गुरुवार, 5 सितंबर 2013

क्या वैदिक ग्रंथों में बहुदेवतावाद और मांसाहार का अंकन हैं ?

क्या वैदिक ग्रंथों में बहुदेवतावाद और मांसाहार का अंकन हैं ?


आधुनिक युग में महर्षि दयानंद का नाम समाज सुधारको के साथ साथ वेदों के भाष्यकार के रूप में भी जाना जाता हैं. महर्षि दयानंद ने यजुर्वेद का संपूर्ण एवं ऋग्वेद का सप्त मंडल तक भाष्य किया था जिसे वे अकाल मृत्यु के कारण पूर्ण नहीं कर पाए थे. कुछ जिज्ञासुओं का कहना हैं की जब पहले से ही सायण,महीधर आदि के भाष्य उपलब्ध थे तो महर्षि दयानंद को नवीन भाष्य की क्या आवश्यकता पड़ी अथवा यह भी कह सकते हैं की महर्षि दयानंद के वेद भाष्य में ऐसा क्या नवीन था.

महर्षि दयानंद के भाष्य से पहले वेदों के विषय में जनमानस की धारणाओं कुछ इस प्रकार थी-

१. वेदों में अनेक ईश्वरों की उपासना का विधान हैं क्योंकि वेदों में अग्नि, इन्द्र, रूद्र,पितर, अश्विनौ, अदिति , मरुत आदि अनेको देवों का वर्णन हैं.

२. वेदों में मांसाहार एवं हवन में पशु बलि जैसे अश्वमेध में अश्व की, अजमेध में अज की , नरमेध में नर बलि का विधान हैं जिससे वेद मात्र बोझिल कर्मकांड की पुस्तक प्रतीत होती हैं

महर्षि दयानंद के वेद भाष्य का प्रयोजन भी यही था की चारो और आर्यव्रत में फैले अंधकार का मुख्य कारण वेदों के सही अर्थ का प्रकाश नहीं होना हैं इसलिए उन्होंने वेद का नवीन भाष्य करने का निश्चय किया. सायण ,महीधर आदि के भ्रामक भाष्यों को पढ़ कर विदेशी भाष्यकारों जैसे मोक्षमूलर, ग्रिफ्फिथ, विल्सन आदि भी वेदों का सही अर्थ न जान सके और पूरा विश्व वेदों के ज्ञान के प्रकाश से वंचित रह गया. महर्षि दयानंद ने वेदों का नवीन भाष्य कर पूरे विश्व में क्रांति का किस प्रकार प्रचार किया पूरे लेख को पड़ कर हम जान जायेंगे.

१. वेदों में अनेक ईश्वरों की उपासना का विधान हैं क्योंकि वेदों में अग्नि, इन्द्र, रूद्र,पितर, अश्विनौ, अदिति , मरुत आदि अनेको देवों का वर्णन हैं.

वेदों में अग्नि, वायु, इन्द्र, अश्विनो, मित्र, वरुण, अर्यमा, रूद्र, सविता, अदिति, सरस्वती, पृथ्वी आदि देवताओ का वर्णन आता हैं. उवट, सायण, महीधर आदि भाष्यकारों ने इन्हें अलग स्वतन्त्र देव स्वीकार किया हैं जिससे वेदों में बहुदेवतावाद प्रतीत होता हैं . यज्ञों में आवाहन करने पर ये देवता प्रसन्न होकर यजमान को पुत्र, पोत्र, धन आदि प्रदान करते हैं. महर्षि दयानंद ने कहाँ की वेदों के विभिन्न देवता एक ही परमेश्वर के गुण- कर्म बोधक विभिन्न नाम हैं जैसे अग्नि के अग्रणी , विज्ञानस्वरुप, स्वयं प्रकाशमान, प्रकाशक परमेश्वर, विद्वान अध्यापक, उपदेशक, नायक राजा, वीर सेनापति अर्थ हैं, इन्द्र के ऐश्वर्याशाली परमेश्वर, शत्रु विदारक राजा, सेनापति, गुरु, बिजुली आदि अर्थ हैं. रूद्र का शत्रु संहारक सेनापति, ब्रहमचारी, जीवात्मा, वैद्य, वायु , प्राण आदि अर्थ हैं.अदिति के माता, जगदम्बा, राज रानी, पृथ्वी, अविनाशी आत्मा, विद्या, क्रिया, गौ आदि अर्थ हैं. महर्षि दयानंद ने जो अर्थ देव शब्दों के किये हैं वे वेदों से , निरुक्त से और ब्राह्मण आदि ग्रंथो से प्रमाणित हो जाते हैं.

वेदों में एक ईश्वर होने के प्रमाण-

१. जो एक ही सब मनुष्यों का और वसुओ का ईश्वर हैं- ऋग्वेद १.७.९

२. जो एक ही हैं और दानी मनुष्य को धन प्रदान करता हैं- ऋग्वेद १.८४.६

३. जो एक ही हैं और मनुष्यों से पुकारने योग्य हैं- ऋग्वेद ६.२२.१

४. हे परमेश्वर (इन्द्र), तू सब जनों का एक अद्वितीय स्वामी हैं , तू अकेला समस्त जगत का राजा हैं – ऋग्वेद ६.३६.४

५. हे मनुष्य, जो परमेश्वर एक ही हैं उसी की तू स्तुति कर, वह सब मनुष्यों का द्रष्टा हैं – ऋग्वेद ६.४५.१६

६. तो एक ही अपने पराकर्म से सबका इश्वर बना हुआ हैं- ऋग्वेद ८.६.४१

७. विश्व को रचने वाला एक ही देव हैं, जिसने आकाश और भूमि को जन्म दिया हैं- ऋग्वेद १०. ८१.३

८. हे दुस्तो को दंड देने वाले परमेश्वर, तुझ से अधिक उत्कृष्ट और तुझ से बड़ा संसार में कोई नहीं हैं, न ही तेरी बराबरी का अन्य कोई नहीं हैं- ऋग्वेद ४.३०.१

९. वह ईश्वर अचल हैं,एक हैं, मन से भी अधिक वेगवान हैं. यजुर्वेद ४०.४

१०. पृथ्वी आदि लोकों का धारण करने वाला ईश्वर हमें सुख देवे,जो जगत का स्वामी हैं, एक ही हैं, नमस्कार करने योग्य हैं, बहुत सुख देने वाला हैं. अथर्वेद २.२.२.

११. आओ , सब मिलकर स्तुति वचनों से इस परमात्मा की पूजा करो, जो आकाश का स्वामी हैं, एक हैं, व्यापक हैं और हम मनुष्यों का अतिथि हैं. अथर्वेद ६.२१.१

१२. वह परमेश्वर एक हैं, एक हैं , एक ही हैं. उसके मुकाबले में कोई दूसरा , तीसरा, चौथा परमेश्वर नहीं हैं, पांचवां, छठा , सातवाँ नहीं हैं, आठवां, नौवां, दसवां नहीं हैं. वही एक परमेश्वर चेतन- अचेतन सबको देख रहा हैं. अथर्वेद १६.४.१६-२०

इस प्रकार वेदों में दिए गए मंत्रो से यह सिद्ध होता हैं की परमेश्वर एक हैं. अब एक समस्या उत्पन्न होती हैं. एक और तो वेदों में मित्र, वरुण, अग्नि , इन्द्र आदि नाना देवों की सत्ता का वर्णन हैं दूसरी और वेदों में एक ही ईश्वर का वर्णन हैं तो इस परस्पर विरोधी बातो का समन्वय कैसे करे. एक उदाहरण लेते हैं देश के राजा का नाम प्रधानमंत्री होता हैं, प्रान्त के राजा का नाम मुख्यमंत्री होता हैं. जिले के राजा का नाम कमिश्नर होता हैं, पंचायत के राजा का नाम सरपंच होता हैं. अगर कोई यह कहे की भारत का एक राजा हैं तो वह भी ठीक हैं और कोई यह कहे भारत में अनेक राजा हैं तो वह भी ठीक हैं. यहीं बात वेदों के विषय में भी हैं. सबसे बड़ा देवता एक परम ब्रह्मा ईश्वर हैं बाकि सब देवता उसके नीचे काम करने वाले हैं. परमेश्वर और बाकि देवों में किस प्रकार का सम्बन्ध हैं यह इस मंत्र से सिद्ध होता हैं. जैसे वृक्ष के तने के आश्रित सब शाखाएं होती हैं, वैसे ही उस परम देव के आश्रय में अन्य सब देव रहते हैं.(अथर्वेद १०.७.३८)

वेदों में एक ईश्वर के विभिन्न नाम होने की साक्षी भी दी गयी हैं जैसे-

१. परमेश्वर एक ही हैं ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामो से पुकारते हैं , उसे इन्द्र कहते हैं, मित्र कहते हैं, वरुण कहते हैं, अग्नि कहते हैं, और वही दिव्या सुपर्ण और गरुत्मान भी हैं, उसे ही वे यम और मातरिश्वा भी कहते हैं.(ऋग्वेद १.१६४.४६)

२. एक होते हुए भी उस सुपर्ण परमेश्वर को ज्ञानी कविजन बहुत नामो से कल्पित कर लेते हैं (ऋग्वेद १०.११४.५)

३. यहीं भाव ऋग्वेद ३.२६.७,ऋग्वेद २.१.३-७,ऋग्वेद १०.८२.३, यजुर्वेद ३२.१, अथर्वेद १३.४ में भी कहाँ गया हैं.

जिस प्रकार बाईबिल में ईश्वर को god, almighty,lord आदि अनेको नाम से पुकारा गया हैं उसी प्रकार वेदों में ईश्वर को भी विभिन्न नाम से पुकारा गया हैं. इस प्रकार यह सिद्ध होता हैं की वेदों में एक ईश्वर का वर्णन हैं इसलिए जो लोग अंध विश्वास में आकर विभिन्न देवी देवताओ की उपासना में लगे हुए हैं वे वेदों में वर्णित एक ईश्वर के यथार्थ को समझे.


वेदों में मांसाहार एवं हवन में पशु बलि जैसे अश्वमेध में अश्व की, अजमेध में अज की , नरमेध में नर बलि का विधान हैं जिससे वेद मात्र बोझिल कर्मकांड की पुस्तक प्रतीत होती हैं
स्वामी दयानंद जी का वेदभाष्य यूँ तो कई पहलुओं में क्रांतिकारी हैं पर इसमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली विचार मांस भक्षण ,पशुबलि, कर्मकांड आदि को लेकर जो अन्धविश्वास हमारे देश में फैला था उसका निवारण कर स्वामी जी ने साधारण जनमानस के मन में वेद के प्रति श्रद्दा भाव उत्पन्न कर दिया. सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देख कर मोक्ष मुलर, विल्सन , ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्र वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दोष प्राणियो को क़त्ल करवा कर मनुष्य जाति को पापी बना दिया. मध्य काल में हमारे देश में वाम मार्ग का प्रचार हो गया था जो मांस, मदिरा, मैथुन, मीन आदि से मोक्ष की प्राप्ति मानता था. आचार्य सायण आदि यूँ तो विद्वान थे पर वाम मार्ग से प्रभावित होने के कारण वेदों में मांस भक्षण एवं पशु बलि का विधान दर्शा बैठे. निरीह प्राणियों के इस तरह कत्लेआम एवं भोझिल कर्मकांड को देखकर ही महात्मा बुद्ध एवं महावीर ने वेदों को हिंसा से लिप्त मानकर उन्हें अमान्य घोषित कर दिया जिससे वेदों की बड़ी हानि हुई एवं अवैदिक मतों का प्रचार हुआ जिससे क्षत्रिय धर्म का नाश होने से देश को गुलामी सहनी पड़ी. इस प्रकार वेदों में मांसभक्षण के गलत प्रचार के कारण देश की कितनी हानि हुई इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.
सर्वप्रथम तो स्वामी दयानंद ने चार वेद संहिताओ को परम प्रमाण माना. उन्होंने कहाँ की दर्शन,उपनिषद, ब्राह्मण, सूत्र, स्मृति, रामायण, महाभारत, पुराण आदि तभी मान्य हैं जब वे वेदानुकुल हैं. स्वामी दयानंद ने आवाहन किया की चारों वेदों में कहीं भी मांस भक्षण का विधान नहीं हैं, न देवताओं को मांस खिलाने का, न मनुष्यों को खिलाने का विधान हैं.
वेदों में गाय के नाम
यजुर्वेद ८.४३ में गाय को इडा (स्तुति की पात्र) , रनता (रमयित्री), हव्या (उसके दूध की हवन में आहुति दिए जाने से ), काम्या (चाहने योग्य होने से) , चंद्रा (अह्ह्यादायानि होने से ) , ज्योति (मन आदि को ज्योति प्रदान करने से ), अदिति (अखंडनिय होने से) , सरस्वती (दुग्ध्वती होने से ) , मही (महिमा शालिनी होने से), विश्रुती (विविध रूपों में श्रुत होने से) और अघन्या (न मारी जाने योग्य) कहा गया हैं.
इन नामों से यह स्पष्ट सिद्ध होता हैं की वेदों में गाय को सम्मान की दृष्टि से देखा गया हैं क्यूंकि वो कल्याणकारी हैं.!वेद किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा प्रणीत कृतियाँ नहीं हैं और न ही ये लेख बद्द किये गये थे। ये श्रुतियों द्वारा अगली पीढ़ी तक पहुँचते थे और बीच-2 मै तमाम माँसभक्षी ऋषि मुनि भी हुये होंगें जिन्होंने ऋग्वेद मे गौमांस भक्षण से सम्बन्धित ऋचाओं को डाला रहा होगा। अन्यथा अचानक हिन्दू सनातन धर्म मे गाय पूज्यनीय कैसे हो जाती???? जो भी स्थिति रही हो पर आज का सत्य यही है कि भारत सहित अन्य देशों मे कोई भी हिन्दू धर्मी  माँस भक्षण को धार्मिक अनुस्ठानों से नहीं जोड़ते।
गाय पूज्य हैं
अथर्ववेद १२.४.६-८ में लिखा हैं जो गाय के कान भी खरोंचता हैं, वह देवों की दृष्टी में अपराधी सिद्ध होता हैं. जो दाग कर निशान डालना चाहता हैं, उसका धन क्षीण हो जाता हैं. यदि किसी भोग के लिए इसके बाल काटता हैं, तो उसके किशोर मर जाते हैं.
अथर्ववेद १३.१.५६ में कहाँ हैं जो गाय को पैर से ठोकर मरता हैं उसका मैं मूलोछेद कर देता हूँ.
गाय, बैल आदि सब अवध्य हैं
ऋगवेद ८.१०१.१५ – मैं समझदार मनुष्य को कहे देता हूँ की तू बेचारी बेकसूर गाय की हत्या मत कर, वह अदिति हैं अर्थात काटने- चीरने योग्य नहीं हैं.
ऋगवेद ८.१०१.१६ – मनुष्य अल्पबुद्धि होकर गाय को मारे कांटे नहीं.
अथर्ववेद १०.१.२९ – तू हमारे गाय, घोरे और पुरुष को मत मार.
अथर्ववेद १२.४.३८ -जो (वृद्ध) गाय को घर में पकाता हैं उसके पुत्र मर जाते हैं.
अथर्ववेद ४.११.३- जो बैलो को नहीं खाता वह कस्त में नहीं पड़ता हैं
ऋगवेद ६.२८.४ – गोए वधालय में न जाये
अथर्ववेद ८.३.२४ – जो गोहत्या करके गाय के दूध से लोगो को वंचित करे , तलवार से उसका सर काट दो
यजुर्वेद १३.४३ – गाय का वध मत कर , जो अखंडनिय हैं
अथर्ववेद ७.५.५ – वे लोग मूढ़ हैं जो कुत्ते से या गाय के अंगों से यज्ञ करते हैं
यजुर्वेद ३०.१८- गोहत्यारे को प्राण दंड दो
वेदों से गो रक्षा के प्रमाण दर्शा कर स्वामी दयानन्द जी ने महीधर के यजुर्वेद भाष्य में दर्शाए गए अश्लील, मांसाहार के समर्थक, भोझिल कर्म कांड का खंडन कर उसका सही अर्थ दर्शा कर न केवल वेदों को अपमान से बचा लिया अपितु उनकी रक्षा कर मानव जाती पर भारी उपकार भी किया.
उदहारण के लिए

महीधर अपने भाष्य में यजुर्वेद २३/१९ का अर्थ इस प्रकार करते हैं- सब ऋत्विजों के सामने यजमान की स्त्री घोरे के पास सोवे, और सोती हुई घोरे से कहे की, हे अश्व ! जिससे गर्भ धारण होता हैं, ऐसा जो तेरा वीर्य हैं उसको मैं खैंच के अपनी योनी में डालूं , तथा तू उस वीर्य को मुझमें स्थापन करने वाला हैं.

ऐसे अश्लील एवं व्यर्थ अर्थ को नक्कारते हुए स्वामी दयानंद इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार करते हैं जो परमात्मा गणनीय पदार्थो का पालन करने हारा हैं उसको हम लोग पूज्य बुद्धि से ग्रहण करते हैं जो की हमारे मित्र और मोक्ष सुख आदि का प्रियपति तथा हमको आनंद में रख कर सदा पालन करने वाला हैं, उसको हम लोग अपना उपास्य देव जन के ग्रहण करते हैं. जो की विद्या और सुख आदि का निधि अर्थात हमारे कोशो का पति हैं, उसी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को हम अपना राजा और स्वामी मानते हैं. तथा जो की व्यापक होके सब जगत में और सब जगत उसमें बस रहा हैं, इस कारण से उसको वसु कहते हैं. हे वसु परमेश्वर! जो आप अपने सामर्थ्य से जगत के अनादिकरण में गर्भ धारण करते हैं, अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों को आप ही रचते हैं.

महीधार अपने भाष्य में यजुर्वेद २३/२० का अर्थ इस प्रकार करते हैं- यजमान की स्त्री घोरे के लिंग को पकड़ कर आप ही अपनी योनी में डाल देवे.

ऐसे अश्लील एवं व्यर्थ अर्थ को नक्कारते हुए स्वामी दयानंद इस मंत्र का सही अर्थ इस प्रकार करते हैं राजा और प्रजा हम दोनों मिल के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के प्रचार करने में सदा प्रवित रहे. जिससे हम दोनों परस्पर तथा सब प्राणियो को सब सुख से परिपूर्ण कर देवें. जिस राज्य में मनुष्य लोग अच्छी प्रकार ईश्वर को जानते हैं, वही देश सुख युक्त होता हैं. इससे राजा और प्रजा परस्पर सुख के लिए सद्गुणों के उपदेशक पुरुष की सदा सेवा करे, और विद्या तथा बल को सदा बदावे.

यजुर्वेद के २३ वें अध्याय का इसी प्रकार महीधर ने अत्यंत अश्लील अर्थ किया हैं जिसका सही अर्थ भाष्यकार-शंका-समाधान-आदि-विषय नामक पाठ में स्वामी दयानंद द्वारा रचित ऋगवेदादि भाष्य भूमिका में पड़ा जा सकता हैं.

डरपोक थे पंडित नेहरु : प्रो. एम के टैग

डरपोक थे पंडित नेहरू : प्रो. एमके टेंग
यह एक पुराणी साक्षात्कार है, परन्तु वर्तमान में भी इसकी प्रासंगिकता को देखते हुए यहां प्रस्तुत कियाजा रहा ही---

प्रो. एमके टेंग
: इंटरव्यू : प्रो. मोहन कृष्‍ण टेंग (लेखक एवं राजनीतिक विश्‍लेषक) : डॉ. मोहन कृष्ण टेंग कश्मीर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे दिसम्बर 1991 में विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने जम्मू-कश्मीर समस्या का गहनतम अध्ययन किया है। उनकी कश्मीर मामले पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं; जिनमें- कश्मीर अनुच्छेद-370, मिथ ऑफ ऑटोनामी, कश्मीर स्पेशल स्टेटस, कश्मीर : कांस्टीट्यूशनल हिस्ट्री एंड डाक्यूमेंट्स, नार्थ-इस्ट फ्रंटियर ऑफ इंडिया, प्रमुख हैं। उनका मानना है कि कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे पंडित नेहरू और भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा न फहराने देने के प्रति उमर सरकार की प्रतिबद्धता और केंद्र सरकार की अपील को भी वे उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि दोनों सरकारों का यह रवैया भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है।

डॉ. टेंग जम्मू के अम्बफला स्थित कारगिल भवन में आयोजित 'जम्मू-कश्मीर : तथ्य, समस्याएं और समाधान' विषयक दो दिवसीय (25 व 26 जनवरी) सेमीनार में हिस्सा लेने आए थे। इसका आयोजन जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र ने किया था। इस दौरान “विश्व हिंदू वॉयस” न्यूज वेब-पोर्टल से जुड़े पत्रकार पवन कुमार अरविंद ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के महत्‍वपूर्ण अंश-

- जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय के संबंध में उमर अब्दुल्ला के बयान पर आपका क्या कहना है?

-- हां, मैंने भी सुना था। राज्य विधानसभा में सशर्त विलय की बात उमर ने कही थी। लेकिन ऐसा कोई समझौता तो नहीं हुआ था। विलय का अधिकार राज्यों के राजाओं को था। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जो एकदम पूर्ण था। यह विलय अन्य राज्यों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था। गवर्नर जनरल ने उसको स्वीकार भी कर लिया था। विलय के हस्ताक्षर होने में नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं की कोई भूमिका नहीं थी। साथ ही उस समय के प्रजा मंडल के सदस्यों की भी कोई भूमिका नहीं थी। हालांकि 3 अक्टूबर को श्रीनगर में हुई नेशनल कान्फ्रेंस की बैठक में शेख ने विलय का समर्थन करने का फैसला लिया था। यह जनता की राय थी लेकिन इस बात को उन्होंने उजागर नहीं किया। विलय पत्र का जो मसौदा तैयार किया गया था उसमें किसी अंग्रेज की भूमिका नहीं थी, बल्कि गृह मंत्रालय ने तैयार किया था। इस मंत्रालय के प्रमुख सरदार पटेल थे। अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पटेल को राज्यों के विलय का विशेष जिम्मा सौंपा था। विलय का यही मसौदा वीके कृष्ण मेनन और माउंटबेटन को सौंपा गया था। नेशनल कांफ्रेस के किसी भी नेता को विलय की ठीक से जानकारी नहीं थी। भारत सरकार ने शेख अब्दुल्ला के दिल्ली पहुंचने से पहले ही उस फाइल को बंद कर दिया। शेख पंडित नेहरू से मिले, उनके जान के लाले पड़े हुए थे। शेख ने कहा कि किसी भी तरह से आप जम्मू-कश्मीर में सेना भेज दीजिए, विलय जैसे भी करना है आप कर लें, लेकिन जल्दी सेना भेजें, नहीं तो बहुत लोग मारे जाएंगे। जबकि विलय की प्रक्रिया पूर्ण कर फाइल बंद कर दी गई थी। इसके बावजूद आज नेशनल कांफ्रेंस इस बात को बार-बार दुहरा रही है कि सशर्त विलय हुआ था। उनका यह दावा सरासर झूठ है। उस वक्त इसकी तो बात ही नहीं हुई थी।

- क्या संविधान में अनुच्छेद-370 शामिल करने के पीछे विलय की भी कोई भूमिका है?

-- अरे भई, 26 अक्टूबर 1947 को ही विलय का कार्य पूर्ण हो चुका था। विलय से अनुच्छेद-370 का कोई संबंध नहीं है। झगड़ा तो विलय के दो वर्ष बाद यानी 1949 में शुरू हुआ। वर्ष 1949 के मध्य तक संविधान सभा ने अपना कार्य लगभग पूर्ण कर लिया था। लेकिन यह समस्या उठ खड़ी हुई कि राज्यों का क्या किया जाए। अन्य राज्यों के विलय का मसला अभी पूर्ण नहीं हुआ था। इसको सुलझाने के लिए जम्मू-कश्मीर सहित सभी राज्यों की दिल्ली में एक बैठक हुई थी। इन राज्यों का कहना था कि यदि यही कहा जाता रहा कि विलय की प्रक्रिया पूरी हो, उसके बाद संविधान सभा बने, तो इस प्रक्रिया में 10 साल लग जाएंगे। विदित हो कि गृह मंत्रालय ने विलय के मसौदे में राज्यों के लिए अलग संविधान सभा की वकालत की थी। इस बैठक में इन राज्यों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए भारत सरकार को संविधान बनाने के लिए अधिकृत कर दिया। इस दौरान यह तय हुआ कि उन राज्यों के शासक घोषणा-पत्र के जरिए इस निर्णय पर अपनी मुहर लगाएं। भारत के हर राज्य के शासकों ने यह निर्णय स्वीकार किया कि भारत की संविधान सभा जो संविधान बनाएगी, उन्हें मंजूर होगा। उन शासकों में महाराजा हरिसिंह भी थे जिन्होंने ऐसी घोषणा की कि भारतीय संविधान सभा के द्वारा बनाया गया संविधान उन्हें मंजूर होगा। ये सारी बातें भारतीय अभिलेखागार में मौजूद हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के लोगों ने यहां पर रोड़ा अटकाया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय हमें मंजूर नहीं हैं। हम अपनी संविधान सभा में अपना संविधान बनाएंगे। हम भारतीय संविधान की कोई बात स्वीकार नहीं करेंगे। जबकि इन्सट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन में राज्यों के विलय कर लेने के बाद भारतीय संविधान की मूलभूत बातें स्वीकार करना प्रमुख रूप से शामिल था। गृह मंत्रालय ने 14 मई 1949 को नेशनल कान्फ्रेंस के नेताओं को दिल्ली बुलाया। मंत्रालय ने कहा कि विलय के मुताबिक आपको भारतीय संविधान की मूलभूत बातें स्वीकार करनी होंगी। नेशनल कान्फ्रेंस ने कहा कि हमें भारतीय संविधान की एक बात भी स्वीकार नहीं होगी। असल में झगड़ा यहीं से शुरू हुआ।

- यदि भारत सरकार नेशनल कान्फ्रेंस की बातें नहीं मानती तो क्या होता?

-- कुछ नहीं होता। विलय की प्रक्रिया नेशनल कान्फ्रेंस के रोड़ा अटकाने से दो वर्ष पहले ही पूरी हो चुकी थी। विलय को नेशनल कान्फ्रेंस को मानना ही पड़ता। लेकिन सरकार ने उसको झूठ में महत्व दिया। अगर सरकार ने ये बातें नहीं मानी होतीं तो देश के ऊपर कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता। इसको लेकर नेहरू क्यों घबरा गए थे, यह समझ से परे है।

- पंडित नेहरू कश्मीर की वर्तमान स्थिति के लिए कहां तक जिम्मेदार हैं?

-- 21 अक्टूबर 1947 को छद्म पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में प्रवेश किया। 22 तारीख को सुबह पांच बजे पाकिस्तानी सेना पूरे मुजफ्फराबाद में फैल चुकी थी। इस संदर्भ में भारत सरकार का कहना था कि इसकी सूचना उसे 26 तारीख को मिली। जबकि 22 तारीख को 10.30 बजे अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के टेबल पर पाकिस्तानी सेना के दाखिले की सूचना लिखित रूप से पहुंच चुकी थी। इसके बावजूद नेहरू की हिम्मत नहीं थी कि वे गवर्नर जनरल से बातचीत करते। इसकी चर्चा दूसरे दिन लंच मीटिंग के दौरान हुई।

- तो आपका कहना है कि पाकिस्तानी आक्रमण के खिलाफ नेहरू ने फैसला लेने में पांच दिन लगा दिए?
-- हां, यदि उन्होंने सूचना मिलने के तुरंत बाद इसके खिलाफ कार्रवाई की होती तो न पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की समस्या उत्पन्न होती और न ही इस आक्रमण में इतने लोग मारे गए होते। इन पांच दिनों में 38 हजार लोग मारे गए। इसमें हिंदू, सिख और अंग्रेज शामिल थे। आप कल्पना कर लीजिए, यह कोई छोटी बात नहीं है। यही नहीं नेहरू ने दूसरी बड़ी गलती यह की कि एक ओर जब भारतीय सेना पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को खदेड़ रही थी तो बीच में ही जीती हुई लड़ाई को वे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। उनमें लड़ने की हिम्मत नहीं थी, वह डरपोक थे।

- क्या अनुच्छेद-370 भारत की सम्प्रभुता के खिलाफ है?

-- इससे भारत का कोई हित नहीं जुड़ा है। यह देश की सम्प्रभुता के खिलाफ है ही, लोकतंत्र और सेक्‍यूलरिज्म की मूल भावना के भी खिलाफ है। सबसे प्रमुख बात यह है इसके कारण नागरिकों के मूलाधिकार, नागरिकता का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का अधिकार-क्षेत्र स्वीकार नहीं है। यही भारतीय संविधान का मूल है।

- अनुच्छेद-370 हटाने से कश्मीर समस्या समाप्त हो जाएगी, आपका क्या कहना है?

-- जम्मू-कश्मीर की समस्याएं हिंदुस्तान की सारी समस्याओं का एक प्रमुख हिस्सा है। दूसरी बात यह है कि कम से कम एक जो अनिश्चितता है वो तो खत्म हो जाएगी। भारतीय संविधान की दृष्टि से समानता के साथ ही जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य राज्यों के नागरिकों के बीच भी समानता आ जाएगी। जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की नागरिकता दोहरी नहीं रह जाएगी। दो विधान और दो निशान खत्म हो जाएंगे।

- क्या भारतीय संसद अनुच्छेद-370 को समाप्त कर सकती है?

-- हां, वह ऐसा कर सकती है। यह अनुच्छेद-370 भारतीय संविधान में अस्थाई संक्रमणकालीन विशेष उपबंध के रूप में शामिल किया गया था, फिर हटाने में कोई समस्या नहीं है। संसद के पास संशोधन और अभिनिषेध, दोनों करने का अधिकार है। लेकिन इसके लिए हमारे नेताओं के पास दृढ़-इच्छाशक्ति का अभाव है, नहीं तो यह समस्या कभी की समाप्त हो जाती। संसद केवल संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं जा सकती।

- कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे क्या आप अमेरिका की भी कोई भूमिका देखते हैं?

-- नहीं, अमेरिका की कोई भूमिका नहीं है। मेरा मानना है कि पहले भी कोई भूमिका नहीं रही है। पाकिस्तान को छोड़कर किसी अन्य देश की ऐसी कोई भूमिका नहीं है। इस समस्या के पीछे भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान ही मूल रूप से जिम्मेदार है।

- लाल चौक पर तिरंगा न फहराने देने की उमर सरकार की प्रतिबद्धता कहां तक उचित है?

-- यह सरासर अनुचित और संविधान के विरूद्ध है। यही बात तो अलगाववादी भी कर रहे हैं। फिर सरकार और अलगाववादियों में क्या अंतर बचता है।

- लेकिन राज्य और केंद्र की सरकार एक स्वर में बोल रही थी कि तिरंगा फहराने से राज्य में काफी समय बाद स्थापित अमन-चैन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा?

-- जहां तक तिरंगा फहराने की बात है तो केवल इतना ही होता न कि दो चार आतंकवादी आ जाते और गोली चलाकर कुछ लोगों को मार डालते, इससे ज्यादा तो कुछ नहीं होता। इसके बावजूद भाजपा कार्यकर्ताओं को तिरंगा फहराने नहीं दिया गया। वे तो प्राणों की आहुति देने को भी तैयार थे। उन्हें पठानकोट और माधवपुर में रोक दिया गया। क्या आप अमन-चैन के बहाने राष्ट्र-ध्वज को फहराने से किसी को रोक सकते हैं? दरअसल भारत सरकार के पास कोई साहस ही नहीं है, नहीं तो कोई कड़ा कदम उठाती।

- केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकारों का दल कश्मीर समस्या को सुलझाने की दिशा में क्या कुछ आवश्यक पहल कर पाएगा, आपको क्या लगता है?

-- सबसे मुख्य बात है कि वार्ताकारों में किसी को भी जम्मू-कश्मीर की स्थानीय भाषा की जानकारी नहीं है। फिर ये त्रि-सदस्यीय वार्ताकार स्थानीय लोगों की भाषा कैसे समझते होंगे। मुझे तो इसी बात पर हैरानी हो रही है। राज्य के संदर्भ में आवश्यक पहल तो दूर की कौड़ी है।

- जम्मू-कश्मीर से संबंधित आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) को हटाने या इसके नियमों में ढील देने की मांग उठती रहती है, कहां तक

उचित है?


-- कुछ नहीं, यह केंद्र और राज्य सरकार कर रही है। ये बेकार का प्रोपेगंडा है। यदि इसमें संशोधन होगा तो सेना के पास कार्य करने का कोई रास्ता नहीं बचेगा, उसके हाथ बंध जाएंगे।

गाँधी की बेहूदगी भरी हरकतें

गाँधी की बेहूदगी भरी हरकतें

गांधी जी के अपने जीवन में ही उनके चरित्र पर न केवल उंगलियाँ उठाई गई बल्कि कई लम्बे-लम्बे लेख और पुस्तकें तक लिखी गईं यहाँ केवल कुछ उदाहरण दे रहा हूँ.
1. रांजी शाहनी अपनी पुस्तक “मिस्टर गांधी” में इस प्रकार लिखते हैं- “गांधी जी मालिश करवाते समय बिलकुल नंगे हो जाते थे और अक्सर नवयुवक लडकियां ही उनकी मालिश किया करती थीं. (पृष्ठ 578 ) में haaidropaithi काइलाज कराते समय गांधी जी स्नान करने के दौरान,जबकि वह पूर्णतया: नग्न होते, पुरुष और स्त्रियाँ, दोनों कि सहायता लिया करते,गांधी जी कि यह इच्छा होती थी कि वह शारीरिक और आध्यात्मिक तौर पर बिलकुल नग्न हो जाएँ.”
2. जैफ्ती ऐशे अपनी पुस्तक “गांधी” में लिखते हैं- गाँधी ने “ब्रहमचर्य”कि प्रतिज्ञा कि हुई थी….उनकी पत्नी कस्तूरबा प्राय: यह संदेह करती थी कि यह प्रतिज्ञा आम औरतों कि बजाय केवल उसी के लिए है.
3. प्रोफ़ेसर एन.सी. बोस जो नवाखली के दंगों में 5 महीने तक गाँधी जी के सचिव रहे, अपनी पुस्तक ‘माई डेज विद गांधी’ में लिखते हैं, “मुझे गाँधी केप्रयोग के बारे में जानकर बहुत आश्चर्य हुआ……प्राय: वह स्त्रियों को अपने साथ सोने और उनकी ओढनी में उनके साथ लेटने के लिए कहते थे. इसके पश्चात् वह जानने का प्रयत्न करते थेकि उनके व उनके साथ सोने वाली स्त्री अथवा लड़की में कामुकता(भोग) कि भावना तो पैदा नहीं हुई. (पृष्ठ 174 ) गांधी जी के नग्न शरीर की मालिश करने वालों में डॉ. सुशीला नायर और मनुबेन भी थीं (पृष्ठ 115 -179 ) मनु गांधी केसाथ नग्न सोती थी ( पृष्ठ 159 )”
4. सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गांधी जी के प्रयोग के बारे में कहा था कि “ये धर्म नहीं वास्तव में अधर्म है.”
5. ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कोर्पोरेशन (बी.बी.सी.) लंडन को व्यक्त किये अपने मत में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था-”नैतिक तौर पर भी गांधी ‘महात्मा’ नहीं थे.”
गाँधी जी ने अपने ‘ब्रह्मचर्य प्रयोगों’ में अनेक लड़कियों व स्त्रियों को इस्तेमाल किया उनमें मनुबेन,सुशीला नायर, रैहाना, ‘मीराबेन (कुमारी स्लाड़े)’, अन्ना आदि के नाम विशेष रूप में लिए जाते हैं. ब्रह्मचर्य प्रयोगों में शामिल एक स्त्री रैहाना का एक वक्तव्य बड़ाही रोचक है वेद मेहता को अपनी एक भेंटमें रैहाना ने बताया-
” पिछले अवतारी जन्मों में (ज्यादा) मैथुन करने के कारण मैं ऐसे हो गई थी जैसे मुक्त में कामुकता ही न हो. गांधी जी को इस कि जानकारी थी हालांकि मेरे योगिक-प्रयोग प्राचीन परम्परा के थे तो भी गांधी जी मेरे बारे में चिंतित रहते थे कि मैं पुरुषों के साथ ब्रहमचर्य-प्रयोग करती हूँ. एक बार अपने एक रोगी के साथ नग्न सोने पर उन्होंने मुझे फटकारा भी था रोगी की पत्नी मर चुकी थी और वह ज्वरांश कि तेजी में अपनी ही बेटी के पीछे कामुकता में भागता था मैं निरंतर एक सप्ताह उसके साथ नग्न सोई परिणाम आश्चर्य जनक निकले. वह पूर्ण तौर पर तंदुरुस्त (स्वस्थ) हो गया. (Mahatma Gandhi and His Apostles , प.211 ) (ऐसा करने से तो मुर्दा भी भाग खड़ा होगा वो तो विक्षिप्त था)
ये तो चंद उदाहरण है इस पर अत्यंत कट्टर समर्थक adgar shefild ब्राईट मैन को भी मानना पड़ा कि ” यह सच है कि जो धर्म कि दुहाई देते है, उन्होंने शायद ही कभी उसके उच्चतम सिद्धांतों का पालन किया है और धर्म याजकों, राजनितिगियों तथा उद्धोगपतियों ने अक्सर धर्म को अधार्मिक उद्द्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया है. आज जो लोग निराश्वर वादिता पर विलाप करते देखे जाते है उसका सारा व्यवहार ऐसा है कि यदि वे एक दिन भी यह समझ कर चलें कि वे ईश्वर की इच्छा को महत्व देते हैं, तो उनका सारा जीवनक्रम ही तहस-नहस हो जाएगा.” (धर्मका एक दर्शन,पृष्ठ २५९). .

कश्मीर समस्या

कश्मीर समस्या

इसी प्रकार कश्मीर में क्या समस्या है इसे समझें । मुसलमानो ने भारत का बंटवारा 1947 मे करवाया ।कश्मीरी जनता भी दरअसल1947 में पाकिस्तान में अपने विलय का सपना देखरही थी । परतुं महाराजा हरिसिंह ने उनकी आशाओं के विपरीत भारत के साथ विलय पर हस्ताक्षर कर दिए । मुसलमानों का पाक स्थान ( पाकिस्तान )में रहने का सपना समाप्त हो गया । अब मुसलमान सीधे तो भारतीय सेना से लड़ नहीं सकते थे । अतः उन्होंने कश्मीर को आजाद करने के लिए जिहाद का सहारा 1980 के दशक में लेना प्रारम्भ करदिया। कुरान में लिखा है कि सारी पृथ्वी अल्लाह की है । अब जब सारी पृथ्वी अल्लाह की है तो उसके जायज हकदार तो मुसलमान ही हुए । ( पैगम्बर मुहम्मद ने मदीना के बैतउल मिदरास में बैठे यहूदियों से कहाः ''ओ यहूदियों! सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके 'रसूल' की है। यदि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो तो तुम रक्षित रह सकोगे।'' मैं तुम्हें इस देश से निकालना चाहता हूँ। इसलिए यदि तुममें से किसी के पास सम्पत्ति है तो उसे इस सम्पत्ति को बेचने की आज्ञा दी जातीहै। वर्ना तुम्हें मालूम होना चाहिए कि सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके रसूल की है''। (बुखारी,खंड ४:३९२, खंड ४:३९२, पृ. २५९-२६०, मिश्कत, खंड २:२१७, पृ.४४२)। ) अब मुसलमानों ने कश्मीर में अपनी भूमि छुड़वाने के लिए जिहाद शुरू कर दिया । उनके द्वारा फैलायी गयी हिसां के शिकार वहां के हिन्दू हुए जिन्हे अपना घरबार छोड़कर वहां से भागना पड़ा । इसी हिंसा का शिकार वहां के सुरक्षा बल के कर्मचारी भी हुए । इसी के कारण सेना के जवानों द्वारा वहां क्रोध वकामवासना का शिकार वहां की कुछ मुस्लिम बच्चे व महिलाएं हुई । जिन्हें उनकी प्रत्यक्ष गलती न होने के कारण भी बलात्कार या मृत्यु का शिकार होना पड़ा ( उनकी गलती केवल यह हो सकती है कि वे कुरान को सही मानती हैं इस बात को सही मानती है कि सारी पृथ्वी तो अल्लाह के रसूल की है तो उनसे मिलने वाले सभी मुसलमानों के मनमें सुरक्षा बलों के प्रति अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गयी । सुरक्षा बल की इन ज्यादतियों को देखते हुए मदरसेमें पढ़ने वाले बच्चों को व मस्जिद में मुसलमानों को नफरत का पाठ पढ़ायागया जिससे दोनों पक्षों की बीच की दीवारे इतनी चौड़ी हो गयी जिसे सुरक्षा बल द्वारा अपने किसी भी अभियान ( जैसे दवाइयां बांटने या कपड़े या मुसलमानों को किसी भी प्रकार की सहायता देने ) से समाप्त नहीं किया जा सकता ।
आतंकवादी कैसे बनता है ? मानेएक बच्चा जिसकी उम्र 2 साल की है और वह मदरसे में जाना शुरू कर देता है । जहां उसे गैर मुसलमानों को नष्ट करनेसारी दुनिया को इस्लाम में बदलने की शिक्षा दी जाती है । उसे बताया जाता है मूर्ति पूजा अथवा अल्लाह के अलावाकिसी और की पूजा सबसे बड़ा ( हत्या से भी बड़ा अपराध है ) यही बात सोचकर वह बड़ा होता है तो देखता है कि उसके पासजैसे पाकिस्तान या अफगानिस्तान में अमेरिकी फौन निरपराध नागरिकों की हत्या कर रही है। भारत में जन्म लेता है तो देखता है कि उसके भाई बहिनों केसाथ कश्मीर और गुजरात में अत्याचार हो रहें हैं । मुस्लिम औरतों के साथ हिन्दू बहुल भारत में ( गुजरात व कश्मीर ) में बलात्कार किए जा रहे हैं। भारत में रहता है तो देखता है कि कई जगह उसके मुस्लिम होने के कारण उसे संदेह से देखा जाता है । ( यही कारण हैकि अजहरूद्दीन जैसा व्यक्ति जिसे भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान तक बनाया गया यह कहता है कि उसके साथ मुसलमान होने के कारण सट्टेबाजी में फंसाया जा रहा है ) ये सारी बाते उसके दिमाग में विद्रोह को भर देती हैं और वह अपने भाई मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध जिहाद के लिए तैयार हो जाता है । वह बेचारा आत्मघाती बन जाता है वह विस्फोट करकेअपने को उड़ा देता है । यही सारी बात हाल ही की फिल्म कुरबान में दिखायी गयी है । वह बेचारा कीट पतंगें की तरहहै जो दीए की लौ में खुद ही भस्म हो जाता है । अब आप स्वयं फैसला करें कि क्या जो कार्य लादेन, हेडली, कसाब, जवाहिरी इत्यादि इस्लाम पीडि़त ( आतंकवादी ) लोग कर रहे है उसे किसी भी तरह से गलत ठहराया जा सकता है ।
सारी दुनिया मे इस्लाम फ़ैलाने के उद्देश्य से ही इस्लाम मेंगर्भ निरोधक को हराम बता दिया है । अबस्वयंविचार करें कि वह औरत जिसके पेटया गोदी में हर समय एक बच्चा हो वहक्या अपने घर के अलावा कुछ और सोचने की स्थिति में होगी ।
मुसलमान सारी दुनिया में वास्तव में सबसे दुखी कौम है । मुसलमान कहते हैं सारी दुनिया इस्लाम को समाप्त करने की साजिश कर रही है । वे ऐसा क्यों कहते हैं वे ऐसा इसीलिए कहते हैं क्योंकि वे खुद सारी गैर मुस्लिम दुनिया को समाप्त करके सारी दुनिया को इस्लाम के हरे रंग में रंगने की तैयारी कर रहे हैं ।चूंकि वे खुद सारी दुनिया के हजार वर्ष से दुश्मन बनें हैं अतः उन्हें सारी दुनिया भी मुसलमानो की दुश्मन नजर आती है । दिया । अब हथियारों का उत्तर किसी भी दुनिया में अंहिसा से नहीं दिया जा सकता अतएव भारत सरकार ने भी मजबूरी में अपनी सेना को कश्मीर में लगाना पड़ा । अब लगातार 25 वर्षों से कश्मीर भारत से केवल सेना के बल पर ही रूका हुआ है अगर आज भारत सरकार कश्मीर से सेना हटा लेती है तो निश्चित रूप से कश्मीरी मुसलमान कश्मीर का पाकिस्तान में विलय कर देंगे ये मुसलमानों की मजबूरी है । कुरान व मौहम्मद के आदेश से मुसलमान इंकार कर नहीं सकते । इसीलिए वह कश्मीरी जिसकी प्रति व्यक्ति आय आतंकवाद के शुरू होने से पहले भारत में सबसे अधिक थी आज हजारों करोड़ की मदद से दाना पानी खा रहे हैं । अब जरा राष्ट्रवादी मुस्लिम की स्थिति पर भी विचार करें वह भारत के लिए सोचता है । कट्टरता सेभी ग्रस्त नहीं है पर जब वह हिन्दुओं का व्यवहार देखता है कि सारे हिन्दू उसे संदेह की नजर से देखते हैं तो उसके दिल पर क्या बीतती होगी यह केवल वही जानता । उसी के दिल की व्यथा को भारतीय फिल्मों में दिखाया जाता है ।कुरान की आयतों ने ही पूरे मुस्लिम व गैर मुस्लिम समाज को परेशान कर रखा है । मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच शत्रुता की खाई को तब तक के लिए खोद दिया है जब तक कि सारे गैर मुसलमान मुसलमान न बन जाएं । समस्या यह है कि कुरान नफरत के बीज फैला रही है और जब यह बीज बढ़कर गोधरा जैसे नरसंहार का कारण बनते हैं तो उसके प्रति नफरत फैलना दूसरे समाज के लिए स्वाभाविक है । परंतु यदि हम जड़ पर कोई प्रहार नहीं करेंगे तो इसी प्रकार के नरसंहार होते ही रहेंगे ।

हिंदी का दुर्भाग्य कहें भारतवर्ष का दुर्भाग्य ????

हिंदी का दुर्भाग्य कहें या भारतवर्ष  का दुर्भाग्य????


भारतवर्ष की जो तथाकथित स्वतन्त्रता अर्थात आज़ादी है वो एक agreement के तहत / अन्तर्गत है , वो agreement है Transfer of power agreement ( सत्ता के हस्तांतरण की संधि ) | भारत में जो कुछ भी आप देख रहे हैं वो सब इसी agreement के शर्तों के हिसाब से चल रहा है | और आज अगर ब्रिटेन इस संधि को नकार दे तो भारत फिर से गुलाम हो जायेगा , ये मजाक की बात मैं नहीं कर रहा हूँ , इस मसले पर बड़े बड़े वकील चुप हो जाते हैं और कहते हैं की हो सकता है | खैर , भारत का दुर्भाग्य ये रहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु बन गए या कहें अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये गए प्रधानमंत्री थे वो | मैं आप लोगों को एक सच्ची घटना बताता हूँ ..... ब्रिटेन की संसद जिसे House of Commons कहा जाता है , वहां भारत की आज़ादी - स्वतंत्रता को लेकर जब विचार विमर्श हो रहा था तो एक मेम्बर ने कहा कि नेहरु को क्यों चुना जा रहा है प्रधानमंत्री के तौर पर , तो दुसरे ने कहा कि नेहरु देखने में तो भारतीय है लेकिन रहन सहन और सोच में बिलकुल हम जैसा है | इस वाकये का सारा दस्तावेज इंग्लैंड के संसद House of Commons की library में उपलब्ध है | और ये जो अंग्रेजी है वो उसी Transfer of power agreement ( सत्ता के हस्तांतरण की संधि ) के तहत हमारे ऊपर थोपी गयी | अंग्रेजी हटाना और हिंदी को स्थापित करना भारत में मुश्किल लग रहा है | मैं यहाँ कुछ तथ्य आप सब के सामने रखता हूँ कि क्यों इस देश से अंग्रेजी हटाना मुश्किल है |
भारत में अंग्रेजी का इतिहास
भारत में जहाँगीर के समय पहली बार अँगरेज़ भारत में आये और व्यापार के नाम पर उन्होंने जो कुछ किया वो सब को मालूम है | उस समय भारत में 565 रजवाड़े हुआ करते थे और अंग्रेजों ने उन सभी राज्यों से अंग्रेजी में agreement कर के उस सभी का राज्य एक एक कर के हड़प लिया | क्योंकि अँगरेज़ जोagreement करते थे वो अंग्रेजी में होता था और सभी agreement के अंत में एक ऐसी बात होती थी जिसकी वजह से सब के सब राज्य अंग्रेजो के हो गए (वोagreement के बारे में मैं यहाँ कुछ विशेष नहीं लिखूंगा) | हमारे यहाँ जो राजा थे उन लोगों को अंग्रेजी नहीं आती थी, जो क़ि स्वाभाविक था, इस लिए वो इन संधियों के मकडजाल में फंस गए लेकिन आजादी के बाद वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी वो कैसे फंस गए ? जब हमें आज़ादी मिली तो हमारे देश में सब कुछ बदल जाना चाहिए था लेकिन सत्ता जिन लोगों के हाथ में आयी वो भारत को इंग्लैंड की तरह बनाना चाहते थे | आज़ादी की लड़ाई के समय सभी दौर के क्रांतिकारियों का एक विचार था कि भारत अंग्रेज़ और अंग्रेजी दोनों से आज़ाद हो और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी स्थापित हो | जून1946 में महात्मा गाँधी ने कहा था कि आज़ादी मिलने के 6 महीने के बाद पुरे देश की भाषा हिंदी हो जाएगी और सरकार के सारे काम काज की भाषा हिंदी हो जाएगी | संसद और विधानसभाओं की भाषा हिंदी हो जाएगी | और गाँधी जी ने घोषणा कर दी थी कि जो संसद और विधानसभाओं में हिंदी में बात नहीं करेगा तो सबसे पहला आदमी मैं होऊंगा जो उसके खिलाफ आन्दोलनकरेगा और उनको जेल भेजवाऊंगा | भारत का कोई सांसद या विधायक अंग्रेजी में बात करे उस से बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है | लेकिन आज़ादी के बाद सत्तागाँधी जी के परम शिष्यों के हाथ में आयी तो वो बिलकुल उलटी बात करने लगे | वो कहने लगे कि भारत में अंग्रेजी के बिना कोई काम नहीं हो सकता है| भारत में विज्ञान और तकनिकी को आगे बढ़ाना है तो अंग्रेजी के बिना कुछ नहीं हो सकता, भारत का विकासअंग्रेजी के बिना नहीं हो सकता, भारत को विश्व के मानचित्र पर बिना अंग्रेजी के नहीं लाया जा सकता |भारत को यूरोप और अमेरिका बिना अंग्रेजी के नहीं बनाया जा सकता | अंग्रेजी विश्व की भाषा है आदि आदि | गाँधी जी का सपना गाँधी जी के जाने के बाद वहीं ख़तम हो गया | भारत में आज हर कहीं अंग्रेजी का बोलबाला है | भारत की शासन व्यवस्था अंग्रेजी में चलती है, न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी है, दवाअंग्रेजी में होती है, डॉक्टर पुर्जा अंग्रेजी में लिखते हैं, हमारे शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों में अंग्रेजी है, कृषि शोध संस्थानों में अंग्रेजी है | भारत में ऊपर से ले के नीचे के स्तर पर सिर्फ अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है |
भारत का संविधान (अंग्रेजी के सम्बन्ध में )
26 जनवरी 1950 को जो संविधान इस देश में लागू हुआ उसका एक अनुच्छेद है 343 | इस अनुच्छेद 343 में लिखा गया है कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी इस देशमें संघ ( Union ) सरकार की भाषा रहेगी और राज्य सरकारें चाहे तो ऐसा कर सकती हैं | 15 वर्ष पूरा होने पर यानि 1965 से अंग्रेजी को हटाने की बात कीजाएगी | एक संसदीय समिति बनाई जाएगी जो अपना विचारदेगी अंग्रेजी के बारे में और फिर राष्ट्रपति के अनुशंसा के बाद एक विधेयक बनेगा और फिर इस देश से अंग्रेजी को हटा दिया जायेगा और उसके स्थान पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ को स्थापित किया जायेगा | ये जो बात है वो अनुच्छेद 343 के पहले पैरा ग्राफ में हैं लेकिन उसी अनुच्छेद के तीसरे पैरा ग्राफ में लिखा गया है कि भारत के विभिन्न राज्यों में से किसी ने भी हिंदी का विरोध किया तोफिर अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा | फिर उसके आगेअनुच्छेद 348 में लिखा गया है कि भारत में भले ही आम बोलचाल कि भाषा हिंदी रहे लेकिन Supreme Courtमें, High Court में अंग्रेजी ही प्रमाणिक भाषा रहेगी |
1955 में एक समिति बनाई गयी सरकार द्वारा, उस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कह दिया कि देश में अंग्रेजी हटाने का अभी अनुकूल समय नहीं है | 1963 में संसद में हिंदी को लेकर बहस हुई कि अंग्रेजी हटाया जाये और हिंदी लाया जाये | 1965 में 15 वर्ष पुरे होने पर राष्ट्रभाषा हिंदी बनाने की बात हुईतो दक्षिण में दंगे शुरू हो गए और यहाँ मैं बताता चलूँ कि भारत सरकार के ख़ुफ़िया विभाग कि ये रिपोर्ट है कि वो दंगे प्रायोजित थे सरकार की तरफ से | ये उन नेताओं द्वारा करवाया गया था जो नहीं चाहते थे कि अंग्रेजी को हटाया जाये | (ये ठीक वैसा ही था जैसे वन्दे मातरम के सवाल पर मुसलमानों को गलत सन्देश देकर भड़काया गया था ) तो यहाँ केंद्र सरकार को मौका मिल गया और उसने कहना शुरू किया कि हिंदी की वजह से दंगे हो रहे हैं तो अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा | इस बात को लेकर 1967 में एक विधेयक पास कर दिया गया | इतना ही नहीं 1968 में उसविधेयक में एक संसोधन कर दिया गया जिसमे कहा गया कि भारत के जितने भी राज्य हैं उनमे से एक भी राज्य अगर अंग्रेजी का समर्थन करेगा तो भारत में अंग्रेजी ही लागू रहेगी, और आपकी जानकारी के लिए मैं यहाँ बता दूँ क़ि भारत में एक राज्य है नागालैंड वहां अंग्रेजी को राजकीय भाषा घोषित कर दिया गया है | ये जो गन्दी राजनीति इस देश में आप देख रहे हैं वो अभी गन्दी नहीं हुई है ये अंग्रेजों से अनुवांशिक तौर पर हमारे नेताओं ने ग्रहण किया था और वो आज भी चल रहा है | अभी तो ये बिलकुल असंभव लग रहा है कि हम अंग्रेजी को इस देश से हटा सकें | इसके लिए सत्ता नहीं व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत है |
मौलिकता आती है मातृभाषा से आप खुद के ऊपर प्रयोग कर के देखिएगा | अंग्रेजी या विदेशी भाषा में हम केवल Copy Pasting कर सकते है | और मातृभाषा छोड़ केहम अंग्रेजी के पीछे पड़े हैं तो मैं आपको बता दूँ क़ि अंग्रेजी में हमें छः गुना ज्यादा मेहनत लगताहै | हम लोगों ने बचपन में पहाडा याद किया था गणित में आपने भी किया होगा और मुझे विश्वास है क़ि वो आपको आज भी याद होगा लेकिन हमारे बच्चे क्या पढ़ रहे हैं आज भारत में वो पहाडा नहीं टेबल याद कर रहे हैं | और मैं आपको ये बता दूँ क़ि इनका जो टेबल है वो कभी भी इनके लिए फायदेमंद नहीं हो सकता | जो पढाई हम B.Tech या MBBS की करते हैं अगर वो हमारी मातृभाषा में हो जाये तो हमारे यहाँ विद्यार्थियों को छः गुना कम समय लगेगा मतलब M.Tech तक की पढाई हम 4 साल तक पूरा कर लेंगे और वैसेही MBBS में भी हमें आधा वक़्त लगेगा | इस विदेशी भाषा से हम हमेशा पिछलग्गू ही बन के रहेंगे | दुनिया का इतिहास उठा के आप देख लीजिये, वही देश दुनिया में विकसित हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा का उपयोग अपने पढाई लिखाई में किया |
कुछ और तथ्य
*. भारत में जो राज्यों का बटवारा भाषा के हिसाब से हुआ वो गलत था |
*. भारत क़ी तरह पाकिस्तान में भी कई भाषाएँ हैं और वहां पंजाबी सबसे लोकप्रिय भाषा है | इसके अलावा वहां पश्तो है , सिन्धी है , बलूच है लेकिन उर्दू मुख्य जोड़ने वाली भाषा है | ये जो इच्छा शक्ति पाकिस्तान ने दिखाई थी वो भारत के नेताओं ने नहीं दिखाया |
*. आज़ादी के पहले भारत में जो collector हुआ करते थे उनकी पोस्टिंग किसी जिले में इसी आधार पर होती थी क़ि वो वहां की भाषा जानते हैं क़ी नहीं | लेकिन अब इस देश में ऐसा कोई नियम नहीं है | आपको कोई भाषा आती हो या नहीं आती है अंग्रेजी आनी चाहिए किसी जिले का collector बनने के लिए |
अंग्रेजी को ले के लोगों में भ्रांतियां
अंग्रेजी को ले के लोगों के मन में तरह तरह कि भ्रांतियां हैं मसलन
*. अंग्रेजी विश्व भाषा है
*. अंग्रेजी सबसे समृद्ध भाषा है
*. अंग्रेजी विज्ञान और तकनीकी कि भाषा है क्या वाकई अंग्रेजी विश्व भाषा है ? पूरी दुनिया में लगभग 200 देश हैं और उसमे सिर्फ 11 देशों में अंग्रेजी है यानि दुनिया का लगभग 5 % | अब बताइए कि ये विश्व भाषा कैसे है? अगर आबादी के हिसाब से देखा जाये तो सिर्फ 4 % लोग पुरे विश्व में अंग्रेजी जानते और बोलते हैं | विश्व में सबसे ज्यादा भाषा जो बोली जाती है वो है मंदारिन (Chinese) और दुसरे स्थान पर है हिंदी और तीसरे स्थान पर है रुसी (Russian) और फिर स्पनिश इत्यादि लेकिन अंग्रेजी टॉप 10 में नहीं है | अरे UNO जो कि अमेरिका में है वहां भी काम काज की भाषा अंग्रेजी नहीं है बल्कि फ्रेंच में काम होता है वहां |
क्या वाकई अंग्रेजी समृद्ध भाषा है ? किसी भी भाषा की समृद्धि उसमे मौजूद शब्दों से मानी जाती है | अंग्रेजी में मूल शब्दों की संख्या मात्र 65,000 है | वो शब्दकोष (dictionary) में जो आप शब्द देखते हैं वो दूसरी भाषाओँ से उधार लिए गए शब्द हैं | हमारे बिहार में भोजपुरी, मैथिली और मगही के शब्दों को ही मिला दे तो अकेले इनके शब्दों की संख्या 60 लाख है| शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है | इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी |
क्या वाकई अंग्रेजी विज्ञान और तकनीकी की भाषा है? आप दुनिया में देखेंगे कि सबसे ज्यादा विज्ञानंऔर तकनिकी की किताबे (Russian ) रुसी भाषा में प्रकाशित हुई हैं और सबसे ज्यादा विज्ञान और तकनीकी में research paper भी Russian में प्रकाशित हुई हैं | मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनीकी की भाषा Russian है न कि अंग्रेजी | दर्शन शास्त्र में सबसे ज्यादा किताबें छपी हैं वो German में हैं | मार्क्स और कांट एक दो उदहारण हैं | चित्रकारी , भवन निर्माण, कला और संगीत कि सबसे ज्यादा किताबें हैं वो French में हैं | अंग्रेजी में विज्ञान और तकनीकी पर सबसे कम शोध हुए हैं | जितने अविष्कार अंग्रेजों के नाम से दुनिया जानती है उसमे आधे से ज्यादा दुसरे देशों के लोगों का अविष्कार है जिसे अंग्रेजों ने अपने नाम से प्रकाशित कर दिया था | अब इन्टरनेट के ज़माने में सब बातों की सच्चाई सामने आ रही है धीरेधीरे |
सारांश ये है कि अगर आपमें व्यवस्था परिवर्तन की हिम्मत है तो आप हिंदी ला सकते हैं अन्यथा बस चुपचाप देखते रहिये और अपने काम में लगे रहिये | कुछ नहीं होने वाला | विश्व में दूसरी सबसे ज्यादाबोले जाने वाली भाषा होने के बावजूद हिंदी लौंडी ही बन के रहने के लिए बाध्य है अपने ही देश में |

ताजमहल हिन्दू शिवमंदिर तेजोमहालय है

ताजमहल हिन्दू शिवमंदिर तेजोमहालय है। -(स्व. पी. एन.ओक के 121 अकाट्य प्रमाण)
श्री पी.एन. ओक अपनी पुस्तक "Tajmahal is a Hindu Temple
Palace" में 100 से भी अधिक प्रमाण और तर्को का हवाला देकर
दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम
तेजोमहालय है। श्री पी.एन. ओक साहब को उस इतिहास कार के रूप मे
जाना जाता है तो भारत के विकृत इतिहास को पुर्नोत्थान और
सही दिशा में ले जाने का किया है। मुगलो और अग्रेजो के समय मे जिस
प्रकार भारत के इतिहास के साथ जिस प्रकार छेड़छाड की गई और आज
वर्तमान तक मे की जा रही है, उसका विरोध और सही प्रस्तुतिकारण
करने वाले प्रमुख इतिहासकारो में पुरूषोत्तम नाथ ओक साहब का नाम
लिया जाता है। ओक साहब ने ताजमहल की भूमिका, इतिहास और
पृष्ठभूमि से लेकर सभी का अध्ययन किया और
छायाचित्रों छाया चित्रो के द्वारा उसे प्रमाणित करने का सार्थक
प्रयास किया। श्री ओक के इन तथ्यो पर आ सरकार और प्रमुख
विश्वविद्यालय आदि मौन जबकि इस विषय पर शोध किया जाना चाहिये
और सही इतिहास से हमे अवगत करना चाहिये। किन्तु दुःख की बात
तो यह है कि आज तक उनकी किसी भी प्रकार से अधिकारिक जाँच
नहीं हुई। यदि ताजमहल के शिव मंदिर होने में सच्चाई है तो भारतीयता के
साथ बहुत बड़ा अन्याय है। आज भी हम जैसे विद्यार्थियों को झूठे
इतिहास की शिक्षा देना स्वयं शिक्षा के लिये अपमान की बात है,
क्योकि जिस इतिहास से हम सबक सीखने की बात कहते है यदि वह
ही गलत हो, इससे बड़ा राष्ट्रीय शर्म और क्या हो सकता है ?
श्री पी.एन. ओक का दावा है कि ताजमहल शिव मंदिर है
जिसका असली नाम तेजो महालय है। इस सम्बंध में उनके द्वारा दिये गये
तर्कों का हिंदी रूपांतरण इस प्रकार हैं -
सर्व प्रथम ताजमहन के नाम के सम्बन्ध में ओक साहब ने कहा कि नाम
- (क्रम संख्या 1 से 108 तक)
1. शाहज़हां और यहां तक कि औरंगज़ेब के शासनकाल तक में
भी कभी भी किसी शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ताजमहल शब्द
का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल
समझना हास्यास्पद है।
2. शब्द ताजमहल के अंत में आये 'महल' मुस्लिम शब्द है ही नहीं,
अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में एक
भी ऐसी इमारत नहीं है जिसे कि महल के नाम से पुकारा जाता हो।
3. साधारणतः समझा जाता है कि ताजमहल नाम मुमताजमहल,
जो कि वहां पर दफनाई गई थी, के कारण पड़ा है। यह बात कम से कम
दो कारणों से तर्कसम्मत नहीं है - पहला यह कि शाहजहां के बेगम
का नाम मुमताजमहल था ही नहीं, उसका नाम मुमताज़-उल-
ज़मानी था और दूसरा यह कि किसी इमारत का नाम रखने के लिय
मुमताज़ नामक औरत के नाम से "मुम" को हटा देने का कुछ मतलब
नहीं निकलता।
4. चूँकि महिला का नाम मुमताज़ था जो कि ज़ अक्षर मे समाप्त होता है
न कि ज में (अंग्रेजी का Z न कि J), भवन का नाम में भी ताज के स्थान
पर ताज़ होना चाहिये था (अर्थात् यदि अंग्रेजी में लिखें तो Taj के स्थान
पर Taz होना था)।
5. शाहज़हां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन
का उल्लेख 'ताज-ए-महल' के नाम से किया है जो कि उसके शिव मंदिर
वाले परंपरागत संस्कृत नाम तेजोमहालय से मेल खाता है। इसके विरुद्ध
शाहज़हां और औरंगज़ेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते
इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुये उसके स्थान पर पवित्र
मकब़रा शब्द का ही प्रयोग किया है।
6. मकब़रे को कब्रगाह ही समझना चाहिये, न कि महल। इस प्रकार से
समझने से यह सत्य अपने आप समझ में आ जायेगा कि कि हुमायुँ,
अकबर, मुमताज़, एतमातुद्दौला और सफ़दरजंग जैसे सारे शाही और
दरबारी लोगों को हिंदू महलों या मंदिरों में दफ़नाया गया है।
7. और यदि ताज का अर्थ कब्रिस्तान है तो उसके साथ महल शब्द
जोड़ने का कोई तुक ही नहीं है।
8. चूँकि ताजमहल शब्द का प्रयोग मुग़ल दरबारों में
कभी किया ही नहीं जाता था, ताजमहल के विषय में किसी प्रकार
की मुग़ल व्याख्या ढूंढना ही असंगत है। 'ताज' और 'महल'
दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।
फिर उन्होने इसको मंदिर कहे जाने की बातो को तर्कसंगत तरीके से
बताया है (क्रम संख्या 9 से 17 तक)
9. ताजमहल शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द तेजोमहालय शब्द
का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।
10. संगमरमर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले जूते उतारने
की परंपरा शाहज़हां के समय से भी पहले की थी जब ताज शिव मंदिर था।
यदि ताज का निर्माण मक़बरे के रूप में हुआ होता तो जूते उतारने
की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि किसी मक़बरे में जाने के लिये
जूता उतारना अनिवार्य नहीं होता।
11. देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले
कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी व
कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित पच्चीकारी की गई है।
इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज़ के मक़बरे वाला कमरा ही शिव
मंदिर का गर्भगृह है।
12. संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश
आरूढ़ हैं, हिंदू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।
13. ताजमहल के रख-रखाव तथा मरम्मत करने वाले ऐसे लोग भी हैं
जिन्होंने कि प्राचीन पवित्र शिव लिंग तथा अन्य
मूर्तियों को चौड़ी दीवारों के बीच दबा हुआ और संगमरमर वाले तहखाने के
नीचे की मंजिलों के लाल पत्थरों वाले गुप्त कक्षों, जिन्हें कि बंद (seal)
कर दिया गया है, के भीतर देखा है।
14. भारतवर्ष में 12 ज्योतिर्लिंग है। ऐसा प्रतीत होता है
कि तेजोमहालय उर्फ ताजमहल उनमें से एक है जिसे कि नागनाथेश्वर के
नाम से जाना जाता था क्योंकि उसके जलहरी को नाग के
द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। जब से शाहज़हां ने उस पर
कब्ज़ा किया, उसकी पवित्रता और हिंदुत्व समाप्त हो गई।
15. वास्तुकला की विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में
शिवलिंगों में 'तेज-लिंग' का वर्णन आता है। ताजमहल में 'तेज-लिंग'
प्रतिष्ठित था इसीलिये उसका नाम तेजोमहालय पड़ा था।
16. आगरा नगर, जहां पर ताजमहल स्थित है, एक प्राचीन शिव
पूजा केन्द्र है। यहां के धर्मावलम्बी निवासियों की सदियों से दिन में पाँच
शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करने की परंपरा रही है विशेषकर
श्रावन के महीने में। पिछले कुछ सदियों से यहां के
भक्तजनों को बालकेश्वर, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राजराजेश्वर
नामक केवल चार ही शिव मंदिरों में दर्शन-पूजन उपलब्ध हो पा रही है। वे
अपने पाँचवे शिव मंदिर को खो चुके हैं जहां जाकर उनके पूर्वज पूजा पाठ
किया करते थे। स्पष्टतः वह पाँचवाँ शिवमंदिर आगरा के इष्टदेव नागराज
अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर ही है जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ
ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।
17. आगरा मुख्यतः जाटों की नगरी है। जाट लोग भगवान शिव
को तेजाजी के नाम से जानते हैं। The Illustrated Weekly of India
के जाट विशेषांक (28 जून, 1971) के अनुसार जाट लोगों के तेजा मंदिर
हुआ करते थे। अनेक शिवलिंगों में एक तेजलिंग भी होता है जिसके जाट
लोग उपासक थे। इस वर्णन से भी ऐसा प्रतीत होता है कि ताजमहल
भगवान तेजाजी का निवासस्थल तेजोमहालय था।
ओक साहब ने भारतीय प्रामाणिक दस्तावेजो द्वारा इसे मकबरा मानने से
इंकार कर दिया है ( क्रम संख्या18 से 24 तक)
18. बादशाहनामा, जो कि शाहज़हां के दरबार के लेखाजोखा की पुस्तक
है, में स्वीकारोक्ति है (पृष्ठ 403 भाग 1) कि मुमताज को दफ़नाने के
लिये जयपुर के महाराजा जयसिंह से एक चमकदार, बड़े गुम्बद
वाला विशाल भवन (इमारत-ए-आलीशान व गुम्ब़ज)
लिया गया जो कि राजा मानसिंह के भवन के नाम से जाना जाता था।
19. ताजमहल के बाहर पुरातत्व विभाग में रखे हुये शिलालेख में वर्णित है
कि शाहज़हां ने अपनी बेग़म मुमताज़ महल को दफ़नाने के लिये एक
विशाल इमारत बनवाया जिसे बनाने में सन् 1631 से लेकर 1653 तक 22
वर्ष लगे। यह शिलालेख ऐतिहासिक घपले का नमूना है। पहली बात तो यह
है कि शिलालेख उचित व अधिकारिक स्थान पर नहीं है। दूसरी यह
कि महिला का नाम मुमताज़-उल-ज़मानी था न कि मुमताज़ महल।
तीसरी, इमारत के 22 वर्ष में बनने की बात सारे मुस्लिम वर्णनों को ताक
में रख कर टॉवेर्नियर नामक एक फ्रांसीसी अभ्यागत के अविश्वसनीय
रुक्के से येन केन प्रकारेण ले लिया गया है जो कि एक बेतुकी बात है।
20. शाहजादा औरंगज़ेब के द्वारा अपने पिता को लिखी गई
चिट्ठी को कम से कम तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृतान्तों में दर्ज
किया गया है, जिनके नाम 'आदाब-ए-आलमगिरी', 'यादगारनामा' और
'मुरुक्का-ए-अकब़राबादी' (1931 में सैद अहमद, आगरा द्वारा संपादित,
पृष्ठ 43, टीका 2) हैं। उस चिट्ठी में सन् 1662 में औरंगज़ेब ने खुद
लिखा है कि मुमताज़ के सातमंजिला लोकप्रिय दफ़न स्थान के प्रांगण में
स्थित कई इमारतें इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उनमें पानी चू रहा है और
गुम्बद के उत्तरी सिरे में दरार पैदा हो गई है। इसी कारण से औरंगज़ेब ने
खुद के खर्च से इमारतों की तुरंत मरम्मत के लिये फरमान
जारी किया और बादशाह से सिफ़ारिश की कि बाद में और
भी विस्तारपूर्वक मरम्मत कार्य करवाया जाये। यह इस बात का साक्ष्य
है कि शाहज़हाँ के समय में ही ताज प्रांगण
इतना पुराना हो चुका था कि तुरंत मरम्मत करवाने की जरूरत थी।
21. जयपुर के भूतपूर्व महाराजा ने अपनी दैनंदिनी में 18 दिसंबर, 1633
को जारी किये गये शाहज़हां के ताज भवन समूह को मांगने के बाबत
दो फ़रमानों (नये क्रमांक आर. 176 और 177) के विषय में लिख रखा है।
यह बात जयपुर के उस समय के शासक के लिये घोर लज्जाजनक थी और
इसे कभी भी आम नहीं किया गया।
22. राजस्थान प्रदेश के बीकानेर स्थित लेखागार में शाहज़हां के
द्वारा (मुमताज़ के मकबरे तथा कुरान की आयतें खुदवाने के लिये)
मरकाना के खदानों से संगमरमर पत्थर और उन पत्थरों को तराशने वाले
शिल्पी भिजवाने बाबत जयपुर के शासक जयसिंह को जारी किये गये तीन
फ़रमान संरक्षित हैं। स्पष्टतः शाहज़हां के ताजमहल पर
जबरदस्ती कब्ज़ा कर लेने के कारण जयसिंह इतने कुपित थे कि उन्होंने
शाहज़हां के फरमान को नकारते हुये संगमरमर पत्थर तथा (मुमताज़ के
मकब़रे के ढोंग पर कुरान की आयतें खोदने का अपवित्र काम करने के
लिये) शिल्पी देने के लिये इंकार कर दिया। जयसिंह ने
शाहज़हां की मांगों को अपमानजनक और अत्याचारयुक्त समझा। और
इसीलिये पत्थर देने के लिये मना कर दिया साथ
ही शिल्पियों को सुरक्षित स्थानों में छुपा दिया।
23. शाहज़हां ने पत्थर और शिल्पियों की मांग वाले ये तीनों फ़रमान
मुमताज़ की मौत के बाद के दो वर्षों में जारी किया था। यदि सचमुच में
शाहज़हां ने ताजमहल को 22 साल की अवधि में
बनवाया होता तो पत्थरों और शिल्पियों की आवश्यकता मुमताज़
की मृत्यु के 15-20 वर्ष बाद ही पड़ी होती।
24. और फिर किसी भी ऐतिहासिक वृतान्त में ताजमहल, मुमताज़
तथा दफ़न का कहीं भी जिक्र नहीं है। न ही पत्थरों के परिमाण और दाम
का कहीं जिक्र है। इससे सिद्ध होता है कि पहले से ही निर्मित भवन
को कपट रूप देने के लिये केवल थोड़े से पत्थरों की जरूरत थी। जयसिंह के
सहयोग के अभाव में शाहज़हां संगमरमर पत्थर वाले विशाल ताजमहल
बनवाने की उम्मीद ही नहीं कर सकता था।
विदेशी और यूरोपीय अभ्यागतों के अभिलेख द्वारा मत स्पष्ट
करना ( क्रम संख्या 25 से 29 तक)
25. टॉवेर्नियर, जो कि एक फ्रांसीसी जौहरी था, ने अपने
यात्रा संस्मरण में उल्लेख किया है कि शाहज़हां ने जानबूझ कर मुमताज़
को 'ताज-ए-मकान', जहाँ पर विदेशी लोग आया करते थे जैसे कि आज
भी आते हैं, के पास दफ़नाया था ताकि पूरे संसार में उसकी प्रशंसा हो।
वह आगे और भी लिखता है कि केवल चबूतरा बनाने में पूरी इमारत बनाने
से अधिक खर्च हुआ था। शाहज़हां ने केवल लूटे गये तेजोमहालय के केवल
दो मंजिलों में स्थित शिवलिंगों तथा अन्य देवी देवता की मूर्तियों के
तोड़फोड़ करने, उस स्थान को कब्र का रूप देने और वहाँ के
महराबों तथा दीवारों पर कुरान की आयतें खुदवाने के लिये ही खर्च
किया था। मंदिर को अपवित्र करने, मूर्तियों को तोड़फोड़ कर छुपाने और
मकब़रे का कपट रूप देने में ही उसे 22 वर्ष लगे थे।
26. एक अंग्रेज अभ्यागत पीटर मुंडी ने सन् 1632 में (अर्थात् मुमताज
की मौत को जब केवल एक ही साल हुआ था) आगरा तथा उसके आसपास
के विशेष ध्यान देने वाले स्थानों के विषय में लिखा है जिसमें के ताज-ए-
महल के गुम्बद, वाटिकाओं तथा बाजारों का जिक्र आया है। इस तरह से
वे ताजमहल के स्मरणीय स्थान होने की पुष्टि करते हैं।
27. डी लॉएट नामक डच अफसर ने सूचीबद्ध किया है कि मानसिंह
का भवन, जो कि आगरा से एक मील की दूरी पर स्थित है, शाहज़हां के
समय से भी पहले का एक उत्कृष्ट भवन है। शाहज़हां के दरबार
का लेखाजोखा रखने वाली पुस्तक, बादशाहनामा में किस मुमताज़
को उसी मानसिंह के भवन में दफ़नाना दर्ज है।
28. बेर्नियर नामक एक समकालीन फ्रांसीसी अभ्यागत ने टिप्पणी की है
कि गैर मुस्लिम लोगों का (जब मानसिंह के भवन को शाहज़हां ने
हथिया लिया था उस समय) चकाचौंध करने वाली प्रकाश वाले
तहखानों के भीतर प्रवेश वर्जित था। उन्होंने चांदी के दरवाजों, सोने के
खंभों, रत्नजटित जालियों और शिवलिंग के ऊपर लटकने वाली मोती के
लड़ियों को स्पष्टतः संदर्भित किया है।
29. जॉन अल्बर्ट मान्डेल्सो ने (अपनी पुस्तक `Voyages and
Travels to West-Indies' जो कि John Starkey and John
Basset, London के द्वारा प्रकाशित की गई है) में सन् 1638 में
(मुमताज़ के मौत के केवल 7 साल बाद) आगरा के जन-जीवन का विस्तृत
वर्णन किया है परंतु उसमें ताजमहल के निर्माण के बारे में कुछ
भी नहीं लिखा है जबकि सामान्यतः दृढ़तापूर्वक यह
कहा या माना जाता है कि सन् 1631 से 1653 तक ताज का निर्माण
होता रहा है।
संस्कृत शिलालेख द्वारा क्रम संख्या 30 द्वारा
30. एक संस्कृत शिलालेख भी ताज के मूलतः शिव मंदिर होने
का समर्थन करता है। इस शिलालेख में, जिसे कि गलती से बटेश्वर
शिलालेख कहा जाता है (वर्तमान में यह शिलालेख लखनऊ अजायबघर के
सबसे ऊपर मंजिल स्थित कक्ष में संरक्षित है) में संदर्भित है, "एक
विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने
वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने
का निश्चय कर लिया।" शाहज़हां के आदेशानुसार सन् 1155 के इस
शिलालेख को ताजमहल के वाटिका से उखाड़ दिया गया। इस शिलालेख
को 'बटेश्वर शिलालेख' नाम देकर इतिहासज्ञों और पुरातत्वविज्ञों ने
बहुत बड़ी भूल की है क्योंकि क्योंकि कहीं भी कोई ऐसा अभिलेख नहीं है
कि यह बटेश्वर में पाया गया था। वास्तविकता तो यह है कि इस
शिलालेख का नाम 'तेजोमहालय शिलालेख' होना चाहिये क्योंकि यह ताज
के वाटिका में जड़ा हुआ था और शाहज़हां के आदेश से इसे निकाल कर
फेंक दिया गया था।
शाहज़हां के कपट का एक सूत्र Archealogiical Survey of India
Reports (1874 में प्रकाशित) के पृष्ठ 216-217, खंड 4 में मिलता है
जिसमें लिखा है, great square black balistic pillar which,
with the base and capital of another pillar....now in the
grounds of Agra,...it is well known, once stood in the
garden of Tajmahal".
थॉमस ट्विनिंग की अनुपस्थित गजप्रतिमा के सम्बन्ध में कथन (क्रम
संख्या 31)
31. ताज के निर्माण के अनेक वर्षों बाद शाहज़हां ने इसके संस्कृत
शिलालेखों व देवी-देवताओं की प्रतिमाओं तथा दो हाथियों की दो विशाल
प्रस्तर प्रतिमाओं के साथ बुरी तरह तोड़फोड़ करके वहाँ कुरान
की आयतों को लिखवा कर ताज को विकृत कर दिया, हाथियों की इन
दो प्रतिमाओं के सूंड आपस में स्वागतद्वार के रूप में जुड़े हुये थे, जहाँ पर
दर्शक आजकल प्रवेश की टिकट प्राप्त करते हैं वहीं ये प्रतिमाएँ स्थित
थीं। थॉमस ट्विनिंग नामक एक अंग्रेज (अपनी पुस्तक "Travels in
India A Hundred Years ago" के पृष्ठ 191 में) लिखता है, "सन्
1794 के नवम्बर माह में मैं ताज-ए-महल और उससे लगे हुये अन्य
भवनों को घेरने वाली ऊँची दीवार के पास पहुँचा। वहाँ से मैंने
पालकी ली और..... बीचोबीच बनी हुई एक सुंदर दरवाजे जिसे
कि गजद्वार ('COURT OF ELEPHANTS') कहा जाता था की ओर
जाने वाली छोटे कदमों वाली सीढ़ियों पर चढ़ा।"
कुरान की आयतों के पैबन्द (क्रम संख्या 32 व 33 द्वारा)
32. ताजमहल में कुरान की 14 आयतों को काले अक्षरों में अस्पष्ट रूप
में खुदवाया गया है किंतु इस इस्लाम के इस अधिलेखन में ताज पर
शाहज़हां के मालिकाना ह़क होने के बाबत दूर दूर तक लेशमात्र भी कोई
संकेत नहीं है। यदि शाहज़हां ही ताज का निर्माता होता तो कुरान
की आयतों के आरंभ में ही उसके निर्माण के विषय में अवश्य
ही जानकारी दिया होता।
33. शाहज़हां ने शुभ्र ताज के निर्माण के कई वर्षों बाद उस पर काले
अक्षर बनवाकर केवल उसे विकृत ही किया है ऐसा उन अक्षरों को खोदने
वाले अमानत ख़ान शिराज़ी ने खुद ही उसी इमारत के एक शिलालेख में
लिखा है। कुरान के उन आयतों के अक्षरों को ध्यान से देखने से
पता चलता है कि उन्हें एक प्राचीन शिव मंदिर के पत्थरों के टुकड़ों से
बनाया गया है।
वैज्ञानिक पद्धति कार्बन 14 द्वारा जाँच
34. ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े के एक
अमेरिकन प्रयोगशाला में किये गये कार्बन 14 जाँच से पता चला है
कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहज़हां के काल से 300 वर्ष पहले का है,
क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वी सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों के
द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिये दूसरे
दरवाजे भी लगाये गये हैं, ताज और भी पुराना हो सकता है। असल में ताज
को सन् 1115 में अर्थात् शाहज़हां के समय से लगभग 500 वर्ष पूर्व
बनवाया गया था।
बनावट तथा वास्तुशास्त्रीय तथ्य द्वारा जॉच (क्रम संख्या 35 से 39
तक)
35. ई.बी. हॉवेल, श्रीमती केनोयर और सर डब्लू.डब्लू. हंटर जैसे पश्चिम
के जाने माने वास्तुशास्त्री, जिन्हें कि अपने विषय पर पूर्ण अधिकार
प्राप्त है, ने ताजमहल के अभिलेखों का अध्ययन करके यह राय दी है
कि ताजमहल हिंदू मंदिरों जैसा भवन है। हॉवेल ने तर्क दिया है
कि जावा देश के चांदी सेवा मंदिर का ground plan ताज के समान है।
36. चार छोटे छोटे सजावटी गुम्बदों के मध्य एक बड़ा मुख्य गुम्बद
होना हिंदू मंदिरों की सार्वभौमिक विशेषता है।
37. चार कोणों में चार स्तम्भ बनाना हिंदू विशेषता रही है। इन चार
स्तम्भों से दिन में चौकसी का कार्य होता था और रात्रि में प्रकाश
स्तम्भ का कार्य लिया जाता था। ये स्तम्भ भवन के पवित्र
अधिसीमाओं का निर्धारण का भी करती थीं। हिंदू विवाह वेदी और भगवान
सत्यनारायण के पूजा वेदी में भी चारों कोणों में इसी प्रकार के चार खम्भे
बनाये जाते हैं।
38. ताजमहल की अष्टकोणीय संरचना विशेष हिंदू अभिप्राय
की अभिव्यक्ति है क्योंकि केवल हिंदुओं में ही आठ दिशाओं के विशेष नाम
होते हैं और उनके लिये खगोलीय रक्षकों का निर्धारण किया जाता है।
स्तम्भों के नींव तथा बुर्ज क्रमशः धरती और आकाश के प्रतीक होते हैं।
हिंदू दुर्ग, नगर, भवन या तो अष्टकोणीय बनाये जाते हैं या फिर उनमें
किसी न किसी प्रकार के अष्टकोणीय लक्षण बनाये जाते हैं तथा उनमें
धरती और आकाश के प्रतीक स्तम्भ बनाये जाते हैं, इस प्रकार से
आठों दिशाओं, धरती और आकाश सभी की अभिव्यक्ति हो जाती है
जहाँ पर कि हिंदू विश्वास के अनुसार ईश्वर की सत्ता है।
39. ताजमहल के गुम्बद के बुर्ज पर एक त्रिशूल लगा हुआ है। इस
त्रिशूल का का प्रतिरूप ताजमहल के पूर्व दिशा में लाल पत्थरों से बने
प्रांगण में नक्काशा गया है। त्रिशूल के मध्य वाली डंडी एक कलश
को प्रदर्शित करता है जिस पर आम की दो पत्तियाँ और एक नारियल
रखा हुआ है। यह हिंदुओं का एक पवित्र रूपांकन है। इसी प्रकार के बुर्ज
हिमालय में स्थित हिंदू तथा बौद्ध मंदिरों में भी देखे गये हैं। ताजमहल के
चारों दशाओं में बहुमूल्य व उत्कृष्ट संगमरमर से बने दरवाजों के शीर्ष पर
भी लाल कमल की पृष्ठभूमि वाले त्रिशूल बने हुये हैं। सदियों से लोग बड़े
प्यार के साथ परंतु गलती से इन त्रिशूलों को इस्लाम का प्रतीक चांद-
तारा मानते आ रहे हैं और यह भी समझा जाता है कि अंग्रेज शासकों ने
इसे विद्युत चालित करके इसमें चमक पैदा कर दिया था। जबकि इस
लोकप्रिय मानना के विरुद्ध यह हिंदू धातुविद्या का चमत्कार है
क्योंकि यह जंगरहित मिश्रधातु का बना है और प्रकाश विक्षेपक भी है।
त्रिशूल के प्रतिरूप का पूर्व दिशा में होना भी अर्थसूचक है
क्योकि हिंदुओं में पूर्व दिशा को, उसी दिशा से सूर्योदय होने के कारण,
विशेष महत्व दिया गया है. गुम्बद के बुर्ज अर्थात् (त्रिशूल) पर
ताजमहल के अधिग्रहण के बाद 'अल्लाह' शब्द लिख दिया गया है
जबकि लाल पत्थर वाले पूर्वी प्रांगण में बने प्रतिरूप में 'अल्लाह' शब्द
कहीं भी नहीं है।
अन्य असंगतियाँ (क्रमांक 40 से 48 तक)
40. शुभ्र ताज के पूर्व तथा पश्चिम में बने दोनों भवनों के ढांचे, माप और
आकृति में एक समान हैं और आज तक इस्लाम की परंपरानुसार
पूर्वी भवन को सामुदायिक कक्ष (community hall) बताया जाता है
जबकि पश्चिमी भवन पर मस्ज़िद होने का दावा किया जाता है।
दो अलग-अलग उद्देश्य वाले भवन एक समान कैसे हो सकते हैं? इससे
सिद्ध होता है कि ताज पर शाहज़हां के आधिपत्य हो जाने के बाद
पश्चिमी भवन को मस्ज़िद के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। आश्चर्य
की बात है कि बिना मीनार के भवन को मस्ज़िद बताया जाने लगा।
वास्तव में ये दोनों भवन तेजोमहालय के स्वागत भवन थे।
41. उसी किनारे में कुछ गज की दूरी पर नक्कारख़ाना है जो कि इस्लाम
के लिये एक बहुत बड़ी असंगति है (क्योंकि शोरगुल वाला स्थान होने के
कारण नक्कारख़ाने के पास मस्ज़िद नहीं बनाया जाता)। इससे इंगित
होता है कि पश्चिमी भवन मूलतः मस्ज़िद नहीं था। इसके विरुद्ध हिंदू
मंदिरों में सुबह शाम आरती में विजयघंट, घंटियों, नगाड़ों आदि का मधुर
नाद अनिवार्य होने के कारण इन वस्तुओं के रखने का स्थान
होना आवश्यक है।
42. ताजमहल में मुमताज़ महल के नकली कब्र वाले कमरे की दीवालों पर
बनी पच्चीकारी में फूल-पत्ती, शंख, घोंघा तथा हिंदू अक्षर ॐ चित्रित
है। कमरे में बनी संगमरमर की अष्टकोणीय जाली के ऊपरी कठघरे में
गुलाबी रंग के कमल फूलों की खुदाई की गई है। कमल, शंख और ॐ के
हिंदू देवी-देवताओं के साथ संयुक्त होने के कारण उनको हिंदू मंदिरों में
मूलभाव के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
43. जहाँ पर आज मुमताज़ का कब्र बना हुआ है वहाँ पहले तेज लिंग हुआ
करता था जो कि भगवान शिव का पवित्र प्रतीक है। इसके चारों ओर
परिक्रमा करने के लिये पाँच गलियारे हैं। संगमरमर के अष्टकोणीय
जाली के चारों ओर घूम कर या कमरे से लगे विभिन्न विशाल कक्षों में
घूम कर और बाहरी चबूतरे में भी घूम कर परिक्रमा किया जा सकता है।
हिंदू रिवाजों के अनुसार परिक्रमा गलियारों में देवता के दर्शन हेतु झरोखे
बनाये जाते हैं। इसी प्रकार की व्यवस्था इन गलियारों में भी है।
44. ताज के इस पवित्र स्थान में चांदी के दरवाजे और सोने के कठघरे थे
जैसा कि हिंदू मंदिरों में होता है। संगमरमर के अष्टकोणीय जाली में
मोती और रत्नों की लड़ियाँ भी लटकती थीं। ये इन ही वस्तुओं की लालच
थी जिसने शाहज़हां को अपने असहाय मातहत राजा जयसिंह से ताज
को लूट लेने के लिये प्रेरित किया था।
45. पीटर मुंडी, जो कि एक अंग्रेज था, ने सन् में, मुमताज़ की मौत के
एक वर्ष के भीतर ही चांदी के दरवाजे, सोने के कठघरे तथा मोती और
रत्नों की लड़ियों को देखने का जिक्र किया है। यदि ताज
का निर्माणकाल 22 वर्षों का होता तो पीटर मुंडी मुमताज़ की मौत के
एक वर्ष के भीतर ही इन बहुमूल्य वस्तुओं को कदापि न देख पाया होता।
ऐसी बहुमूल्य सजावट के सामान भवन के निर्माण के बाद और उसके
उपयोग में आने के पूर्व ही लगाये जाते हैं। ये इस बात का इशारा है
कि मुमताज़ का कब्र बहुमूल्य सजावट वाले शिव लिंग वाले स्थान पर
कपट रूप से बनाया गया।
46. मुमताज़ के कब्र वाले कक्ष फर्श के संगमरमर के पत्थरों में छोटे
छोटे रिक्त स्थान देखे जा सकते हैं। ये स्थान चुगली करते हैं कि बहुमूल्य
सजावट के सामान के विलोप हो जाने के कारण वे रिक्त हो गये।
47. मुमताज़ की कब्र के ऊपर एक जंजीर लटकती है जिसमें अब एक
कंदील लटका दिया है। ताज को शाहज़हां के द्वारा हथिया लेने के पहले
वहाँ एक शिव लिंग पर बूंद बूंद पानी टपकाने वाला घड़ा लटका करता था।
48. ताज भवन में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि हिंदू परंपरा के अनुसार
शरदपूर्णिमा की रात्रि में अपने आप शिव लिंग पर जल की बूंद टपके। इस
पानी के टपकने को इस्लाम धारणा का रूप दे कर शाहज़हां के प्रेमाश्रु
बताया जाने लगा।
ताजमहल में खजाने वाला कुआँ
49. तथाकथित मस्ज़िद और नक्कारखाने के बीच एक अष्टकोणीय कुआँ
है जिसमें पानी के तल तक सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। यह हिंदू
मंदिरों का परंपरागत खजाने वाला कुआँ है। खजाने के संदूक नीचे
की मंजिलों में रखे जाते थे जबकि खजाने के कर्मचारियों के कार्यालय
ऊपरी मंजिलों में हुआ करता था। सीढ़ियों के वृतीय संरचना के कारण
घुसपैठिये या आक्रमणकारी न तो आसानी के साथ खजाने तक पहुँच
सकते थे और न ही एक बार अंदर आने के बाद आसानी के साथ भाग
सकते थे, और वे पहचान लिये जाते थे। यदि कभी घेरा डाले हुये
शक्तिशाली शत्रु के सामने समर्पण की स्थिति आ
भी जाती थी तो खजाने के संदूकों को पानी में धकेल
दिया जाता था जिससे कि वह पुनर्विजय तक सुरक्षित रूप से छुपा रहे।
एक मकब़रे में इतना परिश्रम करके बहुमंजिला कुआँ बनाना बेमानी है।
इतना विशाल दीर्घाकार कुआँ किसी कब्र के लिये अनावश्यक भी है।
मुमताज के दफ़न की तारीख अविदित होना (क्रमांक 50 से 51 तक)
50. यदि शाहज़हां ने सचमुच ही ताजमहल जैसा आश्चर्यजनक
मकब़रा होता तो उसके तामझाम का विवरण और मुमताज़ के दफ़न
की तारीख इतिहास में अवश्य ही दर्ज हुई होती। परंतु दफ़न की तारीख
कभी भी दर्ज नहीं की गई। इतिहास में इस तरह का ब्यौरा न
होना ही ताजमहल की झूठी कहानी का पोल खोल देती है।
51. यहाँ तक कि मुमताज़ की मृत्यु किस वर्ष हुई यह भी अज्ञात है।
विभिन्न लोगों ने सन् 1629,1630, 1631 या 1632 में मुमताज़ की मौत
होने का अनुमान लगाया है। यदि मुमताज़ का इतना उत्कृष्ट दफ़न हुआ
होता, जितना कि दावा किया जाता है, तो उसके मौत की तारीख अनुमान
का विषय कदापि न होता। 5000 औरतों वाली हरम में किस औरत
की मौत कब हुई इसका हिसाब रखना एक कठिन कार्य है।
स्पष्टतः मुमताज़ की मौत की तारीख़ महत्वहीन थी इसीलिये उस पर
ध्यान नहीं दिया गया। फिर उसके दफ़न के लिये ताज किसने बनवाया?
आधारहीन प्रेमकथाएँ
52. शाहज़हां और मुमताज़ के प्रेम की कहानियाँ मूर्खतापूर्ण
तथा कपटजाल हैं। न तो इन कहानियों का कोई ऐतिहासिक आधार है न
ही उनके कल्पित प्रेम प्रसंग पर कोई पुस्तक ही लिखी गई है। ताज के
शाहज़हां के द्वारा अधिग्रहण के बाद उसके आधिपत्य दर्शाने के लिये
ही इन कहानियों को गढ़ लिया गया।
कीमत
53. शाहज़हां के शाही और दरबारी दस्तावेज़ों में ताज की कीमत
का कहीं उल्लेख नहीं है क्योंकि शाहज़हां ने कभी ताजमहल
को बनवाया ही नहीं। इसी कारण से नादान लेखकों के द्वारा ताज
की कीमत 40 लाख से 9 करोड़ 17 लाख तक होने का काल्पनिक
अनुमान लगाया जाता है।
निर्माणकाल
54. इसी प्रकार से ताज का निर्माणकाल 10 से 22 वर्ष तक के होने
का अनुमान लगाया जाता है। यदि शाहज़हां ने ताजमहल
को बनवाया होता तो उसके निर्माणकाल के विषय में अनुमान लगाने
की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि उसकी प्रविष्टि शाही दस्तावेज़ों में
अवश्य ही की गई होती।
भवननिर्माणशास्त्री
55. ताज भवन के भवननिर्माणशास्त्री (designer, architect) के
विषय में भी अनेक नाम लिये जाते हैं जैसे कि ईसा इफेंडी जो कि एक तुर्क
था, अहमद़ मेंहदी या एक फ्रांसीसी, आस्टीन डी बोरडीक्स
या गेरोनिमो वेरेनियो जो कि एक इटालियन था, या शाहज़हां स्वयं।
नदारद दस्तावेज़ क्रमांक 56 से 61
56. ऐसा समझा जाता है कि शाहज़हां के काल में ताजमहल को बनाने के
लिये 20 हजार लोगों ने 22 साल तक काम किया। यदि यह सच है
तो ताजमहल का नक्शा (design drawings),
मजदूरों की हाजिरी रजिस्टर (labour muster rolls), दैनिक खर्च
(daily expenditure sheets), भवन निर्माण सामग्रियों के खरीदी के
बिल और रसीद (bills and receipts of material ordered)
आदि दस्तावेज़ शाही अभिलेखागार में उपलब्ध होते। वहाँ पर इस प्रकार
के कागज का एक टुकड़ा भी नहीं है।
57. अतः ताजमहल को शाहज़हाँ ने बनवाया और उस पर
उसका व्यक्तिगत तथा सांप्रदायिक अधिकार था जैसे ढोंग को समूचे
संसार को मानने के लिये मजबूर करने की जिम्मेदारी चापलूस दरबारी,
भयंकर भूल करने वाले इतिहासकार, अंधे भवननिर्माणशस्त्री, कल्पित
कथा लेखक, मूर्ख कवि, लापरवाह पर्यटन अधिकारी और भटके हुये
पथप्रदर्शकों (guides) पर है।
58. शाहज़हां के समय में ताज के वाटिकाओं के विषय में किये गये
वर्णनों में केतकी, जै, जूही, चम्पा, मौलश्री, हारश्रिंगार और बेल
का जिक्र आता है। ये वे ही पौधे हैं जिनके फूलों या पत्तियों का उपयोग
हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में होता है। भगवान शिव की पूजा में
बेल पत्तियों का विशेष प्रयोग होता है। किसी कब्रगाह में केवल छायादार
वृक्ष लगाये जाते हैं क्योंकि श्मशान के पेड़ पौधों के फूल और फल
का प्रयोग को वीभत्स मानते हुये मानव अंतरात्मा स्वीकार नहीं करती।
ताज के वाटिकाओं में बेल तथा अन्य फूलों के पौधों की उपस्थिति सिद्ध
करती है कि शाहज़हां के हथियाने के पहले ताज एक शिव मंदिर हुआ
करता था।
59. हिंदू मंदिर प्रायः नदी या समुद्र तट पर बनाये जाते हैं। ताज
भी यमुना नदी के तट पर बना है जो कि शिव मंदिर के लिये एक उपयुक्त
स्थान है।
60. मोहम्मद पैगम्बर ने निर्देश दिये हैं कि कब्रगाह में केवल एक कब्र
होना चाहिये और उसे कम से कम एक पत्थर से चिन्हित करना चाहिये।
ताजमहल में एक कब्र तहखाने में और एक कब्र उसके ऊपर के मंज़िल के
कक्ष में है तथा दोनों ही कब्रों को मुमताज़ का बताया जाता है, यह
मोहम्मद पैगम्बर के निर्देश के निन्दनीय अवहेलना है। वास्तव में
शाहज़हां को इन दोनों स्थानों के शिवलिंगों को दबाने के लिये दो कब्र
बनवाने पड़े थे। शिव मंदिर में, एक मंजिल के ऊपर एक और मंजिल में,
दो शिव लिंग स्थापित करने का हिंदुओं में रिवाज था जैसा कि उज्जैन के
महाकालेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर, जो कि अहिल्याबाई के
द्वारा बनवाये गये हैं, में देखा जा सकता है।
61. ताजमहल में चारों ओर चार एक समान प्रवेशद्वार हैं जो कि हिंदू
भवन निर्माण का एक विलक्षण तरीका है जिसे कि चतुर्मुखी भवन
कहा जाता है।
हिंदू गुम्बज के सम्बन्ध मे तर्क (क्रमांक 62 से 64)
62. ताजमहल में ध्वनि को गुंजाने वाला गुम्बद है। ऐसा गुम्बज
किसी कब्र के लिये होना एक विसंगति है क्योंकि कब्रगाह एक शांतिपूर्ण
स्थान होता है। इसके विरुद्ध हिंदू मंदिरों के लिये गूंज उत्पन्न करने वाले
गुम्बजों का होना अनिवार्य है क्योंकि वे देवी-देवता आरती के समय बजने
वाले घंटियों, नगाड़ों आदि के ध्वनि के उल्लास और मधुरता को कई
गुणा अधिक कर देते हैं।
63. ताजमहल का गुम्बज कमल की आकृति से अलंकृत है। इस्लाम के
गुम्बज अनालंकृत होते हैं, दिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित
पाकिस्तानी दूतावास और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के
गुम्बज उनके उदाहरण हैं।
64. ताजमहल दक्षिणमुखी भवन है। यदि ताज का सम्बंध इस्लाम से
होता तो उसका मुख पश्चिम की ओर होता।
कब्र दफनस्थल होता है न कि भवन ( क्रमांक 65 से 69 तक)
65. महल को कब्र का रूप देने की गलती के परिणामस्वरूप एक व्यापक
भ्रामक स्थिति उत्पन्न हुई है। इस्लाम के आक्रमण स्वरूप, जिस
किसी देश में वे गये वहाँ के, विजित भवनों में लाश दफन करके उन्हें कब्र
का रूप दे दिया गया। अतः दिमाग से इस भ्रम को निकाल देना चाहिये
कि वे विजित भवन कब्र के ऊपर बनाये गये हैं जैसे कि लाश दफ़न करने
के बाद मिट्टी का टीला बना दिया जाता है। ताजमहल का प्रकरण
भी इसी सच्चाई का उदाहरण है। (भले ही केवल तर्क करने के लिये) इस
बात को स्वीकारना ही होगा कि ताजमहल के पहले से बने ताज के भीतर
मुमताज़ की लाश दफ़नाई गई न कि लाश दफ़नाने के बाद उसके ऊपर
ताज का निर्माण किया गया।
66. ताज एक सातमंजिला भवन है। शाहज़ादा औरंगज़ेब के
शाहज़हां को लिखे पत्र में भी इस बात का विवरण है। भवन के चार मंजिल
संगमरमर पत्थरों से बने हैं जिनमें चबूतरा, चबूतरे के ऊपर विशाल वृतीय
मुख्य कक्ष और तहखाने का कक्ष शामिल है। मध्य में दो मंजिलें और हैं
जिनमें 12 से 15 विशाल कक्ष हैं। संगमरमर के इन चार मंजिलों के नीचे
लाल पत्थरों से बने दो और मंजिलें हैं जो कि पिछवाड़े में नदी तट तक
चली जाती हैं। सातवीं मंजिल अवश्य ही नदी तट से लगी भूमि के नीचे
होनी चाहिये क्योंकि सभी प्राचीन हिंदू भवनों में भूमिगत मंजिल हुआ
करती है।
67. नदी तट से भाग में संगमरमर के नींव के ठीक नीचे लाल पत्थरों वाले
22 कमरे हैं जिनके झरोखों को शाहज़हां ने चुनवा दिया है। इन
कमरों को जिन्हें कि शाहज़हां ने अतिगोपनीय बना दिया है भारत के
पुरातत्व विभाग के द्वारा तालों में बंद रखा जाता है। सामान्य
दर्शनार्थियों को इनके विषय में अंधेरे में रखा जाता है। इन 22 कमरों के
दीवारों तथा भीतरी छतों पर अभी भी प्राचीन हिंदू चित्रकारी अंकित हैं।
इन कमरों से लगा हुआ लगभग 33 फुट लंबा गलियारा है। गलियारे के
दोनों सिरों में एक एक दरवाजे बने हुये हैं। इन दोनों दरवाजों को इस
प्रकार से आकर्षक रूप से ईंटों और गारा से चुनवा दिया गया है कि वे
दीवाल जैसे प्रतीत हों।
68. स्पष्तः मूल रूप से शाहज़हां के द्वारा चुनवाये गये इन
दरवाजों को कई बार खुलवाया और फिर से चुनवाया गया है। सन् 1934 में
दिल्ली के एक निवासी ने चुनवाये हुये दरवाजे के ऊपर पड़ी एक दरार से
झाँक कर देखा था। उसके भीतर एक वृहत कक्ष (huge hall) और
वहाँ के दृश्य को देख कर वह हक्का-बक्का रह गया तथा भयभीत
सा हो गया। वहाँ बीचोबीच भगवान शिव का चित्र था जिसका सिर
कटा हुआ था और उसके चारों ओर बहुत सारे मूर्तियों का जमावड़ा था।
ऐसा भी हो सकता है कि वहाँ पर संस्कृत के शिलालेख भी हों। यह
सुनिश्चित करने के लिये कि ताजमहल हिंदू चित्र, संस्कृत शिलालेख,
धार्मिक लेख, सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे कौन कौन से
साक्ष्य छुपे हुये हैं उसके के सातों मंजिलों को खोल कर उसकी साफ
सफाई करने की नितांत आवश्यकता है।
69. अध्ययन से पता चलता है कि इन बंद कमरों के साथ ही साथ ताज के
चौड़ी दीवारों के बीच में भी हिंदू चित्रों, मूर्तियों आदि छिपे हुये हैं। सन्
1959 से 1962 के अंतराल में श्री एस.आर. राव, जब वे आगरा पुरातत्व
विभाग के सुपरिन्टेन्डेंट हुआ करते थे, का ध्यान ताजमहल के
मध्यवर्तीय अष्टकोणीय कक्ष के दीवार में एक चौड़ी दरार पर गया। उस
दरार का पूरी तरह से अध्ययन करने के लिये जब दीवार की एक परत
उखाड़ी गई तो संगमरमर की दो या तीन प्रतिमाएँ वहाँ से निकल कर गिर
पड़ीं। इस बात को खामोशी के साथ छुपा दिया गया और प्रतिमाओं
को फिर से वहीं दफ़न कर दिया गया जहाँ शाहज़हां के आदेश से पहले
दफ़न की गई थीं। इस बात की पुष्टि अनेक अन्य स्रोतों से हो चुकी है।
जिन दिनों मैंने ताज के पूर्ववर्ती काल के विषय में खोजकार्य आरंभ
किया उन्हीं दिनों मुझे इस बात की जानकारी मिली थी जो कि अब तक
एक भूला बिसरा रहस्य बन कर रह गया है। ताज के मंदिर होने के प्रमाण
में इससे अच्छा साक्ष्य और क्या हो सकता है? उन देव प्रतिमाओं
को जो शाहज़हां के द्वारा ताज को हथियाये जाने से पहले उसमें
प्रतिष्ठित थे ताज की दीवारें और चुनवाये हुये कमरे आज भी छुपाये हुये
हैं।
शाहज़हां के पूर्व के ताज के संदर्भ ( क्रमांक 70 से 106 )
70. स्पष्टतः के केन्द्रीय भवन का इतिहास अत्यंत पेचीदा प्रतीत
होता है। शायद महमूद गज़नी और उसके बाद के मुस्लिम प्रत्येक
आक्रमणकारी ने लूट कर अपवित्र किया है परंतु हिंदुओं का इस पर
पुनर्विजय के बाद पुनः भगवान शिव की प्रतिष्ठा करके
इसकी पवित्रता को फिर से बरकरार कर दिया जाता था। शाहज़हां अंतिम
मुसलमान था जिसने तेजोमहालय उर्फ ताजमहल के पवित्रता को भ्रष्ट
किया।
71. विंसेंट स्मिथ अपनी पुस्तक 'Akbar the Great Moghul' में
लिखते हैं, "बाबर ने सन् 1630 आगरा के वाटिका वाले महल में अपने
उपद्रवी जीवन से मुक्ति पाई"। वाटिका वाला वो महल यही ताजमहल था।
72. बाबर की पुत्री गुलबदन 'हुमायूँनामा' नामक अपने ऐतिहासिक वृतांत
में ताज का संदर्भ 'रहस्य महल' (Mystic House) के नाम से देती है।
73. बाबर स्वयं अपने संस्मरण में इब्राहिम लोधी के कब्जे में एक
मध्यवर्ती अष्टकोणीय चारों कोणों में चार खम्भों वाली इमारत का जिक्र
करता है जो कि ताज ही था। ये सारे संदर्भ ताज के शाहज़हां से कम से
कम सौ साल पहले का होने का संकेत देते हैं।
74. ताजमहल की सीमाएँ चारों ओर कई सौ गज की दूरी में फैली हुई है।
नदी के पार ताज से जुड़ी अन्य भवनों, स्नान के घाटों और नौका घाटों के
अवशेष हैं। विक्टोरिया गार्डन के बाहरी हिस्से में एक लंबी, सर्पीली,
लताच्छादित प्राचीन दीवार है जो कि एक लाल पत्थरों से
बनी अष्टकोणीय स्तंभ तक जाती है। इतने वस्तृत भूभाग को कब्रिस्तान
का रूप दे दिया गया।
75. यदि ताज को विशेषतः मुमताज़ के दफ़नाने के लिये
बनवाया गया होता तो वहाँ पर अन्य और भी कब्रों का जमघट नहीं होता।
परंतु ताज प्रांगण में अनेक कब्रें विद्यमान हैं कम से कम उसके पूर्वी एवं
दक्षिणी भागों के गुम्बजदार भवनों में।
76. दक्षिणी की ओर ताजगंज गेट के दूसरे किनारे के दो गुम्बजदार
भवनों में रानी सरहंडी ब़ेगम, फतेहपुरी ब़ेगम और कु.
सातुन्निसा को दफ़नाया गया है। इस प्रकार से एक साथ
दफ़नाना तभी न्यायसंगत हो सकता है जबकि या तो रानी का दर्जा कम
किया गया हो या कु. का दर्जा बढ़ाया गया हो। शाहज़हां ने अपने
वंशानुगत स्वभाव के अनुसार ताज को एक साधारण मुस्लिम कब्रिस्तान
के रूप में परिवर्तित कर के रख दिया क्योंकि उसने उसे अधिग्रहित
किया था (ध्यान रहे बनवाया नहीं था)।
77. शाहज़हां ने मुमताज़ से निक़ाह के पहले और बाद में भी कई और
औरतों से निक़ाह किया था, अतः मुमताज़ को कोई ह़क नहीँ था कि उसके
लिये आश्चर्यजनक कब्र बनवाया जावे।
78. मुमताज़ का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था और उसमें
ऐसा कोई विशेष योग्यता भी नहीं थी कि उसके लिये ताम-झाम
वाला कब्र बनवाया जावे।
79. शाहज़हां तो केवल एक मौका ढूंढ रहा था कि कैसे अपने क्रूर सेना के
साथ मंदिर पर हमला करके वहाँ की सारी दौलत हथिया ले, मुमताज़
को दफ़नाना तो एक बहाना मात्र था। इस बात की पुष्टि बादशाहनामा में
की गई इस प्रविष्टि से होती है कि मुमताज़ की लाश को बुरहानपुर के
कब्र से निकाल कर आगरा लाया गया और 'अगले साल' दफ़नाया गया।
बादशाहनामा जैसे अधिकारिक दस्तावेज़ में सही तारीख के स्थान पर
'अगले साल' लिखने से ही जाहिर होता है कि शाहज़हां दफ़न से सम्बंधित
विवरण को छुपाना चाहता था।
80. विचार करने योग्य बात है कि जिस शाहज़हां ने मुमताज़ के
जीवनकाल में उसके लिये एक भी भवन नहीं बनवाया, मर जाने के बाद एक
लाश के लिये आश्चर्यमय कब्र कभी नहीं बनवा सकता।
81. एक विचारणीय बात यह भी है कि शाहज़हां के बादशाह बनने के
तो या तीन साल बाद ही मुमताज़ की मौत हो गई। तो क्या शाहज़हां ने इन
दो तीन साल के छोटे समय में ही इतना अधिक धन संचय कर
लिया कि एक कब्र बनवाने में उसे उड़ा सके?
82. जहाँ इतिहास में शाहज़हां के मुमताज़ के प्रति विशेष
आसक्ति का कोई विवरण नहीं मिलता वहीं शाहज़हां के अनेक औरतों के
साथ, जिनमें दासी, औरत के आकार के पुतले, यहाँ तक कि उसकी स्वयं
की बेटी जहांआरा भी शामिल है, के साथ यौन सम्बंधों ने उसके काल में
अधिक महत्व पाया। क्या शाहज़हां मुमताज़ की लाश पर
अपनी गाढ़ी कमाई लुटाता?
83. शाहज़हां एक कृपण सूदखोर बादशाह था। अपने सारे
प्रतिद्वंदियों का कत्ल करके उसने राज सिंहासन प्राप्त किया था।
जितना खर्चीला उसे बताया जाता है उतना वो हो ही नहीं सकता था।
84. मुमताज़ की मौत से खिन्न शाहज़हां ने एकाएक ताज बनवाने
का निश्चय कर लिया। ये बात एक मनोवैज्ञानिक असंगति है। दुख एक
ऐसी संवेदना है जो इंसान को अयोग्य और अकर्मण्य बनाती है।
85. शाहज़हां यदि मूर्ख या बावला होता तो समझा जा सकता है
कि वो मृत मुमताज़ के लिये ताज बनवा सकता है परंतु सांसारिक और यौन
सुख में लिप्त शाहज़हां तो कभी भी ताज नहीं बनवा सकता क्योंकि यौन
भी इंसान को अयोग्य बनाने वाली संवेदना है।
86. सन् 1973 के आरंभ में जब ताज के सामने वाली वाटिका की खुदाई
हुई तो वर्तमान फौवारों के लगभग छः फुट नीचे और भी फौवारे पाये गये।
इससे दो बातें सिद्ध होती हैं। पहली तो यह कि जमीन के नीचे वाले
फौवारे शाहज़हां के काल से पहले ही मौजूद थे। दूसरी यह कि पहले से
मौजूद फौवारे चूँकि ताज से जाकर मिले थे अतः ताज भी शाहज़हां के काल
से पहले ही से मौजूद था। स्पष्ट है कि इस्लाम शासन के दौरान रख
रखाव न होने के कारण ताज के सामने की वाटिका और फौवारे बरसात के
पानी की बाढ़ में डूब गये थे।
87. ताजमहल के ऊपरी मंजिल के गौरवमय कक्षों से कई जगह से
संगमरमर के पत्थर उखाड़ लिये गये थे जिनका उपयोग मुमताज़ के
नकली कब्रों को बनाने के लिये किया गया। इसी कारण से ताज के भूतल
के फर्श और दीवारों में लगे मूल्यवान संगमरमर के पत्थरों की तुलना में
ऊपरी तल के कक्ष भद्दे, कुरूप और लूट का शिकार बने नजर आते हैं।
चूँकि ताज के ऊपरी तलों के कक्षों में दर्शकों का प्रवेश वर्जित है,
शाहज़हां के द्वारा की गई ये बरबादी एक सुरक्षित रहस्य बन कर रह गई
है। ऐसा कोई कारण नहीं है कि मुगलों के शासन काल की समाप्ति के 200
वर्षों से भी अधिक समय व्यतीत हो जाने के बाद भी शाहज़हां के
द्वारा ताज के ऊपरी कक्षों से संगमरमर की इस लूट को आज भी छुपाये
रखा जावे।
88. फ्रांसीसी यात्री बेर्नियर ने लिखा है कि ताज के निचले रहस्यमय
कक्षों में गैर मुस्लिमों को जाने की इजाजत
नहीं थी क्योंकि वहाँ चौंधिया देने वाली वस्तुएँ थीं। यदि वे वस्तुएँ
शाहज़हां ने खुद ही रखवाये होते तो वह जनता के सामने उनका प्रदर्शन
गौरव के साथ करता। परंतु वे तो लूटी हुई वस्तुएँ थीं और शाहज़हां उन्हें
अपने खजाने में ले जाना चाहता था इसीलिये वह नहीं चाहता था कि कोई
उन्हें देखे।
89. ताज की सुरक्षा के लिये उसके चारों ओर खाई खोद कर की गई है।
किलों, मंदिरों तथा भवनों की सुरक्षा के लिये खाई बनाना हिंदुओं में
सामान्य सुरक्षा व्यवस्था रही है।
90. पीटर मुंडी ने लिखा है कि शाहज़हां ने उन खाइयों को पाटने के लिये
हजारों मजदूर लगवाये थे। यह भी ताज के शाहज़हां के समय से पहले के
होने का एक लिखित प्रमाण है।
91. नदी के पिछवाड़े में हिंदू बस्तियाँ, बहुत से हिंदू प्राचीन घाट और
प्राचीन हिंदू शव-दाह गृह है। यदि शाहज़हाँ ने ताज
को बनवाया होता तो इन सबको नष्ट कर दिया गया होता।
92. यह कथन कि शाहज़हाँ नदी के दूसरी तरफ एक काले पत्थर का ताज
बनवाना चाहता था भी एक प्रायोजित कपोल कल्पना है। नदी के उस पार
के गड्ढे मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा हिंदू भवनों के लूटमार और
तोड़फोड़ के कारण बने हैं न कि दूसरे ताज के नींव खुदवाने के कारण।
शाहज़हां, जिसने कि सफेद ताजमहल को ही नहीं बनवाया था, काले
ताजमहल बनवाने के विषय में कभी सोच भी नहीं सकता था। वह
तो इतना कंजूस था कि हिंदू भवनों को मुस्लिम रूप देने के लिये
भी मजदूरों से उसने सेंत मेंत में और जोर जबर्दस्ती से काम लिया था।
93. जिन संगमरमर के पत्थरों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं उनके रंग
में पीलापन है जबकि शेष पत्थर ऊँची गुणवत्ता वाले शुभ्र रंग के हैं। यह
इस बात का प्रमाण है कि कुरान की आयतों वाले पत्थर बाद में लगाये गये
हैं।
94. कुछ कल्पनाशील इतिहासकारों तो ने ताज के
भवननिर्माणशास्त्री के रूप में कुछ काल्पनिक नाम सुझाये हैं पर और
ही अधिक कल्पनाशील इतिहासकारों ने तो स्वयं शाहज़हां को ताज के
भवननिर्माणशास्त्री होने का श्रेय दे दिया है जैसे कि वह
सर्वगुणसम्पन्न विद्वान एवं कला का ज्ञाता था। ऐसे ही इतिहासकारों ने
अपने इतिहास के अल्पज्ञान की वजह से इतिहास के साथ
ही विश्वासघात किया है वरना शाहज़हां तो एक क्रूर, निरंकुश, औरतखोर
और नशेड़ी व्यक्ति था।
95. और भी कई भ्रमित करने वाली लुभावनी बातें बना दी गई हैं। कुछ
लोग विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि शाहज़हां ने पूरे संसार के
सर्वश्रेष्ठ भवननिर्माणशास्त्रियों से संपर्क करने के बाद उनमें से एक
को चुना था। तो कुछ लोगों का यग विश्वास है कि उसने अपने ही एक
भवननिर्माणशास्त्री को चुना था। यदि यह बातें सच होती तो शाहज़हां के
शाही दस्तावेजों में इमारत के नक्शों का पुलिंदा मिला होता। परंतु
वहाँ तो नक्शे का एक टुकड़ा भी नहीं है। नक्शों का न मिलना भी इस बात
का पक्का सबूत है कि ताज को शाहज़हां ने नहीं बनवाया।
96. ताजमहल बड़े बड़े खंडहरों से घिरा हुआ है जो कि इस बात की ओर
इशारा करती है कि वहाँ पर अनेक बार युद्ध हुये थे।
97. ताज के दक्षिण में एक प्रचीन पशुशाला है। वहाँ पर तेजोमहालय के
पालतू गायों को बांधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गाय कोठा होना एक
असंगत बात है।
98. ताज के पश्चिमी छोर में लाल पत्थरों के अनेक उपभवन हैं
जो कि एक कब्र के लिया अनावश्यक है।
99. संपूर्ण ताज में 400 से 500 कमरे हैं। कब्र जैसे स्थान में इतने सारे
रहाइशी कमरों का होना समझ के बाहर की बात है।
100. ताज के पड़ोस के ताजगंज नामक नगरीय क्षेत्र का स्थूल
सुरक्षा दीवार ताजमहल से लगा हुआ है। ये इस बात का स्पष्ट निशानी है
कि तेजोमहालय नगरीय क्षेत्र का ही एक हिस्सा था। ताजगंज से एक
सड़क सीधे ताजमहल तक आता है। ताजगंज द्वार ताजमहल के द्वार
तथा उसके लाल पत्थरों से बनी अष्टकोणीय वाटिका के ठीक सीध में है।
101. ताजमहल के सभी गुम्बजदार भवन आनंददायक हैं जो कि एक
मकब़रे के लिय उपयुक्त नहीं है।
102. आगरे के लाल किले के एक बरामदे में एक छोटा सा शीशा लगा हुआ
है जिससे पूरा ताजमहल प्रतिबिंबित होता है। ऐसा कहा जाता है
कि शाहज़हां ने अपने जीवन के अंतिम आठ साल एक कैदी के रूप में
इसी शीशे से ताजमहल को देखते हुये और मुमताज़ के नाम से आहें भरते
हुये बिताया था। इस कथन में अनेक झूठ का संमिश्रण है। सबसे पहले
तो यह कि वृद्ध शाहज़हां को उसके बेटे औरंगज़ेब ने लाल किले के
तहखाने के भीतर कैद किया था न कि सजे-धजे और चारों ओर से खुले
ऊपर के मंजिल के बरामदे में। दूसरा यह कि उस छोटे से शीशे को सन्
1930 में इंशा अल्लाह ख़ान नामक पुरातत्व विभाग के एक चपरासी ने
लगाया था केवल दर्शकों को यह दिखाने के लिये कि पुराने समय में लोग
कैसे पूरे तेजोमहालय को एक छोटे से शीशे के टुकड़े में देख लिया करते थे।
तीसरे, वृद्ध शाहज़हाँ, जिसके जोड़ों में दर्द और आँखों में मोतियाबिंद
था घंटो गर्दन उठाये हुये कमजोर नजरों से उस शीशे में झाँकते रहने के
काबिल ही नहीं था जब लाल किले से ताजमहल सीधे
ही पूरा का पूरा दिखाई देता है तो छोटे से शीशे से केवल उसकी परछाईं
को देखने की आवश्कता भी नहीं है। पर हमारी भोली-
भाली जनता इतनी नादान है कि धूर्त पथप्रदर्शकों (guides) की इन
अविश्वासपूर्ण और विवेकहीन बातों को आसानी के साथ पचा लेती है।
103. ताजमहल के गुम्बज में सैकड़ों लोहे के छल्ले लगे हुये हैं जिस पर
बहुत ही कम लोगों का ध्यान जा पाता है। इन छल्लों पर मिट्टी के
आलोकित दिये रखे जाते थे जिससे कि संपूर्ण मंदिर आलोकमय
हो जाता था।
104. ताजमहल पर शाहज़हां के स्वामित्व तथा शाहज़हां और मुमताज़ के
अलौकिक प्रेम की कहानी पर विश्वास कर लेने वाले लोगों को लगता है
कि शाहज़हाँ एक सहृदय व्यक्ति था और शाहज़हां तथा मुमताज़
रोम्यो और जूलियट जैसे प्रेमी युगल थे। परंतु तथ्य बताते हैं
कि शाहज़हां एक हृदयहीन, अत्याचारी और क्रूर व्यक्ति था जिसने
मुमताज़ के साथ जीवन भर अत्याचार किये थे।
105. विद्यालयों और महाविद्यालयों में इतिहास की कक्षा में
बताया जाता है कि शाहज़हां का काल अमन और शांति का काल
था तथा शाहज़हां ने अनेकों भवनों का निर्माण किया और अनेक सत्कार्य
किये जो कि पूर्णतः मनगढ़ंत और कपोल कल्पित हैं। जैसा कि इस
ताजमहल प्रकरण में बताया जा चुका है, शाहज़हां ने कभी भी कोई भवन
नहीं बनाया उल्टे बने बनाये भवनों का नाश ही किया और
अपनी सेना की 48 टुकड़ियों की सहायता से लगातार 30 वर्षों तक
अत्याचार करता रहा जो कि सिद्ध करता है कि उसके काल में
कभी भी अमन और शांति नहीं रही।
106. जहाँ मुमताज़ का कब्र बना है उस गुम्बज के भीतरी छत में सुनहरे
रंग में सूर्य और नाग के चित्र हैं। हिंदू योद्धा अपने
आपको सूर्यवंशी कहते हैं अतः सूर्य का उनके लिये बहुत अधिक महत्व है
जबकि मुसलमानों के लिये सूर्य का महत्व केवल एक शब्द से अधिक कुछ
भी नहीं है। और नाग का सम्बंध भगवान शंकर के साथ हमेशा से
ही रहा है।
झूठे दस्तावेज़ 107. ताज के गुम्बज की देखरेख करने वाले मुसलमानों के
पास एक दस्तावेज़ है जिसे के वे "तारीख-ए-ताजमहल" कहते हैं।
इतिहासकार एच.जी. कीन ने उस पर 'वास्तविक न होने
की शंका वाला दस्तावेज़' का मुहर लगा दिया है। कीन का कथन एक
रहस्यमय सत्य है क्योंकि हम जानते हैं कि जब शाहज़हां ने ताजमहल
को नहीं बनवाया ही नहीं तो किसी भी दस्तावेज़ को जो कि ताजमहल
को बनाने का श्रेय शाहज़हां को देता है झूठा ही माना जायेगा।
108. पेशेवर इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता तथा भवनशास्त्रियों के दिमाग
में ताज से जुड़े बहुत सारे कुतर्क और चतुराई से भरे झूठे तर्क या कम से
कम भ्रामक विचार भरे हैं। शुरू से ही उनका विश्वास रहा है कि ताज
पूरी तरह से मुस्लिम भवन है। उन्हें यह बताने पर कि ताज का कमलाकार
होना, चार स्तंभों का होना आदि हिंदू लक्षण हैं, वे गुणवान लोग इस
प्रकार से अपना पक्ष रखते हैं कि ताज को बनाने वाले कारीगर,
कर्मचारी आदि हिंदू थे और शायद इसीलिये उन्होंने हिंदू शैली से उसे
बनाया। पर उनका पक्ष गलत है क्योंकि मुस्लिम वृतान्त दावा करता है
कि ताज के रूपांकक (designers) बनवाने वाले शासक मुस्लिम थे, और
कारीगर, कर्मचारी इत्यादि लोग मुस्लिम तानाशाही के विरुद्ध
अपनी मनमानी कर ही नहीं सकते थे।
इस्लाम का मुख्य काम भारत को लूटना मात्र था, उन्होने तत्कालीन
मन्दिरो अपना निशाना बनया। हिन्दू मंदिर उस समय अपने ऐश्वर्य के
चरम पर रहे थे। इसी प्रकार आज का ताजमहल नाम से विख्यात
तेजोमहाजय को भी अपना निशाना बनाया। मुस्लिम शासकों ने देश के
हिंदू भवनों को मुस्लिम रूप देकर उन्हें बनवाने का श्रेय स्वयं ले
लिया इस बात का ताज एक आदर्श उदारहरण है।

गुरु पर्व नहीं वरन शिक्षक दिवस

गुरू पर्व नहीं वरन शिक्षक दिवस की आप सभी भारतीयों को शुभ कामनाएं।
यह गुरु-पर्व नहीं, शिक्षक-दिवस है
पाँच सितंबर हमारे देश में शिक्षक-दिवस के रुप में मनाया जाता है। डॉ०
राधाकृष्णन के जन्म-दिन पर।
यह गुरु पर्व नहीं है। गुरु एक अलग ’टर्म’ है। शिक्षक आज एक
एमप्लॉयी है। वह कर्मचारी है, रोजगारी है। तनख्वाह लेता है और दूसरे
कर्मचारियों की तरह ही बोनस, डीए और इंक्रीमेंट पर खुश होता है। शिक्षण
के साथ-साथ अन्य कार्य भी कर लेता है। चाहे वह एमप्लॉयर कराए या वह
खुद करले
पर समय पर स्कूल जाता है और छुट्टी होते ही घर की ओर आ जाता है।
गुरु भारी शब्द है। जहाँ जिम्मेदारी भी भारी होती हैं। चरित्र-निर्माण
की कला आती है। यदि न आती हो तो गुरु नहीं कहला सकता।
गुरु जीवन की कला सिखाता है न कि सिलबस पूरा कराता है। गुरु
ज़रुरी नहीं कि शिक्षक के पद पर कार्य करता हो, ज्ञान-गुरु कोई
भी हो सकता है। नीच-ऊँच लोगों की उपज है। वास्तव में तो वही ऊँचा है
जो हमसे ज़्यादा जानता है। पर महिमा पद की है।
‘शिक्षक-दिवस’ पद का दिवस है। पद का मान है अपमान है।
वरना तो शिक्षक के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाले, शातिर-गुरुओं पर भी लाइट
डालें। गुरु! ( गुंडे) नज़र नहीं आते?
हैप्पी टीचर्स-डे

शिक्षक बनने से पहले लाख बार सोचना चाहिए तब शिक्षक बनने
की ठाननी चाहिए। क्योंकि
’यह तो घर है प्रेम का खाला घर घर नाय,
शीश उतारै, भू धरे जो बैठे इह माय। अपना आपा खोकर ही
किसी को बनाया जा सकता है/गुरु बना जा सकता है। अन्यथा शिक्षक
की नौकरी की जा सकती है।
यदि जीवन में नियंत्रण की कला न आती हो अपने व्यक्तित्व का विकास
चहुमुखी न हुआ हो तो शिक्षक के नाम पर धब्बा बन जाते हैं।
शिक्षक-बनने की ट्रेनिंग भी गहरे गोते लगने जैसी होनी चाहिए न कि उथले
पानी में बैठकर आजाने वाली। जब कोई काम मन से होता है तो उसमें जान
डाल दी जाती है। पर जब खाना-पूरी होती है तो बात आज की बन जाती है।
वैसे तो…
तुम!
मोम हो तुम!
पिघलाकर मोमबत्ती बनानी है,
सोना हो तुम!
तपाकर कुंदन बनाना है,
सूत हो तुम!
बटकर रस्सी बनानी है,
लौहा हो तुम!
ठोककर औजार बनाना है,
गीली मिट्टी हो तुम!
ढ़ालकर मूर्ति बनाना है,
जल हो तुम!
जीवनदाता बनाना है।
बीज हो तुम!
रोपकर वृक्ष बनाना है,
अबोध हो तुम!
ज्ञान से विद्वान बनाना है,
शिष्य हो तुम!
शिक्षा से महान बनाना है।