रविवार, 9 नवंबर 2014

‘बौद्ध-जैनमत, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’

‘बौद्ध-जैनमत, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’

महाभारत काल के बाद देश-विदेश में सर्वत्र अज्ञान फैल गया था। शुद्ध वैदिक धर्म शुद्ध न रह सका और उसमें अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां आदि अनेक हानिकारक मत व बातें सम्मिलित हो गयीं। वेद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को पंच-महायज्ञों का करना अनिवार्य था जिसमें प्रथम ईश्वरोपासना तथा उसके पश्चात दैनिक अग्निहोत्र का विधान था। इस अग्निहोत्र के विस्तार – गोमेध, अजामेध, अश्वमेध आदि अनेक यज्ञ थे। मध्यकाल में विद्वानों के वेद मन्त्रों के गलत अर्थ व व्याख्याओं से यज्ञों में पशुओं का वध होने लगा और उनके मांस से यज्ञों में आहुतियां दी जाने लगीं। वेदों के अनुसार हमारा समाज गुण, कर्म व स्वभावों के अनुसार चार वर्णों में विभक्त था। महाभारत के पश्चात मध्यकाल में इन वर्णों को गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर न मानकर जन्म पर आधारित माना जाने लगा था। कालान्तर में एक वर्ण में ही जन्म के आधार पर अनेक जातियों की रचना हुई और लोग परस्पर, जो वेदों के अनुसार समान थे, उनमें छोटे-बड़े व ऊंच-नीच का भेदभाव उत्पन्न हो गया। स्त्री व शूद्रों को वेदों के अध्ययन से वंचित कर दिया गया। महाभारत से पूर्व वैदिक काल में सबके लिए अनिवार्य गुरूकुल की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई। महाभारत के बाद अपवाद स्वरूप ऐसे कम ही उदाहरण होंगे जहां सभी वर्णों के लोग आचार्य से वेदों का अध्ययन कर पाते थे। स्त्रियों की शिक्षा का कोई गुरूकुल या शिक्षा केन्द्र तो सन् 1825 व महर्षि दयानन्द के वेद प्रचार काल में देश व विदेश में कहीं अस्तित्व में नहीं था। एक प्रकार से गुरूकुल व्यवस्था का ध्वस्त होना और चार वर्णों में समानता समाप्त होकर विषमता का उत्पन्न होना ही देश की पराधीनता और सभी अन्धविश्वासों व कुरीतियों का कारण था। ऐसे समय में कि जब सामाजिक असमानता चरम पर थी, यज्ञों में हितकारी निर्दोष व मूक पशुओं को मार कर खुलकर हिंसा की जाती थी, उनके मांस से यज्ञ किए जाते थे और मांसाहार किया जाता था, तब भगवान बुद्ध का आविर्भाव हुआ। उन्होंने पशु हिंसा और सामाजिक असमानता का विरोध किया। उन्हें बताया गया कि पशु हिंसा का विधान वेदों में है। इस पर उनका उत्तर था कि ऐसे वेद जो पशु हिंसा का विधान करते हैं, वह अमान्य हैं। उन्हें बताया गया कि वेदों की रचना तो साक्षात् ईश्वर से हुई है जिसने यह सारा संसार बनाया है, तो इस पर उन्होंने कहा कि मैं ऐसे ईश्वर को भी नहीं मानता। भगवान बुद्ध पूर्ण अहिंसक व शाकाहारी थे। पशुओं की हिंसा और हत्या से उनको महर्षि दयानन्द के समान आत्मिक दुःख होता था। वह मानव हितकारी अनेकानेक विषयों के ध्यान व चिन्तन में संलग्न रहते थे। लोगों को उनकी यह बातें पसन्द आयीं। लोग उनके अनुयायी बनने लगे। उनकी शिष्य मण्डली बढ़ती गई और उनके द्वारा प्रचार से देश व विश्व में उनके अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक हो गई। बौद्ध एवं जैन मत ने ईश्वर के अस्तित्व व उसकी उपासना का त्याग कर दिया था। यह सत्य का अपलाप था। ऐसी स्थिति का होना वेदानुयायियों के लिए चिन्ता का विषय बन गया। इसकी एक प्रतिक्रिया यह हुई कि बौद्धों व जैनियों की देखा-देखी वेद मतानुयायियों = आर्यो में भी मूर्ति पूजा का प्रचलन हो गया। एक के बाद एक अन्धविश्वासों में वृद्धि होती रही और अतीत का वैदिक धर्म कालान्तर में वेदों के विपरीत कुछ वैदिक व कुछ अवैदिक अथवा पौराणिक मान्यताओं का मत बन कर रह गया।

यह सर्व विदित है कि भगवान बुद्ध और जैन मत के प्रवर्तक स्वामी महावीर ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते थे जिसकी चर्चा हमने उपर्युक्त पंक्तियों में भी की है। उन्होंने-अपनी अपनी कल्पायें कीं और उसी पर उनका मत स्थिर हुआ। ऐसा होने पर नास्तिकता के बढ़ने व धर्म-अर्थ-काम व मोक्ष के बाधित होने से वैदिक मत के शुभ चिन्तक व उच्च कोटि के ईश्वर भक्त विद्वानों में चिन्ता का वातावरण बन गया। ऐसे समय में एक दिव्य पुरूष स्वामी शंकराचार्य जी का आविर्भाव होता है। वह भारत के दक्षिण प्रदेश में जन्में और उन्होंने अनेक वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन किया जिससे वह अपने समय के सबसे अधिक तार्किक विद्वान तथा वेदान्त, गीता व उपनिषदों के सबसे बड़े विद्वान बने। उन्होंने जब बौद्ध मत व जैन मत के सिद्धान्तों का अध्ययन किया तो उन्हें ईश्वर के अस्तित्व को न मानने का सिद्धान्त असत्य व अनुचित लगा। सत्य का प्रचार व असत्य का खण्डन ही मनुष्यों का कर्तव्य भी है और धर्म भी। अतः इस धर्म का पालन करने के लिए उन्होंने तैयारी की। उन्होंने इन नास्तिक मतो के खण्डन के लिए अद्वैतवाद की विचारधारा को स्वीकार किया जिसके अनुसार संसार में केवल एक चेतन सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, निराकार तत्व-पदार्थ-सत्ता का ही अस्तित्व है जिसे ईश्वर-परमात्मा आदि नामों से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि हमें यह जो संसार दिखाई देता है वह हमारी बुद्धि के भ्रम के कारण दिखाई देता है जबकि उसका यथार्थ या वास्तविक अस्तित्व है ही नहीं। उन्होंने वा उनके अनुयायियों ने इसका एक उदाहरण दिया कि जैसे रात्रि के अन्धेरे में वृक्ष पर लटकी हुई रस्सी सांप प्रतीत होती है, ऐसे ही यह संसार हमें वास्तविक प्रतीत हो रहा है जबकि इसका अस्तित्व है ही नहीं। यह हमारा अज्ञान व भ्रम है। इसी प्रकार से उन्होंने सब प्राणियों को ईश्वर का ही अंश बताया और कहा कि इसका कारण अज्ञान है। अज्ञान जब दूर होगा तो जीव ईश्वर में समाहित होकर उसमें लीन हो जायेगा अर्थात् मिल जायेगा और तब जीव वा जीवात्मा का अस्तित्व नहीं रहेगा।

हमने भगवान बुद्ध व भगवान महावीर के ईश्वर के अस्तित्व को न मानने के सिद्धान्त की चर्चा की है। ऐसा उन्होंने ईश्वर के बनाये या दिये गये ज्ञान वेद व इनके नाम पर हिंसा के व्यवहार के कारण किया था। हमें लगता है कि इसके लिए यह आवश्यक था कि वेद के नाम पर यज्ञों में जो हिंसा होती थी उसका खण्डन किया जाता और वेदों का शुद्ध स्वरूप प्रस्तुत किया जाता। इसके साथ ही ईश्वर को सृष्टि, समस्त प्राणियों तथा वेद ज्ञान का रचयिता सिद्ध किया जाता। परन्तु ऐसा नहीं किया गया। यह तो कहा गया कि ईश्वर का अस्तित्व है और उसे तर्कों से सिद्ध किया गया जिससे नास्तिक मत पराभूत हुए, परन्तु वेदों पर पशुओं की हत्या व हिंसा करने वा कराने के जो आरोप थे और जिस हिंसा की प्रेरणा ईश्वर ने वेदों के द्वारा की गई बताई जा रही थी, उनका खण्डन व वेदों के सत्य अर्थों का प्रकाश व उनका मण्डन नहीं किया गया। इस कारण ईश्वर व वेदों पर हिंसा की प्रेरणा करने के आरोप स्वामी शंकराचार्य जी के शास्त्रार्थ के बाद भी यथावत् बने ही रहे। क्या यह नहीं किया जाना था या इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी? हमें लगता है कि यह कार्य अवश्य किया जाना चाहिये था परन्तु स्वामी शंकराचार्य जी का अल्पायु में निधन व अन्य अनेक कारणों से सम्भवतः वह ऐसा नहीं कर सके थे। हमने इसके लिए अपने एक मित्र के साथ स्वामी शंकराचार्य जी के अनुयायी, एक उपदेशक विद्वान से भी चर्चा की। इससे हमें यह ज्ञात हुआ कि स्वामी शंकराचार्य जी ने यज्ञ में हिंसा उचित है या अनुचित, इस भीष्म प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया अर्थात् इसकी उपेक्षा की। इसका परिणाम यह हुआ कि यज्ञों के सत्य स्वरूप, उनका पूर्णतः अंहिंसात्मक होना, का प्रचार न हो सका और जो चल रहा था वह प्रायः चलता रहा या कुछ कम हुआ। इसी कारण वेदों का महत्व भी स्थापित न हो सका और उनका संरक्षण व रक्षा न हो सकी। स्वामी दयानन्द के जीवनकाल सन् 1825-1883 तक आते-आते देश में वेदों की उपलब्धि प्रायः विलुप्ति व अप्राप्यता की सी हो गई थी जिसकी खोज महर्षि दयषनन्द ने अपने अद्भुत ब्रह्मचर्य के तप, विद्या व पुरूषार्थ से की। यदि वह, वह न करते जो उन्होंने किया, तो हमें लगता है कि वेद सदा-सर्वदा के लिए विलुप्त व अप्राप्य हो जाते। आज हमें वेद व उनके मन्त्रों के सत्य अर्थ उपलब्ध हैं, वह महर्षि दयानन्द के तप व पुरूषार्थ का परिणाम है और इसका पूर्ण श्रेय उन्हीं को है। मानव जाति के लिए यह कार्य इतना हितकारी हुआ है कि जिसकी प्रंशसा के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। यदि वह यह कार्य न करते तो, ऐसी अवस्था में, सब मत-मतान्तरों की मनमानी चलती रहती। उनके द्वारा वेदों की प्रमाणिक पाण्डुलिपियों की खोज, उनके पुनरूद्धार व सत्य व यथार्थ वेदार्थ अथवा वेद भाष्य से लोगों को ईश्वर के सत्य स्वरूप का ज्ञान हुआ और साथ ही जीवात्मा, कारण प्रकृति व कार्य प्रकृति के भेद व अन्तर का पता भी चला। महर्षि दयानन्द प्रदत्त यह त्रैतवाद का सिद्धान्त ही वास्तविक, यथार्थ, सत्य व निभ्र्रान्त सिद्धान्त है। महर्षि दयानन्द द्वारा किए गये वेदों के भाष्य, वैदिक रहस्यों के उद्घाटन व सिद्धान्तों एवं मान्यताओं के प्रकाशन से सभी मत-मतान्तरों में मिश्रित असत्य, अज्ञान व मिथ्या मान्यताओं व सिद्धान्तों का ज्ञान समाज में उद्घाटित हुआ। हम समझते हैं कि यह महर्षि दयानन्द की संसार को बहुमूल्य व दुर्लभ देन है। इसके लिए महर्षि दयानन्द विश्व समुदाय की ओर से अभिनन्दनीय है।

इस लेख में हम यह कहना चाहते हैं कि स्वामी शंकराचार्य जी ने नास्तिकता का खण्डन किया और ईश्वर के अस्तित्व व स्वरूप का अपनी विचारधारा के आधार पर मण्डन किया। देश, काल व परिस्थितियों के अनुरूप उनका यह कार्य बहुत सराहनीय था। इसके अतिरिक्त ईश्वर व वेदों पर पशु हत्या की प्रेरणा देने और पशु के मांस से यज्ञ करने का जो मिथ्या दोष, यज्ञकर्ताओं के मिथ्याज्ञान व स्वेच्छाचारिता के कारण, लगा था, उसका परिमार्जन स्वामीजी शंकराचार्य जी ने नहीं किया। सम्भवतः इसी कारण वेदों का समुचित संरक्षण भी उनके व बाद के समय में नहीं हो सका। वेदों पर लगाये गये वेदेतर मतावलम्बियों के मिथ्या अनेक दोषों का खण्डन, वेदों के सत्य अर्थों का प्रकाशन व वेदों के ईश्वर से उत्पन्न, हर काल में इनके प्रासंगिक, उपयोगी व अपरिहार्य होने का मण्डन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने जीवन काल में किया जिसके लिए वह सर्वतोभावेन प्रंशसा व अभिनन्दन के पात्र हैं। उन्होंने न केवल वेदों का पुनरूद्धार ही किया अपितु वेद मन्त्रों के सत्य अर्थों को प्रकाशित कर हमें प्रदान किया। उन्होंने विश्व के सभी मनुष्यों को उनके वेदार्थों की परीक्षा करने की व्याकरण की आर्ष प्रणाली, अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरूक्त पद्धति भी हमें प्रदान की है, जिसके लिए सारी मानवजाति इस सृष्टि के प्रलय होने तक उनकी कृतज्ञ रहेगी। हमारा अनुमान है, जो कि सत्य हो सकता है कि आज यदि स्वामी शंकराचार्य जी होते तो वह निष्पक्ष व न्याय के पक्षधर होने के कारण महर्षि दयानन्द के कार्यों के सबसे बड़े प्रशंसक होते। उपसंहार में यह कहना है कि स्वामी शंकराचार्य जी को वेदो पर यज्ञों में पशु हिंसा के मिथ्या आरोपों का खंडन करना चाहिए था और इसके साथ चारों वेदो का सरल , सुबोध एवं प्रामाणिक भाष्य भी करना चाहिए था जो कि वह नहीं कर सके। यह सभी कार्य महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने करके वेदों की वास्तविकता संसार के सामने रखी। 

“भाषा, भाषा से बनती है और आदि व मूल भाषा ईश्वर से प्राप्त होती है”

“भाषा, भाषा से बनती है और आदि व मूल भाषा ईश्वर से प्राप्त होती है”


आज संसार में जितनी भी भाषायें हैं इनका अस्तित्व अपनी पूर्व भाषा में अपभ्रंशों, विकारों, सुधारों व भौगोलिक कारणों से हुआ है। हम बचपन में जो भाषा बोलते थे उसमें और हमारे द्वारा वर्तमान में बोली जाने वाली भाषा में शब्दों के प्रयोग व उच्चारण की दृष्टि से काफी अन्तर आया है। कुछ भाषायें हमने विद्यालयों में या पुस्तकों आदि से भी सीखी हैं। जिस या जिन भाषाओं को सीखा है उनका भी पहले से अस्तित्व है। अब हम उस भाषा पर विचार करते हैं जो वर्तमान भाषाओं का कारण है। हमें यह तथ्य ज्ञात होता है कि आज की भाषाओं के पूर्व स्वरूप को हमारे पूर्वजों ने अपने समय की भाषा में कुछ अपभ्रंशों, विकारों व उनमें सुधार करके अस्तित्व प्रदान किया था। उन्होंने अपने समय में पहले से विद्यमान भाषा के बिना ही उन भाषाओं को पहली बार स्वयं नहीं बनाया था। इस प्रकार से यदि पीछे की ओर चलते जायेंगे तो हम सृष्टि की आदि में पहुंच जायेंगे। सृष्टि की आदि में यह एक और समस्या आयेगी कि सबसे पहले जो मनुष्य उत्पन्न हुए, उनके माता-पिता तो रहे नहीं होंगे फिर उनका जन्म कैसे हुआ होगा, यह प्रश्न तो बहुत अच्छा है परन्तु इस प्रश्न के लोगों के भिन्न-भिन्न उत्तर होते हैं। कई लोग नाना प्रकार की कल्पना करते हैं और हमारे ऋषि कोटि के विद्वान जन कहते हैं कि आदि कालीन मनुष्य अमैथुनी सृष्टि में पैदा हुए थे। यदि मनुष्य को कुछ देर के लिए छोड़कर हम अन्य प्राणी – पशु व पक्षियों पर विचार करें तो वहां भी यही समस्या आती है। सबका उत्तर एक ही है कि अमैथुनी सृष्टि जिसको सर्वव्यापक व सृष्टिकर्ता ईश्वर ने कार्य रूप में अंजाम दिया। यह अमैथुनी सृष्टि होती क्या है? यह बिना माता-पिता के सन्तानों के जन्म को कहते हैं। बिना माता-पिता के क्या सन्तान हो सकते हैं? जी हां, हो सकते हैं, इसका प्रमाण यह संसार है। तर्क से भी यह सिद्ध है कि एक न एक दिन यह जगत, सृष्टि बनी अवश्य है। सृष्टि बनने से पूर्व इसका अस्तित्व नहीं था। जब अस्तित्व नहीं था तो बनायेगा कौन? इसका उत्तर है कि किसी एक सत्य, चित्त, आनन्दयुक्त, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, अनादि, अजन्मा, अमर, सृष्टि रचना की अनुभवी सत्ता ने ही इस संसार को बनाया है। यही उत्तर हमें वेदों से मिलता है कि एक ईश्वर है जिसमें यह सभी गुण है और वही इस सृष्टि को बनाता है और आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में मनुष्यों सहित सभी प्राणियों को उत्पन्न करता है। यह उत्तर पूर्णतः वैज्ञानिक उत्तर है। यदि वैज्ञानिक कहे जाने वाले लोग इसे स्वीकार न करें तो इसका अर्थ यह है कि उन्हें ईश्वर व जीव का ज्ञान नहीं है जबकि इनकी सत्ता यथार्थ है। कुछ समय लगेगा और अन्त में उनका यही निष्कर्ष होगा क्योंकि सभी अनुमान, कल्पनायें, मान्यताओं, सिद्धान्तों व थ्योरियों पर विचार किया जा चुका है और ईश्वरेतर कोई भी कल्पना व विचार सन्तोषजनक नहीं मिला है। ईश्वर, जीवात्मा व कारण प्रकृति — अनादि, नित्य, सत्य, अजर, अमर तत्व हैं, इनकी न तो उत्पत्ति होती है और न ही नाश होता है। विज्ञान भी इस अमरता के सिद्धान्त को मानता है। ईश्वर, जीवात्मा व कारण प्रकृति अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण चर्म चक्षुओं से देखे नहीं जा सकते। इस न दिखने के कारण ही विज्ञान इनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। कारण प्रकृति की कार्य अवस्था क्योंकि स्थूल है और वह आंखों से दिखाई देती है, इसलिये विज्ञान व वैज्ञानिकों को वह स्वीकार्य है। ईश्वर चेतन तत्व है अर्थात् वह हमारी आत्मा जैसा हमसे कहीं बड़ा, अनन्त परिमाण वाला है अर्थात् सर्वव्यापक व निराकार है। इसके साथ ही ईश्वर व जीवात्मा के प्रकृति के मूल स्वरूप से भी अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण इन दोनों पदार्थों का आंखों से दिखाई देना सम्भव नहीं है। आंखों का काम तो स्थूल पदार्थों को देखना है अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थों को नहीं। जब हम परमाणु व अणु जो कि प्रकृति के विकार हैं व मूल प्रकृति से स्थूल हैं, उन्हीं को नहीं देख पाते तो परमाणु व प्रकृति से भी सूक्ष्म पदार्थ ईश्वर व जीवात्मा को कदापि नहीं देख सकते। हां, विवेक से इन्हें जाना जा सकता है और यही इनको देखना कहलता है। ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व से इनकार करना, यह बुद्धि की संकीर्णता व घोर अज्ञानता है। इस ब्रह्माण्ड और प्राणियों के शरीरों को देख कर ईश्वर व जीवात्मा का अस्तित्व निभ्रान्त रूप से सिद्ध है।



हम जब सृष्टि के आरम्भ में पहुंचते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि आरम्भ में ईश्वर ने अमैथुनी सृष्टि की थी जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। ईश्वर ने ही इस चेतनारहित जड़ ब्रह्माण्ड तथा चेतनायुक्त प्राणी जगत को बनाया है। प्राणी जगत में सभी प्राणियों की आंखे, मुंह, वाणी, जिह्वा, श्रोत्र या कान के साथ शरीर के अन्दर बुद्धि भी बनाई है जो सत्य व असत्य व करणीय व अकरणीय का विवेचन करती है। जो सत्ता अदृश्य रहकर ब्रह्माण्ड व मनुष्यों के शरीर बना सकती है वह सत्ता मनुष्य को बोलने व भाषा का ज्ञान भी दे सकती है जिससे मनुष्य बोलने में समर्थ होता है। यदि ऐसा न होता तो शायद् ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियों की रचना न की होती जिसमें कान व मुंह के अतिरिक्त अन्य इन्द्रियां भी सम्मिलित हैं। अब विचार करते हैं कि आत्मा में विद्यमान ईश्वर, भाषा का ज्ञान करा सकता है या नहीं? हम जानते हैं कि बोलने वाले की सुनने वाले के कान से जितनी अधिक दूरी होती है, उतना ही अधिक जोर से बोलना होता है और यदि बोलने वाला कान में बोले तो बहुत धीरे से बोलने पर भी व्यक्ति सुनकर समझ लेता है। बोलना तब होता है जब बोलने वाला और सुनने वाला दोनों अलग-अलग हैं। अब यदि बोलने वाला आत्मा के भीतर है तो बोलने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा में उसके द्वारा प्रेरणा कर देने मात्र से ही पहले आत्मा को ज्ञान होता है और ज्ञान का उपयोग कर मनुष्य भाषा को बुद्धि व मन के सहयोग से मुंह द्वारा उच्चारित कर सकता है। हमें जब कुछ बोलना होता है तो उसमें हम अपनी आत्मा, मन व बुद्धि के साथ मुंह का प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार आत्मा में उपस्थित यदि ईश्वर ज्ञान प्रदान करता है तो आत्मा से वह मन को, बुद्धि को प्राप्त होकर मुख के अंतर में निहित वाणी द्वारा उच्चारित हो सकता है। इस बात को हमें जानना व समझना है। आत्मा में विद्यमान वा उपस्थित ज्ञान को वाणी द्वारा व्यक्त करना वा बोलना सम्भव है। यह असम्भव नहीं है। ऐसा ही सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में हुआ था या हुआ होगा। ईश्वर ने आदि सृष्टि में प्रथम चार ऋषियों की आत्माओं में वेदों का ज्ञान, भाषा ज्ञान सहित दिया था और बोलने की प्रेरणा भी ईश्वर ने ही की थी। हम जानते हैं कि ज्ञान का आधार भाषा होती है। यदि भाषा न हो तो ज्ञान हो ही नहीं सकता। वेदों का ज्ञान भी संस्कृत भाषा में है और इस कारण संस्कृत का ही ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में कराया था। यह सम्भावना है कि भाषा का ज्ञान अर्थात् बोलने के लिए भाषा का ज्ञान तो सभी अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को कराया गया था। इसका कारण हमारा यह चिन्तन है कि यदि ईश्वर सभी को बोलना न सिखाता तो हम ऋषियों से ज्ञान भी प्राप्त नहीं कर सकते थे। पहले भाषा पढ़़ते जिसमें काफी समय लगता। सम्भवतः कामचलाऊ  भाषा के ज्ञान के लिए एक-दो सप्ताह तो लग ही जाते। इस अवधि में मनुष्य अपना सामान्य व्यवहार कैसे करते? इसका उत्तर नहीं मिलता है। क्या बिना भाषा के ज्ञान के मनुष्य दो-चार दिन भी अपना निर्वाह कर सकते हैं, वह भी तब, जब उनका पालन करने के लिए उनके माता-पिता या कोई अभिभावक न हो। हमें लगता है कि यह सम्भव नहीं है। अतः यह स्वीकार करना पड़ता है कि ईश्वर ने जब मनुष्यों को जीवित जागृत बना दिया तो उनके क्रियाशील होते ही उन्हें परमात्मा ने भाषा व सामान्य व्यवहार का ज्ञान भी दिया।



भाषा के विषय में हमारा चिन्तन बताता है कि सृष्टि के आरम्भ में जब मनुष्य उत्पन्न हुए तो उन्हें बोलने के लिए भाषा की आवश्यकता थी। उस समय यदि ईश्वर उन्हें भाषा का ज्ञान न कराता तो वह स्वयं व कालान्तर में भाषा को उत्पन्न या उसकी रचना नहीं कर सकते थे। इसका कारण है कि भाषा के लिए वाक्य, उससे पूर्व शब्द, शब्द से पूर्व अक्षर या सभी प्रकार की ध्वनियों के लिए एक एक अक्षर व उन ध्वनियों को जोड़ने के लिए उन ध्वनियों के संकेतक अक्षर व मात्राओं की न्यूनतम आवश्यकता होती है। क्या वह मनुष्य व मनुष्य समूह जो भाषा व ज्ञान से पूर्णतः शून्य हैं, अक्षर व शब्दों की रचना कर सकते हैं? इसके सभी पहलुओं पर विचार व चिन्तन करने पर ज्ञात होता है कि मनुष्यों के लिए यह सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि अक्षरों को निर्धारित करने के लिए भी भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है और क्योंकि आदि काल में अमैथुनी मनुष्यों को भाषा का ज्ञान नहीं है, तो वह अक्षरों के निर्धारण का कार्य कदापि नहीं कर सकते और न हि किस अक्षर के लिए तालु, जिह्वा, कण्ठ, नासिका आदि का उच्चारण में कैसे प्रयोग करना है, यह ही जान सकते हैं। इस स्थिति में ईश्वर का होना सत्य सिद्ध होने के साथ यह प्रमाण कोटि का विचार, मान्यता या सिद्धान्त है कि अक्षर, मात्राओं, शब्द, वाक्य वा भाषा का ज्ञान एवं अन्य सभी विषयों का ज्ञान जिसकी मनुष्य के जीवन के लिए अपरिहार्य आवश्यकता है, वह सत्य, चित्त, आनन्द स्वरूप, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता ईश्वर से प्राप्त होता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस ईश्वर व सत्ता ने इस संसार को बनाया है उसे भी तो विज्ञान व ज्ञान की आवश्यकता थी। ज्ञान क्योंकि भाषा में ही निहित होता है, अतः ईश्वर को भी अपने सभी कार्य करने के लिए एक भाषा की आवश्यकता होती है। यदि ऐसा न हो अर्थात् ईश्वर की अपनी भाषा न हो तो वह ज्ञानहीन ठहरेगा। तब इस संसार की रचना ईश्वर द्वारा कदापि सम्भव नहीं हो सकती, ऐसा हमारा अनुमान व विवेक कहता है। ईश्वर की वह भाषा कौन सी है तो इसकी एक ही सम्भावना है कि ईश्वर की भाषा वही भाषा ‘‘संस्कृत’’ है जो उसने वेदों का मनुष्यों को ज्ञान देने के अवसर पर प्रयोग की है। हम इस विषय में सभी विद्वानों के विचार आमंत्रित करते हैं।



हमारे इस लेख का प्रयोजन यह बताना है कि प्रत्येक भाषा अपनी किसी पूर्व भाषा में अपभ्रंस के द्वारा या विकारों व सुधारों व कई भाषाओं का समन्वय कर बनाई जाती है। पीछे चलते चलें तो एक अनवस्था दोष आता है। वहां केवल एक ही भाषा होती है। वह भाषा वेदों की भाषा अर्थात् संस्कृत है। वह संस्कृत मनुष्यों द्वारा बनाई गई नहीं है। वह परमात्मा प्रदत्त भाषा है जिसका विस्तार पूर्वक उल्लेख पूर्व पंक्तियों में किया जा चुका है। हम आज भी देख रहे हैं कि सृष्टि को बने हुए लगभग 2 अरब वर्ष व्यतीत होने को हैं और इतनी लम्बी अवधि में, आज तक भी संसार के सभी मनुष्य संस्कृत से उत्कृष्ट भाषा नहीं बना सके। संसार की सभी भाषाओं में अनेक दोष हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सका परन्तु संस्कृत पहली भाषा होकर भी निर्दोष है। यही इस भाषा का अपौरूषेयत्व या ईश्वरत्व है। इस सिद्धान्त को मान लेने पर भाषा विषयक सभी प्रश्नों का समाधान हो जाता है।

‘वर्तमान समाज में शूद्र संज्ञक कोई नहीं’

‘वर्तमान समाज में शूद्र संज्ञक कोई नहीं’

वेद एवं वैदिक साहित्य में मनुष्य समाज को गुण, कर्म तथा स्वभाव के अनुसार चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में वर्गीकृत किया गया था। गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित इस वैदिक वर्ण व्यवस्था में चारों वर्णों के लिए गुणों व कर्तव्यों का निर्धारण किया गया था।आज इस वर्ण व्यवस्था का स्थान जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था ने ले लिया है जो कि वर्णव्यवस्था की पूरक न होकर विरोधी व्यवस्था है। वर्तमान में अधिंकाश लोग प्रायः शर्माजी, वर्माजी, गुप्तजी और दासजी आदि अनेकानेक जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनका गुण, कर्मों व स्वभाव से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। इस आधार पर आज जो सामाजिक स्थिति है उसमें न कोई ब्राह्मण है, न कोई क्षत्रिय, न कोई वैश्य और न कोई शूद्र है। प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थों रामायण एवं महाभारत में इन जाति सूचक शब्दों का कहीं उल्लेख नहीं है जिसका अर्थ है कि उस काल में जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था का आरम्भ नहीं हुआ था। वर्तमान समय में हम जिन्हें ब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति कहते हैं उनमें अधिकांश अशिक्षित भी हैं वह प्राचीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण नहीं कहे जा सकते। अनेक ऐसे लोग है जो ब्राह्मण कुलों या जातियों में उत्पन्न हुए हैं परन्तु वह कार्य सेना या पुलिस में, व्यापार व वाणिज्य के या सरकारी सेवा में चपरासी, क्लर्क व अधिकारी का कर रहे हैं। इन लोगों में अपवाद स्वरूप शायद ही किसी ने वेदों के दर्शन किये हों, उन्हें पढ़ना व समझना तो दूर की बात है। इनमें प्रायः सभी मूर्ति पूजा आदि पौराणिक कृत्यों के अनुसार पूजा आदि करते हैं जो कि वेदविरूद्ध कृत्य है। इसी प्रकार स्वयं को ब्राह्मण कहने व मानने वाले लोग वेद विरूद्ध अवतारवाद, फलित ज्योतिष, छुआछूत, गुण-कर्म-स्वभाव की उपेक्षा करके अपने बच्चों के विवाह अपनी ही जाति में करते हैं। क्या यह गुण, कर्म व स्वभाव व व्यवसाय पर आधारित प्राचीन वा वेदकालीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण कहलायें जा सकते हैं? हमारा अध्ययन कहता है कि कदापि नहीं। इसी प्रकार से अन्य तीन वर्णों क्षत्रिय, वैश्य व शूद्रों की भी स्थिति है। यदि निष्कर्ष रूप में देखें तो आज प्राचीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र की अर्हता से अलंकृत न होने के कारण इन वर्णों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इसलिए सर्वत्र वर्णसंकर होने से सभी मनुष्य हैं, आर्य हैं, वैदिक धर्म एवं पौराणिक मत का मिश्रण हैं, यह स्वीकार करना पड़ता है। इस निष्कर्ष के अनुसार यह भी सुनिश्चित है कि देश व समाज में वैदिक भावना व वैदिक साहित्य के अनुसार शूद्र कोई भी नहीं है या फिर सभी वर्णों में शूद्र हैं और शूद्रों में अनेक व बड़ी संख्या में ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य हैं।

महात्मा गांधी जी ने अपने समय में स्वच्छता पर बल दिया था। उन्होंने स्वयं मल-मूत्र साफ कर दूसरों को एक उदाहरण प्रस्तुत किया था कि वह भी ऐसा करें जिससे समाज व देश स्वच्छ रह सकें। आज भी हमारे बड़े-बड़े राजनेता जिसमें प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भीहैंस्वयं को जनता का प्रधान सेवक कहते हैं और हाथ में झाडू उठाकर सफाई करते हुए दिखते  दिखाते हैं। उनका अनुकरण कर स्वामी बाबा रामदेव, श्री बालकृष्ण, अनिल अम्बानी, सानिया मिर्जा, शशि थरूर, आदि भी सफाई कर रहे हैं। मध्य काल में यदि कोई ऐसा करता तो उसे शूद्र व अस्पर्शय कहा जाता। अतः मध्यकाल की परिभाषा के अनुसार तो यह शूद्र हैं परन्तु ऐसा मानना अज्ञान व अन्धविश्वास है, और कुछ नहीं। यह सभी लोग समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं और जो हैं, वस्तुतः वही हैं और वही रहेंगे। इसी कारण से हमारा मानना है कि आज मध्यकालीन विचारों के अनुसार कोई मनुष्य शूद्र नहीं है। इस बात को आज कल के ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य कहे जाने वाले लोगों को मनसा, वाचा व कर्मणा समझना है। नगरों में रहने वाले तो इसे कुछ समझ सकते हैं परन्तु हमारे गांवों में इतनी अज्ञानता फैली हुई है कि वहां यह सन्देश पहुंचता ही नहीं और यदि पहुंचता भी है तो वह इसे समझने के लिए तैयार नहीं होते। यह हकीकत है कि प्राचीन काल में जो शूद्र होते थे, उनका समाज में पूरा सम्मान था। उनका कार्य मल-मूत्र साफ करना नहीं अपितु विद्वान, ऋषियों व ब्राह्मणों के घरों में भोजन आदि बनाना व अन्य सेवा कार्य होते थे। आज यह कार्य सभी जातियों के लोग करते हैं।

समय ने करवट ली और महाभारत काल के बाद मध्यकाल आया, ज्ञान विज्ञान समाप्त हो गया, अविद्या, अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियों व फलित ज्योतिष जैसी समाज के लिए हानिकारक व मिथ्या बातों ने समाज में स्थान पाया और एक वर्ग को शूद्र कहकर उससे छुआछुत का अमानवीय व्यवहार किया जाने लगा। आज हमारे सफाई का काम करने वाले भाईयों के कार्यों की महिमा का गान हो रहा है, जो कि समयानुकुल और उचित ही है। जब हम विदेशों में जाते हैं तो वहां स्वच्छता को देखकर उनकी प्रशंसा करते हैं। वहां स्वच्छता करने वाले लोगों के प्रति वह दृष्टि नहीं है जो हमारे देश में रही है और अब भी कुछ कम या अधिक जारी है। अब आधुनिक काल चल रहा है, अतः हमें अपनी दृष्टि बदलनी चाहिये जो यह हो सकती है कि संसार के सभी लोग समान हैं, कोई न छोटा है, न बड़ा है, सभी ईश्वर के अमृत पुत्र व पुत्रियां हैं और इस कारण से सभी हमारे परिवार के सदस्य हैं। इस दृष्टि से जीवन जीकर समाज में एक क्रान्ति लाई जा सकती है जिसकी की आज आवश्यकता है और जो स्वामी दयानन्द जी व महात्मा गांधी जी सभी महापुरूषों का स्वप्न रहा है।

महर्षि दयानन्द से पूर्व समाज में बहुविध समाजिक बुराईयां थी। सती प्रथा, स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार न होना, सामाजिक विषमता, ऊंच-नीच की भावना, निर्धन व निम्न जातियों के लोगों को कुंओं से पानी भरने की मनाही, उनसे पक्षपातपूर्ण व्यवहार, निर्बलों पर न्याय व अत्याचार, एक ही जाति में विवाह जो स्वास्थ्य, शारीरिक बल व लम्बी आयु में बाधक होता है, अन्तर्जातीय विवाह अप्रचलित थे, चूहे-चैके का अधिक महत्व था, लोग दूसरे के हाथ का पकाया गया भोजन तक नहीं करते थे, शूद्रों के मन्दिरों में प्रवेश की समस्या आदि न जाने कितनी समस्यायें थी। महर्षि दयानन्द द्वारा सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना करने से इन सभी अज्ञानपूर्ण अन्धविश्वासों व सामाजिक विषमताओं वाली परम्पराओं पर कुठाराघात किया गया और वेदों से सिद्ध किया गया कि ईश्वरीय ज्ञान वेदों में इनका कोई आधार नहीं है। इसके साथ ही वेदों के अनुसार सभी मनुष्य समान हैं, सभी आर्य हैं, प्राचीन काल में शूद्र वह होता था जो ब्राह्मणों के घरों में भोजन बनाने के साथ श्रम व यांत्रिकी के कार्य करता था। छुआछूत करना वेदों की आज्ञा के विरूद्ध है। सभी कोयज्ञोपवीत धारणसन्ध्योपासना  यज्ञ करने का अधिकार है। गुणकर्म  स्वभाव के अनुसार विवाह करने का अधिकार है,वेदाध्ययन का अधिकार हैआदि आदि। बहुत से अन्त्यज परिवारों के भाई गुरूकुलों में पढ़कर पण्डित बने, बहुतों ने सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ को पढ़कर अपने जीवन का उद्धार व उन्नति की।  स्वामी अदभुतानन्द सरस्वती व अन्य इसके प्रमाण है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ही वस्तुत सामाजिक क्रान्ति के जनक हैं। सामाजिक असमानता को दूर करने का सर्वाधिक श्रेय महर्षि दयानन्द जी व उनके अनुयायियों को ही है। इस पृष्ठभूमि में हम यह कहना चाहते हैं कि आज समाज में शूद्र कोई नहीं है। जिनके विचार शूद्र हैं और जो मन में निम्न विचार रखते हैं, वही वस्तुत शूद्र संज्ञा के अधिकारी हैं, वह चाहे किसी भी रूतबे के कोई भी क्यों न हों। मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं उसके कर्मों व आचार विचारों से होती है। सद्कर्मों को करके मनुष्य श्रेष्ठ या आर्य बनता है और बुरे कर्मों को करके अनार्य। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं।

गौरवमयी भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत और देश की अवनति के कारणों पर विचार

गौरवमयी भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत और देश की अवनति के कारणों पर विचार



                संसार में वैदिक धर्म व संस्कृति सबसे प्राचीन है। इसका आधार चार वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद हैं। वेदों का लेखक कोई मनुष्य या ऋषि-मुनि नहीं अपितु परम्परा से इसे ईश्वर प्रदत्त बताया जाता है। वैदिक प्रमाणों एवं विचार करने पर ज्ञात होता है कि सृष्टि की रचना होने के बाद जैविक व प्राणी सृष्टि हुई जिसमें वनस्पति जगत के बाद प्राणी जगत के अन्तर्गत पशु, पक्षी तथा कीट-पतंग की अमैंथुनी सृष्टि हुई। इनके बाद अन्तिम अमैथुनी सृष्टि मनुष्यों की हुई। मनुष्यों की अमैथुनी सृष्टि की न केवल सम्भावना है अपितु इसका उल्लेख वैदिक साहित्य में उपलब्ध होता है। हम आजकल देखते हैं कि मनुष्येतर जीवयोनियों, पशु, पक्षियों, कीट व पतंगों आदि को अपना जीवन व्यतीत करने के लिए किसी भाषा व नैमित्तिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। उनका काम ईश्वर से उन्हें प्राप्त स्वाभाविक ज्ञान से चल जाता है। मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे माता के दुग्ध का पान करने व भूख व पीड़ा होने पर रोने के अतिरिक्त किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं होता। इससे अधिक वह अपने हाथ पैरों को पटकता रहता है। माता उसे गोद में दुग्धपान कराने के साथ उसे पुचकारती व दुलारती है तथा भांति-भांति के गीत व लोरियां आदि सुनाती रहती है जिससे वह अपनी माता की आवाज व भाषा से कुछ कुछ परिचित होना आरम्भ करता है। कुछ महीनों में वह माता की आवाज को पूरी तरह से समझने लगता है और पिता की भी ध्वनि को अनुभव करने लगता है। धीरे-धीरे उसका ज्ञान बढ़ने लगता है। वह न केवल शब्दों को सुनकर पहचानने लगता है वरन उसे प्रेरित करने पर वह छोटे-छोटे शब्दों को बोलने भी लगता है। आयु वृद्धि के साथ वह अपनी माता व पिता से कुछ-कुछ नई बातें सीखता जाता है परन्तु परिवार व समाज के लोगों के साथ समान्य व विशेष रूप से ज्ञानपूर्वक व्यवहार करने के लिए उसे आचार्यों की आवश्यकता होती हैं जो उसे विद्यालय में प्राथमिक कक्षा से आरम्भ करके भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान कराते हैं। विद्यालयों में भिन्न-भिन्न विषयों को पढ़कर वह नाना प्रकार के व्यवहार, कार्य व व्यवसाय करने में दक्ष हो जाता है।

सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में युवावस्था में उत्पन्न हमारे आदि पूर्वजों के पास अपनी कोई भाषा व ज्ञान तो होता नहीं है तो प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वह भाषा व व्यवहार करने का ज्ञान किससे प्राप्त करते हैं वा किससे सीखते हैं? इस प्रश्न का उत्तर वेदों को जानने वालों के लिए अधिक कठिन नहीं है। हम जानते हैं कि यह सृष्टि ज्ञान पूर्वक बनी हुई रचना है। यह स्वयं कदापि नहीं बन सकती।  इसको बनाने वाली कोई पूर्ण बुद्धिमान सत्ता अर्थात् सर्वज्ञ, जो अतुल बलशाली अर्थात् सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म, अनादि, अनन्त, अजन्मा, अमर, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर आदि गुणों वाली होनी सिद्ध होती है। यदि वह न होती तो यह सृष्टि या ब्रह्माण्ड न बनता। उसका दिखाई देना इस लिए आवश्यक नहीं है क्योंकि उसका निराकार, सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म व सर्वान्तर्यामी होना आवश्यक है और वह है भी ऐसी ही। उसे हम अपने ज्ञान के नेत्रों अर्थात्ः अन्तर्चक्षुओं से जान सकते हैं और आत्मा में विचार व चिन्तन से उसका प्रत्यक्ष अथवा साक्षात्कार कर सकते हैं जिस प्रकार से हम फूलों की सुगन्ध न देखकर भी उसका अनुभव करते हैं और इसी प्रकार वायु को आंखों से न दिखने पर भी अपनी त्वचा द्वारा स्पर्श कर उसका अनुभव करते हैं। इसी प्रकार हमें अपने मोबाइल की घण्टी बजने पर किसी परिचित की आवाज आती है तो उस व्यक्ति के सामने न होने पर भी हमें उसका प्रत्यक्ष व प्रामाणिक ज्ञान होता है कि हमारा अमुक परिचित मित्र, सम्बन्धी या परिवार का सदस्य बोल रहा है। अतः परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। उसी परमात्मा ने सभी मनुष्यों को आदि सृष्टि में बनाया था। उसी ने देखने के लिए आंखें, सुनने के लिए कान, स्वाद व शब्दोच्चार के लिए रसनेन्द्रिय अर्थात् जिह्वा व कण्ठ, स्पर्श के लिए त्वचा व सूंघने के लिए नाक व इसके साथ सत्यासत्य के विवेचन के लिए बुद्धि तथा शुभ व अशुभ संकल्पों के लिए मन आदि अवयव मनुष्य शरीर में बना कर लिए हैं। मनुष्य लाख कोशिश कर ले, वह भाषा को नहीं बना सकते। भाषा के न होने पर ज्ञान हो ही नहीं सकता चूँकि ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। यदि भाषा न हो तो ज्ञान व समझ उत्पन्न नहीं हो सकती। जब मनुष्य इन्हें नहीं बना सकता है तो फिर प्रश्न यह है कि यह प्राप्त किससे होती हैं। इसका सीधा व सरल उत्तर है कि आदि भाषा वैदिक संस्कृत और ज्ञान ‘वेद’यह इस संसार को बनाने वाली सत्ता “ईश्वर” से मनुष्यों को प्राप्त हुए हैं। इन प्रश्नों के इन उत्तरों के अतिरिक्त हम में से किसी के पास अन्य कोई विकल्प है ही नहीं। हां, अनावश्यक काल्पनिक तर्कों का सहारा लिया जा सकता है परन्तु सत्य यही है कि यह भाषा और ज्ञान हमें ईश्वर से प्राप्त हुआ है।



वेद संस्कृत भाषा में है जो लौकिक संस्कृत से भिन्न ‘वैदिक संस्कृत’है। इन वेदों का यथार्थ अर्थ हमें महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का किया हुआ प्राप्त है। अंग्रेजी भाषा में भी डा. स्वामी सत्य प्रकाश सरस्वती जी का किया हुआ वेदों  का भाष्य हमारे पास उपलब्ध है। इनके अतिरिक्त महर्षि दयानन्द के अनेक ग्रन्थ यथा सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि सहित अनेक लघु ग्रन्थ जिनका आधार वेद और वैदिक साहित्य है, हमारे पास उपलब्ध है। वेदों पर आधारित प्राचीन ग्रन्थ मनुस्मृति, 6 दर्शन तथा 11 उपनिषदें भी हमारे पास है जिनके प्रणेता ऋषि कोटि के असाधारण विद्वान मनुष्य हैं। इतिहास के दो प्रमुख ग्रन्थ बाल्मीकी रामायण तथा व्यास ऋषि कृत महाभारत भी उपलब्ध हैं। इनका अध्ययन कर वैदिक धर्म, सभ्यता व संस्कृति से परिचित हुआ जा सकता है। आज भी वैदिक धर्म, संस्कृति व सभ्यता प्रासंगिक एव उपादेय है। हमने विगत 40 वर्षों में इन सभी ग्रन्थों का अध्ययन किया है और हमें लगता है कि इनके आधार पर स्वस्थ व सुखी जीवन व्यतीत किया जा सकता है। इनके अध्ययन के साथ हम आधुनिक ज्ञान व विज्ञान का अध्ययन कर विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिगं, शिक्षा, बैंकिगं, व्यापार, वाणिज्य आदि किसी भी क्षेत्र में अपना व्यवसाय चुन कर सफल जीवन व्यतीत कर सकते हैं।



आज की सामाजिक व्यवस्था को भी जानने का प्रयास करते हैं। आज हमारे देश व संसार में अनेक मत-मतान्तर, धर्म, मजहब, सम्प्रदाय आदि हैं। यह सभी संसार के लोगों को अपने-अपने मत का अनुयायी बनाने का प्रयास करते हैं। ईश्वर के एक होने पर भी सबकी अपनी-अपनी भिन्न-भिन्न विचारधारायें, मान्यतायें, सिद्धान्त तथा उपासना पद्धतियां है। किसी को भी इस बात से कोई सरोकार नहीं दिखता कि उनके द्वारा की जाने वाली क्रियाओं व उपासना पद्धतियों से ईश्वर प्रसन्न होता है अथवा नहीं? ईश्वर क्या चाहता है किसी मत के द्वारा जानने का प्रयास नहीं किया जाता है। वैदिक मत व धर्म में यह प्रयास अवश्य किया गया है। उनके अनुसार ईश्वर सभी जीवों का सुख चाहता है इसी लिए उसने सृष्टि को बनाया आरै आरम्भ में ही संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु वेदों का ज्ञान दिया जिसमें ईश्वर की ओर से मनुष्यों के कर्तव्यों का उल्लेख है। इन वैदिक कर्तव्यों की व्याख्यायें दर्शन, उपनिषद व मनुस्मृति ग्रन्थों में भी दी गई है।  वेदों के ज्ञान का महत्व इस लिए सर्वाधिक है क्योंकि मनुष्य का आत्मा जन्म व मरण धर्मा है। इसका अर्थ है कि यह सृष्टि काल में जन्म-मृत्यु-जन्म के चक्र में बन्धा हुआ होता है, जन्म के बाद पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मानुसार आयु, जाति व सुख व दुःखों को प्राप्त कर भोगता है और कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त होता है। मृत्यु के बाद पुनः पूर्व व इस जन्म के शेष कर्मों के आधार पर नया जन्म मिलता है। यह जन्म किये हुए कर्मों के अनुसार होता है। यह सम्भव है कि हम अगले जन्म में मनुष्य बने और यह भी सम्भव है कि हम पशु, पक्षी, कीट व पतंग में से किसी योनि या जाति प्रजाति में पैदा हों। हमारा भावी जन्म मनुष्य योनि में अच्छे सुशिक्षित व सुखी परिवारों में हों जहां हम सत्कर्मों को करते हुए धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करें, इसके लिए ही वैदिक कर्तव्यों का पालन करने का विधान है।



सृष्टि के आदि काल में मनुष्यों की उत्पत्ति एवं वेदों के प्रादुर्भाव से ही काल गणना आरम्भ कर दी गई थी जो अद्यावधि जारी है। इस समय सृष्टि संवत् 1,96,08,53,115 चल रहा है। इस लम्बी अवधि में अब से लगभग 5,100 वर्ष पूर्व महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में जनहानि हुई जिस कारण युद्ध के बाद सर्वत्र अव्यवस्था फैल गई। विगत 5000 वर्ष में देश के ज्ञानी वर्ग के आलस्य, प्रमाद आदि अनेक कारणों से वेदों का ज्ञान लुप्त हुआ जिससे अन्धविश्वास, अवैदिक परम्परायें व कुरीतियां प्रचलित हो गईं। अज्ञान व कुछ अन्य कारणों से पूर्ण अहिंसात्मक यज्ञों में पशुओं की हत्यायें की जाने लगीं। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन से वंचित कर दिया गया। देश भर में वेदों का अध्ययन समाप्त प्रायः हो गया। वेदों के अज्ञानतापूर्ण, मिथ्या व अश्लील अर्थ किये गये। सत्य वेदार्थ लुप्त प्रायः था जब कि वेदार्थ के कुछ ग्रन्थ अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरूक्त व निघण्टु आदि ग्रन्थ कुछ लोगों के पास उपलब्ध थे परन्तु इनका उपयोग नहीं किया जा रहा था। देश व समाज का पतन इस सीमा तक हुआ कि महाभारत काल तक बोलचाल व साहित्य की भाषा सर्वत्र संस्कृत ही थी परन्तु इसके बाद संस्कृत का वर्चस्व समाप्त होकर अन्य अनेक भाषायें अस्तित्व में आ गईं। इन परिस्थितियों के उत्पन्न होने से नये-नये मत यथा बौद्ध, जैन, अद्वैत, द्वैत, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि अस्तित्व में आयें। विदेशों में भी पारसी या जरदुश्त मत, यहूदी मत, ईसाई मत तथा इस्लाम मत आदि अस्तित्व में आये। यह क्रम चलता रहा और भारत में मतों की संख्या में वृद्धि होती रही। इस कारण संसार में अज्ञान फैल गया और एक ईश्वर की नाना प्रकार से स्तुति व प्रार्थनायें की जाने लगी। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के सत्य स्वरूप को जानने का प्रयास ही नहीं किया गया और न अब किया जा रहा है। सब जगह ‘अपनी अपनी ढफली, अपना अपना राग’वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अनेक मत-मतान्तर, मजहब, सम्प्रदाय व पन्थों के कारण समाज में समरसता समाप्त हो गई है। यदा-कदा यत्र-तत्र देश में साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं। सब अपने-अपने मत को श्रेष्ठ व ज्येष्ठ मानने लगे और हमारे विदेशी मतों ने तो धर्मान्तरण का कुचक्र भी चलाया। ऐसी अनेक घटनायें इतिहास में अंकित है जहां शासक वर्ग व बलवान शत्रु का मत न मानने वालों की हत्यायें कर दी जाती थी और यह कार्य बहुत बड़े पैमाने पर भारत में हुआ। सभी मतों का आपस में संवाद समाप्त हो गया और सब अपने अपने घर में शेर बन गये। सन् 1825 में महर्षि दयानन्द का जन्म होता है। वह वेदों का अध्ययन करते हैं और बहृमचर्य व योग के आधार पर अपूर्व पुरूषार्थ, तप एवं त्याग से वेदों के सत्य अर्थों को जानते हैं।  उन्होंने संसार के सभी मतों का अध्ययन किया और पाया कि सत्य धर्म केवल एक है और वह प्राचीन वेदों का धर्म है जिसे सनातन धर्म भी कहते हैं। उनको इस तथ्य का भी साक्षात हुआ कि विश्व शान्ति के लिए आवश्यक है कि सभी मतों का परस्पर संवाद हो, वार्तालाप, उपदेश, गोष्ठी, शास्त्रार्थ कर सत्य मत का निर्णय किया जाये और उस सत्य मत को सभी स्वीकार करें। उन्होंने अनेक मतों के विद्वानों से संवाद और शास्त्रार्थ भी किए जिसमें वैदिक मान्यतायें हीं  सत्य सिद्ध हुईं। बहुत से लोगों ने सत्य को स्वीकार भी किया परन्तु यह स्थिति नाममात्र की ही कही जा सकती है। इस पृष्ठ भूमि में अब हम भारत के पतन के कारणों पर विचार करते हैं और उन्नति के कारकों का भी उल्लेख करते हैं।



देश के पतन का पहला कारण तो वैदिक ज्ञान का लोप तथा असत्य व मिथ्या ज्ञान पर आधारित मतों का प्रादुर्भाव रहा जिस कारण देश में सर्वत्र अज्ञान, अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न हो गईं। इसके फलस्वरूप मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित करना, अवतारवाद की कल्पना व उसका प्रचलन, फलित ज्योतिष, जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था वा आधुनिक वर्णव्यवस्था, छुआ-छुत का प्रचलन, बाल विवाह-अनमेल विवाह व बहुविवाह, सती प्रथा, मदिरा पान, मांसाहार, अशिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान पर ध्यान न देना, निर्धनों व दुर्बलों का धनिकों व बलवानों द्वारा शोषण व उन पर अत्याचार आदि अनेक पतन के कारण समाज व देश में उपस्थित हुए। यह सब देश में चल पड़ा परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति उत्पन्न नहीं हुआ जो इनके विरूद्ध आवाज उठाता। इसका श्रेय स्वामी दयानन्द सरस्वती को मिला जिन्हें उनके गुरू स्वामी विरजानन्द सरस्वती ने असत्य का खण्डन और सत्य का मण्डन कर देश व इसके पुराने सत्य वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए प्रेरित किया था।  स्वामी दयानन्द जी ने पतन को समाप्त करने और देश व विश्व का कल्याण करने के लिए 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की और इसके 10 स्वर्णिम नियम बनाये जिनमें से एक ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये’है। दूसरा अति महत्वपूर्ण नियम यह है कि ‘अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’उनकी इस प्रेरणा से उनके प्रमुख अनुयायियों स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरूदत्त विद्यार्थी, स्वामी दर्शनानन्द, महात्मा हंसराज, पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु आदि ने गुरूकुलों व दयानन्द एंग्लो वैदिक कालेजों का देश भर में विस्तार किया। आर्य समाज के स्वर्णिम नियमों यह नियम भी हैं कि “सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये। मनुष्य को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिये। समाज का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और आत्मिक उन्नति करना।“ यह नियम यद्यपि आर्य समाज के नियम हैं परन्तु इन नियमों का कोई भी विरोधी नहीं हो सकता। इसी प्रकार से ईश्वर के स्वरूप व उसके द्वारा प्रदत्त वेद ज्ञान से सम्बन्धित नियम भी देश व काल की सीमा से परे होने के साथ मानवमात्र के लिए हितकारी हैं व जीवन की उन्नति के आधार हैं। जहां यह नियम सरल व सुबोध हैं एवं देश व समाज के लिए लाभप्रद हैं वहीं देश के नाना प्रकार के मतों व अज्ञान तथा अन्धविश्वासों में ग्रसित होने के कारण इनका क्रियान्वयन असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।



समाज की उन्नत अवस्था वह अवस्था हो सकती हैं जहां किसी के साथ पक्षपात न होता हो और न ही अन्याय। सभी देशवासी शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ, सुखी, सम्पन्न व समृद्ध हों। इसके साथ सभी का धार्मिक व सामाजिक दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक है। एक ही मत, एक जैसी परम्परायें और एक समान ही सबकी विचारधारा हो। यह उन्नति की स्थिति है और इसके विरीत जो स्थिति हो सकती है वह अवनति की स्थिति या अल्प उन्नति की स्थिति कही जा सकती है। समाज ऐसा हो जहां सभी लोग संसार की सबसे प्राचीन भाषा को बोलना व लिखना जानते हों। हिन्दी का ज्ञान भी सभी देशवासियों को होना चाहिये। इनका जो विरोध करे वह कड़े व तत्काल दण्ड से दण्डित किया जाये। इन दो भाषाओं के बाद क्षेत्रीय भाषा व अंग्रेजी का स्थान होना चाहिये। देश के लिए सर्वत्र एक समान, अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिये। वेदाध्ययन अनिवार्य होना चाहिये। वेदों की उपेक्षा सहन नहीं की जानी चाहिये। यहां यह कहना उचित होगा कि वेद किसी मत या पन्थ का ग्रन्थ नहीं अपितु साक्षात् ईश्वर से प्राप्त सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ हैं जिन पर संसार के सभी मानवेों का अधिकार है और सबको इसका अध्ययन व पालन करना परम कर्तव्य व मानव धर्म है। सभी अन्धविश्वास व कुरीतियों को सरकारी राजाज्ञा द्वारा निषिद्ध किया जाना चाहिये जिसे वेदों के विद्वान, सभी ज्ञानी, शिक्षाविद व वैज्ञानिक मिलकर तय करें। विरोध करने वालों को उचित दण्ड शीघ्रातिशीघ्र मिलना चाहिये। अज्ञान पर आधारित मतों पर प्रतिबन्ध होना चाहिये। देश में कम से कम सरकारी अवकाश हों। पुरूषार्थ की पूजा हो और पुरूषार्थहीन का असम्मान हो। गुणी लोगों को बिना किसी पक्षपात के रोजगार मिलना चाहिये और अयोग्य को समय-समय पर छानबीन कर उन्हें उनकी योग्यता व स्वभाव के अनुसार कार्य दिया जाना चाहिये। सामाजिक समरसता के लिए भी कानून हो। जो इसमें रूकावट करें वह कोई भी हों, दण्डित होने चाहियें। धन की भी एक सीमा होनी चाहिये। जो अधिक धनी हैं उनकी भी अधिकतम् सीमा होनी चाहिये। उससे अधिक धन सरकार उनके कर के रूप में लेकर उससे निर्धनों के कल्याण के कार्यक्रम चलाए जिससे सामाजिक व आर्थिक असमानता कम से कम हो। देश में एक ऐसा वातावरण बनना चाहिये जिसमें त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले अधिक सम्मानित माने जाने चाहिये और सभी को उनका यथोचित सम्मान करना चाहिये। यदि ऐसा नहीं करेंगें तो राष्ट्र उन्नत न होकर अवनति को प्राप्त होगा। अवनति के जहां अनेक कारण होते हैं वहां मांसाहार व मदिरापान भी आध्यात्मिक एवं भौतिक अवनति का कारण होता है। मदिरापान और मांसाहार सहित सभी प्रकार के नशों से मनुष्य का शरीर निर्बल होकर रोगग्रस्त हो जाता है। उसकी शारीरिक व बौद्धिक क्षमतायें स्वस्थ मनुष्य की अपेक्षा कम होती है। विलासी और व्यस्नी मनुष्यों से राष्ट्र को अधिक लाभ नहीं हो पाता जो व्यस्नों से रहित देशवासियों से होता है। अतः शासक व शासक वर्ग को इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इसके साथ देश का सामरिक दृष्टि से भी पड़ोसी देशों से कहीं अधिक बलवान होना अति आवश्यक है। संसार का कोई देश अपनी सैन्य व अन्य किसी शक्ति के कारण हमें अपनी बात मानने के लिए विवश न कर सके, इस लिए हमें उनके समान व अधिक बल व सामर्थ्य देश में उत्पन्न करना आवश्यक है। गोहत्या किसी भी देश के लिए अभिशाप व कलंक होता है। गोहत्या एक प्रकार से राष्ट्र की हत्या के समान है। ईश्वर की दृष्टि में भी यह एक जघन्य अपराध है। ऐसे नागरिक कभी भी मन की प्रसन्नता, वास्तविक सुख व शान्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। अवनति के इन कारणों को दूर करने पर ही देश उन्नति कर सकता है। आशा की जानी चाहिये कि भविष्य में यह स्वर्णिम समय अवश्य आयेगा।

मनुष्यों की सूरत हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के अनुरूप

मनुष्यों की सूरत हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के अनुरूप


सूरत मनुष्य की आकृति को कहते हैं। भारत की जनसंख्या लगभग 125 करोड़ और सारे संसार की लगभग 7 अरब से कुछ अधिक है। यह एक बड़ा आश्चर्य है कि सभी स्त्री व पुरूषों, बुजुर्गं, जवान या बच्चे, की मुखों की सूरत, चेहरा, आकृतियां, शकल, कद-काठी, रंग-रूप अलग-अलग हैं। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है? कौन इन्हें बनाता है? हम अपने उद्योगों में नाना प्रकार के उत्पाद बनाते हैं, वह सब एक जैसे होते हैं। एक ही प्रकार के उत्पादों में आकृति की दृष्टि से अन्तर करना कठिन होता है। इसलिए उन पर संख्या डालनी पड़ती है जिससे उन्हें पहचाना जा सके। परन्तु संसार में हम देखते हैं कि मनुष्य योनि में अगणित वा 7 अरब से अधिक लोग हैं। सबकी सूरत व चेहरे भिन्न-भिन्न हैं। एक ही माता-पिता से जन्म लेने वाली सन्तानें भी रूप, रंग, आकार, प्रकार, आकृति व प्रकृति में एक दूसरे से भिन्न होती हैं। इसका कारण क्या हो सकता है? इस पर धर्म को यथार्थ रूप में जानने वाले लोगों की मान्यतायें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। धार्मिक लोग भी अनेक मतों, मजहबों, सम्प्रदायों आदि में बंटे हुए है। सबकी आस्थायें, मान्यतायें व सिद्धान्त पृथक-पृथक या भिन्न-भिन्न हैं। यदि सबका तुलनात्मक अध्ययन करें और फिर गुण-दोष, युक्ति व प्रमाणों के आधार पर विवेचना करें तो यह तथ्य सामने आता है कि मनुष्य की सूरत व आकृति अर्थात् चेहरा एक ऐसी सत्ता द्वारा निर्मित है जो मनुष्य से भिन्न है व इससे अधिक ज्ञानी, शक्ति-सम्पन्न या सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अनुभवी है। वह पूर्व कल्प-कल्पान्तरों-युगों से ऐसा ही करती चली आ रही है तथा उसे इस कार्य को अर्थात् प्राणी जगत की उत्पत्ति करने व मनुष्यों के शरीर व उनकी सूरत बनाने का पूर्ण अनुभव व ज्ञान है। जब वह सत्ता पहले से ऐसा करती आ रही है तो भविष्य में भी करती रहेगी। “उस सत्ता व कर्ता को ही ईश्वर कहते हैं।“

यह बात तो ईश्वर के बारे में हुई। अब आकृति भेद या अलग-अलग सूरत होने का कारण क्या है? इस पर भी विचार करना आवश्यक है। इसका उत्तर हमें यह मिलता है कि जन्म से पूर्व जीवात्मा अन्यत्र कहीं मनुष्य या अन्य किसी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि योनियों में रहा है। हम नित्य-प्रति देखते हैं कि मनुष्य, पशु, पक्षी आदि मरते हैं और उससे भी अधिक या बराबर संख्या में नये जीव-प्राणधारी सृष्टि क्रम व नियमों के अनुसार उत्पन्न होते हैं। मृत्यु होने पर सबके शरीरों में से चेतन तत्व अर्थात् “जीवात्मा” निकल जाता है एवं निर्जीव पार्थिव शरीर जिसे मृत्यु के बाद “शव” की संज्ञा दी जाती है, हमारे सामने होता है जिसकी अन्येष्टि करके उसे पंच-तत्वों में विलीन कर दिया जाता है। यह मृत्यु को प्राप्त होकर जो चेतन तत्व शरीर से निकलता है, यह स्वभाविक है कि वह निकलने के बाद इस ब्रह्माण्ड या आकाश में रहता है। हम सब अनुभव से यह भी जानते हैं कि चेतन तत्व जीव अल्पज्ञ व सूक्ष्म तत्व है, यह प्रत्यक्ष व निर्विवाद है। जब इसका जन्म हुआ था तो यह माता-पिता के संयोग व प्राकृतिक अन्य नियमों के अनुसार जन्मा था। उसी प्रकार से अब मृतक जीवात्मा आकाश से माता के गर्भ में जाता है। यह कार्य ईश्वर करता है जिसका आधार उसकी पूर्व योनि व उससे भी पूर्व के शेष व अभुक्त कर्म, जिन कर्मों का भोग नहीं हो सका व जिनको भोगा जाना है, होते हैं जो प्रारब्ध कहलाते हैं और इस जन्म में इसी को भाग्य भी कहा जाता है। इसी के आधार पर जहां जीवात्मा को किस योनि में जन्म देना है, इसका निर्धारण ईश्वर करता है। उस जीवात्मा की उस नई, पुनर्जन्म की, योनि की आकृति क्या हो, उसका निर्धारण भी ईश्वर के द्वारा ही किया जाता है जिसका प्रमाण हमें संसार के सभी मनुष्यों व अन्य योनियों के प्राणियों को देखकर होता है। एक माता की सभी सन्तानें अलग-अलग आकृति व सूरत वाली होती हैं। इसका कारण उन जन्म लेने वाले शरीरों की आत्माओं का प्रारब्ध व भाग्य ही है। इसका अन्य कोई कारण है ही नहीं और न किसी ने सूरत की भिन्नताओं पर कोई मान्यता व सिद्धान्त अब तक स्थापित किया है।

हम प्रायः यह भी देखते हैं कि सन्तानों की सूरत में अपने माता या पिता से कुछ-कुछ साम्यता होती है। भाई व बहिनों की सूरतों में भी परस्पर साम्यता देखी जाती है। हमने दो जुड़वा बहिनें ऐसी भी देखी हैं कि जिनमें बाल्यावस्था में हम भेद नहीं कर पाते थे कि इनमें से कौन सी ऋजु नाम वाली है और कौन ऋतु नाम वाली। लेकिन माता-पिता को कभी भ्रम नहीं होता था, तो हमें आश्चर्य होता था।  यह हमें ईश्वर का करिश्मा प्रतीत होता है। ईश्वर ने यह अपवाद किया होता है, शायद् यह जताने के लिए कि मैं यद्यपि सबकी सूरतें अलग-अलग बनाता हूं परन्तु मैं दो बच्चों की सूरतें एक जैसी भी बना सकता हूं लेकिन माता-पिता भ्रमित न हों, इसलिए उन्हें भ्रम नहीं होने देता अन्यथा उन्हें उनके पालन-पोषण में कठिनाई होगी। ऐसा भी होता है कि हमारा परिचय व निकट सम्बन्ध किसी व्यक्ति से होता है तो हम उसके भाई या बहिन से अन्यत्र मिलने पर उसके हाव-भाव से उसको उस व्यक्ति से निकट सम्बन्ध के कारण अनुमान से जान लेते हैं। एक बार ऐसा हुआ कि एक बालक किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाषण दे रहा था। हम ध्यान से सुन रहे थे। उसके हाव-भाव व बोलने के तरीके से हमें लगा कि यह हमारे मित्र श्री नरेश बंसल का छोटा भाई हो सकता है। हमने श्री नरेश बंसल के माता व पिताजी को भी देखा हुआ था। जब उस बालक का भाषण समाप्त हुआ तो वह हमारे पास आकर बैठ गया। हमने धीरे से उससे पूछा कि क्या वह श्री नरेश बंसल का छोटा भाई तो नहीं है तो उसने बताया कि हां, मैं श्री नरेश बंसल जी का छोटा भाई हूं। इससे यह लगता है कि यह संसार कुछ रहस्यपूर्ण भी है। हम इसका जितना अध्ययन करते हैं उतने ही अधिक रहस्यों का हमें ज्ञान होता जाता है।

हम लोग अपने व्यवहार में “प्रकृति” शब्द का प्रयोग करते हैं। हमारा जन्म व मृत्यु, सुख व दुख, संसार की रचना व उसका संचालन, प्राकृतिक प्रकोप व विपदायें सभी को नेचर या प्रकृति का नाम देकर कह देते हैं यह सब प्रकृति करती है। अतः यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि प्रकृति जड़ है या चेतन। संसार में दो प्रकार के पदार्थ देखें जाते हैं, एक जड़ पदार्थ हैं व दूसरे चेतन पदार्थ। जड़ पदार्थों को हमारे सत्य शास्त्रों में जड़, सूक्ष्म, सत्व-रज-तम गुणों वाली प्रकृति का विकार व कार्य कहा जाता है। यह विकार स्वमेव नहीं होता अपितु सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर जो कि सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान है, उसके द्वारा किया जाता है। वह सूक्ष्म जड़ प्रकृति से कार्य जगत यथा सूर्य, चन्द्र, पृथिवी एवं पृथिवीस्थ सभी पदार्थ अग्नि, जल, वायु व आकाश आदि को बनाता है। उसी के द्वारा वन व पर्वत बनायें गये हैं और उसी ने समुद्र भी बनाया है। मनुष्य का जन्म भी उसी सत्ता ईश्वर से होता है, होता आ रहा है और होता रहेगा। यदि ईश्वर को न माने तो जड़ पदार्थों में स्वमेव संयोग करके किसी प्रयोजन को पूरा करने वाला पदार्थ बनाने की योग्यता या क्षमता तो होती नहीं है जिससे कोई भी रचना अस्तित्व में नहीं आ सकती। ईश्वर को मानना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। घर में रोटी बनाने के लिए ईधन, आटा, जल, बर्तन आदि सभी कुछ हो। उन्हें आस-पास रख दिया जाये परन्तु रोटी, कितना ही काल क्यों न बीत जाये, कभी नहीं बन सकती जिसका कारण यह है कि जड़ पदार्थो में किसी विशेष प्रयोजन को जानने व उसे पूरा करने का ज्ञान नहीं है। चेतन तत्व जीवात्मा व परमात्मा ईश्वर को यह ज्ञान है कि उन्हें प्रयोजन के अनुसार जड़ पदार्थ कारण प्रकृति व कार्य प्रकृति का प्रयोग करके इच्छित प्रयोजन को पूरा करना व सिद्ध करना है। यदि रोटी बनाने का कहीं सब समान उपस्थित हो और वहां कोई मनुष्य पहुंच जाये जिसे रोटी बनाने का ज्ञान हो तथा उसे भोजन करना हो तो वह अपने ज्ञान, बल, संस्कारों व अभ्यास को दोहरा कर रोटी बनाकर अपनी क्षुधा को तृप्त कर सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हम व्यवहार में जिसे नेचर व प्रकृति कहते हैं, वह जड़ नहीं अपितु चेतन है। जो कार्य हम संसार में देखते हैं उनकी दो श्रेणियां होती है एक अपौरूषेय कार्य व दूसरे पौरूषेय कार्य।  जिन कार्यों को संसार का काई भी मनुष्य नहीं कर सकता तथा ऐसे सभी कार्य जो हमें आंखों से दिखायी देते हैं, यथा सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि का निर्माण व संचालन तथा मनुष्य व अन्य प्राणियों को जन्म देना और उन्हें व्यवस्था में रखना आदि कार्य, वह ईश्वर व परमात्मा द्वारा किये जाते हैं जिन्हें अपौरूषेय कार्य कहते हैं। मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले व सम्भव कार्यों को पौरूषेय कार्य कहते हैं। अतः जिन कार्यों के लिए नेचर या प्रकृति शब्द का प्रयोग किया जाता है वह कार्य प्रायः ईश्वर जो कि चेतन व सर्वव्यापक तत्व है, उसके लिए प्रयोग किया जाता है। अतः हमें विदेशी लोगों का अन्धानुकरण न कर प्रकृति, नेचर व ईश्वर के अन्तर को जानना व समझना चाहिये।

हमने मनुष्यों की सूरत व उसमें भिन्नता के कारणों को समझने का प्रयास किया है। जिस प्रकार ईश्वर ने प्रकृति में भिन्न-भिन्न प्रकार के पुष्प जो मन व हृदय को आकर्षित व सम्मोहित करते हैं, जिनके रूप व सुगन्ध का शब्दों में पूरी तरह से वर्णन व मूल्याकंन करना शब्द विज्ञानियों-शास्त्रियों के लिए भी सम्भव नहीं है, उसी प्रकार से मनुष्य की नाना रंग व रूपों वाली सूरत को देख कर ईश्वर की रचना शक्ति के ज्ञान का अनुमान होता है। इस आश्चर्य को देखकर हृदय से शब्द प्रस्फुटित होते हैं, कि हे ईश्वर, ‘तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं, दृष्टि किसी की भी आया नहीं, तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं।’ईश्वर संसार का सबसे बड़ा व महान रचयिता, कारीगर, निर्माता, चिन्तक व सृष्टि को बनाने, धारण करने, चलाने व व्यवस्था करने वाली एक ऐसी महान सत्ता है जिसकी उपमा हम किसी अन्य वस्तु व सत्ता से नहीं दे सकते। वह अपनी उपमा आप ही है। इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि वह ईश्वर सत्य, चित्त व आनन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र व सृष्टिकर्ता है। उसने हमें मानव जीवन देकर, इस सृष्टि को बनाकर तथा हमारे उपयोग के लिए नाना सुखदायक पदार्थ बनाकर हम पर जो उपकार किए हैं उसके कारण इन गुणों व स्वरूप वाला ईश्वर ही हमारी स्तुति व प्रार्थना के द्वारा हमारा उपास्य देव हैं। हम उसी ईश्वर को मन, वचन व कर्म से स्वयं को समर्पित करके, उसका ध्यान व चिन्तन द्वारा गुणगान करते हुए देश, समाज व प्राणीमात्र के कल्याण के कार्यों को करके उसके कृपा पात्र बन सकते हैं। ऐसा करके हम उसके निकट पहुंच जायेगें और उसकी कृपा को प्राप्त करके उसके द्वारा प्राप्त होने वाले सुख व आनन्द का अनुभव कर सकेगें। मोह व माया में न फंस कर त्याग व समर्पण का जीवन व्यतीत कर अपने जीवन को सफल व उपयोगी सिद्ध कर सकेगें। विभिन्न मनुष्यों की भिन्न-भिन्न मुखाकृतियां व सूरतें ईश्वर की रचनायें हैं जो मुखाकृति की ओट में ईश्वर के होने व सौन्दर्यपूर्ण रचना द्वारा उसको जानने व प्राप्त करने का सन्देश दे रही हैं। आईये, सूरत बनाने वाले ईश्वर की ओर प्रस्थान करें और उसे प्राप्त करने का प्रयास करें


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

वेश्यावृत्ति और नशे द्वारा भारत और भारतीयों का चारित्रिक पतन का षड़यंत्र और इतिहास

 वेश्यावृत्ति और नशे द्वारा भारत और भारतीयों का चारित्रिक पतन का षड़यंत्र और इतिहास



अंग्रेजों ने हमें चारित्रिक रूप से, और नैतिक रूप से नीचा दिखाने के लिए, कमज़ोर बनाने के लिए, शराब के साथ एक काम और भी किया था। और उसमें भी हम भारतवासी काफी डूब गए हैं। और वह दूसरा काम यह था - भारत के वासियों को वेश्यावृत्ति के रास्ते पर धकेलना। बहुत खराब काम यह अंग्रेजों ने किया था।
आपको सुनकर ताज्जुब होगा, कि 1760 के पहले हिंदुस्तान में कोई शराब नहीं पीता था, ऐसे ही, 1760 के पहले के जो दस्तावेज़ हैं, रिकॉर्ड हैं, वे बताते हैं कि इस देश में कोई वेश्याघर नहीं था, वेश्यालय नहीं था। पूरे हिन्दुस्तान में ! ये अँगरेज़ थे जिंहोंने सबसे पहला वेश्यालय खोल सन 1760 में प्लासी के युद्ध के बाद कलकत्ते में। कलकत्ता में एक बहुत बदनाम इलाका कहा जाता है, जिसको सरकार रेड लाइट एरिया कहती है, और उसका नाम है सोनागाची। यह सोनागाची का रेड लाइट एरिया है - आपको सुनकर बहुत अफ़सोस होगा, दुःख होगा - यह अंग्रेजों का बसाया हुआ है, और अंग्रेजों का बनाया हुआ है। सन 1760 से पहले देश की किसी भी गाँव में, किसी नगर में वेश्याघर नाम की कोई भी चीज़ नहीं हुआ करती थी। तो आप बोलेंगे - मुस्लिम शासकों के ज़माने में क्या होता था? जब मुग़ल सम्राट इस देश में होते थे, मुग़ल शासक इस देश में होते थे, मुस्लिम धर्म को मानने वाले शासक इस देश में होते थे, तब क्या होता था? मुस्लिम शासकों के ज़माने में, सात सौ साल तक इस देश में, एक भी वेश्यालय नहीं बना, एक भी वेश्याघर नहीं बना। कुछ एक-दो मुस्लिम शासलों ने, जो कि अपवाद माने जाते हैं, जिनको उनके धर्म वाले भी गालियाँ देते हैं, एक ग़लत काम शुरू किया था - माताओं, बहन, बेटियों को घरों में से उठा लेना और ज़बरदस्ती उनको एक महल में रखना, उस महल का नाम हरम होता था। उस हरम में, मुस्लिम शासक अपने आमोद-प्रमोद के लिए, समय गुजारने के लिए, माताओं, बहन, बेटियों का नाच वगैरह कराया करते थे। तो, यह कुछ मुस्लिम शासकों ने किया, लेकिन वेश्यालय और वेश्याघर इस हिंदुस्तान में कभी नहीं बना।
आप बोलेंगे - पुराने ज़माने में तो हमारे देश में, हमने इतिहास में पढ़ा है, कुछ उपन्यास भी पढ़े हैं। हो सकता है आपने एक उपन्यास पढ़ा हो अपने जीवन में - वैशाली की नगर वधू। सम्राट अशोक के ज़माने की बात है, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त मौर्य के ज़माने की बात है, कि नगर वधू हुआ करती थी। हाँ, उस ज़माने में नगर वधू हुआ करती थी। लेकिन उसका काम वेश्या के काम से बिलकुल अलग होता था। नगर वधु जो होती थी, वह पूरे नगर की कोई सम्मान और इज्ज़त वाली कोई मां और बहन हुआ करती थी, और नगर वधु के शरीर को कोई भी पुरुष चाहे, तो अपनी वासना का शिकार नहीं बना सकता था। और नियम और क़ानून ऐसे थे कि नगर वधू के शरीर को कोई छू भी नहीं सकता था। आप बोलेंगे - फिर यह नगर वधू होती किसलिए थी? यह नगर वधू हुआ करती थी, समाज के लोगों को संगीत की तालीम देने के लिए, शिक्षा देने के लिए। जैसे, नृत्य सिखाने के लिए। जैसे गायन सिखाने के लिए। जैसे वाद्य सिखाने के लिए। वह संगीत की कला में बहुत निपुण कलाकार हुआ करती थी, और उनके द्वारा संगीत कला का शिक्षण और प्रशिक्षण का काम चला करता था। सम्राट अशोक के ज़माने में, सम्राट चन्द्रगुप्त के ज़माने में, सम्राट हर्षवर्धन के ज़माने में, सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के ज़माने में, जितने भी भारत में चक्रवर्ती सम्राट रहे हैं, उनके ज़माने जो नगर वधुएँ हुआ करती थीं, वे संगीत का शिक्षण और प्रशिक्षण देने वाली उच्च, इज्ज़तदार, बहुत रौबदार महिलायें हुआ करती थीं। वे अपने शरीर का सौदा करने वाली सामान्य वेश्याएं नहीं हुआ करती थीं।
तो, नगर वधू एक अलग बात थी, हरम में महिलाओं का रहना बिलकुल अलग बात थी। अंग्रेजों ने क्या किया - भारत वासियों के चरित्र को पूरी तरह ख़त्म कर देने के लिए सबसे पहली बार एक वेश्याघर खोल दिया और वह वेश्याघर सोनागाची का, कलकत्ता का वेश्याघर बन गया। अंग्रेजों ने वहां क्या किया - 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद रोबर्ट क्लाइव ने कलकत्ता को लूटा, इतिहास में आपने पढ़ा होगा, न सिर्फ कलकत्ता के धन संपत्ति को लूटा, बल्कि जिन घरों में वह गया, उन घरों की माताओं, बहन, बेटियों की इज्ज़त और आबरू को भी लूटा। और ऐसे सैंकड़ों घर थे जहां अँगरेज़ घुस गए, और उनहोंने हमारी मां, बहन बेटियों की आबरू को तार-तार कर दिया। फिर उन मां बहन, बेटियों का समाज में कोई रखवाला नहीं रहा। घर वालों ने उनको निकाल दिया, समाज ने उनको तिरस्कृत कर दिया और अंग्रेजों ने उन की इज्ज़त से खिलवाड़ किया। तो ऐसी मां, बहन, बेटियों को पकड़ पकड़ कर अंग्रेजों ने वेश्या बना दिया और नियमित रूप से उनके यहाँ अँगरेज़ सैनिक अपनी वासना की शांति के लिए, अपनी भूख की शांति के लिए, शारीर वासना की शांति के लिए जाया करते थे। और, धीरे-धीरे यह वेश्याघर कलकत्ता से आगे बढ़ कर भारत के दूसरे नगरों में फैलते चले गए। अंग्रेजों ने जहां जहां कब्ज़ा किया, जैसे कलकत्ता में, जैसे पूना में, जैसे पटना में, जैसे दिल्ली में, जैसे मुंबई में, मद्रास में, बगलौर में, हैदराबाद में, सिकंदराबाद में, ऐसे 350 बड़े शहरों में अंग्रेजों ने कब्ज़ा करके अपनी छावनियां बनायीं, और हर छावनी में अंग्रेजों ने एक-एक वेश्याघर बना दिया।
पहले क्या होता था - इन छावनी में दूसरे देशों से गुलाम बनाकर लायी लडकियां रखी जाती थीं। फिर भारत की मां , बहन, बेटियाँ जिनकी इज्ज़त अँगरेज़ तार-तार करते थे, उनको रखवाना शुरू किया। और धीरे-धीरे यह काम बढ़ता गया, और बहुत दुःख और अफ़सोस की बात है कि हज़ारों-हज़ारों मां, बहन, बेटियों को अपनी इज्ज़त गंवा कर, अपनी अस्मत गंवा कर, अंग्रेजों की इस क्रूरता का शिकार होना पडा, अंग्रेजों की पिपासा का शिकार होना पडा, और उनको मजबूरी में यह वेश्या- धर्म अपनाना पडा। परिणाम उसका क्या हुआ - ऐसी वेश्याओं की संख्या बढती चली गयी, और वेश्याघरों की भी संख्या बढती चली गयी।
अफ़सोस है के अँगरेज़ चले गए 15 अगस्त 1947 को, तो वेश्यावृत्ति ख़त्म होनी चाहिए थी। अंग्रेजों के जाने के बाद यह ग़लत काम इस देश में बंद होना चाहिए था, क्योंकि अंग्रेजों ने अपने शरीर की पिपासा को शांत करने के लिए यह दुष्कर्म शुरू किया था, तो अंग्रेजों के जाने के बाद इसे क्यूं चलते रहना चाहिए ?
लेकिन बहुत दुःख और अफ़सोस की बात है, कि अंग्रेजों के जाने के बासठ साल के बाद भारतीय लोगों के नैतिक और चारित्रिक पतन करने वाला यह वेश्यावृत्ति का काम और तेज़ी से बढ़ गया है, और तेज़ी से फल-फूल रहा है, और ज्यादा पैमाने पर वेश्याघर खुल रहे हैं, और ज्यादा पैमाने पर हमारी मां, बहन, बेटियों को मजबूरी में इस व्यापार में धकेला जा रहा है। आंकड़ों में अगर मैं बात करूं तो, आपको सुनकर हैरानी होगी, 1760 में अंग्रेजों ने जो पहला वेश्याघर खोला था उसमें 200 के लगभग वेश्याएं हुआ करती थीं। अब आजादी के बासठ साल के बाद इस देश में, अंग्रेजों के जाने के बाद जब काले अंग्रेजों का शासन आगया है, अर्थात भ्रष्ट भारतीयों का शासन आगया है, तो सरकार के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 20 लाख 80 हज़ार माताएं, बहनें वेश्यावृत्ति के काम में लग गयी हैं। अंग्रेजों के पहले, या अंग्रेजों के समय में, 200 माताएं, बहनें मुश्किल से इस काम में थीं। अब अंग्रेजों के जाने के बासठ साल के बाद बीस लाख अस्सी हज़ार माताएं, बहनें इस वेश्यावृत्ति के काम में हैं।
औत गैर-सरकारी आंकड़ों की अगर बात की जाए, जो संस्थाएं वेश्याओं के उद्धार के लिए काम करती हैं, वेश्याओं को इस वेश्यावृत्ति से बाहर निकालने के लिए जो संस्थाएं भारत में काम करती हैं उनके आंकड़ों को अगर मैं आपको बताऊँ, तो उनका कहना है कि भारत में करीब एक करोड़ पचास लाख से ज्यादा माताएं, बहनें, जिनको मजबूरी में यह वेश्यावृत्ति का काम करना पड़ रहा है।
उनकी मजबूरी क्या है - एक मजबूरी है उनकी सबसे बड़ी कि उनका पति शराबी है। एक मजबूरी दूसरी उनकी यह कि उनका पति उनको मारता-पीटता है। आप जानते हैं, हमारे देश की मां, बहन, बेटियों के साथ घरेलू हिंसा बहुत बड़े पैमाने पर होती है। पति अगर शराबी हो जाये तो पत्नी को पीटता है, और इतना पीटता है कि पत्नी घर छोड़कर भागने के लिए विवश हो जाती है, और ज़्यादातर माताएं और बहनें जब पत्नी के रूप में घर छोड़ने को विवश हो जाती हैं, तो वे जाने- अनजाने वेश्याघर में पहुँच जाती हैं, और हमारे देश में एक करोड़ पचास लाख माताएं और बहनें, जो गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार वेश्यावृत्ति के काम में लगी हुई हैं, उनमें से 34% माताएं, बहनें ऐसी हैं जो अपने शराबी पति के दुष्कर्म के चलते, पति से मार खाते-खाते, पिटते-पिटते, परेशान होकर, मजबूर होकर घर छोड़कर भागी हैं और इस काम में लग गयी हैं।
इसका मतलब - उन्होंने अपनी इच्छा से यह काम नहीं स्वीकार किया है। इसका मतलब - उन्होंने अपनी सद्भावना से अपने आप को इस काम में नहीं लगाया है। उनकी एक बहुत बड़ी मजबूरी है, जिसने उनको मजबूर किया है इस काम में लगने के लिए। और इस से भी ज्यादा दुःख की बात है, कि इन डेढ़ करोड़ माताओं, बहनों में, 18 साल से कम उम्र की माताओं, बहनों की संख्या 30% से ज्यादा है। 18 साल से कम उम्र की बहनें, बेटियाँ 30 प्रतिशत से ज्यादा हैं, जो इस वेश्यावृत्ति के रैकेट में धकेली गयी हैं। आपको मालूम है, कि यह बहुत बड़ा एक रैकेट चलता है। उड़ीसा में काफी ग़रीबी वाला इलाका है। हिंदुस्तान के सबसे ग़रीब इलाकों में कालाहांडी, हिंदुस्तान के सबसे ग़रीब इलाकों में बोलांगीर, हिंदुस्तान के सबसे ग़रीब इलाकों में ढेंकानाल, आदि जिले हैं। आपको पता है - हिन्दुस्तान के सबसे ग़रीब जिलों में से छः जिले उड़ीसा में ही पड़ते हैं। तो वहां क्या होता है - ग़रीबी के कारण कोई भी बाप, कोई भी मां, अपनी बेटी और बेटे को बेच देने के लिए मजबूर होते हैं। बेटी बिक जाती है, तो वेश्याघर में पहुँच जाती है। बेटा बिक जाता है तो किसी के घर में नौकर बनकर पहुँच जाता है। तो उड़ीसा के ग़रीबी वाले इलाके से, झारखंड के ग़रीबी वाले इलाके से, बंगाल के ग़रीबी वाले इलाके से, आसाम के ग़रीबी वाले इलाके से, और उत्तर-पूर्व के ग़रीबी वाले इलाके से, और भारत के अन्य ग़रीबी वाले इलाकों से, मां, बहन, बेटियों को मजबूरी में जो माता, पिता बेच रहे हैं, और दलाल लोग उनको खरीद कर वेश्याघरों में लाकर डाल रहे हैं, यह दूसरा बड़ा दुश्चक्र है जो हमारे देश में यह चल रहा है।
और एक तीसरा बड़ा दुश्चक्र जो हमारे देश में है, कि बहुत सारी माता, बहन, बेटियाँ जिनको पैसे की इतनी ज्यादा आकांक्षा हो गयी है, कि थोड़े से पैसों में उनका गुज़ारा नहीं चलता - उनको बहुत ज्यादा पैसा चाहिए अपना जीवन चलाने के लिए, बहुत ज्यादा पैसा चाहिए खर्च चलाने के लिए, जिनके खर्च हज़ार, दो हज़ार, पांच हज़ार में पूरे नहीं होते, जिनके रोज़-मर्रा के खर्च हज़ारों में होते हैं, दस-पंद्रह-बीस हज़ार से कम में जिनका जीवन नहीं चल सकता, ऐसी मां, बहन, बेटियों ने इच्छा के साथ इस पेशे में अपने को डाल दिया है, और हम उनको एक अंग्रेजी शब्द से संबोधित करते हैं - कॉल गर्ल। ये कॉल गर्ल वो बेटियाँ हैं, वो बहनें हैं, जो अपनी इच्छा से इस 'बिज़नेस' में आई हैं, और मात्र पैसे के लिए अपने शरीर की नुमाईश करके, अपने शरीर को बेच कर इस काम में लगी हुई हैं।
तो तीन स्तर पर यह दुष्कर्म इस देश में चल रहा है, और इस देश के करोड़ों लोगों की नैतिकता और चरित्र को तार-तार कर दिया है। पहले वेश्याघरों में अँगरेज़ सैनिक जाया करते थे अपने शरीर की आग शांत करने लिए, अब उन्हीं वेश्याघरों में हमारे भारतवासी जा रहे हैं, शरीर की आग शांत करने लिए। और जो जा रहे हैं, वे चरित्र और नैतिकता में गिरते ही जा रहे हैं, डूबते ही जा रहे हैं। उनके पैरों में इतनी ताक़त नहीं है, उनके संकल्प में इतना दम नहीं है, कि समाज के दूसरे लोगों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकें।
तो यह दूसरा बड़ा दुश्चक्र हमारे देश में है - शराब के बाद वेश्यावृत्ति का, जिसमें हम काफी कुछ डूब गए हैं और करोड़ों भारतवासी इसमें शिकार हो गए हैं। तो मैं भारत स्वाभिमान की तरफ से एक अपील करना चाहता हूँ, कि हमको इस वेश्यावृत्ति को ख़त्म करने का आन्दोलन चलाना पड़ेगा - आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों। जैसे शराब में डूबे हुए बीस बाइस करोड़ भारतवासियों को हम निकालना चाहते हैं, और उनको उच्च चरित्र और उच्च नैतिकता देना चाहते हैं, वैसे ही इस वेश्त्यावृत्ति के घृणित काम में डूबी हुई बहनों, बेटियों को निकालना है और इस घृणित काम में लगे हुए भाइयों को भी इसमें से बाहर निकालना है। और इसके लिए बड़े पैमाने पर, पूरी ताक़त से इस काम में लगना पड़ेगा। अपने जीवन के सामने एक उच्च आदर्श और रखें। पहला आदर्श अपने रखा है - व्यसनमुक्त भारतवर्ष बनाना, व्यसनमुक्त भारतीय समाज बनाना, तो दूसरा - वासनामुक्त भारत बनाना, वासनामुक्त भारतीय समाज बनाना। यह भी दूसरा बड़ा आदर्श हमें रखना पड़ेगा, तभी जाकर कोई बड़ी सामजिक क्रांति हम कर पायेंगे। आर्थिक क्रांति करना बहुत आसान काम है, राजनैतिक क्रान्ति करना भी बहुत आसान काम है, लेकिन सामजिक क्रांति करना, नैतिक क्रांति करना, चारित्रिक क्रांति करना बहुत मुश्किल काम होता है, बहुत ऊंचा काम होता है। इसको करने वाले भी विरले होते हैं, और करने वाले भी संख्या में बहुत कम होते हैं। तो आप सभी से मेरी विनम्र प्रार्थना है, विनम्र निवेदन है कि इस वासना में डूबे हुए भाइओं को, और इस वासना के कीचड में लिपटी हमारी मां, बहनों, बेटियों को जल्दी से जल्दी निकालने के लिए कमर कसकर अपने अपने स्थानीय स्तर पर अभियान चलायें, और इस अभियान को एक सार्थक और सफल मुकाम तक पहुंचाएं।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

विजयादशमी पर्व का पावन सन्देश



विजयादशमी पर्व का पावन सन्देश

भारतवर्ष पर्व प्रधान देश है। भारतवर्ष के समस्त पर्वों का सम्बन्ध प्रकृति की रमणीय ऋतुओं से है। प्राचीनकाल में वर्षाकाल के चातुर्मास्य में (चौमासा) वर्षा की अधिकता होने के कारण यातायात प्रायः रुका रहता था। यातायात के साधन इतने अधिक नहीं थे। सड़कों, राजमार्गों की बहुतायत न थी। इसलिए क्षत्रिय वर्ग की विजय यात्रा एवं वैश्यों की व्यापार यात्रा वर्षाकालीन चातुर्मास्य में रुकी रहती थी। वर्षा की समाप्ति पर जब शरद्‌ ऋतु का आगमन होता था, तब इन रुकी हुई यात्राओं को पुनः प्रारम्भ किया जाता था।
    ऐसे समय में दिग्विजय यात्रा और व्यापार यात्रा के पुनः प्रारम्भ की तैयारियॉं एवं विजयादशमी उत्सव का समारम्भ शुरू होता था। (राजन्य) क्षत्रियवर्ग अपने औजारों की साज-सज्जा स्वच्छता का ध्यान, व्यापारी वर्ग अपने बही- खाते आदि की तैयारियॉं आश्विन सुदी प्रतिपदा से आरम्भ कर आश्विन सुदी विजयादशमी तक पूर्ण कर लिया करते थे।
    प्राचीन काल में विजयादशमी के दिन यज्ञशाला को सुसज्जित कर चतुरंगिणी सेना जिसमें अश्व, हाथी, रथ, पदाति का क्रमबद्ध खड़ा करके उनकी नीराजना (आरती) विधि सम्पन्न की जाती थी। जिसका उल्लेख महाकवि कालिदास अपने रघुवंश महाकाव्य में महाराज रघु की नीराजना विधि का निम्न पद्य में वर्णन करते हैं।
तस्मै सम्यग्द्युतो वह्निद्युतो वह्निर्वाजिनीराजनाविधौ।
प्रदक्षिणार्चिर्व्याजेन हस्तेनैव जयं ददौ।।
    (रघुवंश चतुर्थ सर्ग 24वां श्लोक)
    महाराज रघु अश्वादि की नीराजना विधि कर रहे थे। श्लोक का भाव ही है कि अग्नि की ज्वालाएं प्रज्वलित हो रही थी। कवि की उत्प्रेक्षा का चमत्कार तो देखिये मानो वह अग्नि जो दक्षिण की ओर बल खा-खाकर लपेटे ले रही थी, प्रज्ज्वलित हो रही थी। वह अपने दाहिने हाथ से मानो रघु को विजय प्रदान कर रही हो। इस प्रकार नीराजना का शुभ अनुष्ठान विजय यात्रा के लिए शुभ सूचक माना जाता था।
    तात्पर्य यही है कि विजयादशमी के दिन से दिग्विजय यात्रा और व्यापार यात्रा निर्बाध गति से प्रारम्भ हो जाया करती थी।
    इस पर्व पर सब लोग आपस में एक दूसरे के साथ प्रेम भाव से मिलते थे। एक दूसरे के प्रति  जो मनोमालिन्य था वह प्रायः समाप्त कर आपस में प्रेम भाव से परस्पर एक दूसरे की उन्नति की भावना अपने मनों में संजोये हुए सबके कल्याण के लिए प्रयत्न किया करते थे। वैदिक युग वा प्राचीनकाल में विजयादशमी का  शुद्ध स्वरूप इतना ही प्रतीत होता है।
    पश्चात्‌ इस पर्व का सम्बन्ध रावण वध लंका विजय के साथ जोड़ दिया गया, जो कि पौराणिक मान्यताओं पर ही आधारित है। भविष्य उत्तर पुराण में विजयादशमी के दिन शत्रु का पुतला बनाकर उसके हृदय को बाण से वेधने का उल्लेख मिलता है। सम्भव है पीछे में यह पुतला रावम का रूप समझा जाने लगा हो और उसको रामलीला के राम के हाथ से वध कराने की प्रथा चल पड़ी हो।
    श्रीराम के राजतिलक का मास चैत्र था और उसी मास राम को वनवास दिया गया। अतः 14 वर्ष के वनवास की समाप्ति भी चैत्र मास में ही सम्भव है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में (सर्ग 3 श्लोक 4) लिखा है-
चैत्र श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पित काननः।
यौवराज्यस्य रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्‌।।
    इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट विदित होता है कि श्री रामचन्द्र जी की विजयतिथि चैत्र कृष्ण अमावस को है।
    वस्तुतः हमारे सभी पर्वों का जो वास्तविक रूप था उसको हम भूलते जा रहे हैं। केवल ब्राह्माडम्बर (दिखावा) मात्र रह गया है। महान्‌ पुरुषों के दिव्य जीवन आदर्शों को हम अपनाने को तैयार नहीं हैं। भगवान्‌ राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। क्यों? क्योंकि वे स्वयं अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते थे। वे अपने नियमों को नहीं तोड़ते थे। मर्यादा की रेखा को कभी न लांघने का संकल्प पूरा करने वाले राम का व्यक्तित्व समद्र के समान गहरा है। वे पुरुष से पुरुषोत्तम बन गये। मर्यादा की रक्षा करने समुद्र की श्रद्धा पूर्णिमा की रात को नजर आती है जब लगता है कि उसका पानी पूरी दुनिया को लांघ जायेगा पर वह पानी को किनारे की मर्यादा नहीं लांघने देता और सारे ज्वार को अपने पेट में समा लेता है। राम का जीवन भी ऐसा ही है। उन्होंने जीवन भर मर्यादाओं का पालन किया, अतिक्रमण नहीं। उनकी मर्यादाओं व गुणों की चर्चा स्वयं वाल्मीकि ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही करते हैं। श्रीराम समुद्र के समान गम्भीर, विष्णु के समान पराक्रमी,हिमालय के भांति धैर्यवान्‌, धर्म के रक्षक, वेद-वेदांगों के ज्ञाता, सत्यवादी,परोपकारी, दृढ़चरित्र, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, समदर्शी सज्जनों के प्रिय किन्तु शत्रुओं का मानमर्दन करने वाले आर्य पुरुष हैं।
    आदर्श पुरुष राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। उन्होंने सर्वदा मर्यादा का पालन किया। जिस कैकेयी के कारण उन्हें वन जाना पड़ा, भरत कहते हैं कि मैं इसका वध कर दूँ। किन्तु आदर्श पुरुष श्रीराम की मर्यादा देखिये। भरत से कहते हैं- हे भरत! तुम्हारी माता ने चाहे स्नेह के कारण या लोभ के कारण यह कार्य किया है इसे तुम मन में मत रखना। सदा उनके साथ माता के समान व्यवहार करना।यह आदर्श पुरुष राम की मर्यादा है।
    राम की मर्यादा का एक और दृश्य। रावण का वध हो जाता है। उस समय राम विभीषण से कहते हैं- मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम्‌। अर्थात्‌ मृत्यु के अनन्तर वैरभाव समाप्त हो जाते हैं। हे विभीषण! यह अब जैसे तुम्हारा भाई है वैसा मेरा भी। तुम इनका सम्मानपूर्वक दाह संस्कार करो।
    आदर्श राम स्नेह के भण्डार थे। उनका मातृप्रेम भ्रातृप्रेम, पितृप्रेम सर्वविदित है। किन्तु वे गुहराज निषाद्‌, सुग्रीव, विभीषण आदि से भी समान भाव से स्नेह रखते थे।
    राम अपने राज्य में प्रजा को किसी भी दशा में दुःखी नहीं देख सकते थे। संस्कृत के महान्‌, कवि भवभूति ने ठीक ही लिखा है- स्नेह, दया,मित्रता अथवा सीता को भी प्रजा की रक्षा के लिए छोड़ने में मुझे कोई व्यथा नहीं होगी।
    वे आदर्श विद्वान्‌ थे। वेद-वेदांगों के ज्ञाता थे। उन्होंने वैदिक मन्त्रोें को मानो अपने जीवन में ही उतार लिया था- अनुव्रतः पितु पुत्रो मात्रा भवतु सम्मना। इसलिए वे आदर्श पुत्र बने। अपनी तीनों माताओं के प्रति उनका समान भाव था। अपने पिता के प्रति उनकी भक्ति अटूट थी। कैकेयी से पूछते हैं- पिताजी क्यों अप्रसन्न हैं? आप बताइये। श्रीराम कहते हैं कि पिताजी की प्रसन्नता के लिए मैं अग्नि में कूद सकता हूँ। समुद्र में छलांग लगा सकता हूँ। तीक्ष्ण विष पी सकता हूँ। आप बताएं कि राजा क्या चाहते हैं। मैं उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। राम दो वचन नहीं बोलता। वह तो कह देता है उसे पूरा करके ही छोड़ता है-
तद्‌ ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम्‌।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते।।
    (अयोध्याकाण्ड 18.28.30)
    राम आदर्श पुत्र तो थे ही, वे आदर्श भाई  भी थे। लक्ष्मण के शक्ति लगने पर वे कितने रोये थे! सुषेण से कहते हैंकि मैंने पूर्वजन्म में न जाने क्या दुष्कर्म किया था, जिसके फलस्वरूप मेरा धार्मिक भ्राता मेरे सामने मर रहा है। (युद्धकाण्ड 101.19)
    एक आदर्श पति बनकर वैदिक संस्कृति का सन्देश फैलाते रहे। मित्रता धर्म निभाया। सुग्रीव को मित्र बनाया तो किष्किन्धा का राज्य उसे ही दे दिया। गुरुभक्त थे। गुरुजनों के प्रति सदा सम्मान की भावना रखते थे। वसिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम सभी के वे प्रिय पात्र थे।
    यज्ञप्रेमी थे। पांच महायज्ञों का अनुष्ठान करना उनके जीवन का अनिवार्य अंग बन गया था। अपने कर्त्तव्य कर्मों के करने में भी कभी भी आलस्य व प्रमाद नहीं करते थे। जब क्षत्रिय ने धनुष ले लिया तो दुखियों की चीत्कार फिर कहॉं हो सकती है? देखें अरण्य काण्ड-क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति। वे शरणागतपालक थे। जो भी उनकी शरण में आया वह अपने जीवन में तर गया।      सदाचार के वे मानो पुतले थे- न रामः परदारान्‌ स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति (अयोध्या काण्ड)। वे मातृवत्‌ परदारेषु का व्यवहार करते थे।
    ईश्वरभक्ति उनके जीवन का अनिवार्य अंग था। सन्ध्या, अग्निहोत्र, जप,तप इन सबका पालन करना जीवन का अभिन्न उद्देश्य था।
    ऐसा कोई नहीं था जो उनके जीवन में न खिल उठा हो। महापुरुषों का लक्षण तो यही है कि मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्‌। वे मन-वचन-कर्म से एक थे। इसलिए श्रीराम का पावन चरित्र उनके अनुकरणीय गुण-कर्म-स्वभाव तथा आदर्श सार्वकालिक, सार्वदेशिक तथा सार्वजनिक जीवनों के लिए अनुपम एवं उपयोगी हैं। वे आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने श्रीराम के समय लाखों वर्ष पूर्व थे। उनके जाज्वल्यमान आदर्श वर्तमान में भूले-भटके हुए लक्ष्यहीन एवं अशान्त भारतीयों के लिए प्रकाश स्तम्भ हैं।
    आज हम केवल इतना ही मानकर सन्तोष न कर लें कि उन्होेंने रावण जैसे अन्यायी, अत्याचारी का वध कर दिया तथा हम भी रावण के पुतले जलाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लें। आज के इस भौतिक वातावरण में जिनके अन्दर रावणीय भावनाएं कूट-कूटकर भरी हुई हैं, वे जीवन से उनको सम्पूर्णतया निकालकर "अच्छे इंसान' बनने का संकल्प लें।
    वस्तुतः आदर्श राम के जीवन की पद्धति, आदर्श राजनीति और जन-जन में व्याप्त प्रीति हमारी वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान देने में पूर्णतः समर्थ हो सकती है। आत्मीयता, विश्वबन्धुता, सर्वसमभाव, प्राणियों में सद्‌भावना आदि तथा संघटन, एकता व प्रेम के भाव उत्पन्न करने में श्रीराम के अनुकरणीय जीवन पद्धति से हम कुछ प्रेरणा अपनाकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण करने का सत्प्रयास करेंगे। विजयादशमी पर्व की पाठकों को अनेकानेक शुभकामनाएँ।

भारतवर्ष पर्व प्रधान देश है। भारतवर्ष के समस्त पर्वों का सम्बन्ध प्रकृति की रमणीय ऋतुओं से है। प्राचीनकाल में वर्षाकाल के चातुर्मास्य में (चौमासा) वर्षा की अधिकता होने के कारण यातायात प्रायः रुका रहता था। यातायात के साधन इतने अधिक नहीं थे। सड़कों, राजमार्गों की बहुतायत न थी। इसलिए क्षत्रिय वर्ग की विजय यात्रा एवं वैश्यों की व्यापार यात्रा वर्षाकालीन चातुर्मास्य में रुकी रहती थी। वर्षा की समाप्ति पर जब शरद्‌ ऋतु का आगमन होता था, तब इन रुकी हुई यात्राओं को पुनः प्रारम्भ किया जाता था।
    ऐसे समय में दिग्विजय यात्रा और व्यापार यात्रा के पुनः प्रारम्भ की तैयारियॉं एवं विजयादशमी उत्सव का समारम्भ शुरू होता था। (राजन्य) क्षत्रियवर्ग अपने औजारों की साज-सज्जा स्वच्छता का ध्यान, व्यापारी वर्ग अपने बही- खाते आदि की तैयारियॉं आश्विन सुदी प्रतिपदा से आरम्भ कर आश्विन सुदी विजयादशमी तक पूर्ण कर लिया करते थे।
    प्राचीन काल में विजयादशमी के दिन यज्ञशाला को सुसज्जित कर चतुरंगिणी सेना जिसमें अश्व, हाथी, रथ, पदाति का क्रमबद्ध खड़ा करके उनकी नीराजना (आरती) विधि सम्पन्न की जाती थी। जिसका उल्लेख महाकवि कालिदास अपने रघुवंश महाकाव्य में महाराज रघु की नीराजना विधि का निम्न पद्य में वर्णन करते हैं।
तस्मै सम्यग्द्युतो वह्निद्युतो वह्निर्वाजिनीराजनाविधौ।
प्रदक्षिणार्चिर्व्याजेन हस्तेनैव जयं ददौ।।
    (रघुवंश चतुर्थ सर्ग 24वां श्लोक)
    महाराज रघु अश्वादि की नीराजना विधि कर रहे थे। श्लोक का भाव ही है कि अग्नि की ज्वालाएं प्रज्वलित हो रही थी। कवि की उत्प्रेक्षा का चमत्कार तो देखिये मानो वह अग्नि जो दक्षिण की ओर बल खा-खाकर लपेटे ले रही थी, प्रज्ज्वलित हो रही थी। वह अपने दाहिने हाथ से मानो रघु को विजय प्रदान कर रही हो। इस प्रकार नीराजना का शुभ अनुष्ठान विजय यात्रा के लिए शुभ सूचक माना जाता था।
    तात्पर्य यही है कि विजयादशमी के दिन से दिग्विजय यात्रा और व्यापार यात्रा निर्बाध गति से प्रारम्भ हो जाया करती थी।
    इस पर्व पर सब लोग आपस में एक दूसरे के साथ प्रेम भाव से मिलते थे। एक दूसरे के प्रति  जो मनोमालिन्य था वह प्रायः समाप्त कर आपस में प्रेम भाव से परस्पर एक दूसरे की उन्नति की भावना अपने मनों में संजोये हुए सबके कल्याण के लिए प्रयत्न किया करते थे। वैदिक युग वा प्राचीनकाल में विजयादशमी का  शुद्ध स्वरूप इतना ही प्रतीत होता है।
    पश्चात्‌ इस पर्व का सम्बन्ध रावण वध लंका विजय के साथ जोड़ दिया गया, जो कि पौराणिक मान्यताओं पर ही आधारित है। भविष्य उत्तर पुराण में विजयादशमी के दिन शत्रु का पुतला बनाकर उसके हृदय को बाण से वेधने का उल्लेख मिलता है। सम्भव है पीछे में यह पुतला रावम का रूप समझा जाने लगा हो और उसको रामलीला के राम के हाथ से वध कराने की प्रथा चल पड़ी हो।
    श्रीराम के राजतिलक का मास चैत्र था और उसी मास राम को वनवास दिया गया। अतः 14 वर्ष के वनवास की समाप्ति भी चैत्र मास में ही सम्भव है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में (सर्ग 3 श्लोक 4) लिखा है-
चैत्र श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पित काननः।
यौवराज्यस्य रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्‌।।
    इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट विदित होता है कि श्री रामचन्द्र जी की विजयतिथि चैत्र कृष्ण अमावस को है।
    वस्तुतः हमारे सभी पर्वों का जो वास्तविक रूप था उसको हम भूलते जा रहे हैं। केवल ब्राह्माडम्बर (दिखावा) मात्र रह गया है। महान्‌ पुरुषों के दिव्य जीवन आदर्शों को हम अपनाने को तैयार नहीं हैं। भगवान्‌ राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। क्यों? क्योंकि वे स्वयं अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते थे। वे अपने नियमों को नहीं तोड़ते थे। मर्यादा की रेखा को कभी न लांघने का संकल्प पूरा करने वाले राम का व्यक्तित्व समद्र के समान गहरा है। वे पुरुष से पुरुषोत्तम बन गये। मर्यादा की रक्षा करने समुद्र की श्रद्धा पूर्णिमा की रात को नजर आती है जब लगता है कि उसका पानी पूरी दुनिया को लांघ जायेगा पर वह पानी को किनारे की मर्यादा नहीं लांघने देता और सारे ज्वार को अपने पेट में समा लेता है। राम का जीवन भी ऐसा ही है। उन्होंने जीवन भर मर्यादाओं का पालन किया, अतिक्रमण नहीं। उनकी मर्यादाओं व गुणों की चर्चा स्वयं वाल्मीकि ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही करते हैं। श्रीराम समुद्र के समान गम्भीर, विष्णु के समान पराक्रमी,हिमालय के भांति धैर्यवान्‌, धर्म के रक्षक, वेद-वेदांगों के ज्ञाता, सत्यवादी,परोपकारी, दृढ़चरित्र, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, समदर्शी सज्जनों के प्रिय किन्तु शत्रुओं का मानमर्दन करने वाले आर्य पुरुष हैं।
    आदर्श पुरुष राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। उन्होंने सर्वदा मर्यादा का पालन किया। जिस कैकेयी के कारण उन्हें वन जाना पड़ा, भरत कहते हैं कि मैं इसका वध कर दूँ। किन्तु आदर्श पुरुष श्रीराम की मर्यादा देखिये। भरत से कहते हैं- हे भरत! तुम्हारी माता ने चाहे स्नेह के कारण या लोभ के कारण यह कार्य किया है इसे तुम मन में मत रखना। सदा उनके साथ माता के समान व्यवहार करना।यह आदर्श पुरुष राम की मर्यादा है।
    राम की मर्यादा का एक और दृश्य। रावण का वध हो जाता है। उस समय राम विभीषण से कहते हैं- मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम्‌। अर्थात्‌ मृत्यु के अनन्तर वैरभाव समाप्त हो जाते हैं। हे विभीषण! यह अब जैसे तुम्हारा भाई है वैसा मेरा भी। तुम इनका सम्मानपूर्वक दाह संस्कार करो।
    आदर्श राम स्नेह के भण्डार थे। उनका मातृप्रेम भ्रातृप्रेम, पितृप्रेम सर्वविदित है। किन्तु वे गुहराज निषाद्‌, सुग्रीव, विभीषण आदि से भी समान भाव से स्नेह रखते थे।
    राम अपने राज्य में प्रजा को किसी भी दशा में दुःखी नहीं देख सकते थे। संस्कृत के महान्‌, कवि भवभूति ने ठीक ही लिखा है- स्नेह, दया,मित्रता अथवा सीता को भी प्रजा की रक्षा के लिए छोड़ने में मुझे कोई व्यथा नहीं होगी।
    वे आदर्श विद्वान्‌ थे। वेद-वेदांगों के ज्ञाता थे। उन्होंने वैदिक मन्त्रोें को मानो अपने जीवन में ही उतार लिया था- अनुव्रतः पितु पुत्रो मात्रा भवतु सम्मना। इसलिए वे आदर्श पुत्र बने। अपनी तीनों माताओं के प्रति उनका समान भाव था। अपने पिता के प्रति उनकी भक्ति अटूट थी। कैकेयी से पूछते हैं- पिताजी क्यों अप्रसन्न हैं? आप बताइये। श्रीराम कहते हैं कि पिताजी की प्रसन्नता के लिए मैं अग्नि में कूद सकता हूँ। समुद्र में छलांग लगा सकता हूँ। तीक्ष्ण विष पी सकता हूँ। आप बताएं कि राजा क्या चाहते हैं। मैं उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। राम दो वचन नहीं बोलता। वह तो कह देता है उसे पूरा करके ही छोड़ता है-
तद्‌ ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम्‌।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते।।
    (अयोध्याकाण्ड 18.28.30)
    राम आदर्श पुत्र तो थे ही, वे आदर्श भाई  भी थे। लक्ष्मण के शक्ति लगने पर वे कितने रोये थे! सुषेण से कहते हैंकि मैंने पूर्वजन्म में न जाने क्या दुष्कर्म किया था, जिसके फलस्वरूप मेरा धार्मिक भ्राता मेरे सामने मर रहा है। (युद्धकाण्ड 101.19)
    एक आदर्श पति बनकर वैदिक संस्कृति का सन्देश फैलाते रहे। मित्रता धर्म निभाया। सुग्रीव को मित्र बनाया तो किष्किन्धा का राज्य उसे ही दे दिया। गुरुभक्त थे। गुरुजनों के प्रति सदा सम्मान की भावना रखते थे। वसिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम सभी के वे प्रिय पात्र थे।
    यज्ञप्रेमी थे। पांच महायज्ञों का अनुष्ठान करना उनके जीवन का अनिवार्य अंग बन गया था। अपने कर्त्तव्य कर्मों के करने में भी कभी भी आलस्य व प्रमाद नहीं करते थे। जब क्षत्रिय ने धनुष ले लिया तो दुखियों की चीत्कार फिर कहॉं हो सकती है? देखें अरण्य काण्ड-क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति। वे शरणागतपालक थे। जो भी उनकी शरण में आया वह अपने जीवन में तर गया।      सदाचार के वे मानो पुतले थे- न रामः परदारान्‌ स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति (अयोध्या काण्ड)। वे मातृवत्‌ परदारेषु का व्यवहार करते थे।
    ईश्वरभक्ति उनके जीवन का अनिवार्य अंग था। सन्ध्या, अग्निहोत्र, जप,तप इन सबका पालन करना जीवन का अभिन्न उद्देश्य था।
    ऐसा कोई नहीं था जो उनके जीवन में न खिल उठा हो। महापुरुषों का लक्षण तो यही है कि मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्‌। वे मन-वचन-कर्म से एक थे। इसलिए श्रीराम का पावन चरित्र उनके अनुकरणीय गुण-कर्म-स्वभाव तथा आदर्श सार्वकालिक, सार्वदेशिक तथा सार्वजनिक जीवनों के लिए अनुपम एवं उपयोगी हैं। वे आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने श्रीराम के समय लाखों वर्ष पूर्व थे। उनके जाज्वल्यमान आदर्श वर्तमान में भूले-भटके हुए लक्ष्यहीन एवं अशान्त भारतीयों के लिए प्रकाश स्तम्भ हैं।
    आज हम केवल इतना ही मानकर सन्तोष न कर लें कि उन्होेंने रावण जैसे अन्यायी, अत्याचारी का वध कर दिया तथा हम भी रावण के पुतले जलाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लें। आज के इस भौतिक वातावरण में जिनके अन्दर रावणीय भावनाएं कूट-कूटकर भरी हुई हैं, वे जीवन से उनको सम्पूर्णतया निकालकर "अच्छे इंसान' बनने का संकल्प लें।
    वस्तुतः आदर्श राम के जीवन की पद्धति, आदर्श राजनीति और जन-जन में व्याप्त प्रीति हमारी वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान देने में पूर्णतः समर्थ हो सकती है। आत्मीयता, विश्वबन्धुता, सर्वसमभाव, प्राणियों में सद्‌भावना आदि तथा संघटन, एकता व प्रेम के भाव उत्पन्न करने में श्रीराम के अनुकरणीय जीवन पद्धति से हम कुछ प्रेरणा अपनाकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण करने का सत्प्रयास करेंगे। विजयादशमी पर्व की पाठकों को अनेकानेक शुभकामनाएँ।