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रविवार, 9 नवंबर 2014

टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया उसका नाम है सरदार बल्लभ भाई पटेल

लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल 

टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया
उसका नाम है सरदार बल्लभ भाई पटेल 


आधुनिक भारत के शिल्पी सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचार, कर्म और उनकी स्मृतियां मन को रोमांच और गौरव से भर देती हैं। वे ऐसे राष्ट्रभक्त महापुरुष थे जिनके लिए ‘राष्ट्र सबसे पहले’ था। सरदार सही मायने में राष्ट्रीय एकता के प्रतीक थे और हैं। उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लेने के लिए भाजपानीत राजग सरकार की सराहना की जानी चाहिए। भारत की संप्रभुता, एकता और अखण्डता के लिए जीने-मरने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की सूझबूझ का ही नतीजा है कि आज हम एक शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिक हैं। दुनिया में भारत एक महाशक्ति है। वरना तो हम अपने महान राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े पकड़कर रो रहे होते।

तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर कई दफा तरस आता है जो यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत को एक देश और राजनीतिक इकाई का रूप देने का श्रेय अंग्रेजों को है। कांग्रेस के ही नेता एवं पूर्व मंत्री पी. चिदम्बरम किसी कार्यक्रम में इंदौर आए हुए थे, तब उन्होंने कहा था कि भला हो अंगे्रजों का जो वे भारत आए और हमें बेहतर बना दिया। वरना हम तो अंधेरे में ही जी रहे थे। लगभग यही बातें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तब कहीं थीं जब वे इंग्लैण्ड गए थे, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए। तमाम वामपंथी विद्वान भी यही सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं कि भारत को सभ्य और एक तो अंग्रेजों ने बनाया। अंग्रेज न आते तो भारत होता ही नहीं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों को भारतीयों से कोई मोहब्बत नहीं थी, न ही वे मानवता में विश्वास करते थे, जो वे भारतीयों के हित की चिन्ता करते। वे लुटेरे थे। लूटने के लिए आए थे। जब वीर प्रसूता मां भारती के लड़ाकों ने अंग्रेजों को ललकारा तब आखिरकर उन्हें यहां से जाना पड़ा। लेकिन, जाते-जाते भारत का सर्वनाश करने के लिए वे अपनी कुटिल चाल चल गए थे। उन्होंने भारत को एक राजनीतिक इकाई नहीं बनाया था बल्कि उन्होंने तो भारत को कई टुकड़ों में बांट दिया था। देशभक्त सरदार वल्लभ भाई पटेल न होते तो आज भारत 562 से भी अधिक टुकड़ों में बंटा होता। वे सरदार पटेल ही थे जिन्होंने भारत को एक किया। अपनी सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता के बल पर ही सरदार अलग-अलग झण्डा थामे 562 रियासतों को तिरंगे के नीचे ला सके। यह आसान काम नहीं था। सरदार पटेल के हाथ में यह काम न होता तो शायद यह संभव भी न हो पाता। सरदार के दृढ़ के आगे, उनकी लौह पुरुष की छवि के आगे भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद के निजामों की भी एक न चली। सरदार पटेल के कारण ही ये सब आज भारत का अभिन्न अंग हैं और यहां कोई विवाद नहीं। वहीं, जम्मू-कश्मीर मसले में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के कारण आज तक विवाद की स्थितियां बनी हुई हैं। अगर जम्मू-कश्मीर के मामले में नेहरू ने टांग न फंसाई होती, सरदार पटेल को अपने तरीके से समस्या को हल करने दिया गया होता तो आज जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन होता। वह अपने नाम के अनुरूप वाकई ‘धरती पर स्वर्ग’ होता।

भारत-पाकिस्तान अलगाव के कारण उपजीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोर अनुशासन प्रिय और मितभाषी सरदार वल्लभ भाई पटेल के लिए राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चुनौतीपूर्ण कार्य था। लेकिन, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने देश जोड़कर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा दिया। दरअसल, निर्णय लेते वक्त उनके दिमाग में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं रहती थी। उनकी सोच एकदम स्पष्ट थी- राष्ट्र सबसे पहले। किसी भी कीमत पर देश की एकता जरूरी है। राष्ट्र को एकजुट करने के लिए उन्हें कितनी ही तोहमत झेलनी पड़ी। सरदार सांप्रदायिक हैं, असमझौतावादी हैं, पूंजीपतियों के समर्थक हैं, मुस्लिम विरोधी हैं, वामपक्ष के विरोधी हैं। इस तरह के तमाम आरोप उन पर लगाए गए। लेकिन, आरोपों की परवाह न करते हुए सरदार पूरी तल्लीनता के साथ अपने काम में लगे रहे। निश्चित ही वे अपनी छवि और आरोपों की फिक्र करते तो देश कहीं पीछे छूट जाता। राष्ट्रीय एकता को हम पा नहीं सकते थे। भारत एक देश नहीं बन पाता। सरदार पटेल का ऋण हमेशा भारतीयों के माथे पर रहेगा। उस ऋण से उऋण होना संभव नहीं है। हां, एक तरीका है सरदार पटेल के विचारों और कर्मों को सार्थकता प्रदान करने का। राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए हम ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के मौके पर शपथ लें कि हमारे मन-वचन-कर्म से कभी भी, किसी तरह भी राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और संप्रभुता को क्षति न पहुंचे। राज्यों के आपसी विवाद खत्म करने के लिए हमें आगे आएं। भाषाई विवाद से पार पाएं। इन्सानों में धर्म-जाति के आधार पर कोई भेद न करें। सब स्तर पर एकजुट हों। देश की आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने में अपना योगदान थे। राष्ट्र विरोधी विचारों और कार्यों से दूर रहें। राष्ट्र विरोधी तत्वों का पुरजोर विरोध करें। भारत के गौरव को बढ़ाने के लिए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाहन करें।

भारत सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लेकर एकता की भावना के महत्व का भी प्रतिपादन किया है। स्वयं सरदार पटेल एकता को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। उनका स्पष्ट कहना था- ‘एकता के बिना जनशक्ति शक्ति नहीं है।’ उनका यह भी मानना था कि कोई भी विश्वास तब तक मजबूत नहीं होता जब तक उसके पीछे एकता की ताकत न हो। वे कहते थे- ‘शक्ति के अभाव में विश्वास किसी काम का नहीं है। विश्वास और शक्ति, दोनों ही किसी भी महान कार्य को करने के लिए अनिवार्य हैं।’ उन्होंने भाषणों से ही नहीं बल्कि अपने व्यवहार से भी इन बातों को आगे बढ़ाया था। कई मसलों को लेकर जवाहरलाल नेहरू से उनकी मतभिन्नता थी लेकिन अपनी ओर से उन्होंने यह कभी भी जाहिर नहीं होने दिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आपसी एकता और सामंजस्य जरूरी है। व्यक्तिगत हित, मन-मुटाव और मतभिन्नता को उन्होंने कभी अपने पास फटकने नहीं दिया। वे तो देश के लिए सर्वस्व समर्पित करने को निकले थे। उनके लिए बड़े से बड़ा पद प्राप्त करना उद्देश्य नहीं था। देश का मानस उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहता था लेकिन महात्मा गांधी ने अपने प्रिय जवाहरलाल नेहरू का नाम आगे बढ़ाया। सरदार पटेल ने पद-प्रतिष्ठा की दौड़ से खुद को बाहर रखकर गांधी के सम्मान को बढ़ाया और किसी मौन तपस्वी की तरह वे राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने में लगे रहे। आज के राजनीतिक दलों को सरदार पटेल से यह सीख लेनी चाहिए कि वे राष्ट्रीय एकता के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आगे आएं। एकजुट हों। देश के सम्मान पर आंच आए तो मिलकर आवाज बुलंद करें। भारत की सुरक्षा के लिए नासूर बन चुकी अवैध घुसपैठ की समस्या पर राजनीति बंद करें। घटनाओं और समस्याओं को अलग-अलग चश्मे से देखना बंद करें। खुली आंखों से स्थितियों को एक समान रूप से देखें। समस्या का समाधान करते समय राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर राष्ट्र को पहले रखकर देखें। स्वतंत्र भारत के समस्त नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि सरदार पटेल के काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। उनकी जयंती को सार्थक बनाएं, इसे कर्मकाण्ड तक सीमित न करें। भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के सरदार पटेल के स्वप्र को हम साकार करें।

रविवार, 15 दिसंबर 2013

भारतीय रियासतों का एकीकरण और पटेल

लौह पुरुष सरदार पटेल को आज पुण्य तिथि के पावन अवसर पर कृतज्ञ राष्ट्रवासियों की भाव - भीनी हार्दिक श्रद्धांजलि,,,,, कोटि - कोटि श्रद्धा सुमन अर्पण,,,शत् शत् वंदन

भारतीय रियासतों का एकीकरण और पटेल

सरदार पटेल का नाम भारत की तत्कालीन 563 रियासतों के भारत में विलीनीकरण के कारण बहुत ही सम्मान से लिया जाता है। उनके लौहपुरूष होने का प्रमाण उनके द्वारा रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने के उनके महान कार्य में देखने को मिला।
भारत की स्वतंत्रता में राजशाही का कोई विशेष योगदान नही था। बहुत से शासक केवल नाम मात्र के शासक थे। छोटे छोटे रजवाड़े अपने किलों में या दरबारों में अपनी प्रशंसा कराके ही खुश हो जाते थे। परंतु इसके उपरांत भी उनके भीतर यह इच्छा अवश्य थी कि स्वतंत्र भारत में संभवत: वह भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकेंगे। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में वह भी अपनी स्वतंत्रता खोज रहे थे। उनकी यह इच्छज्ञ उस समय और भी बलवती हो गयी जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को यह अधिकार दे दिया कि वह चाहें तो भारत के साथ जा सकती हैं, चाहें तो पाकिस्तान के साथ जा सकती हैं और यदि चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बचाये रख सकती हैं।
बहुत से राजाओं ने स्वतंत्रता मिलते ही अपने को स्वतंत्र घोषित करने के सपने पालने आरंभ कर दिये। रामपुर और पालनपुर के मुस्लिम नवाब ऐसे शासक थे जिन्होंने बिना देरी किये और बिना किसी संकोच के भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। जबकि मंगरोल के शासक ने कुछ हिचकिचाहट के साथ अपना अस्तित्व भारतीय संघ के साथ विलीन कर दिया। इसमें सरदार पटेल का हस्तक्षेप हुआ और उन्होंने बड़ी सफलता प्राप्त की। टोंक रियासत के नवाब को भी जूनागढ़ के नवाब ने भड़काने का प्रयास किया। मुस्लिम लीगी नेता भी उसे पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। पर उसे भी सरदार पटेल ने उधर जाने से रोक लिया।
सरदार का राजोचित व्यवहार
महाभारत (अ.145 पू पृष्ठ 5949) में आया है :-
चारै: कर्म प्रवृत्या च तद् विज्ञाय विचारयेत्।
अशुभ निर्हरेत सद्यो जीवयेच्छुभात्मन:।।
अर्थात गुप्तचरों द्वारा और कार्य की प्रवृति से देश के शुभाशुभ वृतांत को जानकर उस पर विचार करे। तत्पश्चात अशुभ का तत्काल निवारण करे। अपने राज्य के (शुभ के) लिए शुभ का सेवन करे।
गहर्यान, निगर्हमेदेव पूज्यवान सम्पूज्येत तथा।
दणडर्याश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा।।
हे, वीर! शासक निंदनीय मनुष्यों की निंदा ही करे, पूज्यनीय पुरूषों का सत्कार करे और दण्डनीय अपराधियों को दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नही करना चाहिए।
सरदार पटेल का राजधर्म ऐसा ही था। वह निंदनीय पुरूषों के प्रति, राष्टï्रदोहियों के प्रति और अपूज्यों के प्रति ही कठोर थे। पूज्यनीय और राष्टï्रभक्तों के प्रति सदा ही वह सत्कार शील रहे।
उन्होंने भारतीय नरेशों के साथ बड़ी सावधानी से वार्तालाप किया। इस बात का पूरा ध्यान रखा कि किसी भी राजा के सम्मान को चोट न लगे और वह हमारी बात को भी मान ले। उन्होंने राजाओं को बताया कि वह चाहते हैं कि इस पवित्र भूमि को दुनिया के देशों के मध्य उपयुक्त स्थान दिलायें और इसे शांति एवं समृद्घि का घर बना दें।
स्वतंत्रता मिलते ही त्रावणकोर के हिंदू राजा ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। उसका अनुकरण करने का मन कुछ अन्य हिंदू नरेश भी बना रहे थे। इस प्रकार संकट केवल मुस्लिम रियासतों की ओर से ही नही था अपितु कहीं से भी उत्पन्न होना संभावित था। ऐसे में बहुत ही धैर्य और विवेक का परिचय देने वाले नेतृत्व की आवश्यकता थी। विशेषत:  तब जब कि अंग्रेज भारत को खण्ड खण्ड कर देने की चालें चल रही थीं और उन चालों में फंसने के लिए बहुत सी मछलियां स्वयं को तैयार बैठी थीं।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के उपरांत भोपाल के नवाब ने अपने चैम्बर ऑफ प्रिंसेस को अधिकृत कर कार्यरत घोषित कर दिया। भोपाल का नवाब 25 जुलाई 1947 की उस बैठक में भी नही गया था जिसे माउंट बेटन ने दिल्ली में आहूत किया था। उसने कह दिया था कि वह बैठक घोंघों को दरियाई घोड़े और कठफोड़वे के साथ चाय पीने के लिए बुलावा देने के समान है।
वायसराय माउंट बेटन ने भोपाल के नवाब को समझाया और उसे भारत के साथ विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया। जिसने उसे कुछ हिचकिचाहट के साथ मान लिया।
भोपाल के नवाब ने पटेल को लिखा:-मैं इस तथ्य को छिपाना नही चाहता कि संघर्ष के दिनों में मैंने अपनी रियासत की स्वतंत्रता व तटस्थता बनाये रखने के लिए वह सब कुछ किया जो मेरे बस में था। अब जबकि मैंने पराजय स्वीकार कर ली है, मुझे उम्मीद है कि आप पाएंगे कि मैं उतना ही पक्का मित्र हो सकता हूं जितना पक्का विरोधी था। आपकी ओर से मुझे सदा सम्मान मिला है, और मेरे साथ विनम्रता पूर्ण व्यवहार किया गया है, इसलिए किसी के बारे में मेरे मन में कोई विद्वेष नही है।
सरदार पटेल ने नवाब को अपनी उदारता और विनम्रता का जवाब यों दिया-स्पष्टï बात तो यह है कि आपकी रियासत के भारतीय राष्टï्र में विलय को मैं न अपनी जीत मानता हूं और न ही आपकी हार। अंतत: विजय न्याय एवं उपयुक्तता की हुई है। इस विजय में मैंने और आपने अपनी-अपनी भूमिका ही निभाई है। स्थिति की महत्ता को समझने और ईमानदारी तथा  साहस के साथ अपने पुराने रूख को बदलने के लिए आप श्रेय के पात्र हैं। हमारा यह मानना है कि आपका पिछला रूख भारत तथा आपकी अपनी रियासत दोनों के हितों के प्रतिकूल था। मुझे आपके इस आश्वासन के विशेष प्रसन्नता हुई है कि देश के गद्दारों से, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों निपटने में आप भारत का साथ देंगे। निष्ठा पूर्ण मैत्री के आपके प्रस्ताव का भी मैं स्वागत करता हूं। शरणागत शत्रु के प्रति उदारता अपनाना औरर उसे अभयदान देना भारतीय राजधर्म की विशेषता रही है। पराजित राजा के प्रति राजोचित व्यवहार करना भी केवल भारत की ही परंपरा रही है। सदार पटेल भारत के राजधर्म की जीती जागती मिसाल बन गये थे। वह कुछ ऐसा राजधर्म निभा रहे थे जैसा कि लेखक के ज्येष्ठ भ्राता श्री प्रो. वीएस आर्य जी की ये पंक्तियां बताती हैं:-
मित्र को हैं हम फूल से कोमल
शत्रु को फौलाद हैं हम।
वीर शिवाा, शेखर, राणा जी की,
वही तो वज्र औलाद हैं हम।।
अब जूनागढ़ की ओर आते हैं। यहां के शासक ने भी जिन्ना की बातों में आकर पाकिस्तान के साथ जाने का निर्णय लिया। जिन्ना ने इस रियासत के नवाब को केवल भारत को तंग व परेशान करने के लिए ही उपसाया था। इस रियासत के दीवान शाहनवाज भुट्टïो के पिता थे। वह रियासत को भारत के साथ जाने देने के घोर विरोधी थे। यद्यपि उनके ऐसे प्रयास सरदार पटेल के लौह व्यक्तित्व और बुद्घि चातुर्य के समक्ष शीघ्र ही ढीले पड़ गये। जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। इतना भयभीत कि अपनी एक बेगम को उसके हवाई अड्डे पर समय से न पहुंचकर के कारण वह उसका इंतजार न करके उसे यहां ही छोड़कर चला गया। बीस फरवरी 1948 को जूनागढ़ की जनता ने जनमत के माध्यम से भारत के साथ विलय कर दिया। जूनागढ़ यात्रा के दौरान ही सरदार पटेल ने घोषणा की थी कि महमूद गजनवी द्वारा तोड़े गये सोमनात के मंदिर का फिर से निर्माण कर उसे पुराना गौरव प्रदान किया जाएगा।
अब आते हैं हैदराबाद की रियासत पर। श्री के.एम. मुंशी ने यहां के कासिम रिजवी के बारे में लिखा है यद्यपि रिजवी धर्मांत था, पर वह बहुत ही चालाक और अथक परिश्रम करने वाला कार्यकर्ता था। वह लोगों को प्रेरित भी कर सकता था और आतंकित भी। आवश्यकता पडऩे पर वह मुस्करा सकता था, मजाक कर सकता था। अपने व्यक्तित्व से लोगों को अपने आकर्षण में बांध सकता था।
हैदराबाद की रियासत की जनसंख्या का 80 प्रतिशत भाग हिंदू था। कासिम रजवी हैदराबाद के निजाम पर दबाव बना रहा था।  उसने निजाम से कहकर उदार मंत्री मिर्जा अस्माइल को प्रधानमंत्री पद से हटवा दिया और छतारी के नवाब को इस पर बैठा दिया। छतारी के नवाब ने जिन्ना से पूछा कि यदि भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण किया तो क्या पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आएगा। जिन्ना ने दो टूक शब्दों में उत्तर दिया-यही यह सुनकर छतारी के नवाब के पैरों तले की जमीन खिसक गयी और उन्होंने हैदराबाद छोड़ दिया।
कासिलम रिजवी की घृणास्पद बातों में फंसकर हैदराबाद का निजाम भारत विरोधी बन गया था। यहां पर सरदार पटेल ने लंबी प्रतीक्षा के पश्चात पुलिस एक्शन लिया। रिजवी भाग गया और निजाम को सरदार के सामने झुकना पड़ गया। उसको बचाने के लिए कोई नही आया। सारे देश के मुस्लिम अखबारों ने भी लिखा था कि निजाम ने अपनी मूर्खताओं से अपनी परेशानियां बुलाईं। सुहरावर्दी, जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, ने भी लौहपुरूष को इस बात के लिए बधाई दी कि उन्होंने अपनी दक्षता से एक जटिल समस्या को सहज ही सुलझा लिया।
सरदार ने सुहरावर्दी को बताया-भारत के मुसलमानों ने हमारा साथ दिया जिसका निश्चित रूप से अच्छा प्रभाव पड़ा।
निजाम ने अपने किये पर प्रायश्चित किया। उसने रिजवी की साम्प्रदायिकता को कोसा और उसके रहते अपनी असहायावस्था को सहज की स्वीकार किया।
सरदार पटेल ने निजाम को लिखा महामहिम जैसा कि मैंने आपसे कहा, गलती करना मनुष्य की कमजोरी है। ईश्वरीय निर्देश भूल जाने व क्षमा करने का संकेत देते हैं, मनुष्यों का यह कत्र्तव्य है कि वे ईमानदारी से पाश्चाताप करके एवं शेष समय में जनता व ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस प्रक्रिया में अपना योगदान करें।
इस प्रकार सारे भारत को पटेल एक करने में सफल हुए उनसे कश्मीर की रियासत का प्रश्न नेहरू ने अपने लिये रख लिया था, उसे ही हम आज तक नही सुलझा पाए। काश, नेहरू कश्मीर को भी पटेल के हवाले कर देते।