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मंगलवार, 24 मार्च 2015

भारत में सर्वत्र हुआ था तैमूर का व्यापक प्रतिरोध

भारत में सर्वत्र हुआ था तैमूर का व्यापक प्रतिरोध




दिल्ली यूं तो अब से पूर्व कई विदेशी आक्रांता या बलात् अधिकार कर दिल्ली के सुल्तान बन बैठे शासकों के आतंक और अत्याचार का शिकार कई बार बन चुकी थी, पर इस बार का विदेशी आक्रांता और भी अधिक क्रूरता की वर्षा करने के लिए आ रहा था। हिंदू प्रतिरोध यद्यपि निरंतर जारी था, परंतु दिल्ली पर नियंत्रण स्थापित कर पुन: हिंदू राज्य स्थापित करने की सारी चेष्टाएं निष्फल जा रही थीं।

दिल्ली नही थी सुरक्षित

मुगलों ने दिल्ली सल्तनत के अब तक के इतिहास में अनेकों बार भारत के भू-भाग को हथियाने के लिए आक्रमण किये, परंतु वे अभी तक असफल रहे थे। दिल्ली का तुगलक वंश लड़खड़ा रहा था, और अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। ऐसे समय में दिल्ली को पूर्णत: सुरक्षित नही कहा जा सकता था। देश का बहुसंख्यक हिंदू दिल्ली को पुन: प्राप्त नही कर पा रहा था और बलात दिल्ली के शासक बने विदेशी तुर्कों की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। जिनके विनाश की कामना यहां का बहु संख्यक वर्ग हिंदू चौबीसों घंटे किया करता था।

सत्ता और जनता में थी दूरी

कहने का अभिप्राय है कि दिल्ली के साथ सत्ता तो थी पर जनता नही थी और जनता के पास सत्ता नही थी। इसलिए सत्ता और जनता में दूरी थी एकात्मकता नही थी, समरूपता नही थी। इतिहास के इस सच को लोगों ने उपेक्षित करते हुए हमें यह समझाने का प्रयास किया है कि हम परस्पर फूट से ग्रस्त थे और विदेशी हमारी पारस्परिक फूट का लाभ उठाने मेंं सफल रहे।

हम मानते हैं कि इस प्रकार के कथन में सत्यांश हो सकता है, परंतु यह पूर्ण सत्य नही हो सकता। हमारी फूट का आधार जनता और सत्ता के मध्य का ऊपरिलखित अंतद्र्वद्व ही था।

हिन्दू की दयनीय स्थिति

इस देश के मूल निवासी हिन्दू से उसके मौलिक अधिकार छीन लिये गये थे और देश के आर्थिक संसाधनों से उसका प्रथम अधिकार छीनकर मुस्लिमों को दे दिया था, हिंदू जितना ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता था, उसे उतना ही दलन, दमन, शोषण और उत्पीडऩ की चक्की में क्रूरता से पीसा जाता था।

हिन्दू की मानसिकता…..

सत्ता के इस क्रूर स्वरूप से हिंदू मुक्त होना चाहता था और सत्ता उसे अपने शिकंजे में कसे रखना चाहती थी। इसलिए देश के मुस्लिम शासकों पर यदि कोई अन्य विदेशी मुस्लिम शासक हमला करता था तो उस समय हमारे देश का हिंदू उस विदेशी नये हमलावर के विरूद्घ अपने देश के शासक वर्ग के साथ नही होता था। इसका कारण ये था कि एक तो हिंदू को यह भली प्रकार ज्ञात था कि आने वाले आक्रांता के शासल काल में भी उसके साथ अन्याय और अत्याचार का वर्तमान क्रम ही चलते रहना है, दूसरे जिस सत्ता को वह स्वयं उखाड़ देना चाहता है, उसको विदेशी के विरूद्घ सहायता देना हिंदू उचित नही मानता था, विशेषत: तब जब विदेशी आक्रांता का अंतिम उद्देश्य भी हिंदुस्थान के क्रूर शासन का अंत करना ही था।

सत्ता कभी राष्ट्र नही हो सकती

कुछ लोगों ने भारतवर्ष के हिंदू समाज की अपने शासक वर्ग (मुस्लिम सुल्तानों) के प्रति अपनायी गयी ऐसी नीति की ये कहकर आलोचना की है कि भारतवर्ष में कभी राष्ट्रवाद की भावना नही रही। हम इस प्रकार की आलोचना को समालोचना न मानकर केवल ‘निंदा वचन’ मानते हैं और‘निंदा वचनों’ में कभी ईमानदारी नही हो सकती। ऐसे ‘निंदा वचन’ कहने वाले लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि सत्ता के साथ विद्रोह‘राष्ट्र के साथ विद्रोह’ कभी नही हो सकता। कारण कि सत्ता कभी राष्ट्र नही हो सकती। सत्ता को राष्ट्र के साथ समरूप होना चाहिए।

सत्ता खो देती है राष्ट्र की निष्ठा

जो सत्ता राष्ट्र के मूल्यों का वध करने लगती है, वह सत्ता राष्ट्र के निवासियों की और राष्ट्र की निष्ठा खो देती है। इसलिए राष्ट्र की परिभाषा के नियामक तत्वों में उस राष्ट्र की सत्ता या शासक वर्ग का उस राष्ट्र के राष्ट्रीय मूल्यों सम्प्रभुता और निवासियों के मौलिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील होना अनिवार्य है। जो शासक वर्ग लोक की मान्यता प्राप्त नही कर पाता है वह शासन कभी ‘लोकमान्य’ नही हो सकता। भारत के मुस्लिम शासकों को यहां के लोगों की मान्यता कभी नही मिली, इसलिए लोक से बहिष्कृत तिरस्कृत और उपेक्षित सत्ता या शासक वर्ग के किसी भी प्रकार के समर्थन की आवश्यकता नही थी। अत: इतिहासकारों को भारत के लोगों के द्वारा अपने तत्कालीन शासक वर्ग का सहयोग न करने को यह कहकर आलोचना से बचने का प्रयास करना चाहिए कि भारतीयों में कभी राष्ट्रवादिता की भावना थी ही नही।

तैमूर बढ़ता आ रहा था

ऐसी परिस्थितियों में दिल्ली की ओर तैमूर बढ़ता जा रहा था। अपनी जीवनी में वह कहता है-‘‘दिल्ली पर मेरे अंतिम हमले से पूर्व मुझे यह बताया गया कि हिंदुस्तान में प्रवेश करने से आज तक हम लोगों ने एक लाख हिंदुओं को कैद किया है ये सभी कैदी मेरे पड़ाव में थे। मैंने अपने दरबारियों से परामर्श किया कि इन कैदियों का क्या किया जाए? उन लोगों ने बताया कि युद्घ के दिन एक लाख कैदियों को सामान के पास नही छोड़ा जा सकता। उस पर इन बुत परस्तों और इस्लाम के शत्रुओं को स्वतंत्र छोड़ देना युद्घ के नियमों के विरूद्घ होगा। उन लोगों का यह परामर्श मुझे युद्घ के नियमों और नीति के अनुकूल लगा। मैंने सारे पड़ाव के लिए घोषणा कर आदेश जारी किया कि जो कोई व्यक्ति इस आदेश को न मानेगा उसका वध कर दिया जाएगा और उसकी सारी चीजें ऐसी सूचना देने वाले को दे दी जाएंगी। इस्लाम के गाजियों को जब इस आदेश की जानकारी हुई तो उन लोगों ने अपनी अपनी कटारें खींच ली, और अपने अपने कैदियों की हत्या कर दी। मौलाना नासिरूद्दीन उमर मेरा परामर्शदाता और उच्च शिक्षित व्यक्ति था, उसने अपने जीवन में एक चिडिय़ा को भी नही मारा होगा अब उसी ने मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए अपनी तलवार से 15 मूत्र्ति पूजक हिंदुओं की हत्या कर दी थी, जो उसकी कैद में थे।’’

उन एक लाख हिंदुओं को हमारा प्रणाम

स्वंय तैमूर की जीवनी के इस उद्घरण से स्पष्ट है कि दिल्ली में प्रवेश पाने से पूर्व अब तक के एक लाख हिन्दू बंदियों को कितनी निर्ममता से मृत्यु के घाट उतार दिया गया। हमारे वह निहत्थे और असहाय हिंदू पूर्वज कितने आत्माभिमानी, स्वाभिमानी और बलिदानी भावना से ओत प्रोत थे, जिन्होंने तैमूर की तलवार के अत्याचारों के सामने झुककर अपना धर्मांतरण स्वीकार नही किया और बड़ी सहजता से मृत्यु को गले लगा लिया। किसी से मिलने की उनकी इच्छा ना तो पूछी गयी और ना ही उन्होंने किसी से मिलने की इच्छा व्यक्त की, क्योंकि मिलने की इच्छा व्यक्त करना भी उस समय दुर्बलता थी और शत्रु को अपने ऊपर और भी अधिक अत्याचार करने के लिए प्रेरित करना था।

मरने वालों की प्रार्थना होती थी….

एक एक हिंदू के सामने अपने दूसरे भाई का सिर कटकर एक बार हवा में उड़ता और धांय से पृथ्वी पर आ गिरता। देखने वाला केवल अपने ईश्वर को स्मरण करता और उससे केवल यही प्रार्थना करता कि-‘‘हे दयानिधे! मुझे अपने धर्म पर अडिग रखना  मैं किंचित भी डगमगाऊं नही और अपने सर्वोत्कृष्ट बलिदान को देकर आपके श्रीचरणों में स्थान पाऊं।’’

 ईश्वर-अल्लाह का अंतर

तैमूर और उसकी सेना का अल्लाह उन्हें ‘काफिरों’ को मारने की प्रेरणा दे रहा था तो हमारा ईश्वर हमें निज धर्म की रक्षा के लिए मरने की प्रेरणा दे रहा था। जो लोग ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ कहकर उस शक्ति को एक ही मानते हैं, उन्हें यहां ईश्वर और अल्लाह के मध्य का अंतर स्वत: स्पष्टहो जाना चाहिए।

तैमूर का दिल्ली में प्रवेश

17 दिसंबर 1398 को तैमूर की सेना ने दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली की हिंदू जनता को नये आक्रांता के अत्याचारों की भनक लग चुकी थी कि उसने किस प्रकार एक लाख हिंदू कैदियों को दिल्ली में प्रवेश पाने से पूर्व ही ‘शकुन’ बनाने के लिए समाप्त करा दिया है। इसलिए उसने भी अपने आपको युद्घ करने और मरने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार कर लिया। कुछ लोगों ने भयभीत होकर दिल्ली को छोड़ दिया तो कुछ ने तैमूर के अत्याचारों से बचने के लिए अपने परिवार सहित किसी भी प्रकार से आत्महत्या का मार्ग अपना लिया।

अब क्या खाक मुसलमां होंगे

यह मुहावरा हमें अक्सर सुनने ेको मिलता है कि ‘अब आखिर में क्या खाक मुसलमां होंगे?’ यह उन हिंदू वीरों का ही एक उद्घोष था जो मध्यकालीन भारत के स्वतंत्रता सैनानी थे और अंतिम क्षणों तक अपने धर्म की रक्षा  के लिए कृत संकल्प रहते थे। उनसे मृत्यु के अंतिम क्षणों में कई बार जब ‘इस्लाम या मौत’ में से एक को चुनने की बात कही जाती थी तो वे अक्सर यही बात कहा करते थे कि जिस धर्म की रक्षार्थ (हिंदुत्व) पूरा जीवन संघर्ष में लगा दिया और उस समय मृत्यु से भय नही लगा, तो अब दो चार पलों के जीवन के लिए अंतिम क्षणों में क्या मुसलमां होंगे? हमारे वीर पूर्वजों की वीरता और शौर्य का प्रतीक यह मुहावरा बड़ी सरलता से कह दिया जाता है। जबकि इसके पीछे हमारी शौर्य परंपरा की एक गौरवमयी गाथा है। उसकी ओर हमारा ध्यान नही जाता क्योंकि प्रचलित इतिहास ने हमारी गौरव गाथा को विलुप्त करने का हरसंभव प्रयास किया है, और उसी प्रयास के तले दबकर यह मुहावरा भी अपनी गौरवगाथा की पुण्य आभा से हीन हो चुका है।

दिल्ली के रक्तपात की कहानी

दिल्ली में प्रविष्ट होकर तैमूर और उसकी सेना ने किस प्रकार का तांडव मचाया उसे अपने शब्दों में न रखकर तैमूर के शब्दों में ही लिखा जाना उचित होगा। तैमूर लिखता है-

सिपाही हिंदुओं को पकडऩे के लिए जब आगे बढ़े तो बहुतों ने अपनी तलवारें खींच लीं। (इसका अभिप्राय है कि हिंदुओं ने तैमूर का प्रतिरोध किया) इस लड़ाई से लगी हुई आग सभी कुछ जलाती हुई सीरी से लेकर पुरानी दिल्ली तक फैल गयी। क्रोधित होकर तुर्क काटने-लूटने में लग गये हिंदुओं (आत्मरक्षार्थ और निज धर्म को बचाने के लिए) ने अपने घरों में अपने हाथ से आग लगा दी, अपनी स्त्रियों तथा बच्चों को उसमें जला दिया, फिर लडऩे दौड़े और मारे गये। हिंदुओं ने लड़ाई में बड़ी फुर्ती और वीरता दिखाई। (इतने भयंकर रक्तपात के मध्य भी हिंदुओं की फुर्ती और वीरता को शत्रु से प्रशंसा मिलना उनके शौर्य की गौरवमयी गाथा का सुंदर चित्रण है) बृहस्पतिवार और शुक्रवार की सारी रात लगभग15 हजार तुर्क काटने, लूटने और विनाश करने में लगे रहे। शुक्रवार की प्रात: मेरी सेना मेरे नियंत्रण से बाहर हो गयी। शहर में जाकर उन लोगों ने कुछ भी सोच-विचार नही किया। काटने, लूटने और (हिंदुओं का) विनाश करने में लग गये। सारे दिन मारकाट (भयंकर स्तर पर) चलती रही। लूट इतनी अधिक थी कि हर व्यक्ति (तुर्क सैनिक) के पास 50 से 100 कैदी थे, जिनमें स्त्रियां पुरूष और बच्चे सभी थे। हीरे, जवाहरात, माणिक,मोती, सोने, चांदी के गहने अशर्फी, सोने चांदी के टंके, सोने चांदी के बर्तन, कीमती कपड़े और रेशम आदि का लूट का बहुत अधिक सामान हाथ लगा। …मुसलमानों के रहने के लिए सारा शहर खाली हो गया।’’

हिंदू ने दिखायी अपनी देशभक्ति

तैमूर के इस वर्णन पर यदि समीक्षा की जाए तो स्पष्ट होता है कि शहर के वीर हिंदुओं ने जहां तुर्क सेना के अत्याचारों का डटकर सामना किया वहीं आत्महत्या करना या पूरे परिवार को अग्नि के समर्पित करने और पलायन आदि करके शहर को खाली करने की घटनाएं भी अपरिमित स्तर पर हुई होंगी तभी तो तैमूर को यह लिखना पड़ा कि सारा शहर ही खाली हो गया था।

हिंदुओं का साहस दर्शनीय था

हिंदुओं ने अपने चारों ओर शवों को देखा उन्हें यह भी पता था कि दिल्ली में उनका रक्षक अब ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नही था, परंतु इसके उपरांत भी उनका साहस दर्शनीय था। उनका एक दल बड़ी वीरता और साहस के साथ आगे बढ़ा और दिल्ली जामा मस्जिद के पास मुस्लिमों पर आक्रमण करने के लिए एकत्र हो गया। तैमूर आगे लिखता है-‘‘बहुत से हिंदू हथियार और राशन लेकर दिल्ली की मस्जिद-ए-जामी (जामा मस्जिद) में जमा हो गये और बचाव की तैयारी कर रहे हैं। मेरे कुछ सिपाही उधर जा रहे हैं। हिंदुओं ने (आक्रमण कर) उन लोगों को घायल कर दिया। मैंने तुरंत अमीर शाह मलिक और अली सुल्तान तबाची को काफिरों और मूर्ति पूजकों से अल्लाह के घर को खाली करवाने का आदेश दिया। उन लोगों ने काफिरों पर हमला करके सभी को समाप्त कर दिया। इसके बाद पुरानी दिल्ली लूट ली गयी।’’

दिल्ली बन गयी भूतों का बसेरा

इस प्रकार हिंदुओं के साहस को दंडित किया गया और दिल्ली  हिंदू विहीन हो गयी। सारी दिल्ली भूतों का बसेरा बन चुकी थी। कटी हुई लाशें,सिसकते हुए जीवन, मंडराते हुए गिद्घ और कौवे, मानव शवों पर झगड़ते कुत्ते और सर्वत्र शवों के सडऩे की दुर्गंध इस सबके मध्य भी तुर्क सेना हिंदू आवासों में स्त्रियों के आभूषणों को खोजने और यदि कहीं उनके सौभाग्य से कोई हिंदू स्त्री मिल जाए तो उसका शील भंग करने की अमानवीय कार्यवाहियों में लगे हुए थे। मानवता कहीं दूर-दूर तक भी दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी, सर्वत्र दानवता का नग्न नृत्य हो रहा था। जब उन शवों से सड़ती दुर्गंधित राजधानी दिल्ली में मुस्लिमों के लिए ठहरना भी कठिन हो गया और जब उन्हें इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया कि अब दिल्ली में लूट के लिए शेष कुछ भी नही बचा है, तो उन्होंने दिल्ली को उस समय छोडऩा ही उचित समझा।

तैमूर ने किया दिल्ली का वर्णन

तैमूर लिखता है-‘‘मैंने दिल्ली के निवासियों के और अधिक विनाश में और रूचि नही ली। सवार होकर मैं नगरों के चारों ओर (घोड़े पर) घूमा। सीरी एक गोलशहर है। इसके भवन ऊंचे-ऊंचे हैं। यह नगरी चारों ओर से किलेबंदी से घिरी हुई है। पुरानी दिल्ली में भी एक ऐसा ही सुदृढ़ दुर्ग है। (इस दुर्ग से तैमूर का अभिप्राय लालकिले से लिया जा सकता है) परंतु यह श्री के दुर्ग से बड़ा है।’’

लौटते हुए तैमूर का हिन्दू शक्ति ने किया प्रतिरोध

हिंदुओं का साहस भी देखने योग्य था। ऐसे कितने ही संघर्ष हुए हैं, जब हिंदुओं ने अपने किसी राजा की या सेनापति की प्रतीक्षा न करके हिंदुत्व और मां भारती की सेवा के लिए स्वयं को एक ऐसे दल के रूप में एकत्र किया, जिसका नेता कोई स्थानीय साधारण व्यक्ति बन जाता था और तुर्क सेनाओं पर प्राणों की चिंता किये बिना ही टूट पड़ता था। ऐसे वीरता पूर्ण हिंदू कृत्यों का वर्णन हम पूर्व के कई पृष्ठों पर कर चुके हैं।

अब तैमूर के समय में भी हिंदुओं ने अपनी वीरता का वही इतिहास दोहराया। तैमूर जब हिंदुस्तान से स्वदेश लौट रहा था, तो उसने अपना यात्रामार्ग ऐसे स्थलों से चुना जो उसे हिंदुओं से सुरक्षित रख सके। मुहम्मद हबीब के अनुसार तैमूर ने पिछले समय के मंगोल अनुभव से प्रेरित होकर  हिमालय पर्वत और शिवालिक पर्वत माला के मध्य का क्षेत्र चुना।

स्टडीज इन इण्डो मुस्लिम हिस्ट्री खण्ड 1 पृष्ठ 356 के अनुसार तैमूर गंगा नदी के किनारे-किनारे तुगलुकपुर की ओर बढ़ा (यह गांव मुजफ्फर नगर से सत्रह मील उत्तर पूर्व में है) जब वह तुगलुकपुर से 5 कोस की दूरी पर पहुंचा तो उसे सूचना प्राप्त हुई कि मार्ग में एक स्थान पर हिंदू उसके प्रतिरोध के लिए एकत्र हो गये हैं।

दिल्ली की पीड़ा से दुखी था हिंदू

हिंदू के रोम-रोम में दिल्ली की पीड़ा बोल रही थी उन तक दिल्ली और दूसरे स्थानों पर तुगलक के अत्याचारों और हिंदू विनाश की पीड़ादायक कहानी किसी न किसी रूप में पहुंच चुकी थी। इसलिए उन्हेंाने देश से लौटते हुए तैमूर पर वीरतापूर्वक आक्रमण किया। इन लोगों ने कम संख्या में होने के उपरांत भी मुस्लिमों से घोर संघर्ष किया और अपना प्राणोत्सर्ग कर देश के बलिदानी इतिहास में अपनी देशभक्ति के कार्य को अमर कर दिया। इन वीर हिंदुओं के बलिदान हो जाने पर मुस्लिम सेना ने इनकी स्त्रियों और बच्चों को कैद कर लिया। परंतु आग तो आग होती है,वह भी यदि जंगल में फेेल जाए तो बुझनी असंभव हो जाती है। यही स्थिति प्रतिरोध की थी। हिंदू प्रतिरोध की अग्नि एक स्थान पर शांत होती तो दूसरे स्थान पर जा लगती।

हिंदुओं का दूसरा प्रतिरोध

तुगलुकपुर के हिंदुओं के बलिदान की सुर्खियां सूख भी नही पायी थीं कि थोड़ी देर में ही तैमूर को पुन: सूचना मिली कि कुछ दूरी पर हिंदू एक बार पुन: एकत्रित हो रहे हैं और उनका मुस्लिम सेना से युद्घ अपरिहार्य है।

‘मुलफुजात-ए-तैमूरी’ के अनुसार 13 जनवरी 1399 को तैमूर की सेना और हिंदुओं के मध्य भयंकर संग्राम हुआ। इस संग्राम में हिंदू पराजित हुए और भाग खड़े हुए।

हरिद्वार ने भी किया प्रतिरोध

हरिद्वार ने अपने जन्मकाल से ही हिंदू समाज का मार्गदर्शन किया है। यह हिंदुओं की धर्म नगरी कही जाती है। हमारा धर्म-‘कर्म और विज्ञान’ का समुच्चय कहा जाता है। अत: हरिद्वार के लिए यह भला कैसे संभव था कि जब सारे देश में ही सर्वत्र प्रतिरोध की बयार बह रही थी तो वह शांत रह जाता?

हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए तब हरिद्वार आगे आया। हरिद्वार अपने लिए यह कैसे कहलवा सकता था कि वह केवल धार्मिक सहिष्णुता की आत्मघाती उपदेशात्मक शैली का अवलंबन करते हुए सही समय पर कत्र्तव्य से च्युत हो गया और उसने हिंदुओं में शौर्य का भाव भरकर अपने धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित नही किया? हरिद्वार ने अपना धर्म समझा और विदेशी आततायी को दंडित करने का निर्णय लिया।

वहां (तैमूर की जीवनी के अनुसार) बड़ी संख्या में हिंदू एकत्र हो गये। जब तैमूर हरिद्वार पहुंचा तो उसे हिंदुओं के विषय में जानकारी मिली कि उसे यहां भी इन लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। अत: उसने अपनी अन्य सेना के आने की प्रतीक्षा की। रविवार के दिन पीर मुहम्मद और सुलेमान शाह के नेतृत्व में आसपास युद्घ के  लिए भेजी गयी तैमूर की शेष सेना भी आ पहुंची, जिससे उत्साहित होकर तैमूर ने उसी दिन मध्यान्ह और सायंकाल की नमाज के मध्य आगे बढक़र हिंदुओं पर धावा बोल दिया। ‘मुल फुजात-ए-तैमूरी’ के अनुसार हिंदुओं को यहां भी पराजित होना पड़ा। परंतु अगले ही दिन पुन: एक बार हिंदू शक्ति ने बड़ी प्रबलता के साथ मुस्लिम सेना पर आक्रमण कर दिया। यह अलग बात है कि  हिंदुओं को पुन: पराजित होना पड़ा।

पराजयें भाग्य का निर्णय नही करती हैं

हम पुन: यही दोहराएंगे कि युद्घ में पराजय अर्थ नही रखती युद्घ के लिए उत्साह और साहस महत्वपूर्ण होता है। पराजय यदि हमारे भाग्य का निर्णय करती तो ऐसी पराजयें तो पूर्व में कितनी ही बार मिल चुकी थीं, परंतु हमारे भाग्य का निर्णय तो हमारा उत्साह और साहस कर रहे थे और ये दोनों सौभाग्य से हमारे साथ थे। आश्चर्य की बात थी कि शत्रु इनसे सैकड़ों वर्षों से लड़ता आ रहा था पर इन्हें परास्त नही कर पाया था।

आगे भी मिला प्रतिरोध

हिंदुओं के इसी उत्साह और साहस के चलते 24 जनवरी को शिवालिक की पहाडिय़ों की ओर उसे रामरतन सिंह की सेना से और नगरकोट में हिंदुओं की एक टुकड़ी से भारी संघर्ष करना पड़ा। इसी प्रकार जम्मू में भी उसे हिंदू चुनौती का सामना करना पड़ा।

अंत में हम यही कहेंगे कि तैमूर के आक्रमण के समय भी हिंदू ने पराजय नही मानी, अपना सब कुछ हो करके भी निज राष्ट्र और निज धर्म की रक्षा करना उसने सर्वोपरि कत्र्तव्य माना। ऐसे वीर समाज का शत-शत अभिनंदन।

रविवार, 16 नवंबर 2014

गौरवमयी भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत और देश की अवनति के कारणों पर विचार

गौरवमयी भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत और देश की अवनति के कारणों पर विचार


                संसार में वैदिक धर्म व संस्कृति सबसे प्राचीन है। इसका आधार चार वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद हैं। वेदों का लेखक कोई मनुष्य या ऋषि-मुनि नहीं अपितु परम्परा से इसे ईश्वर प्रदत्त बताया जाता है। वैदिक प्रमाणों एवं विचार करने पर ज्ञात होता है कि सृष्टि की रचना होने के बाद जैविक व प्राणी सृष्टि हुई जिसमें वनस्पति जगत के बाद प्राणी जगत के अन्तर्गत पशु, पक्षी तथा कीट-पतंग की अमैंथुनी सृष्टि हुई। इनके बाद अन्तिम अमैथुनी सृष्टि मनुष्यों की हुई। मनुष्यों की अमैथुनी सृष्टि की न केवल सम्भावना है अपितु इसका उल्लेख वैदिक साहित्य में उपलब्ध होता है। हम आजकल देखते हैं कि मनुष्येतर जीवयोनियों, पशु, पक्षियों, कीट व पतंगों आदि को अपना जीवन व्यतीत करने के लिए किसी भाषा व नैमित्तिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। उनका काम ईश्वर से उन्हें प्राप्त स्वाभाविक ज्ञान से चल जाता है। मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे माता के दुग्ध का पान करने व भूख व पीड़ा होने पर रोने के अतिरिक्त किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं होता। इससे अधिक वह अपने हाथ पैरों को पटकता रहता है। माता उसे गोद में दुग्धपान कराने के साथ उसे पुचकारती व दुलारती है तथा भांति-भांति के गीत व लोरियां आदि सुनाती रहती है जिससे वह अपनी माता की आवाज व भाषा से कुछ कुछ परिचित होना आरम्भ करता है। कुछ महीनों में वह माता की आवाज को पूरी तरह से समझने लगता है और पिता की भी ध्वनि को अनुभव करने लगता है। धीरे-धीरे उसका ज्ञान बढ़ने लगता है। वह न केवल शब्दों को सुनकर पहचानने लगता है वरन उसे प्रेरित करने पर वह छोटे-छोटे शब्दों को बोलने भी लगता है। आयु वृद्धि के साथ वह अपनी माता व पिता से कुछ-कुछ नई बातें सीखता जाता है परन्तु परिवार व समाज के लोगों के साथ समान्य व विशेष रूप से ज्ञानपूर्वक व्यवहार करने के लिए उसे आचार्यों की आवश्यकता होती हैं जो उसे विद्यालय में प्राथमिक कक्षा से आरम्भ करके भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान कराते हैं। विद्यालयों में भिन्न-भिन्न विषयों को पढ़कर वह नाना प्रकार के व्यवहार, कार्य व व्यवसाय करने में दक्ष हो जाता है।

सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में युवावस्था में उत्पन्न हमारे आदि पूर्वजों के पास अपनी कोई भाषा व ज्ञान तो होता नहीं है तो प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वह भाषा व व्यवहार करने का ज्ञान किससे प्राप्त करते हैं वा किससे सीखते हैं? इस प्रश्न का उत्तर वेदों को जानने वालों के लिए अधिक कठिन नहीं है। हम जानते हैं कि यह सृष्टि ज्ञान पूर्वक बनी हुई रचना है। यह स्वयं कदापि नहीं बन सकती।  इसको बनाने वाली कोई पूर्ण बुद्धिमान सत्ता अर्थात् सर्वज्ञ, जो अतुल बलशाली अर्थात् सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म, अनादि, अनन्त, अजन्मा, अमर, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर आदि गुणों वाली होनी सिद्ध होती है। यदि वह न होती तो यह सृष्टि या ब्रह्माण्ड न बनता। उसका दिखाई देना इस लिए आवश्यक नहीं है क्योंकि उसका निराकार, सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म व सर्वान्तर्यामी होना आवश्यक है और वह है भी ऐसी ही। उसे हम अपने ज्ञान के नेत्रों अर्थात्ः अन्तर्चक्षुओं से जान सकते हैं और आत्मा में विचार व चिन्तन से उसका प्रत्यक्ष अथवा साक्षात्कार कर सकते हैं जिस प्रकार से हम फूलों की सुगन्ध न देखकर भी उसका अनुभव करते हैं और इसी प्रकार वायु को आंखों से न दिखने पर भी अपनी त्वचा द्वारा स्पर्श कर उसका अनुभव करते हैं। इसी प्रकार हमें अपने मोबाइल की घण्टी बजने पर किसी परिचित की आवाज आती है तो उस व्यक्ति के सामने न होने पर भी हमें उसका प्रत्यक्ष व प्रामाणिक ज्ञान होता है कि हमारा अमुक परिचित मित्र, सम्बन्धी या परिवार का सदस्य बोल रहा है। अतः परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। उसी परमात्मा ने सभी मनुष्यों को आदि सृष्टि में बनाया था। उसी ने देखने के लिए आंखें, सुनने के लिए कान, स्वाद व शब्दोच्चार के लिए रसनेन्द्रिय अर्थात् जिह्वा व कण्ठ, स्पर्श के लिए त्वचा व सूंघने के लिए नाक व इसके साथ सत्यासत्य के विवेचन के लिए बुद्धि तथा शुभ व अशुभ संकल्पों के लिए मन आदि अवयव मनुष्य शरीर में बना कर लिए हैं। मनुष्य लाख कोशिश कर ले, वह भाषा को नहीं बना सकते। भाषा के न होने पर ज्ञान हो ही नहीं सकता चूँकि ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। यदि भाषा न हो तो ज्ञान व समझ उत्पन्न नहीं हो सकती। जब मनुष्य इन्हें नहीं बना सकता है तो फिर प्रश्न यह है कि यह प्राप्त किससे होती हैं। इसका सीधा व सरल उत्तर है कि आदि भाषा वैदिक संस्कृत और ज्ञान ‘वेद’यह इस संसार को बनाने वाली सत्ता “ईश्वर” से मनुष्यों को प्राप्त हुए हैं। इन प्रश्नों के इन उत्तरों के अतिरिक्त हम में से किसी के पास अन्य कोई विकल्प है ही नहीं। हां, अनावश्यक काल्पनिक तर्कों का सहारा लिया जा सकता है परन्तु सत्य यही है कि यह भाषा और ज्ञान हमें ईश्वर से प्राप्त हुआ है।



वेद संस्कृत भाषा में है जो लौकिक संस्कृत से भिन्न ‘वैदिक संस्कृत’है। इन वेदों का यथार्थ अर्थ हमें महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का किया हुआ प्राप्त है। अंग्रेजी भाषा में भी डा. स्वामी सत्य प्रकाश सरस्वती जी का किया हुआ वेदों  का भाष्य हमारे पास उपलब्ध है। इनके अतिरिक्त महर्षि दयानन्द के अनेक ग्रन्थ यथा सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि सहित अनेक लघु ग्रन्थ जिनका आधार वेद और वैदिक साहित्य है, हमारे पास उपलब्ध है। वेदों पर आधारित प्राचीन ग्रन्थ मनुस्मृति, 6 दर्शन तथा 11 उपनिषदें भी हमारे पास है जिनके प्रणेता ऋषि कोटि के असाधारण विद्वान मनुष्य हैं। इतिहास के दो प्रमुख ग्रन्थ बाल्मीकी रामायण तथा व्यास ऋषि कृत महाभारत भी उपलब्ध हैं। इनका अध्ययन कर वैदिक धर्म, सभ्यता व संस्कृति से परिचित हुआ जा सकता है। आज भी वैदिक धर्म, संस्कृति व सभ्यता प्रासंगिक एव उपादेय है। हमने विगत 40 वर्षों में इन सभी ग्रन्थों का अध्ययन किया है और हमें लगता है कि इनके आधार पर स्वस्थ व सुखी जीवन व्यतीत किया जा सकता है। इनके अध्ययन के साथ हम आधुनिक ज्ञान व विज्ञान का अध्ययन कर विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिगं, शिक्षा, बैंकिगं, व्यापार, वाणिज्य आदि किसी भी क्षेत्र में अपना व्यवसाय चुन कर सफल जीवन व्यतीत कर सकते हैं।



आज की सामाजिक व्यवस्था को भी जानने का प्रयास करते हैं। आज हमारे देश व संसार में अनेक मत-मतान्तर, धर्म, मजहब, सम्प्रदाय आदि हैं। यह सभी संसार के लोगों को अपने-अपने मत का अनुयायी बनाने का प्रयास करते हैं। ईश्वर के एक होने पर भी सबकी अपनी-अपनी भिन्न-भिन्न विचारधारायें, मान्यतायें, सिद्धान्त तथा उपासना पद्धतियां है। किसी को भी इस बात से कोई सरोकार नहीं दिखता कि उनके द्वारा की जाने वाली क्रियाओं व उपासना पद्धतियों से ईश्वर प्रसन्न होता है अथवा नहीं? ईश्वर क्या चाहता है किसी मत के द्वारा जानने का प्रयास नहीं किया जाता है। वैदिक मत व धर्म में यह प्रयास अवश्य किया गया है। उनके अनुसार ईश्वर सभी जीवों का सुख चाहता है इसी लिए उसने सृष्टि को बनाया आरै आरम्भ में ही संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु वेदों का ज्ञान दिया जिसमें ईश्वर की ओर से मनुष्यों के कर्तव्यों का उल्लेख है। इन वैदिक कर्तव्यों की व्याख्यायें दर्शन, उपनिषद व मनुस्मृति ग्रन्थों में भी दी गई है।  वेदों के ज्ञान का महत्व इस लिए सर्वाधिक है क्योंकि मनुष्य का आत्मा जन्म व मरण धर्मा है। इसका अर्थ है कि यह सृष्टि काल में जन्म-मृत्यु-जन्म के चक्र में बन्धा हुआ होता है, जन्म के बाद पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मानुसार आयु, जाति व सुख व दुःखों को प्राप्त कर भोगता है और कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त होता है। मृत्यु के बाद पुनः पूर्व व इस जन्म के शेष कर्मों के आधार पर नया जन्म मिलता है। यह जन्म किये हुए कर्मों के अनुसार होता है। यह सम्भव है कि हम अगले जन्म में मनुष्य बने और यह भी सम्भव है कि हम पशु, पक्षी, कीट व पतंग में से किसी योनि या जाति प्रजाति में पैदा हों। हमारा भावी जन्म मनुष्य योनि में अच्छे सुशिक्षित व सुखी परिवारों में हों जहां हम सत्कर्मों को करते हुए धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करें, इसके लिए ही वैदिक कर्तव्यों का पालन करने का विधान है।



सृष्टि के आदि काल में मनुष्यों की उत्पत्ति एवं वेदों के प्रादुर्भाव से ही काल गणना आरम्भ कर दी गई थी जो अद्यावधि जारी है। इस समय सृष्टि संवत् 1,96,08,53,115 चल रहा है। इस लम्बी अवधि में अब से लगभग 5,100 वर्ष पूर्व महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में जनहानि हुई जिस कारण युद्ध के बाद सर्वत्र अव्यवस्था फैल गई। विगत 5000 वर्ष में देश के ज्ञानी वर्ग के आलस्य, प्रमाद आदि अनेक कारणों से वेदों का ज्ञान लुप्त हुआ जिससे अन्धविश्वास, अवैदिक परम्परायें व कुरीतियां प्रचलित हो गईं। अज्ञान व कुछ अन्य कारणों से पूर्ण अहिंसात्मक यज्ञों में पशुओं की हत्यायें की जाने लगीं। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन से वंचित कर दिया गया। देश भर में वेदों का अध्ययन समाप्त प्रायः हो गया। वेदों के अज्ञानतापूर्ण, मिथ्या व अश्लील अर्थ किये गये। सत्य वेदार्थ लुप्त प्रायः था जब कि वेदार्थ के कुछ ग्रन्थ अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरूक्त व निघण्टु आदि ग्रन्थ कुछ लोगों के पास उपलब्ध थे परन्तु इनका उपयोग नहीं किया जा रहा था। देश व समाज का पतन इस सीमा तक हुआ कि महाभारत काल तक बोलचाल व साहित्य की भाषा सर्वत्र संस्कृत ही थी परन्तु इसके बाद संस्कृत का वर्चस्व समाप्त होकर अन्य अनेक भाषायें अस्तित्व में आ गईं। इन परिस्थितियों के उत्पन्न होने से नये-नये मत यथा बौद्ध, जैन, अद्वैत, द्वैत, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि अस्तित्व में आयें। विदेशों में भी पारसी या जरदुश्त मत, यहूदी मत, ईसाई मत तथा इस्लाम मत आदि अस्तित्व में आये। यह क्रम चलता रहा और भारत में मतों की संख्या में वृद्धि होती रही। इस कारण संसार में अज्ञान फैल गया और एक ईश्वर की नाना प्रकार से स्तुति व प्रार्थनायें की जाने लगी। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के सत्य स्वरूप को जानने का प्रयास ही नहीं किया गया और न अब किया जा रहा है। सब जगह ‘अपनी अपनी ढफली, अपना अपना राग’वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अनेक मत-मतान्तर, मजहब, सम्प्रदाय व पन्थों के कारण समाज में समरसता समाप्त हो गई है। यदा-कदा यत्र-तत्र देश में साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं। सब अपने-अपने मत को श्रेष्ठ व ज्येष्ठ मानने लगे और हमारे विदेशी मतों ने तो धर्मान्तरण का कुचक्र भी चलाया। ऐसी अनेक घटनायें इतिहास में अंकित है जहां शासक वर्ग व बलवान शत्रु का मत न मानने वालों की हत्यायें कर दी जाती थी और यह कार्य बहुत बड़े पैमाने पर भारत में हुआ। सभी मतों का आपस में संवाद समाप्त हो गया और सब अपने अपने घर में शेर बन गये। सन् 1825 में महर्षि दयानन्द का जन्म होता है। वह वेदों का अध्ययन करते हैं और बहृमचर्य व योग के आधार पर अपूर्व पुरूषार्थ, तप एवं त्याग से वेदों के सत्य अर्थों को जानते हैं।  उन्होंने संसार के सभी मतों का अध्ययन किया और पाया कि सत्य धर्म केवल एक है और वह प्राचीन वेदों का धर्म है जिसे सनातन धर्म भी कहते हैं। उनको इस तथ्य का भी साक्षात हुआ कि विश्व शान्ति के लिए आवश्यक है कि सभी मतों का परस्पर संवाद हो, वार्तालाप, उपदेश, गोष्ठी, शास्त्रार्थ कर सत्य मत का निर्णय किया जाये और उस सत्य मत को सभी स्वीकार करें। उन्होंने अनेक मतों के विद्वानों से संवाद और शास्त्रार्थ भी किए जिसमें वैदिक मान्यतायें हीं  सत्य सिद्ध हुईं। बहुत से लोगों ने सत्य को स्वीकार भी किया परन्तु यह स्थिति नाममात्र की ही कही जा सकती है। इस पृष्ठ भूमि में अब हम भारत के पतन के कारणों पर विचार करते हैं और उन्नति के कारकों का भी उल्लेख करते हैं।



देश के पतन का पहला कारण तो वैदिक ज्ञान का लोप तथा असत्य व मिथ्या ज्ञान पर आधारित मतों का प्रादुर्भाव रहा जिस कारण देश में सर्वत्र अज्ञान, अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न हो गईं। इसके फलस्वरूप मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित करना, अवतारवाद की कल्पना व उसका प्रचलन, फलित ज्योतिष, जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था वा आधुनिक वर्णव्यवस्था, छुआ-छुत का प्रचलन, बाल विवाह-अनमेल विवाह व बहुविवाह, सती प्रथा, मदिरा पान, मांसाहार, अशिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान पर ध्यान न देना, निर्धनों व दुर्बलों का धनिकों व बलवानों द्वारा शोषण व उन पर अत्याचार आदि अनेक पतन के कारण समाज व देश में उपस्थित हुए। यह सब देश में चल पड़ा परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति उत्पन्न नहीं हुआ जो इनके विरूद्ध आवाज उठाता। इसका श्रेय स्वामी दयानन्द सरस्वती को मिला जिन्हें उनके गुरू स्वामी विरजानन्द सरस्वती ने असत्य का खण्डन और सत्य का मण्डन कर देश व इसके पुराने सत्य वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए प्रेरित किया था।  स्वामी दयानन्द जी ने पतन को समाप्त करने और देश व विश्व का कल्याण करने के लिए 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की और इसके 10 स्वर्णिम नियम बनाये जिनमें से एक ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये’है। दूसरा अति महत्वपूर्ण नियम यह है कि ‘अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’उनकी इस प्रेरणा से उनके प्रमुख अनुयायियों स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरूदत्त विद्यार्थी, स्वामी दर्शनानन्द, महात्मा हंसराज, पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु आदि ने गुरूकुलों व दयानन्द एंग्लो वैदिक कालेजों का देश भर में विस्तार किया। आर्य समाज के स्वर्णिम नियमों यह नियम भी हैं कि “सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये। मनुष्य को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिये। समाज का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और आत्मिक उन्नति करना।“ यह नियम यद्यपि आर्य समाज के नियम हैं परन्तु इन नियमों का कोई भी विरोधी नहीं हो सकता। इसी प्रकार से ईश्वर के स्वरूप व उसके द्वारा प्रदत्त वेद ज्ञान से सम्बन्धित नियम भी देश व काल की सीमा से परे होने के साथ मानवमात्र के लिए हितकारी हैं व जीवन की उन्नति के आधार हैं। जहां यह नियम सरल व सुबोध हैं एवं देश व समाज के लिए लाभप्रद हैं वहीं देश के नाना प्रकार के मतों व अज्ञान तथा अन्धविश्वासों में ग्रसित होने के कारण इनका क्रियान्वयन असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।



समाज की उन्नत अवस्था वह अवस्था हो सकती हैं जहां किसी के साथ पक्षपात न होता हो और न ही अन्याय। सभी देशवासी शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ, सुखी, सम्पन्न व समृद्ध हों। इसके साथ सभी का धार्मिक व सामाजिक दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक है। एक ही मत, एक जैसी परम्परायें और एक समान ही सबकी विचारधारा हो। यह उन्नति की स्थिति है और इसके विरीत जो स्थिति हो सकती है वह अवनति की स्थिति या अल्प उन्नति की स्थिति कही जा सकती है। समाज ऐसा हो जहां सभी लोग संसार की सबसे प्राचीन भाषा को बोलना व लिखना जानते हों। हिन्दी का ज्ञान भी सभी देशवासियों को होना चाहिये। इनका जो विरोध करे वह कड़े व तत्काल दण्ड से दण्डित किया जाये। इन दो भाषाओं के बाद क्षेत्रीय भाषा व अंग्रेजी का स्थान होना चाहिये। देश के लिए सर्वत्र एक समान, अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिये। वेदाध्ययन अनिवार्य होना चाहिये। वेदों की उपेक्षा सहन नहीं की जानी चाहिये। यहां यह कहना उचित होगा कि वेद किसी मत या पन्थ का ग्रन्थ नहीं अपितु साक्षात् ईश्वर से प्राप्त सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ हैं जिन पर संसार के सभी मानवेों का अधिकार है और सबको इसका अध्ययन व पालन करना परम कर्तव्य व मानव धर्म है। सभी अन्धविश्वास व कुरीतियों को सरकारी राजाज्ञा द्वारा निषिद्ध किया जाना चाहिये जिसे वेदों के विद्वान, सभी ज्ञानी, शिक्षाविद व वैज्ञानिक मिलकर तय करें। विरोध करने वालों को उचित दण्ड शीघ्रातिशीघ्र मिलना चाहिये। अज्ञान पर आधारित मतों पर प्रतिबन्ध होना चाहिये। देश में कम से कम सरकारी अवकाश हों। पुरूषार्थ की पूजा हो और पुरूषार्थहीन का असम्मान हो। गुणी लोगों को बिना किसी पक्षपात के रोजगार मिलना चाहिये और अयोग्य को समय-समय पर छानबीन कर उन्हें उनकी योग्यता व स्वभाव के अनुसार कार्य दिया जाना चाहिये। सामाजिक समरसता के लिए भी कानून हो। जो इसमें रूकावट करें वह कोई भी हों, दण्डित होने चाहियें। धन की भी एक सीमा होनी चाहिये। जो अधिक धनी हैं उनकी भी अधिकतम् सीमा होनी चाहिये। उससे अधिक धन सरकार उनके कर के रूप में लेकर उससे निर्धनों के कल्याण के कार्यक्रम चलाए जिससे सामाजिक व आर्थिक असमानता कम से कम हो। देश में एक ऐसा वातावरण बनना चाहिये जिसमें त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले अधिक सम्मानित माने जाने चाहिये और सभी को उनका यथोचित सम्मान करना चाहिये। यदि ऐसा नहीं करेंगें तो राष्ट्र उन्नत न होकर अवनति को प्राप्त होगा। अवनति के जहां अनेक कारण होते हैं वहां मांसाहार व मदिरापान भी आध्यात्मिक एवं भौतिक अवनति का कारण होता है। मदिरापान और मांसाहार सहित सभी प्रकार के नशों से मनुष्य का शरीर निर्बल होकर रोगग्रस्त हो जाता है। उसकी शारीरिक व बौद्धिक क्षमतायें स्वस्थ मनुष्य की अपेक्षा कम होती है। विलासी और व्यस्नी मनुष्यों से राष्ट्र को अधिक लाभ नहीं हो पाता जो व्यस्नों से रहित देशवासियों से होता है। अतः शासक व शासक वर्ग को इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इसके साथ देश का सामरिक दृष्टि से भी पड़ोसी देशों से कहीं अधिक बलवान होना अति आवश्यक है। संसार का कोई देश अपनी सैन्य व अन्य किसी शक्ति के कारण हमें अपनी बात मानने के लिए विवश न कर सके, इस लिए हमें उनके समान व अधिक बल व सामर्थ्य देश में उत्पन्न करना आवश्यक है। गोहत्या किसी भी देश के लिए अभिशाप व कलंक होता है। गोहत्या एक प्रकार से राष्ट्र की हत्या के समान है। ईश्वर की दृष्टि में भी यह एक जघन्य अपराध है। ऐसे नागरिक कभी भी मन की प्रसन्नता, वास्तविक सुख व शान्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। अवनति के इन कारणों को दूर करने पर ही देश उन्नति कर सकता है। आशा की जानी चाहिये कि भविष्य में यह स्वर्णिम समय अवश्य आयेगा।



रविवार, 9 नवंबर 2014

गौरवमयी भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत और देश की अवनति के कारणों पर विचार

गौरवमयी भारतवर्ष का स्वर्णिम अतीत और देश की अवनति के कारणों पर विचार



                संसार में वैदिक धर्म व संस्कृति सबसे प्राचीन है। इसका आधार चार वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद हैं। वेदों का लेखक कोई मनुष्य या ऋषि-मुनि नहीं अपितु परम्परा से इसे ईश्वर प्रदत्त बताया जाता है। वैदिक प्रमाणों एवं विचार करने पर ज्ञात होता है कि सृष्टि की रचना होने के बाद जैविक व प्राणी सृष्टि हुई जिसमें वनस्पति जगत के बाद प्राणी जगत के अन्तर्गत पशु, पक्षी तथा कीट-पतंग की अमैंथुनी सृष्टि हुई। इनके बाद अन्तिम अमैथुनी सृष्टि मनुष्यों की हुई। मनुष्यों की अमैथुनी सृष्टि की न केवल सम्भावना है अपितु इसका उल्लेख वैदिक साहित्य में उपलब्ध होता है। हम आजकल देखते हैं कि मनुष्येतर जीवयोनियों, पशु, पक्षियों, कीट व पतंगों आदि को अपना जीवन व्यतीत करने के लिए किसी भाषा व नैमित्तिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। उनका काम ईश्वर से उन्हें प्राप्त स्वाभाविक ज्ञान से चल जाता है। मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे माता के दुग्ध का पान करने व भूख व पीड़ा होने पर रोने के अतिरिक्त किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं होता। इससे अधिक वह अपने हाथ पैरों को पटकता रहता है। माता उसे गोद में दुग्धपान कराने के साथ उसे पुचकारती व दुलारती है तथा भांति-भांति के गीत व लोरियां आदि सुनाती रहती है जिससे वह अपनी माता की आवाज व भाषा से कुछ कुछ परिचित होना आरम्भ करता है। कुछ महीनों में वह माता की आवाज को पूरी तरह से समझने लगता है और पिता की भी ध्वनि को अनुभव करने लगता है। धीरे-धीरे उसका ज्ञान बढ़ने लगता है। वह न केवल शब्दों को सुनकर पहचानने लगता है वरन उसे प्रेरित करने पर वह छोटे-छोटे शब्दों को बोलने भी लगता है। आयु वृद्धि के साथ वह अपनी माता व पिता से कुछ-कुछ नई बातें सीखता जाता है परन्तु परिवार व समाज के लोगों के साथ समान्य व विशेष रूप से ज्ञानपूर्वक व्यवहार करने के लिए उसे आचार्यों की आवश्यकता होती हैं जो उसे विद्यालय में प्राथमिक कक्षा से आरम्भ करके भिन्न-भिन्न विषयों का ज्ञान कराते हैं। विद्यालयों में भिन्न-भिन्न विषयों को पढ़कर वह नाना प्रकार के व्यवहार, कार्य व व्यवसाय करने में दक्ष हो जाता है।

सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में युवावस्था में उत्पन्न हमारे आदि पूर्वजों के पास अपनी कोई भाषा व ज्ञान तो होता नहीं है तो प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वह भाषा व व्यवहार करने का ज्ञान किससे प्राप्त करते हैं वा किससे सीखते हैं? इस प्रश्न का उत्तर वेदों को जानने वालों के लिए अधिक कठिन नहीं है। हम जानते हैं कि यह सृष्टि ज्ञान पूर्वक बनी हुई रचना है। यह स्वयं कदापि नहीं बन सकती।  इसको बनाने वाली कोई पूर्ण बुद्धिमान सत्ता अर्थात् सर्वज्ञ, जो अतुल बलशाली अर्थात् सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म, अनादि, अनन्त, अजन्मा, अमर, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर आदि गुणों वाली होनी सिद्ध होती है। यदि वह न होती तो यह सृष्टि या ब्रह्माण्ड न बनता। उसका दिखाई देना इस लिए आवश्यक नहीं है क्योंकि उसका निराकार, सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म व सर्वान्तर्यामी होना आवश्यक है और वह है भी ऐसी ही। उसे हम अपने ज्ञान के नेत्रों अर्थात्ः अन्तर्चक्षुओं से जान सकते हैं और आत्मा में विचार व चिन्तन से उसका प्रत्यक्ष अथवा साक्षात्कार कर सकते हैं जिस प्रकार से हम फूलों की सुगन्ध न देखकर भी उसका अनुभव करते हैं और इसी प्रकार वायु को आंखों से न दिखने पर भी अपनी त्वचा द्वारा स्पर्श कर उसका अनुभव करते हैं। इसी प्रकार हमें अपने मोबाइल की घण्टी बजने पर किसी परिचित की आवाज आती है तो उस व्यक्ति के सामने न होने पर भी हमें उसका प्रत्यक्ष व प्रामाणिक ज्ञान होता है कि हमारा अमुक परिचित मित्र, सम्बन्धी या परिवार का सदस्य बोल रहा है। अतः परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। उसी परमात्मा ने सभी मनुष्यों को आदि सृष्टि में बनाया था। उसी ने देखने के लिए आंखें, सुनने के लिए कान, स्वाद व शब्दोच्चार के लिए रसनेन्द्रिय अर्थात् जिह्वा व कण्ठ, स्पर्श के लिए त्वचा व सूंघने के लिए नाक व इसके साथ सत्यासत्य के विवेचन के लिए बुद्धि तथा शुभ व अशुभ संकल्पों के लिए मन आदि अवयव मनुष्य शरीर में बना कर लिए हैं। मनुष्य लाख कोशिश कर ले, वह भाषा को नहीं बना सकते। भाषा के न होने पर ज्ञान हो ही नहीं सकता चूँकि ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। यदि भाषा न हो तो ज्ञान व समझ उत्पन्न नहीं हो सकती। जब मनुष्य इन्हें नहीं बना सकता है तो फिर प्रश्न यह है कि यह प्राप्त किससे होती हैं। इसका सीधा व सरल उत्तर है कि आदि भाषा वैदिक संस्कृत और ज्ञान ‘वेद’यह इस संसार को बनाने वाली सत्ता “ईश्वर” से मनुष्यों को प्राप्त हुए हैं। इन प्रश्नों के इन उत्तरों के अतिरिक्त हम में से किसी के पास अन्य कोई विकल्प है ही नहीं। हां, अनावश्यक काल्पनिक तर्कों का सहारा लिया जा सकता है परन्तु सत्य यही है कि यह भाषा और ज्ञान हमें ईश्वर से प्राप्त हुआ है।



वेद संस्कृत भाषा में है जो लौकिक संस्कृत से भिन्न ‘वैदिक संस्कृत’है। इन वेदों का यथार्थ अर्थ हमें महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का किया हुआ प्राप्त है। अंग्रेजी भाषा में भी डा. स्वामी सत्य प्रकाश सरस्वती जी का किया हुआ वेदों  का भाष्य हमारे पास उपलब्ध है। इनके अतिरिक्त महर्षि दयानन्द के अनेक ग्रन्थ यथा सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि सहित अनेक लघु ग्रन्थ जिनका आधार वेद और वैदिक साहित्य है, हमारे पास उपलब्ध है। वेदों पर आधारित प्राचीन ग्रन्थ मनुस्मृति, 6 दर्शन तथा 11 उपनिषदें भी हमारे पास है जिनके प्रणेता ऋषि कोटि के असाधारण विद्वान मनुष्य हैं। इतिहास के दो प्रमुख ग्रन्थ बाल्मीकी रामायण तथा व्यास ऋषि कृत महाभारत भी उपलब्ध हैं। इनका अध्ययन कर वैदिक धर्म, सभ्यता व संस्कृति से परिचित हुआ जा सकता है। आज भी वैदिक धर्म, संस्कृति व सभ्यता प्रासंगिक एव उपादेय है। हमने विगत 40 वर्षों में इन सभी ग्रन्थों का अध्ययन किया है और हमें लगता है कि इनके आधार पर स्वस्थ व सुखी जीवन व्यतीत किया जा सकता है। इनके अध्ययन के साथ हम आधुनिक ज्ञान व विज्ञान का अध्ययन कर विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिगं, शिक्षा, बैंकिगं, व्यापार, वाणिज्य आदि किसी भी क्षेत्र में अपना व्यवसाय चुन कर सफल जीवन व्यतीत कर सकते हैं।



आज की सामाजिक व्यवस्था को भी जानने का प्रयास करते हैं। आज हमारे देश व संसार में अनेक मत-मतान्तर, धर्म, मजहब, सम्प्रदाय आदि हैं। यह सभी संसार के लोगों को अपने-अपने मत का अनुयायी बनाने का प्रयास करते हैं। ईश्वर के एक होने पर भी सबकी अपनी-अपनी भिन्न-भिन्न विचारधारायें, मान्यतायें, सिद्धान्त तथा उपासना पद्धतियां है। किसी को भी इस बात से कोई सरोकार नहीं दिखता कि उनके द्वारा की जाने वाली क्रियाओं व उपासना पद्धतियों से ईश्वर प्रसन्न होता है अथवा नहीं? ईश्वर क्या चाहता है किसी मत के द्वारा जानने का प्रयास नहीं किया जाता है। वैदिक मत व धर्म में यह प्रयास अवश्य किया गया है। उनके अनुसार ईश्वर सभी जीवों का सुख चाहता है इसी लिए उसने सृष्टि को बनाया आरै आरम्भ में ही संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु वेदों का ज्ञान दिया जिसमें ईश्वर की ओर से मनुष्यों के कर्तव्यों का उल्लेख है। इन वैदिक कर्तव्यों की व्याख्यायें दर्शन, उपनिषद व मनुस्मृति ग्रन्थों में भी दी गई है।  वेदों के ज्ञान का महत्व इस लिए सर्वाधिक है क्योंकि मनुष्य का आत्मा जन्म व मरण धर्मा है। इसका अर्थ है कि यह सृष्टि काल में जन्म-मृत्यु-जन्म के चक्र में बन्धा हुआ होता है, जन्म के बाद पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मानुसार आयु, जाति व सुख व दुःखों को प्राप्त कर भोगता है और कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त होता है। मृत्यु के बाद पुनः पूर्व व इस जन्म के शेष कर्मों के आधार पर नया जन्म मिलता है। यह जन्म किये हुए कर्मों के अनुसार होता है। यह सम्भव है कि हम अगले जन्म में मनुष्य बने और यह भी सम्भव है कि हम पशु, पक्षी, कीट व पतंग में से किसी योनि या जाति प्रजाति में पैदा हों। हमारा भावी जन्म मनुष्य योनि में अच्छे सुशिक्षित व सुखी परिवारों में हों जहां हम सत्कर्मों को करते हुए धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करें, इसके लिए ही वैदिक कर्तव्यों का पालन करने का विधान है।



सृष्टि के आदि काल में मनुष्यों की उत्पत्ति एवं वेदों के प्रादुर्भाव से ही काल गणना आरम्भ कर दी गई थी जो अद्यावधि जारी है। इस समय सृष्टि संवत् 1,96,08,53,115 चल रहा है। इस लम्बी अवधि में अब से लगभग 5,100 वर्ष पूर्व महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में जनहानि हुई जिस कारण युद्ध के बाद सर्वत्र अव्यवस्था फैल गई। विगत 5000 वर्ष में देश के ज्ञानी वर्ग के आलस्य, प्रमाद आदि अनेक कारणों से वेदों का ज्ञान लुप्त हुआ जिससे अन्धविश्वास, अवैदिक परम्परायें व कुरीतियां प्रचलित हो गईं। अज्ञान व कुछ अन्य कारणों से पूर्ण अहिंसात्मक यज्ञों में पशुओं की हत्यायें की जाने लगीं। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन से वंचित कर दिया गया। देश भर में वेदों का अध्ययन समाप्त प्रायः हो गया। वेदों के अज्ञानतापूर्ण, मिथ्या व अश्लील अर्थ किये गये। सत्य वेदार्थ लुप्त प्रायः था जब कि वेदार्थ के कुछ ग्रन्थ अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरूक्त व निघण्टु आदि ग्रन्थ कुछ लोगों के पास उपलब्ध थे परन्तु इनका उपयोग नहीं किया जा रहा था। देश व समाज का पतन इस सीमा तक हुआ कि महाभारत काल तक बोलचाल व साहित्य की भाषा सर्वत्र संस्कृत ही थी परन्तु इसके बाद संस्कृत का वर्चस्व समाप्त होकर अन्य अनेक भाषायें अस्तित्व में आ गईं। इन परिस्थितियों के उत्पन्न होने से नये-नये मत यथा बौद्ध, जैन, अद्वैत, द्वैत, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि अस्तित्व में आयें। विदेशों में भी पारसी या जरदुश्त मत, यहूदी मत, ईसाई मत तथा इस्लाम मत आदि अस्तित्व में आये। यह क्रम चलता रहा और भारत में मतों की संख्या में वृद्धि होती रही। इस कारण संसार में अज्ञान फैल गया और एक ईश्वर की नाना प्रकार से स्तुति व प्रार्थनायें की जाने लगी। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के सत्य स्वरूप को जानने का प्रयास ही नहीं किया गया और न अब किया जा रहा है। सब जगह ‘अपनी अपनी ढफली, अपना अपना राग’वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अनेक मत-मतान्तर, मजहब, सम्प्रदाय व पन्थों के कारण समाज में समरसता समाप्त हो गई है। यदा-कदा यत्र-तत्र देश में साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं। सब अपने-अपने मत को श्रेष्ठ व ज्येष्ठ मानने लगे और हमारे विदेशी मतों ने तो धर्मान्तरण का कुचक्र भी चलाया। ऐसी अनेक घटनायें इतिहास में अंकित है जहां शासक वर्ग व बलवान शत्रु का मत न मानने वालों की हत्यायें कर दी जाती थी और यह कार्य बहुत बड़े पैमाने पर भारत में हुआ। सभी मतों का आपस में संवाद समाप्त हो गया और सब अपने अपने घर में शेर बन गये। सन् 1825 में महर्षि दयानन्द का जन्म होता है। वह वेदों का अध्ययन करते हैं और बहृमचर्य व योग के आधार पर अपूर्व पुरूषार्थ, तप एवं त्याग से वेदों के सत्य अर्थों को जानते हैं।  उन्होंने संसार के सभी मतों का अध्ययन किया और पाया कि सत्य धर्म केवल एक है और वह प्राचीन वेदों का धर्म है जिसे सनातन धर्म भी कहते हैं। उनको इस तथ्य का भी साक्षात हुआ कि विश्व शान्ति के लिए आवश्यक है कि सभी मतों का परस्पर संवाद हो, वार्तालाप, उपदेश, गोष्ठी, शास्त्रार्थ कर सत्य मत का निर्णय किया जाये और उस सत्य मत को सभी स्वीकार करें। उन्होंने अनेक मतों के विद्वानों से संवाद और शास्त्रार्थ भी किए जिसमें वैदिक मान्यतायें हीं  सत्य सिद्ध हुईं। बहुत से लोगों ने सत्य को स्वीकार भी किया परन्तु यह स्थिति नाममात्र की ही कही जा सकती है। इस पृष्ठ भूमि में अब हम भारत के पतन के कारणों पर विचार करते हैं और उन्नति के कारकों का भी उल्लेख करते हैं।



देश के पतन का पहला कारण तो वैदिक ज्ञान का लोप तथा असत्य व मिथ्या ज्ञान पर आधारित मतों का प्रादुर्भाव रहा जिस कारण देश में सर्वत्र अज्ञान, अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न हो गईं। इसके फलस्वरूप मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित करना, अवतारवाद की कल्पना व उसका प्रचलन, फलित ज्योतिष, जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था वा आधुनिक वर्णव्यवस्था, छुआ-छुत का प्रचलन, बाल विवाह-अनमेल विवाह व बहुविवाह, सती प्रथा, मदिरा पान, मांसाहार, अशिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान पर ध्यान न देना, निर्धनों व दुर्बलों का धनिकों व बलवानों द्वारा शोषण व उन पर अत्याचार आदि अनेक पतन के कारण समाज व देश में उपस्थित हुए। यह सब देश में चल पड़ा परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति उत्पन्न नहीं हुआ जो इनके विरूद्ध आवाज उठाता। इसका श्रेय स्वामी दयानन्द सरस्वती को मिला जिन्हें उनके गुरू स्वामी विरजानन्द सरस्वती ने असत्य का खण्डन और सत्य का मण्डन कर देश व इसके पुराने सत्य वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए प्रेरित किया था।  स्वामी दयानन्द जी ने पतन को समाप्त करने और देश व विश्व का कल्याण करने के लिए 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की और इसके 10 स्वर्णिम नियम बनाये जिनमें से एक ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये’है। दूसरा अति महत्वपूर्ण नियम यह है कि ‘अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’उनकी इस प्रेरणा से उनके प्रमुख अनुयायियों स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरूदत्त विद्यार्थी, स्वामी दर्शनानन्द, महात्मा हंसराज, पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु आदि ने गुरूकुलों व दयानन्द एंग्लो वैदिक कालेजों का देश भर में विस्तार किया। आर्य समाज के स्वर्णिम नियमों यह नियम भी हैं कि “सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये। मनुष्य को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिये। समाज का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और आत्मिक उन्नति करना।“ यह नियम यद्यपि आर्य समाज के नियम हैं परन्तु इन नियमों का कोई भी विरोधी नहीं हो सकता। इसी प्रकार से ईश्वर के स्वरूप व उसके द्वारा प्रदत्त वेद ज्ञान से सम्बन्धित नियम भी देश व काल की सीमा से परे होने के साथ मानवमात्र के लिए हितकारी हैं व जीवन की उन्नति के आधार हैं। जहां यह नियम सरल व सुबोध हैं एवं देश व समाज के लिए लाभप्रद हैं वहीं देश के नाना प्रकार के मतों व अज्ञान तथा अन्धविश्वासों में ग्रसित होने के कारण इनका क्रियान्वयन असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।



समाज की उन्नत अवस्था वह अवस्था हो सकती हैं जहां किसी के साथ पक्षपात न होता हो और न ही अन्याय। सभी देशवासी शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ, सुखी, सम्पन्न व समृद्ध हों। इसके साथ सभी का धार्मिक व सामाजिक दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक है। एक ही मत, एक जैसी परम्परायें और एक समान ही सबकी विचारधारा हो। यह उन्नति की स्थिति है और इसके विरीत जो स्थिति हो सकती है वह अवनति की स्थिति या अल्प उन्नति की स्थिति कही जा सकती है। समाज ऐसा हो जहां सभी लोग संसार की सबसे प्राचीन भाषा को बोलना व लिखना जानते हों। हिन्दी का ज्ञान भी सभी देशवासियों को होना चाहिये। इनका जो विरोध करे वह कड़े व तत्काल दण्ड से दण्डित किया जाये। इन दो भाषाओं के बाद क्षेत्रीय भाषा व अंग्रेजी का स्थान होना चाहिये। देश के लिए सर्वत्र एक समान, अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिये। वेदाध्ययन अनिवार्य होना चाहिये। वेदों की उपेक्षा सहन नहीं की जानी चाहिये। यहां यह कहना उचित होगा कि वेद किसी मत या पन्थ का ग्रन्थ नहीं अपितु साक्षात् ईश्वर से प्राप्त सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ हैं जिन पर संसार के सभी मानवेों का अधिकार है और सबको इसका अध्ययन व पालन करना परम कर्तव्य व मानव धर्म है। सभी अन्धविश्वास व कुरीतियों को सरकारी राजाज्ञा द्वारा निषिद्ध किया जाना चाहिये जिसे वेदों के विद्वान, सभी ज्ञानी, शिक्षाविद व वैज्ञानिक मिलकर तय करें। विरोध करने वालों को उचित दण्ड शीघ्रातिशीघ्र मिलना चाहिये। अज्ञान पर आधारित मतों पर प्रतिबन्ध होना चाहिये। देश में कम से कम सरकारी अवकाश हों। पुरूषार्थ की पूजा हो और पुरूषार्थहीन का असम्मान हो। गुणी लोगों को बिना किसी पक्षपात के रोजगार मिलना चाहिये और अयोग्य को समय-समय पर छानबीन कर उन्हें उनकी योग्यता व स्वभाव के अनुसार कार्य दिया जाना चाहिये। सामाजिक समरसता के लिए भी कानून हो। जो इसमें रूकावट करें वह कोई भी हों, दण्डित होने चाहियें। धन की भी एक सीमा होनी चाहिये। जो अधिक धनी हैं उनकी भी अधिकतम् सीमा होनी चाहिये। उससे अधिक धन सरकार उनके कर के रूप में लेकर उससे निर्धनों के कल्याण के कार्यक्रम चलाए जिससे सामाजिक व आर्थिक असमानता कम से कम हो। देश में एक ऐसा वातावरण बनना चाहिये जिसमें त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले अधिक सम्मानित माने जाने चाहिये और सभी को उनका यथोचित सम्मान करना चाहिये। यदि ऐसा नहीं करेंगें तो राष्ट्र उन्नत न होकर अवनति को प्राप्त होगा। अवनति के जहां अनेक कारण होते हैं वहां मांसाहार व मदिरापान भी आध्यात्मिक एवं भौतिक अवनति का कारण होता है। मदिरापान और मांसाहार सहित सभी प्रकार के नशों से मनुष्य का शरीर निर्बल होकर रोगग्रस्त हो जाता है। उसकी शारीरिक व बौद्धिक क्षमतायें स्वस्थ मनुष्य की अपेक्षा कम होती है। विलासी और व्यस्नी मनुष्यों से राष्ट्र को अधिक लाभ नहीं हो पाता जो व्यस्नों से रहित देशवासियों से होता है। अतः शासक व शासक वर्ग को इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इसके साथ देश का सामरिक दृष्टि से भी पड़ोसी देशों से कहीं अधिक बलवान होना अति आवश्यक है। संसार का कोई देश अपनी सैन्य व अन्य किसी शक्ति के कारण हमें अपनी बात मानने के लिए विवश न कर सके, इस लिए हमें उनके समान व अधिक बल व सामर्थ्य देश में उत्पन्न करना आवश्यक है। गोहत्या किसी भी देश के लिए अभिशाप व कलंक होता है। गोहत्या एक प्रकार से राष्ट्र की हत्या के समान है। ईश्वर की दृष्टि में भी यह एक जघन्य अपराध है। ऐसे नागरिक कभी भी मन की प्रसन्नता, वास्तविक सुख व शान्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। अवनति के इन कारणों को दूर करने पर ही देश उन्नति कर सकता है। आशा की जानी चाहिये कि भविष्य में यह स्वर्णिम समय अवश्य आयेगा।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

भारतवर्ष के महान दीवार अर्थात द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया का रहस्य

भारतवर्ष के महान दीवार अर्थात द ग्रेट वॉल ऑफ  इंडिया का रहस्य 

भारतवर्ष का महान दीवार


चीन के दीवार का नाम विश्व में सभी जानते हैं , परन्तु आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि भारत में भी एक ऐसी दीवार है जो सीधे तौर पर चीन के दीवार को टक्कर देती है | जिसे भेदने की कोशिश अकबर ने भी की लेकिन भेद न सका। जिसके दीवार की मोटाई इतनी है कि उस पर 10 घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं।कुम्भलगढ़ किला उदयपुर शहर से 64 किलोमीटर की दूरी पर है | उदयपुर शहर से कुम्भलगढ़ किले तक आसानी से पहुंचा जा सकता है |
कैसे बनी ये 36 किलोमीटर लंबी दीवार ?
किले के दीवार की निर्माण से जुड़ी कहानी बहुत ही दिलचस्प है | 1443 में राणा कुंभा ने किले का निर्माण शुरू किया लेकिन, जैसे जैसे दीवारों का निर्माण आगे बढ़ा वैसे-वैसे दीवारें रास्ता देते चली गई। दरअसल, इस दीवार का काम इसलिए करवाया जा रहा था ताकि विरोधियों से सुरक्षा हो सके | लेकिन दीवारें थी की बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी | फिर कारिगरों ने राजा को बताया कि यहां पर किसी देवी का वास है।
इस किले के लिए चढ़ाई गई संत की बलि
देवी कुछ और ही चाहती हैं राजा इस बात पर चिंतित हो गए और एक संत को बुलाया और सारी गाथा सुनाकर इसका हल पूछा | संत ने बताया कि देवी इस काम को तभी आगे बढ़ने देंगी जब स्वेच्छा से कोई मानव बलि के लिए खुद को प्रस्तुत करे | राजा इस बात से चिंतित होकर सोचने लगे कि आखिर कौन इसके लिए आगे आएगा | तभी संत ने कहा कि वह खुद बलिदान के लिए तैयार है और इसके लिए राजा से आज्ञा मांगी |
संत ने कहा कि उसे पहाड़ी पर चलने दिया जाए और जहां वो रुके वहीं उसे मार दिया जाए और वहां एक देवी का मंदिर बनाया जाए | ठीक ऐसा ही हुआ और वह 36 किलोमीटर तक चलने के बाद रुक गया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया | जहां पर उसका सिर गिरा वहां मुख्य द्वार है और जहां पर उसका शरीर गिरा वहां दूसरा मुख्य द्वार है |
यह किला चारों तरफ से अरावली की पहाड़ियों की मजबूत ढाल द्वारा सुरक्षित है |
इसका निर्माण पंद्रहवी सदी में राणा कुम्भा ने करवाया था। पर्यटक किले के ऊपर से आस पास के रमणीय दृश्यों का आनंद ले सकते हैं | शत्रुओं से रक्षा के लिए इस किले के चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया था | ऐसा कहा जाता है कि चीन की महान दीवार के बाद यह एक सबसे लम्बी दीवार है | यह किला 1,914 मीटर की ऊंचाई पर समुद्र स्तर से परे क्रेस्ट शिखर पर बनाया गया है। इस किले के निर्माण को पूरा करने में 15 साल का समय लागा |
दस घोड़े एक साथ दौड़ते है इसके दीवार पर
महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 किले आते थे जिसमें से 32 किलों का नक्शा उसके द्वारा बनवाया गया था | कुंभलगढ़ भी उनमें से एक है | इस किले की दीवार की चौड़ाई इतनी ज्यादा है कि 10 घोड़ों को एक ही समय में उसपर दौड़ सकते हैं | एक मान्यता यह भी है कि महाराणा कुंभा अपने इस किले में रात में काम करने वाले मजदूरों के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रूई का प्रयोग करता था |
यहां है "बादलों का महल"
बादल महल को ‘बादलों के महल’ के नाम से भी जाना जाता है | यह कुम्भलगढ़ किले के शीर्ष पर स्थित है | इस महल में दो मंजिलें हैं एवं यह संपूर्ण भवन दो आतंरिक रूप से जुड़े हुए खंडों, मर्दाना महल और जनाना महल में विभाजित हैं |
इस महल के कमरों के दीवारों पर सुंदर दृश्यों को अंगित किया गया है जो उन्नीसवीं शताब्दी के काल को प्रदर्शित करते हैं |
उस समय भी होता था एसी का प्रयोग
आज भी एसी का प्रयोग कर ऑफिसों में पाइपों के द्वारा ठंढ़क पहूंचाई जाती है | उस समय भी महल के इस परिसर में रचनात्मक वातानुकूलन प्रणाली लगा हुआ था जो आज भी है | यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है जिसे देखना एक दिलचस्प बात है | इसमें पाइपों की एक श्रृंखला है जो इन सुंदर कमरों को ठंडी हवा प्रदान करती है और साथ ही कमरों को नीचे से भी ठंडा करती हैं | पर्यटक जनाना महल में पत्थरों की जालियों से बाहर का नजारा देख सकते हैं | ये जालियां रानियों द्वारा दरबार की कार्यवाही को देखने के लिए प्रयोग में लाई जाती थी |
सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी न मार सके पैर:
सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए इस दुर्ग में ऊंचे स्थानों पर महल, मंदिर व आवासीय इमारतें बनायीं गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया वही ढलान वाले भागों का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वावलंबी बनाया गया | इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है |
इसे बनाते समय रखा गया वास्तु शास्त्र का ध्यान:
वास्तु शास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर, जलाशय, बाहर जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारते, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है |
सिर्फ एक बार छाया किले पर हार का साया
कुंभलगढ़ को अपने इतिहास में सिर्फ एक बार हार का सामना करना पड़ा जब मुगल सेना ने किले की तीन महिलाओं को जान से मारने की धमकी देकर अंदर प्रवेश करने का रास्ता पूछा | महिलाओं ने डर से एक गुप्त द्वार बताया लेकिन, इसके बाद भी मुगल अंदर जाने में सफल नहीं हो पाए। एक बार फिर अकबर के बेटे सलीम ने भी इस किले पर फतह करने की सोची लेकिन उसे भी खाली हाथ वापस लौटना पड़ा |
जिसे कोई और न मार सका उसके बेटे ने ही ले ली जान
महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है | महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा | यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था |
धोखा देने पर चुनवा दिया दीवार में
कुछ समय बाद जब राजा को उस महिलाओं के बारे में पता चला तो उन्होंने तीनों को किले के द्वार पर दीवार में जिंदा चुनवा दिया | ऐसा कर राजा ने लोगों को यह संदेश दिया कि राज्य के सुरक्षा के साथ जो भी खिलवाड़ करेगा उसका यही अंजाम होगा |


सोमवार, 8 सितंबर 2014

गौरवमयी भारतवर्ष की गौरव कथा

गौरवमयी भारतवर्ष की गौरव कथा 

भारत के गौरव पर प्रकाश डालते हुए मैक्समूलर ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया: व्हाट कैन इज टीच अस’ में लिखा है-‘‘यदि मैं विश्वभर में से उस देश को ढूंढने के लिए चारों दिशाओं में आंखें उठाकर देखूं जिस पर प्रकृति देवी ने अपना संपूर्ण वैभव, पराक्रम तथा सौंदर्य खुले हाथों लुटाकर उसे पृथ्वी का स्वर्ग बना दिया है तो मेरी अंगुली भारत की ओर उठेगी। यदि मुझसे पुन: पूछा जाए कि अंतरिक्ष के नीचे कौन सा वह स्थल है जहां मानव के मानस ने अपने अंतराल में निहित ईश्वर प्रदत्त अनन्यतम सदभावों को पूर्णरूप से विकसित किया है, गहराई में उतरकर जीवन की कठिनतम समस्याओं पर विचार किया है, उनमें से अनेकों को इस प्रकार सुलझाया है जिसको जानकर प्लेटो तथा कांट का अध्ययन करने वाले मनीषी भी आश्चर्य चकित रह जाएं तो मेरी अंगुली पुन: भारत की ओर उठेगी और मैं, यदि स्वयं अपने आपसे पूंछू कि हम यूरोप के वासी जो अब तक केवल ग्रीक, रोमन तथा यहूदी विचारों में पलते रहे हैं, किस साहित्य से वह प्रेरणा ले सकते हैं, जो हमारे भीतरी जीवन का परिशोधन करे, उसे उन्नति के पथ पर अग्रसर करे, व्यापक बनाये, विश्वजनीन बनाये सही अर्थों में मानवीय बनाये, जिससे हमारे इस पार्थिव जीवन को ही नही हमारी सनातन आत्मा को प्रेरणा मिले तो फिर मेरी अंगुली भारत की ओर उठेगी।’’
सचमुच हमारे लिए यह गौरव और गर्व की बात है कि हम आदिकाल से ज्ञान विज्ञान के उपासक होने के कारण ही सनातन धर्मी हैं। हमारा मूल वेद है जिसका शाब्दिक अर्थ ही ज्ञान है। इस मूल की शाखाएं भी गुण कर्म, स्वभाव में वैसी ही हैं जैसी कि होनी चाहिए। ये शाखाएं जैन (ज्ञान से बिगडक़र जैन बना है) बौद्ध (बोध-ज्ञान का समानार्थक) और सिक्ख (शिष्य-ज्ञान और विद्या का अभिलाषी) है।
भारत की इस ज्ञान परंपरा पर कितने ही लोगों ने अपना सर्वस्व होम कर दिया। संसार की भौतिक सुख संपदा को भारत की इस आध्यात्मिक पूंजी के समक्ष तुच्छ समझा। औरंगजेब का भाई दाराशिकोह उपनिषदों के रस का रसिया हो गया, और छह माह तक निरंतर इन उपनिषदों की व्याख्या काशी के पंडितों से सुनता रहा। 1656 ई. में उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करा दिया। इसी काल में औरंगजेब सत्ता षडयंत्र रचता रहा और एक सात्विक वृत्ति के व्यक्ति को दारा के रूप में सत्ता से दूर करने में सफल हो गया, पर उस व्यक्ति ने तनिक भी इस बात का बुरा नही माना।
कपिल देव द्विवेदी लिखते हैं कि वेदों के विषय में मनु का यह कथन सारगर्भित है कि-‘‘सर्वज्ञानमयो हि स:’’ (मनु 2-7) अर्थात वेदों में सभी विद्याओं के सूत्र विद्यमान हैं।
वेदों में जहां धर्म, आचारशिक्षा, नीतिशिक्षा, सामाजिक जीवन, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि से संबद्घ पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है वहीं विज्ञान के विविध अंगों से संबद्घ सामग्री भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। वेदों में भौतिकी रसायन विज्ञान, वनस्पति शास्त्र, जंतु विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृषि, गणित शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, वृष्टि विज्ञान, पर्यावरण एवं भूगर्भ विज्ञान से संबद्घ सामग्री भी बहुलता से प्राप्त है।
अब ऐसे ही ज्ञानोपासक भारत के लिए समाचार मिला है कि अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में मैथ्स के प्रोफेसर भारतीय मूल के मंजुल भार्गव (40 वर्ष) ने मैथमैटिक्स का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला ‘फील्ड्स मेडल’ प्राप्त किया है। यह मेडल 1936 ई. से निरंतर दिया जा रहा है और श्री मंजुल इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले पहले भारतीय मूल के व्यक्ति हैं। मंजुल ने ज्यामिती में कुछ नये तरीके विकसित किये और इस क्षेत्र में उनके पुरूषार्थ और उद्यम को देखते हुए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है। उन्होंने संस्कृत की सहायता से दो सौ वर्ष पुराने नंबर थ्योरी लॉ को सरल करके दिखा दिया था। संस्कृत के प्रति इतना आकर्षण श्री मंजुल को मानो उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है। क्योंकि उनके पितामह राजस्थान में संस्कृत के प्रोफेसर रहे थे। मंजुल का कहना है कि अपने दादाजी के पास उन्होंने 628 ई. पू. की भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त की संस्कृत में लिखी पांडुलिपि देखी थी। जिसका संस्कार बालक मंजुल के मनमस्तिष्क पर पड़ा और वह सफलता के नये नये आयामों को छूने लगा। श्री मंजुल  का कहना है कि उक्त पांडुलिपि में जर्मनी के गणितज्ञ कार्ल फ्रैंडरिच गॉस के जटिल नंबर थ्यौरी लॉ जैसे सिद्घांत को साधारण ढंग से समझाया गया है। इस लॉ के अनुसार दो परफेक्ट एक्वेयर्स के जोड़ से प्राप्त दो नंबरों को परस्पर गुणा किया जाए तो परिणाम भी दो परफेक्ट स्क्वेयर्स के जोड़ जितना ही होगा। भार्गव ने ब्रह्मगुप्त के संस्कृत में लिखे सिद्धांत को फेमस रयूबिक क्यूब पर लागू किया और 18वीं शताब्दी के गॉस के लॉ को अधिक सरल ढंग से समझाने में सफलता प्राप्त की।
ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब भारतीय मूल के लोगों ने अपनी ज्ञानोपासना के द्वारा विदेशों में भारत और भारतीयता का नाम उज्ज्वल किया है। मां भारती के लिए ये लोग गौरव और गर्व के योग्य होते हैं। अपने देश की महान विरासत को विश्व में प्रचारित प्रसारित करना और उससे शेष विश्व को लाभान्वित करना ही देश, समाज और विश्व की सच्ची सेवा है। इस क्षेत्र में यदि मंजुल ने उत्कृष्ट कार्य किया है और पुरस्कार प्राप्त किया है तो इस पर सभी देशवासियों को उन पर गर्व है। उन्होंने विश्व को बता दिया है कि संस्कृत एक मृत भाषा न होकर जीवंत और अमृत भाषा है, जिसमें सृष्टि का गूढ़तम ज्ञान अंतर्निहित है। इसके रहस्यों को जितना समझा जाएगा और सूत्रों की जितनी सहज, सरल और सरस व्याख्या की जाएगी, उतना ही समुद्रमंथन होगा और हमें अमृत मिलेगा।
उदाहरण के रूप में यजुर्वेद (18-24) और (18-25) में 1 से 33 तक की विषम संख्याएं और 4 से 48 तक की सम संख्याएं  दी गयी हैं। अथर्ववेद (2-24-1) में हमें भाग देने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार ऋग्वेद (1-140-2) में गुणा संबंधी उल्लेख मिलता है। हम यहां संकेत मात्र कर रहे हैं। केवल यह स्पष्ट करने के लिए कि गणित का गूढ़ ज्ञान भी किस प्रकार वेदों के मंत्रों में छिपा पड़ा है और यह भी कि विश्व का संपूर्ण ज्ञान विज्ञान भारत की भूमि का ऋणी है। आज हमारे ज्ञान विज्ञान पर उपेक्षा और उपहास का ताला जड़ दिया गया है, जिस कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने गौरवपूर्ण अतीत से कट रही है। यह घोर आश्चर्य और दुख का विषय है कि जो लोग हमसे ज्ञान विज्ञान प्राप्त करने के लिए आया करते थे आज हमें उन्हीं की ओर देखना पड़ रहा है। परमुखापेक्षी होने की यह शिक्षा प्रणाली हमारा अहित करती ही जा रही है और हम हैं कि इसका पीछा नही छोड़ रहे हैं। श्री मंजुल हमारे आज के युवा वर्ग के लिए निश्चय ही प्रेरणा स्रोत बनेंगे।
मैगास्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में लिखा है कि सिकंदर जब आक्रमण करने के लिए भारत की ओर चला तो वह पहले अपने गुरू अरस्तू से आज्ञा प्राप्त करने गया। उसने अरस्तू से पूछा कि  आपके लिए भारत से क्या लाऊं ? तो उस पर अरस्तू ने कहा था कि मेरे लिए भारत से दो उपहार लेकर आना-एक गीता और दूसरा कोई तपा हुआ दार्शनिक ऋषि। सिकंदर जब भारत से लौटने लगा तो उसे उस समय गीता तो सहज रूप से उपलब्ध हो गयी, परंतु विश्व विजेता पराजित सिकंदर को कोई दार्शनिक ऋषि उपलब्ध नहीं हुआ, तब उसने अपने एक विश्वसनीय औनियोक्रोटस नामक व्यक्ति को कोई दार्शनिक ऋषि खोजने के लिए भेजा। बड़ी कठिनता से दो साधु उस व्यक्ति को मिले। जिनमें से एक का नाम उसने ‘डैंडीमीज’ (दंडी स्वामी) लिखा है। इस डैंडीमीज ने सिकंदर के साथ जाने से इन्कार कर दिया। वह दूसरा संत ही सिकंदर के साथ गया।
यह था भारत जिसके ऋषि भी दूसरे देशों के दार्शनिकों के लिए कौतूहल और जिज्ञासा का श्रद्धामयी केन्द्र हुआ करते थे। हर्बर्ट ने जिस ‘फाइव स्टैप्स ऑफ हर्बर्ट’ को देकर संसार में अपना नाम कमाया है, वह हमारी ही खोज थी। प्राचीन काल में शिक्षा शास्त्री ज्ञान तक पहुंचने के लिए पांच क्रम रखते थे-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय तथा निगमन। छांदोग्योपनिषद में ऋषि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा-देखो, सामने वटवृक्ष है, उसका फल ले आओ। श्वेतकेतु कुछ ही क्षणों में फल लेकर आ जाता है। तब ऋषि ने कहा- श्वेतकेतु इस फल को तोड़ दो। श्वेतकेतु ने फल तोड़ दिया। ऋषि ने पूछा इसमें क्या देखते हो? कहा-भगवन मैं इसमें छोटे-छोटे बीज देखता हूं। कहा -इनमें से एक दाने को तोड़ दो। श्वेतकेतु ने एक बीज तोड़ दिया। कहा इसमें क्या देखते हो? उत्तर मिला भगवान कुछ भी नहीं। गुरू ने कहा-सोम्य! तू कुछ भी नही कह रहा है, जिसे अणु रूप में तू कुछ नहीं देख पा रहा है उसी से यह महान वृक्ष खड़ा हो जाता है।
यह थी हमारी शिक्षा प्रणाली। खेल खेल में शिक्षा नही ज्ञान परोसती थी। इसी रहस्य को समझने के लिए कि समस्त विश्व अणुवाद के सिद्घांत से संचालित हैं, आज के विश्व ने करोड़ों अरबों डालर खर्च किये और एक हमारा ऋषि था कि जिसने एक वट वृक्ष के बीज से ही श्वेतकेतु को समझा दिया कि अणुवाद क्या है? और यह कैसे समस्त चराचर जगत का मूल आधार है।
मंजुल का संस्कृत संस्कृत प्रेम और उससे बनी उसकी सफलता की कहानी बहुत कुछ कह रही है। इस ‘बहुत कुछ’ को दीवार पर लिखी इबारत की तरह पढऩे में भी अक्षम है, और हमारे ऋषि ने श्वेतकेतु के द्वारा बीज में ‘कुछ भी न देखने’ की बात सुनकर भी उसे पढ़ा दिया कि कुछ भी नही देखने का अर्थ क्या है? परायी शिक्षा पद्घति पर चलकर अपनी चाल को भूल जाना और मौलिक शिक्षा पद्घति के बीच का अंतर है ये। इसे पाटना आज की सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए। यदि हम अपने मौलिक चिंतन से भटकने से नही तो सब कुछ खो बैठेंगे। जबकि भारत जैसे सत्य सनातन राष्ट्र के लिए खोना नही, सदा पाना ही श्रेयस्कर है। तभी इसके सनातन धर्म की सनातनता अक्षुण्ण रह सकती है।