रविवार, 2 मार्च 2014

आर्यों की भारत में घुसपैठ के झूठ की जड़


आर्यों की भारत में घुसपैठ के झूठ की जड़

आर्यों की भारत में घुसपैठ के झूठ की जड़

(एक) मूल कारण है, एशियाटिक सोसायटी।  
कितने वर्षों से यह प्रश्न मुझे सता रहा था। प्रश्न था, कि कहां से यह “आर्यन इन्वेज़न ऑफ इंण्डिया” का झूठ फैलाया गया?  इसके पीछे कौनसा उद्देश्य और कौन सी शक्तियां काम कर रही थीं? भारतीय मानस को इसने, ऐसे विषैले झूठ से सराबोर कर दिया कि आज तक इस कुटिल धारणा से सामान्य भारतीय जानकार, मुक्त नहीं हो पाया है। जाने अनजाने हम अपने ही देश में पराए होते चले गए; विभाजित होते चले गए।
==>इस झूठ का  कारण है, एशियाटिक सोसायटी। 
जो एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल, १७८६ में विलियम जोन्स ने स्थापी थीं,  उसी की लन्दन शाखा में आगे, १८६६ में, जो षड्यंत्र रचा गया, वही इस मिथ्या-अवधारणा का कारण है।
प्रत्येक वर्ष एशियाटिक सोसायटी अपनी बैठकों के वृत्तान्तों का वार्षिक (Yearly Reports of Society’s Proceedings) संचयन प्रकाशित किया करती थीं।अनुमान है, कि, उन्हीं वृत्तान्तोंमें से इस झूठ को पकड़ा गया है। यह है, आर्य-अतिक्रमण’ का  झूठ। प्राकृत रिसर्च इन्स्टिट्यूट, वैशाली, बिहार के, डॉ. डीएस त्रिवेदी ने इस झूठ का स्फोट किया। संक्षेप में मैं इसी वृत्तान्त का आधार लेकर आलेख प्रस्तुत करता हूं।
डॉ.त्रिवेदी नें एक बड़े झूठ का भंडाफोड़ कर, क्रान्तिकारी सच्चाई को उजागर  किया है। यह जानकारी डॉ. त्रिवेदी नें अंग्रेज़ी शोधपत्रों में १९९२ में छपवाई, परिणाम, वह छपी तो सही, पर छपकर ही रह गयी।
(दो) इसे हिंदी में छपना चाहिए था।
ऐसे महत्त्वपूर्ण शोधपत्रों के  कम से कम, संक्षिप्त समाचार, भारतीय संचार माध्यमों मे छपने चाहिए। हिंदी में छपते तो कुछ तो हमारा समाज जाग्रत होता, कुछ जानकारी पाता, तो मानसिक रीति से मुक्त भी होता। फिर प्रादेशिक भाषाओं में भी फैल जाता। ऐसी जानकारी, भारतीय मानस को शनैः शनैः ही स्वतंत्र होने में सहायता अवश्य करती। उन पत्रों में उन्हें कई गुना परिश्रम करना पडता है। डॉ. त्रिवेदी ने अंग्रेज़ को रंगे हाथ पकडा है। रक्त रंजित हाथ है और छुरी भी है।
बाकी शोधपत्र  भी ढेरों लिखे गए हैं, पर वे सारे परोक्ष भी हैं, और अंग्रेज़ी में भी होते हैं। सुई खोई है, घास की गंजी में, पर ढूंढ़ते हैं हम उसे अंग्रेज़ी के दीप तले।इस लिए भी हम स्वतंत्र नहीं हो रहे।
(तीन) कड़वे रस में डुबा गुलाब जामुन
सोचता हूं कि यदि गुलाब जामुन को शक्कर के बदले, कड़वे रस में  डुबाया जाए तो वह पूरा का पूरा कड़वा हो जाएगा। बस वैसे ही भारतीय मानस को अंग्रेज़ आत्म-द्वेष, स्वभाषा-द्वेष, स्व-संस्कृति द्वेष, इत्यादि के कड़वे अंग्रेज़ी रस में सराबोर कर चला गया है। अंग्रेज़ी के सारे पुरस्कर्ता जब संसद में बोलते हैं, तो ग्लानि से मन भर जाता है।
सबेरे से रात तक, जो भी सोचता हूं तो अपनी सोच पर ही संदेह होता है। कहीं मेरी ही मानसिकता से निकलता हुआ चयन, दास्यता की, गुलामी की अभिव्यक्ति तो नहीं?
इतने सारे कुटिल मिशनरियों की, प्राच्यविदों की, विद्वानों की सेना हमें आत्मद्वेष से भरकर गयी है कि भारत मानसिक रीति से यदि स्वतंत्र हो जाए तो उसे संसार का आठवां आश्चर्य मानूंगा। जब हमारे विद्वान ही ब्रेनवॉश्ड (जान बूझकर लिखा) हुए हैं तो सामान्य जन की क्या कहें? जान लीजिए कि, आप-हम-भारत आज भी स्वतंत्र नहीं है। और ऐसे “ब्रेन वॉश्ड विद्वान” ही जब शिक्षक होते हैं, तो बालकों को भी क्या पढ़ाएंगे?  

(चार) लन्दन, रॉयल एशियाटिक सोसायटी की १८६६ की गुप्त बैठक

भारत को मतिभ्रमित (ब्रेन वॉश) करने के लिए, एक गुप्त बैठक १० अप्रैल १८६६ में, लन्दन की, रॉयल एशियाटिक सोसायटी में हुयी थी। वहां षड्यंत्र रचा गया था। जिसके अंतर्गत भारत में ’आर्य-अतिक्रमण’ के झूठे सिद्धान्त को तैराया गया था। उद्देश्य था उसके  परिणामस्वरूप भारत की प्रजा अंग्रेज़ों को परदेशी ना मानें। आर्य बहार से घुसे और अंग्रेज़ भी बहार से घुसे। दोनों का भारत पर समान अधिकार है; यह प्रमाणित करना।
A Secret meeting was held in the Royal Asiatic Society on April 10 1866, London when a conspiracy was hatched to induct the theory of Aryan Invasion of India, so that no Indian may say that the English are foreigners. “India was, ruled all along by outsiders and so the country must remain a slave under the Christian benign rule.”( The British wanted to justify their rule in India. To that end they tried to show all people here are outsiders,)
इस गुप्त बैठक में, इसाई पादरी एडवर्ड थॉमस ने ’आर्यन इन्वेज़न थियरी’ [ आर्य घुसपैठ का सिद्धान्त ] का  कपोलकल्पित सिद्धान्त  प्रस्तुत किया। लॉर्ड स्ट्रेंगफोर्ड बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।
धीरे-धीरे सुझाया गया कि तथाकथित आदिवासी, द्राविडी, आर्य, हूण, शक, राजपूत, और इस्लामपंथी इत्यादि, गुट अलग अलग ऐतिहासिक कालावधि में, भारत में, घुसकर शासन करते रहे हैं। इस प्रकार दिखाया गया कि जब भारत, सदा परदेशी घुसपैठियों से ही शासित हुआ है तो अंग्रेज़ी शासन से भारत को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भारतीयों को स्वतंत्रता की मांग करने का भी कोई कारण नहीं है।
(डॉ. डी, एस. त्रिवेदी, प्राकृत रिसर्च इन्स्टिट्यूट, वैशाली, बिहार)
” A clever clergyman Edward Thomas spelled the theory with Lord Strangford in the chair. Slowly and Slowly it was suggested that the so-called aborigines, Dravidians, Aryans, Hunas, Sakas, Rajputs and Muslims came at different epochs and ruled the country. Thus it was suggested that the country had been ruled by the foreign invaders and so there is nothing wrong if the Britishers are ruling the country. And, therefore, Indians had no right to demand independence.”
{Dr. D. S. Triveda, Professor, Prakrit Research Institute, Vaisali,Bihar}
(पांच) डॉ. अम्बेडकर का निरीक्षण-विश्लेषण 
एक अलग और तर्क शुद्ध प्रमाण डॉ. अम्बेडकर भी, वेदों का अध्ययन करने के पश्चात प्रस्तुत करते हैं।
डॉ. अंबेडकरजी कहते हैं:
“आर्यों की भारत में घुसपैठ’ का सिद्धांत एक मन गढंत झूठी कहानी है। ऐसा झूठ आवश्यक था, एक दूसरे झूठ को पुष्ट करने के लिए। यह दूसरा झूठ, जो उन्हें वास्तव में प्रमाणित करना था; वह था:
====>” इन्डो-जर्मेनिक जाति शुद्ध आर्य वंश का प्रतिनिधित्व करती  है;” इस झूठ को प्रस्थापित करने के लिए, फिर भारत में आर्यों की घुसपैठ आवश्यक हो गयी। भारत में तथाकथित “इंडो जर्मेनिक आर्य” घुसकर आए बिना, जर्मन जाति का भारत से संबंध कैसे जुड़ता?  और इसलिए ऐसा झूठा सिद्धान्त फैलाया गया। इस  सिद्धान्त को प्रस्थापित करने के लिए फिर अन्य तर्क-कुतर्क भी लड़ाए गये।<==
– डॉ. अंबेडकर जी के उद्धरण का भावानुवाद है यह।
(छः)  आर्य, दास और दस्युं — डॉ. अम्बेडकर 
डॉ. अम्बेडकर जी ही आगे लिखते हैं।
(१) वेदों में  आर्य शब्द है, पर उस नाम से किसी प्रजाति का उल्लेख नहीं होता।
{वेदों में आर्य शब्द प्रयोग अवश्य है। उसका अर्थ होता है, उच्च संस्कारित व्यक्तित्व —जैसे  कृण्वन्तु विश्वं आर्यं –का अर्थ होता है, हम विश्व को संस्कारित कर ऊंचे उठाएंगे। —लेखक}
(२) वेदों में, आर्य प्रजाति की भारत में घुसपैठ का कोई प्रमाण नहीं है। और मूल निवासी दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त किए जाने का भी, कोई प्रमाण नहीं है।
(३) आर्यों, दासों  और दस्युओं में कोई प्रजातिगत भेद की पुष्टि  करता प्रमाण भी नहीं मिलता।
वैदिक आर्य, दास और दस्युओं से अलग रंग के थे इस की पुष्टि भी वेदों में नहीं मिलती।
यदि *मानवमिति* नामका कोई विज्ञान माना जाता है, जिसके आधारपर मनुष्य की प्रजाति सुनिश्चित की जा सकती है……..(और उसके उपयोग से)  यदि ब्राह्मण आर्य प्रजाति का प्रमाणित होता है, तो अस्पृश्य भी आर्य प्रजाति का ही प्रमाणित होगा। और  यदि ब्राह्मण द्राविड प्रजाति का प्रमाणित होता है, तो अस्पृश्य भी द्राविडी  प्रजाति का ही प्रमाणित होगा।
* मानवमिति* एक शास्त्र है। जैसे भूमिति का अर्थ होता है, भू (भूमि) को  (मापन का) मापने का  विज्ञान; उसी प्रकार मानवमिति का अर्थ = मनुष्यके शरीर और अंगों का मापन कर उसकी प्रजाति सुनिश्चित करने का शास्त्र। अंग्रेज़ी में इसे  Anthropometry कहा जाता है। और माना जाता है कि हिटलर ने इसी का उपयोग कर जर्मनियों को भारत से जोड़ने का प्रयास किया था। शरीर के अंगों का अनुपात (प्रमाण ) इस में मह्त्व का होता है, रंग नहीं।
(सात) विवेकानंदजी की चुनौती
सबसे पहले, स्वामी विवेकानन्दजी ने इस आर्य-अतिक्रमण’ के झूठे सिद्धान्त  को चुनौती दी थी। उन्हों ने कहा था “ये सिद्धांत निरी मूर्खता है।”
“किस वेद में, वेद के किस सूक्त में, आप को आर्यों के, परदेश से यहां आकर भारत में बसने की बात का उल्लेख या प्रमाण मिलता हैं? कहां से ऐसी झूठी कल्पना करने के लिए भी आप को, प्रमाण प्राप्त होता है कि यहां के वनवासी आदिवासियों का नरसंहार किया गया था? आप को ऐसे मूर्खतापूर्ण ढपोसले से क्या मिलने वाला है?
आपकी सारी रामायण की पढ़ाई वृथा है, बेकार है। उसमें जो है ही नहीं, उस विषय में क्यों झूठी कपोल कथा खड़ी कर  रहे हो?”
(आठ) युरोप और भारत की सभ्यता का अंतर
विवेकानंद जी आगे कहते हैं;
“युरप की सभ्यता का उद्देश्य है अन्य सभी का जड़मूल से, नाश; मात्र अपने और अपने ही सुखी-जीवन के लिए। अन्यों का संहार कर अपनी समृद्धि का स्वप्न पश्चिम देखता है। पर हमारी आर्य संस्कृति का लक्ष्य है, सभी को अपने स्तर से भी ऊपर उठाकर, संस्कारित करना।
युरोपियन सभ्यता का साधन है तलवार;  हमारा साधन है, वर्ण व्यवस्था।
यह वर्ण व्यवस्था ही संस्कृति की ऊर्ध्व गामिनी सीढ़ी है। प्रत्येक को ऊंचा उठनेका अवसर उपलब्ध है। प्रत्येक (व्यक्ति और जाति )अपने आप को ऊपर उठाती चली जाए, अपने ज्ञान और और संस्कार के आधार पर। ऐसे संस्कारित होने को ही आर्यत्व माना गया है और सभी को ऐसे संस्कारित करने की घोषणा है, ॥ऋण्वन्तु विश्वं आर्यं॥ { Ref: Castes Culture and Socialism-Vivekaanand}
युरोप में हर जगह बलवान की विजय और दुर्बल की मृत्यु है।
पर इस भारत भूमि पर, प्रत्येक सामाजिक नियम, दुर्बल की रक्षा के लिए गढ़ा जाता है। हमारी समानता हर कोई को, ऊंचे स्तर पर उठाकर उस स्तर पर समानता का आदर्श रखती है। हमारी जातिका सदस्य सभी के साथ रहते हुए  ऊपर उठता है, अपनी उन्नति में सभीको सहभागी बनाकर।
सभीके लिए आदर्श है, ब्रह्मतेज और क्षात्रवीर्य। { Castes Culture and Socialism-Vivekaanand} 

(नौ ) पश्चिम की जाति धन पर आधारित है। 

युरोपीय अमरिका में कोई निर्धन बस्ती का वासी यदि धनी हो जाता है, तो, तुरंत उस बस्ती से उठकर धनिकों की बस्ती में घर खरिदकर अलग हो जाता है।जिन के साथ वह रहकर समृद्ध हुआ, उनसे ही अलग हो जाता है। पर, हमारे यहां जाति का सदस्य यदि उन्नति कर लेता है, तो वह अपनी जाति के साथ साथ ऊपर उठता है। साथ जाति को भी ऊपर उठाता है। {अम्बेडकर जी का ही उदाहरण लीजिए।} उनका त्याग कर, अलग होकर धनिकों के साथ रहने नहीं चला जाता। यह सभी को ऊपर उठाना, संस्कारित करना, यही है, ॥कृण्वन्तु विश्वं आर्यं॥ इसी लिए विवेकानंद जी कहते हैं, हमारा साधन है, वर्ण व्यवस्था। हमने अपनी स्वतंत्रता के लिए संहार नहीं किया। यह “कृण्वन्तु विश्वम आर्यम” की प्रक्रिया (जो शतकों तक चलती है) की सफलता का परिचायक है। {यह सब कुछ आप पृष्ठ १४० के आस पास “कास्ट्स ऑफ माइंड” में देख पाएंगे।} जिसका अर्थ, सारे विश्व को “आर्य” अर्थात सुसंस्कृत बनानेसे है, न कि किसी भेद-भाव की दूषित मनो वृत्ति से।
(दस) समन्वयकारी विचारधारा। ऋण्वन्तु भारतं आर्यं।
भारत (हिंदुत्व) की विचार-धारा समन्वय कारी है। हमारे बीच असंख्य देवी देवता, कुछ तो वनवासी, आदिवासी समाज की प्रथाएं, पहाड पत्थर की पूजा, नाग-पूजा, वृक्ष-पूजा, हमारे देवी देवताओं के वाहन रूपी चूहा, हंस, बाघ, सिंह, हाथी के मुख वाले देव, वानर-मुख वाले देव, इत्यादि इत्यादि इसी समन्वयकारी “कृण्वन्तु विश्वम्‌ आर्यम्‌” की अभिव्यक्ति है। जब हमारे पूरखें किसी वनवासी क्षेत्र में गए और वहां के लोगों को वन्य वस्तुओं के प्रति आदर भाव से प्रेरित पाया, तो उन्होंने उनका , गोरे लोगों की भांति संहार नहीं किया, पर उनके भी देवी देवताओं को सम्मानपूर्वक अपने असंख्य देवों के गणों में सम्मिलित कर लिया।
हमारा “एकं सत विप्राः बहुधा वदन्ति” भी हमें काम आता है। यह है समन्वयकारी परम्परा।
हमारी इसी सहिष्णुता के आयाम का अतिरेक कभी कभी हमारे दुर्गुण में परिवर्तित हुआ है। इसे ही “सदगुण-विकृति” कहा जाता है।
हजार वर्ष के परदेशी थपेड़ों से शिथिलता अवश्य आयी है। उसी के परिणामस्वरूप समाज में विकृतियाँ भी घुस चुकी है। इन विकृतियों को दूर करना हर जगे हुए भारतीय का काम है।
घोष है, ।ऋण्वन्तु विश्वं आर्यं। साथ साथ-ऋण्वन्तु भारतं आर्यं।

‘ईश्वरोपासना एवं अनिष्ट-चिन्तन-व्यभिचार’

‘ईश्वरोपासना एवं अनिष्ट-चिन्तन-व्यभिचार’



ईश्वरोपासना या ईश्वर भक्ति अपने आप में लोकप्रिय शब्द हैं। संसार की जनसख्या का बड़ा भाग किसी न किसी प्रकार से ईश्वरोपासना करता है। ईश्वरोपासना का अर्थ ईश्वर को जानना व उसके समीपस्थ होकर उसके गुण, कर्म व स्वभाव से परिचित होकर अपने आचरणों को सुधारना होता है। आजकल जितने लोग ईश्वर को मानते हैं और उसकी उपासना करते हैं, उनके बारे में यह नही कह सकते कि वह सब सम्यक् रूप से ईश्वर को जानते हैं व उन्हें ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान है। दूसरी बात यह है कि सब अपनी-अपनी परम्पराओं के अनुसार ईश्वरोपासना करते हैं। वह यह ध्यान ही नहीं देते कि उनकी मान्यता व विधि सत्य है अथवा नहीं। बच्चा स्कूल में पढ़ता है तो उसे माता-पिता व घर के सदस्य एक-एक बात समझाते हैं और गुरूकुल या विद्यालय में भी उसे हर बात समझाई जाती है और शका करने पर इसके कारण को बताया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि लगभग सभी मत-सम्प्रदायों में यह स्वीकार कर लिया गया है कि धर्म में अकल का दखल नहीं है। व्यवहार से तो ऐसा ही लगता है। इससे तो यह भी अनुान होता है कि वह जानते हैं कि उनके मत के सिद्धान्त ऐसे हैंं जिनसे जिज्ञासुओं की शकाओं व प्र’नों का समाधानपरक उत्तर नहीं दिया जा सकता। अब यदि यह सिलसिला चलेगा तो पता कैसे चलेगा कि हम जो ईश्वरोपासना कर रहे हैं वह सत्य व उसके उद्देश्य व लक्ष्य प्राप्ति में समर्थ है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ईश्वर के यथार्थ ज्ञान, मृत्यु से बचने के उपाय, सत्य व मनुष्य धर्म की खोज के लिए अपने माता-पिता-घर-परिवार-देश का त्याग किया था। वह ईश्वरोपासना के क्षेत्र में अपनी खोज, अध्ययन व अनुभव से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि ईश्वर को प्राप्त करना है तो सभी को अपनी बुद्धि के दरवाजे खुले रखने होंगे, उन पर स्वयं विचार करना होगा, ऋषियों व आप्त पुरूषों के ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होगा और फिर भी जो शकायें बचती हैं, उनके लिए योग्य विद्वानों की शरण में जाकर समाधान करना होगा। हम समझते हैं कि मस्तिष्क को खुला रखते हुए यदि एक मत का भक्त, उपासक या अनुयायी किसी अन्य मत के विद्वान के पास जाकर शका समाधान करता है तो इसमें कुछ हानि नहीं है परन्तु यहां मुख्य बात यह है कि पूछने वाले और बताने वाले किसी मत व साम्प्रदायिक आस्थाओं-वि’वासों के आग्रही न हों। उनका आग्रह सत्य के प्रति होना चाहिये। यदि वह मत-सम्प्रदाय के आग्रही होगें तो यह फिर मछली पकड़ने के लिए जाल फेंकने की भांति होगा। आजकल ऐसा ही प्राय: होता है। यद्यपि ऐसा करने से प्र’नकर्ता व समाधानकर्ता दोनों को लाभ होता है। दोनों को ही विचार व चिन्तन का अवसर मिलता है और उससे उन दोनों को कुछ-कुछ लाभ होता है। हम समझते हैं कि यदि व्यक्ति सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका, आर्याभिविनय, संस्कार विधि, पंचमहायज्ञ विधि, योगदर्शन भाष्य, आर्याभिविनय, वेद व अन्य वैदिक साहित्य को पढ़ कर उपासना आरम्भ करें तो फिर अध्येता व उपासक को ईश्वर की उपासना के सभी पक्षों का सत्य व यथार्थ ज्ञान हो जायेगा और वह भटकेगा नहीं और मृत्यु के आने पर वह अपने जीवन लक्ष्य के निकट पहुंच सकेगा या प्राप्त भी कर सकता है। ऐसा न करने पर उसका जीवन अनुपयोगी बनता है व समाज के लिए भी हानिकारक होता है। धनोपार्जन कर सुख-सुविधा की वस्तुयें एकत्रित करना मात्र ही जीवन का उद्देश्य नहीं है।
ईश्वर उपासना का उद्देश्य क्या है यह भी जान लेना आव’यक है। ईश्वर की उपासना अपने जीवन व गुण, कर्म व स्वभाव को सुधारने के लिए व परम-उपकारी ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए की जाती है। यह ऐसा ही है जैसे किसी की कोई वस्तु लेने व उससे उपकृत होने पर हम उसे धन्यवाद करते हैं। इसके साथ ही ईश्वर उपासना व वेदविहित सद्कर्मो को करने से दुखों की सर्वथा निवृति होकर ज्ञान व बल में वृद्धि होकर मुक्ति, मोक्ष व जन्म-मरण से छुट्टी मिलती है। यहां यह जान लेना आव’यक है कि ईश्वर क्या पदार्थ है। ईश्वर क्या है, का उत्तर है कि जिससे यह संसार बना है, जो इसे चला रहा है या धारण व पोषण कर रहा है तथा जो इस ब्रह्माण्ड की प्रलय या संहार करता है उसे ईश्वर कहते हैं। इन बातों को जानने व समझने के लिए हम पाठकों को स्वामी दयानन्द रचित सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़ने का परामर्श देगेंं। सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थों में जो ज्ञान है, वह संसार के अन्य किसी मत, सम्प्रदाय, धार्मिक, सामाजिक या राजनैतिक ग्रन्थ में नही है। इससे अध्येता व उपासक की सभी भ्रान्तियां दूर हो जायेगीं। अब संक्षेप में ईश्वर के स्वरूप को भी जान लेते हैं। ईश्वर, अपने समान केवल एकमात्र सत्ता है जिसने इस संसार को बनाया है। वह सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनादि, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वे’वर, सर्वान्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। इन गुणों व विशेषणों से युक्त ईश्वर ही सारी मनुष्य जाती के लिए उपासनीय व भक्ति करने योग्य है। ईश्वर में असंख्य गुण, कर्म व स्वभाव हैं, अत: उसके नाम भी एक नहीं अपितु उसके गुणों की संख्या के बराबर सहस्रों हैं। अजन्मा होने के कारण ईश्वर का कभी जन्म नही होता और न कभी हुआ है। जिनका जन्म हुआ है वह ईश्वर नहीं थे। भगवान राम व भगवान कृष्ण महान आत्मायें, महापुरूष व युगपुरूष थे। इसी प्रकार अन्य अनेक और भी थे। उनके जीवन में अनेक दैवीय गुण थे जिन्हें हमें अपने जीवन में धारण करना है। दिव्यगुणों को धारण करने वाले हमारे महापुरूष व प्रेरणापुरूष तो हो सकते हैं, परन्तु ईश्वर इनमें से कोई नहीं हुआ और न होगा। कई बार कुछ असाधारण कार्य करने के लिए इन्हें ईश्वर माना जाता है। इन्होंने जो कार्यं किए, वह तो ईश्वर बिना अवतार लिए ही आसानी से कर सकता है। जब वह “ईश्वर” बिना अवतार लिये प्रकृति के परमाणुओं को इकट्ठा कर उनसे आव’यकता के अनुरूप नये परमाणु बनाकर सृष्टि अर्थात् सूर्य, पृथिवी, चन्द्र एवं अन्य गृह व उपग्रह, जिनकी संख्या अनन्त व असंख्य है तथा परस्पर की दूरी भी इतनी है कि उसे नापा नहीं जा सकता, न ही वह बुद्धि में ही आती है, बना सकता है तो वह अवतारों द्वारा कहे जाने वाले सभी कार्यो को भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त इन सूर्य, पृथिवी आदि पिण्डों का परिमाण इतना है कि जिसका अनुमान लगाना भी कठिन वा असम्भव है। फिर सभी प्राणियों को जन्म देना, समय आने पर उनकी मृत्यु का होना, उन्हें कर्म-फल के अनुसार सुख-दुख देना आदि कार्य ईश्वर कर सकता है तो फिर वह ईश्वर रावण, कंस व हिरण्यक’यप आदि को बिना अवतार लिए, यदि मारना आव’यक है, तो मार भी सकता है।
मनुष्य में सुखों की प्राप्ति की स्वाभाविक इच्छा होती है। यह बात इस लिए सत्य है कि कोई भी मनुष्य या प्राणी दु:खों की कामना नहीं करता। सुखों की प्राप्ति के लिए पहले तो स्वस्थ शरीर होना आव’यक है। इसके लिए आहार-विहार व निद्रा का महत्व सुनि’िचत व सर्वज्ञात है। शुद्ध व केवल शाकाहारी आहार जिसमें मांस, अण्डा, मुर्गा, मछली आदि कुछ न हो, धूम्रपान न किया जाये, भोजन सात्विक होने के साथ उचित रीति से बना व पका हो अर्थात् वह तला हुआ व बासी न हो। समय पर कम मात्रा मे भोजन करने पर शरीर स्वस्थ रहता है। इस सम्बन्ध में हम पशुओं से भी शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। भोजन में गाय व बकरी के दूध, सभी प्रकार के ऋतु के अनुसार फल, साग-सब्जियां, चपाती, दालें, यव-जौ-गेहूं आदि की रोटी हो, इस प्रकार संतुलित भोजन ही करना चाहिये। आजकल विवाहों मे, घरों में भी, जिस प्रकार का भोजन बनता है, वह हमारी दृष्टि में स्वादिष्ट तो होता है परन्तु स्वास्थ्यप्रद नहीं होता। अच्छे स्वास्थ्य से सुख मिलता है। स्वास्थ्य के लिए निद्रा को भी उचित मात्रा में लेना चाहिये। निद्रा के लिए आव’यक है कि गहरी निद्रा की आदत डाली जायें जिसके लिए शारीरिक परिश्रम करना आव’यक है। थकान होने पर अच्छी नींद आती है यह हम सबका अनुभव है। इसके साथ विचारों में शुद्धता, पवित्रता व संयमपूर्ण वा जितेन्द्रिय ब्रह्मचर्ययुक्त जीवन होना भी आव’यक है। इसके साथ ही जीवन सुखमय हो, इसमें ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र यज्ञ का बहुत महत्व है। ऐसा इस कारण से कि ईश्वर आनन्द व सुख का भण्डार है एवं चेतन तत्व है। समर्थ होने के कारण उससे प्रार्थना करने पर वह उसे अव’य पूरा करता है बशर्ते की उपासक उसका पात्र हो। जड़ पदार्थो यथा मूर्ति व अवैदिक रीति से उपासना, यज्ञ, संस्कार, पूजा व कर्मकाण्ड करने से कोई लाभ नहीं होता। इसका एक कारण यह है कि वह जड़ पदार्थ अपने लिए न कुछ सोच सकते हैं न कर सकते हैं तो अपने भक्त या उपासक के लिए भी कुछ नही कर सकेगें। यदि विचार व चिन्तन कर तथा जानकर पंच-महायज्ञों को करते हैं तो कर्तव्य की पूर्ति से जीवन सुखमय होता है। ईश्वर की उपासना से आनन्द, ज्ञान, शक्ति व सफलता भी मिलती है। ईश्वर ही केवल आनन्दस्वरूप है अत: आनन्द भी वही दे सकता है। ईश्वर सर्वज्ञ है, उसका ज्ञान नित्य व पूर्ण है तथा वह सर्वशक्तिमान ह,ै अत: ज्ञान व शक्ति या बल भी उसी से प्राप्त होता है। भौतिक व सांसारिक धन-दौलत सच्चे दैवीय ऐ’वर्य की तुलना में इतर सर तुच्छ है। यथार्थ धन तो ईश्वर की उपासना से समृद्धि, सम्पन्नता, स्वास्थ्य, ईश्वर व प्रकृति का ज्ञान, सदाचार व पुरूषार्थ से अर्जित भौतिक धन-सम्पदा जिसमें कदाचार नाममात्र भी न हो, वही सच्चा धन या ऐ’वर्य है। इससे सम्पन्न व्यक्ति को जो प्रसन्नता व सुख प्राप्त होता है वह पुरूषार्थहीन, आलसी, कदाचार से प्राप्त धन वालों को मिलना असम्भव है। ऐसा इसलिए नहीं हो सकता कि ईश्वर सत्य, चित्त, आनन्दस्वरूप व पक्षपातरहित न्याय को धारण करने वाला है। यदि उसकी सत्ता के होते हुए दुराचारी व कदाचारी स्थाई सुख प्राप्त करेंगे तो ईश्वर की व्यवस्था समाप्त होने से स्वाभाविक रूप से प्रलय हो जायेगी, यद्यपि प्रलय की यह कल्पना निराधार है।
ईश्वर की उपासना सुख व आनन्द के लिए की जाती है। उपासना में ईश्वर को जानकर सुख व स्थिर आसन में बैठकर उसके गुणों, कर्मों व स्वभाव पर विचार, चिन्तन व ध्यान करना है। यह एक प्रकार से ऐसा ही है जैसे कोई विद्यार्थी या अनुसंधित्सु किसी विषय को जानने व उसमें निभ्र्रान्त होने के लिए घण्टों पुस्तकों के अध्ययन व विचार-चिन्तन-ध्यान में तल्लीन रहता है। वह नाना प्रकार के उदाहरण घड़कर उनसे इच्छित विषय की पुष्टि करता है या फिर प्रयोगशाला में प्रयोग से उसे साक्षात सिद्ध करता हे। ईश्वर से अर्थात् उपासना के विषय से एकाकार हो जाने पर उद्देश्य पूरा हो जाता है व लक्ष्य की प्राप्ति होती है। यह अवस्था जीवन-मुक्त के रूप में होती है और मृत्यु के बाद जन्म व मरण से छुट्टी मिल जाती है। महर्षि दयानन्द ने मुक्ति के विषय में सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थों में सविस्तार इसका उल्लेख किया है जो सबके लिए माननीय है। यहां हम उपासना या भक्ति के विषय को समाप्त करते हैं। यहां हम यह अव’य कहेगें कि उपासना व भक्ति प्राय: समान ही हैं। उपासक के लिए ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव विषयक सत्य-शास्त्रों का अध्ययन आव’यक है जिसमें मुख्य महर्षि दयानन्द लिखित ग्रन्थ हैं। भक्ति के लिए ईश्वर को सत्य मानकर उसके विचार-ध्यान व चिन्तन में लगातार समय व्यतीत किया जाता है। यहां अनेक कल्पनाओं का सहारा भी लिया जाता है और ज्ञान-अज्ञान, उचित-अनुचित व सही-गलत संबंधी तर्क-वितकों से बचा जाता है। हम अनुभव करते हैं कि भक्त हृदय वाले कुछ सन्तों की ईश्वर से निकटता, वेद, वैदिक ज्ञान, सदाचारी, स्वाध्यायशील व विवेकशील उपासकों की स्थिति से कुछ कम होती है।
अपने लेख के शीर्षक में हमने अनिष्ट-चिन्तन या व्यभिचार को भी सम्मिलित किया है। व्यभिचार एक प्रकार से अनिष्ट चिन्तन का ही परिणाम है। व्यभिचारी वेद एवं वैदिक साहित्य के अध्ययन व स्वाध्याय से प्राय: दूर होते हैं। वह अश्लील साहित्य पढ़ते हैं या फिर चलचित्र व दूरभाष पर दिखाये जाने वाले अच्छे-बुरे कार्यक्रमों का अवलोकन करते हैं। उनका आहार शुद्ध, पवित्र एवं शाकाहारी न होकर सामिष होता है। वह मांसाहार, अण्डों का सेवन, मदिरा पान व धूम्रपान आदि अभक्ष्य पदार्थो का सेवन व अनैतिक कार्य भी करते हैं। मांसाहार से हिंसा की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है जो बलात्कार जैसी घटनायें कराती है। बलात्कार का कारण अच्छे संस्कारों, सदाचार व ज्ञान का अभाव व बुरे संस्कारों का प्राबल्य का होना है। ऐसे लोगों के पास प्राय: धन प्रचुर होता है जिससे उनमें पाशविक प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं। धन खर्च कर वह व्यभिचार आदि अनेक अनुचित कार्य करते हैं। धर्माधर्म सम्बन्धी यथार्थ ज्ञान न होने के कारण वह अपने राजसिक व तामसिक व्यवहार को ठीक से समझ भी नहीं पाते। वह अनिष्ट-चिन्तन व कार्यों के आदि हो जाते हैं। इन सबका उद्देश्य सुखों की प्राप्ति ही होता है। व्यभिचार एक प्रकार से इन्द्रियों के सुखों को प्राप्त करने की प्रवृत्ति है। इसका सम्बन्ध आंख व त्वचा व श्रोत्र इन्द्रियों से अधिक होता है। इन इन्द्रियों का अतिचार कर वह एक ओर तो समाज में अपमानित होते हैं और दूसरी ओर अपने मन व शरीर को रोगी भी बनाते हैं। व्यभिचारी पुरूष कामी कहलाता है और ऐसे व्यक्तियों में सद्ज्ञान स्थिर नहीं हो पाता। हमने ऐसे स्वाध्यायशील व धर्मचर्चा करने वाले पुरूषों को भी देखा है जो अधिक धन अर्जित कर लेने पर मांसाहार व मदिरापान के आदि बन गये। इसके अतिरिक्त अन्य क्या-क्या अनुचित व्यवहार वह करते होगें, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। हमें लगता है कि अनुचित तरीकों से आव’यकता से अधिक कमाया गया धन मन में विकार लाकर मनुष्य को व्यभिचारी, अपराधी व पापी बनाता है। जिस सुख के लिए व्यभिचार किया जाता है उससे कहीं अधिक सुख व आनन्द जिसमें मनुष्य सम्मान, यश व कीर्ति प्राप्त करता है, वह अध्यात्मिक व कदाचार-मुक्त जीवन व्यतीत करने से प्राप्त होता है और जो कोई कठिन व असम्भव कार्य नहीं है। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में अनेक कमियां व दोष हैं, जिससे भी व्यभिचार व कदाचार का जन्म होता है। यदि मन में यह बात बैठा दी जाये कि ईश्वर सर्वव्यापक, कर्मफल दाता व न्यायकारी है तो शायद पाप समाप्त हो जायें, कम तो होंगे ही। अब ईश्वर को सर्वव्यापक सिद्ध करना होगा जो कि किया जा सकता है। बचपन से ही गुरूकुल या स्कूलों में इस विषय की सरल शब्दों में शिक्षा दी जानी चाहिये। अध्यात्म का विषय अनिवार्य होना चाहिये। एक छोटे से उदाहरण से यह विषय बच्चों को समझाया जा सकता है। ईश्वर ने इस संसार को बनाया है। हमारा सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र, सौर मण्डल के अन्य सभी ग्रह, रात्रि में आकाश में दिखने वाले तारे, जो नक्षत्र या हमारे सूर्य की भांति है, इससे कुछ छोटे व बड़े भी हो सकते हैं, यह सब ईश्वर के रचे हुए हैं। अनन्त व असंख्य लोक-लोकान्तर तथा पिण्ड आदि हैं, वह भी ईश्वर के बनाये हुए सिद्ध होते हैं। कोई एक या सब मनुष्य भी मिलकर इनका निर्माण नहीं कर सकते, अत: यह संसार अपौरूषेय रचना, ईश्वर से रचित, है। इस विषय में इस लेख में पूर्व में प्रकाश डाला गया है। यह सिद्ध हो जाने व मान लेने पर कि यह संसार ईश्वर ने बनाया है, यह तथ्य सामने आता है कि इनकों बनाने व धारण करने के लिए ईश्वर को उनमें विद्यमान होना आव’यक है। और जब वह इन सभी ग्रहों, उपग्रहों व समस्त लोक-लोकान्तरों में विद्यमान है तो सर्वव्यापक सिद्ध हो जाता है। ऐसे अनेक उदाहरणों से ईश्वर को सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमान सिद्ध किया जा सकता है। हमें अपना स्वरूप भी जानना है कि हम क्या हैं? हम जीवात्मा हैं जो कि एकदेशी, चेतन तत्व, आनन्द से रहित व ईश्वर से आनन्द की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील, ऐसा इसका स्वरूप् है व जन्म-मरण धर्मा है। यह हम सबका जीवात्मा अनादि व नित्य है। यह मनुष्य योनि में जो भी कर्म करता है, उसका फल इसको जन्म जन्मान्तरों व पशु-पक्षी-कीट-पतंग आदि नाना जीव-योनियों में जन्म देकर ईश्वर भोग कराता है। बिना कर्म का फल भोगे कर्म क्षय को प्राप्त नहीं होते। कर्मों के फल अव’य ही भोगने होेते हैं। गीता में श्रीकृष्ण जी ने क्या ही सुन्दर व सरल शब्दों में इस गूढ़ कर्म-फल सिद्धान्त को बताते हुए कहा है कि ‘अव’यमेव हि भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुमं।’ अर्थात् कर्मो का फल अव’य ही भोगना पड़ता है। यदि देश के सभी लोगों को वेदों, वैदिक साहित्य, कर्मफल सिद्धान्त आदि का ज्ञान कराया जायेगा तो निश्चित रूप से समाज में व्यभिचार आदि सभी अपराध कम होगें और सुख शान्ति अधिक होगी। इस प्रकार से हमने व्यभिचार आदि कदाचार का उललेख कर उसके समाधान व निराकार पर भी कुछ प्रकाश डालने का प्रयास किया है।

शिवरात्रि को हुई दैवीय प्रेरणा से मूलशंकर महर्षि दयानन्द बने


शिवरात्रि को हुई दैवीय प्रेरणा से मूलशंकर महर्षि दयानन्द बने


महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती  का जन्म-काल का नाम मूलशंकर था। उनके पिता श्री करषनजी तिवारी पौराणिक ईश्वर शिव के कट्टर भक्त थे। सन् १८३८ की शिवरात्रि के दिन उन्होंने गुजरात प्रान्त में राजकोट के निकट टंकारा स्थान के अपने पैतृक जन्म गृह में पिता की प्रेरणा व आदेशं पर शिवरात्रि का व्रतोपवास किया था। पिता ने उन्हें व्रत के बारे में जो-जो कहा था, उसका उन्होंने पूरी सत्यनिष्टा से पालन किया। उन दिनों वहां की परम्परा के अनुसार लोग शिवालय में जाकर रात्रि जागरण करते थे। बालक मूलशंकर अपने पिता के साथ मन्दिर गये और वहां जागरण, भजन, कीर्तन व पूजा-पाठ में सम्मिलित हुए। देर रात्रि में सभी भक्त निन्द्रा के आगोशं में आकर सो गये। स्वाभाविक रूप से निद्रा तो मूलशंकर को भी आई ही होगी और हमें लगता है कि बालक होने के कारण औरों से अधिक आई होगी। रात्रि जागरण का पूर्व का अभ्यास भी उन्हें नहीं था। बौद्धिक दृष्टि से भी वह एक तकशील बालक तो थे परन्तु अधिक आयु में जो प्रौढ़ता, समझदारी, अनुभवीय ज्ञान होता है, वह कम आयु होने से उनमें नहीं था। कथा का जो महात्म्य पिता ने सुनाया था, उस पर पूरा-पूरा विश्वास रखते हुए उन्होंने निद्रा पर विजय प्राप्त की थी। आलस्य आने पर आंखों पर जल के छींटें मारकर व पुराणों की कथा के शिव को अपने मानस में उपस्थित कर वह जागृत अवस्था में पूरी तरह से सावधान बैठे शिव की पिण्डी पर अपने नेत्र जमाये हुए थे। देर रात्रि जब अन्य सभी लोग प्राय: निद्राधीन व निद्राग्रस्त हो चुके थे, तब मन्दिर में एक सामान्य घटना घटी परन्तु उस छोटी सी घटना का परिणाम बहुत बड़ा था। वह क्या देखते हैं कि मन्दिर के बिलों में से कुछ चूहे निकले और शिव की पिण्डी पर चढ़ कर उछल-कूद करने लगे। वहां जो अन्न आदि पदार्थ भक्तों की ओर चढ़ाये गये थे, उसे खाने लगे। सम्भव है वहां उन्होंने मल-विसर्जन भी किया हो। महर्षि दयानन्द ने जब यह दृश्य देखा तो उनके विश्वास को गहरी ठेस लगी। उन्हें बताया गया था कि शिव बलवान व सर्वशक्तिमान देवता वा ईश्वर हैं। वह साधुओं की रक्षा व दुष्टों का संहार करते हैं। वह भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं व उनके भक्तों व उपासकों को सुख व शान्ति प्राप्त होती है। शिव से बड़े-बड़े बलवान राक्षस व शत्रु भी डरते व कम्पायमान होते हैं। ऐसे स्वरूपवाला शिव उन क्षुद्र चूहों को अपने मस्तक पर क्यों उछल-कूद करने दे रहा है? क्या वह वास्तव में उन्हें भगाने में सक्षम है भी या नहीं। यदि है तो भगा क्यों नहीं रहा है? क्या वह शिव-लिंग सच्चा शिव है या नहीं? यदि वह चूहों को भगा ही नहीं सकता तो फिर कथा के अनुसार जो लाभ भक्तों को प्राप्त होने की बात कही जाती है वह भी क्योंकर पूरी हो सकती है? इस प्रकार के ऊहापोह से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह वह शिव नहीं है जिसका वर्णन पिता ने शिव पुराण की कथा सुनाते हुए किया था। यह निश्चय हो जाने पर उन्होंने सो रहे अपने पिता को जगाया और उन्हें चूहों का वह दृश्य दिखाकर कई प्रश्न किये? पिता इस बात से मूलशंकर को सन्तुष्ट नहीं कर सके कि वह शिव अपने ऊपर से उन क्षुद्र चूहों को भगा क्यों नहीं रहे हैं? इस घटना से मूलशंकर का शिव-पूजा से विश्वास समाप्त हो गया। अपनी आशा व अपेक्षाओं के खण्डित होने से निराशं मूलशंकर पिता की आज्ञा लेकर देर रात्रि को शिवालय से घर पहुंचें और पिता की आज्ञा कि व्रत न तोड़ना, को विस्मृत कर माता से भोजन लेकर अपनी क्षुधा शान्त की और सो गये। इस दिन की घटना से सच्चे शिव को जानने व उसकी प्राप्ति के लिए उनके मन में जिज्ञासा व संकल्प ने जन्म लिया। इसके कुछ काल बाद उनकी एक बहिन व चाचा की मृत्यु हुई जिससे उन्हें संसार दु:खमय व निस्सार लगने लगा। शिवरात्रि की घटना का ही प्रभाव था कि वह लगभग चार वर्षों बाद कि जब कुछ ही दिन में उनका विवाह होना था, वह अपने माता-पिता, भाई-बन्धु, परिवारजन, सखा-मित्र, घर व स्थान को छोड़कर सच्चे शिव को जानने व प्राप्त करने के लिए गृह-त्याग कर निकल पड़ें।
ईश्वर को जानने के संकल्प की पूर्ति के लिए किये गये केे कार्य
स्वामी दयानन्द जब घर से निकले तो रास्ते में उन्हें एक ग्रामवासी के मिलने और उसे अपने भावी कार्यक्रम के बारे में बता देने से उनके पिता को उस स्थान का ज्ञान हो गया जहां वह उस समय पहुंचे थे। पिता ने वहां जाकर उनको पकड़ लिया और वापस ले आये। अभी कुछ ही समय हुआ था कि रात्रि में पहरेदारों को चकमा देकर वह दूसरी बार फिर परिवार से सदा-सदा के लिए दूर पहुंच गये। इस बार वह अपने परिवार व जानकार किसी व्यक्ति की दृष्टि में नहीं आये। उन्होंने अपना नाम व परिधान बदल लिया। पहले वह शुद्ध चैतन्य नाम के ब्रह्मचारी बने और कुछ समयान्तर पर संन्यास लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती कहलाये। यहां से उन्होंने ईश्वर की खोज आरम्भ की। वह विद्वानों, ज्ञानियों, संन्यासियों, धर्म-प्रेमियों, महन्तों, योगियों आदि के सम्पर्क में आये। इसके लिए उन्होंने देशं के बहुत बड़े भाग का पैदल ही भ्रमण किया। मन्दिरों व मठों में जो भी कोई विद्वान, संन्यासी, योगी या महन्त मिलता था उसकी संगति व सत्संग प्राप्त कर वह उनसे वार्तालाप, उपदेश श्रवण व शंका-समाधान करते थे और योग सीखते थे। उनसे अन्य ज्ञानियों, विद्वानों, संन्यासियों व योगियों का पता पूछते थे जो उनकी बची हुई जिज्ञासों का समाधान कर सके। इस कार्य को करते हुए उनका अध्ययन भी जारी रहता था। कहीं कोई ग्रन्थ मिलता तो वह उसे प्राप्त कर उसका अध्ययन करते थे। इस प्रकार से वह सभी तीर्थो व मठों आदि में जा-जाकर वहां से जो भी ज्ञान प्राप्त हो सकता था, प्राप्त करते थे। उन दिनों में यह आम धारणा थी कि हिमालय व उत्तराखण्ड के पर्वतों में जो मठ-मन्दिर आदि स्थापित हैं, इनमें व गुफाओं आदि में अनेक तपस्वी व योगी निवास करते हैं जिन्होंने अनेक सिद्धियां व ईश्वर साक्षात्कार का लाभ प्राप्त कर रखा है। उन सबकी गहन खोज भी स्वामी दयानन्द ने प्रत्येक मठ-मन्दिर-गुफा में जाकर की। उन्होंने प्राप्त हुए अनेक ग्रन्थों का अध्ययन व मनन किया, परन्तु उनकी तृप्ति न होने से वह सन्तोष प्राप्त न कर सके। पहाड़ों में नदियों के उद्गम तक वह जा पहुंचें और उसमें बहने वाले हिम के नोकिले टुकड़ों व हिम-सम शीतल जल में प्रविष्ट होकर उन नदियों को पार कर आगे योगियों व तपस्वियों की खोज की। यहां तक कि उनके पैर बर्फ के टुकड़ों से घायल हो गए और उनमें रक्तस्राव तक होने लगा। बर्फीले जल से उनके पैर व शंरीर सुन्न हो गये। उनके शंरीर पर कोई वस्त्र तो था ही नहीं। प्राणों के शंरीर के निकलने तक की स्थिति बन गई। परन्तु इस घोर विषम स्थिति मे भी उन्होंने अपनी खोज जारी रखी। सन् १८५७ की क्रान्ति से कुछ समय पूर्व उन्हें मथुरा में प्रज्ञाचक्षु गुरू विरजानन्द जी का पता मिला जो संस्कृत भाषा के विद्वान होने के साथ वैदिक साहित्य के अपूर्व विद्वान थे। प्रथम स्वातन्य समर की समाप्ति के पर्याप्त काल बाद सन् १८६० मे वह मथुरा पहुंचे। निवेदन करने पर गुरूजी ने उनके शिष्यत्व को स्वीकार किया। गुरू विरजानन्द की पाठशाला में उन्होंने लगभग ३ वर्ष तक अध्ययन किया। यहां प्राप्त हुई शिक्षा से ईश्वर की खोज करने का उनके जीवन का वास्तविक उद्देश्य व लक्ष्य पूरा हुआ। ईश्वर का यह यथार्थ स्वरूप वेद व आर्ष ग्रन्थों में उल्लिखित स्वरूप के समान था। अनार्ष ग्रन्थों व मूर्ति पूजा, मृतक श्राद्ध, जन्म जाति व्यवस्था, सती प्रथा आदि अवैदिक कृत्यों का भी ज्ञान हुआ। यहां अध्ययन व योगाभ्यास से प्राप्त यथार्थ ज्ञान को प्राप्त होकर वह गुरू दक्षिणा के लिए गुरू के पास आये। गुरू ने दक्षिणा में वह चीज मांगी जो पहले कभी किसी गुरू ने अपने शिष्य से नहीं मांगी थी। देश परतन्त्र होकर विदेशियों के पदाक्रान्त था। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से प्राप्त वेदों के ज्ञान का सूर्य लुप्त प्राय: हो चुका था। वेदों के मिथ्या भाष्य धार्मिक जगत में प्रतिष्ठित थे। सामाजिक व्यवस्था विकृत व विषम थी। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित किया हुआ था। समाज में बेमेल विवाह होते थे। विधवाओं को न तो पुनर्विवाह का अधिकार था और न सामान्य मानवीय जीवन व्यतीत करने का अधिकार था। उन पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबन्ध थे। वह किसी आनन्दोत्सव में भाग नहीं ले सकतीं थीं। उनका हर प्रकार का शोषण होता था। समाज व धर्मगुरू यह सब अनर्थ व पाप देख कर मौन थे। उनकी आत्मा में दया व करूणा जैसे भाव ऐसा लगता है कि समाप्त हो गये थे। अत: गुरू विरजानन्द ने स्वामी दयानन्द से दक्षिणा के अवसर पर कहा कि उन्हें किसी भौतिक पदार्थ व धन की आवश्यकता नहीं है। यदि वह गुरू को दक्षिणा से सन्तुष्ट करना ही चाहते हैं तो फिर वह आज्ञा देते हैं कि संसार से अनार्ष, अवैदिक, मिथ्या, अन्धविश्वास, कुरीतियां व अज्ञान को हटाने का काम कर वेदाध्ययन की प्रवृत्ति, आर्ष ज्ञान के अनुरूप देशं, समाज व विश्व का निर्माण, उसका प्रचार-प्रसार व स्थापना, सभी प्रकार के पक्षपातों को हटाकर न्याय को प्रतिष्ठित करना, सच्ची ईश्वरोपासना का प्रचार व उसका सर्वत्र आचरण आदि कार्यों को करने की प्रतिज्ञा करें। स्वामी दयानन्द गुरू विरजानन्द के साथ विगत लगभग ३ वर्षों से अध्ययनरत थे, उनके अन्तेवासी शिष्य थे, वह गुरूजी की भावनाओं को भली प्रकार समझते थे व समझ गये। उन्होंने गुरू की इच्छा, भावना व आदेशं को स्वीकार कर शिरोधार्य किया और उसे पूरा करने की प्रतिज्ञा की। उन्होंने गुरूजी को कहा कि वह गुरूजी की आज्ञा के अनुरूप प्राणपण से कार्य करेगें और अपना वचन निभायेंगे। गुरूजी भी दयानन्द के मनोभावों व इरादों से भलीभांति परिचित व सन्तुष्ट थे। उन्होंने सच्चे हृदय से शिष्य दयानन्द को “सफल भव” का आशीर्वाद दिया। हमेंं लगता है कि स्वामी दयानन्द जी को गुरूजी ने जो कहा व उन्होंने उसके पालन में जो-जो कार्य किये, उनके लिए उससे बढ़कर व अच्छा कार्य कोई हो ही नहीं सकता था। हम गुरू विरजानन्द जैसा गुरू व स्वामी दयानन्द जैसा शिष्य संसार के इतिहास में दूसरा नहीं पाते हैं। यह दोनों गुरू व शिष्य आज भले ही भौतिक शंरीर से हमारे बीच में विद्यमान न हों, परन्तु अपने यशं:शंरीर से यह आज भी हमारे मध्य में हैं। इनके ग्रन्थों को पढ़कर हम आज भी इनकी आत्मा से अपनी आत्मा का सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं। हममें आज जो भी ज्ञान व अच्छा आचरण, यदि कुछ भी है, तो उसका सारा श्रेय स्वामी दयानन्द सरस्वती व उनके गुरू जी को है।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात स्वामीजी के कार्य
अब स्वामी दयानन्द सरस्वती को अपना वचन निभाना है। यह केवल गुरू को दिया हुआ वचन ही नहीं है अपितु उनकी अपनी आत्मा की भी यही आवाज है। गुरूजी ने तो केवल उन्हें उनके कर्तव्य का बोध कराया था। गुरू दक्षिणा के बाद स्वामी दयानन्द आगरा में लगभग डेढ़ वर्ष तक रहे। वहां रहते हुए वह प्रवचन आदि करते रहे। यहां उन्होंने ईश्वरोपासना पर सन्ध्या की एक पुस्तक लिख कर प्रकाशित कराई और उसका बहुत बड़ी संख्या में वितरण हुआ। इसके अतिरिक्त यहां रहकर उन्होंने प्रमुख कार्य यह किया कि अपने भावी जीवन की कार्य योजना तैयार की और उसे अन्तिम रूप दिया। उन्हें धार्मिक जगत में मिथ्या अज्ञान व अन्ध-विश्वास को हटा कर आर्ष ज्ञान को स्थापित करना था। इसके लिए उन्होंने मौखिक प्रचार, प्रवचन, उपदेश, व्याख्यान, वार्तालाप, शंका समाधान, शास्त्रार्थ, आर्य समाज की स्थापना, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-यजुर्वेद संस्कृत-हिन्दी भाष्य आदि ग्रन्थों का प्रणयन व लेखन, शुद्धि, संस्कृत पाठशालाओं की स्थापना, गोरक्षा के कार्य, हिन्दी को राजकीय भाषा बनाने के प्रयास, आर्यावर्तीय राजाओं व रिसायतों में वेद धर्म प्रचार, ब्रह्मचर्य व योग को प्रतिष्ठा किया, स्त्री व शूद्रों को शिक्षा, वेदाध्ययन में सबका समानाधिकार, गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार कुलीन परिवारों में विवाह, हिन्दी को धर्म प्रचार कार्य में अपनाने का अभूतपूर्व निर्णय, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, बाल विवाह, मृतक श्राद्ध, जन्मजति व्यवस्था का विरोध तथा वैदिक वर्ण व्यवस्था तथा विधवा विवाह का विधान जैसे अनेक कार्य किए। उन्होंने यह भी बताया कि सृष्टि के आरम्भ से महाभारत काल तक भारत के आर्यो का सारे संसार में एकमात्र चक्रवर्ती राज्य रहा है। हम समझते हैं कि चक्रवर्ती राज्य का उल्लेख वेद या संस्कृत के ग्रन्थों में ही हुआ है, अन्यत्र विश्व साहित्य में कहीं नहीं है। उन्होने अपने ग्रन्थों पर पराधीनता को अभि’ााप बताया व स्वदेशीय, स्वराज्य को सर्वोपरि राज्य को उत्तम बताया। उनके कार्यो का देशं पर गहरा प्रभाव पड़ा और आज का आधुनिक भारत उनके विचारों व कार्यो से नानाविध लाभान्वित है। महर्षि दयानन्द ने ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के सत्य स्वरूप का विश्व को परिचय कराया और सच्ची ईश्वर उपासना संसार को बताई। वेद को उन्होंने ईश्वर से उत्पन्न बताया और वेद को सर्व-ज्ञानमय ग्रन्थ सिद्ध किया। उनके अनुसार वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं जिसे पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सब आर्यों, यह शब्द मानवमात्र के लिए प्रयुक्त है, का परम धर्म बताया। वेद का पढ़ना-पढ़ाना व सुनना-सुनाना परमधर्म इस लिए है कि इसके अध्ययन से मनुष्य की पाशंविक, रज व तमों गुण प्रधान प्रवृत्तियों में कमी आती है और मनुष्य सत्य-धर्म से परिचित होकर उसमें प्रवृत्त होता है जिसका अन्तिम परिणाम अभ्युदय व नि:श्रेयस की सिद्धि होता है। संसार में जहां मनुष्य को शिक्षा प्राप्त कर अपनी आजीविका चलानी है वहीं उसे ईश्वर, जीव व प्रकृति का सत्य ज्ञान प्राप्त कर ईश्वरोपासना कर, परोपकार, धर्म, सेवा, अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ व बलिवैश्वदेव यज्ञ करके अपने जीवन को सफल करना है। गोरक्षा व गोपालन भी मनुष्य का कर्तव्य है। जो इसे करता है वह प्रशंनीय है। कोई भी ज्ञानी, विद्वान, आस्तिक व ईश्वर को जानने वाला व्यक्ति गाय वइ इतर पशुओं का मांसाहार नहीं कर सकता। जो करते हैं वह मानवीय गुणों से हीन है। महर्षि दयानन्द ने धर्म, जीवन के उद्देश्य व उनकी पूर्ति के जो उपाय बतायें हैं उससे सारा संसार प्रभावित हुआ। उनके कार्यो व प्रयासों से वैदिक-आर्य-धर्म के अनुयायियों का धर्मान्तरण रूका। दूसरे मत के व्यक्ति भी आर्य धर्म की श्रेष्ठता को जानकर अपने विवेक से आर्य धर्म में सम्मिलित हुए। बहुत से बिछड़े हुए बन्धुओं को आर्य धर्म में पुनर्दीक्षित कर उन्हें संसार के सर्वश्रेष्ठ व सत्य वैदिक मत का अनुयायी बनाया। ऐसे अनेकों कार्य महर्षि दयानन्द, उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज व उनके अनुयायियों ने किए हैं जिनका किया जाना सारी मानवता के लिए गौरव की बात है। आर्य समाज ने अपनी मान्यता और सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए छल, प्रलोभन, भय, राजकीय प्रभाव का सहारा नहीं लिया फिर भी जिसने इसे समझा वह इसका भक्त व दीवाना हो गया जिनमें से एक हम भी हैं। धन्य है ऋषि दयानन्द व उनका आर्य समाज। खेद है कि संसार के लोगों ने महर्षि दयानन्द व आर्य समाज के मूल स्वभाव, मानवता के उपकार व कल्याण की उसकी भावना, अन्याय, अत्याचार, पाप, पक्षपात के विरूद्ध उसके मिशंन को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा। इसका एक कारण ऐसा करने से कुछ लोगों के स्वार्थ को हानि का पहुंचना था। वह अपने स्वार्थों को छोड़ न सकने के कारण आर्य समाज का विरोध करते रहे व कर रहे हैं। हमें लगता है उनका ऐसा करना सत्य को अस्वीकार करना व असत्य को स्वीकार करना है। हमारा अनुरोध है कि सभी विरोधी सच्चे मन से आर्य समाज की मान्यताओं का गहराई से अध्ययन करें व सत्य को अपनायें। अपनी शंकाओं का समाधान भी उन्हें आर्य समाज के विद्वानों से करना चाहिये। महर्षि दयानन्द व आर्य समाज के कार्यो के कारण सारा विश्व इनका ऋणी है और रहेगा।
संसार को उनके कार्यों से लाभ व उनकी देन
संसार के लोगों को महर्षि दयानन्द व आर्य समाज के कार्यो से जो लाभ पहुंचा है उसका उल्लेख लेख में किया जा चुका है। पराधीन भारत महर्षि दयानन्द के विचारों से प्रेरणा ग्रहण कर, संघर्ष व आन्दोलन कर तथा सत्य ज्ञान के प्रचार व प्रकाशं से स्वतन्त्र हुआ। विश्व भर में वैज्ञानिक क्रान्ति के मूल में महर्षि दयानन्द व वेदों का यह सिद्धान्त कार्य कर रहा है कि अविद्या का नाशं व विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। सत्य को ग्रहण और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। विज्ञान आज जिस मुकान पर है उसमें वेद और महर्षि दयानन्द के विचारों का सर्वोपरि योगदान है। सच्चे योग की प्रतिष्ठता, स्त्री शिक्षा, जन्म-जाति उन्मूलन, गुण-कर्म-स्वभाव को मान्यता व सबको समान अधिकार, गायत्री मन्त्र को सबके द्वारा स्वीकार करना व सर्वोपरि मानना आदि लाभ संसार भर के लोगों को हुए हैं।
शिवरात्रि कैसे मनायें?
शिवरात्रि का पर्व पाराणिक आख्यानों के आधार पर मनाया जाता है। मूर्ति पूजा आज वेदों से असत्य सिद्ध हो चुकी है जिसका विधान वेदों में नहीं है। तर्क व युक्ति के प्रमाणों से भी यह सारहीन सिद्ध है। इसी प्रकार के फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, सती प्रथा, विधवा विवाह के विरोध से जुड़े हुए विचार व कार्य हैं। शिव ईश्वर का एक गुणवाचक नाम है। सबका कल्याण व मंगल करने के कारण सर्वव्यापक ईश्वर ही शिव कहलाता है। उसकी उपासना व पूजा उसे प्रसन्न करके ही हो सकती है। वह सन्ध्या, अग्निहोत्र, पितृ यज्ञ, अतिथि यज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ, परोपकार, देशभक्ति सेवा आदि कार्यों से प्रसन्न होते हैं। शिवरात्रि के दिन वेदों के आधार पर ईश्वर शिव स्वरूप पर सर्वत्र वृहत रूप में सामूहिक प्रवचन व व्याख्यान होने चाहिये। सामाजिक रूप से वृहत अग्निहोत्र यज्ञ किये जायें जिससे सारे देशं व समाज में आरोग्यता का विस्तार हो। निर्धनों व गरीबों के कष्ट दूर करने के उपाय सोचे जायें जो कि वस्तुत: शिव-कार्य है। निर्धनों व अभावग्रस्तों के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई न आ रही हो, इस पर ध्यान दिया जाये और अवरोधों को दूर किया जाये जिससे निर्धन व अभावग्रस्त बन्धु भावी श्रेष्ठ नागरिक बने। मांसाहार, मदिरापान, जुआ, शोषण, कदाचार, दुराचार आदि को समाज में न होने देने के लिए योजनायें बने। बुरे काम करने वालों का समाज व देशं के स्तर पर विरोध हो। शिवरात्रि के दिन बुरे विचारों व संकल्पों को दूर रखकर उपवास करें और ईश्वरोपासना व वृहत अग्निहोत्र के पश्चात खीर, फल, मिष्ठान्न व विशेष भोजन बनाकर समूह भोज कर-कराकर शिवरात्रि को मनाना चाहिये।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

वैलेंटाइन डे की कथा

वैलेंटाइन डे की कथा

मित्रो यूरोप (और अमेरिका) का समाज जो है वो रखैलों (Kept) में विश्वास करता है पत्नियों में नहीं, यूरोप और अमेरिका में आपको शायद ही ऐसा कोई पुरुष या मिहला मिले जिसकी एक शादी हुई हो, जिनका एक पुरुष से या एक स्त्री से सम्बन्ध रहा हो और ये एक दो नहीं हजारों साल की परम्परा है उनके यहाँ | आपने एक शब्द सुना होगा "Live in Relationship" ये शब्द आज कल हमारे देश में भी नव-अिभजात्य वगर् में चल रहा है, इसका मतलब होता है कि "बिना शादी के पती-पत्नी की तरह से रहना" | तो उनके यहाँ, मतलब यूरोप और अमेरिका में ये परंपरा आज भी चलती है.

खुद प्लेटो (एक यूरोपीय दार्शनिक) का एक स्त्री से सम्बन्ध नहीं रहा, प्लेटो ने लिखा है कि "मेरा 20-22 स्त्रीयों से सम्बन्ध रहा है" अरस्तु भी यही कहता है, देकातेर् भी यही कहता है, और रूसो ने तो अपनी आत्मकथा में लिखा है कि "एक स्त्री के साथ रहना, ये तो कभी संभव ही नहीं हो सकता, It's Highly Impossible"| तो वहां एक पत्नि जैसा कुछ होता नहीं | और इन सभी महान दार्शनिकों का तो कहना है कि "स्त्री में तो आत्मा ही नहीं होती" "स्त्री तो मेज और कुर्सी के समान हैं, जब पुराने से मन भर गया तो पुराना हटा के नया ले आये " | तो बीच-बीच में यूरोप में कुछ-कुछ ऐसे लोग निकले जिन्होंने इन बातों का विरोध किया और इन रहन-सहन की व्यवस्थाओं पर कड़ी टिप्पणी की | उन कुछ लोगों में से एक ऐसे ही यूरोपियन व्यक्ति थे जो आज से लगभग 1500 साल पहले पैदा हुए, उनका नाम था - वैलेंटाइन | और ये कहानी है 478 AD (after death) की, यानि ईशा की मृत्यु के बाद |

उस वैलेंटाइन नाम के महापुरुष का कहना था कि "हम लोग (यूरोप के लोग) जो शारीरिक सम्बन्ध रखते हैं कुत्तों की तरह से, जानवरों की तरह से, ये अच्छा नहीं है, इससे सेक्स-जनित रोग (veneral disease) होते हैं, इनको सुधारो, एक पति-एक पत्नी के साथ रहो, विवाह कर के रहो, शारीरिक संबंधो को उसके बाद ही शुरू करो" ऐसी-ऐसी बातें वो करते थे और वो वैलेंटाइन महाशय उन सभी लोगों को ये सब सिखाते थे, बताते थे, जो उनके पास आते थे, रोज उनका भाषण यही चलता था रोम में घूम-घूम कर |

संयोग से वो चर्च के पादरी हो गए तो चर्च में आने वाले हर व्यक्ति को यही बताते थे, तो लोग उनसे पूछते थे कि ये वायरस आप में कहाँ से घुस गया, ये तो हमारे यूरोप में कहीं नहीं है, तो वो कहते थे कि "आजकल मैं भारतीय सभ्यता और दशर्न का अध्ययन कर रहा हूँ, और मुझे लगता है कि वो परफेक्ट है, और इसिलए मैं चाहता हूँ कि आप लोग इसे मानो", तो कुछ लोग उनकी बात को मानते थे, तो जो लोग उनकी बात को मानते थे, उनकी शादियाँ वो चर्च में कराते थे और एक-दो नहीं उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई थी |

जिस समय वैलेंटाइन हुए, उस समय रोम का राजा था क्लौड़ीयस, क्लौड़ीयस ने कहा कि "ये जो आदमी है-वैलेंटाइन, ये हमारे यूरोप की परंपरा को बिगाड़ रहा है, हम बिना शादी के रहने वाले लोग हैं, मौज-मजे में डूबे रहने वाले लोग हैं, और ये शादियाँ करवाता फ़िर रहा है, ये तो अपसंस्कृति फैला रहा है, हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा है", तो क्लौड़ीयस ने आदेश दिया कि "जाओ वैलेंटाइन को पकड़ के लाओ ", तो उसके सैनिक वैलेंटाइन को पकड़ के ले आये |

क्लौड़ीयस नेवैलेंटाइन से कहा कि "ये तुम क्या गलत काम कर रहे हो ? तुम अधमर् फैला रहे हो, अपसंस्कृति ला रहे हो" तो वैलेंटाइन ने कहा कि "मुझे लगता है कि ये ठीक है" , क्लौड़ीयस ने उसकी एक बात न सुनी और उसने वैलेंटाइन को फाँसी की सजा दे दी, आरोप क्या था कि वो बच्चों की शादियाँ कराते थे, मतलब शादी करना जुर्म था | क्लौड़ीयस ने उन सभी बच्चों को बुलाया, जिनकी शादी वैलेंटाइन ने करवाई थी और उन सभी के सामने वैलेंटाइन को 14 फ़रवरी 498 ईःवी को फाँसी दे दिया गया |

पता नहीं आप में से कितने लोगों को मालूम है कि पूरे यूरोप में 1950 ईःवी तक खुले मैदान में, सावर्जानिक तौर पर फाँसी देने की परंपरा थी | तो जिन बच्चों ने वैलेंटाइन के कहने पर शादी की थी वो बहुत दुखी हुए और उन सब ने उस वैलेंटाइन की दुखद याद में 14 फ़रवरी को वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया तो उस दिन से यूरोप में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है | मतलब ये हुआ कि वैलेंटाइन, जो कि यूरोप में शादियाँ करवाते फ़िरते थे, चूकी राजा ने उनको फाँसी की सजा दे दी, तो उनकी याद में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है | ये था वैलेंटाइन डे का इतिहास और इसके पीछे का आधार |

अब यही वैलेंटाइन डे भारत आ गया है जहाँ शादी होना एकदम सामान्य बात है यहाँ तो कोई बिना शादी के घूमता हो तो अद्भुत या अचरज लगे लेकिन यूरोप में शादी होना ही सबसे असामान्य बात है | अब ये वैलेंटाइन डे हमारे स्कूलों में कॉलजों में आ गया है और बड़े धूम-धाम से मनाया जा रहा है और हमारे यहाँ के लड़के-लड़िकयां बिना सोचे-समझे एक दुसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड दे रहे हैं
और जो कार्ड होता है उसमे लिखा होता है " Would You Be My Valentine" जिसका मतलब होता है "क्या आप मुझसे शादी करेंगे" | मतलब तो किसी को मालूम होता नहीं है, वो समझते हैं कि जिससे हम प्यार करते हैं उन्हें ये कार्ड देना चाहिए तो वो इसी कार्ड को अपने मम्मी-पापा को भी दे देते हैं, दादा-दादी को भी दे देते हैं और एक दो नहीं दस-बीस लोगों को ये ही कार्ड वो दे देते हैं |

और इस धंधे में बड़ी-बड़ी कंपिनयाँ लग गयी हैं जिनको कार्ड बेचना है, जिनको गिफ्ट बेचना है, जिनको चाकलेट बेचनी हैं और टेलीविजन चैनल वालों ने इसका धुआधार प्रचार कर दिया | ये सब लिखने के पीछे का उद्देँशय यही है कि नक़ल आप करें तो उसमे अकल भी लगा लिया करें | उनके यहाँ साधारणतया शादियाँ नहीं होती है और जो शादी करते हैं वो वैलेंटाइन डे मनाते हैं लेकिन हम भारत में क्यों ??????

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

वसंतोत्सव

वसंतोत्सव

वसंत की शीतोष्ण वायु जैसे ही तन मन का स्पर्श करती है, समस्त मानवता शीत की ठिठुरी चादर छोड़ कर हर्षोल्लास मनाने लगती है। वैदिक काल से वर्तमान काल तक प्रत्येक युग के भारतीय साहित्य में वसंत के मनबहलावों का मनोरंजक वर्णन प्राप्त होता है। इनसे पता चलता है कि प्राचीन काल में वसंत में 'वन विहार' 'झूला दोलन', (झूले पर झूलना), 'फूलों का शृंगार' और 'मदन उत्सव' मनाने की अदभुत परंपरा थी।

'अवदान कल्पलता' नामक ग्रंथ में वाराणसी के राजा कलभु के सपरिवार वसंतकालीन - विहार और वन केलि का वर्णन है। कहा गया है कि वह देर तक क्रीडा कौतुक कर, थक कर सो गया। इसी बीच उसकी प्रिय रानी मंजरी फूल तोड़ती हुई दूर निकल गयी। वहाँ महामुनि क्षांतिवादिन तपस्या कर रहे थे। उन्हें देख कर वह ठगी-सी रह गई। तभी राजा उसे ढूँढता हुआ वहाँ आ पहुँचा और रानी को उस अवस्था में देखकर क्रोध से पागल हो गया। उसने मुनि के हाथ पैर कटवा दिए। फलस्वरूप राज्य में भारी अकाल पड़ा। बाद में मुनि ने राजा को इस आपत्ति से उबारा।

'पिंड नियुक्ति' में चंद्रानना नगरी के राजा चंद्रवतंस के वसंत विहार के संबंध में एक रोचक कथा मिलती है। नगरी के पूर्व तथा पश्चिम में सूर्योदय तथा चंद्रोदय नाम के दो बगीचे थे। राजा ने वसंत काल में क्रीडा कौतुक के अभिप्राय से सूर्योदय उद्यान में विहार का निश्चय कर के घोषणा करवाई कि उस दिन नागरिक सूर्योदय उद्यान में न जाएँ। सूर्योदय उद्यान पर पहरे लगा दिए गए। रात में अचानक राजा को प्रात:कालीन धूप का ख्याल आया अत: यात्रा का कार्यक्रम सूर्योदय उद्यान के स्थान पर चंद्रोदय उद्यान में परिवर्तित कर दिया गया।

चंद्रोदय उद्यान में अंत:पुर की रानियों को राजा के साथ क्रीडा कौतुक करते हुए अनजाने ही अनेक नागरिकों ने देख लिया। इन नागरिकों को पहरेदारों ने पकड़ लिया। दूसरी ओर कुछ नागरिक जो पहले ही सूर्योदय उद्यान में राजा के क्रीडा कौतुक को देखने जा छिपे थे, वे भी पकड़ लिए गए। अंत में जिन्होंने राजाज्ञा का उल्लंघन किया था वे दंडित किए गए, शेष छोड़ दिए गए।

जातक ग्रंथों में राजा शुद्धोदन की रानियों द्वारा लुंबिनी उद्यान में शालभंजिका पर्व मनाने का बड़ा सुंदर वर्णन है। कपिलवस्तु और देवदह नगरों के बीच सघन शालवन में वसंत के स्पर्श के कारण प्रत्येक पत्र और पुष्प में सिहरन हो रही थी। हर शाख नवपल्लवित किसलय व पुष्पों से झुक गई थी। ऐसा मोहक दृष्य देख देवियाँ रह न सकीं और महादेवी सहेलियों सहित वसंत विहार को निकलीं। एक मंगलमय शाल वृक्ष की टहनी को पकड़ने के लिए उन्होंने हाथ उठाया तो वह स्वयं ही झुक गई। महादेवी ने उसे थाम लिया। ऐसी अवस्था में महादेवी को प्रसव पीड़ा का अनुभव हुआ।

'शिशुपाल वध' महाकाव्य में रैवतक पर्वत पर यादवों की वन केलि का खूब विस्तृत वर्णन है। 'नाया धम्म कहाओ' नामक प्राकृत भाषा के ग्रंथ में चंपा नगरी के दो संपन्न व्यापारी पुत्रों जिनदत्त और सागर दत्त की देवदत्ता नामक अत्यंत सुंदर और संपन्न गणिका के साथ उद्यान यात्रा का विस्तृत और शृंगारिक वर्णन है।

'पद्मचूड़ामणि' में कुमार गौतम की रनिवास सहित उद्यान यात्रा का मनोरम वर्णन मिलता है। संक्षेप में- मन बहलाव के लिये स्त्रियाँ कभी फूल पत्तियाँ चुनतीं, कभी उनके गहने बनातीं, कभी अशोक पर पैरों से प्रहार करतीं और कभी मौलश्री पर सुरा के कुल्ले करतीं। कभी केशों को फूलों से सजातीं, आम की कोपलें तोड़तीं, शेफाली और सिंदुवार के तिलक लगातीं ओर कभी प्रियतम के कानों में फूल खोंस कर उसे हृदय से लगातीं।

'जैन हरिवंश' का कथन है कि उद्यान यात्राएँ वन विहार और सैर सपाटे प्राय:वसंत काल में ही होते थे, जबकि स्त्री पुरुष एक साथ एकत्र होकर मद्यपान करते थे। फूलों को चुनने और सजाने से संबंधित अनेक प्रकार के वसंतकालीन मनोरंजन भारतीय साहित्य में मिलते हैं।

कलिदास के 'मालविकाग्निमित्र' नाटक में महादेवी धारिणी ने मालविका को पाँव के प्रहार से अशोक वृक्ष को पल्लवित कुसुमित करने का कार्य सौंपा और सफल हो जाने पर मुँह माँगा पुरस्कार देने का वचन दिया।

बाणभट्ट की 'कादंबरी' में कादंबरी अपनी सखियों से कहती है कि जिस अशोक वृक्ष को लात मार कर मैंने पाला था उसकी कोपलें कोई न तोड़े।

'पद्मपुराण के उत्तरखंड में 'कुंकुम क्रीडा' का वर्णन हुआ है। कश्मीर की प्रशंसा में कहा गया है कि केसर की प्रचुर उपज होने के कारण वहाँ घर के आँगनों में केसर इस प्रकार उड़ता है कि उनसे सूर्य और चंद्र मंडल भी लाल हो जाते हैं।

जैनों के 'उत्तर पुराण' में वसंतकाल में झूले पर झूल कर मन बहलाने का वर्णन मिलता है। 'जैनहरिवंश' में लिखा गया है कि झूलते समय नागरिक हिंदोल राग गाते थे।

'कुमार पाल चरित' में 'दोला उत्सव' का सजीव और शृंगारिक वर्णन है - एक ही झूले पर बैठ कर पति पत्नी बेधड़क गीत गा रहे थे। स्त्रियाँ मदमत्त थीं, उनके नूपुर झूले की गति के साथ बज रहे थे। जब कभी वे अपने पैरों से अशोक वृक्षों को छू देतीं उनकी कलियाँ खिलने लगतीं।

संस्कृत साहित्य में माघ शुक्ला पंचमी को मदनोत्सव के रूप में मनाए जाने के सुंदर वर्णन मिलते हैं। श्री हर्ष की रत्नावली नाटिका में मदनोत्सव का बड़ा ही सजीव वर्णन है। नागरिकों ने इतना अधिक सुगंधित केसर और कुंकुम बिखराया कि संपूर्ण नगर सोने सा पीला हो गया। ऐसा प्रतीत होता है कि छठी शताब्दी से ही उत्तर भारत में मदनोत्सव सार्वजनिक रूप से मनाया जाने लगा था। इसको मनाते समय लोग वय, लिंग और सामाजिक स्थिति को भुला देते थे। केशों को पुष्पों से सजा कर वे हल्दी चावल और कुंकुम का चूर्ण बिखराते तथा रंग खेलते।

भास के 'चास्र्दत्त' नाटक में 'कामदेवानुयान' नामक एक जलूस का वर्णन है, जिसमें कामदेव के एक चित्र के साथ संगीत नृत्य करते हुए अनेक नागरिक सम्मिलित होते हैं।

राजशेखर की 'काव्यमीमांसा' और भोजराज के 'सरस्वती कंठाभरण' में माघ शुक्ला पंचमी के दिन मनाए जाने वाले सुवसंतक या मदनोत्सव का उल्लेख मिलता है। इन वर्णनों में पिचकारी से रंग डालने और कीचड़ फेंकने के वर्णनों से ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान होली जैसा उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता था और तब से रंग और गुलाल का यह उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा तक चलता रहता था।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

हिन्दू राष्ट्रनीति के उन्नायक - छत्रपति शिवाजी महाराज

हिंदू राष्ट्रनीति के उन्नायक - छत्रपति शिवाजी महाराज


हिंदू पद पादशाही के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को हुआ था। यह अजीब संयोग है कि 19 फरवरी को शिवाजी का जन्मदिवस है तो 20 फरवरी (1707) औरंगजेब का मृत्यु  है। आजीवन औरंगजेब को नाकों चने चबाने वाले शिवाजी महाराज के कारण ही मुगल साम्राज्य की नींव हिली और औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात ये साम्राज्य भर भराकर गिरने लगा।
हिंदू राष्ट्रनीति के उन्नायक:
शिवाजी महाराज हिंदू राष्ट्रनीति के उन्नायक थे। बाद में चलकर वीर सावरकर ने राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण का जो मंत्र हिंदू राष्ट्रनीति (राजनीति नही) का मूल आधार घोषित किया वह चिंतन वास्तव में उन्हें शिवाजी महाराज से मिला था। शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक (6 जून 1674) के अवसर पर हिंदू पद पादशाही की घोषणा की थी। वह देश में हिंदू राजनीति को स्थापित कर देश से विदेशियों को खदेड़ देना चाहते थे। उनकी राजनीति का मूल आधार नीति, बुद्घि तथा मर्यादा-ये तीन बिंदु थे। रामायण, महाभारत, तथा शुक्रनीतिसार का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। इसलिए अपने राज्य को उन्होंने इन्हीं तीनों महान ग्रंथों में उल्लेखित राजधर्म के आधार पर स्थापित करने का पुरूषार्थ किया। वह राष्ट्रनीति में मानवतावाद को ही राष्ट्रधर्म स्वीकार करते थे। शुक्र नीति में तथा रामायण व महाभारत में राजा के लिए 8 मंत्रियों की मंत्रिपरिषद का उल्लेख आता है। इसलिए शिवाजी महाराज ने भी अपने राज्य में 8 मंत्रियों का मंत्रिमंडल गठित किया था। अष्टप्रधान,
मंत्रिमंडल इस प्रकार का था-
पेशवा-मुख्य प्रधान या मंत्री
मुजुमदार-आमात्य
सुरनिस-सचिव
वाकनिक-मंत्री
सरनौबत-सेनापति
दुबीर-सुमंत
न्यायाधीश-प्राड़विवाक, जज
पंडित राव-धर्माधिकारी या दानाध्यक्ष। शेजवलकर का मानना है कि ये अष्टï प्रधान की कल्पना शिवाजी ने ‘शुक्रनीतिसार’ से ही ली थी, क्योंकि उन्हें इस ग्रंथ का पता था। ऐसे ग्रंथों को आधार बनाकर ही हिंदू पद पादशाही की कल्पना की जा सकती है।
इतिहासकारों की मक्कारी
अंग्रेज इतिहासकारों व मुस्लिम इतिहास कारों ने शिवाजी को अपना सांझा शत्रु माना है। इसलिए उन्होंने शिवाजी को औरंगजेब की नजरों से देखते हुए पहाड़ी चूहा या एक लुटेरा सिद्घ करने का प्रयास किया है। अत्यंत दुख की बात ये रही है कि इन्हीं इतिहास कारों की नकल करते हुए कम्युनिस्ट और कांग्रेसी इतिहासकारों ने भी शिवाजी के साथ न्याय नही किया। छल, छदम के द्वारा कलम व ईमान बेच देने वाले इतिहासकारों ने शिवाजी के द्वारा हिंदू राष्ट्रनीति के पुनरूत्थान के लिए जो कुछ महान कार्य किया गया उसे मराठा शक्ति का पुनरूत्थान कहा गया ना कि हिंदू शक्ति का पुनरूत्थान। ऐसे ही हमें पंजाब में सिख शक्ति का उत्थान होता दिखाया जाता है, जबकि हिंद की चादर कहे जाने वाले गुरूओं का मंतव्य उस समय हिंदुत्व की रक्षा के लिए स्वयं को और अपने शिष्यों (सिक्खों) को सौंप देना था। स्वार्थी इतिहासकारों का मंतव्य तभी पूर्ण हो सकता था जब हमें टुकड़ों में (मराठा, राजपूत, गुर्जर, सिक्ख आदि) दिखाया जाता है।
यदि ये लोग हिंदू समाज के लिए इन सारे प्रयासों को जागरण के रूप में पेश करते तो उनका यह कार्य तत्कालीन राजसत्ताओं के लिए कष्ट कर हो सकता था।
शिवाजी की नीति
शिवाजी की नीति धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करने की थी। खानखां जैसे इतिहास कार ने भी उनके लिए ये कहा है कि शिवाजी के राज्य में किसी अहिंदू महिला के साथ कभी कोई अभद्रता नही की गयी। उन्होंने एक बार कुरान की एक प्रति कहीं गिरी देखी तो अपने एक मुस्लिम सिपाही को बड़े प्यार से दे दी। याकूत नाम के एक पीर ने उन्हें अपनी दाढ़ी का बाल प्रेमवश दे दिया तो उसे उन्होंने ताबीज के रूप में बांह पर बांध लिया। साथ ही बदले में उस मुस्लिम फकीर को एक जमीन का टुकड़ा दे दिया। ऐसी ही स्थिति उनकी हिंदुओं के मंदिरों के प्रति थी। वह काल वोट की राजनीति का काल नही था, इसलिए कहीं कोई तुष्टिïकरण नही था, कहीं उनके राज्य में किसी का अनुचित उत्पीडऩ नही था। यही था वास्तविक धर्मनिरपेक्ष राज्य। आज की राजनीति तो इस राज्य का अर्थ ही नही समझ पायी है।
शिवाजी की इस नीति की प्रशंसा कई इतिहासकारों ने की है, और ये माना है कि शिवाजी की इस प्रकार की नीति के कारण ही उनके खिलाफ कभी उनके किसी मुस्लिम सिपाही ने बगावत नही की।
शुद्घि पर बल दिया
शिवाजी का मुस्लिम प्रेम अपनी प्रजा के प्रति एक राजा द्वारा जैसा होना चाहिए, उस सीमा तकराष्ट्रधर्म के अनुरूप था। इसका अभिप्राय कोई तुष्टिकरण नही था। इसी आदर्श को कालांतर में सावरकर ने हिंदू राज्य में स्थापित करने पर बल दिया। शिवाजी इसके उपरांत भी हिंदू संगठन पर विशेष बल देते थे। इसलिए उन्होंने निम्बालकर जैसे प्रतिष्ठित हिंदू को मुसलमान बनने पर पुन: हिंदू बनाकर शुद्घ किया। साथ ही निम्बालकर के लड़के को अपनी लड़की ब्याह दी। नेताजी पालेकर को 8 वर्ष मुस्लिम बने हो गये थे-शिवाजी ने उन्हें भी शुद्घ कराया और पुन: हिंदू धर्म में लाए। ऐसे और भी कितने ही उदाहरण उनके विषय में दिये जा सकते हैं।
शिवाजी का बौद्घिक चातुर्य
राजा जय सिंह की विश्वासघात भरी बातों में फंसकर शिवाजी महाराज 1666 में आगरा स्थित औरंगजेब के लालकिले आ गये। उन्हें बहुत बड़े सम्मान का भरोसा जयसिंह की ओर से दिया गया था, लेकिन आगरा में ऐसा कुछ न पाकर शिवाजी को वास्तविकता को जानने में देर न लगी। औरंगजेब ने उन्हें पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में बैठाने का निर्देश दिया। जिसे देखकर शिवाजी बिगड़ गये। इसके पश्चात उन्हें नजरबंद कर दिया गया। फिर औरंगजेब उन्हें मारने की योजना बनाने लगा। औरंगजेब के इस इरादे की सूचना राजा यशवंत सिंह के लड़के कुंवर रामसिंह ने शिवाजी को दे दी। तब शिवाजी ने बौद्घिक चातुर्य से काम लिया, पहले अपने को बीमार घोषित कराया फिर एक दिन स्वस्थ होने की खुशी में फल और मिठाई बांटने की आज्ञा बादशाह से प्राप्त की। अमीर उमरावों व बड़े-बड़े पदाधिकारियों को मिठाई भिजवाना आरंभ किया गया। बड़े-बड़े टोकरों में मिठाई भर-भरकर बाहर जाने लगी। जब दरबाजों पर टोकरों की रोक-टोक समाप्त हो गयी तब चुपके से अपने बेटे शम्भाजी को पहले एक टोकरे में बैठाकर बाहर निकाल दिया फिर स्वयं निकल गये और अपने बिस्तर में अपने एक हमशक्ल साथी को लिटा दिया और स्वयं बैरागी गुसाईयों की एक टोली के साथ दाढ़ी मूंछ कटाकर उनके साथ काशी के लिए चल दिये। काशी में एक मुगल सेनापति ने उक्त मंडली रोक ली। स्वयं को फिर फंसा देखकर यहां एक मुगल सैनिक से सांठगांठ की और उसे दो बेशकीमती हीरे देकर वहां से भी निकल भागे। ये था शिवाजी का बौद्घिक चातुर्य। ऐसा ही चातुर्य उन्होंने अफजल खां का वध करते समय 1659 में दिखाया था। कई इतिहासकारों ने उन पर यहां हत्या का आरोप लगाया है। लेकिन इस घटना का उल्लेख करते हुए मीर आलम लिखता है कि अफजलखां ने शिवाजी को बगलगीर करके मजबूती से पकड़ा और अपनी कटार से उस पर वार किया। शिवाजी ने पलटकर उस पर बाघनख और बिच से हमला किया। सरकार ने भी शिवाजी के कृत्य को आत्मरक्षा में उठाया गया कदम सिद्घ किया है। हिंदू राष्ट्रनीति का तकाजा भी यही है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करो।
शिवाजी की मर्यादा
किसी भी मस्जिद को किसी सैनिक अभियान में शिवाजी ने नष्ट नही किया। इस बात को मुस्लिम इतिहासकारों ने भी खुले दिल से सराहा है। गोलकुण्डा के अभियान के समय शिवाजी को यह सूचना मिल गयी थी कि वहां का बादशाह शिवाजी के साथ संधि चाहता है, इसलिए उस राज्य में जाते ही शिवाजी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि यहां लूटपाट न की जाए अपितु सारा सामान पैसे देकर ही खरीदा जाए। बादशाह को यह बात प्रभावित कर गयी। जब दोनों (राजा और बादशाह) मिले तो शिवाजी ने बड़े प्यार से बादशाह को गले लगा लिया। शिवाजी ने गौहरवानो नाम की मुस्लिम महिला को उसके परिवार में ससम्मान पहुंचाया। उनके मर्यादित और संयमित आचरण के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं अपने बेटे सम्भाजी को भी एक लड़की से छींटाकशी करने के आरोप में सार्वजनिक रूप से दण्डित किया था।
शिवाजी क्योंकि हिंदू यह बादशाही के माध्यम से देश में ‘हिंदू राज्य’ स्थापित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने हिंदू राष्ट्रनीति के उपरोक्त तीनों आधार स्तंभों (नीति, बुद्घि और मर्यादा) पर अपने जीवन को और अपने राज्य को खड़ा करने का प्रयास किया।
विशाल हिंदू राज्य के निर्माता
शिवाजी महाराज ने जनपद गौतमबुद्घ नगर को तहसील दादरी में स्थित एक बड़े मंदिर का जीर्णोद्घार कराया था। यह मंदिर आज भी है। ऐसे कार्य उन्होंने देश में अन्मत्र स्थानों पर भी बड़ी संख्या में कराये। उन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया, परंतु युद्घों में लगातार रत रहने से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा था और पचास वर्ष की आयु में 15 अप्रैल 1680 में वह चले गये। उनके पश्चात हिंदू शक्ति निरंतर मजबूत होती गयी और अठारहबीं शताब्दी के मध्य में जब अब्दाली और नादिरशाह के आक्रमणों से मुगल साम्राज्य हिला गया तो मराठों ने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया था। अठारहवीं शदी के उत्तरार्ध में और 1857 की क्रांति से 50-60 वर्ष पूर्व मराठा शक्ति हिंदू शक्ति के रूप में सबसे बड़ी शक्ति भारतवर्ष में थी। संबंद्घ चित्र में मराठा राज्य को देखकर यह अनुमान स्वयं लगाया जा सकता है। यह क्षेत्र लगभग अकबर के साम्राज्य से कुछ ही छोटा है। लेकिन यहां चाटुकारों ने अकबर को महान बताया है और शिवाजी को पहाड़ी चूहा कहा है। तथ्यों को झुठलाकर मूर्ख बनाने की इतिहासकारों यह प्रवृत्ति देश के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है।
नोएडा में लगे भव्य प्रतिमा
शिवाजी के वंशजों ने आज के नोएडा, गौतमबुद्घ नगर, गाजियाबाद, बुलंदशहर, दिल्ली सारे एनसीआर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था। नोएडा फिल्म सिटी सेंटर के पास स्थित गरूड़ध्वज (स्थानीय भाषा में गडग़ज) उन्हीं का विजय स्तंभ बताया जाता है। आज नोएडा इन ऐतिहासिक प्रमाणों को निगल रहा है और दम तोड़ते इस इतिहास की ओर किसी का ध्यान नही है। अच्छा हो कि ऐसे स्थानों पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा लगाकर उन्हें सम्मान देकर इतिहास को सहेजने का कार्य किया जाए। आज की राजनीति को शिवाजी से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है, उनके आदर्श जीवन और व्यवहार आज की दिशाहीन राजनीति सचमुच सही दिशा ले सकती है। इसीलिए उन्हें सावरकर ने अपना आदर्श माना था। उनकी जयंती के अवसर पर उनके व्यक्तिगत और कृतित्व का सही मूल्यांकन करने की आवश्यकता है।
सरकारी स्तर पर…
कि हम अंग्रेजों के सभी तंत्र को समाप्त कर अपना नया तंत्र बनाते। नये कानून बनाते। लेकिन जैसे अंग्रेज छोड़कर गये थे। उस शासन व्यवस्था पर हमारे काले अंग्रेजों ने शासन शुरू कर दी। जोकि अभी तक चल रही है। थानो से लेकर कार्यालय तक लूट मची हुई है। जिसको जहां मौका मिल रहा वहीं लूट का अध्याय शुरू हो जाता है। अंग्रेजी की समझ बहुत कम भारतीयों को है। उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय से लेकर उच्च स्तर पर सभी कार्य अंग्रेजी में हो रहे है। देश आजाद तो हुआ 1947 में लेकिन कानून 1860 के ही चल रहे है। और हमारी सरकारे कहती है कानून अंग्रेजों का है तो क्या हुआ शासन तो भारतीयों का है। अगर शासन भारतीयों का है तो फिर भारतीयों को उनके अधिकार क्यों नहीं दिये जा रहे। हम मनमोहन, प्रणब मुखर्जी और अपने देश के सरकार के हर उस शख्स से पूछना चाहते है कि बताओं इंटरनेट पर सभी सरकारी वेबसाइटे, देश के सभी कानून, देश की सभी व्यवस्था हिन्दी, तमिल, तेलुगु बोलने वाले के लिए है या 6 करोड़ की जनंसख्या वाले ब्रिटेन के लिए। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर सभी की वेबसाइटे पहले अंग्रेजी में क्यो खुलती है? और उसमें उपलब्ध दो तिहाई सामग्रियां आखिर हमारे देश की आठवीं अनुसूची में उपलब्ध भाषाओं में आखिर क्यों नहीं है। क्या सरकार सिर्फ अंग्रेजी भाषियों के लिए है या अन्यों के लिए भी। सैकड़ों प्रकार के टैक्स और शुल्क हिन्दी और अन्य आठवी अनुसूची भाषी देते है तो फिर सबके साथ ये अन्याय क्यो?

क्यों जबरदस्ती हमारे देश के होनहारों पर अंग्रेजी थोपी जा रही है। अभी कुछ समय पहले एक आई.ए.एस से मेरी हिन्दी अंग्रेजी को लेकर चर्चा हो रही थी। ये आइएएस महोदय अंग्रेजी के तारिफों के पुल बांधे जा रहे थे। फिर मैंने अंग्रेजी की एक कविता उन्हें दी और कहा इसका अर्थ बताइयें फिर क्या था, वह आइ.ए.एस. महोदय बगले झांकने लगे। भाषा जानना और उसकी आत्मा को समझना दो अलग पहलु है। हिन्दी हमारी आत्मा में बसती है। लेकिन अंग्रेजी को हम अनुवाद करके ही समझते है। हां अगर 1 अरब 25 करोण में एक से डेढ़ करोण लोग अच्छी अंग्रेजी वाले है भी तो उनकी वजह से 1 अरब 24 करोण लोगों पर अंग्रेजी थोपना प्रजातंत्र के सिद्धान्त के अनुसार क्या न्यायोचित माना जायेगा? जब देश के सबसे कठिन परीक्षा पास करने वाले अधिकारियों का ये हाल है तो फिर आम जनता की स्थिति का आंकलन स्वत: किया जा सकता है। आज भी सरकारी कार्यालयों में इतने नियम है कि उन्हें समझने के लिए सालों लग जाते है। भाषा के चलते आ रहे समस्याओं के समाधान हेतु राजभाषा नियम 1976 बनाया गया था लेकिन इसका समुचित अनुपालन आज तक नहीं हो पा रहा। आज भी हमारी सरकार की सभी वेबसाइटे अंग्रेजी की शोभा बढ़ा रही है। आखिर आम जनता अंग्रेजी को क्यो पढ़े। भाषा की समस्या ही मुख्य समस्या है इस देश में। देश में क्या हो रहा है उसकी समझ आम जनता के परे है। सब रट्टा मार प्रतियोगिता करने में भागे जा रहे हैं। हमारे बगल में चाइना दिन-दूनी रात चैगूनी कर रहा है और वहां सभी कार्य उसके अपने भाषा में हो रहे है। जापान निरन्तर उन्नती कर रहा है और उसके यहां भी सभी कार्य उसके अपने भाषा में हो रहे है और भी अनेको देश है जो निज भाषा का प्रयोग कर उन्नती की अग्रसर है। लेकिन हमारी सरकार का अंग्रेजी मोह नहीं छुट रहा। हमारे देश के होनहार बच्चों को अंग्रेजी की चक्की में पीसा जा रहा है। एक तरफ संभ्रान्त, रसूखदार और ऊँचे तबके के लोग शुरू से ही अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा की चक्की का आंटा खिला रहे है तो दूसरी तरफ हमारी केन्द्र सरकार संविधान की दुहाई देकर प्राथमिक स्तर तक बच्चों को अंग्रेजी नहीं पढ़ा रही। क्योंकि हमारे संविधान का अनुच्छेद 350 (क) में प्राविधान है कि- “प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के बालको को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्थाा करने का प्रयास करेगा।”

संविधान के अनुच्छेद 351 में हिन्दी भाषा के विकास के लिए निदेश दिये गये है और कहा गया है कि “संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।” लेकिन सीधा प्राविधान होने के बाद भी हमारी सरकारे आज तक अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति की जगह अंग्रेजी भाषा की उन्नती करती जा रही है। और ऐसा सिर्फ सरकारी मांग की वजह से हो रहा है। क्योंकि हमारी सरकार और उनके द्वारा बुलायी गयी हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनीय अंग्रेजी के जानकारों को खोज रही है। अत: हमारी जनता भी अंग्रेजी के पीछे दीवाना हो चुकी है। अगर आजादी पश्चात् ही आठवी अनुसूची की भाषाओं में ही कार्य किया जाता तो ऐसी स्थिति नहीं उभरती। समूचे देश की एक भाषा अगर चुनना ही था तो हिन्दी चुन ली जाती। और अगर अन्य आठवी अनुसूची से सम्बन्धित भाषाओं का विवाद उत्पन्न होता तो तमिल को अंग्रेजी की जगह तमिल हिन्दी दी जाती। राज्यस्तर की भाषा का चयन राज्य की भाषा के अनुसार किया जाता तो कितना अच्छा रहता।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

मोहनदास करमचंद गाँधी एक स्वाधीनता सेनानी नहीं वरण वीर इंग्लिश सैनिक था

मोहनदास करमचंद गाँधी एक स्वाधीनता सेनानी नहीं वरण वीर इंग्लिश सैनिक था

बोअर युद्ध १८९९ दक्षिण अफ्रिका
क्या आप इस सैनिक को जानते है! क्या? आपने नही पहचाना?
अरे ये तो वो है जिनका जन्म दिवस आप आज मना रहे है! आप जानते है इनकी महानता इन्होने भारत वासीयो के मनमे अंग्रेजो के प्रती अहिंसा की भावना निर्माण की! क्या आप जानते है इनको?
ये बड़े महान अहिसवादी थे! इन्होने जिस बोअर युद्ध में (१८९९) एक अहिंसक (?) सैनिक का कार्य किया था वो अद्वितीय है! अंग्रेज और दक्षिण अफ्रिका के बोअर गण राज्यों में जो भयानक युद्ध १८९९ में हुआ वह कुविख्यत है अंग्रेजो के अत्याचारों के लिए! इस युद्ध में अंग्रजो की सारे विश्व भर में निर्भात्सना हुई, क्यों की अंग्रेजी सैनिको ने युद्ध में अगणित अफ़्रीकी प्रजाजनों को मृत्यु के घाट उतार दिया, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार करके उन्ही क़त्ल कर दिया! अंग्रेजो की इस बदनाम सेना में ये अहिंसावादी क्या कर रहे थे? अब ये अहिंसात्मक लढाई थी? सब कुछ क्या बताना पड़ेगा? समझदार के लिए एक संकेत ही बहुत है!
और एक महत्वपूर्ण बात सुनिए! ये चित्र भारत सरकार द्वारा संचालित सैनिक समाचार नामक पत्रिका में प्रसारित हुए है! जब इस चित्रों को देख के बवाल खड़ा हुआ तो लोगों को मुर्ख बनाने के लिए एक कुतर्क दिया गया! ये महात्मा युद्ध में अहिंसक सैनिक थे! जो युद्ध फसे घायल अंग्रेजी सैनिको को युद्ध भूमि से बाहर निकलते थे! आप सोचिए सैनिक फिर वो कोई भी कार्य करता हो चाहे धोबी का या रसोइये का कभी अहिंसक होता है?
ये महान आत्मा महात्माजी गांधीजी, केवल अंग्रेजो के अब्युलंस कोर्प नामक टुकड़ी के लिए सेवा नहीं दे रहे थे! किन्तु इन्होने युद्ध में अंग्रजो की सहायता करने के लिए एक स्वतंत्र सेना स्वयसेवको की टुकड़ी खड़ी की थी! युद्ध काल में इस निस्पृह सेवा से प्रसन्न हो कर अंग्रेज सरकार ने महान आत्मा महात्माजी गाँधीजी को कैसर-ए-हिंद का पुरस्कार दिया था! क्या आप जानते है ये क्या पुरस्कार है! ये पुरस्कार उस समय का अंग्रेजो का सर्वोच्च पुरस्कार था मानो परमवीर चक्र!!!!!
फिर आप कहोगे की गांधीजीने अंग्रजो के विरोध में अपना पहला आन्दोलन तो दक्षिण अफ्रिका में किये था, फिर ये अंग्रेजो की सेना में क्या कर रहे है! तो वो ये बात है की १९४७ के उपरांत किस की सत्ता भारत में आई? और एसी पक्षपाती सत्ता के चलते ये सब लोगों के सामने आ सकता है क्या? पर वो बेचारे ये क्या जानते थे के आगे चल कर इंटरनेट का अविष्कार होगा और फेस बुक चलेगी!
हमें बताया ये गया के अंग्रेजो ने हमरे भगवान स्वरूप महात्माजी का अपमान किया, उनके पास १ श्रेणी के रेल डिब्बे की टिकिट होने के उपरांत उन्हें अपमान पूर्वक उतारा गया! महात्माजी के भीतर इस अपमान से स्वाभिमान जागा और उन्होंने अहिंसा और असहकार की लड़ाई अंग्रजो के विरुद्ध छेद दी! एक मिनिट रुकिय क्या आप जानते है जिस समय ये घटना घटी ऐसा हमे बताया जाता है, उस समय दक्षिण अफ्रिका में अंग्रजी शासन था और वहा की रेलवे में केवल गोरो को प्रवेश था जिसका अरक्ष्ण लन्दन से किया जाता था! जब प्रथम श्रेणी गोरो के लिए आरक्षित होती थी तो हमारे महात्माजी के पास उसकी टिकिट आयी कैसे? ये मूल भुत प्रश्न उठता है!
कुछ इतिहासकारो का कहना है की ये घटना काल्पनिक है और भारत में क्रांति की अग्नि को दबाने के लिए अंग्रेज सुरक्षा छिद्र (सेफ्टी वाल्व) का निर्माण करना चाहते थे! ये घटना उसी की कड़ी है! ६५ बरसो तक हम ठगे गए अब समय है इसे शेअर करके जागने का!
सन्दर्भ:
http://en.wikipedia.org/wiki/File:Gandhi_Boer_War_1899.jpg
http://en.wikipedia.org/wiki/Second_Boer_War
http://en.wikipedia.org/wiki/Gandhi_Under_Cross_Examination
http://en.wikipedia.org/wiki/Gandhi_Behind_the_Mask_of_Divinity