सोमवार, 15 सितंबर 2014

तनोट माता का सिद्ध मंदिर जहां 3000 पाकिस्तानी तोप के गोले भी रहे थे बेअसर

 तनोट माता का सिद्ध मंदिर जहां 3000 पाकिस्तानी तोप के गोले भी रहे थे बेअसर




राजस्थान के जैलसमेर में बॉर्डर पर स्थित तनोट माता का मंदिर।


तनोट माता का सिद्ध मंदिर जहां 3000 पाकिस्तानी तोप के गोले भी रहे थे बेअसर

भारतवर्ष में राजस्थान के जैसलमेर से थार रेगिस्तान में 120 किमी. दूर सीमा के पास स्थित है तनोट माता का सिद्ध मंदिर।
जैसलमेर में भारत पाक सीमा पर बने तनोट माता के मंदिर से भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965 और 1971 की लड़ाई) की कई अजीबोगरीब यादें जुडी हुई हैं। यह मंदिर भारतीय सेना के फौजियों के लिये आस्था का केन्द्र रहा है।
राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना को परास्त करने में तनोट माता की भूमिका बड़ी अहम मानी जाती है। यहां तक मान्यता है कि माता ने सैनिकों की मदद की और पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा। इस घटना की याद में तनोट माता मंदिर के संग्रहालय में आज भी पाकिस्तान द्वारा दागे गये जीवित बम रखे हुए हैं।
1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध के 50 साल पूरे होने पर पाक सीमा से सटे एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहा हूँ जिस पर दुश्मन द्वारा दागे गए करीब 3000 तोप के गोले भी मंदिर को रत्ती भर भी नुकसान नहीं पहुंचा पाए थे।
17 से 19 नवंबर 1965 को शत्रु ने तीन अलग-अलग दिशाओं से तनोट पर भारी आक्रमण किया। दुश्मन के तोपखाने जबर्दस्त आग उगलते रहे। तनोट की रक्षा के लिए मेजर जय सिंह की कमांड में 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियां दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थी। 1965 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना कि तरफ से गिराए गए करीब 3000 बम भी इस मंदिर पर खरोच तक नहीं ला सके, यहां तक कि मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे तक नहीं।




(युद्ध में पाकिस्तानी सेना अपना टैंक तक छोड़ गई थी। वह अभी भी तनोट मंदिर से 38 किमी दूर लोंगोवाल गांव में रखा हुआ है। आज मंदिर आने वाला हर इंसान इसे देखने जरूर जाता है। )


कब्जा करने उद्देश्य से पाकिस्तान ने भारत के इस हिस्से पर जबर्दस्त हमले किए लेकिन उन्हे कामयाबी नहीं मिली। अब तक गुमनाम रहा यह स्थान इसके बाद प्रसिद्ध हो गया। विश्वास किया जाता है कि तनोट माता के प्रताप से ऐसा हुआ। पाक सेना 4 किमी. अंदर तक हमारी सीमा में घुस आई थी। बाद में जब भारतीय सेना हावी हो गई, उन्होंने जवाबी आक्रमण किया जिससे पाकिस्तानी सेना को भयंकर नुकसान हुआ और वे पीछे लौट गयी।
माता का मंदिर जो अब तक सुरक्षा बलों का कवच बना रहा, शान्ति होने पर सुरक्षा बल इसका कवच बन गये। मंदिर को बीएसएफ ने अपने नियंत्रण में ले लिया। आज यहां का सारा प्रबन्ध सीमा सुरक्षा बल के हाथों में है। मंदिर के अन्दर ही एक संग्रहालय है जिसमें वे गोले भी रखे हुए हैं। पुजारी भी सैनिक ही है। सुबह-शाम आरती होती है।
मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक रक्षक तैनात रहता है, लेकिन प्रवेश करने से किसी को रोका नहीं जाता। फोटो खींचने पर भी कोई पाबंदी नहीं। इस मंदिर की ख्याति को हिंदी फिल्म 'बॉर्डर' की पटकथा में भी शामिल किया गया था। दरअसल, यह फिल्म ही 1965 युद्ध में लोंगोवाल पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना के हमले पर बनी थी।

भारतवर्ष के महान दीवार अर्थात द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया का रहस्य

भारतवर्ष के महान दीवार अर्थात द ग्रेट वॉल ऑफ  इंडिया का रहस्य 

भारतवर्ष का महान दीवार


चीन के दीवार का नाम विश्व में सभी जानते हैं , परन्तु आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि भारत में भी एक ऐसी दीवार है जो सीधे तौर पर चीन के दीवार को टक्कर देती है | जिसे भेदने की कोशिश अकबर ने भी की लेकिन भेद न सका। जिसके दीवार की मोटाई इतनी है कि उस पर 10 घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं।कुम्भलगढ़ किला उदयपुर शहर से 64 किलोमीटर की दूरी पर है | उदयपुर शहर से कुम्भलगढ़ किले तक आसानी से पहुंचा जा सकता है |
कैसे बनी ये 36 किलोमीटर लंबी दीवार ?
किले के दीवार की निर्माण से जुड़ी कहानी बहुत ही दिलचस्प है | 1443 में राणा कुंभा ने किले का निर्माण शुरू किया लेकिन, जैसे जैसे दीवारों का निर्माण आगे बढ़ा वैसे-वैसे दीवारें रास्ता देते चली गई। दरअसल, इस दीवार का काम इसलिए करवाया जा रहा था ताकि विरोधियों से सुरक्षा हो सके | लेकिन दीवारें थी की बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी | फिर कारिगरों ने राजा को बताया कि यहां पर किसी देवी का वास है।
इस किले के लिए चढ़ाई गई संत की बलि
देवी कुछ और ही चाहती हैं राजा इस बात पर चिंतित हो गए और एक संत को बुलाया और सारी गाथा सुनाकर इसका हल पूछा | संत ने बताया कि देवी इस काम को तभी आगे बढ़ने देंगी जब स्वेच्छा से कोई मानव बलि के लिए खुद को प्रस्तुत करे | राजा इस बात से चिंतित होकर सोचने लगे कि आखिर कौन इसके लिए आगे आएगा | तभी संत ने कहा कि वह खुद बलिदान के लिए तैयार है और इसके लिए राजा से आज्ञा मांगी |
संत ने कहा कि उसे पहाड़ी पर चलने दिया जाए और जहां वो रुके वहीं उसे मार दिया जाए और वहां एक देवी का मंदिर बनाया जाए | ठीक ऐसा ही हुआ और वह 36 किलोमीटर तक चलने के बाद रुक गया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया | जहां पर उसका सिर गिरा वहां मुख्य द्वार है और जहां पर उसका शरीर गिरा वहां दूसरा मुख्य द्वार है |
यह किला चारों तरफ से अरावली की पहाड़ियों की मजबूत ढाल द्वारा सुरक्षित है |
इसका निर्माण पंद्रहवी सदी में राणा कुम्भा ने करवाया था। पर्यटक किले के ऊपर से आस पास के रमणीय दृश्यों का आनंद ले सकते हैं | शत्रुओं से रक्षा के लिए इस किले के चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया था | ऐसा कहा जाता है कि चीन की महान दीवार के बाद यह एक सबसे लम्बी दीवार है | यह किला 1,914 मीटर की ऊंचाई पर समुद्र स्तर से परे क्रेस्ट शिखर पर बनाया गया है। इस किले के निर्माण को पूरा करने में 15 साल का समय लागा |
दस घोड़े एक साथ दौड़ते है इसके दीवार पर
महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 किले आते थे जिसमें से 32 किलों का नक्शा उसके द्वारा बनवाया गया था | कुंभलगढ़ भी उनमें से एक है | इस किले की दीवार की चौड़ाई इतनी ज्यादा है कि 10 घोड़ों को एक ही समय में उसपर दौड़ सकते हैं | एक मान्यता यह भी है कि महाराणा कुंभा अपने इस किले में रात में काम करने वाले मजदूरों के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रूई का प्रयोग करता था |
यहां है "बादलों का महल"
बादल महल को ‘बादलों के महल’ के नाम से भी जाना जाता है | यह कुम्भलगढ़ किले के शीर्ष पर स्थित है | इस महल में दो मंजिलें हैं एवं यह संपूर्ण भवन दो आतंरिक रूप से जुड़े हुए खंडों, मर्दाना महल और जनाना महल में विभाजित हैं |
इस महल के कमरों के दीवारों पर सुंदर दृश्यों को अंगित किया गया है जो उन्नीसवीं शताब्दी के काल को प्रदर्शित करते हैं |
उस समय भी होता था एसी का प्रयोग
आज भी एसी का प्रयोग कर ऑफिसों में पाइपों के द्वारा ठंढ़क पहूंचाई जाती है | उस समय भी महल के इस परिसर में रचनात्मक वातानुकूलन प्रणाली लगा हुआ था जो आज भी है | यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है जिसे देखना एक दिलचस्प बात है | इसमें पाइपों की एक श्रृंखला है जो इन सुंदर कमरों को ठंडी हवा प्रदान करती है और साथ ही कमरों को नीचे से भी ठंडा करती हैं | पर्यटक जनाना महल में पत्थरों की जालियों से बाहर का नजारा देख सकते हैं | ये जालियां रानियों द्वारा दरबार की कार्यवाही को देखने के लिए प्रयोग में लाई जाती थी |
सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी न मार सके पैर:
सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए इस दुर्ग में ऊंचे स्थानों पर महल, मंदिर व आवासीय इमारतें बनायीं गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया वही ढलान वाले भागों का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वावलंबी बनाया गया | इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है |
इसे बनाते समय रखा गया वास्तु शास्त्र का ध्यान:
वास्तु शास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर, जलाशय, बाहर जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारते, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है |
सिर्फ एक बार छाया किले पर हार का साया
कुंभलगढ़ को अपने इतिहास में सिर्फ एक बार हार का सामना करना पड़ा जब मुगल सेना ने किले की तीन महिलाओं को जान से मारने की धमकी देकर अंदर प्रवेश करने का रास्ता पूछा | महिलाओं ने डर से एक गुप्त द्वार बताया लेकिन, इसके बाद भी मुगल अंदर जाने में सफल नहीं हो पाए। एक बार फिर अकबर के बेटे सलीम ने भी इस किले पर फतह करने की सोची लेकिन उसे भी खाली हाथ वापस लौटना पड़ा |
जिसे कोई और न मार सका उसके बेटे ने ही ले ली जान
महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है | महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा | यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था |
धोखा देने पर चुनवा दिया दीवार में
कुछ समय बाद जब राजा को उस महिलाओं के बारे में पता चला तो उन्होंने तीनों को किले के द्वार पर दीवार में जिंदा चुनवा दिया | ऐसा कर राजा ने लोगों को यह संदेश दिया कि राज्य के सुरक्षा के साथ जो भी खिलवाड़ करेगा उसका यही अंजाम होगा |


शनिवार, 13 सितंबर 2014

भारतीय समय गणना प्रणाली



भारतीय समय गणना प्रणाली

1. सम्वत्सर(hindu new year) की वैज्ञानिकता

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक पश्चिमी देशों में उनके अपने धर्म-ग्रन्थों के अनुसार मानव सृष्टि को मात्र पांच हजार वर्ष पुराना बताया जाता था। जबकि इस्लामी दर्शन में इस विषय पर स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक भी अपने धर्म-ग्रन्थों की भांति ही यही राग अलापते रहे कि मानवीय सृष्टि का बहुत प्राचीन नहीं है। इसके विपरीत हिन्दू जीवन-दर्शन के अनुसार इस सृष्टि का प्रारम्भ हुए १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, १० वर्ष बीत चुके हैं और अब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से उसका १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, ११वां वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। भूगर्भ से सम्बन्धित नवीनतम आविष्कारों के बाद तो पश्चिमी विद्वान और वैज्ञानिक भी इस तथ्य की पुष्टि करने लगे हैं कि हमारी यह सृष्टि प्राय: २ अरब वर्ष पुरानी है।


अपने देश में हेमाद्रि संकल्प में की गयी सृष्टि की व्याख्या के आधार पर इस समय स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष नामक छह मन्वन्तर पूर्ण होकर अब वैवस्वत मन्वन्तर के २७ महायुगों के कालखण्ड के बाद अठ्ठाइसवें महायुग के सतयुग, त्रेता, द्वापर नामक तीन युग भी अपना कार्यकाल पूरा कर चौथे युग अर्थात कलियुग के ५०११वें सम्वत्‌ का प्रारम्भ हो रहा है। इसी भांति विक्रम संवत्‌ २०६६ का भी श्रीगणेश हो रहा है।

हिन्दू जीवन-दर्शन की मान्यता है कि सृष्टिकर्ता भगवान्‌ व्रह्मा जी द्वारा प्रारम्भ की गयी मानवीय सृष्टि की कालगणना के अनुसार भारत में प्रचलित सम्वत्सर केवल हिन्दुओं, भारतवासियों का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण संसार या समस्त मानवीय सृष्टि का सम्वत्सर है। इसलिए यह सकल व्रह्माण्ड के लिए नव वर्ष के आगमन का सूचक है।

व्रह्मा जी प्रणीत यह कालगणना निसर्ग अथवा प्रकृति पर आधारित होने के कारण पूरी तरह वैज्ञानिक है। अत: नक्षत्रों को आधार बनाकर जहां एक ओर विज्ञानसम्मत चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कात्तिर्क, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन नामक १२ मासों का विधान एक वर्ष में किया गया है, वहीं दूसरी ओर सप्ताह के सात दिवसों यथा रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार तथा शनिवार का नामकरण भी व्रह्मा जी ने विज्ञान के आधार पर किया है।

आधुनिक समय में सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित ईसाइयत के ग्रेगेरियन कैलेण्डर को दृष्टिपथ में रखकर अज्ञानी जनों द्वारा प्राय: यह प्रश्न किया जाता है कि व्रह्मा जी ने आधा चैत्र मास व्यतीत हो जाने पर नव सम्वत्सर और सूर्योदय से नवीन दिवस का प्रारम्भ होने का विधान क्यों किया है? इसी भांति सप्ताह का प्रथम दिवस सोमवार न होकर रविवार ही क्यों निर्धारित किया गया है? जैसा ऊपर कहा जा चुका है, व्रह्मा जी ने इस मानवीय सृष्टि की रचना तथा कालगणना का पूरा उपक्रम निसर्ग अथवा प्रकृति से तादात्म्य रखकर किया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि ‘चैत्रमासे जगत्‌ व्रह्मा संसर्ज प्रथमेऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदय सति।‘ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस को सूर्योदय से कालगणना का औचित्य इस तथ्य में निहित है कि सूर्य, चन्द्र, मंगल, पृथ्वी, नक्षत्रों आदि की रचना से पूर्व सम्पूर्ण त्रैलोक्य में घटाटोप अन्धकार छाया हुआ था। दिनकर(सूर्य) की उत्पत्ति के साथ इस धरा पर न केवल प्रकाश प्रारम्भ हुआ अपितु भगवान्‌ आदित्य की जीवनदायिनी ऊर्जा शक्ति के प्रभाव से पृथ्वी तल पर जीव-जगत का जीवन भी सम्भव हो सका। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के स्थान पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वर्ष का आरम्भ, अर्द्धरात्रि के स्थान पर सूर्योदय से दिवस परिवर्तन की व्यवस्था तथा रविवार को सप्ताह का प्रथम दिवस घोषित करने का वैज्ञानिक आधार तिमिराच्छन्न अन्धकार को विदीर्ण कर प्रकाश की अनुपम छटा बिखेरने के साथ सृजन को सम्भव बनाने की भगवान्‌ भुवन भास्कर की अनुपमेय शक्ति में निहित है। वैसे भी इंग्लैण्ड के ग्रीनविच नामक स्थान से दिन परिवर्तन की व्यवस्था में अर्द्ध रात्रि के १२ बजे को आधार इसलिए बनाया गया है; क्योंकि जब इंग्लैण्ड में रात्रि के १२ बजते हैं, तब भारत में भगवान्‌ सूर्यदेव की अगवानी करने के लिए प्रात: ५.३० बजे होते हैं।

वारों के नामकरण की विज्ञान सम्मत प्रक्रिया में व्रह्मा जी ने स्पष्ट किया कि आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारम्भ होकर क्रमश: बुध, शुक्र, चन्द्र, मंगल, गुरु और शनि की है। पृथ्वी के उपग्रह चन्द्रमा सहित इन्हीं अन्य छह ग्रहों को साथ लेकर व्रह्मा जी ने सप्ताह के सात दिनों का नामकरण किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पृथ्वी अपने उपग्रह चन्द्रमा सहित स्वयं एक ग्रह है, किन्तु पृथ्वी पर उसके नाम से किसी दिवस का नामकरण नहीं किया जायेगा; किन्तु उसके उपग्रह चन्द्रमा को इस नामकरण में इसलिए स्थान दिया जायेगा; क्योंकि पृथ्वी के निकटस्थ होने के कारण चन्द्रमा आकाशमण्डल की रश्मियों को पृथ्वी तक पहुँचाने में संचार उपग्रह का कार्य सम्पादित करता है और उससे मानवीय जीवन बहुत गहरे रूप में प्रभावित होता है। लेकिन पृथ्वी पर यह गणना करते समय सूर्य के स्थान पर चन्द्र तथा चन्द्र के स्थान पर सूर्य अथवा रवि को रखा जायेगा।

हम सभी यह जानते हैं कि एक अहोरात्र या दिवस में २४ होरा या घण्टे होते हैं। व्रह्मा जी ने इन २४ होरा या घण्टों में से प्रत्येक होरा का स्वामी क्रमश: सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु और मंगल को घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि सृष्टि की कालगणना के प्रथम दिवस पर अन्धकार को विदीर्ण कर भगवान्‌ भुवन भास्कर की प्रथम होरा से क्रमश: शुक्र की दूसरी, बुध की तीसरी, चन्द्रमा की चौथी, शनि की नौवीं, गुरु की छठी तथा मंगल की सातवीं होरा होगी। इस क्रम से इक्कीसवीं होरा पुन: मंगल की हुई। तदुपरान्त सूर्य की बाईसवीं, शुक्र की तेईसवीं और बुध की चौबीसवीं होरा के साथ एक अहोरात्र या दिवस पूर्ण हो गया। इसके बाद अगले दिन सूर्योदय के समय चन्द्रमा की होरा होने से दूसरे दिन का नामकरण सोमवार किया गया। अब इसी क्रम से चन्द्र की पहली, आठवीं और पंद्रहवीं, शनि की दूसरी, नववीं और सोलहवीं, गुरु की तीसरी, दशवीं और उन्नीसवीं, मंगल की चौथी, ग्यारहवीं और अठ्ठारहवीं, सूर्य की पाचवीं, बारहवीं और उन्नीसवीं, शुक्र की छठी, तेरहवीं और बीसवीं, बुध की सातवीं, चौदहवीं और इक्कीसवीं होरा होगी। बाईसवीं होरा पुन: चन्द्र, तेईसवीं शनि और चौबीसवीं होरा गुरु की होगी। अब तीसरे दिन सूर्योदय के समय पहली होरा मंगल की होने से सोमवार के बाद मंगलवार होना सुनिश्चित हुआ। इसी क्रम से सातों दिवसों की गणना करने पर वे क्रमश: बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार तथा शनिवार घोषित किये गये; क्योंकि मंगल से गणना करने पर बारहवीं होरा गुरु पर समाप्त होकर बाईसवीं होरा मंगल, तेईसवीं होरा रवि और चौबीसवीं होरा शुक्र की हुई। अब चौथे दिवस की पहली होरा बुध की होने से मंगलवार के बाद का दिन बुधवार कहा गया। अब बुधवार की पहली होरा से इक्कीसवीं होरा शुक्र की होकर बाईसवीं, तेईसवीं और चौबीसवीं होरा क्रमश: बुध, चन्द्र और शनि की होगी। तदुपरान्त पांचवें दिवस की पहली, होरा गुरु की होने से पांचवां दिवस गुरुवार हुआ। पुन: छठा दिवस शुक्रवार होगा; क्योंकि गुरु की पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं और बाईसवीं होरा के पश्चात्‌ तेईसवीं होरा मंगल और चौबीसवीं होरा सूर्य की होगी। अब छठे दिवस की पहली होरा शुक्र की होगी। सप्ताह का अन्तिम दिवस शनिवार घोषित किया गया; क्योंकि शुक्र की पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं और बाईसवीं होरा के उपरान्त बुध की तेईसवीं और चन्द्रमा की चौबीसवीं होरा पूर्ण होकर सातवें दिवस सूर्योदय के समय प्रथम होरा शनि की होगी।

संक्षेप में व्रह्मा जी प्रणीत इस कालगणना में नक्षत्रों, ऋतुओं, मासों, दिवसों आदि का निर्धारण पूरी तरह निसर्ग अथवा प्रकृति पर आधारित वैज्ञानिक रूप से किया गया है। दिवसों के नामकरण को प्राप्त विश्वव्यापी मान्यता इसी तथ्य का प्रतीक है।

2. पश्चिमी और भारतीय कालगणना का अंतर 
पाश्चात्य कालगणना (Western time calculations)
चिल्ड्रन्स ब्रिटानिका Vol 3-1964 में कैलेंडर के संदर्भ में उसके संक्षिप्त इतिहास का वर्णन किया गया है। कैलेंडर यानी समय विभाजन का तरीका-वर्ष, मास, दिन, का आधार, पृथ्वी की गति और चन्द्र की गति के आधार पर करना। लैटिन में Moon के लिए Luna शब्द है, अत: Lunar Month कहते हैं। लैटिन में Sun के लिए Sol शब्द है, अत: Solar Year वर्ष कहते हैं। आजकल इसका माप 365 दिन 5 घंटे 48 मिनिट व 46 सेकेण्ड है। चूंकि सौर वर्ष और चन्द्रमास का तालमेल नहीं है, अत: अनेक देशों में गड़बड़ रही।

दूसरी बात, समय का विभाजन ऐतिहासिक घटना के आधार पर करना। ईसाई मानते हैं कि ईसा का जन्म इतिहास की निर्णायक घटना है, इस आधार पर इतिहास को वे दो हिस्सों में विभाजित करते हैं। एक बी.सी. तथा दूसरा ए.डी.। B.C. का अर्थ है Before Christ - यह ईसा के उत्पन्न होने से पूर्व की घटनाओं पर लागू होता है। जो घटनाएं ईसा के जन्म के बाद हुर्इं उन्हें A.D. कहा जाता है जिसका अर्थ है Anno Domini अर्थात् In the year of our Lord. यह अलग बात है कि यह पद्धति ईसा के जन्म के बाद कुछ सदी तक प्रयोग में नहीं आती थी।

रोमन कैलेण्डर-आज के ई। सन् का मूल रोमन संवत् है जो ईसा के जन्म से 753 वर्ष पूर्व रोम नगर की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ। प्रारंभ में इसमें दस माह का वर्ष होता था, जो मार्च से दिसम्बर तक चलता था तथा 304 दिन होते थे। बाद में राजा नूमा पिम्पोलियस ने इसमें दो माह Jonu Arius और Februarius जोड़कर वर्ष 12 माह का बनाया तथा इसमें दिन हुए 355, पर आगे के वर्षों में ग्रहीय गति से इनका अंतर बढ़ता गया, तब इसे ठीक 46 बी.सी. करने के लिए जूलियस सीजर ने वर्ष को 365 1/4 दिन का करने हेतु नये कैलेंडर का आदेश दिया तथा उस समय के वर्ष को कहा कि इसमें 445 1/4 दिन होंगे ताकि पूर्व में आया अंतर ठीक हो सके। इसलिए उस वर्ष यानी 46 बी.सी. को इतिहास में संभ्रम का वर्ष (Year of confusion) कहते हैं।

जूलियन कैलेंडर- जूलियस सीजर ने वर्ष को 365 1/4 दिन का करने के लिए एक व्यवस्था दी। क्रम से 31 व 30 दिन के माह निर्धारित किए तथा फरवरी 29 दिन की। Leap Year में फरवरी भी 30 दिन की कर दी। इसी के साथ इतिहास में अपना नाम अमर करने के लिए उसने वर्ष के सातवें महीने के पुराने नाम Quinitiles को बदलकर अपने नाम पर जुलाई किया, जो 31 दिन का था। बाद में सम्राट आगस्टस हुआ; उसने भी अपना नाम इतिहास में अमर करने हेतु आठवें महीने Sextilis का नाम बदलकर उस माह का नाम अगस्त किया। उस समय अगस्त 30 दिन का होता था पर-"सीजर से मैं छोटा नहीं", यह दिखाने के लिए फरवरी के माह जो उस समय 29 दिन का होता था जो एक दिन लेकर अगस्त भी 31 दिन का किया। तब से मास और दिन की संख्या वैसी ही चली आ रही है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर - 16वीं सदी में जूलियन कैलेन्डर में 10 दिन बढ़ गए और चर्च फेस्टीवल ईस्टर आदि गड़बड़ आने लगे, तब पोप ग्रेगोरी त्रयोदश ने 1582 के वर्ष में इसे ठीक करने के लिए यह हुक्म जारी किया कि 4 अक्तूबर को आगे 15 अक्तूबर माना जाए। वर्ष का आरम्भ 25 मार्च की बजाय 1 जनवरी से करने को कहा। रोमन कैथोलिकों ने पोप के आदेश को तुरन्त माना, पर प्रोटेस्टेंटों ने धीरे-धीरे माना। ब्रिाटेन जूलियन कैलेंडर मानता रहा और 1752 तक उसमें 11 दिन का अंतर आ गया। अत: उसे ठीक करने के लिए 2 सितम्बर के बाद अगला दिन 14 सितम्बर कहा गया। उस समय लोग नारा लगाते थे "Criseus back our 11 days"। इग्लैण्ड के बाद बुल्गारिया ने 1918 में और ग्रीक आर्थोडाक्स चर्च ने 1924 में ग्रेगोरियन कैलेण्डर माना।

भारत में कालगणना का इतिहास (Indian time calculations)
भारतवर्ष में ग्रहीय गतियों का सूक्ष्म अध्ययन करने की परम्परा रही है तथा कालगणना पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य की गति के आधार पर होती रही तथा चंद्र और सूर्य गति के अंतर को पाटने की भी व्यवस्था अधिक मास आदि द्वारा होती रही है। संक्षेप में काल की विभिन्न इकाइयां एवं उनके कारण निम्न प्रकार से बताये गये-

दिन अथवा वार- सात दिन- पृथ्वी अपनी धुरी पर १६०० कि.मी. प्रति घंटा की गति से घूमती है, इस चक्र को पूरा करने में उसे २४ घंटे का समय लगता है। इसमें १२ घंटे पृथ्वी का जो भाग सूर्य के सामने रहता है उसे अह: तथा जो पीछे रहता है उसे रात्र कहा गया। इस प्रकार १२ घंटे पृथ्वी का पूर्वार्द्ध तथा १२ घंटे उत्तरार्द्ध सूर्य के सामने रहता है। इस प्रकार १ अहोरात्र में २४ होरा होते हैं। ऐसा लगता है कि अंग्रेजी भाषा का ण्दृद्वद्ध शब्द ही होरा का अपभ्रंश रूप है। सावन दिन को भू दिन भी कहा गया।

सौर दिन-पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 1 लाख कि.मी. प्रति घंटा की रफ्तार से कर रही है। पृथ्वी का 10 चलनसौर दिन कहलाता है।

चन्द्र दिन या तिथि- चन्द्र दिन को तिथि कहते हैं। जैसे एकम्, चतुर्थी, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय चन्द्र का 12 अंश तक चलन एक तिथि कहलाता है।

सप्ताह- सारे विश्व में सप्ताह के दिन व क्रम भारत वर्ष में खोजे गए क्रम के अनुसार ही हैं। भारत में पृथ्वी से उत्तरोत्तर दूरी के आधार पर ग्रहों का क्रम निर्धारित किया गया, यथा- शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुद्ध और चन्द्रमा। इनमें चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे पास है तो शनि सबसे दूर। इसमें एक-एक ग्रह दिन के 24 घंटों या होरा में एक-एक घंटे का अधिपति रहता है। अत: क्रम से सातों ग्रह एक-एक घंटे अधिपति, यह चक्र चलता रहता है और 24 घंटे पूरे होने पर अगले दिन के पहले घंटे का जो अधिपति ग्रह होगा, उसके नाम पर दिन का नाम रखा गया। सूर्य से सृष्टि हुई, अत: प्रथम दिन रविवार मानकर ऊपर क्रम से शेष वारों का नाम रखा गया।

निम्न तालिका से सातों दिनों के क्रम को हम सहज समझ सकते हैं-
चन्द्र
बुध
शुक्र
सूर्य
मंगल
बृह.
शनि
रवि 
-
-
-
११
१०
१८
१७
१६
१५
१४
१३
१२
सोम 
२४
२३
२२
२१
२०
१९
१५
१४
१३
१२
११
१०
२२
२१
२०
१९
१८
१७
१६
मंगल 
२४
२३
१२
११
१०
१९
१८
१७
१६
१५
१४
१३
बुध 
२४
२३
२२
२१
२०
१६
१५
१४
१३
१२
११
१०
२३
२२
२१
२०
१९
१८
१७
बृह.
२४
१३
१२
११
१०
२०
१९
१८
१७
१६
१५
१४
शुक्र 
२४
२३
२२
२१
१०
१७
१६
१५
१४
१३
१२
११
२४
२३
२२
२१
२०
१९
१८
                                                                            शनि १
पक्ष-पृथ्वी की परिक्रमा में चन्द्रमा का १२ अंश चलना एक तिथि कहलाता है। अमावस्या को चन्द्रमा पृथ्वी तथा सूर्य के मध्य रहता है। इसे ० (अंश) कहते हैं। यहां से १२ अंश चलकर जब चन्द्रमा सूर्य से १८० अंश अंतर पर आता है, तो उसे पूर्णिमा कहते हैं। इस प्रकार एकम्‌ से पूर्णिमा वाला पक्ष शुक्ल पक्ष कहलाता है तथा एकम्‌ से अमावस्या वाला पक्ष कृष्ण पक्ष कहलाता है।

मास- कालगणना के लिए आकाशस्थ २७ नक्षत्र माने गए (१) अश्विनी (२) भरणी (३) कृत्तिका (४) रोहिणी (५) मृगशिरा (६) आर्द्रा (७) पुनर्वसु (८) पुष्य (९) आश्लेषा (१०) मघा (११) पूर्व फाल्गुन (१२) उत्तर फाल्गुन (१३) हस्त (१४) चित्रा (१५) स्वाति (१६) विशाखा (१७) अनुराधा (१८) ज्येष्ठा (१९) मूल (२०) पूर्वाषाढ़ (२१) उत्तराषाढ़ (२२) श्रवणा (२३) धनिष्ठा (२४) शतभिषाक (२५) पूर्व भाद्रपद (२६) उत्तर भाद्रपद (२७) रेवती।

२७ नक्षत्रों में प्रत्येक के चार पाद किए गए। इस प्रकार कुल १०८ पाद हुए। इनमें से नौ पाद की आकृति के अनुसार १२ राशियों के नाम रखे गए, जो निम्नानुसार हैं-

(१) मेष (२) वृष (३) मिथुन (४) कर्क (५) सिंह (६) कन्या (७) तुला (८) वृश्चिक (९) धनु (१०) मकर (११) कुंभ (१२) मीन। पृथ्वी पर इन राशियों की रेखा निश्चित की गई, जिसे क्रांति कहते है। ये क्रांतियां विषुव वृत्त रेखा से २४ उत्तर में तथा २४ दक्षिण में मानी जाती हैं। इस प्रकार सूर्य अपने परिभ्रमण में जिस राशि चक्र में आता है, उस क्रांति के नाम पर सौर मास है। यह साधारणत: वृद्धि तथा क्षय से रहित है।

चन्द्र मास- जो नक्षत्र मास भर सायंकाल से प्रात: काल तक दिखाई दे तथा जिसमें चन्द्रमा पूर्णता प्राप्त करे, उस नक्षत्र के नाम पर चान्द्र मासों के नाम पड़े हैं- (१) चित्रा (२) विशाखा (३) ज्येष्ठा (४) अषाढ़ा (५) श्रवण (६) भाद्रपद (७) अश्विनी (८) कृत्तिका (९) मृगशिरा (१०) पुष्य (११) मघा (१२) फाल्गुनी। अत: इसी आधार पर चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विनी, कृत्तिका, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन-ये चन्द्र मासों के नाम पड़े।

उत्तरायण और दक्षिणायन-पृथ्वी अपनी कक्षा पर २३  अंश उत्तर पश्चिमी में झुकी हुई है। अत: भूमध्य रेखा से २३  अंश उत्तर व दक्षिण में सूर्य की किरणें लम्बवत्‌ पड़ती हैं। सूर्य किरणों का लम्बवत्‌ पड़ना संक्रान्ति कहलाता है। इसमें २३ अंश उत्तर को कर्क रेखा कहा जाता है तथा दक्षिण को मकर रेखा कहा जाता है। भूमध्य रेखा को ०० अथवा विषुव वृत्त रेखा कहते हैं। इसमें कर्क संक्रान्ति को उत्तरायण एवं मकर संक्रान्ति को दक्षिणायन कहते हैं।

वर्षमान- पृथ्वी सूर्य के आस-पास लगभग एक लाख कि.मी. प्रति घंटे की गति से १६६०००००० कि.मी. लम्बे पथ का ३६५  दिन में एक चक्र पूरा करती है। इस काल को ही वर्ष माना गया।


युगमान- 4,32,000 वर्ष में सातों ग्रह अपने भोग और शर को छोड़कर एक जगह आते हैं। इस युति के काल को कलियुग कहा गया। दो युति को द्वापर, तीन युति को त्रेता तथा चार युति को सतयुग कहा गया। चतुर्युगी में सातों ग्रह भोग एवं शर सहित एक ही दिशा में आते हैं।

वर्तमान कलियुग का आरंभ भारतीय गणना से ईसा से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था। उस समय सभी ग्रह एक ही राशि में थे। इस संदर्भ में यूरोप के प्रसिद्ध खगोलवेत्ता बेली का कथन दृष्टव्य है-

"हिन्दुओं की खगोलीय गणना के अनुसार विश्व का वर्तमान समय यानी कलियुग का आरम्भ ईसा के जन्म से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था। इस प्रकार यह कालगणना मिनट तथा सेकेण्ड तक की गई। आगे वे यानी हिन्दू कहते हैं, कलियुग के समय सभी ग्रह एक ही राशि में थे तथा उनके पञ्चांग या टेबल भी यही बताते हैं। ब्राहृणों द्वारा की गई गणना हमारे खगोलीय टेबल द्वारा पूर्णत: प्रमाणित होती है। इसका कारण और कोई नहीं, अपितु ग्रहों के प्रत्यक्ष निरीक्षण के कारण यह समान परिणाम निकला है।"। (Theogony of Hindus, by Bjornstjerna P. 34) यहाँ देखें

वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंच मण्डल क्रम वाली है। चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडलसूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। ये उत्तरोत्तर मण्डल का चक्कर लगा रहे हैं।
जैसी चन्द्र प्रथ्वी के, प्रथ्वी सूर्य के , सूर्य परमेष्ठी के, परमेष्ठी स्वायम्भू के| 
चन्द्र की प्रथ्वी की एक परिक्रमा -> एक मास 
प्रथ्वी की सूर्य की एक परिक्रमा -> एक वर्ष 
सूर्य की परमेष्ठी की एक परिक्रमा ->एक मन्वन्तर 
परमेष्ठी की स्वायम्भू की एक परिक्रमा ->एक कल्प
मन्वन्तर मान- सूर्य मण्डल के परमेष्ठी मंडल (आकाश गंगा) के केन्द्र का चक्र पूरा होने पर उसे मन्वन्तर काल कहा गया। इसका माप है 30,67,20,000 (तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष। एक से दूसरे मन्वन्तर के बीच 1 संध्यांश सतयुग के बराबर होता है। अत: संध्यांश सहित मन्वन्तर का माप हुआ 30 करोड़ 84 लाख 48 हजार वर्ष। आधुनिक मान के अनुसार सूर्य 25 से 27 करोड़ वर्ष में आकाश गंगा के केन्द्र का चक्र पूरा करता है।

कल्प- परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है। यानी आकाश गंगा अपने से ऊपर वाली आकाश गंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया। यानी इसका माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)। इसे ब्रह्मा का एक दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात, अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ।

ब्रह्मा का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष
ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्माण्ड की आयु- 31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,000000000 वर्ष)

भारतीय ऋषियों  की इस गणना को देखकर यूरोप के प्रसिद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञानी
Carl Sagan ने अपनी पुस्तक "Cosmos" में कहा "विश्व में हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है जो इस विश्वास पर समर्पित है कि इस ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति और क्षय की एक सतत प्रक्रिया चल रही है और यही एक धर्म है, जिसने समय के सूक्ष्मतम से लेकर बृहत्तम माप, जो समान्य दिन-रात से लेकर 8 अरब 64 करोड़ वर्ष के ब्राहृ दिन रात तक की गणना की है, जो संयोग से आधुनिक खगोलीय मापों के निकट है। यह गणना पृथ्वी व सूर्य की उम्र से भी अधिक है तथा इनके पास और भी लम्बी गणना के माप है।" कार्ल सेगन ने इसे संयोग कहा है यह ठोस ग्रहीय गणना पर आधारित है। Cosmos यहाँ से प्राप्त कर सकते है|
http://www.hindu-blog.com/2007/04/hindu-concept-of-beginning-and-end-of.html

ऋषियों की अद्भुत खोज
हमारे पूर्वजों ने जहां खगोलीय गति के आधार पर काल का मापन किया, वहीं काल की अनंत यात्रा और वर्तमान समय तक उसे जोड़ना तथा समाज में सर्वसामान्य व्यक्ति को इसका ध्यान रहे इस हेतु एक अद्भुत व्यवस्था भी की थी, जिसकी ओर साधारणतया हमारा ध्यान नहीं जाता है। हमारे देश में कोई भी कार्य होता हो चाहे वह भूमिपूजन हो, वास्तुनिर्माण का प्रारंभ हो- गृह प्रवेश हो, जन्म, विवाह या कोई भी अन्य मांगलिक कार्य हो, वह करने के पहले कुछ धार्मिक विधि करते हैं। उसमें सबसे पहले संकल्प कराया जाता है। यह संकल्प मंत्र यानी अनंत काल से आज तक की समय की स्थिति बताने वाला मंत्र है। इस दृष्टि से इस मंत्र के अर्थ पर हम ध्यान देंगे तो बात स्पष्ट हो जायेगी।

संकल्प मंत्र में कहते हैं....
ॐ अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्राहृणां द्वितीये परार्धे
अर्थात् महाविष्णु द्वारा प्रवर्तित अनंत कालचक्र में वर्तमान ब्रह्मा की आयु का द्वितीय परार्ध-वर्तमान ब्रह्मा की आयु के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं।
श्वेत वाराह कल्पे-कल्प याने ब्रह्मा के 51वें वर्ष का पहला दिन है।

वैवस्वतमन्वंतरे- ब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं उसमें सातवां मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।

अष्टाविंशतितमे कलियुगे- एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं, उनमें से 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है।

कलियुगे प्रथमचरणे- कलियुग का प्रारंभिक समय है।

कलिसंवते या युगाब्दे- कलिसंवत् या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा है।

जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे- देश प्रदेश का नाम

अमुक स्थाने - कार्य का स्थान
अमुक संवत्सरे - संवत्सर का नाम
अमुक अयने - उत्तरायन/दक्षिणायन
अमुक ऋतौ - वसंत आदि छह ऋतु हैं
अमुक मासे - चैत्र आदि 12 मास हैं
अमुक पक्षे - पक्ष का नाम (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)
अमुक तिथौ - तिथि का नाम
अमुक वासरे - दिन का नाम
अमुक समये - दिन में कौन सा समय
उपरोक्त में अमुक के स्थान पर क्रमश : नाम बोलने पड़ते है ।
जैसे अमुक स्थाने : में जिस स्थान पर अनुष्ठान किया जा रहा है उसका नाम बोल जाता है ।
उदहारण के लिए दिल्ली स्थानेग्रीष्म ऋतौ आदि  |

अमुक - व्यक्ति - अपना नाम, फिर पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करता है।

इस प्रकार जिस समय संकल्प करता है, उस समय से अनंत काल तक का स्मरण सहज व्यवहार में भारतीय जीवन पद्धति में इस व्यवस्था के द्वारा आया है।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

भरतवर्ष को मेट्रो सिटी नहीं मेघा ग्राम चाहिए

भारतवर्ष को मेट्रो सिटी नहीं मेघा ग्राम चाहिए


मेट्रो सिटी नहीं ‘मेधा ग्राम’ बसाइए

-राकेश कुमार आर्य-
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ग्राम अपने आप में एक ऐसी व्यवस्था है जिसके विषय में इसके पूर्णत: आत्मनिर्भर पूर्णत: आत्मानुशासित और पूर्णत: आत्मनियंत्रित रहने की परिकल्पना को हमारे ऋषि पूर्वजों ने साकार रूप दिया। आज के भौतिकवादी युग में किसी ईकाई या संस्था के पूर्णत: आत्मनिर्भर आत्मानुशासित अथवा आत्मनियंत्रित होने की कल्पना नहीं की जा सकती। ग्राम्य और शहरी सभ्यता में यही अंतर है।
ग्राम्य सभ्यता संस्कृति प्रधान होती थी, जिसमें एक ऋषि या ऋषिमंडल के दिशा निर्देशन में पूरा गांव कार्य करता था। जहां व्यायामशाला होती थी, कृषि योग्य भूमि होती थी। जिससे अन्न औषधादि मनुष्य देह की नीरोगता के लिए उत्पन्न होती थी। एक गुरूकुल होता था, जिसमें ऋषि लोग छात्रों का जीवन निर्माण कर उन्हें विश्व राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाया करते थे। गोचर भूमि में गौ-धन विचरता था, जो हमारी कृषीय अर्थव्यवस्था का आधार होता था और मेधावृद्घि कर हमारी आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता था। ऐसे परिवेश में एक गांव के लिए दूध, पानी, भोजन, अन्नादि कहीं बाहर से नहीं लाना पड़ता था, अपितु जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति वहीं होती थी। प्रकृति के साथ सहचर्य के आनंद से खरा वातावरण जगमगाता था, चारों ओर सहचर्य और संवेदनाओं की मीठी-मीठी सुगंध मीठे जल के झरने की भांति झरती रहती थी। इससे आध्यात्म का वातावरण बना रहता था। प्रत्येक प्राणी के जीवन को हम अपने लिए उपयोगी मानते थे, इसलिए जीव हत्या पूर्णत: निषिद्ध होती थी। अत: जीवन को संपूर्णता में जीने की एक संपूर्ण व्यवस्था का नाम है ग्राम। यह हमारी उच्चतम मेधा शक्ति का प्रतीक था।
योग से मोक्ष प्राप्ति हमारे जीवन का उद्देश्य हुआ करती थी। इसलिए चारों ओर आत्मानुशासन हुआ करता था। भारत को हम बड़े सहज भाव से गांवों का देश कह देते हैं, पर यह जानने का प्रयास नहीं करते कि गांव होता क्या है? हम यह भी कहते हैं कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, पर यह नही जानते कि भारत की आत्मा है क्या? सचमुच गांव सहयोग, सम्मैत्री, सदभाव, सहचर्य और समभाव की वह पावन गंगा है जो मानव हृदय की अध्यात्म की प्यास बुझाती है और उसे मानव से देव बनने की ओर प्रेरित करती है। मानव का आध्यात्मिक जागरण कर उसे प्रकृति का असहयोगी नही, अपितु सहयोगी बनाती है और उसे प्रेरित करती है कि मेरी तरह तू भी बीहड़ जंगलों के बीच से अपना रास्ता बना, आगे बढ़ और विलीन हो जा मोक्ष के अनंत सागर में। सचमुच ये सहयोग, सम्मैत्री आदि के दिव्य गुण गांव में इसलिए मिलते थे कि वहां दिव्य मेधासंपन्न दिव्य ऋषि मंडल रहा करता था। ये ऋषिमंडल किसी राजा या सम्राट के कानून का पालन नही करता था, अपितु ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार धर्म का शासन चलाता था और सब लोगों में परस्पर सहयोग, सम्मैत्री आदि के दिव्य गुणों को विकसित कर उन्हें जीवन पथ पर आगे बढऩे के लिए खुला छोड़ देता था। वे सारे लोग स्वभावत: इन दिव्य गुणों को अपने जीवन का आधारभूत सत्य मानकर इनके अनुसार ही अपना जीवनाचरण बनाया करते थे। यह आध्यात्मिक जीवन आचरण और सहचर्यवाद की पराकाष्ठा ही भारत की आत्मा है, जो गांवों में बसती कही जाती है।
समय ने करवट ली। जीवन मान्यताएं बदलीं और हमने देखा कि भारत के गांवों को उजाड़कर नगर बसाने की योजनाएं बनने लगीं। अंग्रेजों ने जितनी शीघ्रता से हो सकता था इस ग्राम्य व्यवस्था को उजाडऩे का कार्य करना आरंभ किया। लॉर्ड मैकाले ने 2 फरवरी 1835 ब्रिटेन की संसद में बोलते हुए कहा कि भारत में इस समय 6 लाख गुरूकुल कार्य कर रहे हैं। यानि प्रत्येक गांव में एक गुरूकुल है। यदि हम भारत में सफल होना चाहते हैं तो हमें भारत की इस गुरूकुल परंपरा को समाप्त करना होगा। बस यहीं से भारत को उजाडऩे का उपक्रम आरंभ हुआ। पिछले पौने दो सौ वर्ष से भारत को उजाड़ा जा रहा है। भारत की आत्मा छंटपटा रही है, भारत का प्रकृति के साथ सहचर्यवाद का दिव्य वातावरण समाप्त होकर रह गया है और हम नरकीय जीवन व्यवस्था के मकडज़ाल में जाकर फंस गये हैं।
हमने आध्यात्म के जंगल उजाड़कर कंकरीट के जंगलों को बसाना आरंभ कर दिया। जिससे हमारी संवेदनाएं मरने लगीं और संवेदननाशून्य ‘मशीनी मानव समाज’ का तेजी से विस्तार होने लगा। गरीबी और अमीरी के बीच की खाई में जमीन आसमान का अंतर हो गया। हमने बहुत बड़े मानव समाज को पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित-शोषित या उपेक्षित समझकर बहुत पीछे छोड़ दिया।
इसी खेल में देश आजाद हो गया और आजादी के बाद अब 21वीं सदी में भी भारत आ गया। पर जो खेल चल रहा था उसे हमने छोड़ा नहीं, अपितु उसे और भी द्रुतगति से जारी रखा। हम नगरों से महानगरों में प्रविष्ट हो गये। महानगरों की ये जीवनशैली वो शैली है, जिसमें न तो आत्मनिर्भरता है, न आत्मानुशासन है और नही आत्मनियंत्रण है। यहां जल, वायु, अन्न, औषधि, सब्जी, दूध आदि सभी बाहर से आते हैं। जिससे लोगों को मिलावट करने का अवसर मिलता है, क्योंकि लोग सोचते हैं कि ये चीजें हमारे लिए नहीं, बल्कि शहरियों के लिए जा रही है, कर लो मिलावट… बना लो… दाम। यह भावना गांव में इसलिए पैदा हुई कि उसे पिछड़ा, अति पिछड़ा समझकर पीछे छोड़ दिया गया और नगरों ने उसकी जीवन शैली पर व्यंग्य करना आरंभ कर दिया। शहरों का वातावरण परमुखापेक्षी होता है, जबकि ग्रामीण परिवेश को स्वावलंबी माना जाता रहा है। शहरी परिवेश बाजार व्यवस्था का जनक है, जबकि ग्रामीण परिवेश या ग्राम्य सभ्यता वस्तु विनिमय से काम चलाती रही है। शहरी सभ्यता भौतिकवादी है तो ग्राम्य सभ्यता संस्कृति प्रधान है। अध्यात्मवाद उसका मूल स्रोत है। आत्मानुशासन अर्थात कर्तव्य पथ पर बढ़ते हुए सुंदर व्यवहार निष्पादित करना, निष्छल, निष्कपट और निभ्र्रांत रहना ग्राम्य सभ्यता का मूल स्वभाव है, जबकि शहरी सभ्यता इसके विपरीत आचरण करती पायी जाती है। इसलिए विश्व की प्राचीन नगरीय सभ्यता के अवशेष जहां-जहां मिलते हैं, वहां-वहां हमें स्थानीय शासन की प्रणाली को विकसित करने में नगरों की सहभागिता दीख पड़ती है। यह महत्वपूर्ण है कि ग्राम्य सभ्यता आत्मानुशासित रहती है और स्वभावत: कोई ऐसा कार्य नही करती जो किसी दूसरे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में बाधा उत्पन्न करे, या उनका हनन करे। जबकि नगरीय सभ्यताओं में ऐसा होता है,और ऐसा हेाता है इसलिए वहां कोई ‘स्थानीय शासन’ मिलता है। जिसे कुछ ऐसे महत्वाकांक्षी (सेवाभावी नही) लोग विकसित करते हैं जो कि दूसरों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। इस प्रकार शासन के माध्यम से वर्चस्व स्थापित कर लोगों का शोषण करने की प्रणाली भारत की ग्राम्य संस्कृति की नही, अपितु पश्चिम की नगरीय सभ्यता की देन है।
आज भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत में सौ मेट्रो सिटी बसाने की बात कह रहे हैं। हमारा देश के प्रधानमंत्री जी से अनुरोध है कि वे महानगरों की नारकीय जीवन शैली से शिक्षा लें। देश में मेट्रो-सिटी बसाने की नही अपितु ‘मेधा ग्राम’ बसाने की आवश्यकता है। ऐसे ग्राम जो आत्मनिर्भर हों, आत्मानुशासित हों, आत्मनियंत्रित हों। जहां दूध, पानी, हवा, अन्न औषधि आदि सभी उपलब्ध हों और लोग प्राकृतिक सहचर्य को अपनाकर स्वभावत: एक दूसरे के साथ मिलकर चलने के अभ्यासी हों। महानगर बसाने का अभिप्राय है कि जीवन शैली को अस्त व्यस्त कर देना। एक ही स्थान पर पचास लाख की आबादी को बसाकर लोगों को पानी कहां से दोगे? दूध, सब्जी कहां से दोगे? यह विचारणीय है। इसलिए आवश्यक है कि मेधा ग्राम बसाओ। एक ग्राम में कितनी आबादी रहेगी-यह निश्चित करो। उसके लिए कितनी भूमि पर सब्जी फल उगाए जाएंगे? कितनी भूमि पर गौ आदि दुधारू पशु रखकर उनके दूधादि की प्राप्ति की जाएगी? यह भी निश्चित करो। ऐसे मेधा ग्राम को बसाकर उसके आध्यात्मिक विकास के लिए ऋषि मंडल की स्थापना करो ताकि राज्य के विधि के शासन को लोग स्वभावत: पालने के अभ्यासी बनें। मेधा ग्राम को आत्मनिर्भर स्वावलंबी बनाओ और परमुखापेक्षी रहने की गली सड़ी वर्तमान नगरीय व्यवस्था को जितना शीघ्र हो सके विदा करो। सबल और सफल, सक्षम और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए आज नये-नये प्रयोग करने की बजाए ऋषियों के अनुभूत प्रयोगों को ही अपनाने की आवश्यकता है।

मथुरा नरेश कुलचन्द का अनुपम बलिदान

मथुरा नरेश कुलचन्द का अनुपम बलिदान

मथुरा नरेश कुलचन्द 


बात सन 986-987 की है। भारत पर उस समय आक्रमण करने की एक श्रंखला को महमूद गजनवी अभी आरंभ कर नही पाया था। तब प्रतीहार वंश भारत में पतनोन्मुख हो चला था, यद्यपि यह वंश भारत के लिए बहुत ही गौरव प्रदान कराने वाला रहा था। ऐसा गौरव जिसे देखकर इतिहासकारों की मान्यता बनी कि जितनी देर (150 वर्षों तक) गुर्जर प्रतीहार राजवंश भारत को एक रख सका और जितना विस्तार उसके साम्राज्य का तत्कालीन भारत में हुआ उतना उनसे पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार कभी मौर्यों ने किया था। जिनका साम्राज्य प्रतीहार वंश से थोड़ा विस्तृत था। डा. विशुद्घानंद पाठक अपनी पुस्तक ‘उत्तर भारत का राजनीतिक इतिहास’ में लिखते हैं-‘‘अपने सर्वाधिक उत्कर्ष और विस्तार के समय केवल मौर्यों का साम्राज्य प्रतीहारों से बड़ा था, लेकिन उसका जीवन प्रतीहार साम्राज्य के 150 वर्षों के मुकाबले  एक सौ वर्षों से भी कम (321-232 ई. पू.) का था। लगभग इतना ही जीवन (350-467 ई. पू.) गुप्त साम्राज्य का भी था, किंतु वह अपने अन्यतम विस्तार के समय भी भोज महेन्द्रपाल के साम्राज्य विस्तार से छोटा ही था। हर्ष का साम्राज्य प्रतीहारों जैसा न तो विस्तृत था, न दीर्घकालीन और न प्रशासन में ही उतना सुसंगठित था। दीर्घजीवन में भारतवर्ष का यदि कोई अन्य साम्राज्य प्रतीहार साम्राज्य का सामना कर सका तो वह मुगल साम्राज्य था।’’
महान गुर्जर प्रतीहार वंश
इतना महत्वपूर्ण और गौरव प्रदाता गुर्जर प्रतीहार राजवंश जब पतन की ओर जाते हुए अपने अस्ताचल के अंक में कहीं समाहित होना चाह रहा था तो उस समय इस राजवंश का शासक राज्यपाल यहां शासन कर रहा था। मुस्लिम इतिहास फिरिश्ता ने इस गुर्जर प्रतीहार शासक के विषय में बड़े पते की बात कही है। यद्यपि इस बात को अन्य साक्षियों से प्रमाणित न होने के कारण कुछ इतिहासकारों ने निर्मूल्य सिद्घ करने का प्रयास किया है। परंतु ध्यान देने योग्य बात ये है कि फिरिश्ता की बात को यदि कोई अन्य कोई मुस्लिम इतिहासकार दोहरा नही रहा है तो कहीं नकार भी तो नही रहा। घटना का पुन: न दोहराना किसी पूर्वाग्रह का परिणाम भी हो सकता है या भारतीयों को विशेष महत्व प्रदान न करने की विदेशी मुस्लिम इतिहासकारों की परंपरागत शैली भी हो सकती है।
फिरिश्ता कहता है-‘‘जब कुर्रम घाटी में शाही राजा जयपाल और महमूद की सेनाओं की मुठभेड़ हुई तो राजा जयपाल की सहायता में पास पड़ोस के विशेषत: दिल्ली, अजमेर, कालंजर और कन्नौज के राजाओं ने सेनाएं और रूपये पैसे भेजे थे। उनकी सेनाएं पंजाब में एकत्र हुईं और उनकी संख्या एक लाख तक पहुंच गयी। फिरिश्ता आगे लिखता है कि जब 1008 ई. में महमूद ने जयपाल के पुत्र आनंदपाल पर पंजाब में चढ़ाई की तो पुन: कन्नौज के राजा ने उसकी सहायता में एक बड़ी भारी सेना भेजी और उसके उदाहरण पर उज्जैन, कालंजर, दिल्ली और अजमेर के राजाओं ने भी सेनाएं भेजीं।’’
संघ बनाने की परंपरा
यह थी हमारी संघ बना बनाकर लडऩे की परंपरा। जो हमें विदेशी आतताईयों के विरूद्घ एक होने के लिए प्रेरित करती थी। कई बार तो हमें ऐसी अनुभूति होती है कि हमारे देशी राजा अपने किसी ऐसे देशी राजा की सहायता करने से तो बचते थे जिसके विषय में वो आश्वस्त होते थे कि वह तो विदेशी आक्रांता को परास्त कर ही देगा। परंतु जहां कहीं उन्हें तनिक सा भी संदेह होता था कि आक्रांत राजा कुछ दुर्बल है तो वहां सैन्य और आर्थिक सहायता भेजने में देरी नही होती थी। इसे आप भारतीय राजाओं का राष्ट्रप्रेम कहेंगे या राष्ट्रद्रोह?
निश्चित रूप से यह राष्ट्रप्रेम था और इसी राष्ट्रप्रेम के कारण चाहे हमारे देशी राजाओं ने गुर्जर प्रतीहार वंश के प्रतापी शासकों की कभी कोई सहायता ना की हो, परंतु जब उसी वंश के दुर्बल शासक को सहायता देने की बात आयी तो उस समय कई राजाओं ने अपने राष्ट्रप्रेम का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। इस उदाहरण का उल्लेख यदि केवल फिरिश्ता तो करता है पर अन्य कोई मुस्लिम लेखक नही करता, मात्र इसी आधार पर निर्मूल नही माना जा सकता। आपके अच्छे कार्य का उल्लेख हर शत्रु लेखक नही कर सकता।
राजाओं का अनुकरणीय कृत्य
भारत के तत्कालीन स्वतंत्रता संघर्ष को जारी रखने के लिए हमारे राजाओं ने अनुकरणीय कृत्य किया और उसकी साक्षी यदि हमें फिरिश्ता ही देता है तो उसे ही स्वीकरणीय माना जाना चाहिए। साथ ही यह भी खोजा जाना चाहिए कि उस युद्घ में भारत के कितने लाल मां भारती की सेवा में बलिदान हुए? परिणाम चाहे जो रहा हो, बात बलिदानी परंपरा के माध्यम से स्वतंत्रता की लौ जलाये रखने की उदात्त राष्ट्रप्रेमी भावना को समझने की है कि विषम परिस्थितियों में भी हमने निज प्राणों को ज्योति की बाती बनाकर और उसमें अपनी ‘शहादत’ का रक्त रूपी तेल डालकर उसे सजीव रखा है, जलाये रखा है, बुझने नही दिया है। अत: यदि उस युद्घ के लिए एक लाख हिंदू वीर काम आये तो उन्हें संयुक्त रूप से सम्माननीय स्मारक मानना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है।
मथुरा का राजा कुलचंद
जब महमूद गजनवी भारत में अपना आतंकपूर्ण इतिहास लिख रहा था और अपनी क्रूरता से विश्व की इस प्राचीनतम संस्कृति के धनी देश की संस्कृति को मिटाने का हर संभव कार्य कर रहा था, उस समय इस देश को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से समृद्घ करने में अग्रणी रहे मथुरा पर कुलचंद नामक वीर कुल शिरोमणि शासक शासन कर रहा था।
2 दिसंबर 1018 को महमूद गजनवी का आतंकी और आक्रांता सैन्य दल बरन (बुलंदशहर) पहुंचा था। उसके सैन्यदल में तीस हजार सैनिक थे। कहा जाता है कि बरन का तत्कालीन शासक हरदत्त महमूद के आतंकी दल का सामना नही कर सका, इसलिए उसने धर्म परिवर्तन कर लिया। राजा हरदत्त की यह बात पड़ोसी शासक मथुरा के राजा कुलचंद को और देश की जनता को अच्छी नही लगी। इसलिए कुलचंद ने भारत की वीर कुलपरंपरा का परिचय देने का निर्णय लिया।
इधर महमूद गजनवी का अहंकार बरन की सफलता से और भी अधिक बढ़ गया था। वह एक तूफान की भांति विनाश मचाता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। उसका भी अगला निशाना मथुरा ही बन रहा था, जहां का राजा कुलचंद अपने राज दरबारियों तथा सेनापतियों के साथ मिलकर इस विदेशी आक्रांता का सामना करने का निर्णय ले चुका था।
मथुरा का गौरवपूर्ण अतीत
मथुरा प्राचीनकाल से अपने वैशिष्टय के लिए प्रसिद्घ रही है। इसके नाम की उत्पत्ति संस्कृति के ‘मधुर’ शब्द से हुई बतायी जाती है। यह भी माना जाता है कि रामायण काल में इस नगरी का नाम मधुपुर था। कभी यह मधुदानव नामक दानव के लडक़े लवणासुर की राजधानी भी रही थी। लवणासुर के अत्याचारों से त्राहिमाम् कर रही जनता ने अयोध्यापति भगवान राम से सहायता की याचना की तो भगवान राम ने अपने भाई शत्रुघ्न को लवणासुर का प्राणान्त करने के लिए भेजा। शत्रुघ्न अपने लक्ष्य में सफल मनोरथ होकर लौटे। द्वापर युग में यहां कंस ने अत्याचारों की कहर बरपा की, तो जैसे लवणासुर का अंत शत्रुघ्न ने रामायण काल में किया था, वैसे ही महाभारत काल में कंस का अंत कृष्ण ने किया था। तब उन्होंने महाराजा उग्रसेन को पुन: राज्यसिंहासन पर बैठाकर धर्म की स्थापना की।
महाभारत काल में मथुरा शूरसेन प्रांत के नाम से विख्यात थी। महात्मा बुद्घ के समय यहां राजा अवन्तिपुत्र का शासन था, जिनके काल में महात्मा बुद्घ ने भी इस नगरी में पदार्पण किया था। चंद्रगुप्त मौर्य के काल में मेगास्थनीज नामक यूनानी यात्री भारत आया था, उसने इस नगरी का नाम अपने संस्मरणों में मथोरा लिखा था। बौद्घ जैन ग्रंथों में भी इस नगरी का विशेष उल्लेख हमें मिलता है। जैन साहित्य में मथुरा को बारह योजन लंबी तथा नौ योजन चौड़ी बतलाया गया है। यहां लगभग तीन सौ वर्ष तक कुषाण वंश का शासन रहा। जिसमें इस नगरी का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व बढ़ा। गुप्तकाल में इसकी और भी अधिक उन्नति हुई। यहां मंदिरों का इस काल में भरपूर विकास हुआ। पर हूणों के आक्रमण से इस नगरी को भारी क्षति हुई थी। इसका उल्लेख चीनी यात्री फाहियान के द्वारा लिखित संस्मरणों से हमें मिलता है।
इस प्रकार मथुरा जैसी सांस्कृतिक और धार्मिक नगरी की ओर महमूद का बढऩा सचमुच इतिहास की एक रोमांचकारी घटना है। मानो महमूद एक नगर की ओर नही बल्कि इस देश की सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता की प्रतीक एक महान ऐतिहासिक धरोहर को ही मिटाने के लिए आगे बढ़ता जा रहा था।
कुलचंद जानता था अपना राष्ट्रधर्म
तब पराधीनता के गहराते अंधकार को चीरकर प्रकाश का परचम फहराना कुलचंद के लिए आवश्यक था। सौभाग्य की बात थी कि राजा कुलचंद यह जानता था कि वह किस ऐतिहासिक धरोहर का इस समय संरक्षक है और इस विषम से विषम परिस्थिति में उसका राष्ट्र धर्म या राष्ट्रीय दायित्व क्या है?
अंत में वह घड़ी आ गयी और विदेशी आक्रांता से धर्मरक्षक राजा कुलचंद की मुठभेड़ हो ही गयी। बड़ा भयंकर युद्घ हुआ था। राजा की बड़ी सेना राष्ट्रवेदी पर बलि हुई थी। राजा बड़ी वीरता से लड़ा। उसके साथ उसकी रानी भी युद्घक्षेत्र में युद्घरत थी। राजा को इसलिए पीछे की कोई चिंता नही थी कि मैं यदि बलिदान हो गया तो रानी का क्या होगा? कहीं वह आक्रांता के हाथ तो नही आ जाएगी? लगता है दोनों पति-पत्नी पहले से ही मन बनाकर आये थे कि युद्घ का परिणाम यदि हमारे प्रतिकूल गया तो क्या करना है और कैसे करना है? राजा अपने बलिदान के पीछे किसी प्रकार का जोखिम अपनी रानी के लिए छोडऩा नही चाहता था और रानी भी इसके लिए तैयार नही थी कि राजा के जाने के पश्चात अपना सतीत्व और धर्म किसी विदेशी को सौंपना पड़े। इसलिए देश के धर्म के लिए और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दोनों प्राणपण से संघर्ष करते रहें।
राजा कुलचंद ने जब देखा कि अब अधिकांश सेना स्वतंत्रता की वेदी पर निज प्राणों का उत्सर्ग कर चुकी है और अब कभी भी वह स्वयं भी शत्रु के हाथों या तो मारे जा सकते हैं या कैद किये जा सकते हैं, इसलिए उन्होंने राजा हरिदत्त का अनुकरण करने से उत्तम अपना और अपनी रानी का प्राणांत निज हाथों से ही करना उचित और श्रेयस्कर माना।
किया सर्वोत्कृष्टबलिदान
राजा ने अपनी ही तलवार से अपनी रानी और अपना प्राणांत कर मां भारती की सेवा में दो पुष्प चढ़ा दिये।
ये दो पुष्प कहां गिरे या कहां और कौन से स्थान पर मां के लिए चढ़े, किसी इतिहासकार ने आज तक खोजने का प्रयास नही किया? इतिहास के इस क्रूर मौन से पता नही कब पर्दा हटेगा? कुछ भी हो, पाठकवृन्द! हम और आप तो आइए, इन बलिदानियों पर अपने श्रद्घा पुष्प चढ़ा ही दें। आज राष्ट्र के लिए और आने वाली पीढिय़ों के लिए यही उचित है।