैं…’ का शोर नही होता है, अपितु ‘पहले आप.. पहले आप…’ का स्वर्णिम भोर होता है। भारत की संस्कृति में शिष्टाचार में ‘पहले आप’ कहने की परंपरा का गहरा राज है, जिसे उजाडऩे की ओर हमने कीर्तिमान स्थापित कर दिये हैं। इसलिए सर्वत्र अलगाववाद की बयार बह रही है, आतंकवाद का ज्वार चढ़ रहा है।

हमने ऊपर जितने भी संगठनों के नाम दिये हैं, ये सारे के सारे ही देश में ‘पहले मैं’ की अपसंस्कृति के प्रसारक हैं। ये अधिकारों के साथ साथ कत्र्तव्यों की ओर कोई ध्यान नही देते हैं और राज्य से ही नही अपितु देशवासियों से भी छीनकर खाने की अपसंस्कृति में विश्वास रखते हैं। यही राक्षसी वृत्ति है और इसी वृत्ति से जनसाधारण की रक्षा कराने के लिए राज्य की स्थापना प्राचीन काल में की गयी थी। तब हर व्यक्ति का और हर संवेदनशील हृदय का उद्देश्य ऐसी घातक सोच वाले लोगों को राष्ट्र और समाज का शत्रु माना जाना हमारा एक राष्ट्रीय संस्कार होता था। इसीलिए राम और लक्ष्मण को ऋषियों के यज्ञ कार्यों में विघ्न डालने वाले दुष्टों के संहार के लिए उनके पिता ने विश्वामित्र जी के साथ सहज रूप में ही भेज दिया था। जबकि आज इसके विपरीत हो रहा है, आज का राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति को चमकाने के लिए ‘गुण्डों’ को पालता है। सारी व्यवस्था शीर्षासन कर गयी है, और हम हैं कि कहे जा रहे हैं कि देश उन्नति कर रहा है।

देश की राजनीति दिशाविहीन हुई तो देश ही दिशाविहीन हो गया है, देश की राजनीति विकृत हुई तो सारा देश विकृतियों से ग्रस्त हो गया और देश की राजनीति विसंगतियों में उलझी तो देश भी विसंगतियों में उलझ गया। क्या ही अच्छा हो कि ‘स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत’ के सफाई अभियान को मोदी जी ऊपर से आरंभ करें और राजनीति को स्वच्छ और स्वस्थ करते हुए देश के अंतिम व्यक्ति की ओर बढ़ें। हमारा विश्वास है कि ‘राजनीति के स्वच्छता अभियान’ में उन्हें जितने अनुपात में सफलता मिलती जाएगी, देश में उतनी ही जागृति आत्मविश्वास और पवित्रता आती जाएगी। एक समय आएगा कि जब सारा देश चमक उठेगा और उन्हें बाहर अर्थात जनसाधारण के मध्य अधिककार्य करने की आवश्यकता नही रहेगी। इसका कारण ये है कि राजनीति नाम की बगुली में ही राष्ट्र के प्राण निवास करते हैं। आतंकवाद की आश्रय स्थली राजनीति है। सारे नाग और राष्ट्रघाती लोगों को भोजन पानी राजनीति के संरक्षण में मिलता है। इसीलिए मानवतावाद और संवेदना शून्य राजनीति इस देश का दुर्भाग्य बन चुकी है।

1949 में सावरकर जी ने हिंदू महासभा के अध्यक्षीय भाषण में कहा था-‘हम ऐसा राज्य चाहते हैं जिसे विशुद्घ हिंदी राज्य रहने दिया जाए और वह मतदान लोकसेवाओं, कार्यालयों, कराधानों में धर्म अथवा जाति के आधार पर किसी प्रकार का पक्षपात या भेद न करे। किसी भी व्यक्ति को हिन्दू या मुसलमान ईसाई या पारसी के रूप में न पहचाना जाए।’’ सावरकर का हिंदुत्व सचमुच कितना विनम्र है। हमारा मानना है कि ऐसा विनम्र हिंदुत्व ही इस देश की वह कुंजी है जो सारी समस्याओं का एक मात्र समाधान रखकर चलती है। मोदी ने अमेरिका में जाकर बोला है कि भारत के मुसलमान की देशभक्ति असंदिग्ध है, हमारा मानना है कि सावरकर के इस विनम्र हिंदुत्व के प्रति निष्ठा भी हर राष्ट्रवादी मुसलमान की असंदिग्ध है। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हम इस हिन्दुत्व को अपनी राजनीति का आधार नही बना पाये इसलिए राष्ट्र वृत्त को बिना केन्द्र के ही घुमाने का प्रयास कर रहे हैं। अब भी समय है यदि परिधि का केन्द्र अब भी चुन लिया गया तो सब तरह के आतंकवाद और जिहादों का विनाश स्वयं हो जाएगा। भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू नही है, अपितु जो व्यक्ति इस देश को अपना देश मानकर इसे पितृभू और पुण्यभू मानता है, वह स्वभावत: हिन्दू है। हमारे वृत्त की परिधि का केन्द्र हिन्दू है।



वेदालोचन के बिना संस्कृत शिक्षा व मनुष्य जीवन व्यर्थ है

वेदालोचन के बिना संस्कृत शिक्षा व मनुष्य जीवन व्यर्थ है


कहा जाता है कि ज्ञान की पराकाष्ठा वैराग्य है। इसका अर्थ यह लगता है कि जिस व्यक्ति को जितना अधिक ज्ञान होगा वह उतना ही अधिक वैराग्य को प्राप्त होगा। अब विचार करते हैं कि एक व्यक्ति के अन्दर ज्ञान बहुत ही कम है। इस पहली परिभाषा के अनुसार कहना होगा कि उस व्यक्ति में भौतिक व नश्वर वस्तुओं के प्रति राग अधिक तथा वैराग्य नगण्य है। जैसे-जैसे उसको यथार्थ ज्ञान होता जायेगा, वैसे-वैसे वह व्यक्ति वैराग्य को प्राप्त होता जायेगा। ईश्वर में ज्ञान की पराकाष्ठा है इससे यह अनुमान होता है कि ईश्वर पूर्ण वैराग्य में स्थित है। हमें लगता है कि ज्ञान की पराकाष्ठा के लिए मुख्यतः दो चीजों की आवश्यकता है। एक तो भाषा व दूसरा ज्ञान। सर्वोत्कृष्ट भाषा संस्कृत है व उसमें ज्ञान की पराकाष्ठा वेदों में है। वेदों का अध्ययन किया हुआ व्यक्ति ही ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त हो सकता है। इतर व्यक्तियों का ज्ञान व उनमें वैराग्य न्यूनातिन्यून होगा।



हम कोई भी भाषा क्यों सीखते हैं? इसलिये कि हम अपनी बात दूसरों को संप्रेषित कर सकंे और दूसरों की बातें व वाक्यों को समझ सकें। इसलिये भी भाषा सीखते हैं कि उस भाषा का जो साहित्य है उसका अघ्ययन कर सकें। इन सबसे हमें जीवन में अनेक लाभ होते हैं। भाषा को शुद्ध व सारगर्भित एवं प्रभावशाली रूप से बोलने वाला व्यक्ति ही सम्मान पाता है और जीवन में सफल होता है। यदि हमें भाषा का आधा-अधूरा अधकचरा ज्ञान है तो यह हमारी सफलता में बाधक होता है। अतः सभी का यह प्रयास होता है कि वह उस भाषा को अधिक से अधिक जाने। इसके लिए उस भाषा के व्याकरण आदि को पढ़ने व उसके अभ्यास के साथ उस भाषा के सामान्य व उच्च कोटि के साहित्य का अध्ययन करने से यह कमी पूरी होती है। जितने भी महान व्यक्ति हमारे देश, विश्व व समाज में हुए हैं वह सब शिक्षा, संस्कार, अध्ययन, लेखन, वक्ता-संवाद-व्याख्यान आदि में उच्च स्थिति प्राप्त करने के कारण ही बने हैं। पं. प्रकाशवीर शास्त्री आर्य समाज के विद्वान, उपदेशक व प्रचारक थे। आप अपने हिन्दी-संस्कृत के ज्ञान तथा सरस, मनोहर, सारगर्भित व प्रभावशाली भाषण शैली के कारण लोकप्रिय हुए और बिना किसी पार्टीं के निकट के अनेक बार स्वतन्त्र रूप से सांसद बने और बड़े-बड़े दिग्गजों को निर्वाचनों में पराजित किया। इतना ही नहीं वह अपने समय में संसद के अन्दर व बाहर लोकप्रिय सांसदों में से एक थे जिन्हें देश के प्रधान मंत्री सहित सभी दलों के नेता आदर देने के साथ उनके वक्तव्यों को पसन्द करते थे। हम श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी का भी उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं जिनका प्रधानमंत्री बनना इस लिए संभव हो सका कि उन्हें अपनी बात को सहस्रों लोगों की सभा में प्रभावशाली रूप से कहने में महारत हासिल रही है। इसके साथ उनका राजनैतिक अनुभव व अनेका विषयों का चिन्तन व ज्ञान तथा उनका व्यक्तित्व व साफ सुथरी छवि भी प्रमुख कारण रहा है। यदि उनमें भाषा बोलने पर पकड़ व सरस व सरल वाणी में अभिव्यक्ति का ज्ञान न होता तो जिस बुलन्दी पर वह आज हैं, वह यहां तक न पहुंच पाते। यदि हम यह कहें कि उन्होंने अपने इस गुण से वर्तमान समय के सब नेताओं को पीछे छोड़ दिया है और पूर्व के सभी नेताओं से वह आगे निकल गये हैं, तो इसमें कोई अन्योक्ति न होगी। अतः भाषा का जीवन में बहुत अधिक महत्व है।



ईश्वर ने हमें हमारा शरीर बना कर भेंट किया है जो कि ईश्वर की सभी रचनाओं से अधिक महत्वपूर्ण, कठिन व जटिल होने के साथ सर्वोत्तम रचना है। हमारे शरीर में आंख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा पांच इन्द्रियां हैं जिनका प्रयोग हम देखने, सूंघने, सुनने, चखने या स्वाद के लिए एवं स्पर्श कर नरम व कठोर, ठण्डा व गरम आदि वस्तु के अनेक गुणों को जानने के उद्देश्यों से करते हैं। इन्हीं उद्देश्यों के लिए यह इन्द्रियां परमात्मा ने बना कर हमें दी है और हमें इनके उपयोग का ज्ञान भी स्वयं ही पदइनपसज रूप से दिया हुआ है। यदि हम इन ज्ञान इन्द्रियों से यह उपयोग न लें तो फिर ईश्वर से हमें इनका मिलना व्यर्थ सिद्ध होता है। जिन लोगों को यह या इनमें से कुछ शक्तियां नहीं हैं वह जीवन भर उन्हें ठीक कराने में इधर उधर घूम कर व चिकित्सा कराकर अपना सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं, इससे इन इन्द्रियों की महत्ता का पता चलता है। इसी प्रकार से ईश्वर ने हमें वेदों का ज्ञान व वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत का ज्ञान भी दिया व कराया है। यदि हम संस्कृत भाषा को जानकर वेदों का सर्वांगपूर्ण अध्ययन नहीं करते तो हमारी स्थिति इन्द्रिय विहिन एक अपंग व्यक्ति के समान सिद्ध होती है। भाषा के अध्ययन से हमें विदित होता है कि हमारे आदि-कालीन सभी पूर्वज इस भाषा को बोलते थे, वेदों का अध्ययन सुनकर करते थे व वेदों का ज्ञान प्राप्त करते थे। वेदों का ज्ञान प्राप्त कर उस ज्ञान का उपयोग वह स्वकल्याण, समाज, देश व विश्व के कल्याण के लिए करते थे। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अधिकांश लोगों को वेदों के सभी मंत्र स्मरण व कण्ठाग्र होते थे। वह इनके अर्थ भी जानते हैं। हमें हिन्दी भाषा का ज्ञान है। हिन्दी में लिखी अध्यात्म, समाज, राजनीति, कहानी, सरल भाषा के पद्य व गद्य को हम आसानी से समझ सकते हैंे। यदि हमें संस्कृत भाषा का ज्ञान होता तो हम संस्कृत में लिखी हुई पुस्तकों का ज्ञान पढ़कर प्राप्त कर सकते थे। सामान्य पुस्तकें ही क्यों, महाभारत, रामायण, गीता, उपनिषद्, दर्शन, मनुस्मृति, आयुर्वेद आदि के ग्रन्थ और चारों वेदों को पढ़कर अधिकांशतः या पूर्णतः जान सकते थे। हमारा दुर्भाग्य है कि हमें संस्कृत का ज्ञान नहीं है अतः हम इन सभी ग्रन्थों को पढ़ने व समझने में असमर्थ है। हम ही क्या संस्कृत पढ़े लिखे सभी स्त्री व पुरूष भी इन सभी पठनीय ग्रन्थों को नहीं पढ़ते हैं। हमें लगता है कि वह सब कर्तव्यच्युत हैं। ईश्वर ने वेदों व संस्कृत भाषा का ज्ञान क्यों व किसलिए दिया था?, इस प्रश्न पर विचार करने पर जो तथ्य सामने आते हैं उनसे विदित होता है कि ईश्वर ने वेदों का ज्ञान मानव जीवन को सर्वांगपूर्ण रूप से जीने, ज्ञान विज्ञान को जानने व समझने तथा उससे अपने जीवन को सफल करने, धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की सिद्धि आदि प्रयोजनों के लिए दिया था। वेदों से दूर जाने या रहने का अर्थ है कि जीवन के यथार्थ उद्देश्य से दूर जाना या रहना है। इससे जीवन विफल होता है। भारी हानि होती है जिसका संसार में कोई उदाहरण नहीं दिया जा सकता। इतना समझ सकते हैं कि यदि किसी की करोड़ों अरबों की सम्पत्ति लूट ली जाये तो उसकी जो हानि होती है उससे अधिक हानि वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन न करने व उसे जानने में कृतकार्य न होने से होती है। यह बात वेदों के मर्म व रहस्यों को न जानने वालों को समझ में नहीं आ सकती। इसे तो महर्षि ब्रह्मा, महर्षि दयानन्द, मर्यादा पुरूषोत्तम राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, महर्षि पतंजलि, महर्षि कपिल, महर्षि कणाद, महर्षि गौतम, महर्षि वेद व्यास व महर्षि जैमिनी आदि ने ही जाना था या वह लोग जान सकते हैं जिन्होंने वेद और वैदिक साहित्य रूपी महासागर में डूबकी या गोते लगाये हों। हम यह भी कहना चाहते हैं जिसने सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ पढ़ा है उसे पूरे वैदिक साहित्य को पढ़कर होने वाले ज्ञान का अधिकांश ज्ञान हो जाता है। अतः समस्त संसारवासियों को राग-द्वेष व पक्षपातशून्य होकर न्यूनातिन्यून सत्यार्थ प्रकाश अवश्य पढ़ना चाहिये।



हम यहां प्रो. सन्तराम लिखित संक्षिप्त महाभारत से द्रौपदी, युधिष्ठिरजी के धर्म विषय में शंका करने पर हुए परस्पर सम्वाद को उदधृत कर रहे हैं। पुस्तक में विद्वान लेखक ने लिखा है – ‘‘वन के दुःखों से दुखित द्रौपदी ने एक दिन धर्मराज से कहा – राजन् ! आप कहा करते हैं कि संसार को सुख-दुःख देने वाला विधाता है। सो मालूम देता है कि विधाता जो सुख-दुःख देता है, माता पिता की भांति स्नेह से नहीं और ना ही न्यायकारी विभाजक की तरह पुण्य और पाप देखकर देता है, किन्तु साधारण जनवत् डंडे के डर से बलवानों को सुख और भले मानसों को दुःख देता रहता है और कुछ नहीं। एवमेव धर्म अधर्म भी पुरूष को सुखी दुःखी नहीं करते किन्तु वे भी जहां बलवानों के भय से उन्हें सुख देते हैं, वहां दीन-दरिद्र और शान्त स्वभावी लोगों को दुःख दे जाते हैं। यदि मेरा विचार ठीक न होता तो दुर्योधन आदि पापी नास्तिक, सुखी और आप सर्व प्रकार के सुख एवं सुख साधनों से लम्बे काल के लिए वंचित न होते? यह सुन धर्मराज बोले — देवी ! आर्य होकर अनार्यों की भांति धर्म और ईश्वर पर शंका मत कर, क्योंकि जो धर्म पर शंका करता है उसका कोई प्रायश्चित नहीं। देवि ! धर्म स्वर्ग जाने के लिए विमान एवं भवसागर तरने के लिए दृढ़ नौका है। यदि धर्म निष्फल हो तो इतने-इतने बड़े ऋषि, मुनि, राजे, महाराजे क्यों सेवन करें? धर्म के बिना यह सारा जगत् पाप समुद्र में क्षण में डूब जाय। धर्म का करना पुरूष का कत्र्तव्य है, यह समझ धर्म करना चाहिये।



नाहं कर्मफलान्वेषी राजपुत्रि ! चराम्युत। ददामि देयमित्येव यजे यष्टव्ययित्युत।। (वन. 13/2)

 धर्मएव मनः कृष्णे ! स्वभावा चैव मेधृतम्। धर्म वाणिज्य को हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम्।। (वन. 13/5)



राजपुत्रि ! मैं फल की इच्छा से नहीं, किन्तु कर्तव्य समझ दान, यजन आदि कर्म करता हूं। धर्म को सौदे के ढंग पर करना, धर्मवादियों में निन्दित कर्म कहा है। कृष्णे ! विधाता पर भी आक्षेप मत कर, किन्तु उसे प्रणाम कर। उसकी वेद शिक्षा का पाठ कर, क्योंकि उस अमृत पुरूष की कृपा से मत्र्य स्वभाव मनुज भी ‘अमृत’ हो जाता है। इस उत्तर को सुन कृष्णा तो शुद्ध संकल्प से ईश्वर और धर्म की महिमा अनुभव करने लग गई, पर भीमसेन बोल उठे। उन्होंने कहा-राजन् ! यदि कत्र्तव्य पर ही आपकी धारण है तो आप अपने वर्ण धर्म (क्षात्र धर्म) को ग्रहण कीजिये। भिक्षा मांगना और दीन-हीन जनों की भांति लुक छिप कर दिनों को बिताना किस कर्तव्य सूत्र का वचन है? हमने तो सुना है, क्षत्रिय का पालनीय धर्म – बल एवं पौरूष दिखाना है। इसलिए कायरता छोड़, मेरी और अर्जुन की सहायता से शत्रु वन को भस्म कर तेज प्रकाश कीजिये। आखिर सम्बन्धियों को, मित्रों को और अपने को कष्ट देने वाला कर्म कहां का धर्म है? यह तो हमारे विचार में कुकर्म (पाप) ही कहलाने के योग्य है, अतः इसे छोड़ो ! भीम के उत्तर में धर्म राज ने कहा – वीर ! तुम सत्य कहते हो, वनवास क्षत्रियोचित नहीं, पर हम यहां एक सत्य प्रतिज्ञा रूपी धर्म पालने के लिए आए हैं। अब इस धर्म को त्याग पृथ्वी का शासन करना, आर्यत्व के विरूद्ध ही नहीं किन्तु मरने से भी बुरा है–

आर्यस्य मन्ये मरणाद्गरीयो यद्धर्ममुत्क्रस्य मही प्रशासेत। (वन पर्व 34/15)

 और मेरी प्रतिज्ञा तो धर्म तथा सत्य पालन के सम्बन्ध में यह है –

मम प्रतिज्ञांच निबोध सत्यां वृक्षे धर्मममृताजीविताच्च। राज्यं च पुत्रांश्च यशोधनं च सर्वं न सत्यस्य कलामुपैति।।

(वन पर्व 34/22)



जीवन और अमृत से भी मैं तो सत्य धर्म को खरीदूगां, क्योंकि मैं समझता हूं राज्य, पुत्र, यश, धन आदि सर्व पदार्थ सत्य की अंश कला को भी प्राप्त नहीं हो सकते। इत्यादि विचारों से सबको सन्तुष्ट किया।’’



वेदालोचना के सम्बन्ध में आईये, महर्षि दयानन्द के जीवन पर दृष्टिपात करते हैं। महर्षि दयानन्द ने मूर्तिपूजा की सत्यता व यथार्थ स्थिति, सच्चे ईश्वर का स्वरूप, उसकी प्राप्ति के उपाय, मृत्यु क्या है व उस पर किस प्रकार से विजय प्राप्त की जा सकती है, प्रश्नों के उत्तर खोजने और उन पर विजय पाने के लिए गृह त्याग किया था। वह अपने भावी जीवन में देश भर में घूमें और विद्वान साधू, महात्मा व योगियों के सम्पर्क में आये। उनकी संगति व निकटता से उनसे ईश्वर व योग सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त किया। देश के एक स्थान से दूसरे व इसी प्रकार भ्रमण करते हुए उन्हें अनेक पुस्तकालयों को देखने व अनेकानेक गुण-कर्म-स्वभाव वाले व्यक्तियों से मिलने का अवसर मिला जहां उन्हें हस्तलिखित पाण्डुलियों व प्रतिकृतियों के रूप में अनेक दुर्लभ, ज्ञान व विद्या से परिपूर्ण ग्रन्थों को देखने व पढ़ने का सुअवसर मिला जो शायद् ही उनसे पूर्व अन्य किसी को सुलभ हुआ हो? जहां कभी कोई योगी मिलता था तो वह उसे टटोलते थे और सच्चे योगियों का शिष्यत्व प्राप्त कर उनसे योग व उपासना विषयक सभी ज्ञान व क्रियायें समझते थे, उनका अभ्यास कर कृतकार्य होते थे। उन्हें योग के योग्य गुरू मिले जिनसे उन्होंने योग विद्या सीखी व उनका अभ्यास कर सफलता प्राप्त की। इस पर भी उनकी पूर्ण सन्तुष्टि नहीं हुई जबकि आजकल नाममात्र की योग सिद्धि को भी पूर्ण सफलता मान लिया जाता है। इसका कारण क्या था? हमें लगता है कि जब उन्होंने नाना प्रकार के प्राचीन दुर्लभ ग्रन्थ देखें तो उनमें स्थान-स्थान पर ईश्वर प्रदत्त वेदों के ज्ञान का चर्चा मिलती थी जिनसे उनका चित्त वेदों को पूर्ण रूप से जानने को उद्वेलित होता था। योगियों व गुरूओं से पूछने पर उन्हें बताया गया था कि इसके लिए किसी योग्य गुरू से आर्ष परम्परा का संस्कृत व्याकरण का अध्ययन करना होगा। हमें यहां यह भी अनुभव होता है कि योग सीखकर सफलता प्राप्त करने पर यद्यपि हृदय की ग्रन्थियों के टूटने व सर्वसंशयों की निवृत्ति होने पर भी वेदों में जो ज्ञान का समुद्र है, उसका ज्ञान व प्रकाश योगी की आत्मा को नहीं होता। इस अपूर्णता को दूर कर पूर्णता प्राप्त करने के लिए योगी को भी वेदाध्ययन या वेदालोचन आवश्यक होता है। महर्षि दयानन्द ने इस रहस्य को जाना व इसका साक्षात् किया था। इसी कारण पूर्ण योग सिद्धि से सब कुछ प्राप्त कर लेने पर भी वह वेदों के अध्ययन में तत्पर हुए। वह सन् 1860 में मथुरा पहुंच कर प्रज्ञाचक्षु स्वामी गुरू विरजानन्द सरस्वती से मिले और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। ढाई व तीन वर्ष उनके चरणों में बैठकर उनसे आर्ष व्याकरण का अभ्यास किया व अपने मनोरथ में सिद्धी को प्राप्त होकर आप्त काम हुए। स्वामी गुरू विरजानन्द सरस्वती जी के बारे में कहा जाता है कि वह व्याकरण के सूर्य थे। यह पूर्ण सत्य है, परन्तु व्याकरण का सूर्य क्यों व किसके लिए व किस कारण से थे? हमें अनुभव होता है कि यह सब कुछ उन्होंनेवेदालोचना के लिए ही प्राप्त किया था। प्रज्ञाचक्षु होकर भी वह वेद के रहस्यों से पूर्णतया विज्ञ व परिचित थे, ऐसा निष्कर्ष अध्ययन व मनन करने पर निकलता है। तभी तो वह महर्षि दयानन्द को यह मूल्यवान रहस्य बता सके थे कि मनुष्य कोटि के लोगों ने जो ग्रन्थ लिखे हैं उनमें हमारे ऋषियों व महर्षियों की निन्दा व मिथ्या कथायें हैं, वह अनार्ष होने से त्याज्य हैं और ऋषि प्रणीत ग्रन्थ ही आर्ष ग्रन्थ हैं जिनका अध्ययन करना सत्यान्वेषक के लिए आवश्यक व अपरिहार्य है। आर्ष कोटि के ग्रन्थों का अध्ययन कर ही वेदालोचन किया जा सकता है अन्यथा मात्र व्याकरण के अध्ययन से वेदालोचन भली प्रकार से नहीं होता। महर्षि दयानन्द ने आर्ष व अनार्ष सभी प्रकार के ग्रन्थों का अध्ययन किया था। अतः वह आर्ष-अनार्ष का जितना गहन ज्ञान रखते थे, वह महाभारत काल के बाद किसी एक व्यक्ति में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। इतिहास पर दृष्टि डालने पर स्पष्ट होता है कि महर्षि दयानन्द जितना वेदों व आर्ष ग्रन्थों का ज्ञान किसी के लिए सम्भव भी नहीं था। अतः महर्षि दयानन्द के योग प्रवीण होने पर भी विद्या व ज्ञान प्राप्ति की जो अवशिष्ट भूख उनमें थी, वह गुरू विरजानन्द के यहां अध्ययन करने व बाद में उस पर मनन करने से पूरी हुई। उनके जीवन का उद्देश्य लगभग पूरा हो चुका था। अब वेदालोचना के बाद का अवशिष्ट कर्तव्य उन्हें गुरू विरजानन्द व ईश्वर साक्षात्कार से ज्ञात व प्राप्त हुआ, वह था – वेदों का प्रचार व प्रसार। वेदों का प्रचार व प्रसार, जो महाभारत काल व उसके बाद बन्द व समाप्त हो गया था, उसे पुनर्जीवित करना। यह गुरू विरजानन्द की आज्ञा थी और परमात्मा की प्ररेणा व आज्ञा अर्थात् वेदाज्ञा भी थी। इस जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य ‘धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष अर्थात् अभ्युदय व निःश्रेयस को उन्होंने सन् 1863 से 30 अक्तूबर, सन् 1883 को अपनी मृत्यु पर्यन्त पालन करके प्राप्त किया।



हमारे यह सब कहने का उद्देश्य यह बताना मात्र है कि संसार के प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह संस्कृत भाषा को पढ़े। संस्कृत व वैदिक साहित्य को पढ़ने से ही उसे अपने साध्य, उद्देश्य व साधनों का ज्ञान होगा व जीवन में सफलता मिलेगी। संस्कृत का अध्ययन करने पर ही वह वेद एवं इतर वैदिक साहित्य का पूर्णतः अध्ययन करने में सफल हो सकते हैं। संस्कृत भाषा के अध्ययन का उद्देश्य ही वेद एवं इतर वैदिक साहित्य का संगोपांग अध्ययन करना है। यदि ऐसा नहीं किया तो संस्कृत न पढ़ने वालों को तो भारी हानि होगी ही, संस्कृत पढ़ने वालों को भी वेद न पढ़ने अर्थात् वेदालोचन न करने से उनका संस्कृत पढ़ना व्यर्थ सिद्ध होगा। इससे ईश्वर प्रदत्त वेद एवं संस्कृत भाषा का यथोचित आदर न करने के कारण ईश्वर की ओर से दण्ड के भागी भी वह मनुष्य अवश्य होगें। 

‘विकासवाद बनाम् वैदिक धर्म (वेदों का त्रैतवाद)’

‘विकासवाद बनाम् वैदिक धर्म (वेदों का त्रैतवाद)’



विकासवाद का सिद्धान्त संसार में ऐसे समय पर आया जब विज्ञान विकासशील अवस्था में था। विकासवाद का सिद्धान्त इंग्लैण्ड में जन्में चार्ल्स राबर्ट डारविन (जन्म 12 फरवरी, 1809 तथा मृत्यु 19 अप्रैल, 1882) ने दिया। इसका आधार क्या था? इसका उत्तर यही है कि उनकी कल्पनायें, विचार, चिन्तन, सृष्टि की उत्पत्ति का अध्ययन, व उनके अपने निष्कर्ष। वह यह तो जानते थे कि यह सृष्टि हमेशा से इसी रूप में विद्यमान नहीं है अपितु इतिहास की दृष्टि से हजारों, लाखों व उससे भी पूर्व बनी है परन्तु कब व कैसे बनी इसका कोई विज्ञान व बुद्धि संगत ठोस सिद्धान्त न तो उस समय के साहित्य अथवा बाइबिल में ही उपलब्ध था और न कहीं अन्यत्र, अतः उन्होंने व उनके सभी समकालीन पश्चिमी विद्वानों ने बाइबिल के परिप्रेक्ष्य में कल्पनायें की। वैदिक मत के सत्य को स्वीकार करना उन्हें अभिप्रेत नहीं था अन्यथा उनके धार्मिक सिद्धान्तों को खतरा होता। श्री डारविन भारत आये नहीं और भारत में जो वैदिक साहित्य जिसमें वेद और दर्शन भी शामिल है, उससे वह अनभिज्ञ थे अथवा उन्होंने सोच-मसझकर उसकी उपेक्षा की। यह आश्चर्य की बात है कि उनके जन्म के ठीक 16 वर्ष बाद गुजरात की धरती में टंकारा नामक ग्राम में एक औदिच्य ब्राह्मण कुल में बालक मूलशंकर जो बाद में महर्षि दयानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए, जन्म हुआ। महर्षि दयानन्द ने अपने शैशव काल में अपने परिवार में जब तर्क व बुद्धि की तुला पर समझ में न आने वाली मूर्तिपूजा आदि धार्मिक परम्पराओं को देखा व समझा तो उन्होंने उन मान्यताओं के विरूद्ध एक प्रकार का विद्रोह कर दिया और सत्य, ज्ञान व विज्ञान की खोज में घर से निकल पड़े। महर्षि दयानन्द ने भी इस सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धान्त का वेदों व वैदिक साहित्य के आलोक में अध्ययन किया और सन् 1863 व उसके बाद अनेक अवसरों पर उन्होंने अपने ग्रन्थों, सन्ध्या, सत्यार्थ प्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, वार्तालाप, शास्त्रार्थ आदि के माध्यम से सृष्टि विज्ञान का स्वरूप प्रस्तुत किया जो बुद्धिसंगत, तर्कसंगत, अकाट्य होने के साथ ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर भी खरा है।



हम पहले महर्षि दयानन्द के सिद्धान्त को जान लेते हैं। महर्षि दयानन्द के अनुसार जगत में 3 पदार्थों का अस्तित्व सदा-सर्वदा, अनादिकाल से है जिन्हें ईश्वर, जीव व प्रकृति के नाम से जाना जाता है और यह तीनों नाम हमें शाश्वत दैवीय साहित्य ‘वेद’से मिले हैं। इसमें ईश्वर व जीव तो चेतन पदार्थ हैं जबकि प्रकृति जड़, अचेतन अथवा निर्जीव पदार्थ या तत्व है। सृष्टि की रचना से पूर्व यह प्रकृति कारण अवस्था में होती है जो अत्यन्त सूक्ष्म कणों, जो ऊर्जा के कण हैं, सत्व, रज व तम इन प्रकृति के गुणों की साम्यावस्था है। यह सृष्टि निर्माण की सामग्री है। इस प्रकृति में ही उन्नति, विकास, स्वयं नहीं अपितु ईश्वर के द्वारा, होकर यह कार्य सृष्टि या सारा जगत जिसमें सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अनेकानेक ग्रह व उपग्रह, नक्षत्र, आकाश गंगाएं, निहारिकायें, अग्नि, जल, वायु और आकाश आदि हैं, बनते हैं। प्रश्न मात्र यह है कि क्या यह अपने आप बने हैं या इन्हें किसी ने बनाया है। विज्ञान का एक नियम है कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अतः प्रतिक्रिया के पीछे क्रिया और क्रिया के पीछे एक चेतन कर्ता का होना आवश्यक है अन्यथा क्रिया का होना असम्भव है। इसे आप इस प्रकार से समझ लें कि रोटी के बनाने का सारा सामान या सामग्री रसोई गृह में उपलब्ध है। इन सब सामान से एक दिन, महीने, एक वर्ष या अनेकों वर्षों में भी अपने आप रोटी नहीं बन सकती। रोटी कब बनेगी जब एक चेतन सत्ता, मनुष्य, स्त्री वा पुरूष, जो रोटी बनाना जानता है, वह उचित मात्रा में रोटी बनाने के लिए आवश्यक सामग्री लेकर विधि पूर्वक या ज्ञानपूर्वक रोटी को बना दें। तभी रोटी बनेगी अन्यथा कभी नहीं बन सकती। इसी प्रकार कारण प्रकृति से कार्य प्रकृति अर्थात् सूर्य, चन्द्र व पृथिवी आदि एक चेतन सत्ता के द्वारा ही बनायें गये हैं। ऐसा ही वर्णन वेदों में है और इसी सिद्धान्त को वेद और वैदिक ग्रन्थों के आघार पर स्वामी दयानन्द जी ने सविस्तार व सयुक्तिक प्रस्तुत किया है। महर्षि दयानन्द जी को तो वेद और वैदिक साहित्य सृष्टि रचना व उसकी उत्पत्ति के सिद्धान्त को प्रतिपादित करने के लिए मिल गये और उन्होंने विज्ञान की नीति व रीति से सृष्टि रचना के सिद्धान्त का प्रतिपादन कर दिया परन्तु चार्ल्स डारविन सहित पश्चिम जगत के अन्य विद्वानों के पास वेदों का ज्ञान नहीं था अतः उन्हें कल्पनायें करनी पड़ी और वह कल्पनायें सत्य व यथार्थ से विरूद्ध, उससे हटकर व अटपटी सी, ज्ञान व बुद्धि तथा तर्कहीन सी उन्होंने प्रस्तुत की। पश्चिमी जगत को वेदों का सिद्धान्त पता नहीं था अतः वहां के लोगों व वैज्ञानिकों ने चार्ल्स डारविन की मान्यता को वैज्ञानिक सिद्धान्त मान लिया जबकि यह सत्य के पूर्णतया विपरीत था व है। आज भी इसको निर्भ्रान्त सिद्ध नहीं किया जा सका है। इससे पता चलता है कि कई बार बड़े बड़े ज्ञानी, विद्वान व वैज्ञानिक भी गलत बात को स्वीकार कर लेते हैं जबकि वह तर्क व प्रमाणों से पूरी तरह से सिद्ध नहीं होती हैं। परन्तु खेद इस बात का है कि वैज्ञानिक अपनी बात व मान्यता की सतत खोज करते रहते हैं और उसे अन्तिम परिणाम पर पहुंचाते हैं परन्तु हमारे विदेशी वैज्ञानिक बन्धुओं ने सृष्टि उत्पत्ति व रचना के वैदिक सिद्धान्त की भली-भांति परीक्षा करना उचित नहीं समझा, यह चिन्तनीय है। ऐसा उन्होंने क्यों किया इससे भ्रान्ति व भ्रमों को आश्रय मिलता है। इसका एक कारण उनकी भारत विरोधी धारणा भी प्रतीत होती है। जब अपने देश के लोग ही विदेशियों का अन्धानुकरण करें तो विदेशी वैज्ञानिक, समाज शास्त्री व धर्मवेत्ता भी भारतीय वेदों के सत्य सिद्धान्तों की उपेक्षा करें, तो इसमें आश्चर्य कैसा?

विकासवाद क्या है? विकासवाद शब्द पृथिवी एवं जैविक रचना या उत्पत्ति व उसके विकास अथवा उन्नति के लिए प्रयोग होता है। विकासवाद के सिद्धान्त के जनक चार्ल्स राबर्ट डारविन महाशय है। डारविन एक वैज्ञानिक थे। उन्होंने जड़ एवं जैविक सृष्टि की रचना व उत्पत्ति पर विचार किया। उनके ज्ञान में बाइबिल के सिद्धान्त अवश्य विद्यमान थे जो विज्ञान के अनुकूल व अनुरूप नहीं थे। उन्होंने अनुमान से कार्य लिया और सोचा कि इस ब्रह्माण्ड को बनाने वाला तो कोई दिखाई नहीं देता और न वह उनकी बुद्धि में ही आ सका, अतः स्वाभाविक था कि उन्होंने सृष्टि को स्वतः, स्वयं, अपने आप निर्मित मान लिया और कहा कि धीरे-धीरे, क्रमिक रूप से, स्वतः विकास होता है और यह ब्रह्माण्ड और जैविक सृष्टि अस्तित्व में आ जाती है। हमारा मानना है कि यदि सृष्टि की आदि में भारत में ईश्वर ने आदि चार ऋषियों को वेदों का ज्ञान न दिया होता तो हमारे पूर्वजों को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती और वेदों के आधार पर जो सिद्धान्त हमारे सामने तब आये और आज भी विद्यमान हैं, वह कदापि न होते। भारत का बच्चा-बच्चा कभी वेदों की शिक्षा के अनुसार यह जानता व मानता था कि ईश्वर निराकार, सर्वव्यापक, नित्य, अनादि, अजन्मा, अनन्त, अमर, जीवात्मा का पिता-माता-आचार्य-राजा और गुरू है, उसने जीवों को पूर्व जन्मों के आधार पर उनके सुख व दुख रूपी कर्मों के फलों के लिए ही अपनी सामर्थ्य के साफल्य व जीवों के सुख के लिए इस सृष्टि की रचना की है। यदि डारविन ने प्रयास किया होता तो वह कम से कम मनुस्मृति को ही प्राप्त कर सृष्टि की रचना के वैदिक सिद्धान्त को जान सकते थे, और तब यदि वह पक्षपात न करते तो ईश्वर का स्वरूप भी उन्हें समझ में आ जाता और सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े हुए सभी प्रश्नों के सन्तोषजनक उत्तर उन्हें मिल जाते। भारत में उनके देश की सरकार थी और इंग्लैण्ड में प्रो. फ्रेडरिक मैक्समूलर आदि अनेक वेदों के जानकर मौजूद थे जिनसे वह जानकारी ले सकते थे व स्वयं भारत भी आ सकते थे। एक वैज्ञानिक होकर उन्होंने यह कार्य क्यों नहीं किया? यह आश्चार्यजनक है और सन्देह व शक पैदा करता है। इससे यह भी संकेत मिलता था कि उन्होंने सत्य की खोज करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। ऐसी ही शिकायत हमें देश व विदेश के वैज्ञानिकों से भी होती है। हमारे पश्चिमी वैज्ञानिकों ने जड़ प्रकृति का अध्ययन किया व अनेकानेक नियमों को खोज निकाला, उन्हें विज्ञान व गणित के माध्यम से प्रस्तुत किया जिससे आज हम विज्ञान के शिखर पर पहुंच गये हैं। हम सभी वैज्ञानिकों का उनकी खोजों व आविष्कारों तथा अनेकानेक कम्प्यूटर, सूचना के यन्त्र आदि उपकरण प्रदान करने के लिए उन्हें साधुवाद भी देना चाहते हैं परन्तु हमें उन वैज्ञानिकों पर आश्चर्य होता है जो परमाणु बनाने वाली अदृश्य कारण सत्ता ईश्वर जो एक निराकार तत्व है, उसका संकेत मिलने पर भी उसे स्वीकार नहीं करते। क्या इलेक्ट्रान प्रोटोन, व न्यूट्रॉन आदि प्रकृति के (सत्, रज व तम् गुणों) में स्वयं परस्पर नाना प्रकार के हाइड्रोजन, हीलियम व अन्य सभी तत्व वा सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रों व पृथिवी एवं पृथिवीस्थ पदार्थ बनाने की क्षमता है? यदिहै, कदापि नहीं है, तो फिर या तो वह इसका सन्तोषजनक उत्तर दें या ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करें। ईश्वर को स्वीकार न करने से उनका पक्षपातपूर्ण होना प्रतीत होता है।

हमने उपरोक्त विचार विकासवाद की जिन मान्यताओं व सिद्धान्तों को दृष्टिगत करके प्रस्तुत किये है उसके अनुसार वर्तमान सृष्टि अपने से पूर्वरूपों का स्वतः विकसित और उन्नत रूप है। पूर्व से निर्धारित न इसकी कोई योजना है और न इसका कोई प्रयोजन है। तदनुसार समस्त प्राणियों के शरीर अमीबा नाम के एक अत्यन्त निकृष्ट प्राणी से प्रारम्भ होकर एक-दूसरे का विकृत रूप है। हम आशा करते हैं कि विज्ञान व अध्यात्म विज्ञान के सम्बद्ध लोग इस पर विचार करेंगे और वैदिक सिद्धान्तों को आगामी काल में विज्ञान द्वारा स्वीकार कर लिया जायेगा इसकी आशा करते हैं।

आईये, महर्षि दयानन्द के अनुरूप संसार में विद्यमान ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप को भी जान लेते हैं। उनके अनुसार – ‘‘ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र व सृष्टिकर्ता है। (सभी मनुष्यों को) उसी की उपासना करनी योग्य है। स्वमन्तव्य प्रकाश में उन्होंने लिखा है कि – “ईश्वर कि जिसको ब्रह्म, परमात्मादि नामों से कहते हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है जिसके गुण, कर्म, स्वभाव, पवित्र हैं जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता एवं हर्ता, सब जीवों को कर्मानसुार सत्य न्याय से फलप्रदाता आदि लक्षणयुक्त परमेश्वर है, उसी को मानता हूं।“ महर्षि दयानन्द के लघु ग्रन्थ आर्योद्देश्यरत्नमाला में ईश्वर के सारगर्भित स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि – ‘‘जिसके गुण-कर्म-स्वभाव और स्वरूप सत्य ही हैं, जो केवल चेतनमात्र वस्तु है तथा जो एक, अद्वितीय, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वत्र व्यापक, अनादि और अनन्त, सत्य गुणवाला है, और जिसका स्वभाव अविनाशी, ज्ञानी, आनन्दी, शुद्ध, न्यायकारी, दयालु और अजन्मादि है, जिसका कर्म जगत् की उत्पत्ति, पालन और विनाश करना तथा सब जीवों को पाप-पुण्य के फल ठीक-ठीक पहुंचाना है, उसी को ईश्वर कहते हैं।’आर्य समाज का पहला नियम जो महर्षि दयानन्द जी का बनाया हुआ है, उसके अनुसार ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।’ इसका सरल अर्थ है कि सब सब सत्य विद्याओं तथा सृष्टि के समस्त पदार्थों का आदि मूल origin and root ईश्वर है।

अब दूसरे चेतन तत्व ‘जीवात्मा’के स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं। उनके सिद्धान्तों के अनुसार जीवात्मा चेतन, अल्पज्ञ, एकदेशी, सूक्ष्म, आकाररहित, जन्म-मरण धर्मा, दुःखों से निवृत्ति की इच्छा रखने वाला, अजन्मा, नित्य, अनादि, सत्कर्मों से दुःखों से निवृत्त होकर वेदाध्ययन कर श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण कर जन्म मरण से छूट कर मुक्ति को प्राप्त करने में समर्थ तत्व व एक पदार्थ है जिसको अग्नि जला नहीं सकती, मृत्यु के बाद भी जिसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता, जल इसे गला नहीं सकता, शस्त्र इसे काट नहीं सकते और यह ऐसा पदार्थ है कि वायु इसे सुख नहीं सकती है। इसी प्रकार से प्रकृति को भी जान लेते हैं। प्रकृति की दो अवस्थायें हैं एक कारण व दूसरी कार्य। कारण अवस्था में यह अति सूक्ष्म, सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था, ईश्वर के अधीन रहती है। सारा आकाश इससे भरा हुआ होता है। इसी कारण प्रकृति से ईश्वर रचना कर परमाणु आदि अथवा महत्तत्व, अहंकार, पांच तन्मात्रायें आदि बनाकर सृष्टि जिसमें सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, नक्षत्र आदि हैं, निर्माण करता है। महर्षि दयानन्द व उनसे पूर्व अनेकानेक पूज्य ऋषियों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान ही सत्य, यथार्थ व वास्तविक है।

‘बौद्ध-जैनमत, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’

‘बौद्ध-जैनमत, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’

महाभारत काल के बाद देश-विदेश में सर्वत्र अज्ञान फैल गया था। शुद्ध वैदिक धर्म शुद्ध न रह सका और उसमें अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां आदि अनेक हानिकारक मत व बातें सम्मिलित हो गयीं। वेद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को पंच-महायज्ञों का करना अनिवार्य था जिसमें प्रथम ईश्वरोपासना तथा उसके पश्चात दैनिक अग्निहोत्र का विधान था। इस अग्निहोत्र के विस्तार – गोमेध, अजामेध, अश्वमेध आदि अनेक यज्ञ थे। मध्यकाल में विद्वानों के वेद मन्त्रों के गलत अर्थ व व्याख्याओं से यज्ञों में पशुओं का वध होने लगा और उनके मांस से यज्ञों में आहुतियां दी जाने लगीं। वेदों के अनुसार हमारा समाज गुण, कर्म व स्वभावों के अनुसार चार वर्णों में विभक्त था। महाभारत के पश्चात मध्यकाल में इन वर्णों को गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर न मानकर जन्म पर आधारित माना जाने लगा था। कालान्तर में एक वर्ण में ही जन्म के आधार पर अनेक जातियों की रचना हुई और लोग परस्पर, जो वेदों के अनुसार समान थे, उनमें छोटे-बड़े व ऊंच-नीच का भेदभाव उत्पन्न हो गया। स्त्री व शूद्रों को वेदों के अध्ययन से वंचित कर दिया गया। महाभारत से पूर्व वैदिक काल में सबके लिए अनिवार्य गुरूकुल की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई। महाभारत के बाद अपवाद स्वरूप ऐसे कम ही उदाहरण होंगे जहां सभी वर्णों के लोग आचार्य से वेदों का अध्ययन कर पाते थे। स्त्रियों की शिक्षा का कोई गुरूकुल या शिक्षा केन्द्र तो सन् 1825 व महर्षि दयानन्द के वेद प्रचार काल में देश व विदेश में कहीं अस्तित्व में नहीं था। एक प्रकार से गुरूकुल व्यवस्था का ध्वस्त होना और चार वर्णों में समानता समाप्त होकर विषमता का उत्पन्न होना ही देश की पराधीनता और सभी अन्धविश्वासों व कुरीतियों का कारण था। ऐसे समय में कि जब सामाजिक असमानता चरम पर थी, यज्ञों में हितकारी निर्दोष व मूक पशुओं को मार कर खुलकर हिंसा की जाती थी, उनके मांस से यज्ञ किए जाते थे और मांसाहार किया जाता था, तब भगवान बुद्ध का आविर्भाव हुआ। उन्होंने पशु हिंसा और सामाजिक असमानता का विरोध किया। उन्हें बताया गया कि पशु हिंसा का विधान वेदों में है। इस पर उनका उत्तर था कि ऐसे वेद जो पशु हिंसा का विधान करते हैं, वह अमान्य हैं। उन्हें बताया गया कि वेदों की रचना तो साक्षात् ईश्वर से हुई है जिसने यह सारा संसार बनाया है, तो इस पर उन्होंने कहा कि मैं ऐसे ईश्वर को भी नहीं मानता। भगवान बुद्ध पूर्ण अहिंसक व शाकाहारी थे। पशुओं की हिंसा और हत्या से उनको महर्षि दयानन्द के समान आत्मिक दुःख होता था। वह मानव हितकारी अनेकानेक विषयों के ध्यान व चिन्तन में संलग्न रहते थे। लोगों को उनकी यह बातें पसन्द आयीं। लोग उनके अनुयायी बनने लगे। उनकी शिष्य मण्डली बढ़ती गई और उनके द्वारा प्रचार से देश व विश्व में उनके अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक हो गई। बौद्ध एवं जैन मत ने ईश्वर के अस्तित्व व उसकी उपासना का त्याग कर दिया था। यह सत्य का अपलाप था। ऐसी स्थिति का होना वेदानुयायियों के लिए चिन्ता का विषय बन गया। इसकी एक प्रतिक्रिया यह हुई कि बौद्धों व जैनियों की देखा-देखी वेद मतानुयायियों = आर्यो में भी मूर्ति पूजा का प्रचलन हो गया। एक के बाद एक अन्धविश्वासों में वृद्धि होती रही और अतीत का वैदिक धर्म कालान्तर में वेदों के विपरीत कुछ वैदिक व कुछ अवैदिक अथवा पौराणिक मान्यताओं का मत बन कर रह गया।

यह सर्व विदित है कि भगवान बुद्ध और जैन मत के प्रवर्तक स्वामी महावीर ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते थे जिसकी चर्चा हमने उपर्युक्त पंक्तियों में भी की है। उन्होंने-अपनी अपनी कल्पायें कीं और उसी पर उनका मत स्थिर हुआ। ऐसा होने पर नास्तिकता के बढ़ने व धर्म-अर्थ-काम व मोक्ष के बाधित होने से वैदिक मत के शुभ चिन्तक व उच्च कोटि के ईश्वर भक्त विद्वानों में चिन्ता का वातावरण बन गया। ऐसे समय में एक दिव्य पुरूष स्वामी शंकराचार्य जी का आविर्भाव होता है। वह भारत के दक्षिण प्रदेश में जन्में और उन्होंने अनेक वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन किया जिससे वह अपने समय के सबसे अधिक तार्किक विद्वान तथा वेदान्त, गीता व उपनिषदों के सबसे बड़े विद्वान बने। उन्होंने जब बौद्ध मत व जैन मत के सिद्धान्तों का अध्ययन किया तो उन्हें ईश्वर के अस्तित्व को न मानने का सिद्धान्त असत्य व अनुचित लगा। सत्य का प्रचार व असत्य का खण्डन ही मनुष्यों का कर्तव्य भी है और धर्म भी। अतः इस धर्म का पालन करने के लिए उन्होंने तैयारी की। उन्होंने इन नास्तिक मतो के खण्डन के लिए अद्वैतवाद की विचारधारा को स्वीकार किया जिसके अनुसार संसार में केवल एक चेतन सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, निराकार तत्व-पदार्थ-सत्ता का ही अस्तित्व है जिसे ईश्वर-परमात्मा आदि नामों से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि हमें यह जो संसार दिखाई देता है वह हमारी बुद्धि के भ्रम के कारण दिखाई देता है जबकि उसका यथार्थ या वास्तविक अस्तित्व है ही नहीं। उन्होंने वा उनके अनुयायियों ने इसका एक उदाहरण दिया कि जैसे रात्रि के अन्धेरे में वृक्ष पर लटकी हुई रस्सी सांप प्रतीत होती है, ऐसे ही यह संसार हमें वास्तविक प्रतीत हो रहा है जबकि इसका अस्तित्व है ही नहीं। यह हमारा अज्ञान व भ्रम है। इसी प्रकार से उन्होंने सब प्राणियों को ईश्वर का ही अंश बताया और कहा कि इसका कारण अज्ञान है। अज्ञान जब दूर होगा तो जीव ईश्वर में समाहित होकर उसमें लीन हो जायेगा अर्थात् मिल जायेगा और तब जीव वा जीवात्मा का अस्तित्व नहीं रहेगा।

हमने भगवान बुद्ध व भगवान महावीर के ईश्वर के अस्तित्व को न मानने के सिद्धान्त की चर्चा की है। ऐसा उन्होंने ईश्वर के बनाये या दिये गये ज्ञान वेद व इनके नाम पर हिंसा के व्यवहार के कारण किया था। हमें लगता है कि इसके लिए यह आवश्यक था कि वेद के नाम पर यज्ञों में जो हिंसा होती थी उसका खण्डन किया जाता और वेदों का शुद्ध स्वरूप प्रस्तुत किया जाता। इसके साथ ही ईश्वर को सृष्टि, समस्त प्राणियों तथा वेद ज्ञान का रचयिता सिद्ध किया जाता। परन्तु ऐसा नहीं किया गया। यह तो कहा गया कि ईश्वर का अस्तित्व है और उसे तर्कों से सिद्ध किया गया जिससे नास्तिक मत पराभूत हुए, परन्तु वेदों पर पशुओं की हत्या व हिंसा करने वा कराने के जो आरोप थे और जिस हिंसा की प्रेरणा ईश्वर ने वेदों के द्वारा की गई बताई जा रही थी, उनका खण्डन व वेदों के सत्य अर्थों का प्रकाश व उनका मण्डन नहीं किया गया। इस कारण ईश्वर व वेदों पर हिंसा की प्रेरणा करने के आरोप स्वामी शंकराचार्य जी के शास्त्रार्थ के बाद भी यथावत् बने ही रहे। क्या यह नहीं किया जाना था या इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी? हमें लगता है कि यह कार्य अवश्य किया जाना चाहिये था परन्तु स्वामी शंकराचार्य जी का अल्पायु में निधन व अन्य अनेक कारणों से सम्भवतः वह ऐसा नहीं कर सके थे। हमने इसके लिए अपने एक मित्र के साथ स्वामी शंकराचार्य जी के अनुयायी, एक उपदेशक विद्वान से भी चर्चा की। इससे हमें यह ज्ञात हुआ कि स्वामी शंकराचार्य जी ने यज्ञ में हिंसा उचित है या अनुचित, इस भीष्म प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया अर्थात् इसकी उपेक्षा की। इसका परिणाम यह हुआ कि यज्ञों के सत्य स्वरूप, उनका पूर्णतः अंहिंसात्मक होना, का प्रचार न हो सका और जो चल रहा था वह प्रायः चलता रहा या कुछ कम हुआ। इसी कारण वेदों का महत्व भी स्थापित न हो सका और उनका संरक्षण व रक्षा न हो सकी। स्वामी दयानन्द के जीवनकाल सन् 1825-1883 तक आते-आते देश में वेदों की उपलब्धि प्रायः विलुप्ति व अप्राप्यता की सी हो गई थी जिसकी खोज महर्षि दयषनन्द ने अपने अद्भुत ब्रह्मचर्य के तप, विद्या व पुरूषार्थ से की। यदि वह, वह न करते जो उन्होंने किया, तो हमें लगता है कि वेद सदा-सर्वदा के लिए विलुप्त व अप्राप्य हो जाते। आज हमें वेद व उनके मन्त्रों के सत्य अर्थ उपलब्ध हैं, वह महर्षि दयानन्द के तप व पुरूषार्थ का परिणाम है और इसका पूर्ण श्रेय उन्हीं को है। मानव जाति के लिए यह कार्य इतना हितकारी हुआ है कि जिसकी प्रंशसा के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। यदि वह यह कार्य न करते तो, ऐसी अवस्था में, सब मत-मतान्तरों की मनमानी चलती रहती। उनके द्वारा वेदों की प्रमाणिक पाण्डुलिपियों की खोज, उनके पुनरूद्धार व सत्य व यथार्थ वेदार्थ अथवा वेद भाष्य से लोगों को ईश्वर के सत्य स्वरूप का ज्ञान हुआ और साथ ही जीवात्मा, कारण प्रकृति व कार्य प्रकृति के भेद व अन्तर का पता भी चला। महर्षि दयानन्द प्रदत्त यह त्रैतवाद का सिद्धान्त ही वास्तविक, यथार्थ, सत्य व निभ्र्रान्त सिद्धान्त है। महर्षि दयानन्द द्वारा किए गये वेदों के भाष्य, वैदिक रहस्यों के उद्घाटन व सिद्धान्तों एवं मान्यताओं के प्रकाशन से सभी मत-मतान्तरों में मिश्रित असत्य, अज्ञान व मिथ्या मान्यताओं व सिद्धान्तों का ज्ञान समाज में उद्घाटित हुआ। हम समझते हैं कि यह महर्षि दयानन्द की संसार को बहुमूल्य व दुर्लभ देन है। इसके लिए महर्षि दयानन्द विश्व समुदाय की ओर से अभिनन्दनीय है।

इस लेख में हम यह कहना चाहते हैं कि स्वामी शंकराचार्य जी ने नास्तिकता का खण्डन किया और ईश्वर के अस्तित्व व स्वरूप का अपनी विचारधारा के आधार पर मण्डन किया। देश, काल व परिस्थितियों के अनुरूप उनका यह कार्य बहुत सराहनीय था। इसके अतिरिक्त ईश्वर व वेदों पर पशु हत्या की प्रेरणा देने और पशु के मांस से यज्ञ करने का जो मिथ्या दोष, यज्ञकर्ताओं के मिथ्याज्ञान व स्वेच्छाचारिता के कारण, लगा था, उसका परिमार्जन स्वामीजी शंकराचार्य जी ने नहीं किया। सम्भवतः इसी कारण वेदों का समुचित संरक्षण भी उनके व बाद के समय में नहीं हो सका। वेदों पर लगाये गये वेदेतर मतावलम्बियों के मिथ्या अनेक दोषों का खण्डन, वेदों के सत्य अर्थों का प्रकाशन व वेदों के ईश्वर से उत्पन्न, हर काल में इनके प्रासंगिक, उपयोगी व अपरिहार्य होने का मण्डन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने जीवन काल में किया जिसके लिए वह सर्वतोभावेन प्रंशसा व अभिनन्दन के पात्र हैं। उन्होंने न केवल वेदों का पुनरूद्धार ही किया अपितु वेद मन्त्रों के सत्य अर्थों को प्रकाशित कर हमें प्रदान किया। उन्होंने विश्व के सभी मनुष्यों को उनके वेदार्थों की परीक्षा करने की व्याकरण की आर्ष प्रणाली, अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरूक्त पद्धति भी हमें प्रदान की है, जिसके लिए सारी मानवजाति इस सृष्टि के प्रलय होने तक उनकी कृतज्ञ रहेगी। हमारा अनुमान है, जो कि सत्य हो सकता है कि आज यदि स्वामी शंकराचार्य जी होते तो वह निष्पक्ष व न्याय के पक्षधर होने के कारण महर्षि दयानन्द के कार्यों के सबसे बड़े प्रशंसक होते। उपसंहार में यह कहना है कि स्वामी शंकराचार्य जी को वेदो पर यज्ञों में पशु हिंसा के मिथ्या आरोपों का खंडन करना चाहिए था और इसके साथ चारों वेदो का सरल , सुबोध एवं प्रामाणिक भाष्य भी करना चाहिए था जो कि वह नहीं कर सके। यह सभी कार्य महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने करके वेदों की वास्तविकता संसार के सामने रखी।