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रविवार, 16 नवंबर 2014

महापुरुषों को बांटने की राजनीति क्यों?

महापुरुषों को बांटने की राजनीति क्यों?


पहले सरदार पटेल, फिर महात्मा गांधी और अब पं. जवाहरलाल नेहरू की विरासत को लेकर भाजपा व कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई सार्वजनिक हो चुकी है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती पर कांग्रेस द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा और उसके घटक दलों को आमंत्रित न करना बताता है कि कांग्रेस किस तरह की राजनीति पर उतर आई है। देश के महा -पुरुषों को प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करने की इस राजनीति ने ओछेपन की सभी सीमाओं को पार कर लिया है। पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, बाबा साहब अंबेडकर, लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसी विभूतियों पर राजनीतिक दलों द्वारा अधिकार जमाने की कोशिश करने का यह कोई पहला मामला भी नहीं है। आजाद भारत के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जो बताते हैं कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति तथा अपनी राजनीति को चमकाने के मकसद से किसी न किसी महापुरुष पर अपना ही अधिकार जताने की कोशिश की व उन्हें दूसरों के लिए बेगाना बना दिया।
जैसे- शिवसेना शिवाजी को केवल और केवल अपना ही मानती है, तो बाबा साहब अंबेडकर को मायावती व उनकी पार्टी।मगर, कांग्रेस यदि पं. जवाहरलाल नेहरू या महात्मा गांधी या सरदार पटेल को केवल अपना बनाने पर तुली है, तो इससे यही साबित होता है कि अब वह बेहद कमजोर हो गई है। वह डरने लगी है कि उसके प्रतीकों को कोई छीन न ले। चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान की शुरुआत कर देश को एक सार्थक संदेश देने में सफल रहे और सरदार पटेल की जयंती पर उन्होंने सशक्त भारत का जो खाका पेश किया था, उससे कांग्रेस की बेचैनी बढ़ गई है कि नेहरू जी को भी मोदी कहीं उससे छीन न लें। यहीं पर कांग्रेस का दोहरापन भी साफ हो जाता है। एक तरफ तो कांग्रेस ने यह शिकायत की थी कि मोदी इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर उनके समाधिस्थल पर क्यों नहीं गए। कांग्रेस ने कहा था कि मोदी को वहां जाकर इंदिरा गांधी के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए था। दूसरी ओर नेहरू जी के कार्यक्रम में मोदी या भाजपा-एनडीए को बुलाया तक नहीं। यह महापुरुषों के राजनीतिक इस्तेमाल का ही उदाहरण है।
मजे की बात यह भी है कि जिस महापुरुष को भुनाया नहीं जा सकता, कांग्रेस उसे याद भी नहीं करती। इस पर तो वैचारिक रूप से मतभेद हो सकता है कि मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, पीवी नरसिम्हाराव को महापुरुष माना जाए अथवा नहीं। कुछ लोग इन नेताओं को महापुरुष मानेंगे, तो कुछ कहेंगे कि नहीं, ये साधारण नेता थे। मगर, इसमें कोई दोराय नहीं है कि मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, पीवी नरसिम्हाराव भारत के प्रधानमंत्री थे। चौ. चरण सिंह भी देश के प्रधानमंत्री रहे थे। इन चारों नेताओं की जड़ें कांग्रेस पार्टी में ही थीं। मगर, उसने इन्हें कभी याद नहीं किया, क्योंकि उसे पता है कि इन दिवंगत नेताओं के नाम पर वोट नहीं बटोरे जा सकते। अत: कांग्रेस छोड़कर राजनीति करने वाले मोरारजी देसाई, वीपी सिंह और चौ. चरण सिंह को तो उसने भुलाया ही, उन नरसिम्हाराव को भी भुला दिया, जिन्होंने कांग्रेस और देश, दोनों की धारा को बदला था। यानी, कांग्रेस केवल उन्हें ही याद रखती है, जिसके नाम पर वोट मिलते हैं व सबसे ज्यादा चलने वाले सिक्के तो गांधी जी और नेहरू जी हैं ही।
आजादी के बाद से लेकर अब तक कांग्रेस ने अपने बुरे दौर में इन महान नेताओं के प्रति जनता की सहानुभूति को ही भुनाया। नेहरू जी के नाम पर अब तो कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष दलों की अगुआ बनने की फिराक में भी है, ताकि वह भाजपा का मुकाबला कर सके, मगर दिक्कत यह है कि कोई भी धर्मनिरपेक्ष नेता छोटे भाई की भूमिका निभाने के लिए तैयार नहीं है। हाल ही में जनता परिवार को जिंदा करने के प्रयास के दौरान भी कांग्रेस को इससे दूर ही रखा गया था। इन परिस्थितियों में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की सोच यह है कि नेहरू जी की विरासत को भुनाकर खुद की खोई जमीन तलाशी जाए। वरना, और क्या कारण है कि जो कार्यक्रम नेहरू जी का स्मरण करने के लिए आयोजित हुआ था, उसमें राजनीतिक बातें होती रहीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा गया। यह निशाना राहुल गांधी ने भी साधा और सोनिया ने भी।कांग्रेस को राजनीति करने का भी अधिकार है। मगर, किसी भी दल को किसी महापुरुष पर एकाधिकार जताने का कोई हक नहीं है। गांधी, नेहरू, पटेल पूरे देश के हैं, अकेले कांग्रेस के नहीं हैं। न लोहिया मुलायम के हैं और न ही दीनदयाल उपाध्याय पर भाजपा का एकाधिकार है। जयप्रकाश नारायण जितने नीतीश एवं लालू के हैं, उतने ही राष्ट्र के। बाबा साहब अंबेडकर भी केवल मायावती के नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के हैं। यही बात हमारे सभी महापुरुषों पर लागू होती है। छोटे-छोटे दल अगर किसी महापुरुष विशेष पर अपना अधिकार जताएं, तो चलता है, मगर कांग्रेस यह गलती कैसे कर सकती है। उससे तो देश जवाब मांगेगा।

रविवार, 9 नवंबर 2014

टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया उसका नाम है सरदार बल्लभ भाई पटेल

लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल 

टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया
उसका नाम है सरदार बल्लभ भाई पटेल 


आधुनिक भारत के शिल्पी सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचार, कर्म और उनकी स्मृतियां मन को रोमांच और गौरव से भर देती हैं। वे ऐसे राष्ट्रभक्त महापुरुष थे जिनके लिए ‘राष्ट्र सबसे पहले’ था। सरदार सही मायने में राष्ट्रीय एकता के प्रतीक थे और हैं। उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लेने के लिए भाजपानीत राजग सरकार की सराहना की जानी चाहिए। भारत की संप्रभुता, एकता और अखण्डता के लिए जीने-मरने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की सूझबूझ का ही नतीजा है कि आज हम एक शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिक हैं। दुनिया में भारत एक महाशक्ति है। वरना तो हम अपने महान राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े पकड़कर रो रहे होते।

तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर कई दफा तरस आता है जो यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत को एक देश और राजनीतिक इकाई का रूप देने का श्रेय अंग्रेजों को है। कांग्रेस के ही नेता एवं पूर्व मंत्री पी. चिदम्बरम किसी कार्यक्रम में इंदौर आए हुए थे, तब उन्होंने कहा था कि भला हो अंगे्रजों का जो वे भारत आए और हमें बेहतर बना दिया। वरना हम तो अंधेरे में ही जी रहे थे। लगभग यही बातें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तब कहीं थीं जब वे इंग्लैण्ड गए थे, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए। तमाम वामपंथी विद्वान भी यही सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं कि भारत को सभ्य और एक तो अंग्रेजों ने बनाया। अंग्रेज न आते तो भारत होता ही नहीं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों को भारतीयों से कोई मोहब्बत नहीं थी, न ही वे मानवता में विश्वास करते थे, जो वे भारतीयों के हित की चिन्ता करते। वे लुटेरे थे। लूटने के लिए आए थे। जब वीर प्रसूता मां भारती के लड़ाकों ने अंग्रेजों को ललकारा तब आखिरकर उन्हें यहां से जाना पड़ा। लेकिन, जाते-जाते भारत का सर्वनाश करने के लिए वे अपनी कुटिल चाल चल गए थे। उन्होंने भारत को एक राजनीतिक इकाई नहीं बनाया था बल्कि उन्होंने तो भारत को कई टुकड़ों में बांट दिया था। देशभक्त सरदार वल्लभ भाई पटेल न होते तो आज भारत 562 से भी अधिक टुकड़ों में बंटा होता। वे सरदार पटेल ही थे जिन्होंने भारत को एक किया। अपनी सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता के बल पर ही सरदार अलग-अलग झण्डा थामे 562 रियासतों को तिरंगे के नीचे ला सके। यह आसान काम नहीं था। सरदार पटेल के हाथ में यह काम न होता तो शायद यह संभव भी न हो पाता। सरदार के दृढ़ के आगे, उनकी लौह पुरुष की छवि के आगे भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद के निजामों की भी एक न चली। सरदार पटेल के कारण ही ये सब आज भारत का अभिन्न अंग हैं और यहां कोई विवाद नहीं। वहीं, जम्मू-कश्मीर मसले में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के कारण आज तक विवाद की स्थितियां बनी हुई हैं। अगर जम्मू-कश्मीर के मामले में नेहरू ने टांग न फंसाई होती, सरदार पटेल को अपने तरीके से समस्या को हल करने दिया गया होता तो आज जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन होता। वह अपने नाम के अनुरूप वाकई ‘धरती पर स्वर्ग’ होता।

भारत-पाकिस्तान अलगाव के कारण उपजीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोर अनुशासन प्रिय और मितभाषी सरदार वल्लभ भाई पटेल के लिए राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चुनौतीपूर्ण कार्य था। लेकिन, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने देश जोड़कर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा दिया। दरअसल, निर्णय लेते वक्त उनके दिमाग में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं रहती थी। उनकी सोच एकदम स्पष्ट थी- राष्ट्र सबसे पहले। किसी भी कीमत पर देश की एकता जरूरी है। राष्ट्र को एकजुट करने के लिए उन्हें कितनी ही तोहमत झेलनी पड़ी। सरदार सांप्रदायिक हैं, असमझौतावादी हैं, पूंजीपतियों के समर्थक हैं, मुस्लिम विरोधी हैं, वामपक्ष के विरोधी हैं। इस तरह के तमाम आरोप उन पर लगाए गए। लेकिन, आरोपों की परवाह न करते हुए सरदार पूरी तल्लीनता के साथ अपने काम में लगे रहे। निश्चित ही वे अपनी छवि और आरोपों की फिक्र करते तो देश कहीं पीछे छूट जाता। राष्ट्रीय एकता को हम पा नहीं सकते थे। भारत एक देश नहीं बन पाता। सरदार पटेल का ऋण हमेशा भारतीयों के माथे पर रहेगा। उस ऋण से उऋण होना संभव नहीं है। हां, एक तरीका है सरदार पटेल के विचारों और कर्मों को सार्थकता प्रदान करने का। राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए हम ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के मौके पर शपथ लें कि हमारे मन-वचन-कर्म से कभी भी, किसी तरह भी राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और संप्रभुता को क्षति न पहुंचे। राज्यों के आपसी विवाद खत्म करने के लिए हमें आगे आएं। भाषाई विवाद से पार पाएं। इन्सानों में धर्म-जाति के आधार पर कोई भेद न करें। सब स्तर पर एकजुट हों। देश की आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने में अपना योगदान थे। राष्ट्र विरोधी विचारों और कार्यों से दूर रहें। राष्ट्र विरोधी तत्वों का पुरजोर विरोध करें। भारत के गौरव को बढ़ाने के लिए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाहन करें।

भारत सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लेकर एकता की भावना के महत्व का भी प्रतिपादन किया है। स्वयं सरदार पटेल एकता को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। उनका स्पष्ट कहना था- ‘एकता के बिना जनशक्ति शक्ति नहीं है।’ उनका यह भी मानना था कि कोई भी विश्वास तब तक मजबूत नहीं होता जब तक उसके पीछे एकता की ताकत न हो। वे कहते थे- ‘शक्ति के अभाव में विश्वास किसी काम का नहीं है। विश्वास और शक्ति, दोनों ही किसी भी महान कार्य को करने के लिए अनिवार्य हैं।’ उन्होंने भाषणों से ही नहीं बल्कि अपने व्यवहार से भी इन बातों को आगे बढ़ाया था। कई मसलों को लेकर जवाहरलाल नेहरू से उनकी मतभिन्नता थी लेकिन अपनी ओर से उन्होंने यह कभी भी जाहिर नहीं होने दिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आपसी एकता और सामंजस्य जरूरी है। व्यक्तिगत हित, मन-मुटाव और मतभिन्नता को उन्होंने कभी अपने पास फटकने नहीं दिया। वे तो देश के लिए सर्वस्व समर्पित करने को निकले थे। उनके लिए बड़े से बड़ा पद प्राप्त करना उद्देश्य नहीं था। देश का मानस उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहता था लेकिन महात्मा गांधी ने अपने प्रिय जवाहरलाल नेहरू का नाम आगे बढ़ाया। सरदार पटेल ने पद-प्रतिष्ठा की दौड़ से खुद को बाहर रखकर गांधी के सम्मान को बढ़ाया और किसी मौन तपस्वी की तरह वे राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने में लगे रहे। आज के राजनीतिक दलों को सरदार पटेल से यह सीख लेनी चाहिए कि वे राष्ट्रीय एकता के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आगे आएं। एकजुट हों। देश के सम्मान पर आंच आए तो मिलकर आवाज बुलंद करें। भारत की सुरक्षा के लिए नासूर बन चुकी अवैध घुसपैठ की समस्या पर राजनीति बंद करें। घटनाओं और समस्याओं को अलग-अलग चश्मे से देखना बंद करें। खुली आंखों से स्थितियों को एक समान रूप से देखें। समस्या का समाधान करते समय राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर राष्ट्र को पहले रखकर देखें। स्वतंत्र भारत के समस्त नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि सरदार पटेल के काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। उनकी जयंती को सार्थक बनाएं, इसे कर्मकाण्ड तक सीमित न करें। भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के सरदार पटेल के स्वप्र को हम साकार करें।