रविवार, 15 दिसंबर 2013

मुसलमान :राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान

मुसलमान :राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान

यह बात तो सब जानते है कि भारत के मुसलमान "वन्दे मातरम "का विरोध करते हैं .उनका तर्क है की , वह अल्लाह के सिवा किसी की स्तुति या वंदना नहीं कर सकते है .यह इस्लाम केविरुद्ध है.ऐसा उनका तर्क है .भारत में लगभग 19370 मदरसे चल रहे हैं ,और सबको सरकार से मदद मिलाती है .लेकिन आपने आजतक किसी मदरसे में नहीं देखा होगा कि 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रिय पर्वों पर वहां सम्मान पूर्वक राष्ट्र ध्वज फहराया गया हो ,और राष्ट्र गान गाया गया हो .मुसलमान इसे गुनाह मानते हैं .कुछ समय पूर्व एक फतवा पढ़ने को मिला था ,जिसमे ,लोगों ने मुल्लों से पूछा था कि ,क्या राष्ट्र गान गाना और राष्ट्र ध्वज का सम्मान करना इस्लाम में जायज है ?उत्तर के रूप में जो फतवा दिया गया है ,उसके मुख्य अंश हिंदी और अंगरेजी में दिए जा रहे हैं .साथ में कुरान कि उन आयतों ,और हदीसों के अरबी में हवाले भी दिए जा रहे हैं ,जिनके अधर पर इसे हराम करार दिया गया .

यह फतवा गुरुवार दिनांक -23 दिसंबर 2010 को "फतवा अल जन्नाह अल दायमा "ने जारी किया है ,जिसे ई मेल से भारत भेजा गया था .

111877 -Thu 17/1/1432 - 23/12/2010 Basic Tenets of Faith

Respect for the national anthem or flag" احترام النشيد الوطني او العلم"

What is the ruling on standing when the national anthem is played, or when the flag is saluted?.

Praise be to Allaah.- الحمد لله .

Firstly:

पहिली बात यह है कि ,राष्ट्र गान को गाना और सुनना हराम है !

Playing or listening to national anthems is haraam.

This has been discussed in the answer to question no. 5000 and 20406. It makes no difference whether what is played is songs or the national anthem or anything else.

सवाल संख्या 5000 और 20406 पर विमर्श के बाद तय किया कि चाहे राष्ट्र गान हो ,या कोई और उस से कोई फर्क नहीं होता .

Secondly:

दूसरी बात यह है कि , विनम्रता से खड़ा होना है ,जो सर्फ अल्लाह के लिए ही होना चाहिए
Standing by way of humility and veneration is not befitting unless it is done for Allaah.

الدائمة عن طريق التواضع والتعظيم لا يليق إلا إذا تم القيام به من أجل الله

Allaah says (interpretation of the meaning):

“And stand before Allaah with obedience”

इस आयत में स्पष्ट किया गया है कि ,"अल्लाह के आगे पूरे भक्ति और विनय भाव से खड़े हो" .सूरा -बकरा 2 :238

والوقوف بين يدي الله مع طاعة

al-Baqarah 2:238].
और जिस दिन रूह और फ़रिश्ते पंक्तिबद्ध होकर खड़े होंगे ,वे बोलेंगे नहीं ,सिवाय उस व्यक्ति के ,जिसे रहमान अनुज्ञा दे दे .

Allaah has said that because of His greatness and majesty, the greatest of creation (the angels) will stand for Him on the Day of Resurrection and no one will speak until after Allaah has given him permission. He says (interpretation of the meaning):

“The Day that Ar‑Rooh [Jibreel (Gabriel)

يَوْمَ يَقُومُ الرُّوحُ وَالْمَلَائِكَةُ صَفًّا لَّايَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرحْمَنُ وَقَالَ صَوَابًا

[al-Naba’ 78:38].
जो कोई किसी अल्लाह के द्वारा पैदा की गयी किसी भी चीज के आगे खड़े होकर वैसा आदर प्रकट करे ,जिसका हक़ सिर्फ अल्लाह को है ,तो रसूल ने कहा जो भी किसी मनष्य के आगे खड़ा होगा तो उसका स्थान जहन्नम में होगा .
The one who claims that there is any created being for whom one should stand out of respect have given that created being one of the rights of Allaah.

Hence the Prophet (peace and blessings of Allaah be upon him) said:

“Whoever likes men to stand up for him, let him take his place in Hell.”
"من يحب الرجال على الوقوف له ، فليتبوأ مقعده من النار
Narrated by al-Tirmidhi (2755);

classed as saheeh by al-Albaani in Saheeh al-Tirmidhi. That is because this is part of the might and pride that belongs only to Allaah.

وذلك لأن هذا هو جزء من القوة والعزة التي ينتمي فقط إلى الله تعالى

See: Tafseer al-Tahreer wa’l-Tanweer by al-Taahir ibn ‘Ashoor (15/51).

जब खलीफा अल महदी रसूल की मस्जिद में दाखिल हुए तो उनके आदर में सब खड़े हो गए ,सिवाय इमरान इब्न अबी जई के .लोगों ने कहा खड़े हो जाओ यह अमीरुल मोमिनीन हैं ,उन्होंने कहा लोगों को सिर्फ दुनिया के मालिक के आगे खड़ा होना चाहिए .तुम चाहे मेरे बाल पकड कर मुझे खड़ा कर लो .
The caliph al-Mahdi entered the Mosque of the Messenger of Allaah (peace and blessings of Allaah be upon him) and the people all stood up for him except Imam Ibn Abi Dhi’b. It was said to him: Stand up; this is the Ameer al-Mu’mineen. He said: The people should only stand up for the Lord of the Worlds.
Al-Mahdi said: Let him be, for all the hairs of my head have stood on end.

Siyar A’laam al-Nubala’ (7/144).

The scholars of the Standing Committee were asked: Is it permissible to stand to show respect to any national anthem or flag?

They replied: فلا يجوز للمسلم أن يقف احتراما لأي النشيد الوطني أو العلم

सलमानों को यह इजाजत नहीं है कि राष्ट्र ध्वज के आगे खड़े होकर उसका आदर करें और राष्ट्रगान गायें ,चाहे उस समारोह में राष्ट्रपति भी क्यों न हो .

It is not permissible for the Muslim to stand out of respect for any national anthem or flag, rather this is a reprehensible innovation which was not known at the time of the Messenger of Allaah (peace and blessings of Allaah be upon him) or at the time of the Rightly-Guided Caliphs (may Allaah be pleased with them), and it is contrary to perfect Tawheed and sincere veneration of Allaah alone. It is also a means that leads to shirk and is an imitation of the kuffaar in their reprehensible customs, and following them in their exaggeration about their presidents and in their ceremonies. The Prophet (peace and blessings of Allaah be upon him) forbade imitating them.

فلا يجوز للمسلم أن يقف احتراما لأي النشيد الوطني أو العلم، بل هو من البدع المنكرة التي لم تكن معروفة في عهد رسول الله صلى الله عليه وعليه وسلم) أو في زمن الخلفاء الراشدين رضي الله عنهم)، وأنها منافية لكمال التوحيد والتبجيل خالص لله وحده. وهي أيضا وسيلة تؤدي إلى الشرك وتشبها بالكفار في عادتهم القبيحة ، ومجاراة لهم في غلوهم نظرهم حول رؤسائهم واحتفالات. وقد نهى النبي صلى الله عليه وس "

And Allaah is the Source of strength; may Allaah send blessings and peace upon our Prophet Muhammad and his family and companions. End quote.

Fataawa al-Lajnah al-Daa’imah فتاوى اللجنة الدائمة آل

(1/235).
والله أعلم
And Allaah knows best.

यही कारण है कि ,मुसलमानमें राष्ट्र भक्ति का आभाव है ,और वे राष्ट्रगान और तिरंगा का आदर नहीं करते .मुसलमानों का रिमोट मुल्लों के हाथों

में होता है .यह खुराफाती मुल्ले चुपचाप फतवों से उनको भड़काते रहते हैं .लेकिन जब चाहे अपने अधिकारों कि बात करते रहते हैं .और हमारी सरकारें वोट कि खातिर उनके लिए खजाने खोल देती है .
सही बात है ,मुसलमान जिसका खाते हैं ,उसी को खा जाते हैं !

भारतीय रियासतों का एकीकरण और पटेल

लौह पुरुष सरदार पटेल को आज पुण्य तिथि के पावन अवसर पर कृतज्ञ राष्ट्रवासियों की भाव - भीनी हार्दिक श्रद्धांजलि,,,,, कोटि - कोटि श्रद्धा सुमन अर्पण,,,शत् शत् वंदन

भारतीय रियासतों का एकीकरण और पटेल

सरदार पटेल का नाम भारत की तत्कालीन 563 रियासतों के भारत में विलीनीकरण के कारण बहुत ही सम्मान से लिया जाता है। उनके लौहपुरूष होने का प्रमाण उनके द्वारा रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने के उनके महान कार्य में देखने को मिला।
भारत की स्वतंत्रता में राजशाही का कोई विशेष योगदान नही था। बहुत से शासक केवल नाम मात्र के शासक थे। छोटे छोटे रजवाड़े अपने किलों में या दरबारों में अपनी प्रशंसा कराके ही खुश हो जाते थे। परंतु इसके उपरांत भी उनके भीतर यह इच्छा अवश्य थी कि स्वतंत्र भारत में संभवत: वह भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकेंगे। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में वह भी अपनी स्वतंत्रता खोज रहे थे। उनकी यह इच्छज्ञ उस समय और भी बलवती हो गयी जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को यह अधिकार दे दिया कि वह चाहें तो भारत के साथ जा सकती हैं, चाहें तो पाकिस्तान के साथ जा सकती हैं और यदि चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बचाये रख सकती हैं।
बहुत से राजाओं ने स्वतंत्रता मिलते ही अपने को स्वतंत्र घोषित करने के सपने पालने आरंभ कर दिये। रामपुर और पालनपुर के मुस्लिम नवाब ऐसे शासक थे जिन्होंने बिना देरी किये और बिना किसी संकोच के भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। जबकि मंगरोल के शासक ने कुछ हिचकिचाहट के साथ अपना अस्तित्व भारतीय संघ के साथ विलीन कर दिया। इसमें सरदार पटेल का हस्तक्षेप हुआ और उन्होंने बड़ी सफलता प्राप्त की। टोंक रियासत के नवाब को भी जूनागढ़ के नवाब ने भड़काने का प्रयास किया। मुस्लिम लीगी नेता भी उसे पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। पर उसे भी सरदार पटेल ने उधर जाने से रोक लिया।
सरदार का राजोचित व्यवहार
महाभारत (अ.145 पू पृष्ठ 5949) में आया है :-
चारै: कर्म प्रवृत्या च तद् विज्ञाय विचारयेत्।
अशुभ निर्हरेत सद्यो जीवयेच्छुभात्मन:।।
अर्थात गुप्तचरों द्वारा और कार्य की प्रवृति से देश के शुभाशुभ वृतांत को जानकर उस पर विचार करे। तत्पश्चात अशुभ का तत्काल निवारण करे। अपने राज्य के (शुभ के) लिए शुभ का सेवन करे।
गहर्यान, निगर्हमेदेव पूज्यवान सम्पूज्येत तथा।
दणडर्याश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा।।
हे, वीर! शासक निंदनीय मनुष्यों की निंदा ही करे, पूज्यनीय पुरूषों का सत्कार करे और दण्डनीय अपराधियों को दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नही करना चाहिए।
सरदार पटेल का राजधर्म ऐसा ही था। वह निंदनीय पुरूषों के प्रति, राष्टï्रदोहियों के प्रति और अपूज्यों के प्रति ही कठोर थे। पूज्यनीय और राष्टï्रभक्तों के प्रति सदा ही वह सत्कार शील रहे।
उन्होंने भारतीय नरेशों के साथ बड़ी सावधानी से वार्तालाप किया। इस बात का पूरा ध्यान रखा कि किसी भी राजा के सम्मान को चोट न लगे और वह हमारी बात को भी मान ले। उन्होंने राजाओं को बताया कि वह चाहते हैं कि इस पवित्र भूमि को दुनिया के देशों के मध्य उपयुक्त स्थान दिलायें और इसे शांति एवं समृद्घि का घर बना दें।
स्वतंत्रता मिलते ही त्रावणकोर के हिंदू राजा ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। उसका अनुकरण करने का मन कुछ अन्य हिंदू नरेश भी बना रहे थे। इस प्रकार संकट केवल मुस्लिम रियासतों की ओर से ही नही था अपितु कहीं से भी उत्पन्न होना संभावित था। ऐसे में बहुत ही धैर्य और विवेक का परिचय देने वाले नेतृत्व की आवश्यकता थी। विशेषत:  तब जब कि अंग्रेज भारत को खण्ड खण्ड कर देने की चालें चल रही थीं और उन चालों में फंसने के लिए बहुत सी मछलियां स्वयं को तैयार बैठी थीं।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के उपरांत भोपाल के नवाब ने अपने चैम्बर ऑफ प्रिंसेस को अधिकृत कर कार्यरत घोषित कर दिया। भोपाल का नवाब 25 जुलाई 1947 की उस बैठक में भी नही गया था जिसे माउंट बेटन ने दिल्ली में आहूत किया था। उसने कह दिया था कि वह बैठक घोंघों को दरियाई घोड़े और कठफोड़वे के साथ चाय पीने के लिए बुलावा देने के समान है।
वायसराय माउंट बेटन ने भोपाल के नवाब को समझाया और उसे भारत के साथ विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया। जिसने उसे कुछ हिचकिचाहट के साथ मान लिया।
भोपाल के नवाब ने पटेल को लिखा:-मैं इस तथ्य को छिपाना नही चाहता कि संघर्ष के दिनों में मैंने अपनी रियासत की स्वतंत्रता व तटस्थता बनाये रखने के लिए वह सब कुछ किया जो मेरे बस में था। अब जबकि मैंने पराजय स्वीकार कर ली है, मुझे उम्मीद है कि आप पाएंगे कि मैं उतना ही पक्का मित्र हो सकता हूं जितना पक्का विरोधी था। आपकी ओर से मुझे सदा सम्मान मिला है, और मेरे साथ विनम्रता पूर्ण व्यवहार किया गया है, इसलिए किसी के बारे में मेरे मन में कोई विद्वेष नही है।
सरदार पटेल ने नवाब को अपनी उदारता और विनम्रता का जवाब यों दिया-स्पष्टï बात तो यह है कि आपकी रियासत के भारतीय राष्टï्र में विलय को मैं न अपनी जीत मानता हूं और न ही आपकी हार। अंतत: विजय न्याय एवं उपयुक्तता की हुई है। इस विजय में मैंने और आपने अपनी-अपनी भूमिका ही निभाई है। स्थिति की महत्ता को समझने और ईमानदारी तथा  साहस के साथ अपने पुराने रूख को बदलने के लिए आप श्रेय के पात्र हैं। हमारा यह मानना है कि आपका पिछला रूख भारत तथा आपकी अपनी रियासत दोनों के हितों के प्रतिकूल था। मुझे आपके इस आश्वासन के विशेष प्रसन्नता हुई है कि देश के गद्दारों से, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों निपटने में आप भारत का साथ देंगे। निष्ठा पूर्ण मैत्री के आपके प्रस्ताव का भी मैं स्वागत करता हूं। शरणागत शत्रु के प्रति उदारता अपनाना औरर उसे अभयदान देना भारतीय राजधर्म की विशेषता रही है। पराजित राजा के प्रति राजोचित व्यवहार करना भी केवल भारत की ही परंपरा रही है। सदार पटेल भारत के राजधर्म की जीती जागती मिसाल बन गये थे। वह कुछ ऐसा राजधर्म निभा रहे थे जैसा कि लेखक के ज्येष्ठ भ्राता श्री प्रो. वीएस आर्य जी की ये पंक्तियां बताती हैं:-
मित्र को हैं हम फूल से कोमल
शत्रु को फौलाद हैं हम।
वीर शिवाा, शेखर, राणा जी की,
वही तो वज्र औलाद हैं हम।।
अब जूनागढ़ की ओर आते हैं। यहां के शासक ने भी जिन्ना की बातों में आकर पाकिस्तान के साथ जाने का निर्णय लिया। जिन्ना ने इस रियासत के नवाब को केवल भारत को तंग व परेशान करने के लिए ही उपसाया था। इस रियासत के दीवान शाहनवाज भुट्टïो के पिता थे। वह रियासत को भारत के साथ जाने देने के घोर विरोधी थे। यद्यपि उनके ऐसे प्रयास सरदार पटेल के लौह व्यक्तित्व और बुद्घि चातुर्य के समक्ष शीघ्र ही ढीले पड़ गये। जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। इतना भयभीत कि अपनी एक बेगम को उसके हवाई अड्डे पर समय से न पहुंचकर के कारण वह उसका इंतजार न करके उसे यहां ही छोड़कर चला गया। बीस फरवरी 1948 को जूनागढ़ की जनता ने जनमत के माध्यम से भारत के साथ विलय कर दिया। जूनागढ़ यात्रा के दौरान ही सरदार पटेल ने घोषणा की थी कि महमूद गजनवी द्वारा तोड़े गये सोमनात के मंदिर का फिर से निर्माण कर उसे पुराना गौरव प्रदान किया जाएगा।
अब आते हैं हैदराबाद की रियासत पर। श्री के.एम. मुंशी ने यहां के कासिम रिजवी के बारे में लिखा है यद्यपि रिजवी धर्मांत था, पर वह बहुत ही चालाक और अथक परिश्रम करने वाला कार्यकर्ता था। वह लोगों को प्रेरित भी कर सकता था और आतंकित भी। आवश्यकता पडऩे पर वह मुस्करा सकता था, मजाक कर सकता था। अपने व्यक्तित्व से लोगों को अपने आकर्षण में बांध सकता था।
हैदराबाद की रियासत की जनसंख्या का 80 प्रतिशत भाग हिंदू था। कासिम रजवी हैदराबाद के निजाम पर दबाव बना रहा था।  उसने निजाम से कहकर उदार मंत्री मिर्जा अस्माइल को प्रधानमंत्री पद से हटवा दिया और छतारी के नवाब को इस पर बैठा दिया। छतारी के नवाब ने जिन्ना से पूछा कि यदि भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण किया तो क्या पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आएगा। जिन्ना ने दो टूक शब्दों में उत्तर दिया-यही यह सुनकर छतारी के नवाब के पैरों तले की जमीन खिसक गयी और उन्होंने हैदराबाद छोड़ दिया।
कासिलम रिजवी की घृणास्पद बातों में फंसकर हैदराबाद का निजाम भारत विरोधी बन गया था। यहां पर सरदार पटेल ने लंबी प्रतीक्षा के पश्चात पुलिस एक्शन लिया। रिजवी भाग गया और निजाम को सरदार के सामने झुकना पड़ गया। उसको बचाने के लिए कोई नही आया। सारे देश के मुस्लिम अखबारों ने भी लिखा था कि निजाम ने अपनी मूर्खताओं से अपनी परेशानियां बुलाईं। सुहरावर्दी, जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, ने भी लौहपुरूष को इस बात के लिए बधाई दी कि उन्होंने अपनी दक्षता से एक जटिल समस्या को सहज ही सुलझा लिया।
सरदार ने सुहरावर्दी को बताया-भारत के मुसलमानों ने हमारा साथ दिया जिसका निश्चित रूप से अच्छा प्रभाव पड़ा।
निजाम ने अपने किये पर प्रायश्चित किया। उसने रिजवी की साम्प्रदायिकता को कोसा और उसके रहते अपनी असहायावस्था को सहज की स्वीकार किया।
सरदार पटेल ने निजाम को लिखा महामहिम जैसा कि मैंने आपसे कहा, गलती करना मनुष्य की कमजोरी है। ईश्वरीय निर्देश भूल जाने व क्षमा करने का संकेत देते हैं, मनुष्यों का यह कत्र्तव्य है कि वे ईमानदारी से पाश्चाताप करके एवं शेष समय में जनता व ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस प्रक्रिया में अपना योगदान करें।
इस प्रकार सारे भारत को पटेल एक करने में सफल हुए उनसे कश्मीर की रियासत का प्रश्न नेहरू ने अपने लिये रख लिया था, उसे ही हम आज तक नही सुलझा पाए। काश, नेहरू कश्मीर को भी पटेल के हवाले कर देते।

इस्लामी मान्यताएं और वास्तविकता

इस्लामी मान्यताएं और वास्तविकता

इस्लाम धर्म में कुछ ऎसी मान्यताएं हैं जिन पर जिन पर हरेक मुसलमान को विश्वास करना
फ़र्ज़ है.और उस पर शंका करने या सवाल करने की कोई इजाजत नहीं है.इस्लाम्मे इसे ईमान
लाना कहा जाता है.ऎसी कुछ बातें इस इस तरह हैं,अल्लाह को एक मानना,फरिश्तों को मानना
,जन्नत और दोलख को मानना आदि .
इन मान्यताओं का आधार कुरआन और हदीसें हैं .इस्लाम की सारी धार्मिक पुस्तकें अरबी भाषा में हैं.अरबी एक शब्द संपदा से संपन्न भाषा है.इसकी व्याकरण लगभग संस्कृत मिलती है.एनी भाषाओं के मुकाबले अरबी में अभिव्यक्ति की क्षमता अधिक है इसलिए जब कुरआन को अरबी व्याकरण के अनुसार पढ़ा जाता है तो कुछ तथ्य मान्यताओं के विपरीत पाए जाते हैं,जैसे कि-
१-अल्लाह एक नहीं ,अनेक व्यक्ति हैं
कुरआन में जब भी अल्लाह अपने मुंह से कुछ बात कहता है ,तो वह "मैं "की जगह "हम "शब्द का प्रयोग करता है.अरबी में "अना"की जगह "नहनु"कहता है ,जोकि बहुवचन है .और एक से अधिक लोगों के लिए प्रयुक्त किया होता है देखिये

इन्ना नहनु अकरबु इलैह मं कुम सूरा वाकिया ५६:८५ हम तुम्हारे पास हैं
नहनु खलाक्नाकुम सूरा अम्बिया ५६:५७,इन्ना नहनुल हय्यी व् युमीतु सूरा अल हिज्र १५:२३ हम तुम्हें जीवित करते हैं और मारते हैं.
इन्ना नहनु नुही व् नुमीतु सूरा काफ ५०:५३ ,हम जीवन देते हैं और मौत देते हैं
ऐसे कुरआन में कई उदाहण हैं जिस से लगता है कि अलाह के साथ कोई और भी है जो उसके साथ काम कर रहा है वरना अल्लाह एकवचन की जगह बहुवचन में क्यों बोल रहा है यानी वाहिद की जगह जमा मुतकल्लिम में क्यों बोल रहा है.अर्थात अल्लाह एक नहीं है
२-फ़रिश्ते मर्द नहीं औरतें हैं
फ़रिश्ता फारसी शब्द है .इसके लिए अरबी शब्द मलायाकतुं है जो अरबी व्याकरण के अनुसार मुआन्निस जमा है .यानी स्त्रीलिंग बहुवचन है
अरबी में पुर्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए संज्ञा के आगे हे ते और दो पेश लगाए जाते हैं उदा-हामिदुन-हामिदतुन,सादिकुन सादिकतुं
इसलिए अरबी व्याकरण के अनुसार मलायाकतुन का अर्थ फरिस्ता नहीं फरिश्तिनी होना चाहिये और वे सारी औरतें हैं

३-फ़रिश्ते अजन्मा और अमर हैं
कुरआन में मनुष्य को काली मिट्टी से और जिन्नों को गर्म लू की लपटसे पैदा बताया है सूरा अल हिज्र १५:२७.२८
लेकिन फ़रिश्ते का बने और किस चीज से बने इस पर कुरआन मौन है .इतना प्रमाण है कि जिस समय आदम और जिन्नों को बनाया जारहा था फ़रिश्ते पहिलेसे मौजूद थे.फरिश्तों के न औलाद हो रही है और न वे मर रहे हैं अर्थात वह अजर अमर हैं .और अलह की तरह अजन्मा हैं
४-मुहम्मद ने औरत पर सवारी की सूरा बनी इसराएल के अनुसार जब मुहम्मद ने अल्लाह से मिलना चाहाथा वह मक्का ने था
और अल्लाह सातवें आसमान पर रहते हैं इसलिए अल्लाह ने एक फरिस्ते को भेजा ,जिसकी शक्ल और छाती से ऊपर का हिस्सा एक १४ साल की लड़की की तरह था.और धड एक गढ़ी की तरह थे .उसका नाम बुर्राक बताया जाता.वह घोड़ी से छोटी और गधीसे बड़ी थी .वह इंसान की तरह बात करती थी .और औरतोंकी तरह श्रृंगार किये थी . जब उसने मुहामद को देखा तो वह शर्मा गयी .अब जिब्रील ने कहा तुम शरमाओ मत ,यह नबी हैं ,जो तम्हारे ऊपर चढ़ कर अल्लाह के पास जायेंगे .बुर्राक ने मुहम्मद को सातों आसमान की सैर करायी..
इस यात्रा को मेराज कहा जाता है मुहम्मद ने बुर्राक को जोर से पकड़ा था ताकि गिर न जाए .बुर्राक के पंख भी थे .लेकिन उसने कोई पर्दा नहीं किया था .
इन बातों से पता चलता है कि इस्लामी मान्यताओं में कितनी विसंगतियां हैं.

इस्लाम है आतंकवाद का कारण

इस्लाम है आतंकवाद का कारण

इस्लाम के संदेश को यदि ध्यानपूर्वक विशलेषण किया जाय तो यह विषय यौन-विज्ञान का नूतन सिद्धांत है जो कि दैहिक भोग और विवेकहीन हिंसा, इन दो स्तंभों पर आधारित है

यह सिद्धांत उस अल्लाह के नाम होता है जो सर्वाधिक दयालु और सर्वोत्तम निर्णायक होने का दावा करता है यद्यपि यह मजहब इन स्तंभों के बिना खड़ा नहीं हो सकता है, इन्हें बड़ी चतुराई से दैवीय आवरण में छिपा दिया गया है इस्लाम को बौद्धिक कि कसौटी पर कसते ही इसकी चमक-दमक समाप्त हो जाती है
इतिहाश साक्षी है कि मोहम्मद में जितना प्रभुत्व कि ललक थी उतनी और किसी भी व्यक्ति में नहीं थी यदि हम सम्पूर्ण मानव समाज को एक पिरामिड के रूप में देखे तो “अरबी पैगम्बर” को ही पायेंगे, उन्होंने मानव जाती के आचरण के लिए स्वयं को दैवीय मानव के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका तात्पर्य यह है कि सभी को उसके अनुसार सोचना एवं अनुभव करना चाहिए, उसके अनुसार ही खाना-पीना चाहिए और सभी कानून जो उन्होंने अल्लाह के नाम पर बनाये है उनकी अपनी सुविधा के अनुकूल ही है
केवल अल्लाह में विश्वास ही का कोई महत्त्व नही है, इससे दैवीय कृपा और जन्नत तब तक नहीं मिलेगा जब तक मोहम्मद में विश्वास न व्यक्त किया जाय | वह एक ऐसे बिचौलिया है कि कयामत के दिन उसका शब्द ही इसका निर्णय करेगा कि कौन जन्नत में जायेगा और कौन दोखज में | इतना ही नहीं, अल्लाह और उसके फरिस्ते भी मुहम्मद के पूजा करते है
इसी से मोहम्मद कि प्रभुत्व कि ललक कि तीब्रता सिध्द होती है
यीशु मसीह भी यहोवा गाड कि पूजा करते हुए पाए गए थे “लेकिन अल्लाह और उसके फरिस्ते तो मोहम्मद कि पूजा करते है"
इस प्रकार कि स्थिति के जो कि मनुष्य और अल्लाह दोनों कि ही पकड़ से परे है, अर्जन के लिए धैर्य, आयोजन एवं शक्ति कि आवश्यकता है पैगम्बर को ये सभी मिले थे और उन्हें, इन सबको असामान्य सफलतापूर्वक संचालित करने कि योग्यता भी मिली थी
पैगम्बर ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि उनका राष्ट्र एक अजेय सैन्य शक्ति बने ताकि एक ऐसी शक्तिशाली साम्राज्य बन जाए, जोकि उनकी व्यक्तिगत पवित्रता एवं शिक्षा कि पुनिताता पर टिका हो| यातना अत्याचार और उत्पीडन कि प्रचंड खुराक दे सकने में सिध्द एक अति शक्ति संपन्न एवं निडर सेना निर्माण द्वारा अरब साम्राज्य स्थापना के अपने उद्देश्य कि पूर्ति के लिए पैगम्बर ने पुरुषों को आकर्षित करने के हेतु कामोत्तेजना को सबसे आकर्षण बल के रूप में प्रयोग किया
तथापि यह समझ कर कि पुरुष सिर्फ शारीरिक भोग तक सिमित नहीं रहता, तो उन्होंने अपील के आकर्षण का क्षेत्र विस्तृत करके जिहाद का अन्वेषण किया जिससे पवित्र सैनिको (मुजाहिद) कि न सिर्फ स्त्री और लडको कि ही प्रभुत मात्र कि पूर्ति होती थी , बल्कि गैर मिस्लिमो को लुटाने और उनकी हत्या को भी क़ानूनी रूप दे दिया, जो इस प्रकार अल्लाह को प्रसन्न करने का एक सबसे अच्छा रास्ता बन गया
यह पैगम्बर की शतरंजी चाल थी जिसके द्वारा उनके अनुयायियों के मस्तिष्क एक जबरदस्त विश्वास हो गया कि लूटपाट, हत्या बलात्कार तथा वर्णनातीत दुःख दर्द फैलाना, बच्चो को अनाथ और स्त्रियों को बिधवा करना जिहाद ( पवित्र युध्द ) के रूप में इस्लाम का सर्वोच्च काम है जिसके द्वारा जन्नत के द्वार खुलने कि पूरी गारंटी है
माना कि मुहम्मद के पहले भी बड़े-बड़े विजेता हुए है परन्तु किसी ने भी इसे अतुअचारो कि पवित्रता का दर्जा नहीं दिया जिनके बदले में आशीष, मंगलकामनाए एवं आनंद मिले| मस्तिष्क की सफाई की यह शक्ति जो पैगम्बर मोहम्मद के पास थी, वह ना केवल भरी मात्रा में थी सदैव की रहने वाली थी क्योकि यह दोनों ही रूपों में चौदह शताब्दियान बीत जाने के बाद भी अभी भी उसी मजबूती से चल रही है