रविवार, 7 दिसंबर 2014

रानी पद्मिनी,गोरा-बादल और गोरा की पत्नी की वीरता एवं अद्वितीय देशभक्ति

रानी पद्मिनी,गोरा-बादल और गोरा की पत्नी की वीरता एवं अद्वितीय देशभक्ति



भारत में नारी को उसके नारी सुलभ ममता,  करूणा, स्नेह आदि गुणों के कारण अबला भी कहा गया है। परंतु नारी का वेदों ने एकवीरांगना के रूप में भी चित्रण किया है। उसे हर स्थिति में पति की रक्षिका ध्वजवाहिका और शत्रु संहारिका के रूप में भी वर्णित किया गया है। स्वेच्छा से जौहर करने वाली राजा दाहर की रानी बाई एक वैदिक वीरांगना थी। जौहर या सती प्रथा अपराध तब हुई जब नारी को चिता में उसके पति के साथ बलात् जलाया जाने लगा। इसलिए एक वीरांगना का अति सराहनीय कार्य भी हमारी दृष्टि से कहीं दूर ओझल हो गया। हमने बलात् सती करने वाले अपराधियों के अपराध की विभीषिका में बलिदानी वीरांगना बाई को भी भुला दिया।

रानी बाई ने किया था पहला जौहर

हम सती प्रथा या बलात् जौहर के समर्थक नही हैं, परंतु जिस वीरांगना रानी बाई ने इसे सर्वप्रथम अपनाया था, उसकी वीरता और अपने धर्म को बचाने के लिए उसके साहस की पराकाष्ठा तो देखिए कि उसने आत्मोत्सर्ग का यही ढंग ढूंढ़ लिया कि पति के वीरगति पाने का समाचार मिलते ही स्वयं को अग्नि के समर्पित कर दिया। हम इस आदर्श देशभक्ति और पति भक्ति के प्रशंसक अवश्य हैं। भारतीय नारियों को वीरांगना होने की यह प्रेरणा वेद से मिली। हमने नारी के विषय में ये पंकित्यां स्मरण कर ली हैं :-

अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी,

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।

वेदों ने कहा नारी वीरांगना है

पर हमने वेद के उन संदेशों को भुला दिया जिनमें नारी को अबला, दीनहीन और मतिहीन न मानकर उसे वीरांगना माना है।

पारस्कर गृहय सूत्र (1/7/1) में आया है कि ‘आरोहेममश्मानम् अश्वेमेव त्वं स्थिरा भव।

अभितिष्ठ पृतन्यतो अबवाधस्व पृतनायत:।।

अर्थात (सुदृढ़ता प्राप्त करने के लिए) तू इस शिला पर आरोहण कर। जैसे यह शिला स्थिर तथा सुदृढ़ है, ऐसे ही तू भी स्थिर और सुदृढ़ गात्री बन। आक्रमणकारियों को परास्त कर। सेना द्वारा चढ़ाई करने वालों को बाधित कर।

यजुर्वेद (5/10) में आया है-‘‘हे नारी! तू स्वयं को पहचान। तू शेरनी है, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करने वाली है, देवजनों के हितार्थ अपने भीतर, सामथ्र्य उत्पन्न कर। हे नारी! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की भांति है। तू दुष्कर्मों एवं दुव्र्यसनों को शेरनी के समान विध्वंसित करने वाली है, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।’’

यजुर्वेद (5/12) में कहा गया है-‘‘हे नारी तू शेरनी है, तू आदित्य ब्रह्मचारियों की जन्मदात्री है। हम तेरी पूजा करते हैं। हे नारी! तू शेरनी है, तू ब्राह्मणों की जन्मदात्री है, तू क्षत्रियों की जन्मदात्री है, हम तेरा यशोगान करते हैं।’’

यजुर्वेद (10/16) में नारी को क्षात्रबल की भंडार कहा गया है। जबकि यजु (13/16) में उसके लिए कहा गया है कि-‘‘हे नारी! तू धु्रव है, अटल निश्चय वाली है, सुदृढ़ है, अन्यों को धारण करने वाली है। विश्वकर्मा परमेश्वर ने तुझे विद्या, वीरता आदि गुणों से आच्छादित किया है। ध्यान रख, समुद्र के समान उमडऩे वाला रिप ुदल तुझे हानि न पहुंचा सके, गरूड़ के समान आक्रांता तुझे हानि न पहुंचा सके। किसी से पीडि़त होती हुई तू राष्ट्रभूमि को समृद्घ कर।’’

यजुर्वेद (13/26) में कहा गया है-‘‘हे नारी! तू विघ्न बाधाओं से पराजित होने योग्य नही है, प्रत्युत विघ्न बाधाओं को पराजित कर सकने वाली है। तू शत्रुओं को परास्त कर, सैन्य दल को परास्त कर, तू सहस्रवीर्या है, अपनी वीरता प्रदर्शित करके तू मुझे प्रसन्नता प्रदान कर।’’

ऋग्वेद (8/18/5) में आया है कि-‘‘हे नारी! जैसे तू शत्रु से खंडित न होने वाली, सदा अदीन रहने वाली वीरांगना है, वैसे ही तेरे पुत्र भी अद्वितीय वीर हैं।’’

ऋग्वेद (10/86/10) में नारी के लिए कहा गया है कि वह आवश्यकता पडऩे पर बलिदान के स्थल संग्राम में जाने से भी नही हिचकती। यहां से सत्य की विधात्री वीर पुत्रों की माता वीर की पत्नी कहकर उसे महिमान्वित किया गया है।

यजुर्वेद (16/44) में नारी को कहा गया है कि तू शत्रुओं के प्रति प्रयाण कर, उनके हृदयों को शोक से दग्ध कर दे। तेरे शत्रु निराशारूप घोर अंधकार से ग्रस्त हो जाएं।

ऋग्वेद (6/65/15) में आया है कि जो वीरांगना विष लिप्त बाण के समान रण संहार करने वाली है जो रक्षार्थ सिर पर मृग के सींगों का बना शिरस्त्राण धारण करती है, जिसका सामने का भाग लोह कवच से आच्छादित है, जो पर्जन्य वीर्या है, अर्थात बादल के समान शस्त्रास्त्रों की वर्षा करने वाली है उस बाण के समान गतिशील, कर्मकुशल, शूरवीर देवी को हम भूरि-भूरि नमस्कार करते हैं।’’

ऋग्वेद (10/159/2) में नारी अपने विषय में कहती है-‘‘मैं राष्ट्र की ध्वजा हूं, मैं समाज का सिर हूं। मैं उग्र हूं, मेरी वाणी में बल है। शत्रु सेनाओं को पराजय करने वाली मैं युद्घ में वीर कर्म दिखाने के पश्चात ही पति का प्रेम पाने की अधिकारिणी हूं।’’

ऋग्वेद (10/159/4) का कहना है कि-‘‘जिस आत्मोसर्ग की छवि से मेरा वीर पति कृत कृत्य यशस्वी तथा सर्वोत्तम सिद्घ हुआ है, वह छवि आज मैंने भी दे दी है। आज मैं निश्चय ही शत्रु रहित हो गयी  हूं।’’ इससे अगले मंत्र में वह कहती है कि-‘‘ मैंने शत्रुओं का वध कर दिया है, मैंने विजय पा ली है, वैरियों को पराजित कर दिया है। ’’

इसलिए किया रानी ने जौहर

वैदिक नारी का राष्ट्र की राष्ट्रनीति (राजनीति) में ये स्थान था। मानो वह अपने पति के हटते ही तुरंत ध्वजा संभालने को आतुर रहती थी। राष्ट्र और समाज की शांति व्यवस्था के शत्रु आतंकियों का विनाश करने में यदि पति ने आत्मोत्सर्ग कर लिया है, वीरगति प्राप्त कर ली है, तो पत्नी भी उसी मार्ग का अनुकरण करना अपना सौभाग्य मानती थी। इसी भाव और भावना ने राजा दाहिर की पत्नी को जौहर करने का विकल्प दे दिया। राजा दाहर की रानी के जौहर से पूर्व किसी रानी के जौहर का उल्लेख नही है। कारण ये है कि उससे पूर्व भारत वर्ष में नारी के प्रति पुरूष का बड़ा प्रशंसनीय धर्म व्यवहार था। नारी चाहे कितनी ही वीरांगना हो, परंतु पुरूष समाज उससे शत्रुता नही मानता था और ना किसी की नारी के शीलभंग के लिए युद्घ किये जाते थे, नारी का को शत्रु नही (न+ अरि = नारी) होता था, इसीलिए वह नारी कही जाती थी। परंतु अब विदेशी आक्रमणकारियों का धर्म उन्हें नारी के लिए ही युद्घ करने की प्रेरणा देता था और नारी का शीलभंग करना इस युद्घ का एक प्रमुख उद्देश्य बन गया था, इसलिए रानी बाई ने जौहर को अपना लिया।

जौहर बन गया अनुकरणीय

इसी जौहर को कालांतर में अन्य हिंदू वीरांगनाओं ने भी अपनाया। अब हम आते हैं एक ऐसी ही हिंदू वीरांगना रानी पदमिनी की वीरता की कहानी पर, जिसने अपने पति की रक्षार्थ वैदिक आदर्श को अपनाया और विदेशियों को ये बता दिया कि वेदों के आदर्श केवल कोरी कल्पना ही नही हैं और ना ही ये इतने पुराने पड़ गये हैं कि अब इन्हें कोई अपनाने या मानने वाला ही नही रहा है। रानी की विवेकशीलता और बौद्घिक चातुर्य को देखकर शत्रु भी दांतों तले जीभ दबाकर रह गया। शत्रु ने भारतीय नारी से कभी ये अपेक्षा ही नही की होगी कि वह इतनी साहसी भी हो सकती है।

भीमसिंह बना चित्तौड़ का राजा

कर्नल टॉड के ‘राजस्थान का इतिहास’-भाग-1, से हमें ज्ञात होता है कि सन 1275 ई. में चित्तौड़ के सिंहासन पर लक्ष्मण सिंह बैठा, राजा की अवस्था उस समय छोटी थी, इसलिए उसका संरक्षक राजा के चाचा भीमसिंह को बनाया गया।

राजा भीमसिंह का विवाह उस समय की अद्वितीय सुंदरी रानी पद्मिनी के साथ हुआ था, रानी की सुंदरता की जब अलाउद्दीन खिलजी को पता चला तो उसने रानी को प्राप्त करने के लिए चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। उसने राजा भीमसिंह को अपने आक्रमण का प्रयोजन बताकर रानी को यथाशीघ्र अपने शिविर में भेज देने का संदेश भिजवा दिया।

अलाउद्दीन का मजहब

यहां हम तनिक विचार करें। अलाउद्दीन का मजहब कहता था कि काफिरों की पत्नियां तुम्हारा धन हैं, उन्हें लूटो और उनका उपभोग करो। इसलिए उसके मजहब के अनुसार किसी की पत्नी छीनना अन्याय या पाप नही था। जबकि राजा का धर्म कहता था कि पत्नी पति की पोष्या है और उसके सतीत्व एवं पतित्व की रक्षा करना उसका धर्म है। यदि कोई पति अपनी पत्नी के सतीत्व एवं पतित्व की रक्षा नही कर पाता है, तो उसे कायर माना जाता है, और ऐसा न करने से उसे पाप लगता है। बात स्पष्ट है कि एक का धर्म रानी को छीनने की आज्ञा दे रहा था, तो दूसरे का धर्म उसकी रक्षा करने की आज्ञा दे रहा था। अत: टकराव होना अवश्यम्भावी हो गया। राजा ने रानी को ‘न देने’ का निर्णय लिया। समस्त राज्य की प्रजा भी राजा के निर्णय के साथ रही। किले का घेरा लंबे काल तक चला। जब अलाउद्दीन ने देखा कि रानी को प्राप्त करने की उसकी इच्छा पूर्ण होने वाली नही है, राजा को झुकाया जाना उसके लिए असंभव होता जा रहा है, तब उसने रानी को प्राप्त करने के लिए छल -बल से काम लेने का निर्णय लिया।

अलाउद्दीन ने रचा षडय़ंत्र

अलाउद्दीन ने राजा के पास पुन: एक संदेश पहुंचाया कि यदि राजा रानी पद्मिनी को उसे दर्पण में भी दिखा देगा तो भी वह इतने से ही प्रसन्न और संतुष्ट होकर दिल्ली लौट जाएगा। राजा ने प्रजाहित में अलाउद्दीन की यह शर्त स्वीकार कर ली। रानी को दर्पण में से अलाउद्दीन को दिखा दिया गया।

रानी को दर्पण में देखने के पश्चात उसे प्राप्त करने की इच्छा से अलाउद्दीन व्याकुल हो उठा। वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नही रख सका। उसकी काम वासना उसे कोई और षडय़ंत्र बनाने के लिए प्रेरित कर रही थी। यद्यपि वह पहले से ही एक षडय़ंत्र रचकर राजा के पास गया था, पर अब तो उसके भीतर से उसे कोई बार-बार झकझोर रहा था कि शीघ्रता से अपनी योजना को फलीभूत करो, समय निकला जा रहा है।

अलाउद्दीन इसी अंतद्र्वन्द्व में राजा से ‘चलने की अनुमति’ प्राप्त करता है। राजा अपने अतिथि को शिष्टाचार वश विदा करने के लिए किले के मुख्यद्वार तक चला। अलाउद्दीन ने राजा को बातों में फंसा लिया और बात करते-कराते राजा को किले से थोड़ी दूर बाहर तक ले आया। अलाउद्दीन ने जब देखा कि राजा अब पूर्णत: असावधानी में है, तब वह राणा पर आक्रमण कराके उसे कैद कर अपने शिविर में ले गया।

रानी को किया गया सूचित

राणा को शिविर में कैद करके अलाउद्दीन ने किले के भीतर सूचना भिजवाई कि यदि राणा को जीवित देखना चाहते हो तो पद्मिनी को मुझको सौंप दो। प्रारंभ में तो सारी घटना की सूचना राजदरबारियों तक सीमित रही,  पर वहां तक ही यह सूचना कब तक सीमित रह सकती थी। अंतत: वीरांगना रानी पदमिनी को भी घटनाक्रम की जानकारी कुछ ही काल में हो गयी।

रानी ने किया षडय़ंत्र का वीरता के साथ सामना

अब वीरांगना पद्मिनी को निर्णय करना था कि वह क्या करेगी और उसे अपने और देश के सम्मान को बचाकर राणा के प्राणों की रक्षा कैसे करनी है? रानी चिंता में डूब गयी, पर शीघ्र ही उसे अपनी समस्या के समाधान की एक युक्ति सूझ गयी।

अपनी युक्ति को फलीभूत करने के लिए रानी ने चित्तौड़ के दरबार के दो अत्यंत साहसी और अदम्य शौर्य के लिए प्रसिद्घ गोरा एवं बादल नामक दो योद्घाओं के साथ विचार-विमर्श किया। इन दोनों वीरों ने भी समझ लिया कि जिस जटिल परिस्थितियों में आज चित्तौड़ का सम्मान फंसा खड़ा है, उससे देश का गौरव जुड़ा है। अत: इस जटिल परिस्थिति से निकलने के लिए प्राणों की बाजी लगाकर कार्य करने के क्षण आ उपस्थित हुए हैं। इसलिए गोरा बादल एवं रानी ने गुप्त योजना बनायी कि रानी अलाउद्दीन की सेवा में जाने के लिए तैयार है, ऐसा संदेश सुल्तान के शिविर में भिजवा दिया जाए। इस संदेश के साथ शर्त यह भी रहेगी कि रानी अपनी राजपूत सहेलियों को लेकर आएगी और रानी या उसके साथ आने वाली किसी सहेली की डोली को कोई मुस्लिम सैनिक निरीक्षण आदि के लिए रोकेगा नही, क्योंकि इससे रानी की गरिमा को ठेस लगेगी।

अलाउद्दीन खिलजी फंस गया जाल में

अलाउद्दीन खिलजी के पास जब यह संदेश गया तो वह प्रसन्न्ता में इतना झूम उठा कि सारी बातों के लिए उसने अपनी स्वीकृति रानी की इच्छानुसार यथावत प्रदान कर दी।

रानी ने अपने दोनों सेनापतियों के साथ योजना बना ली थी कि रानी और उसकी सहेलियों की डोलियों में (पालकियों में) सशस्त्र राजपूत सैनिकों को बैठाया जाए। पालकियों को कंधे पर उठाकर चलने वाले कहारों के स्थान पर छह-छह सैनिक उठाकर चलेंगे, जिनके शस्त्र पालकी के भीतर रखे होंगे। रानी शिविर में पहुंचने के पश्चात राजा से अंतिम बार  मिलने की याचना खिलजी से करेगी और राजा से मिलकर उसे सारी योजना से अवगत कराते हुए छुड़ाने का कार्य संपादित करेगी। अवसर मिलते ही सैनिक राजा को अपनी पालकी में बैठाकर वहां से चल देंगे और पालकियों के भीतर छिपे सैनिक और कहारों के रूप में चल रहे योद्घा मिलकर तातार सेना के प्रतिरोध का सामना करेंगे। इस सारी योजना को सिरे चढऩे का नेतृत्व गोरा एवं बादल को सौंपा गया। इन दोनों को किले की सुरक्षा का दायित्व दिया गया।

कार्य योजना को दिया गया मूत्र्त रूप

कर्नल टॉड हमें बताते हैं कि नियत दिन को सही समय पर सात सौ बंद पालकियां चित्तौड़ से निकलकर बादशाह के शिविर की ओर रवाना हुई। प्रत्येक की में छह छह कहार थे, और वे अपने वस्त्रों में लडऩे के लिए हथियार लाये थे। उन पालकियां में चित्तौड़ के शूरवीर सशस्त्र राजपूत बैठे थे। चित्तौड़ से निकलकर ये पालकियां बादशाह के शिविर के सामने पहुंच गयीं। बादशाह ने शिविर में आने के लिए एक बड़ा शिविर लगा दिया था, और उस शिविर के चारों ओर एक द्वार बनाकर कनातें लगा दी गयी थीं। एक-एक करके सभी पालकियां उस शिविर के भीतर पहुंच गयीं।’’

रानी को मिला राणा से मिलने का समय

रानी के अनुरोध पर अलाउद्दीन ने उसे राणा से अंतिम भेंट करने के लिए आधा घंटे का समय दिया। राणा को शिविर में रानी से मिलने की व्यवस्था करायी गयी। तभी एक राजपूत ने पालकी के भीतर से झांककर राणा को संकेत से अपनी पालकी की ओर आने को कहा। राजा पालकी के निकट आया तो उसे पालकी में भीतर बैठाकर पालकी के कहार  उठाकर चित्तौड़ की ओर चल दिये। उसके साथ कुछ और पालकियां भी चल दीं। शेष पालकियां शिविर के भीतर ही रहीं। निर्धारित समय के बीत जाने पर भी राणा के शिविर से न लौटने पर अलाउद्दीन  को बड़ा क्रोध आया और वह राणा को शिविर से पुन: कैद में डालने के उद्देश्य से स्वयं ही शिविर में प्रवेश कर गया। उसके साथ उसके बहुत से सैनिक भी थे। अलाउद्दीन को भीतर आता देखकर सशस्त्र राजपूतों ने उस पर आक्रमण कर दिया।

अलाउद्दीन को राज समझ में आ गया

अब अलाउद्दीन को ज्ञात हुआ कि वह अपने ही बुने जाल में स्वयं ही फंस चुका है। उसने अनुमान लगा लिया कि अब भारतीयों के पौरूष का सामना करने का समय आ गया है। अत: दोनों ओर भयंकर मारकाट आरंभ हो गयी। अलाउद्दीन को बचाने में उसके सैनिकों ने सफलता प्राप्त की। परंतु उससे भी बड़ी सफलता तो राणा के सैनिकों को मिल चुकी थी, जो अपने राजा को पालकी में बैठाकर सुरक्षित बाहर ले जाने में भी सफल हो गये थे। अलाउद्दीन के सैनिकों ने कुछ देर पश्चात वस्तुस्थिति को समझ कर राजा की पालकी का पीछा किया। जब उन सैनिकों ने चित्तौड़ के पास जाकर राजा को घेरा तो पालकियों में बंद सैनिक और कहारों के वेश में चल रहे योद्घाओं ने उन तातार सैनिकों का सामना करते हुए उन्हें समाप्त कर दिया, और अपने राणा को सुरक्षित लेकर आगे चल दिये। कुछ दूरी पर राणा को चित्तौड़ से आये हुए एक विशेष घोड़े से चित्तौड़ की ओर दौड़ा दिया गया। गोरा बादल का संघर्ष

कुछ तातार सैनिकों ने राणा का पुन: पीछा किया और दुर्ग के द्वार पर उन तातार सैनिकों को गोरा बादल ने रोककर उनसे युद्घ किया। यद्यपि राणा इस समय तक दुर्ग में प्रवेश करने में सफल हो गये थे। कहते हैं कि बादल की अवस्था इस समय केवल 12 वर्ष की थी। पर उसने कितने ही यवनों को मृत्यु के घाट उतार दिया। युद्घ करते हुए ही गोरा को वीरगति प्राप्त हो गयी। बहुत से राजपूतों ने भी अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान दिया।

कर्नल टॉड कहते हैं-‘‘शिविर और सिंह द्वार पर जो कुछ हुआ, उसे देखकर अलाउद्दीन का साहस टूट गया। पद्मिनी को पाने के स्थान पर उसने जो कुछ पाया, उससे वह युद्घ को रोककर अपनी सेना के साथ दिल्ली की ओर रवाना हो गया।’’

अलाउद्दीन को पता चला गया वीरांगना-धर्म

अलाउद्दीन को ज्ञात हो गया कि वेदों के धर्म से संचालित भारत में अभी भी वीरांगना हैं, जो शत्रु के शिविर में जाकर अपनी वीरता, साहस और शौर्य का प्रदर्शन कर सकती है। रानी के शौर्य से अलाउद्दीन हतप्रभ रह गया।

गोरा की वीरांगना पत्नी

उधर गोरा की पत्नी की वीरता को भी कर्नल टॉड ने जिस प्रकार उल्लेखित किया है, वह भी कम रोमांचकारी नही है। कर्नल टाड ने कहा है-‘‘सैकड़ों जख्मों से क्षत विक्षत बालक बादल चित्तौड़ पहुंचा। उसके साथ गोरा नही था। यह देखते ही गोरा की पत्नी युद्घ के परिणाम को समझ गयी। उसने अपने गंभीर नेत्रों से बादल की ओर देखा। उसकी सांसों की गति तीव्र हो चुकी थी। वह बादल के मुंह से तुरंत सुनना चाहती थी कि बादशाह के सैनिकों के साथ उसके पति गोरा ने किस प्रकार वीरता से युद्घ किया और शत्रुओं का संहार किया। वह बादल के कुछ कहने की प्रतीक्षा न कर सकी, और उतावलेपन के साथ उससे पूछ बैठी बादल युद्घ का समाचार सुनाओ? प्राणनाथ ने आज शत्रुओं से किस प्रकार युद्घ किया? बादल में साहस था, उसमें बहादुरी थी। अपनी चाची गोरा की पत्नी को उत्तर देते हुए उसने कहा-‘‘चाचा की तलवार से आज शत्रुओं का खूब संहार हुआ सिंह द्वार पर डटकर संग्राम हुआ। चाचा की मार से शत्रुओं का साहस टूट गया। बादशाह के खूब सैनिक मारे गये। शिशौदिया वंश की कीर्ति को अमर बनाने के लिए शत्रुओं का संहार करते हुए चाचा ने अपने प्राणों की आहुति दी।’’

बादल के मुंह से इन शब्दों को सुनकर गोरा की स्त्री को असीम संतोष मिला। क्षण भर चुप रहने के पश्चात बादल के सामने और कुछ न कहने पर उसने तेजी के साथ-‘‘अब मेरे लिए देर करने का समय नही है। प्राणनाथ को अधिक समय तक मेरी प्रतीक्षा नही करनी पड़ेगी। यह देखकर वीरांगना गोरा की पत्नी ने (पहले से ही तैयार की गयी) जलती हुई चिता में कूदकर अपने प्राणों का अंत कर दिया।’’

इसे कहते हैं अद्भुत शौर्य। एक साथ हमारे पास कितने हीरे हैं-रानी पद्मिनी हैं, गोरा है, बादल है, गोरा की पत्नी है, रानी के साथ गये सात सौ सशस्त्र सैनिकों और सात सौ पालकियों के छह-छह कहारों के रूप में वीर योद्घा हैं। सबका लक्ष्य एक था-राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा, अपने धर्म की रक्षा, अपने सम्मान की रक्षा करना। ऐसा अदभुत शौर्य एवं पराक्रम विश्व के किसी अन्य देश में देखने को नही मिलेगा कि जहां बारह वर्ष के बच्चे ने भी किले की रक्षा करने के अपने दायित्व का इतनी उत्कृष्टता से पालन किया हो। सचमुच ये देश है-वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का………इस देश का यारो क्या कहना….ये देश है दुनिया का गहना….

चित्तौड़ गढ़ आज भी अपने वीर योद्घाओं और वीरांगनाओं की वीरता एवं बलिदान की साक्षी दे रहा है, इसीलिए यह दुर्ग हर हिंदू के लिए आज भी श्रद्घा का पात्र है, एक वीर मंदिर है, जहां शीश झुकाकर हर देशभक्त भारतवासी कृतकृत्य हो जाता है। यह घटना सन 1303 ई. की है।   

रानी पद्मिनी और उनकी हजारों वीरांगना सहेलियों का बलिदान

रानी पद्मिनी और उनकी हजारों वीरांगना सहेलियों का बलिदान



मेवाड़ की भूमि का कण-कण गोरा बादल और रानी पद्मिनी की वीरता का गुणगान आज लगभग सात सौ वर्ष पश्चात भी कर रहा है। वास्तव में इतिहास के नायक वही लोग हुआ करते हैं जिनके बलिदानों को और महान कार्यों को आने वाली पीढिय़ां स्वभावत: स्मरण रखें और बिना किसी दबाब के अपने नायक को अपनी श्रद्घांजलि अर्पित करने के अभ्यासी हों। हमारे प्रचलित इतिहास ने चाहे जितना ही अलाउद्दीन खिलजी को एक ‘नायक’ सिद्घ करने का प्रयास क्यों न किया हो, परंतु वह स्थानीय लोगों के लिए आज भी सम्मान का पात्र नही है, लोग आज भी अपने ‘नायकों’ को ही नमन करते हैं।

एक रोमांचकारी चित्रण

गोरा-बादल के युद्घ का एक रोमांचकारी और हृदयस्पर्शी चित्रण बी.एस. शेखावत ने करते हुए लिखा है-‘‘यों तो सभी राजपूत दिल खोलकर युद्घ में लड़ रहे थे, परंतु गोरा की बात ही निराली थी। भूखे सिंह की भांति गर्जना करता हुआ जिधर भी नंगी तलवार लेकर वह घुसता वहीं त्राहि-त्राहि मच जाती थी, यहां तक कि उसके रौद्ररूप को देखकर यवन सैनिकों को हाथों में  कंपन के कारण तलवारें नीचे गिर जातीं। वे सिंह के समक्ष बकरे की स्थिति में आ गये, वह वीरता का अवतार था। धीरे-धीरे राजपूत वीरगति को प्राप्त होते गये। लहुलुहान गोरा का सिर चकरा गया, और वह गश खाकर भूमि पर गिर गया। अपनी जन्मभूमि को याद करता हुआ हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया। धन्य है उसकी वीरता, स्वामी  भक्ति और कत्र्तव्यपरायणता। मेवाड़ का एक बहादुर शेर रक्त रंजित भूमि में लेट गया। मेवाड़ के अनेक बहादुर नक्षत्रों में से एक दैदीव्यमान नक्षत्र अस्त हो गया।’’

गोरा और गीता का ज्ञान

गोरा जैसे आत्मबलिदानियों के लिए गीता (32) का ये उपदेश युद्घभूमि में सदा ही मार्गदर्शक रहा है कि ‘‘हे पार्थ! ये युद्घ एक स्वर्गद्वार है, जो तेरे लिए अपने आप खुल गया है, क्योंकि तुम भाग्यवान हो।’’

इससे अगले श्लोक में कहा गया है-‘‘यदि तुम यह धर्म युद्घ नही लड़ोगे तो स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागीदार बनोगे (द्वितीय-अध्याय) इससे पूर्व श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं-अपने धर्म को देखो (दुष्ट आततायी शत्रु से प्रजा की रक्षा करना) भय करना कोई योग्यता नही है, धर्मयुक्त युद्घ से बढक़र दूसरा कोई कल्याणकारक कत्र्तव्य क्षत्रिय के लिए नही है। (31 द्वितीय अध्याय ) श्रीकृष्ण (गीता 37 द्वितीयोध्याय) यह भी कहते हैं कि-‘‘युद्घ करना तेरे लिए सब प्रकार से अच्छा है, क्योंकि मर कर या तो स्वर्ग में जाएगा या युद्घ जीतकर पृथ्वी को भोगेगा। इसलिए हे पार्थ! युद्घ के लिए निश्चय के साथ खड़ा हो।’’

गोरा ने गीता के इस ज्ञान को मानो हृदयंगम कर लिया था, उसकी राष्ट्रभक्ति मचल रही थी, वह आज आततायी को कठोर से कठोर दण्ड देकर भारतीयों की तलवार का लोहा मनवा देना चाहताा था। अत: पूर्णत: अदम्य साहस और शौर्य के साथ उसने युद्घ किया और वीरगति प्राप्त कर स्वर्ग का अधिकारी बना।

यही स्थिति उसकी पत्नी की थी। उस वीरांगना ने वेद धर्म के अनुसार अपने वीरपति की वीरगति पर हर्ष व्यक्त किया और जब वह पूर्णत: आश्वस्त हो गयी कि पतिदेव ने प्राणों की तनिक भी परवाह न करते हुए युद्घ किया और वीरगति प्राप्त की है, तो उसने धर्म की रक्षार्थ स्वयं को अग्नि के समर्पित करने में भी देरी नही की।

अत्याचारों की लगा दी झड़ी

अलाउद्दीन अपने आप में एक अत्यंत क्रूर सुल्तान था। उसने अपनी क्रूरता का परिचय अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन की हत्या करके भी दिया था, परंतु हिंदुओं के प्रति तो उसकी क्रूरता और भी निदंनीय और घृणास्पद स्तर की थी। इलियट एण्ड डाउसन ग्रंथ 3 के पृष्ठ संख्या 164-165 से हमें ज्ञात होता है कि-‘‘हत्यारों की पत्नियों का अपमान करके उनके साथ भयंकर दुव्र्यवहार किया जाए, (ऐसी आज्ञा अलाउद्दीन के संकेत को समझकर उसके सेनापति नुसरतखां ने अपने भाई की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए गुजरात अभियान के समय दी थी) तदुपरांत उन लोगों को दर-दर भटकने वाली वैश्या बनाने के लिए दुष्ट पुरूषों को सौंप दिया जाए। उसने बच्चों को उनकी माताओं के सिर पर रखकर कटवा डाला। इस  प्रकार का अपमान किसी भी धर्म या मत में कभी नही हुआ है।’’

इस दृश्य को देखकर बरनी जैसे मुस्लिम इतिहासकार को भी दुखी होकर लिखना पड़ा-‘‘इस्लाम को छोडक़र किसी अन्य धर्म में मातृत्व का ऐसा अपमान कभी नही हुआ। लाखों नागरिकों की आंखों के सामने खुले मैदान में उनके सिर पर उनके बच्चों को रखकर काट डालना।’’ ऐसी वीभत्स बर्बरता के विषय में पी.एन. ओक लिखते हैं कि ऐसा करना केवल अलाउद्दीन या नुसरत खां की ही विशेषता नही थी, अपितु हिंदुस्तान के मुस्लिम शासन काल के हजार वर्षों में से एक दिन भी ऐसा नही आया जब दिन में सूर्य ने तथा रात्रि में तारों ने इन पाशविक अत्याचारों को न देखा हो। (संदर्भ भारत में मुस्लिम सुल्तान, भाग 1 पृष्ठ 230)

इतने असीम कष्टों को झेलने वाले और झेलकर भी अपने धर्म को न त्यागने वाले हमारे पूर्वजों के साहस को शत-शत नमन।

नुसरत खां को मौत की नींद सुलाया था-रणथम्भौर ने

रणथम्भौर की वीरता का उल्लेख हम पूर्व पृष्ठों पर करके आये हैं। 1301 में जब अलाउद्दीन ने रणथम्भौर का पुन: घेराव किया तो नुसरत खां ने किले की प्राचीर पर चढऩे के लिए किले की दीवार के साथ मिट्टी का ऊंचा टीला बनाने का प्रयास किया, जब नुसरत खां अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के दृष्टिकोण से किले के निकट आया, तब हमारे देशभक्त हिंदू सैनिकों ने उस धर्मभ्रष्ट सेनापति से उसके सारे  पापों का प्रतिशोध लेते हुए दुर्ग से एक विशाल चट्टान लुढक़ा कर उसका अंत कर दिया।  कहते हैं कि नुसरत खां दो दिन मूचर््िछत रहकर संसार से चला गया।

हिंदू वीरों के ऐसे उल्लेखनीय वीरतापूर्ण कृत्यों से लोगों में उत्साह उत्पन्न होता रहता था। एक ऊर्जा मिलती थी और लोग और अधिक साहस से अपने लक्ष्य के प्रति कार्य करने की प्रेरणा लेते थे।

लालकिला तब भी था

भारत की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है लालकिला। इस दुर्ग के निर्माण का श्रेय मुगल बादशाह शाहजहां को दिया जाता है। परंतु ‘तारीखे फिरोजशाही’ का लेखक (इलियट एण्ड डाउसन, गं्रथ-3 पृष्ठ 160) हमें बताता है कि-‘‘1296 ई. के अंत में अलाउद्दीन ने एक बड़ी सेना लेकर बड़ी भव्यता के साथ दिल्ली में प्रवेश किया। वह लालभवन (लालकिला) की ओर बढ़ा, जहां उसने निवास किया।’’

1296 ई. में दिल्ली में कोई लालभवन या लालकिला कहीं अन्य होने का कोई प्रमाण नही है। इसलिए वर्तमान लालकिले के निर्माण का श्रेय शाहजहां को दिया जाना पूर्णत: अतार्किक है।

चित्तौड़ पर पुन: आक्रमण

चित्तौड़ ने भारत के गौरव को बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई है। इस राजवंश के राणा भीमसिंह और उनकी पत्नी पद्मिनी के विषय में पूर्व में हम उल्लेख कर चुके हैं कि रानी को  लेने के लिए अलाउद्दीन ने यद्यपि हर प्रकार का छलबल अपनाया परंतु वह अपनी योजना में सफल नही हो सका। अंत में  उसे लज्जित होकर दिल्ली लौटना पड़ गया। अलाउद्दीन खिलजी को इस पराजय से उपजे अपमान भाव ने जीने नही दिया और वह पुन: चित्तौड़ पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा। वह शीघ्र ही अपने अपमान का प्रतिशोध लेना चाहता था।

अंत में उसके लिए वह क्षण आ ही गया कि जब चित्तौड़ विजय के लक्ष्य को दृष्टिगत करते हुए वह एक विशाल सेना के साथ दिल्ली से चित्तौड़ के लिए चल दिया। फरिश्ता के अनुसार दूसरी बार तातार सेना के चित्तौड़ में पहुंचते ही एक भयानक आतंक छा गया। कर्नल टॉड लिखते हैं कि चित्तौड़ में शूरवीर पहले युद्घ में ही बहुत बड़ी संख्या में समाप्त हो गये थे, इसलिए अब नई सेना का संगठन करना कठिन कार्य था। पर वीर सामंतों ने और सरदारों ने वीरता के साथ युद्घ की तैयारियां करनी आरंभ कर दीं।

राणा के पुत्र ने किया युद्घ का संचालन

इस बार के युद्घ में चित्तौड़ के राणा के ज्येष्ठ पुत्र अरिसिंह ने युद्घ क्षेत्र में जाकर सेना का संचालन करने का निर्णय लिया। अरिसिंह एक वीर और साहसी राजकुमार था, तो स्वराष्ट्र की रक्षार्थ विदेशी आक्रांता से भिडऩा अपने लिए सौभाग्य की बात मानता था। इसलिए उसने सुल्तान की सेना का सामना युद्घ क्षेत्र में किया।

कहा जाता है कि इस बार तीन दिन तक हिंदू वीर राजपूतों और विदेशी आक्रांता सेना के मध्य भयंकर युद्घ हुआ। कोई सा भी पक्ष पीछे हटने का नाम नही लेता था। राजपूतों के लिए युद्घ प्रतिष्ठा का प्रश्न था, उन्हें पराजय किसी भी मूल्य पर स्वीकार नही थी। यही स्थिति अलाउद्दीन की थी। वह यह भी जानता था कि यदि इस बार पराजय मिल गयी तो पुन: कभी चित्तौड़ पाने की इच्छा पूर्ण नही हो पाएगी, और अपमान का प्रतिशोध लेने का उसका सपना या संकल्प भी पूर्ण नही हो पाएगा। अत: तातार सेना भी युद्घ को येन केन प्रकारेण जीत लेना चाहती थी। उसके यहां भी पराजय के लिए इस बार कोई स्थान नही था।

राजकुमार ने प्राप्त की वीरगति

युद्घ के चौथे दिन एक दुर्भाग्य पूर्ण घटना घटित हुई। राजकुमार अरिसिंह युद्घ करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया। यह हिंदू सेना  के लिए एक वज्रपात के समान हुई घटना  थी। जिससे सैन्यदल को आघात लगा। परंतु उसके उपरांत  भी हमारे कुशल रणनीतिकारों ने व्यवस्था को संभाला और अरिसिंह के अनुज अजय सिंह ने स्वयं को युद्घ के लिए प्रस्तुत कर दिया। कहते हैं कि अजय सिंह से राणा भीमसिंह का अनुराग अधिक था, इसलिए वह उसे युद्घभूमि में भेजने के पक्षधर नही थे। फलस्वरूप राणा ने अजय सिंह के लघु भ्राताओं को युद्घ के लिए भेजना उचित समझा। राणा ने समय को पहचाना नही, वह युद्घ संचालन में अक्षम और अनभिज्ञ राजकुमारों को भेजता रहा और राजकुमार अपना बलिदान देकर अपनी राष्ट्रभक्ति का परिजय देते रहे, पर विजयश्री नही मिली। कहते हैं कि राणा के कुल ग्यारह लडक़े युद्घ भूमि में शत्रु से युुद्घ  करते-करते बलिदान हो गये। अजय सिंह ही शेष रहा।  अंत में राणा भीमसिंह ने युद्घ में स्वयं जाने का निर्णय लिया।

अंत में राणा भीमसिंह ने किया युद्घ

राणा भीमसिंह के युद्घ में जाने का अभिप्राय था कि युद्घ आज आर-पार का होना था, आज या तो युद्घ का निर्णय विजय श्री के साथ चित्तौड़ के पक्ष में आना था, या शत्रु के पक्ष में जाना था। इसलिए पूरी तत्परता से और पूर्ण मनोयोग से राणा युद्घ के लिए निकले।

जब राणा युद्घ के लिए प्रस्थान कर रहे थे, तभी किले की वीरांगनाओं ने विशाल चिता जलाने के लिए सामग्री एकत्र कर ली। किले के मध्य में जौहर की होली सजने लगी। कर्नल टॉड ने लिखा है:-‘‘चित्तौड़ में राणा भीमसिंह एक ओर युद्घ में जाने की तैयारी कर रहे थे, तो दूसरी ओर महलों में जौहर व्रत पालन की व्यवस्था हो रही थी। रानियों और राजपूत बालाओं ने इस बात को समझ लिया था कि चित्तौड़ पर भयंकर संकट आ गया है, और चित्तौड़ की स्वतंत्रता के नष्ट होने के समय राजपूत रमणियों को अपने सतीत्व एवं स्वातंत्रय को सुरक्षित रखने के लिए जौहर व्रत का पालन करना है। चित्तौड़ की पुरानी प्रणाली के अनुसार शत्रु के आक्रमण करने पर जब राज्य की रक्षा का कोई उपाय न रह जाता था, तो सहस्रों की संख्या में राजपूत बालाएं जौहर व्रत का पालन करती हुई एक साथ आग की होली में बैठकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करती थीं। उसी जौहर व्रत की तैयारी इस समय आरंभ हुई।

आ गयी रानी पद्मिनी की परीक्षा की घड़ी

आज रानी पद्मिनी के लिए भी परीक्षा की घड़ी आ गयी थी। वैसे उस शेरनी वीरांगना के लिए जौहरव्रत को परीक्षा की घड़ी कहना उसकी वीरता और दृढ़ इच्छा शक्ति का अपमान करना होगा, क्योंकि रानी इससे भी कठिन परीक्षा से पूर्व में निकल चुकी थी। जब वह अपने प्राणनाथ राणा भीमसिंह को अलाउद्दीन खिलजी के शिविर से सुरक्षित निकालकर लाने में सफल हुई थी। आज का जौहर रानी को अपने लिए कहीं अधिक सुरक्षित लग रहा था। इसलिए रानी ने आज अपने प्राणनाथ राणा भीमसिंह को देश रक्षा के लिए अंतिम विदाई दी और स्वयं सखियों के साथ जौहर का मंगल गान गाने लगी।

अदभुत शौर्य के क्षण थे वह

अदभुत शौर्य  और अनुपम वीरता के क्षण थे चित्तौड़ के लिए जब राणा युद्घ क्षेत्र में मरने के लिए किले से बाहर निकले और आज उनका लक्ष्य केवल या तो विजय श्री का वरण करना था या उसकी खोज में सीधे स्वर्गलोक में पहुंच जाना था। उससे भी बड़ी बात थी कि रानी आज अपनी सहेलियों के साथ मिलकर अपने ग्यारह पुत्रों की मृत्यु पर शोक में रूदन न करके पति को युद्घ के लिए प्रसन्नता से भेजकर स्वयं सखियों के साथ वैसे ही मंगलगान करती जा रही थीं, जैसे कुछ सहेलियां अपनी किसी सहेली को श्वसुरालय (ससुराल) भेजने के समय मंगलगान गाया करती हैं। है किसी देश की नारियों की इतनी वीरतापूर्ण कहानियां, जिनमें हर क्षण और हर कण से केवल वीर रस टपकता है और वही वीर रस किसी समाज या देश की युवा पीढ़ी के लिए अमृत रस बन जाता है, जो उसे सदियों तक के लिए जीवन प्रदान करता है।

कर्नल टॉड ने किया है रोमांचकारी वर्णन

कर्नल टॉड ने रानी और उसकी सखियों के द्वारा जौहर के लिए प्रस्थान करने के क्षणों को बड़े ही रोमांचकारी शब्दों में वर्णित किया है। वह लिखते हैं-‘‘राजप्रासाद के मध्य में पृथ्वी के नीचे भीषण अंधकार में एक लंबी सुरंग थी। दिन में भी उस सुरंग में भयानक अंधकार रहता था। इस सुरंग में बहुत सी लड़कियां पहुंचाकर चिता जलाई गयी। उसी समय चित्तौड़ की रानियां, राजपूत बालाएं और सुंदर युवतियां अगणित संख्या में प्राणोत्सर्ग करने के लिए तैयार हुईं। सुरंग के भीतर आग की लपटें तेज होने पर वे सभी बालाएं अपने बीच में पद्मिनी को लेकर सत्य सतीत्व और स्वाधीनता के महत्व के गीत (एक विदेशी जिन्हें सत्य, सतीत्व और स्वाधीनता के गीत कहता है, पर हमारे इतिहास में उन्हें हमारी कायरता के रूप में प्रदर्शित कर दिया है) गाती हुई सुरंग की ओर चलीं। सुरंग में प्रवेश करने के लिए नीचे उतरने लगीं। सीढिय़ों के भीतर जाने पर भयानक आवाज के साथ लोहे का बना हुआ सुरंग का मजबूत दरवाजा बंद हुआ और कुछ क्षणों के भीतर हजारों राजपूत बालाओं के शरीर सुरंग की प्रज्ज्वलित आग में जलकर ढेर हो गये।’’

‘‘स्वाधीनता की इतनी बड़ी साधना

किस देश ने की है ऐसी उपासना,

कोई इतिहास का एक पृष्ठ तो उठाये,

इतिहास की एक पंक्ति पढक़र सुनाये,

हर पंक्ति में मिलेंगे स्वर्ण के ढेर,

पढ़ेगी पीढ़ी तो युवा बनेंगे शेर।’’

राणा भीमसिंह को अपनी और चित्तौड़ की स्वाधीनता की अब कोई आशा नही रह गयी थी, इसलिए अंतिम प्रस्थान से पूर्व वीरता का इतना बड़ा रोमांचकारी तांडव रचा गया था। जब सुरंग का लौहद्वार बंद हो गया, तो राणा को अपनी चित्तौड़ की अस्मिता के प्रति निश्चय हो गया कि यदि उनके उत्सर्ग के पश्चात शत्रु सेना दुर्ग में प्रवेश भी कर गयी तो उसे यहां कोई नही मिलेगा और शत्रु से हमारे सम्मान की रक्षा हो जाएगी।

घटना को लें सही संदर्भ में

घटना को सही संदर्भ में लिया जाए तो पता चलता है कि निज धर्म, स्वतंत्रता और आत्म सम्मान की सुरक्षा उस समय हमारे देशवासियों के लिए पहली प्राथमिकता हो गयी थी, इसलिए प्रत्येक नर-नारी इनके लिए ही संघर्ष कर रहा था। यदि इनके लिए प्राणोत्सर्ग भी करना पड़े तो वह उससे पीछे नही हटता था। प्राणों से खेलना हमारा राष्ट्रधर्म बन गया था। इसके लिए देश की वीरांगनाओं ने आपात जौहर धर्म का अत्यंत हृदय स्पर्शी मार्ग अपनाया, जो विश्व इतिहास की एक अनूठी और रोमांचकारी परंपरा है। इस परंपरा में वीरता और देशभक्ति की पराकाष्ठा है।

यह कितना रोमांचकारी दृश्य है कि जिस राजा के ग्यारह पुत्र युद्घ की बलि चढ़ गये हों, हजारों की संख्या में आज वीर सैनानी बलिदान हो चुके हों, परिवार की महिलाएं ‘जौहर धर्म’ से आंखों के सामने अपनी जीवन लीला समाप्त कर रही हों, वह राजा आज भी शोक, पश्चाताप या शत्रु से संधि की बात नही कर रहा है, शत्रु को कुछ मनोवांछित वस्तुएं देकर विदा करने की बात नही कर रहा है, शत्रु के धर्म को अपनाने की बातें नही कर रहा है। वह बातें कर रहा है देशभक्ति की और देशभक्ति एवं स्वाधीनता की रक्षार्थ आज अंतिम युद्घ कर स्वर्गारोहण की। देशभक्ति और स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव भी पराकाष्ठा थी यह। विश्व इतिहास के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब शासक थोड़ी सी विषमताओं में घिरा तो उसने शत्रु के सामने समर्पण कर दिया। पर यहां समर्पण नही था, यहां आत्मोत्सर्ग था, बलिदान था, देशभक्ति थी और वीरता थी।

राणा के जितने सामंत और सरदार बचे थे सबने युद्घ के लिए प्रस्थान किया, आज वह अपने जीवन का अंतिम युद्घ करने के लिए निकले थे-एक बलिदानी जत्थे के रूप में। उनके जीवन का ही नही अपितु अलाउद्दीन की सेना के साथ चित्तौड़ का ही यह अंतिम युद्घ सिद्घ होने वाला था, जिसके लिए स्वतंत्रता के ये दीवाने चल दिये थे सिर पर केसरिया साफा बांधकर।

रानी पद्मिनी अपनी हजारों सहेलियों के साथ अपना बलिदान दे चुकी थी। वह इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ बन चुकी थी, चित्तौड़ की मर्यादा के अनुसार उसने राष्ट्र सेवा की। उन सारी वीरांगनाओं को हमारा शत्-शत् नमन।

गौभक्तों का हुतात्मा दिवस : 7 नवंबर

गौभक्तों का हुतात्मा दिवस : 7 नवंबर


देश के गौभक्तों ने विगत 7 नवंबर को जंतर मंतर पर उन गौभक्त हुतात्माओं को बड़ी संख्या में पहुंचकर श्रद्घांजलि अर्पित की, जो 7 नवंबर 1966 को तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार के गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा की पुलिस की निर्दयी गोलियों के शिकार हो गये थे और असमय ही हमारे मध्य से चले गये थे। सचमुच वह दिन भारतीय लोकतंत्र का एक काला दिन था, जब इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ और भारत के लोगों की असीम श्रद्घा और सम्मान की पात्र गौमाता के भक्तों को अपनी ही सरकार की गोलियों से भून दिया गया था। जिस देश में 1857 की क्रांति में हमारे कितने ही सैनिक इसलिए सम्मिलित हो गये थे कि उन्हें जो कारतूस दिये जाते थे उनमें कहीं गोमांस का प्रयोग किया जाता था। जब हमारे गोभक्त सैनिकों को ज्ञात हुआ कि इन कारतूसों को मुंह से खोलने से हमारा धर्मभ्रष्ट हो रहा है तो वे सशस्त्र क्रांति का एक अंग बनकर उठ खड़े हुए और विश्व को यह अनुभव करा दिया कि भारत के सैनिकों के लिए गौमाता कितनी आदरणीया है।


पर जब 1966 में लगभग एक शताब्दी का लंबा मार्ग हमने (1857 के पश्चात) पूर्ण किया तो स्थिति में परिवर्तन आ गया। गौ विरोधी राष्ट्रद्रोही मानसिकता के लोग सत्तासीन हुए और धर्मनिरपेक्ष (धर्मभ्रष्ट) बनकर गौभक्तों पर हमारे ही सैनिक गोली चलाने लगे। एक शताब्दी में हमने यही सीखा और इसी सीख के साथ 7 नवंबर 1966 को गौभक्तों की हत्या करके 1857 के ‘गौभक्त सैनिकों’ को हमारे ‘गौद्रोही पुलिसिया विभाग’ ने अपनी ‘श्रद्घांजलि’ अर्पित की।


हमें 7 नवंबर को केवल 1966 ई. में हुए शहीदों को अपने श्रद्घासुमन अर्पित करने का दिवस ही नही मानना चाहिए, अपितु इसे आज तक के सभी गौभक्तों का ‘हुतात्मा दिवस’ घोषित किया जाना चाहिए। गौभक्तों की मौन बलिदानी परंपरा आज भी जारी है और बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि अधिकारी, व्यापारी और कसाई की तिक्कड़ी के चलते कितने ही गौभक्त प्रतिवर्ष अपना सर्वोकृष्ट बलिदान गौमाता की रक्षा के लिए दे देते हैं। उनका यह बलिदान यूं ही व्यर्थ चला जाता है। ना कोई द्वीप जलता है और न उनकी स्मृतियों पर कोई एक पुष्प चढ़ता है। इतनी उपेक्षा संभवत: किसी भी देश के बलिदानियों की नही होती होगी जितनी भारत में होती है। विगत 7 नवंबर को हजारों गौभक्तों ने जंतर मंतर पर एक साथ पुन: एकत्र होकर अपनी एकता का परिचय दिया है और अपने गौभक्त हुतात्माओं के बलिदान को अर्थपूर्ण बनाने की दिशा में एक ठोस और सकारात्मक पहल की है। हमें आशा करनी चाहिए कि सर्वदलीय गोरक्षामंच, हिंदू महासभा, आर्यसमाज और अन्य कितने ही हिन्दूवादी संगठन गौ के लिए एक मंच पर आएंगे और इस आंदोलन को नये आयामों तक पहुंचाएंगे।


1976ई. में स्व. श्रीवेणीशंकर मु. वासु ने एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था-‘‘कहां गयी गोचर भूमि’’। लेख बड़ा तथ्यपरक और मार्मिक था, जो आज भी हमारी सरकार और हमारे देश वासियों की उस सामूहिक चेतना को झंकृत करने की सामथ्र्य रखता है, जो इस समय गाय के विषय में पूर्णत: उदासीन है, या मर चुकी है। विद्वान लेखक का उस समय का आंकलन था-जो देश स्वयं को उद्योग प्रधान कहलाते हैं, और जिनके उद्योगों को भी भारत के कृषि उत्पादों पर आधारित रहना पड़ता है, वे भी अपने पशुओं के लिए और उनके परिपालन की ओर ध्यान देते हैं और संभव हो तो उतनी ज्यादा जमीन में चरागाह रखते हैं। ब्रिटेन खुद के लिए अनाज आयात करके भी और जापान रूई आयात करके भी चरागाहों को सुरक्षित रखते हैं। क्योंकि उनको चरागाहों और पशुओं का महत्व समझ में आया है।


इंग्लैंड हरेक पशु के लिए औसतन 3.5 एकड़ जमीन चरने के लिए अलग रखता है। जर्मनी 8 एकड़, जापान 6.7 एकड़ और अमेरिका हर पशु के लिए औसतन 12 एकड़ जमीन चरनी के लिए अलग रखता है। इसकी तुलना में भारत में एक पशु के लिए चराऊ जमीन 1920 ई. में 0.78 एकड़ अर्थात अनुमानित पौना एकड़ थी। (संदर्भ : एग्रीकल्चरल स्टेटिस्टिक्स ऑफ इंडिया 1920-21 खण्ड-1) अब यह संख्या घटकर प्रति पशु 0.09 एकड़ हो गयी है। अर्थात अमेरिका में 12 एकड़ पर एक पशु चरता है, जबकि अपने यहां एक एकड़ पर 11 पशु चरते हैं। (संदर्भ : इंडिया 1947 पेज 172-187) मात्र एक वर्ष में अपने यहां साढ़े सात लाख एकड़ जमीन पर के चरागाहों का नाश कर दिया गया। 1968 में चराऊभूमि 3 करोड़ 32 लाख 50 एकड़ थी जो 1969 ई. में घटकर तीन करोड़ 25 लाख एकड़ हो गयी। (संदर्भ : इंडिया 1947 पेज 172) और अगले पांच वर्षों में अर्थात 1974 में वह घटकर तीन करोड़ 22 लाख 50 हजार एकड़ रह गयी। इस प्रकार केवल छह वर्षों में दस लाख एकड़ गोचर भूमि का विनाश हुआ।


इसके पश्चात आज की स्थिति ये है कि देश के अधिकांश गांवों में गोचर भूमि को खोजना भी अत्यंत कठिन है। ‘‘जो भूमि सरकारी (सार्वजनिक) है वह भूमि हमारी है’’- इस कुसंस्कार को आधार वाक्य बनाकर कार्य करने की प्रतिस्पद्र्घा यहां सरकारों में और लोगों में उत्पन्न हुई और देखते ही देखते सारी गोचर भूमि लुप्त हो गयी। अभिलेखों में गोचर भूमि का उल्लेख मिल सकता है, परंतु स्थल पर भी वह गोचर भूमि स्थित हो यह आवश्यक नही है। जैसे देश के तालाबों को देश प्रदेश के राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने मोटी धनराशि ले लेकर अवैध अतिक्रमण करा-करा के लोगों को उन पर बसाकर समाप्त प्राय: कर दिया है उसी प्रकार गोचर भूमि भी देश में समाप्त कर दी गयी है।


इस स्थिति के लिए उत्तरदायी कौन है? यह प्रश्न भी बड़ा ही समसामयिक और उचित है। हमारा मानना है कि इसके लिए सरकार की वह सोच उत्तरदायी है जिसके परिणाम स्वरूप गौ को केवल एक पशु माना गया और ऐसी नीतियों का निर्धारण किया कि गोवंश का नाश किया जा सके। गोमांस के निर्यात से होने वाली ‘आय’ और उससे मिलने वाला ‘कमीशन’ तो मंत्री जी को दीखता रहा, पर देश की विनष्ट होती अर्थव्यवस्था की ओर उसका ध्यान नही गया।


देश में नीतियां बनायी गयीं और अनीतियां लागू की गयीं। बीते 67 वर्षों में देश की सरकारी कार्यप्रणाली का यदि सूक्ष्मता से निरीक्षण, परीक्षण और समीक्षण किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलेगा। जैसे गाय के वंश के संवर्धन की योजनाएं बनायीं गयीं तो दिखाया यह गया कि जैसे हम गोसंवर्धन की बात कर रहे हैं। पर जब 1954 ई. में संबंधित कानून लागू किया गया तो उसमें ‘चोर दरवाजा’ यह कहकर छोड़ दिया गया कि यदि गोवंश अनुपयोगी है, बूढ़ा है, दूध नही दे रहा है, तो देश में चारे की कमी के कारण उसका वध किया जा सकता है। इसी चोर दरवाजे से आज तक गाय वंश का विनाश किया जा रहा है। इसी प्रकार देश में किसानों के नाम पर, कृषि विकास के नाम पर योजनाएं बनती हैं, पर उन्हें जब लागू किया जाता है तो वहां भी हमारे हाथ अनीति ही आती है। ऐसी बातों को देखकर एक सज्जन ने एक अपनी पुस्तक का नाम रखा-‘‘धूत्र्तों के देश में और मूर्खों के राज में’’।


हमने 16 बार आम चुनाव करा लिये हैं। कहने का अभिप्राय है कि 16 बार हमें गौभक्त और गौवंश विध्वंसकों के मध्य चुनाव करने का अथवा नीतियों के नाम पर अनीतियों को लागू करने वालों को दंडित करने का अवसर मिला, पर हमने अवसरों को पहचानने का प्रयास नही किया। अवसर आते रहे और हमारे सिर के ऊपर से जाते रहे। इसके उपरंात भी हम अपने आपको विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र मानते हैं, और उस पर गर्व करते हैं। जबकि हमने परिपक्व लोकतंत्र का परिचय तो नही दिया।


इसी लोकतंत्र के चलते 7 नवंबर 1966 को देश में गौभक्तों पर सरकार की निर्मम गोलियां चलीं और देश की राजधानी के ‘राजपथ’ पर लोकतंत्र की सार्वजनिक हत्या कर दी गयी। उसी ‘हत्यारी सरकार’ को देश की जनता ने पुरस्कार देकर 1971 के आम चुनावों में पुन: सत्तासीन कर दिया। श्री वेणीशंकर जी का कहना है कि 1860 तक हमारे देश में चरनी में घास (बरसाती वनस्पतियों से अभिप्राय है) इतना ऊंचा उगता था कि यदि कोई घुड़सवार हाथ में भाला लेकर घोड़े पर आता था, तो वह घास में ढक जाता था। दूर से कोई उसे देख नही पाता था। आज की स्थिति ऐसी नही है। अधिकांश गांवों में जहां कहीं घास उगती है तो वह कुछ इंचों में ऊंची हो पाती है। इसका कारण ये है कि जंगल सीमित रह गया है और उसी चरान पर प्रतिदिन पशु चरने आते हैं, रात-रात में वह घास कितनी बढ़ सकती है? जिसे अभी शाम में ही पशु चरकर गये थे। एक और दुखद स्थिति है कि हम अब अपने घरों के बाहर कोई ऐसा कुण्ड या छोटी नॉद जैसी चीज नही बनाते या रखते हैं जिनमें पशुओं के लिए पानी भरा रह सके और पशु उन्हें जब चाहें प्रयोग कर सकें। इससे गायादि पशु प्यासे तड़पते देखे जा सकते हैं विदेशों ने भारत से कुछ सीखा है और उस सीख को उन्होंने  सुरक्षित रखा है, परंतु भारत ने उनसे इतना भी नही सीखा कि इन्होंने जो कुछ मुझसे सीखा है उससे ही मैं कुछ सीख लूं। विदेशों ने पशु पालन को एक सम्मानजनक व्यवसाय माना है, जबकि हमने तो पशुपालन और कृषि तक को एक ऐसा घृणास्पद व्यवसाय बना दिया है कि उसका नाम सुनकर ही लोग दूर हट जाते हैं। गौ पालन के स्थान पर ‘कुत्ता पालन’ का प्रचलन अवश्य बढ़ा है, और प्रात:काल उस कुत्ते को ‘बड़े साहब’ स्वयं शौचादि कराने ले जाते हैं। कुत्ता ‘बड़े साहब’ का ‘साहब’ है। क्योंकि ‘साहब’ को अपने कार्यालय में तो पानी पिलाने वाला भी एक व्यक्ति अलग होता है पर वही ‘साहब’ जब घर जाते हैं तो कुत्ते को शौच कराने ले जाते हैं। शर्म की बात पर शर्म नही आती और गर्व की बात (गौपालन) पर गर्व नही होता? हम कहां खड़े हैं। विचारणीय है।


आज हमें 7 नवंबर 1966 के दिन हुतात्मा हुए अपने वीरों की आत्मा से पूछना होगा कि आपके सपने क्या थे, और आप कैसा भारत निर्माण करना चाहते थे। केन्द्र में मोदी सरकार काम कर रही है, उससे बड़ी अपेक्षाएं लोगों को हैं। मोदी संस्कृति रक्षक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य भी कर रहे हैं इसलिए उन्हें 7 नवंबर को गौभक्त बलिदान दिवस के रूप में मनाने की घोषणा करनी चाहिए और इस दिन को विश्वोत्थान के लिए समर्पित करना चाहिए। क्योंकि गौमाता के दिव्य गुणों और लक्षणों के कारण गाय विश्व माता भी है। सर्वदलीय गोरक्षा मंच और समस्त गौ सेवी संस्थाएं इसी एक सूत्र पर कार्य करें कि हमें देश में गो संस्कृति को लागू कराके गौ आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाना है तो गौ विश्वमाता स्वयं ही बन जाएगी। इसके लिए सरकार अपनी व्यापक कार्यनीति जितना शीघ्र हो घोषित कर दे। 7 नवंबर के बलिदानियों के बलिदान की अब अधिक परीक्षा लेने की आवश्यकता नही है। अब मोदी जी उन्हें पुरस्कार दें और ‘भागीरथी’ को लाकर इन हुतात्माओं की आत्मा को शांति प्रदान करें। कार्य कठिन तो है पर असंभव नही।

नेहरू काल में ही लग गया था लोकतंत्र पर दाग

नेहरू काल में ही लग गया था लोकतंत्र पर दाग


बात पहले आमचुनावों की है। तब उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ मुस्लिम नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद पार्टी के प्रत्याशी थे। मौलाना आजाद नेहरू के निकटतम मित्रों में से थे। नेहरू अपने मित्र को हृदय से चाहते थे। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पं. गोविन्द वल्लभ पंत थे। पंत एकसुलझे हुए नेता थे। इसलिए उन्हें संयुक्त प्रांत का प्रथम मुख्यमंत्री बनाया गया था। पंत और नेहरू के मध्य आपसी संबंध बड़े सहज थे।

प्रथम आम चुनावों में रामपुर से मौलाना आजाद के सामने वरिष्ठ हिंदूवादी राजनीतिज्ञ स्व. विशनचंद सेठ अपनी किस्मत आजमा रहे थे। श्री सेठ जी की लोकप्रिय छवि थी,इसलिए अधिकतम लोगों ने उनको अपना मत प्रदान किया और अपना मत उन्हें देकर भारी मतों से विजयी कर दिया। नेहरू जी को रामपुर की जनता का यह निर्णय रास नही आया और उन्होंने इसे गांधीजी के उसी दृष्टिकोण की भांति लिया जिस प्रकार गांधी ने 1938 ई. में सुभाषचंद बोस और डा. पट्टाभिसीता रमैया के चुनाव को लिया था। जैसे गांधी को उस चुनाव में सुभाष चंद्र बोस की जीत ने हतप्रभ कर दिया था और वह उस जीत को पचा नही पाये थे उसी प्रकार स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव में रामपुर की जनता ने अपना निर्णय मौलाना के पक्ष में न देकर नेहरू को आश्चर्य चकित कर दिया था। पं. नेहरू इस अप्रत्याशित हार को विजय में परिवर्तित करने के लिए सक्रिय हो गये। उन्होंने फिर 1938 के इतिहास को दोहराने की योजना बनाई। अंतर मात्र इतना था कि उस समय गांधी जी ने चुनाव परिणाम तो नही बदला था परंतु चुनाव परिणाम के फलितार्थ सुभाष चंद्र  बोस से बोलचाल बंद करके डा. पट्टाभिसीता रमैया की हार को अपनी व्यक्तिगत हार मान लिया था, और तब तक सुभाष चंद बोस के प्रति गांधी ने अपनी यह ‘दण्डात्मक कार्यवाही’ जारी रखी जब तक सुभाष चंद्र बोस ने पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र न दे दिया। गांधी के राजनीतिक शिष्य या उत्तराधिकारी पं. नेहरू थे। इसलिए उन्हेंाने गांधी के कई गुरों को बड़ी सूक्ष्मता से अपनाया और उन्हें सही अवसर आने पर प्रयोग भी किया। अत: नेहरू ने अपने अभिन्न मित्र मौलाना आजाद को देश की संसद में लाने की जिद की, और तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. गोविन्दवल्लभ पंत को अपनी इच्छा बताकर सारी व्यवस्था करने का निर्देश दे दिया। मुख्यमंत्री ने रामपुर के जिलाधिकारी पर दबाब बनाया और हारे हुए प्रत्याशी को जीत का सेहरा बांधकर दूल्हा की भांति संसद में भेज दिया। जिलाधिकारी ने बड़ी सावधानी  से सेठ विशनचंद की वोटों को मौलाना के मतों में मिला दिया और दोबारा मतगणना के आदेश देकर जीते हुए प्रत्याशी को परास्त कर दिया।

अटल जी उस समय प्रधानमंत्री पद से हट चुके थे। तब उन्होंने स्व. विशनचंद सेठ की स्मृति में प्रकाशित स्मृति ग्रंथ ‘हिंदुत्व के पुरोधा’ नामक पुस्तक का विमोचन किया था। 18 नवंबर 2005 को विमोचित किये गये उक्त स्मृति ग्रंथ में उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग के अवकाश प्राप्त उपनिदेशक शम्भूनाथ टण्डन ने एक लेख लिखकर उक्त घटना का रहस्योदघाटन किया था। इस स्मृति ग्रंथ का प्रकाशन अखिल भारतीय खत्री महासभा दिल्ली ने कराया था।

अपने लेख का शीर्षक विद्वान लेखक ने बहुत ही सार्थक और गंभीर शब्दावली का प्रयोग करके यूं दिया था-‘‘जब भईये विशन सेठ ने मौलाना आजाद को धूल चटाई थी, भारत के इतिहास की एक अनजान घटना।’’ इस घटना से सिद्घ होता है कि भारत में लोकतंत्र को ठोकतंत्र में और जनतंत्र को गनतंत्र में परिवर्तित करने की कुचालें पहले दिन से ही चल गयी थी। नेहरू ने इन कुचालों को कहीं स्वयं चलाया तो कहीं इनका समर्थन किया अथवा अपनी मौन सहमति प्रदान की। पाठकों को स्मरण होगा कि उनके समय में जब जीप घोटाला हुआ तो उन्होंने उस घोटाले में लिप्त कांग्रेसी नेताओं का बचाव करने में ही बचाव समझा था। उन्होंने चीनी आक्रमण के समय अपने रक्षामंत्री कृष्णा मेनन का भी बचाव किया था। कुल मिलाकर उनके भीतर भी वही अहंकार का भाव रहता था जो गांधी जी के भीतर रहता था कि मैंने जो किया, या जो सोच लिया वही उत्तम है।

श्री टंडन ने अपने उक्त आलेख में स्पष्ट किया था कि कैसे नेहरूकाल से ही मतों पर नियंत्रण करने की दुष्प्रवृत्ति देश के राजनीतिज्ञों में पैर पसार चुकी थी। कालांतर में इस दुष्प्रवृत्ति ने विस्तार ग्रहण किया और ये बूथ कैप्चरिंग तक पहुंच गयी। जो लोग ये कहकर नेहरू का बचाव करते हैं कि उनके समय में यह बीमारी इतनी नही थी, ये तो बाद में अधिक फैली। उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि नेहरू का काल बीजारोपण का काल था। आम या बबूल का पौधा तो पिता या पितामह ही लगाते हैं और अक्सर उनके फल पुत्र या पौत्र प्राप्त करते हैं। अत: नेहरू ने अपने काल में बीजारोपण किया उसी के कटु फल हमें आज तक चखने पड़ रहे हैं। इंदिरा गांधी के काल में नेहरू द्वारा रखी गयी आधारशिला पर फटाफट भवन निर्माण हुआ और राजनीतिक भ्रष्टाचार के सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कार्य हर कांग्रेसी सरकार में चलता रहा। आज यह दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ता प्राप्त कर गया है, इसकी जड़ें ‘स्विस बैंकों’ तक चली गयीं हैं। इसे तोडऩे के लिए मोदी सरकार को भागीरथ प्रयास करना पड़ रहा है।

पहले आम चुनाव में हिंदू महासभा ने मुस्लिम तुष्टीकरण का पक्षघर मानते हुए पं. नेहरू और मौलाना आजाद के विरूद्घ हिंदू नेताओं को खड़ा करने का निश्चय किया था। इसका कारण था कि हिंदू महासभा ब्रिटिश काल के अंतर्गत अंतिम चुनाव (1945-46) के राष्ट्रीय असेम्बली के चुनाव में हिंदू महासभा ने कांग्रेस को यह कहकर अपना समर्थन दिया था कि वह देश का बंटवारा स्वीकार नही करेगी और किसी प्रकार का तुष्टीकरण भी नही करेगी। पर कांग्रेस वचन देकर भी अपने वचन से मुकर गयी थी। उसने देश का बंटवारा करा दिया। इसलिए हिंदू महासभा ने कांग्रेस को पहले आम चुनाव में घेरने की तैयारी की। मौलाना आजाद को यदि बिशन चंद सेठ एक चुनौती दे रहे थे तो फूलपुर से संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी नेहरू को चुनौती दे रहे थे।

नेहरू और मौलाना का गठबंधन मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का एक मुंह बोलता प्रमाण था और लोगों में उस समय ऐसे किसी भी गठबंधन के विरूद्घ एक आक्रोश व्याप्त था। इसलिए लोगों ने मौलाना आजाद  के विरूद्घ मतदान किया और बिशनचंद सेठ को 8 हजार मतों से विजयी बनाकर उन्हें हरा दिया था। श्री टंडन ने उक्त लेख में यह भी स्पष्ट किया है कि अधिकारियों ने मतगणना के बाद लाउडस्पीकरों से बिशनचंद सेठ के पक्ष में चुनाव परिणाम भी घोषित कर दिया था। पर इस चुनाव परिणाम पर मौलाना के ‘बेताज के बादशाह दोस्त’ नेहरू के तोते उड़ गये। उन्होंने दिल्ली दरबार में ‘शाही पैगाम’ जारी किया और रामपुर की  पुनर्मतगणना कराकर चुनाव परिणाम मौलाना आजाद के पक्ष में घोषित करने के लिए यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. गोविन्दवल्लभ पंत को निर्देशित किया। लेखक का कहना है कि मौलाना की हार की सूचना मिलते ही नेहरू बौखला उठे थे। जबकि सेठ समर्थक कार्यकर्ता अपने नेता का विजय जुलूस निकाल रहे थे।

तब पं. नेहरू ने पं. पंत को चेतावनी भरे शब्दों में संदेश दिया कि उन्हें मौलाना की हार किसी भी कीमत पर सहन या स्वीकार नही होगी। गोविन्द वल्लभ पंत ने तुरंत ‘दिल्ली दरबार’ के आदेश का क्रियान्वयन करना सुनिश्चित किया। जिलाधिकारी ने पुन: मतगणना के लिए बिशनचंद सेठ को भी बुला भेजा। लेखक के अनुसार सेठ जी ने उक्त पुन: मतगणना के आदेश का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि मेरे सारे कार्यकर्ता विजय जुलूस में जा चुके हैं और अब तो मुझे मतगणना के लिए एजेंट तक भी नही मिल सकते। तब जिलाधिकारी ने कह दिया कि कोई बात नही, मतगणना आपके सामने कर दी जाएगी। तब एडी.एम ने सेठजी के सामने ही मतपत्रों का जखीरा समेट कर मौलाना के मतपत्रों में मिला दिया। सेठ जी ने चिल्लाकर कहा कि यह क्या कर रहे हो? तब अधिकारियों ने कह दिया कि हम अपनी नौकरी बचाने के लिए तुम्हें हरवा रहे हैं।

श्री टंडन ने लिखा है कि चूंकि उन दिनों प्रत्याशियों के नामों की अलग-अलग पेटियां हुआ करती थीं और मतपत्र बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों में डाले जाते थे। अत: यह आसान था कि एक प्रत्याशी के मत  दूसरे प्रत्याशी के मतों मेें मिला दिये जाते थे। इसी का लाभ उठाकर सेठ जी को हराया गया और मौलाना को विजयी बनाया गया। 1957 और 1962 के चुनावों में यद्यपि सेठ जी कांग्रेसी प्रत्याशी को हराकर संसद पहुंचे परंतु पहले चुनाव में तो नेहरू वह दुष्कृत्य करने में सफल हो ही गये जिसके कटुफल देश को आज तक चखने पड़ रहे हैं। इससे नेहरू की लोकतांत्रिक छवि पर भी दाग लगा और देश को लोकतंत्र की हत्या का दंश पहले ही आम चुनाव में झेलना पड़ गया।

रानी पद्मिनी राणा लक्ष्मण सिंह और कान्हड़देव की रोमांचकारी देशभक्ति

रानी पद्मिनी राणा लक्ष्मण सिंह और कान्हड़देव की रोमांचकारी देशभक्ति
 
हम दिन चार रहें या न रहें, तेरा वैभव अमर रहे मां- और रानी पद्मिनी ने कर लिया जौहर


भारत के वैभव और गौरव से प्रभावित होकर फे्रंच तत्वज्ञ विक्टर कजिन ने कहा है-‘‘इसमें संदेह नही कि प्राचीन हिंदुओं को वास्तविक ईश्वर का पूर्ण ज्ञान था। उनके विचार,उनका तत्व ज्ञान इतना श्रेष्ठ उदात्त तथा सत्य है कि उनके मुकाबले में यूरोपीय तत्व ज्ञान दोपहर के सूर्य के सामने चमकने वाले जुगनू की भांति फीका है।’’
जो जातियां अपने अतीत को संवारकर रखने के अपने महान दायित्व का निर्वाह नही कर पाती हैं, वे मिट जाया करती हैं। इसलिए प्रत्येक भारतीय का (और जिनमें मुस्लिम भी सम्मिलित हैं, क्योंकि अधिकांश भारतीय मुसलमानों के पूर्वज वही हैं जो शेष हिंदू समाज के हैं) पुनीत कत्र्तव्य है कि वह अपने इस महान दायित्व के निर्वाह के प्रति गंभीर हो।
भारतवर्ष वह देश है जिसके विषय में मार्क ट्वेन ने बड़ा सुंदर लिखा है:-यह भारतवर्ष मानव जाति का उद्गम स्थल है, हमारी अभिव्यक्ति का जन्म स्थान, इतिहास की मां तथा युग पुरूषों पितामह है।’’
यहां प्रकरण इतिहास की इस पूज्यनीय, वंदनीया और प्रातस्मरणीय माता के एक युग पुरूष राणा भीमसिंह का चल रहा है, जो आज सारी संवेदनाओं और संवेगों को राष्ट्रभक्ति के उदात्त भाव के साथ समेकित कर युद्घभूमि के लिए प्रस्थान कर चुका है। उसके लिए अब अपना कोई नही है, जो कुछ भी है वह मातृभूमि है, राष्ट्र है,अपना धर्म है, और अपनी स्वतंत्रता के लिए बलिदान हो जाने की उदात्त और अनुकरणीय भावना है। आज वह उस भारत, भारतीयता और भारतीयों के लिए अपना सर्वस्व होम करने के लिए निकल पड़ा है, जिनके विषय में उक्त विदेशी विद्वानों ने उपरोक्त विचार प्रस्तुत किये हैं।
अलाउद्दीन राणा भीमसिंह की प्रतीक्षा ही कर रहा था। राणा जैसे ही युद्घभूमि में पहुंचा अलाउद्दीन और उसकी सेना राणा पर टूट पड़ी। चित्तौड़ के हिंदू वीरों ने पा्रण पण से युद्घ करना आरंभ कर दिया। कर्नल टॉड लिखते हैं:-भयानक रूप से दोनों सेनाओं में मारकाट हुई। राजपूत सेना की अपेक्षा बादशाह की सेना बहुत बड़ी थी। इसलिए भीषण युद्घ के पश्चात चित्तौड़ की सेना की पराजय हुई अगणित संख्या में उसके सैनिक और सरदार मारे गये और चित्तौड़ की शक्ति का पूर्ण रूप से क्षय हुआ। युद्घ के कारण युद्घ का स्थल शमशान बन गया। चारों ओर दूर-दूर तक मारे गये सैनिकों के शरीरों से जमीन अटी पड़ी थी और रक्त बह रहा था।’’
सचमुच स्वतंत्रता को रक्त से ही सींचना पड़ता है। जब वह जाती है तो उस समय भी ये रक्त पीती है और जब ये आती है तो भी रक्त मांगती है। इसकी इस शाश्वत मांग को समझ कर ही नेताजी सुभाषचंद बोस ने भारतीयों का आह्वान किया था-‘‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’’
आज (29-8-1303) इस स्वतंत्रता के लिए राणा भीमसिंह और उनकी वीर सेना अपना रक्त अर्पित कर रही थी, अगणित शीश चढ़ा रही थी, केवल इसलिए कि भविष्य में जब इसे लेने का अवसर आये तो हमारे नींव के बलिदानों का स्मरण हो सके, और हम उन क्षणों में स्वयं को धन्य समझ सकें। आज के बलिदान का परिणाम तो सबको ज्ञात था कि क्या होने वाला है? परंतु आज के बलिदानों को भविष्य की ‘सुप्रभात’ के लिए दिया जा रहा था, जिसे किसी ने नही देखा था। वीरता का सर्वोत्कृष्ट भाव था ये।
अलाउद्दीन की निर्णायक जीत हो गयी
इसके पश्चात अलाउद्दीन अपनी शेष सेना के साथ चित्तौड़ में प्रवेश करता है। उसे अब प्रसन्नता हो रही थी कि जिस रानी ने उस समय तेरे साथ छल करके अपने पति राणा भीमसिंह को तेरी जेल से मुक्त कराने का दुस्साहसपूर्ण प्रयास किया था,अब वह तेरी मलिका बनेगी। अपने सपनों में खोया अलाउद्दीन बड़ी तेजी से किले में प्रवेश करता है पर किले के भीतर पसरे सन्नाटे को देखकर वह स्वयं सन्न रह गया। पूछने पर उसे ज्ञात हुआ कि रानी ने अपनी हजारों सहेलियों के साथ जौहर कर लिया है, और अब यहां उनकी वीरता की एक अमिट कहानी की अमिट स्मृतियों के अतिरिक्त कुछ नही है। भारतीय वीरांगना ने एक फिरंगी को फिर धोखा दे दिया। अलाउद्दीन को रानी ने ठग लिया वह जीतकर भी हार गया था, क्योंकि चित्तौड़ पाकर वह इतना प्रसन्न नही होता जितना रानी पदमिनी को पाकर होता। रानी ने बलिदान तो दिया पर शत्रु की जय को पराजय में भी परिवर्तित कर गयीं। सचमुच वह विजय विजय नही होती, जिसे पाकर भी विजेता शोक और पीड़ा से कराहकर हाथ मसलता रह जाए। विजय के अनेक आयाम होते हैं, वह प्रसन्नता दायिनी भी होती है, विजित क्षेत्र की जनता विजेता को अपना राजा स्वेच्छा से माने इस अपेक्षा पर भी खरी उतरने वाली होती है और उसकी विजय के साथ-साथ उसकी सारी अपेक्षाएं अभिलााषाएं भी तृप्त हो गयीं हों।
राणा भीमसिंह ने अपने पुत्र अजय सिंह को जीवित और सुरक्षित बचाकर किले से निकाल दिया था जो चित्तौड़ पतन के पश्चात कैलवाड़ा नामक स्थान की ओर चला गया था, दूसरे रानी ने अलाउद्दीन की अपेक्षाओं और अभिलााषाओं पर पानी फेर दिया था, तीसरे चित्तौड़ की राणा भक्त प्रजा अपने राणा और रानी के बलिदान का मूल्य समझती थी, इसलिए वह अलाउद्दीन की जीत को केवल किले पर किया गया आधिपत्य ही मान रही थी, वह तो आज भी राणा परिवार के साथ थी।
अत: अलाउद्दीन खिलजी जीतकर भी हारे हुए सैनिक की भांति निराशा के साथ दिल्ली के लिए प्रस्थान करने लगा। उसने चित्तौड़ का शासन जालौर के सोनेगरे वंश के मालदेव नामक सरदार को सौंप दिया और स्वयं मन मारकर दिल्ली की ओर चल दिया। भारतीयों की पराजय में भी जीत के रहस्य को उसका निराश मन जितना ही समझने का प्रयास करता था, वह रहस्य उसके लिए उतना ही गहराता जाता था-तब वह कह उठता था-इन भारतीयों को समझना भी बड़ा कठिन है।
कितने इतिहासकारों ने अलाउद्दीन की इस मानसिकता को उकेरने का प्रयास किया है? और कितनों ने राणा और रानी के उस साहसिक प्रयास पर ‘लेखनी धर्म’ का निर्वाह किया है, जिसके कारण अलाउद्दीन को जीत में भी हार का अनुभव हुआ और उसे अपनी सेना के बलिदान तथा अपने सारे परिश्रम पर भी अफसोस हुआ। हमने जौहर को केवल आत्महत्या का एक उपाय समझा है। हम यह भूल गये कि जौहर किसी विजेता को पराजित करने का सशक्त माध्यम भी है और एक कारगर हथियार भी है।
कुछ लेखकों ने रानी पद्मिनी की कहानी को असत्य ठहराने के अतार्किक प्रयास किये हैं। परंतु मुहम्मद हबीब, आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव, एस.सी. दत्त, एस. राय, दशरथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने पद्मिनी की सत्यता पर विश्वास प्रकट किया है।
चित्तौड़ अभियान पर इतिहासकारों के मत
अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ अभियान पर मुहम्मद हबीब का कहना है कि अलाउद्दीन खिलजी के नेतृत्व में शाही सेनाएं राजस्थान में प्रवेश कर गंभीरी और वेहद नदियों के बीच पहुंचकर शिविर लगाकर और चित्तौड़ दुर्ग का घेरा डालकर युद्घ के लिए सन्नद्घ हो गयीं। सुल्तान ने अपनी सेना को दो भागों में विभक्त कर किले पर दोनों ओर से आक्रमण का आदेश दिया। इन सेनाओं द्वारा दो माह तक अनवरत आक्रमण के पश्चात भी मुसलमानों को विजय प्राप्त करने में कोई सफलता प्राप्त न हो सकी।
अमीर खुसरो के वर्णन को देखते हुए कुछ इतिहासकारों ने यह अनुमान भी लगाया है कि या तो दुर्ग के कुछ लोगों ने दुर्ग का द्वार खोल दिया अथवा उसमें उपस्थित समस्त सैनिकों ने वहां की तत्कालीन स्थिति पर विचार करते हुए एक साथ दुर्ग से निकल पड़े और वे मुसलमानों से संघर्ष करते हुए मारे गये। अमीर खुसरो ने इस युद्घ में हुई जनहानि का वर्णन करते हुए लिखा है कि सुल्तान के क्रोध के कारण तीस हजार हिंदुओं की हत्या कर दी गयी। इस स्थिति में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरा चित्तौड़ वीरों से खाली कर दिया गया होगा। हमें अपने इन बलिदानियों के बलिदान पर विचार करते हुए यह भी सोचना होगा कि इन तीस हजार (जिनके लिए खुसरो का कथन है कि उनमें अधिकांश सैनिक थे) ने तातार सेना का भी बड़ी संख्या में संहार किया होगा। वे सरलता से बलि का बकरा नही बने होंगे।
मुहम्मद हबीब का कथन है कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ विजय के उपरांत उसका नाम अपने पुत्र खित्र खां के नाम खिज्राबाद कर दिया था और उसे अपने पुत्र खिज्रखां को सौंपकर ही दिल्ली लौटा था। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र को लालदत्त काली व हरी पताका भी प्रदान की थी। इस सारी प्रक्रिया को पूर्ण करके सुल्तान 4 सितंबर को दिल्ली लौट गया।
आगे के संघर्ष की नींव
राणा भीमसिंह (रतन सिंह) की चित्तौड़ के पतन के पश्चात प्रचलित इतिहास हमें कुछ ऐसा आभास दिलाता है कि जैसे सब कुछ शांत हो गया था, और अलाउद्दीन खिलजी निष्कंटक होकर शासन करने लगा था। परंतु जैसा कि हमने पूर्व में उल्लेख किया है कि अलाउद्दीन खिलजी के शासन पर चित्तौड़ की जनता ने अपनी सहमति या स्वीकृति नही दी थी, तो हमारी इस बात की पुष्टि फरिश्ता के कथन से भी होती है। उसने कहा है कि आसपास के हिंदुओं ने चित्तौड़ पर कई बार अधिकार करने का प्रयास किया था।
जनता अपने शासक के साथ थी, अर्थात राणा भीमसिंह के साथ। इसलिए वह बलात थोपे गये किसी भी शासक को अपना शासक मानने को तत्पर नही थी। इसी संघर्ष की गाथा ने देशभक्त जनता को गरम किये रखा और उसकी गरमी ने स्वतंत्रता की अलख जलाये रखी। स्वतंत्रता का यह संघर्ष आगे चलकर शीघ्र ही फलीभूत हुआ, जब चित्तौड़ को राणा भीमसिंह के पौत्र हमीर ने दिल्ली की सल्तनत से छीन लिया था। इसका वर्णन हम आगे करेंगे कि ये हमीर कौन था और इसके निर्माण में कौन सी परिस्थितियों का योगदान रहा था?
राणा लक्ष्मण सिंह का वीरतापूर्ण सहयोग
यह मानना पड़ेगा कि अलाउद्दीन खिलजी के समय तक हिंदू शक्तियां एक दूसरे का सहयोग करके विदेशी शक्तियों को देश की सीमाओं से बाहर खदेड़ देने की अपनी परंपरागत शैली से विमुख हो गयी थीं, परंतु कुछ लोग हर स्थिति परिस्थिति के अपवाद हुआ करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी भारतवर्ष में अपना राज्य विस्तार करता जा रहा था। कोई भी शक्ति उससे लोहा लेने से पूर्ण दस बार सोचती थी। ऐसे समय में अलाउद्दीन खिलजी की क्रूरता का सामना करना हर किसी के वश की बात नही थी।
चित्तौड़ के राणा भीमसिंह जिस समय अलाउद्दीन खिलजी से युद्घ रत थे और खिलजी के चित्तौड़ दुर्ग का डेरा डाले हुए कई माह व्यतीत हो गये थे, तब राणा की सहायता करने कोई भी हिंदू नरेश नही आया था। किंतु कुंभलगढ़ शिलालेख से हमें ज्ञात होता है कि चित्तौड़ के गुहिल राजवंश (राणा परिवार) की छोटी शाखा से संबंधित सीसोदा गांव (इसी से शिशौदिया गोत्र प्रचलित हुआ है) का स्वामी राणा लक्ष्मण सिंह अपने परिवार वालों के साथ मातृभूमि की रक्षार्थ आ पहुंचा था। राणा लक्ष्मण सिंह ने चित्तौड़ को ऐसे समय में सहयोग किया जब उसके सहयोग की चित्तौड़ को अत्यंत आवश्यकता थी। राणा लक्ष्मण सिंह ने युद्घ में पर्याप्त शौर्य एवं साहस का परिचय दिया था, और स्वतंत्रता के अपहर्ताओं को बड़ी संख्या में परलोक पहुंचा दिया था।
जालौर का शक्तिशाली शासक कान्हड़देव
राजस्थान की वीरभूमि ने जिन बलिदानी वीर रत्नों को जन्म देकर मां भारती का गौरव बढ़ाया है उनमें जालौर के चौहान वंशी शासक को अपने समकालीन हिंदू शासकों का सक्रिय सहयोग नही मिला, अन्यथा वह इतिहास की दिशा को परिवर्तित करने की क्षमता और सामथ्र्य से संपन्न था। इस परिस्थिति पर विचार करते हुए डा. के.एस. लाल ने अपनी पुस्तक च्च्खलजी वंश का इतिहास च्च्में लिखा है:-‘‘पराधीनता से घृणा करने वाले राजपूतों के पास शौर्य था, किंतु एकता की भावना नही थी। कुछेक ने प्रबल प्रतिरोध किया, किंतु उनमें से कोई भी अकेला दिल्ली के सुल्तान के सम्मुख नगण्य था। यदि दो या तीन राजपूत राजा भी सुल्तान के विरूद्घ एक हो जाते तो वे उसे पराजित करने में सफल हो जाते।’’
भारतवर्ष के इतिहास के ऐसे अनेकों नररत्न हैं, जो उपेक्षा के पात्र बने पड़े हैं, और हम आज तक उन्हें उनका अपेक्षित स्थान इतिहास में दे नही पाये हैं, कान्हड़देव भी उन्हीं उपेक्षित नररत्नों में से एक है। इतिहास के मर्मज्ञ विद्वान डा. शक्ति कुमार शर्मा ‘शकुन्त’ ने इस नररत्न के विषय में लिखा है-‘‘चाहमान (चौहान) के वंशजों ने यायव्य कोण से आने वाले विदेशियों के आक्रमणों का न केवल तीव्र प्रतिरोध किया अपितु 300 वर्षों तक उनको (अपने देश में) जमने नही दिया। फिर चाहे वह मुहम्मद गजनवी हो गौरी हो, अलाउद्दीन खिलजी हो, चौहानों के प्रधान पुरूषों ने उन्हें चुनौती दी उनके अत्याचारों के रथ को रोके रखा, तथा अंत में आत्म बलिदान देकर भी देश और धर्म की रक्षा अंतिम क्षण तक करते रहे।’’
ऐसा था चौहान शासक कान्हड़ देव, जिसकी प्रशंसा में जितना लिखा जाए उतना अल्प ही कहा जाएगा। हमने पूर्व में उल्लेख किया है कि पृथ्वी राज चौहान की मृत्यु के पश्चात उसकी एक शाखा ने रणथम्भौर में जाकर शासन स्थापित किया तो उसी की एक शाखा पहले नाडौल गयी और फिर नाडौल से भी एक शाखा जालौर चली गयी। कीर्तिपाल नामक (पृथ्वीराज चौहान का वंशज) व्यक्ति ने वहां जाकर नये राजवंश की स्थापना की। जिसमें कई शासकों के होने के उपरांत कान्हड़देव वहां का शासक बना। कान्हड़देव में प्रारंभ से ही अपने पूर्वजों का स्वातंत्रय प्रेम स्पष्ट झलकता था। वह स्वाभिमानी था और किसी भी स्थिति परिस्थिति में अपने स्वाभिमान को क्षतिग्रस्त होते देखना नही चाहता था। इसके पिता राजा समंत सिंह थे।
जिस समय दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी भारत में अपने अभिमान पूर्ण विजय अभियान को चला रहा था और उसका राज्य निरंतर विस्तार पाता जा रहा था, उस समय उसका सामना करना हर किसी के वश की बात नही थी। खिलजी ने गुजरात के अपने विजय अभियान के समय सोमनाथ के मंदिर में जीर्णोद्घार होने के उपरांत लौटी भव्यता को पुन: विनष्ट करने का मन बनाया। सोमनाथ सदियों से हमारी धार्मिक आस्था का प्रतीक रहा था, उसके विनाश की बात कोई भी स्वाभिमानी हिन्दू वीर सोच भी नही सकता था। उसकी प्रतिष्ठा के लिए हजारों लाखों हिन्दुओं ने अपने बलिदान दिये थे, इसलिए उन बलिदानों को व्यर्थ करना लोग अपने लिए कृतघ्नता का कारण मानते थे।
अलाउद्दीन खिलजी के ‘गुजरात अभियान’ के वास्तविक लक्ष्य (अर्थात सोमनाथ का पुन: विध्वंस) की जब सही सूचना कान्हड़देव को मिली तो कान्हड़देव की भुजाएं फडक़ने लगीं। अलाउद्दीन खिलजी ने कान्हड़देव से अपने राज्य से निकलने का रास्ता देने का अनुरोध किया और इस उपकार के बदले उसे खिलअत से सुशोभित करने का वचन भी दिया। परंतु कान्हड़देव ने अलाउद्दीन खिलजी को उसके पत्र का उत्तर इस प्रकार दिया-
‘‘तुम्हारी सेना अपने प्रयाण मार्ग में आग लगा देती है, उसके साथ विष देने वाले व्यक्ति होते हैं, वह महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करती है, ब्राह्मणों का दमन करती है, और गायों का वध करती है यह सब कुछ हमारे धर्म के अनुकूल नही है, अत: हम तुम्हें रास्ता नही दे सकते।’’
अलाउद्दीन खिलजी को कान्हड़देव से ऐसे उत्तर की अपेक्षा नही थी, इसलिए उसने क्रोधित होकर अपने सेनापति उलुग खां को आज्ञा दी कि गुजरात से लौटते समय कान्हड़देव की ‘देशभक्ति का उपचार’ किया जाए। जब उलुगखां गुजरात से लौट रहा था तो उसने कान्हड़देव के राज्य के सकराणा नामक दुर्ग पर हमला बोल दिया। हमारे वीरों ने अपने नायक जैता के नेतृत्व में उलुग खां के आक्रमण का सफलता पूर्वक प्रतिराध किया और उन्होंने एक ही हमले में उलुग खां की सेना को भागने के लिए विवश कर दिया। उलुग खां हाथ मलता रह गया। उसने जैता वीर से ऐसे प्रतिरोध की अपेक्षा नही की थी। जैता ने उलुग खां से सोमनाथ मंदिर से लायी गयी पांच मूत्र्तियों को भी छीन लिया। इतना ही नही इस युद्घ में जैता वीर ने सुल्तान के एक भतीजे मलिक एजुद्दीन तथा नुसरत खां के एक भाई को भी जहन्नुम की आग में फेंक दिया।
अलाउद्दीन ने शेर को छल से जाल में फंसा लिया
भारत के इस शेर कान्हड़देव को 1308 ई. में सुल्तान अलाउद्दीन ने अपने एक विश्वसनीय व्यक्ति के माध्यम से अपने दरबार में बुलावा भेजा। दुर्भाग्यवश कान्हड़देव जाल में फंस गया और सुल्तान के दरबार में पहुंच गया। वहां अलाउद्दीन ने हिंदू समाज के पौरूष और वीरता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कह दिया कि मेरे सामने कोई भी हिंदू युद्घ क्षेत्र में रूक नही पाता।
स्वाभिमानी कान्हड़देव का च्च्हिंदूज्ज् जाग गया और वह तुरंत सिंह गर्जना कर उठा कि आपकी चुनौती मुझे स्वीकार है। अलाउद्दीन यही चाहता था। कान्हड़देव ये भूल गया था कि वह किसी षडयंत्र का शिकार हो चुका है, और वर्तमान क्षणों में वह कहां बैठा हुआ है? हिंदुओं के लिए अपमानजनक शब्दों पर तीखे बाण छोडक़र और सुल्तान को बुरा भला कहकर कान्हड़देव सुल्तान के दरबार से निकल गया और जालौर पहुंच गया।
१311 ई. में अलाउद्दीन ने कान्हड़देव को दण्डित करने के लिए सेना भेजी। कान्हड़देव जानता था कि दिल्ली दरबार में हुई घटना की प्रतिक्रिया क्या होगी? इसलिए वह भी अपनी तैयारी से था। इस हिंदू वीर ने सुल्तान की सेना को कई स्थानों पर पराजित किया। गुजराती महाकाव्य ‘कान्हड़ दे प्रबंध’ के अनुसार संघर्ष कुछ वर्षों तक चला और शाही सेनाओं को अनेक बार मुंह की खानी पड़ी। तब सुल्तान ने कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में शक्तिशाली तुर्क सेना भेजी। इस सेना का सामना सिवाणा के सामंत शीतल देव ने किया। दोनों के मध्य जैसा संघर्ष हुआ वैसे युद्घ की कल्पना भी तुर्कों ने नही की होगी। फलस्वरूप हिंदू वीर योद्घा सीतलदेव ने शक्तिशाली तुर्क सेना को भागने के लिए विवश कर दिया। एक सामंत होकर सुल्तान की शक्तिशाली सेना को भगाने का काम एक हिंदू वीर ही कर सकता था जो उसने कर दिखाया। तब सुल्तान अलाउद्दीन स्वयं सेना लेकर जालौर गया। सुल्तान ने जालौर जाकर छल का सहारा लिया और एक भापला नामक ‘जयचंद’ को भारी धनराशि देकर अपनी ओर मिला लिया। जिसने अपने स्वामी के साथ छल करते हुए किले का द्वार खोल दिया। सुल्तानी सेना दुर्ग में प्रवेश कर गयी। हमारी महिलाएं जौहर करने की तैयारी करने लगीं, राजपूत ‘शेरों’ ने जमकर संघर्ष करना आरंभ कर दिया। उन्होंने जीते जी ‘समर्पण’ करना अपमान समझा, इसलिए बड़ा भयंकर संघर्ष हुआ। मुट्ठी भर हिंदू सैनिक युद्घ करते हुए कुछ ही समय में समाप्त हो गये। कान्हड़देव ने 18 वर्ष तक अलाउद्दीन को नाकों चने चबाए थे, उसे बता दिया था कि हिंदू कैसे सामना करते हैं, और यदि दुष्ट भापला बीच में न आता तो परिणाम कुछ और ही होता। इसके पश्चात कान्हड़देव कहां गया, या उसके साथ क्या किया गया, इस पर तो कोई प्रामणिक जानकारी नही है, परंतु कान्हड़देव हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का एक अमर पात्र अवश्य है। पराजित हो जाने से वह आभाहीन नही हो जाता है अपितु उसका गौरव इसमें है कि उसने हिन्दू स्वाभिमान के लिए 18 वर्ष तक संघर्ष किया, उसी के लिए जिया और मरा। निश्चित ही वह एक वंदनीय पात्र है।

करोड़ों में खेलने वाले, ने किया करोड़ों की भावनाओं से खिलवाड़

करोड़ों में खेलने वाले, ने किया करोड़ों की भावनाओं से खिलवाड़


शिकारी एक हिरण का पीछा कर रहा था। दौड़ता हुआ हिरण अचानक रूका और एक लता के पीछे छिप गया। शिकारी उसे ढूंढ़ता हुआ आगे निकल गया। हरी भरी लता को देखकर हिरण के मुंह में पानी आ गया और उसने लता को खाना आरंभ कर दिया। थोड़ी ही देर में उसने लता का काफी भाग खा लिया। उसी समय शिकारी उसे ढूंढ़ता हुआ पुन: वहीं आ गया। तब हिरण के लिए लता के पास छिपना संभव नही था, क्योंकि वह उस लता को खा चुका था। पहले वह उसी लता की ओट में अपनी प्राण रक्षा करने में सफल हो गया था। शिकारी ने खुले में खड़े हिरण को मार गिराया। मरते समय हिरण सोच रहा था कि जो लोग अपने आश्रय देने वाले के साथ कृतघ्नता करता है, उसका हश्र मेरे जैसा ही होता है।ज्

जब आध्यात्मिकता के नाम पर कुछ लोग किसी व्यक्ति को संत मानकर अपने हृदयासन पर विराजमान करें और वह संत उस हृदय की पवित्र भावनाओं की लता को खाना आरंभ कर दे तो बिना लाग लपेट के कहा जा सकता है कि उस कथित संत की स्थिति तो उस हिरण से भी बुरी होगी। क्योंकि आस्था के साथ खिलवाड़ करना या किसी की आस्था को स्वार्थ पूर्ति के लिए प्रयोग करना सबसे बड़ी कृतघ्नता है।

धर्म के विषय में कहा गया है कि धर्म उसी की रक्षा करता है जो स्वयं धर्म की रक्षा करता है। रामपाल जैसे असत पुरूष ने स्वयं के संत होने का एक मायावी भ्रम तैयार किया और बड़ी संख्या में लोगों का मूर्ख बनाने में सफल हो गया। संत के लिए मायावी भ्रमों  का जाल बुनना या लोगों को मूर्ख बनाना सबसे बड़ा अधर्म है। रामपाल धर्म की रक्षा नही कर पाया तो धर्म ने उसका भी साथ छोड़ दिया, और हम देख रहे हैं कि कल का एक च्शहंशाहज् आज सलाखों के पीछे चला गया है। माना कि आप सारी दुनिया को ठग सकते हैं पर धर्म को नही ठग सकते, और यदि धर्म को ठगने का प्रयास आपने किया तो धर्म के न्यायचक्र से तुम छूट नही पाओगे। वह तुम्हें कसौटी पर कसेगा अवश्य और कसकर देखने पर उसके पश्चात अपना न्याय भी देगा। रामपाल के साथ जो कुछ हुआ है वह उसके अधर्म का फल है। इसी को न्याय कहते हैं।

संत के विषय में यह सत्य है कि उसकी सतोगुणी वृत्ति होती है और वह सतोगुणी होने के कारण ही साधनारत रह पाता है। साधनारत व्यक्ति ही साधु होता है। पर साधु के लिए भी यह आवश्यक नहीे कि वह गेरूए रंग के वस्त्र धारण करने वाला ही हो, वह सत्व के प्रकाश में चित्त की प्रसन्नता के साथ आनंदलोक में विचरण करने वाला होता है, महा तपस्वी होता है वह,राग द्वेष से मुक्त होता है वह, निंदा वंदन का क्रंदन उस पर किसी प्रकार का बंधन नही डाल सकता। उस वीतराग को किसी के महल से किसी प्रकार का लगाव नही होता और किसी की झोंपड़ी से किसी प्रकार की घृणा नही होती। वह समभाव और सद्भाव की साकार मूर्ति होता है। मां भारती ऐसे दिव्य पुरूषों की आरती के लिए प्राचीन काल से थाल सजाए खड़ी रही है। इसलिए यह देश कभी गौतम, कणाद का देश बना तो कभी अध्यात्म से मुंह फेर गयी राजनीति को धर्म के केन्द्र के साथ जोडक़र चलाने वाले चाणक्य की भूमि बनी। यहां सृष्टि प्रारंभ में अग्नि,वायु,आदित्य,अंगिरा ने वेद ज्ञान को सीधे ईश्वर से ग्रहण किया और उसे लोक कल्याणार्थ आगे के लिए मनुष्य की पीढिय़ों को यूं दे दिया जैसे इस पर उनका कोई अधिकार ही नही था। मनु महाराज ने इस परंपरा को आगे ज्यों का त्यों बढ़ाया, पतंजलि ने अपने दिव्य ज्ञान को योगदर्शन के माध्यम से लोगों के हृदय मंदिर में एक दिव्य दीपक के रूप में ज्योतित कर प्रतिष्ठित किया। यहां राम के साथ वशिष्ठ  हैं, विश्वामित्र हैं, तो युधिष्ठर के साथ स्वयं कृष्ण हैं, जो योगिराज हैं, और क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर एक संत के समान या एक ऋषि के समान जीवन जीने वाले हैं। आज उसी देश में कुछ लोग संतत्व का अपमान करते हुए स्वयं को संत घोषित करते हैं, और बड़े बड़े पापों में, घोटालों में, या अपराधों में संलिप्त मिलते हैं। रामपाल ने हम सबके साथ पुन: छल किया है। यह छल इस देश की एक लंबी उस संत परंपरा के साथ विश्वासघात है जो इस देश की संस्कृति का अटूट भाग रही है या जिसने इस देश की संस्कृति का निर्माण किया है। करोड़ों में खेलने वाले ने करोड़ों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है, फल बड़ा भयानक होगा।

आयु घट भी सकती है और बढ़ भी सकती है

आयु घट भी सकती है और बढ़ भी सकती है


सामान्यत: किसी भी दुर्घटना या चोट आदि के पश्चात जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो लोग उसे अकाल मृत्यु कहते हैं। लोग पीडि़त परिवार को सांत्वना देते हुए ऐसा भी कहते सुने जाते हैं कि ईश्वर ने ऐसा ही करना था, सो हो गया, इसलिए दु:ख किस बात का?
ऐसी बातों के बीच जो धारणा हमारे समाज में प्रचलित हो गयी है, वह यह है कि‘आयु निश्चित है’, और उसे तिल भर भी घटाया बढ़ाया नही जा सकता। इस दोषपूर्ण विचार को बढ़ाते-बढ़ाते लोगों ने ‘हत्या’ को भी ईश्वरीय व्यवस्था के अंतर्गत प्रायोजित मान लिया है। अब यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि हत्यारे ने हत्या ईश्वरीय प्रेरणा से की थी तो इसमें उसका दोष क्या था? क्योंकि तब कत्र्ता वही माना जाएगा जिसने प्रेरणा दी, इसलिए ईश्वर ही उस हत्या के लिए दोषी होगा। पर ऐसी परिस्थिति में ईश्वर का न्यायकारी स्वरूप समाप्त हो जाएगा, तब पाप पुण्य का भेद भी समाप्त हो जाएगा।
समाज में ऐसी भ्रांत धारणाओं ने वैदिक संस्कृति की मान्यताओं को भारी क्षति पहुंचाई है। इस प्रकार की धारणाओं ने हमारी कर्मशीलता और पुरूषार्थ भरी उद्यमशीलता को छीन लिया, व्यक्ति की कर्म करने में स्वतंत्रता और फल भोगने में परतंत्रता की वैदिक व्यवस्था को छीन लिया। हम ये भूल गये कि-
‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।’’
अर्थात हे जीव तेरा अधिकार केवल कर्म करने पर है उसके फल पर कदापि नही। वेद ने आदेश दिया-‘‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:’’ अर्थात हमारी जिजीविषा (जीने की इच्छा) कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने तक की हो। इस जिजीविषा पर प्रतिबंध है कि-‘‘सत्यं वद् और धर्मम् चर’’ अर्थात सत्य बोल और धर्म का आचरण कर। कर्म सत्य और धर्म के दो पाटों के बीच चलना चाहिए। कर्मरूपी गंगा की धारा के दो किनारे हों-‘सत्य और धर्म।’ अच्छे कर्मों के करने से आयु वृद्घि होती है और बुरे कर्मों के करने से आयु क्षीण होती है, ऐसा माना जाता है।
अल्पायु में मृत्यु होना अकाल मृत्यु कहलाती है। परंतु इसका अभिप्राय यह नही कि वह मृत्यु लिखी ही इस प्रकार थी और उसे इस प्रकार होने से टाला नही जा सकता था। अकाल का अभिप्राय केवल असमय मृत्यु हो जाना ही है, यदि आवश्यक और अपेक्षित सावधानी बरती जाए तो बहुत संभव होगा कि ऐसी अकाल मृत्युओं पर विजय प्राप्त की जा सके। इस सिद्घांत को महर्षि दयानंद ने भी यथावत स्वीकार किया है, और यह वैदिक सिद्घांत है।
वेद ने कहा है कि-‘‘शंयोरभिस्रवन्तु न:’’। अर्थात हमारे जीवन में सुखों के रस का झरना धीमे-धीमे बहता रहे, शुभ कर्मों के सुखों की,फुहारों की,धीमी-धीमी और भीनी-भीनी वर्षा हम पर जीवन भर अथवा आयु पर्यन्त होती रहे। हमारा जीवन जितना संयमित, अनुशासित और मर्यादित रहेगा हम उतने ही अनुपात में सुखों की भीनी-भीनी वर्षा का अनुभव अधिक समय तक करते रहेंगे। इसीलिए हमारे ऋषियों ने मनुष्य को ईश्वर भक्त बनने की प्रेरणा दी, जिससे कि मनुष्य शांत और निभ्र्रांत मन का स्वामी बन सके। इससे आज का वैज्ञानिक भी सहमत है कि हमारा मन जितना शांत होगा हम उतने ही अधिक स्वस्थ और दीर्घायु वाले होंगे।
यदि यह माना जाए कि सभी कुछ पूर्व में निश्चित कर दिया गया है और सब कुछ निश्चित कालक्रम के अनुसार घटित हो रहा है, तो कुछ प्रश्न खड़े हो जाएंगे, यथा-(1) यदि ऐसा है तो हमारे ऋषियों ने आयुर्वेद की खोज क्यों की? (2) ईश्वर ने वनस्पति जगत जो प्रकटत: हमारे स्वास्थ्य और दीर्घायुष्य के लिए उपयोगी है, उसकी रचना क्यों की? (3) शत्रु और वन्य हिंसक जीवों से बचने के लिए मानव ने प्रारंभ से ही सुरक्षात्मक उपाय क्यों अपनाए? (4) आज भी जीवनरक्षक औषधियों की खोज क्यों जारी है? (5) बहुत सी महामारियों यथा प्लेग, हैजा, चेचक आदि पर विज्ञान नियंत्रण कर चुका है, जिससे व्यक्ति की सामान्य आयु में वृद्घि हुई है, ऐसा क्यों?
(6) मध्य काल में राजाओं और बादशाहों के साम्राज्य विस्तार के लिए होने वाले युद्घों में बहुत से लोग मारे जाते थे, इसलिए जनसंख्या कम थी। आज ऐसा नही है तो जनसंख्या अधिक हो गयी, ऐसा क्यों? (7) यदि सभी कुछ पूर्व निर्धारित है तो हम सडक़ के नियमों का पालन क्यों करते हैं? (8) इसी प्रकार हमें बीमार होने पर चिकित्सक का सहारा नही लेना चाहिए। बीमारी हुई है तो पूर्व निर्धारित कालक्रम के अनुसार हुई है और यदि जाएगी तो भी पूर्व निर्धारित कालक्रम के अनुसार ही जाएगी, तब हमारी व्यर्थ की भागदौड़ किस काम की? व्यर्थ का तनाव और पैसा खर्च करना किस काम का है? (9) हमें मनु महाराज ने ऐसा क्यों बताया-
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्घोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वद्र्घन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।
(मनुस्मृति)
महर्षि दयानंद जी ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है कि-जो नम्र सुशील है, जो ऐसा नित्य करते हैं (अपने वृद्घों की सेवा और अभिवादन) उनके बल, आयु, विद्या और यश सदा बढ़ते हैं, जो ऐसा नही करते उनकी आयु आदि नही बढ़ती। वास्तव में यदि व्यक्ति ने आयुर्वेद की खोज की है, ईश्वर ने वनस्पति जगत में जीवों के कल्याणार्थ औषधियां प्रदान की हैं, हमने शत्रु से बचने के लिए अपने सुरक्षाबल और सैन्यबल बनाये हैं, सडक़ों पर चलने के लिए यातायात के नियम बनाये हैं, और माता-पिता आदि वृद्घों के प्रति सेवाभाव और सत्कार की भावना के नैतिक प्राविधान किये हैं, तो स्पष्ट है कि आयु का बढऩा या घटना मानव के क्रिया कलापों और कार्यों पर भी निर्भर है। इसके लिए हमारे ऋषियों ने हमें अष्टांग योग का रास्ता बताया है, जिसमें मनुष्य मोक्षाभिलाषी बनकर जीवन की साधना करता है और मृत्यु पर विजय प्राप्त करके जीवन को विस्तार देता है। महर्षि चरक का यह कथन भी उल्लेखनीय है-
‘‘हितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययो हि मृत्यु:’’
अर्थात मनुष्य का जीवन हितकारी चिकित्सा पर निर्भर है, इसके विपरीत उचित चिकित्सा न होने से मृत्यु अवश्य होती है। हम अपने शरीर रूपी यंत्र (मशीन) की जितनी अधिक सुरक्षा व सेवा करेंगे उतना ही यह दीर्घजीवी बनेगा।
समाज में लोग बड़े सहज भाव से कह देते हैं कि श्वास और ग्रास सब पूर्व निर्धारित हैं। मनुष्य अपने श्वासों को काम, क्रोध और दूसरी व्याधियों में फंसकर तेज-तेज लेकर शीघ्रता से समाप्त कर सकता है, और प्राणायाम के माध्यम से श्वासों की गति को सामान्य और सुंदर बना सकता है, उन्हें दीर्घ कर सकता है। हमारे समाज में ‘‘कम खाना और गम खाना’’ वाला मुहावरा बहुत प्रचलित है, इसका महत्वपूर्ण अर्थ है क्योंकि इन दोनों से ही आयु बढ़ती है। हम भय, चिंता, शोक आदि से दूर होते हैं। मनुस्मृति अध्याय 4 श्लोक 157 में कहा गया है-
दुराचारो हि पुरूषोलोकेभवति निंदित:।
दु:ख भागी-च सततं व्याधितोअल्पायुरेव च।।
अर्थात जो दुष्टाचारी पुरूष होता है वह सर्वत्र व्याधित और अल्पायु होता है। अत: स्पष्ट है कि सदाचार से आयु बढ़ती है और दुराचार से आयु घटती है।
सत्यार्थ प्रकाश के दूसरे समुल्लास में महर्षि दयानंद कहते हैं-‘‘बालक अभिज्ञात जलाशय में जाकर स्नानादि न करें, क्यों जल जंतुओं के हानि पहुंचाने से वह मर सकता है और डूबकर भी मर सकता है।’’ इसका अभिप्राय है कि मृत्यु किसी भी समय संभव है, इसलिए सावधानी बरती जानी आवश्यक है।
ईश्वर-सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी है,उसको सब कुछ पता है,वह कालातीत है। जबकि ईश्वर के इन गुणों के विपरीत जीव अल्पज्ञ है। जीव नही जान सकता कि उसकी आयु का परिमाण, नापतोल अथवा उसका ओर छोर क्या है? ईश्वर के ज्ञान में आयु का निश्चित होना इसलिए है कि वह हमारे शुभाशुभ कर्मों का फल प्रदाता है। जिसका ज्ञान ईश्वर ही अपनी सर्वज्ञता से जानता है मनुष्य को तो अपने सुख दुख के फल की परिमाण तक का भी ज्ञान नही है। उसे नही मालूम है कि सुख अथवा दुख की अनुभूति कब तक रहेगी? अत: मनुष्य की आयु उसके अपने ज्ञान में अनिश्चित है। सत्यार्थ प्रकाश के 8वें समुल्लास में ‘आयु निश्चित है’ ये नही कहा गया है, अपितु जीवों का जन्म पूर्वकृत कर्मों के आधार पर ईश्वर करता है यह कहा गया है। इसलिए मानवीय ज्ञान में आयु को निश्चित मानना संभव नही है।
भारतवर्ष के अन्य प्राचीन ऋषियों की भांति महर्षि दयानंद जी ने भी ब्रह्मचर्य और सदाचरण पर मानव के लिए विशेष बल देकर दीर्घायुष्य प्राप्त करने और सप्रमाण संकेत किया है। यदि आयु मानवीय ज्ञान में निश्चित होती तो महर्षि दयानंद जी महाराज ऐसा नही करते। देखिए मनुस्मृति में भी कहा गया है कि-
सर्वलक्षण हीनोअपि य: सदाचार वान्नर:।
श्रद्धानोअनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति।।
इसकी व्याख्या करते हुए महर्षि दयानंद जी लिखते हैं-जो सबसे अच्छे लक्षणों से हीन होकर भी सदाचारयुक्त, श्रद्घा और निंदा आदि दोषों से रहित होता है, वह सुख से सौ वर्ष पर्यन्त तक जीता है। ‘‘महामृत्युजंय मंत्र’’-
‘‘त्र्यंबकम् यजामहे……..मृत्योर्मुक्षीय माअमृतात्’’ में भी कहा गया है कि मुझको मृत्यु से छुड़ाओ अमृत से नही, मृत्यु से छुड़ाने की प्रार्थना तभी की जा सकती है जबकि उससे छूटा जा सकता है। बच्चे के नामकरण संस्कार पर भी हम प्राचीनकाल से उसे आशीर्वाद के रूप में कहते चले आ रहे हैं कि-‘‘त्वं आयुष्मान, वर्चस्वी, तेजस्वी, श्रीमान भूया:।।’’
हे बालक-तू आयुष्मान विद्यावान, यशस्वी, धर्मात्मा पुरूषार्थी, प्रतापी, परोपकारी और श्रीमान हो।
विवाह संस्कार में वर अपनी पत्नी से कहता है-‘‘……….ममेयमस्तु पोष्या: शं जीव ‘शरद:’ शतम्।। अर्थात मुझ पति के साथ (शरद:शांत) सौ शरद ऋतुओं तक शत वर्ष पर्यन्त ‘‘शं जीव’’ सुखपूर्वक जीवन धारण कर। लाजा होम के दूसरे मंत्र में कहा है-
‘‘…………..आयुष्मानस्तु मे पति:।। वधू कहती है कि मेरा पति लंबी आयु वाला हो, उसका दीर्घ जीवन हो। उपरोक्त कथन के प्रत्युत्तर में वर बोलता है-
‘‘ओउम् तच्चक्षुर्देवहितं…..स्याम शरद: शतम् भूयश्च शरद: शतात्।।
अर्थात मुझ पति के साथ प्रजावती होकर सौ वर्ष पर्यन्त आनंद पूर्वक जीवन धारण कर। ‘‘इमं जीवेभ्य: परिधिं दधामि……………।।
स्वामी महामुनि जी के अनुसार बहुत सुख प्राप्त कराने वाली सौ सर्दियों तक जीवित रह,पूर्ण करने के साधन वाले ब्रह्मचर्य रूप पर्वत के द्वारा मृत्यु को अंतर्हित लुप्त करें, अर्थात नष्ट करें। अर्थात मुमुक्षु के लिए ईश्वर नियत परिधि बनाता है, कोई भी मुमुक्षु उसमें रहकर शीघ्र मृत्यु का ग्रास नही बनता। किंतु सौ या बहुत वर्षों तक वह जीता है। ब्रह्मचर्य रूपी पर्वत को मृत्यु लांघ नही सकती है। ऐसे अनेकों प्रमाण हमारे वैदिक वांड्मय में हैं। जिनमें लंबी आयु की कामना हमने ईश्वर से की है। अथवा ईश्वरीय वाणी वेद ने हमें दीर्घजीवन की प्राप्ति के रहस्य बताते हुए उसकी ओर बढऩे के लिए प्रेरित किया है।
उपरोक्त प्रमाणों से यह सिद्घ है कि ‘‘आयु घट बढ़ सकती है। आयु को तनाव, भय, चिंता, विषय विकार काम क्रोधादि घटाते हैं। पश्चिमी जगत इन सभी बातों से तंग आकर आज भारत की संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। वह योग से जुड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक मूल्यों की धरोहर को अपनाकर अपने आचार-विचार और आहार-विहार को च्भारतीयज्बना रहा है। वह शाकाहार की ओर आ रहा है। उसने समझ लिया है कि जीवन का वास्तविक आनंद च्लॉफिंग क्लबोंज् में नही है अपितु स्वाभाविक और तनावमुक्त हंसी के हंसने और स्वाभाविक जीवन जीने में है। इसलिए वह अपने आप भारत की ओर खिंच रहा है।
मांसाहार व्यक्ति के लिए वर्जित है। क्योंकि यह आयु को क्षीण करने वाला है। आजकल चिकित्सा विज्ञान में मांसाहार पर काफी शोध की जा रही है। वाशिंगटन के दैनिक समाचार पत्र में मांसाहार के संदर्भ में कुछ तथ्य प्रकाशित हुए हैं-यथा-‘‘मांसाहार करने वालों को जानलेवा बीमारियां ज्यादा होती हैं’’। अमेरिका की प्रतिष्ठित रिसर्च संस्था ‘वल्र्ड वाच’ ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है कि-इसके अनुसार मांस खाने वालों को दिल के दौरे, मधुमेह, आंतों का कैंसर और दूसरी घातक बीमारियां आसानी से हो जाती हैं।
जार्ज बर्नार्डशा के शब्दों में देखिए-मांसाहार क्रूरता को जन्म देता है।
यही कारण है कि मानव आज हिंसक बनकर ७५००० जीव जंतुओं की प्रजातियों को नष्ट कर चुका है। इतने बड़े पाप का एक ही कारण है कि हमने यह मान लिया है कि होनी बलवान होती है। जो भी हम कर रहे हैं उसमें किसी अदृश्य शक्ति की प्रेरणा कार्य कर रही है। फलस्वरूप मानव अधर्मी बनकर क्रूर हो गया है, हिंसक हो गया है। अपने ही पैंरों पर कुल्हाड़ी मारे जा रहा है और फिर बड़ी बेशर्मी से स्वयं को सभ्य कहता है। हमें स्मरण रखना होगा कि परिस्थितियों का निर्माता मानव स्वयं होता है। वास्तव में सच यह है कि परिस्थितियों का भंवर जाल हो हमें बहा ले गया हमारी ही मूर्खताओं का परिणाम था। अत: जो होनी होती है उसे हम अपने विवेक, बुद्घिकौशल और विचारपूर्ण कार्यशैली से टाल सकते हैं। हम अपने भाग्य निर्माता स्वयं हैं। रास्ता कौन सा चुनना है विवेक का अथवा अविवेक का? उसके चयनकर्ता हम स्वयं हैं। विवेक का रास्ता आयुवर्धक है और अविवेक का रास्ता आयु घटाता है।
अधिकांश जानलेवा अथवा आयु को क्षीण करने वाले रोग भी हमारी अपनी भूलों के ही परिणाम होते हैं। उसका फल ईश्वर देता है जो कभी कभी मृत्यु के रूप में भी हमें देखने को मिलता है।
अत: यह कहना भी सर्वथा अज्ञानमय है कि-ईश्वर को करना ही ऐसा था, जो हो गया है। अपितु सही रूप में यह कहना चाहिए कि हमारे कर्म ही ऐसे थे कि जो ईश्वर ने यह फ ल हमें दिया है। तब ईश्वर के प्रति दुखों में रहकर भी कृतज्ञता बढ़ेगी, आस्तिक भाव बढ़ेगा और दुखों को सहन करने की शक्ति बढ़ेगी। जबकि फल देने को मात्र ईश्वर का अन्याय मानने से उसके प्रति नास्तिक भाव बढ़ेगा। दुख पहाड़ बन जाएंगे और जीवन बोझ बन जाएगा।
अत: हमें किसी प्रकार के मिथकों में चित्त को न भरमाकर अपने जीवन और अपनी आयु का पोषक,संरक्षक और शुभचिंतक बनना चाहिए। ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस मशीनरी की देखभाल और रख रखाव हम अपने बुद्घि कौशल और विवेक से करते रहें। अपने आचार विचार और आहार विहार पर ध्यान दें, क्योंकि यही ‘दीर्घायुष्य’ का रहस्य है।