शनिवार, 13 सितंबर 2014

भारतीय समय गणना प्रणाली



भारतीय समय गणना प्रणाली

1. सम्वत्सर(hindu new year) की वैज्ञानिकता

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक पश्चिमी देशों में उनके अपने धर्म-ग्रन्थों के अनुसार मानव सृष्टि को मात्र पांच हजार वर्ष पुराना बताया जाता था। जबकि इस्लामी दर्शन में इस विषय पर स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक भी अपने धर्म-ग्रन्थों की भांति ही यही राग अलापते रहे कि मानवीय सृष्टि का बहुत प्राचीन नहीं है। इसके विपरीत हिन्दू जीवन-दर्शन के अनुसार इस सृष्टि का प्रारम्भ हुए १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, १० वर्ष बीत चुके हैं और अब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से उसका १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, ११वां वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। भूगर्भ से सम्बन्धित नवीनतम आविष्कारों के बाद तो पश्चिमी विद्वान और वैज्ञानिक भी इस तथ्य की पुष्टि करने लगे हैं कि हमारी यह सृष्टि प्राय: २ अरब वर्ष पुरानी है।


अपने देश में हेमाद्रि संकल्प में की गयी सृष्टि की व्याख्या के आधार पर इस समय स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष नामक छह मन्वन्तर पूर्ण होकर अब वैवस्वत मन्वन्तर के २७ महायुगों के कालखण्ड के बाद अठ्ठाइसवें महायुग के सतयुग, त्रेता, द्वापर नामक तीन युग भी अपना कार्यकाल पूरा कर चौथे युग अर्थात कलियुग के ५०११वें सम्वत्‌ का प्रारम्भ हो रहा है। इसी भांति विक्रम संवत्‌ २०६६ का भी श्रीगणेश हो रहा है।

हिन्दू जीवन-दर्शन की मान्यता है कि सृष्टिकर्ता भगवान्‌ व्रह्मा जी द्वारा प्रारम्भ की गयी मानवीय सृष्टि की कालगणना के अनुसार भारत में प्रचलित सम्वत्सर केवल हिन्दुओं, भारतवासियों का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण संसार या समस्त मानवीय सृष्टि का सम्वत्सर है। इसलिए यह सकल व्रह्माण्ड के लिए नव वर्ष के आगमन का सूचक है।

व्रह्मा जी प्रणीत यह कालगणना निसर्ग अथवा प्रकृति पर आधारित होने के कारण पूरी तरह वैज्ञानिक है। अत: नक्षत्रों को आधार बनाकर जहां एक ओर विज्ञानसम्मत चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कात्तिर्क, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन नामक १२ मासों का विधान एक वर्ष में किया गया है, वहीं दूसरी ओर सप्ताह के सात दिवसों यथा रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार तथा शनिवार का नामकरण भी व्रह्मा जी ने विज्ञान के आधार पर किया है।

आधुनिक समय में सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित ईसाइयत के ग्रेगेरियन कैलेण्डर को दृष्टिपथ में रखकर अज्ञानी जनों द्वारा प्राय: यह प्रश्न किया जाता है कि व्रह्मा जी ने आधा चैत्र मास व्यतीत हो जाने पर नव सम्वत्सर और सूर्योदय से नवीन दिवस का प्रारम्भ होने का विधान क्यों किया है? इसी भांति सप्ताह का प्रथम दिवस सोमवार न होकर रविवार ही क्यों निर्धारित किया गया है? जैसा ऊपर कहा जा चुका है, व्रह्मा जी ने इस मानवीय सृष्टि की रचना तथा कालगणना का पूरा उपक्रम निसर्ग अथवा प्रकृति से तादात्म्य रखकर किया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि ‘चैत्रमासे जगत्‌ व्रह्मा संसर्ज प्रथमेऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदय सति।‘ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस को सूर्योदय से कालगणना का औचित्य इस तथ्य में निहित है कि सूर्य, चन्द्र, मंगल, पृथ्वी, नक्षत्रों आदि की रचना से पूर्व सम्पूर्ण त्रैलोक्य में घटाटोप अन्धकार छाया हुआ था। दिनकर(सूर्य) की उत्पत्ति के साथ इस धरा पर न केवल प्रकाश प्रारम्भ हुआ अपितु भगवान्‌ आदित्य की जीवनदायिनी ऊर्जा शक्ति के प्रभाव से पृथ्वी तल पर जीव-जगत का जीवन भी सम्भव हो सका। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के स्थान पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वर्ष का आरम्भ, अर्द्धरात्रि के स्थान पर सूर्योदय से दिवस परिवर्तन की व्यवस्था तथा रविवार को सप्ताह का प्रथम दिवस घोषित करने का वैज्ञानिक आधार तिमिराच्छन्न अन्धकार को विदीर्ण कर प्रकाश की अनुपम छटा बिखेरने के साथ सृजन को सम्भव बनाने की भगवान्‌ भुवन भास्कर की अनुपमेय शक्ति में निहित है। वैसे भी इंग्लैण्ड के ग्रीनविच नामक स्थान से दिन परिवर्तन की व्यवस्था में अर्द्ध रात्रि के १२ बजे को आधार इसलिए बनाया गया है; क्योंकि जब इंग्लैण्ड में रात्रि के १२ बजते हैं, तब भारत में भगवान्‌ सूर्यदेव की अगवानी करने के लिए प्रात: ५.३० बजे होते हैं।

वारों के नामकरण की विज्ञान सम्मत प्रक्रिया में व्रह्मा जी ने स्पष्ट किया कि आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारम्भ होकर क्रमश: बुध, शुक्र, चन्द्र, मंगल, गुरु और शनि की है। पृथ्वी के उपग्रह चन्द्रमा सहित इन्हीं अन्य छह ग्रहों को साथ लेकर व्रह्मा जी ने सप्ताह के सात दिनों का नामकरण किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पृथ्वी अपने उपग्रह चन्द्रमा सहित स्वयं एक ग्रह है, किन्तु पृथ्वी पर उसके नाम से किसी दिवस का नामकरण नहीं किया जायेगा; किन्तु उसके उपग्रह चन्द्रमा को इस नामकरण में इसलिए स्थान दिया जायेगा; क्योंकि पृथ्वी के निकटस्थ होने के कारण चन्द्रमा आकाशमण्डल की रश्मियों को पृथ्वी तक पहुँचाने में संचार उपग्रह का कार्य सम्पादित करता है और उससे मानवीय जीवन बहुत गहरे रूप में प्रभावित होता है। लेकिन पृथ्वी पर यह गणना करते समय सूर्य के स्थान पर चन्द्र तथा चन्द्र के स्थान पर सूर्य अथवा रवि को रखा जायेगा।

हम सभी यह जानते हैं कि एक अहोरात्र या दिवस में २४ होरा या घण्टे होते हैं। व्रह्मा जी ने इन २४ होरा या घण्टों में से प्रत्येक होरा का स्वामी क्रमश: सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु और मंगल को घोषित करते हुए स्पष्ट किया कि सृष्टि की कालगणना के प्रथम दिवस पर अन्धकार को विदीर्ण कर भगवान्‌ भुवन भास्कर की प्रथम होरा से क्रमश: शुक्र की दूसरी, बुध की तीसरी, चन्द्रमा की चौथी, शनि की नौवीं, गुरु की छठी तथा मंगल की सातवीं होरा होगी। इस क्रम से इक्कीसवीं होरा पुन: मंगल की हुई। तदुपरान्त सूर्य की बाईसवीं, शुक्र की तेईसवीं और बुध की चौबीसवीं होरा के साथ एक अहोरात्र या दिवस पूर्ण हो गया। इसके बाद अगले दिन सूर्योदय के समय चन्द्रमा की होरा होने से दूसरे दिन का नामकरण सोमवार किया गया। अब इसी क्रम से चन्द्र की पहली, आठवीं और पंद्रहवीं, शनि की दूसरी, नववीं और सोलहवीं, गुरु की तीसरी, दशवीं और उन्नीसवीं, मंगल की चौथी, ग्यारहवीं और अठ्ठारहवीं, सूर्य की पाचवीं, बारहवीं और उन्नीसवीं, शुक्र की छठी, तेरहवीं और बीसवीं, बुध की सातवीं, चौदहवीं और इक्कीसवीं होरा होगी। बाईसवीं होरा पुन: चन्द्र, तेईसवीं शनि और चौबीसवीं होरा गुरु की होगी। अब तीसरे दिन सूर्योदय के समय पहली होरा मंगल की होने से सोमवार के बाद मंगलवार होना सुनिश्चित हुआ। इसी क्रम से सातों दिवसों की गणना करने पर वे क्रमश: बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार तथा शनिवार घोषित किये गये; क्योंकि मंगल से गणना करने पर बारहवीं होरा गुरु पर समाप्त होकर बाईसवीं होरा मंगल, तेईसवीं होरा रवि और चौबीसवीं होरा शुक्र की हुई। अब चौथे दिवस की पहली होरा बुध की होने से मंगलवार के बाद का दिन बुधवार कहा गया। अब बुधवार की पहली होरा से इक्कीसवीं होरा शुक्र की होकर बाईसवीं, तेईसवीं और चौबीसवीं होरा क्रमश: बुध, चन्द्र और शनि की होगी। तदुपरान्त पांचवें दिवस की पहली, होरा गुरु की होने से पांचवां दिवस गुरुवार हुआ। पुन: छठा दिवस शुक्रवार होगा; क्योंकि गुरु की पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं और बाईसवीं होरा के पश्चात्‌ तेईसवीं होरा मंगल और चौबीसवीं होरा सूर्य की होगी। अब छठे दिवस की पहली होरा शुक्र की होगी। सप्ताह का अन्तिम दिवस शनिवार घोषित किया गया; क्योंकि शुक्र की पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं और बाईसवीं होरा के उपरान्त बुध की तेईसवीं और चन्द्रमा की चौबीसवीं होरा पूर्ण होकर सातवें दिवस सूर्योदय के समय प्रथम होरा शनि की होगी।

संक्षेप में व्रह्मा जी प्रणीत इस कालगणना में नक्षत्रों, ऋतुओं, मासों, दिवसों आदि का निर्धारण पूरी तरह निसर्ग अथवा प्रकृति पर आधारित वैज्ञानिक रूप से किया गया है। दिवसों के नामकरण को प्राप्त विश्वव्यापी मान्यता इसी तथ्य का प्रतीक है।

2. पश्चिमी और भारतीय कालगणना का अंतर 
पाश्चात्य कालगणना (Western time calculations)
चिल्ड्रन्स ब्रिटानिका Vol 3-1964 में कैलेंडर के संदर्भ में उसके संक्षिप्त इतिहास का वर्णन किया गया है। कैलेंडर यानी समय विभाजन का तरीका-वर्ष, मास, दिन, का आधार, पृथ्वी की गति और चन्द्र की गति के आधार पर करना। लैटिन में Moon के लिए Luna शब्द है, अत: Lunar Month कहते हैं। लैटिन में Sun के लिए Sol शब्द है, अत: Solar Year वर्ष कहते हैं। आजकल इसका माप 365 दिन 5 घंटे 48 मिनिट व 46 सेकेण्ड है। चूंकि सौर वर्ष और चन्द्रमास का तालमेल नहीं है, अत: अनेक देशों में गड़बड़ रही।

दूसरी बात, समय का विभाजन ऐतिहासिक घटना के आधार पर करना। ईसाई मानते हैं कि ईसा का जन्म इतिहास की निर्णायक घटना है, इस आधार पर इतिहास को वे दो हिस्सों में विभाजित करते हैं। एक बी.सी. तथा दूसरा ए.डी.। B.C. का अर्थ है Before Christ - यह ईसा के उत्पन्न होने से पूर्व की घटनाओं पर लागू होता है। जो घटनाएं ईसा के जन्म के बाद हुर्इं उन्हें A.D. कहा जाता है जिसका अर्थ है Anno Domini अर्थात् In the year of our Lord. यह अलग बात है कि यह पद्धति ईसा के जन्म के बाद कुछ सदी तक प्रयोग में नहीं आती थी।

रोमन कैलेण्डर-आज के ई। सन् का मूल रोमन संवत् है जो ईसा के जन्म से 753 वर्ष पूर्व रोम नगर की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ। प्रारंभ में इसमें दस माह का वर्ष होता था, जो मार्च से दिसम्बर तक चलता था तथा 304 दिन होते थे। बाद में राजा नूमा पिम्पोलियस ने इसमें दो माह Jonu Arius और Februarius जोड़कर वर्ष 12 माह का बनाया तथा इसमें दिन हुए 355, पर आगे के वर्षों में ग्रहीय गति से इनका अंतर बढ़ता गया, तब इसे ठीक 46 बी.सी. करने के लिए जूलियस सीजर ने वर्ष को 365 1/4 दिन का करने हेतु नये कैलेंडर का आदेश दिया तथा उस समय के वर्ष को कहा कि इसमें 445 1/4 दिन होंगे ताकि पूर्व में आया अंतर ठीक हो सके। इसलिए उस वर्ष यानी 46 बी.सी. को इतिहास में संभ्रम का वर्ष (Year of confusion) कहते हैं।

जूलियन कैलेंडर- जूलियस सीजर ने वर्ष को 365 1/4 दिन का करने के लिए एक व्यवस्था दी। क्रम से 31 व 30 दिन के माह निर्धारित किए तथा फरवरी 29 दिन की। Leap Year में फरवरी भी 30 दिन की कर दी। इसी के साथ इतिहास में अपना नाम अमर करने के लिए उसने वर्ष के सातवें महीने के पुराने नाम Quinitiles को बदलकर अपने नाम पर जुलाई किया, जो 31 दिन का था। बाद में सम्राट आगस्टस हुआ; उसने भी अपना नाम इतिहास में अमर करने हेतु आठवें महीने Sextilis का नाम बदलकर उस माह का नाम अगस्त किया। उस समय अगस्त 30 दिन का होता था पर-"सीजर से मैं छोटा नहीं", यह दिखाने के लिए फरवरी के माह जो उस समय 29 दिन का होता था जो एक दिन लेकर अगस्त भी 31 दिन का किया। तब से मास और दिन की संख्या वैसी ही चली आ रही है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर - 16वीं सदी में जूलियन कैलेन्डर में 10 दिन बढ़ गए और चर्च फेस्टीवल ईस्टर आदि गड़बड़ आने लगे, तब पोप ग्रेगोरी त्रयोदश ने 1582 के वर्ष में इसे ठीक करने के लिए यह हुक्म जारी किया कि 4 अक्तूबर को आगे 15 अक्तूबर माना जाए। वर्ष का आरम्भ 25 मार्च की बजाय 1 जनवरी से करने को कहा। रोमन कैथोलिकों ने पोप के आदेश को तुरन्त माना, पर प्रोटेस्टेंटों ने धीरे-धीरे माना। ब्रिाटेन जूलियन कैलेंडर मानता रहा और 1752 तक उसमें 11 दिन का अंतर आ गया। अत: उसे ठीक करने के लिए 2 सितम्बर के बाद अगला दिन 14 सितम्बर कहा गया। उस समय लोग नारा लगाते थे "Criseus back our 11 days"। इग्लैण्ड के बाद बुल्गारिया ने 1918 में और ग्रीक आर्थोडाक्स चर्च ने 1924 में ग्रेगोरियन कैलेण्डर माना।

भारत में कालगणना का इतिहास (Indian time calculations)
भारतवर्ष में ग्रहीय गतियों का सूक्ष्म अध्ययन करने की परम्परा रही है तथा कालगणना पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य की गति के आधार पर होती रही तथा चंद्र और सूर्य गति के अंतर को पाटने की भी व्यवस्था अधिक मास आदि द्वारा होती रही है। संक्षेप में काल की विभिन्न इकाइयां एवं उनके कारण निम्न प्रकार से बताये गये-

दिन अथवा वार- सात दिन- पृथ्वी अपनी धुरी पर १६०० कि.मी. प्रति घंटा की गति से घूमती है, इस चक्र को पूरा करने में उसे २४ घंटे का समय लगता है। इसमें १२ घंटे पृथ्वी का जो भाग सूर्य के सामने रहता है उसे अह: तथा जो पीछे रहता है उसे रात्र कहा गया। इस प्रकार १२ घंटे पृथ्वी का पूर्वार्द्ध तथा १२ घंटे उत्तरार्द्ध सूर्य के सामने रहता है। इस प्रकार १ अहोरात्र में २४ होरा होते हैं। ऐसा लगता है कि अंग्रेजी भाषा का ण्दृद्वद्ध शब्द ही होरा का अपभ्रंश रूप है। सावन दिन को भू दिन भी कहा गया।

सौर दिन-पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 1 लाख कि.मी. प्रति घंटा की रफ्तार से कर रही है। पृथ्वी का 10 चलनसौर दिन कहलाता है।

चन्द्र दिन या तिथि- चन्द्र दिन को तिथि कहते हैं। जैसे एकम्, चतुर्थी, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय चन्द्र का 12 अंश तक चलन एक तिथि कहलाता है।

सप्ताह- सारे विश्व में सप्ताह के दिन व क्रम भारत वर्ष में खोजे गए क्रम के अनुसार ही हैं। भारत में पृथ्वी से उत्तरोत्तर दूरी के आधार पर ग्रहों का क्रम निर्धारित किया गया, यथा- शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुद्ध और चन्द्रमा। इनमें चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे पास है तो शनि सबसे दूर। इसमें एक-एक ग्रह दिन के 24 घंटों या होरा में एक-एक घंटे का अधिपति रहता है। अत: क्रम से सातों ग्रह एक-एक घंटे अधिपति, यह चक्र चलता रहता है और 24 घंटे पूरे होने पर अगले दिन के पहले घंटे का जो अधिपति ग्रह होगा, उसके नाम पर दिन का नाम रखा गया। सूर्य से सृष्टि हुई, अत: प्रथम दिन रविवार मानकर ऊपर क्रम से शेष वारों का नाम रखा गया।

निम्न तालिका से सातों दिनों के क्रम को हम सहज समझ सकते हैं-
चन्द्र
बुध
शुक्र
सूर्य
मंगल
बृह.
शनि
रवि 
-
-
-
११
१०
१८
१७
१६
१५
१४
१३
१२
सोम 
२४
२३
२२
२१
२०
१९
१५
१४
१३
१२
११
१०
२२
२१
२०
१९
१८
१७
१६
मंगल 
२४
२३
१२
११
१०
१९
१८
१७
१६
१५
१४
१३
बुध 
२४
२३
२२
२१
२०
१६
१५
१४
१३
१२
११
१०
२३
२२
२१
२०
१९
१८
१७
बृह.
२४
१३
१२
११
१०
२०
१९
१८
१७
१६
१५
१४
शुक्र 
२४
२३
२२
२१
१०
१७
१६
१५
१४
१३
१२
११
२४
२३
२२
२१
२०
१९
१८
                                                                            शनि १
पक्ष-पृथ्वी की परिक्रमा में चन्द्रमा का १२ अंश चलना एक तिथि कहलाता है। अमावस्या को चन्द्रमा पृथ्वी तथा सूर्य के मध्य रहता है। इसे ० (अंश) कहते हैं। यहां से १२ अंश चलकर जब चन्द्रमा सूर्य से १८० अंश अंतर पर आता है, तो उसे पूर्णिमा कहते हैं। इस प्रकार एकम्‌ से पूर्णिमा वाला पक्ष शुक्ल पक्ष कहलाता है तथा एकम्‌ से अमावस्या वाला पक्ष कृष्ण पक्ष कहलाता है।

मास- कालगणना के लिए आकाशस्थ २७ नक्षत्र माने गए (१) अश्विनी (२) भरणी (३) कृत्तिका (४) रोहिणी (५) मृगशिरा (६) आर्द्रा (७) पुनर्वसु (८) पुष्य (९) आश्लेषा (१०) मघा (११) पूर्व फाल्गुन (१२) उत्तर फाल्गुन (१३) हस्त (१४) चित्रा (१५) स्वाति (१६) विशाखा (१७) अनुराधा (१८) ज्येष्ठा (१९) मूल (२०) पूर्वाषाढ़ (२१) उत्तराषाढ़ (२२) श्रवणा (२३) धनिष्ठा (२४) शतभिषाक (२५) पूर्व भाद्रपद (२६) उत्तर भाद्रपद (२७) रेवती।

२७ नक्षत्रों में प्रत्येक के चार पाद किए गए। इस प्रकार कुल १०८ पाद हुए। इनमें से नौ पाद की आकृति के अनुसार १२ राशियों के नाम रखे गए, जो निम्नानुसार हैं-

(१) मेष (२) वृष (३) मिथुन (४) कर्क (५) सिंह (६) कन्या (७) तुला (८) वृश्चिक (९) धनु (१०) मकर (११) कुंभ (१२) मीन। पृथ्वी पर इन राशियों की रेखा निश्चित की गई, जिसे क्रांति कहते है। ये क्रांतियां विषुव वृत्त रेखा से २४ उत्तर में तथा २४ दक्षिण में मानी जाती हैं। इस प्रकार सूर्य अपने परिभ्रमण में जिस राशि चक्र में आता है, उस क्रांति के नाम पर सौर मास है। यह साधारणत: वृद्धि तथा क्षय से रहित है।

चन्द्र मास- जो नक्षत्र मास भर सायंकाल से प्रात: काल तक दिखाई दे तथा जिसमें चन्द्रमा पूर्णता प्राप्त करे, उस नक्षत्र के नाम पर चान्द्र मासों के नाम पड़े हैं- (१) चित्रा (२) विशाखा (३) ज्येष्ठा (४) अषाढ़ा (५) श्रवण (६) भाद्रपद (७) अश्विनी (८) कृत्तिका (९) मृगशिरा (१०) पुष्य (११) मघा (१२) फाल्गुनी। अत: इसी आधार पर चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विनी, कृत्तिका, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन-ये चन्द्र मासों के नाम पड़े।

उत्तरायण और दक्षिणायन-पृथ्वी अपनी कक्षा पर २३  अंश उत्तर पश्चिमी में झुकी हुई है। अत: भूमध्य रेखा से २३  अंश उत्तर व दक्षिण में सूर्य की किरणें लम्बवत्‌ पड़ती हैं। सूर्य किरणों का लम्बवत्‌ पड़ना संक्रान्ति कहलाता है। इसमें २३ अंश उत्तर को कर्क रेखा कहा जाता है तथा दक्षिण को मकर रेखा कहा जाता है। भूमध्य रेखा को ०० अथवा विषुव वृत्त रेखा कहते हैं। इसमें कर्क संक्रान्ति को उत्तरायण एवं मकर संक्रान्ति को दक्षिणायन कहते हैं।

वर्षमान- पृथ्वी सूर्य के आस-पास लगभग एक लाख कि.मी. प्रति घंटे की गति से १६६०००००० कि.मी. लम्बे पथ का ३६५  दिन में एक चक्र पूरा करती है। इस काल को ही वर्ष माना गया।


युगमान- 4,32,000 वर्ष में सातों ग्रह अपने भोग और शर को छोड़कर एक जगह आते हैं। इस युति के काल को कलियुग कहा गया। दो युति को द्वापर, तीन युति को त्रेता तथा चार युति को सतयुग कहा गया। चतुर्युगी में सातों ग्रह भोग एवं शर सहित एक ही दिशा में आते हैं।

वर्तमान कलियुग का आरंभ भारतीय गणना से ईसा से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था। उस समय सभी ग्रह एक ही राशि में थे। इस संदर्भ में यूरोप के प्रसिद्ध खगोलवेत्ता बेली का कथन दृष्टव्य है-

"हिन्दुओं की खगोलीय गणना के अनुसार विश्व का वर्तमान समय यानी कलियुग का आरम्भ ईसा के जन्म से 3102 वर्ष पूर्व 20 फरवरी को 2 बजकर 27 मिनट तथा 30 सेकेंड पर हुआ था। इस प्रकार यह कालगणना मिनट तथा सेकेण्ड तक की गई। आगे वे यानी हिन्दू कहते हैं, कलियुग के समय सभी ग्रह एक ही राशि में थे तथा उनके पञ्चांग या टेबल भी यही बताते हैं। ब्राहृणों द्वारा की गई गणना हमारे खगोलीय टेबल द्वारा पूर्णत: प्रमाणित होती है। इसका कारण और कोई नहीं, अपितु ग्रहों के प्रत्यक्ष निरीक्षण के कारण यह समान परिणाम निकला है।"। (Theogony of Hindus, by Bjornstjerna P. 34) यहाँ देखें

वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंच मण्डल क्रम वाली है। चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडलसूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। ये उत्तरोत्तर मण्डल का चक्कर लगा रहे हैं।
जैसी चन्द्र प्रथ्वी के, प्रथ्वी सूर्य के , सूर्य परमेष्ठी के, परमेष्ठी स्वायम्भू के| 
चन्द्र की प्रथ्वी की एक परिक्रमा -> एक मास 
प्रथ्वी की सूर्य की एक परिक्रमा -> एक वर्ष 
सूर्य की परमेष्ठी की एक परिक्रमा ->एक मन्वन्तर 
परमेष्ठी की स्वायम्भू की एक परिक्रमा ->एक कल्प
मन्वन्तर मान- सूर्य मण्डल के परमेष्ठी मंडल (आकाश गंगा) के केन्द्र का चक्र पूरा होने पर उसे मन्वन्तर काल कहा गया। इसका माप है 30,67,20,000 (तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष। एक से दूसरे मन्वन्तर के बीच 1 संध्यांश सतयुग के बराबर होता है। अत: संध्यांश सहित मन्वन्तर का माप हुआ 30 करोड़ 84 लाख 48 हजार वर्ष। आधुनिक मान के अनुसार सूर्य 25 से 27 करोड़ वर्ष में आकाश गंगा के केन्द्र का चक्र पूरा करता है।

कल्प- परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है। यानी आकाश गंगा अपने से ऊपर वाली आकाश गंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया। यानी इसका माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)। इसे ब्रह्मा का एक दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात, अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ।

ब्रह्मा का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष
ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्माण्ड की आयु- 31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,000000000 वर्ष)

भारतीय ऋषियों  की इस गणना को देखकर यूरोप के प्रसिद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञानी
Carl Sagan ने अपनी पुस्तक "Cosmos" में कहा "विश्व में हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है जो इस विश्वास पर समर्पित है कि इस ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति और क्षय की एक सतत प्रक्रिया चल रही है और यही एक धर्म है, जिसने समय के सूक्ष्मतम से लेकर बृहत्तम माप, जो समान्य दिन-रात से लेकर 8 अरब 64 करोड़ वर्ष के ब्राहृ दिन रात तक की गणना की है, जो संयोग से आधुनिक खगोलीय मापों के निकट है। यह गणना पृथ्वी व सूर्य की उम्र से भी अधिक है तथा इनके पास और भी लम्बी गणना के माप है।" कार्ल सेगन ने इसे संयोग कहा है यह ठोस ग्रहीय गणना पर आधारित है। Cosmos यहाँ से प्राप्त कर सकते है|
http://www.hindu-blog.com/2007/04/hindu-concept-of-beginning-and-end-of.html

ऋषियों की अद्भुत खोज
हमारे पूर्वजों ने जहां खगोलीय गति के आधार पर काल का मापन किया, वहीं काल की अनंत यात्रा और वर्तमान समय तक उसे जोड़ना तथा समाज में सर्वसामान्य व्यक्ति को इसका ध्यान रहे इस हेतु एक अद्भुत व्यवस्था भी की थी, जिसकी ओर साधारणतया हमारा ध्यान नहीं जाता है। हमारे देश में कोई भी कार्य होता हो चाहे वह भूमिपूजन हो, वास्तुनिर्माण का प्रारंभ हो- गृह प्रवेश हो, जन्म, विवाह या कोई भी अन्य मांगलिक कार्य हो, वह करने के पहले कुछ धार्मिक विधि करते हैं। उसमें सबसे पहले संकल्प कराया जाता है। यह संकल्प मंत्र यानी अनंत काल से आज तक की समय की स्थिति बताने वाला मंत्र है। इस दृष्टि से इस मंत्र के अर्थ पर हम ध्यान देंगे तो बात स्पष्ट हो जायेगी।

संकल्प मंत्र में कहते हैं....
ॐ अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्राहृणां द्वितीये परार्धे
अर्थात् महाविष्णु द्वारा प्रवर्तित अनंत कालचक्र में वर्तमान ब्रह्मा की आयु का द्वितीय परार्ध-वर्तमान ब्रह्मा की आयु के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं।
श्वेत वाराह कल्पे-कल्प याने ब्रह्मा के 51वें वर्ष का पहला दिन है।

वैवस्वतमन्वंतरे- ब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं उसमें सातवां मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।

अष्टाविंशतितमे कलियुगे- एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं, उनमें से 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है।

कलियुगे प्रथमचरणे- कलियुग का प्रारंभिक समय है।

कलिसंवते या युगाब्दे- कलिसंवत् या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा है।

जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे- देश प्रदेश का नाम

अमुक स्थाने - कार्य का स्थान
अमुक संवत्सरे - संवत्सर का नाम
अमुक अयने - उत्तरायन/दक्षिणायन
अमुक ऋतौ - वसंत आदि छह ऋतु हैं
अमुक मासे - चैत्र आदि 12 मास हैं
अमुक पक्षे - पक्ष का नाम (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)
अमुक तिथौ - तिथि का नाम
अमुक वासरे - दिन का नाम
अमुक समये - दिन में कौन सा समय
उपरोक्त में अमुक के स्थान पर क्रमश : नाम बोलने पड़ते है ।
जैसे अमुक स्थाने : में जिस स्थान पर अनुष्ठान किया जा रहा है उसका नाम बोल जाता है ।
उदहारण के लिए दिल्ली स्थानेग्रीष्म ऋतौ आदि  |

अमुक - व्यक्ति - अपना नाम, फिर पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करता है।

इस प्रकार जिस समय संकल्प करता है, उस समय से अनंत काल तक का स्मरण सहज व्यवहार में भारतीय जीवन पद्धति में इस व्यवस्था के द्वारा आया है।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

भरतवर्ष को मेट्रो सिटी नहीं मेघा ग्राम चाहिए

भारतवर्ष को मेट्रो सिटी नहीं मेघा ग्राम चाहिए


मेट्रो सिटी नहीं ‘मेधा ग्राम’ बसाइए

-राकेश कुमार आर्य-
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ग्राम अपने आप में एक ऐसी व्यवस्था है जिसके विषय में इसके पूर्णत: आत्मनिर्भर पूर्णत: आत्मानुशासित और पूर्णत: आत्मनियंत्रित रहने की परिकल्पना को हमारे ऋषि पूर्वजों ने साकार रूप दिया। आज के भौतिकवादी युग में किसी ईकाई या संस्था के पूर्णत: आत्मनिर्भर आत्मानुशासित अथवा आत्मनियंत्रित होने की कल्पना नहीं की जा सकती। ग्राम्य और शहरी सभ्यता में यही अंतर है।
ग्राम्य सभ्यता संस्कृति प्रधान होती थी, जिसमें एक ऋषि या ऋषिमंडल के दिशा निर्देशन में पूरा गांव कार्य करता था। जहां व्यायामशाला होती थी, कृषि योग्य भूमि होती थी। जिससे अन्न औषधादि मनुष्य देह की नीरोगता के लिए उत्पन्न होती थी। एक गुरूकुल होता था, जिसमें ऋषि लोग छात्रों का जीवन निर्माण कर उन्हें विश्व राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाया करते थे। गोचर भूमि में गौ-धन विचरता था, जो हमारी कृषीय अर्थव्यवस्था का आधार होता था और मेधावृद्घि कर हमारी आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता था। ऐसे परिवेश में एक गांव के लिए दूध, पानी, भोजन, अन्नादि कहीं बाहर से नहीं लाना पड़ता था, अपितु जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति वहीं होती थी। प्रकृति के साथ सहचर्य के आनंद से खरा वातावरण जगमगाता था, चारों ओर सहचर्य और संवेदनाओं की मीठी-मीठी सुगंध मीठे जल के झरने की भांति झरती रहती थी। इससे आध्यात्म का वातावरण बना रहता था। प्रत्येक प्राणी के जीवन को हम अपने लिए उपयोगी मानते थे, इसलिए जीव हत्या पूर्णत: निषिद्ध होती थी। अत: जीवन को संपूर्णता में जीने की एक संपूर्ण व्यवस्था का नाम है ग्राम। यह हमारी उच्चतम मेधा शक्ति का प्रतीक था।
योग से मोक्ष प्राप्ति हमारे जीवन का उद्देश्य हुआ करती थी। इसलिए चारों ओर आत्मानुशासन हुआ करता था। भारत को हम बड़े सहज भाव से गांवों का देश कह देते हैं, पर यह जानने का प्रयास नहीं करते कि गांव होता क्या है? हम यह भी कहते हैं कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, पर यह नही जानते कि भारत की आत्मा है क्या? सचमुच गांव सहयोग, सम्मैत्री, सदभाव, सहचर्य और समभाव की वह पावन गंगा है जो मानव हृदय की अध्यात्म की प्यास बुझाती है और उसे मानव से देव बनने की ओर प्रेरित करती है। मानव का आध्यात्मिक जागरण कर उसे प्रकृति का असहयोगी नही, अपितु सहयोगी बनाती है और उसे प्रेरित करती है कि मेरी तरह तू भी बीहड़ जंगलों के बीच से अपना रास्ता बना, आगे बढ़ और विलीन हो जा मोक्ष के अनंत सागर में। सचमुच ये सहयोग, सम्मैत्री आदि के दिव्य गुण गांव में इसलिए मिलते थे कि वहां दिव्य मेधासंपन्न दिव्य ऋषि मंडल रहा करता था। ये ऋषिमंडल किसी राजा या सम्राट के कानून का पालन नही करता था, अपितु ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार धर्म का शासन चलाता था और सब लोगों में परस्पर सहयोग, सम्मैत्री आदि के दिव्य गुणों को विकसित कर उन्हें जीवन पथ पर आगे बढऩे के लिए खुला छोड़ देता था। वे सारे लोग स्वभावत: इन दिव्य गुणों को अपने जीवन का आधारभूत सत्य मानकर इनके अनुसार ही अपना जीवनाचरण बनाया करते थे। यह आध्यात्मिक जीवन आचरण और सहचर्यवाद की पराकाष्ठा ही भारत की आत्मा है, जो गांवों में बसती कही जाती है।
समय ने करवट ली। जीवन मान्यताएं बदलीं और हमने देखा कि भारत के गांवों को उजाड़कर नगर बसाने की योजनाएं बनने लगीं। अंग्रेजों ने जितनी शीघ्रता से हो सकता था इस ग्राम्य व्यवस्था को उजाडऩे का कार्य करना आरंभ किया। लॉर्ड मैकाले ने 2 फरवरी 1835 ब्रिटेन की संसद में बोलते हुए कहा कि भारत में इस समय 6 लाख गुरूकुल कार्य कर रहे हैं। यानि प्रत्येक गांव में एक गुरूकुल है। यदि हम भारत में सफल होना चाहते हैं तो हमें भारत की इस गुरूकुल परंपरा को समाप्त करना होगा। बस यहीं से भारत को उजाडऩे का उपक्रम आरंभ हुआ। पिछले पौने दो सौ वर्ष से भारत को उजाड़ा जा रहा है। भारत की आत्मा छंटपटा रही है, भारत का प्रकृति के साथ सहचर्यवाद का दिव्य वातावरण समाप्त होकर रह गया है और हम नरकीय जीवन व्यवस्था के मकडज़ाल में जाकर फंस गये हैं।
हमने आध्यात्म के जंगल उजाड़कर कंकरीट के जंगलों को बसाना आरंभ कर दिया। जिससे हमारी संवेदनाएं मरने लगीं और संवेदननाशून्य ‘मशीनी मानव समाज’ का तेजी से विस्तार होने लगा। गरीबी और अमीरी के बीच की खाई में जमीन आसमान का अंतर हो गया। हमने बहुत बड़े मानव समाज को पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित-शोषित या उपेक्षित समझकर बहुत पीछे छोड़ दिया।
इसी खेल में देश आजाद हो गया और आजादी के बाद अब 21वीं सदी में भी भारत आ गया। पर जो खेल चल रहा था उसे हमने छोड़ा नहीं, अपितु उसे और भी द्रुतगति से जारी रखा। हम नगरों से महानगरों में प्रविष्ट हो गये। महानगरों की ये जीवनशैली वो शैली है, जिसमें न तो आत्मनिर्भरता है, न आत्मानुशासन है और नही आत्मनियंत्रण है। यहां जल, वायु, अन्न, औषधि, सब्जी, दूध आदि सभी बाहर से आते हैं। जिससे लोगों को मिलावट करने का अवसर मिलता है, क्योंकि लोग सोचते हैं कि ये चीजें हमारे लिए नहीं, बल्कि शहरियों के लिए जा रही है, कर लो मिलावट… बना लो… दाम। यह भावना गांव में इसलिए पैदा हुई कि उसे पिछड़ा, अति पिछड़ा समझकर पीछे छोड़ दिया गया और नगरों ने उसकी जीवन शैली पर व्यंग्य करना आरंभ कर दिया। शहरों का वातावरण परमुखापेक्षी होता है, जबकि ग्रामीण परिवेश को स्वावलंबी माना जाता रहा है। शहरी परिवेश बाजार व्यवस्था का जनक है, जबकि ग्रामीण परिवेश या ग्राम्य सभ्यता वस्तु विनिमय से काम चलाती रही है। शहरी सभ्यता भौतिकवादी है तो ग्राम्य सभ्यता संस्कृति प्रधान है। अध्यात्मवाद उसका मूल स्रोत है। आत्मानुशासन अर्थात कर्तव्य पथ पर बढ़ते हुए सुंदर व्यवहार निष्पादित करना, निष्छल, निष्कपट और निभ्र्रांत रहना ग्राम्य सभ्यता का मूल स्वभाव है, जबकि शहरी सभ्यता इसके विपरीत आचरण करती पायी जाती है। इसलिए विश्व की प्राचीन नगरीय सभ्यता के अवशेष जहां-जहां मिलते हैं, वहां-वहां हमें स्थानीय शासन की प्रणाली को विकसित करने में नगरों की सहभागिता दीख पड़ती है। यह महत्वपूर्ण है कि ग्राम्य सभ्यता आत्मानुशासित रहती है और स्वभावत: कोई ऐसा कार्य नही करती जो किसी दूसरे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में बाधा उत्पन्न करे, या उनका हनन करे। जबकि नगरीय सभ्यताओं में ऐसा होता है,और ऐसा हेाता है इसलिए वहां कोई ‘स्थानीय शासन’ मिलता है। जिसे कुछ ऐसे महत्वाकांक्षी (सेवाभावी नही) लोग विकसित करते हैं जो कि दूसरों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। इस प्रकार शासन के माध्यम से वर्चस्व स्थापित कर लोगों का शोषण करने की प्रणाली भारत की ग्राम्य संस्कृति की नही, अपितु पश्चिम की नगरीय सभ्यता की देन है।
आज भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत में सौ मेट्रो सिटी बसाने की बात कह रहे हैं। हमारा देश के प्रधानमंत्री जी से अनुरोध है कि वे महानगरों की नारकीय जीवन शैली से शिक्षा लें। देश में मेट्रो-सिटी बसाने की नही अपितु ‘मेधा ग्राम’ बसाने की आवश्यकता है। ऐसे ग्राम जो आत्मनिर्भर हों, आत्मानुशासित हों, आत्मनियंत्रित हों। जहां दूध, पानी, हवा, अन्न औषधि आदि सभी उपलब्ध हों और लोग प्राकृतिक सहचर्य को अपनाकर स्वभावत: एक दूसरे के साथ मिलकर चलने के अभ्यासी हों। महानगर बसाने का अभिप्राय है कि जीवन शैली को अस्त व्यस्त कर देना। एक ही स्थान पर पचास लाख की आबादी को बसाकर लोगों को पानी कहां से दोगे? दूध, सब्जी कहां से दोगे? यह विचारणीय है। इसलिए आवश्यक है कि मेधा ग्राम बसाओ। एक ग्राम में कितनी आबादी रहेगी-यह निश्चित करो। उसके लिए कितनी भूमि पर सब्जी फल उगाए जाएंगे? कितनी भूमि पर गौ आदि दुधारू पशु रखकर उनके दूधादि की प्राप्ति की जाएगी? यह भी निश्चित करो। ऐसे मेधा ग्राम को बसाकर उसके आध्यात्मिक विकास के लिए ऋषि मंडल की स्थापना करो ताकि राज्य के विधि के शासन को लोग स्वभावत: पालने के अभ्यासी बनें। मेधा ग्राम को आत्मनिर्भर स्वावलंबी बनाओ और परमुखापेक्षी रहने की गली सड़ी वर्तमान नगरीय व्यवस्था को जितना शीघ्र हो सके विदा करो। सबल और सफल, सक्षम और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए आज नये-नये प्रयोग करने की बजाए ऋषियों के अनुभूत प्रयोगों को ही अपनाने की आवश्यकता है।

मथुरा नरेश कुलचन्द का अनुपम बलिदान

मथुरा नरेश कुलचन्द का अनुपम बलिदान

मथुरा नरेश कुलचन्द 


बात सन 986-987 की है। भारत पर उस समय आक्रमण करने की एक श्रंखला को महमूद गजनवी अभी आरंभ कर नही पाया था। तब प्रतीहार वंश भारत में पतनोन्मुख हो चला था, यद्यपि यह वंश भारत के लिए बहुत ही गौरव प्रदान कराने वाला रहा था। ऐसा गौरव जिसे देखकर इतिहासकारों की मान्यता बनी कि जितनी देर (150 वर्षों तक) गुर्जर प्रतीहार राजवंश भारत को एक रख सका और जितना विस्तार उसके साम्राज्य का तत्कालीन भारत में हुआ उतना उनसे पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार कभी मौर्यों ने किया था। जिनका साम्राज्य प्रतीहार वंश से थोड़ा विस्तृत था। डा. विशुद्घानंद पाठक अपनी पुस्तक ‘उत्तर भारत का राजनीतिक इतिहास’ में लिखते हैं-‘‘अपने सर्वाधिक उत्कर्ष और विस्तार के समय केवल मौर्यों का साम्राज्य प्रतीहारों से बड़ा था, लेकिन उसका जीवन प्रतीहार साम्राज्य के 150 वर्षों के मुकाबले  एक सौ वर्षों से भी कम (321-232 ई. पू.) का था। लगभग इतना ही जीवन (350-467 ई. पू.) गुप्त साम्राज्य का भी था, किंतु वह अपने अन्यतम विस्तार के समय भी भोज महेन्द्रपाल के साम्राज्य विस्तार से छोटा ही था। हर्ष का साम्राज्य प्रतीहारों जैसा न तो विस्तृत था, न दीर्घकालीन और न प्रशासन में ही उतना सुसंगठित था। दीर्घजीवन में भारतवर्ष का यदि कोई अन्य साम्राज्य प्रतीहार साम्राज्य का सामना कर सका तो वह मुगल साम्राज्य था।’’
महान गुर्जर प्रतीहार वंश
इतना महत्वपूर्ण और गौरव प्रदाता गुर्जर प्रतीहार राजवंश जब पतन की ओर जाते हुए अपने अस्ताचल के अंक में कहीं समाहित होना चाह रहा था तो उस समय इस राजवंश का शासक राज्यपाल यहां शासन कर रहा था। मुस्लिम इतिहास फिरिश्ता ने इस गुर्जर प्रतीहार शासक के विषय में बड़े पते की बात कही है। यद्यपि इस बात को अन्य साक्षियों से प्रमाणित न होने के कारण कुछ इतिहासकारों ने निर्मूल्य सिद्घ करने का प्रयास किया है। परंतु ध्यान देने योग्य बात ये है कि फिरिश्ता की बात को यदि कोई अन्य कोई मुस्लिम इतिहासकार दोहरा नही रहा है तो कहीं नकार भी तो नही रहा। घटना का पुन: न दोहराना किसी पूर्वाग्रह का परिणाम भी हो सकता है या भारतीयों को विशेष महत्व प्रदान न करने की विदेशी मुस्लिम इतिहासकारों की परंपरागत शैली भी हो सकती है।
फिरिश्ता कहता है-‘‘जब कुर्रम घाटी में शाही राजा जयपाल और महमूद की सेनाओं की मुठभेड़ हुई तो राजा जयपाल की सहायता में पास पड़ोस के विशेषत: दिल्ली, अजमेर, कालंजर और कन्नौज के राजाओं ने सेनाएं और रूपये पैसे भेजे थे। उनकी सेनाएं पंजाब में एकत्र हुईं और उनकी संख्या एक लाख तक पहुंच गयी। फिरिश्ता आगे लिखता है कि जब 1008 ई. में महमूद ने जयपाल के पुत्र आनंदपाल पर पंजाब में चढ़ाई की तो पुन: कन्नौज के राजा ने उसकी सहायता में एक बड़ी भारी सेना भेजी और उसके उदाहरण पर उज्जैन, कालंजर, दिल्ली और अजमेर के राजाओं ने भी सेनाएं भेजीं।’’
संघ बनाने की परंपरा
यह थी हमारी संघ बना बनाकर लडऩे की परंपरा। जो हमें विदेशी आतताईयों के विरूद्घ एक होने के लिए प्रेरित करती थी। कई बार तो हमें ऐसी अनुभूति होती है कि हमारे देशी राजा अपने किसी ऐसे देशी राजा की सहायता करने से तो बचते थे जिसके विषय में वो आश्वस्त होते थे कि वह तो विदेशी आक्रांता को परास्त कर ही देगा। परंतु जहां कहीं उन्हें तनिक सा भी संदेह होता था कि आक्रांत राजा कुछ दुर्बल है तो वहां सैन्य और आर्थिक सहायता भेजने में देरी नही होती थी। इसे आप भारतीय राजाओं का राष्ट्रप्रेम कहेंगे या राष्ट्रद्रोह?
निश्चित रूप से यह राष्ट्रप्रेम था और इसी राष्ट्रप्रेम के कारण चाहे हमारे देशी राजाओं ने गुर्जर प्रतीहार वंश के प्रतापी शासकों की कभी कोई सहायता ना की हो, परंतु जब उसी वंश के दुर्बल शासक को सहायता देने की बात आयी तो उस समय कई राजाओं ने अपने राष्ट्रप्रेम का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। इस उदाहरण का उल्लेख यदि केवल फिरिश्ता तो करता है पर अन्य कोई मुस्लिम लेखक नही करता, मात्र इसी आधार पर निर्मूल नही माना जा सकता। आपके अच्छे कार्य का उल्लेख हर शत्रु लेखक नही कर सकता।
राजाओं का अनुकरणीय कृत्य
भारत के तत्कालीन स्वतंत्रता संघर्ष को जारी रखने के लिए हमारे राजाओं ने अनुकरणीय कृत्य किया और उसकी साक्षी यदि हमें फिरिश्ता ही देता है तो उसे ही स्वीकरणीय माना जाना चाहिए। साथ ही यह भी खोजा जाना चाहिए कि उस युद्घ में भारत के कितने लाल मां भारती की सेवा में बलिदान हुए? परिणाम चाहे जो रहा हो, बात बलिदानी परंपरा के माध्यम से स्वतंत्रता की लौ जलाये रखने की उदात्त राष्ट्रप्रेमी भावना को समझने की है कि विषम परिस्थितियों में भी हमने निज प्राणों को ज्योति की बाती बनाकर और उसमें अपनी ‘शहादत’ का रक्त रूपी तेल डालकर उसे सजीव रखा है, जलाये रखा है, बुझने नही दिया है। अत: यदि उस युद्घ के लिए एक लाख हिंदू वीर काम आये तो उन्हें संयुक्त रूप से सम्माननीय स्मारक मानना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है।
मथुरा का राजा कुलचंद
जब महमूद गजनवी भारत में अपना आतंकपूर्ण इतिहास लिख रहा था और अपनी क्रूरता से विश्व की इस प्राचीनतम संस्कृति के धनी देश की संस्कृति को मिटाने का हर संभव कार्य कर रहा था, उस समय इस देश को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से समृद्घ करने में अग्रणी रहे मथुरा पर कुलचंद नामक वीर कुल शिरोमणि शासक शासन कर रहा था।
2 दिसंबर 1018 को महमूद गजनवी का आतंकी और आक्रांता सैन्य दल बरन (बुलंदशहर) पहुंचा था। उसके सैन्यदल में तीस हजार सैनिक थे। कहा जाता है कि बरन का तत्कालीन शासक हरदत्त महमूद के आतंकी दल का सामना नही कर सका, इसलिए उसने धर्म परिवर्तन कर लिया। राजा हरदत्त की यह बात पड़ोसी शासक मथुरा के राजा कुलचंद को और देश की जनता को अच्छी नही लगी। इसलिए कुलचंद ने भारत की वीर कुलपरंपरा का परिचय देने का निर्णय लिया।
इधर महमूद गजनवी का अहंकार बरन की सफलता से और भी अधिक बढ़ गया था। वह एक तूफान की भांति विनाश मचाता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। उसका भी अगला निशाना मथुरा ही बन रहा था, जहां का राजा कुलचंद अपने राज दरबारियों तथा सेनापतियों के साथ मिलकर इस विदेशी आक्रांता का सामना करने का निर्णय ले चुका था।
मथुरा का गौरवपूर्ण अतीत
मथुरा प्राचीनकाल से अपने वैशिष्टय के लिए प्रसिद्घ रही है। इसके नाम की उत्पत्ति संस्कृति के ‘मधुर’ शब्द से हुई बतायी जाती है। यह भी माना जाता है कि रामायण काल में इस नगरी का नाम मधुपुर था। कभी यह मधुदानव नामक दानव के लडक़े लवणासुर की राजधानी भी रही थी। लवणासुर के अत्याचारों से त्राहिमाम् कर रही जनता ने अयोध्यापति भगवान राम से सहायता की याचना की तो भगवान राम ने अपने भाई शत्रुघ्न को लवणासुर का प्राणान्त करने के लिए भेजा। शत्रुघ्न अपने लक्ष्य में सफल मनोरथ होकर लौटे। द्वापर युग में यहां कंस ने अत्याचारों की कहर बरपा की, तो जैसे लवणासुर का अंत शत्रुघ्न ने रामायण काल में किया था, वैसे ही महाभारत काल में कंस का अंत कृष्ण ने किया था। तब उन्होंने महाराजा उग्रसेन को पुन: राज्यसिंहासन पर बैठाकर धर्म की स्थापना की।
महाभारत काल में मथुरा शूरसेन प्रांत के नाम से विख्यात थी। महात्मा बुद्घ के समय यहां राजा अवन्तिपुत्र का शासन था, जिनके काल में महात्मा बुद्घ ने भी इस नगरी में पदार्पण किया था। चंद्रगुप्त मौर्य के काल में मेगास्थनीज नामक यूनानी यात्री भारत आया था, उसने इस नगरी का नाम अपने संस्मरणों में मथोरा लिखा था। बौद्घ जैन ग्रंथों में भी इस नगरी का विशेष उल्लेख हमें मिलता है। जैन साहित्य में मथुरा को बारह योजन लंबी तथा नौ योजन चौड़ी बतलाया गया है। यहां लगभग तीन सौ वर्ष तक कुषाण वंश का शासन रहा। जिसमें इस नगरी का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व बढ़ा। गुप्तकाल में इसकी और भी अधिक उन्नति हुई। यहां मंदिरों का इस काल में भरपूर विकास हुआ। पर हूणों के आक्रमण से इस नगरी को भारी क्षति हुई थी। इसका उल्लेख चीनी यात्री फाहियान के द्वारा लिखित संस्मरणों से हमें मिलता है।
इस प्रकार मथुरा जैसी सांस्कृतिक और धार्मिक नगरी की ओर महमूद का बढऩा सचमुच इतिहास की एक रोमांचकारी घटना है। मानो महमूद एक नगर की ओर नही बल्कि इस देश की सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता की प्रतीक एक महान ऐतिहासिक धरोहर को ही मिटाने के लिए आगे बढ़ता जा रहा था।
कुलचंद जानता था अपना राष्ट्रधर्म
तब पराधीनता के गहराते अंधकार को चीरकर प्रकाश का परचम फहराना कुलचंद के लिए आवश्यक था। सौभाग्य की बात थी कि राजा कुलचंद यह जानता था कि वह किस ऐतिहासिक धरोहर का इस समय संरक्षक है और इस विषम से विषम परिस्थिति में उसका राष्ट्र धर्म या राष्ट्रीय दायित्व क्या है?
अंत में वह घड़ी आ गयी और विदेशी आक्रांता से धर्मरक्षक राजा कुलचंद की मुठभेड़ हो ही गयी। बड़ा भयंकर युद्घ हुआ था। राजा की बड़ी सेना राष्ट्रवेदी पर बलि हुई थी। राजा बड़ी वीरता से लड़ा। उसके साथ उसकी रानी भी युद्घक्षेत्र में युद्घरत थी। राजा को इसलिए पीछे की कोई चिंता नही थी कि मैं यदि बलिदान हो गया तो रानी का क्या होगा? कहीं वह आक्रांता के हाथ तो नही आ जाएगी? लगता है दोनों पति-पत्नी पहले से ही मन बनाकर आये थे कि युद्घ का परिणाम यदि हमारे प्रतिकूल गया तो क्या करना है और कैसे करना है? राजा अपने बलिदान के पीछे किसी प्रकार का जोखिम अपनी रानी के लिए छोडऩा नही चाहता था और रानी भी इसके लिए तैयार नही थी कि राजा के जाने के पश्चात अपना सतीत्व और धर्म किसी विदेशी को सौंपना पड़े। इसलिए देश के धर्म के लिए और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दोनों प्राणपण से संघर्ष करते रहें।
राजा कुलचंद ने जब देखा कि अब अधिकांश सेना स्वतंत्रता की वेदी पर निज प्राणों का उत्सर्ग कर चुकी है और अब कभी भी वह स्वयं भी शत्रु के हाथों या तो मारे जा सकते हैं या कैद किये जा सकते हैं, इसलिए उन्होंने राजा हरिदत्त का अनुकरण करने से उत्तम अपना और अपनी रानी का प्राणांत निज हाथों से ही करना उचित और श्रेयस्कर माना।
किया सर्वोत्कृष्टबलिदान
राजा ने अपनी ही तलवार से अपनी रानी और अपना प्राणांत कर मां भारती की सेवा में दो पुष्प चढ़ा दिये।
ये दो पुष्प कहां गिरे या कहां और कौन से स्थान पर मां के लिए चढ़े, किसी इतिहासकार ने आज तक खोजने का प्रयास नही किया? इतिहास के इस क्रूर मौन से पता नही कब पर्दा हटेगा? कुछ भी हो, पाठकवृन्द! हम और आप तो आइए, इन बलिदानियों पर अपने श्रद्घा पुष्प चढ़ा ही दें। आज राष्ट्र के लिए और आने वाली पीढिय़ों के लिए यही उचित है।

कौटिल्य के अनुसार देश के शासक व मंत्रियों की योग्यता

कौटिल्य के अनुसार देश के शासक व मंत्रियों की योग्यता


कौटिल्य ने देश को चलाने के लिए किसी मंत्री की योग्यता की एक व्यवस्थित सूची हमें दी है। उनके अनुसार-‘‘एक मंत्री को देशवासी (विदेशी ना हो) उच्चकुलोत्पन्न (संस्कारित और उच्च शिक्षा प्राप्त) प्रभावशाली, कलानिपुण, दूरदर्शी, विवेकशील, (न्यायप्रिय दूध का दूध और पानी का पानी करने वाला-नीर-क्षीर विवेकशक्ति संपन्न) अच्छी स्मृति वाला, जागरूक, अच्छा वक्ता,(समाज में लोगों की सकारात्मक सोच को बढ़ाने वाला और जाति, संप्रदाय आदि के आधार पर लोगों में विभाजन न करके समरसता उत्पन्न करने के लिए बोलने वाला) निर्भीक, मेधावी, उत्साही, प्रतापी, धैर्यवान, चरित्रवान, विनयशील, राजा (प्रधानमंत्री) के प्रति अटूट श्रद्घावान, स्वस्थ, तेजस्वितापूर्ण, स्नेहवान, समभावी, होना चाहिए।’’
एक सशक्त, सुसंस्कृत, सुंस्कारित और उच्च मर्यादाओं से सज्जित व भूषित राष्ट्र का निर्माण करना किसी भी शासन पद्घति का प्रथम आदर्श होता है। भारत प्राचीन काल से ही लोकतांत्रिक विचारों का देश रहा है। इसीलिए यहां की शासन-व्यवस्था ने सदा ही उपरोक्त गुगों से भूषित राष्ट्र का निर्माण करना अपनी वरीयता माना है। यही कारण है कि इस सनातन राष्ट्र ने विश्वगुरू का गौरवपूर्ण पद प्राप्त किया और संपूर्ण भूमंडल को अपने द्वारा नियत मर्यादा पथ से बहुत देर तक लाभान्वित किया।
आज हम लोकतांत्रिक राष्ट्र होने का अभिमान करते हैं। परंतु हमारे द्वारा अपनाये गये लोकतंत्र में ऐसे कई दुर्गुण आ घुसे हैं, जिन्हें देखकर लगता नही है कि हम किसी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में जी रहे हैं। उन दुर्गुणों पर यहां विचार करना उचित नही है। यहां विचारणीय है मोदी द्वारा अपने नये सांसदों को मर्यादा का पाठ पढ़ाने के लिए उनकी ‘क्लास’ लेने का उपक्रम करना। सचमुच यह अच्छी बात है। नये सांसदों को संसद के प्रति तथा देश के प्रति उत्तरदायी बनाना समय की आवश्यकता है। नये सांसदों को प्राचीनता और आधुनिकता के ऐसे सुंदर समायोजन में ढालना आवश्यक है कि वे एक सुंदर राष्ट्र (वसुधैव कुटुम्बकम्-सारी वसुधा ही हमारा राष्ट्र है) के निर्माण के लिए कृतसंकल्प हो उठें। राजनीति को व्यापार बनाकर राजनीति करने वालों पर अब लगाम लगानी चाहिए। बहुत से व्यापारी राजनीति में केवल इसलिए आते हैं कि इससे उनका व्यापार अच्छा चलता है, बड़े अधिकारी उनकी गाडिय़ों पर हाथ नही डालते और गाडिय़ां चाहे जो ले जाएं, या चाहे जो ले आयें, ये माननीयों की गाडिय़ों का भी विशेषाधिकार हो जाता है। इसलिए इन माननीयों को यह भी समझाना आवश्यक है कि आपके अपने तो कुछ विशेषाधिकार हो सकते हैं, परंतु अपनी गाडिय़ों के कोई विशेषाधिकार नही हो सकते।
प्राचीनकाल में (जिसे हमारे यहां ऋग्वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है) हमारी शासन व्यवस्था में प्रमुख मंत्रालयों का विवरण इस प्रकार मिलता है। हमारा द्यौस् (सूर्य चंद्रमा आदि  चमकते पदार्थों वाला द्यौ) राष्ट्रपिता कहलाता था। वैसे भी भारत (आभा में रत) का पिता दिव्य और दैवीय ही हो सकता है, क्योंकि भारत मेधा शक्ति का उपासक देश रहा है और वह मेधाशक्ति संपन्न दिव्य गुणों से युक्त संसार की निर्मिती ही चाहता है। इसलिए हमने अपना राष्ट्रपिता द्यौस् को माना। हमारी माता यह पृथ्वी मानी गयी। पृथ्वी माता हमारी जननी माता की भांति सुबह से शाम तक हमारी कितनी ही गलतियों को सहन करती है, और हमारे द्वारा फेेलायी जाने वाली कितने ही प्रकार की गंदगी को सहज रूप में सहन करती है, इसलिए माता के समान वह हमारा ध्यान करती है। अत: वह राष्ट्र की माता है। द्यौलोक और पृथ्वी के बीच मानो हम संतानों के लिए माता-पिता साक्षात द्यौस् और पृथ्वी के रूप में हमारे साथ हैं। परंतु उनका हमारा संबंध क्षणिक है। हम क्षणिक के साथ प्रसन्न नही रह सकते। हम सनातनी हैं और हमें प्रसन्नता मिलती है-सनातन के साथ संबंध जोडऩे में। इसलिए वेद सत्य सनातन परंपराओं का पक्षधर है। इसीलिए उसने हमारा संबंध द्यौस् और पृथ्वी से जोड़ा। कृतज्ञतावश हम इनके उपासक बने। किसी ने हमें प्रकृतिपूजक कहा तो किसी ने जड़तावादी कहा, पर ये लोग वो थे जो हमारी उपासना पद्घति की वैज्ञानिकता से अपरिचित थे।
हमने अपना प्रधानमंत्री ‘विष्णु’ को माना। विष्णु का अर्थ है जो हमारा पालन-पोषण, वृद्घि और विकास करता है। बिना किसी राग-द्वेष के और बिना किसी पक्षपात के हमारा कल्याण करता है। ईश्वर की उस दिव्य शक्ति का नाम विष्णु है। ऐसी मेधाशक्ति से संपन्न व्यक्ति हमारा प्रधानमंत्री होना चाहिए। सारे निहित और दलगत स्वार्थों से सर्वथा ऊपर उठकर और सर्वसंप्रदाय समभाव को अपने जीवन का आधार बनाकर चलने वाला।
हमारा रक्षामंत्री इंद्र कहा जाता था। इंद्र का स्थान सदा आकाश में माना गया है। वास्तव में इंद्र हमारी आत्मा है। आत्मा हृदय मंदिर से मस्तिष्क तक के आकाश अर्थात खाली स्थान में ही निवास करती है। वह हमारे भीतर बैठकर हमें ईश्वर की आज्ञाओं से यथावत परिचित कराती है, इसलिए हमारी रक्षा करती है। अत: उसके जैसे दिव्य गुणों से युक्त व्यक्ति हमारा रक्षामंत्री होना चाहिए।
शिक्षा मंत्रालय एवं गृहमंत्रालय को प्राचीन काल में अग्नि कहा जाता था। अग्नि संस्कृत के अग्रणी शब्द से बना है। जिसका अभिप्राय नेता भी होता है, जो सदा आगे ही आगे चलकर हमारा मार्गदर्शन करे, दूसरे, इसका अभिप्राय प्रकाश भी होता है जो अज्ञान-अंधकार से हमारी रक्षा करे। इसलिए गृहमंत्री और शिक्षामंत्री को ऐसे ही शुद्घ-बुद्घ ज्ञान से और नेतृत्व क्षमता से सुभूषित होना चाहिए।
कृषिमंत्री को हम पर्जन्य करते थे। पर्जन्य का अभिप्राय बादल से है। बादल का कार्य लोक कल्याण होता है। वह धरती की प्यास बुझाता है और धरती को अन्नौषधि आदि उत्पन्न करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे पर्जन्य भाव से प्रेरित व्यक्ति को ही देश का कृषिमंत्री बनाना चाहिए। पर्जन्यभाव से युक्त व्यक्ति को चौबीसों घंटे देश की कृषि की चिंता रहती है और वह लोक कल्याण से प्रेरित होकर सर्वदा धर्म संगत कार्यों में लगाए रहता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय को हम सोम की उपाधि दिया करते थे। सोम चंद्रमा की कांति का नाम है। सोम से ही सौम्य शब्द बना है। सौम्यता भला किसे अच्छी नही लगती? सोम से ही वनस्पतियों में औषधीय गुण आते हैं और बहुत सी वनस्पतियां हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उत्तम औषधि बन जाती हंै। उन औषधियों को जानने वाला और उनकी पहचान कराकर समस्त भूमंडल से रोग व्याधियों को भगाने के लिए विशाल-विशाल यज्ञ कराने वाला व्यक्ति ही स्वास्थ्य मंत्री माना जाना चाहिए।
विधि मंत्रालय के प्रभारी को हमारे यहां वरूण कहा जाता था। ईश्वर की न्यायप्रियता सबको ज्ञात है। वह न्याय करते समय पाई-पाई का भुगतान करता है। ना तो किसी की एक पाई रखता है और ना ही किसी को एक पाई अधिक देता है। उसकी न्यायप्रियता दुष्टों को रूलाती है  और सज्जनों को आनंद देती है। ऐसी दिव्य दृष्टिरखने वाला व्यक्ति वरूण कहलाता है। वही हमारा विधि मंत्री होने का अधिकारी होता है।  देश की न्याय व्यवस्था तभी सक्रिय होती है।
इसी प्रकार हमारा ऊर्जा एवं विकास मंत्रालय सूर्य तथा सविता नाम से पुकारा जाता था। सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। सारी ऊर्जाएं उसी से पैदा होती हैं। सविता ईश्वर की प्रेरक शक्ति का नाम है। यह प्रेरक शक्ति हमारे भीतर ही ऊर्जा का अक्षय स्रोत उत्पन्न करती है। जिससे हमारा आत्मबल बढ़ता है। यह आत्मबल ही आजकल ‘ऑटोमोबाइल’ कहलाता है। हमारी स्वत: स्फूत्र्त शक्ति का, ऊर्जा का वही स्रोत है, और वही हमें भद्र का उपासक बनाती है। उसी के बल से एक व्यक्ति संपूर्ण भूमंडल का चक्रवर्ती सम्राट बनकर मोक्ष की प्राप्ति तक कर लेता है। उसके अभाव में एक व्यक्ति अपने बने बनाये साम्राज्य को गंवा बैठता है। इसलिए हमारा ऊर्जा मंत्री सूर्य और सविता शक्ति संपन्न होना चाहिए। 

गौरवमयी भारतवर्ष की गौरव कथा

गौरवमयी भारतवर्ष की गौरव कथा 

भारत के गौरव पर प्रकाश डालते हुए मैक्समूलर ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया: व्हाट कैन इज टीच अस’ में लिखा है-‘‘यदि मैं विश्वभर में से उस देश को ढूंढने के लिए चारों दिशाओं में आंखें उठाकर देखूं जिस पर प्रकृति देवी ने अपना संपूर्ण वैभव, पराक्रम तथा सौंदर्य खुले हाथों लुटाकर उसे पृथ्वी का स्वर्ग बना दिया है तो मेरी अंगुली भारत की ओर उठेगी। यदि मुझसे पुन: पूछा जाए कि अंतरिक्ष के नीचे कौन सा वह स्थल है जहां मानव के मानस ने अपने अंतराल में निहित ईश्वर प्रदत्त अनन्यतम सदभावों को पूर्णरूप से विकसित किया है, गहराई में उतरकर जीवन की कठिनतम समस्याओं पर विचार किया है, उनमें से अनेकों को इस प्रकार सुलझाया है जिसको जानकर प्लेटो तथा कांट का अध्ययन करने वाले मनीषी भी आश्चर्य चकित रह जाएं तो मेरी अंगुली पुन: भारत की ओर उठेगी और मैं, यदि स्वयं अपने आपसे पूंछू कि हम यूरोप के वासी जो अब तक केवल ग्रीक, रोमन तथा यहूदी विचारों में पलते रहे हैं, किस साहित्य से वह प्रेरणा ले सकते हैं, जो हमारे भीतरी जीवन का परिशोधन करे, उसे उन्नति के पथ पर अग्रसर करे, व्यापक बनाये, विश्वजनीन बनाये सही अर्थों में मानवीय बनाये, जिससे हमारे इस पार्थिव जीवन को ही नही हमारी सनातन आत्मा को प्रेरणा मिले तो फिर मेरी अंगुली भारत की ओर उठेगी।’’
सचमुच हमारे लिए यह गौरव और गर्व की बात है कि हम आदिकाल से ज्ञान विज्ञान के उपासक होने के कारण ही सनातन धर्मी हैं। हमारा मूल वेद है जिसका शाब्दिक अर्थ ही ज्ञान है। इस मूल की शाखाएं भी गुण कर्म, स्वभाव में वैसी ही हैं जैसी कि होनी चाहिए। ये शाखाएं जैन (ज्ञान से बिगडक़र जैन बना है) बौद्ध (बोध-ज्ञान का समानार्थक) और सिक्ख (शिष्य-ज्ञान और विद्या का अभिलाषी) है।
भारत की इस ज्ञान परंपरा पर कितने ही लोगों ने अपना सर्वस्व होम कर दिया। संसार की भौतिक सुख संपदा को भारत की इस आध्यात्मिक पूंजी के समक्ष तुच्छ समझा। औरंगजेब का भाई दाराशिकोह उपनिषदों के रस का रसिया हो गया, और छह माह तक निरंतर इन उपनिषदों की व्याख्या काशी के पंडितों से सुनता रहा। 1656 ई. में उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करा दिया। इसी काल में औरंगजेब सत्ता षडयंत्र रचता रहा और एक सात्विक वृत्ति के व्यक्ति को दारा के रूप में सत्ता से दूर करने में सफल हो गया, पर उस व्यक्ति ने तनिक भी इस बात का बुरा नही माना।
कपिल देव द्विवेदी लिखते हैं कि वेदों के विषय में मनु का यह कथन सारगर्भित है कि-‘‘सर्वज्ञानमयो हि स:’’ (मनु 2-7) अर्थात वेदों में सभी विद्याओं के सूत्र विद्यमान हैं।
वेदों में जहां धर्म, आचारशिक्षा, नीतिशिक्षा, सामाजिक जीवन, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि से संबद्घ पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है वहीं विज्ञान के विविध अंगों से संबद्घ सामग्री भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। वेदों में भौतिकी रसायन विज्ञान, वनस्पति शास्त्र, जंतु विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृषि, गणित शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, वृष्टि विज्ञान, पर्यावरण एवं भूगर्भ विज्ञान से संबद्घ सामग्री भी बहुलता से प्राप्त है।
अब ऐसे ही ज्ञानोपासक भारत के लिए समाचार मिला है कि अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में मैथ्स के प्रोफेसर भारतीय मूल के मंजुल भार्गव (40 वर्ष) ने मैथमैटिक्स का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला ‘फील्ड्स मेडल’ प्राप्त किया है। यह मेडल 1936 ई. से निरंतर दिया जा रहा है और श्री मंजुल इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले पहले भारतीय मूल के व्यक्ति हैं। मंजुल ने ज्यामिती में कुछ नये तरीके विकसित किये और इस क्षेत्र में उनके पुरूषार्थ और उद्यम को देखते हुए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है। उन्होंने संस्कृत की सहायता से दो सौ वर्ष पुराने नंबर थ्योरी लॉ को सरल करके दिखा दिया था। संस्कृत के प्रति इतना आकर्षण श्री मंजुल को मानो उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है। क्योंकि उनके पितामह राजस्थान में संस्कृत के प्रोफेसर रहे थे। मंजुल का कहना है कि अपने दादाजी के पास उन्होंने 628 ई. पू. की भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त की संस्कृत में लिखी पांडुलिपि देखी थी। जिसका संस्कार बालक मंजुल के मनमस्तिष्क पर पड़ा और वह सफलता के नये नये आयामों को छूने लगा। श्री मंजुल  का कहना है कि उक्त पांडुलिपि में जर्मनी के गणितज्ञ कार्ल फ्रैंडरिच गॉस के जटिल नंबर थ्यौरी लॉ जैसे सिद्घांत को साधारण ढंग से समझाया गया है। इस लॉ के अनुसार दो परफेक्ट एक्वेयर्स के जोड़ से प्राप्त दो नंबरों को परस्पर गुणा किया जाए तो परिणाम भी दो परफेक्ट स्क्वेयर्स के जोड़ जितना ही होगा। भार्गव ने ब्रह्मगुप्त के संस्कृत में लिखे सिद्धांत को फेमस रयूबिक क्यूब पर लागू किया और 18वीं शताब्दी के गॉस के लॉ को अधिक सरल ढंग से समझाने में सफलता प्राप्त की।
ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब भारतीय मूल के लोगों ने अपनी ज्ञानोपासना के द्वारा विदेशों में भारत और भारतीयता का नाम उज्ज्वल किया है। मां भारती के लिए ये लोग गौरव और गर्व के योग्य होते हैं। अपने देश की महान विरासत को विश्व में प्रचारित प्रसारित करना और उससे शेष विश्व को लाभान्वित करना ही देश, समाज और विश्व की सच्ची सेवा है। इस क्षेत्र में यदि मंजुल ने उत्कृष्ट कार्य किया है और पुरस्कार प्राप्त किया है तो इस पर सभी देशवासियों को उन पर गर्व है। उन्होंने विश्व को बता दिया है कि संस्कृत एक मृत भाषा न होकर जीवंत और अमृत भाषा है, जिसमें सृष्टि का गूढ़तम ज्ञान अंतर्निहित है। इसके रहस्यों को जितना समझा जाएगा और सूत्रों की जितनी सहज, सरल और सरस व्याख्या की जाएगी, उतना ही समुद्रमंथन होगा और हमें अमृत मिलेगा।
उदाहरण के रूप में यजुर्वेद (18-24) और (18-25) में 1 से 33 तक की विषम संख्याएं और 4 से 48 तक की सम संख्याएं  दी गयी हैं। अथर्ववेद (2-24-1) में हमें भाग देने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार ऋग्वेद (1-140-2) में गुणा संबंधी उल्लेख मिलता है। हम यहां संकेत मात्र कर रहे हैं। केवल यह स्पष्ट करने के लिए कि गणित का गूढ़ ज्ञान भी किस प्रकार वेदों के मंत्रों में छिपा पड़ा है और यह भी कि विश्व का संपूर्ण ज्ञान विज्ञान भारत की भूमि का ऋणी है। आज हमारे ज्ञान विज्ञान पर उपेक्षा और उपहास का ताला जड़ दिया गया है, जिस कारण हमारी युवा पीढ़ी अपने गौरवपूर्ण अतीत से कट रही है। यह घोर आश्चर्य और दुख का विषय है कि जो लोग हमसे ज्ञान विज्ञान प्राप्त करने के लिए आया करते थे आज हमें उन्हीं की ओर देखना पड़ रहा है। परमुखापेक्षी होने की यह शिक्षा प्रणाली हमारा अहित करती ही जा रही है और हम हैं कि इसका पीछा नही छोड़ रहे हैं। श्री मंजुल हमारे आज के युवा वर्ग के लिए निश्चय ही प्रेरणा स्रोत बनेंगे।
मैगास्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में लिखा है कि सिकंदर जब आक्रमण करने के लिए भारत की ओर चला तो वह पहले अपने गुरू अरस्तू से आज्ञा प्राप्त करने गया। उसने अरस्तू से पूछा कि  आपके लिए भारत से क्या लाऊं ? तो उस पर अरस्तू ने कहा था कि मेरे लिए भारत से दो उपहार लेकर आना-एक गीता और दूसरा कोई तपा हुआ दार्शनिक ऋषि। सिकंदर जब भारत से लौटने लगा तो उसे उस समय गीता तो सहज रूप से उपलब्ध हो गयी, परंतु विश्व विजेता पराजित सिकंदर को कोई दार्शनिक ऋषि उपलब्ध नहीं हुआ, तब उसने अपने एक विश्वसनीय औनियोक्रोटस नामक व्यक्ति को कोई दार्शनिक ऋषि खोजने के लिए भेजा। बड़ी कठिनता से दो साधु उस व्यक्ति को मिले। जिनमें से एक का नाम उसने ‘डैंडीमीज’ (दंडी स्वामी) लिखा है। इस डैंडीमीज ने सिकंदर के साथ जाने से इन्कार कर दिया। वह दूसरा संत ही सिकंदर के साथ गया।
यह था भारत जिसके ऋषि भी दूसरे देशों के दार्शनिकों के लिए कौतूहल और जिज्ञासा का श्रद्धामयी केन्द्र हुआ करते थे। हर्बर्ट ने जिस ‘फाइव स्टैप्स ऑफ हर्बर्ट’ को देकर संसार में अपना नाम कमाया है, वह हमारी ही खोज थी। प्राचीन काल में शिक्षा शास्त्री ज्ञान तक पहुंचने के लिए पांच क्रम रखते थे-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय तथा निगमन। छांदोग्योपनिषद में ऋषि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा-देखो, सामने वटवृक्ष है, उसका फल ले आओ। श्वेतकेतु कुछ ही क्षणों में फल लेकर आ जाता है। तब ऋषि ने कहा- श्वेतकेतु इस फल को तोड़ दो। श्वेतकेतु ने फल तोड़ दिया। ऋषि ने पूछा इसमें क्या देखते हो? कहा-भगवन मैं इसमें छोटे-छोटे बीज देखता हूं। कहा -इनमें से एक दाने को तोड़ दो। श्वेतकेतु ने एक बीज तोड़ दिया। कहा इसमें क्या देखते हो? उत्तर मिला भगवान कुछ भी नहीं। गुरू ने कहा-सोम्य! तू कुछ भी नही कह रहा है, जिसे अणु रूप में तू कुछ नहीं देख पा रहा है उसी से यह महान वृक्ष खड़ा हो जाता है।
यह थी हमारी शिक्षा प्रणाली। खेल खेल में शिक्षा नही ज्ञान परोसती थी। इसी रहस्य को समझने के लिए कि समस्त विश्व अणुवाद के सिद्घांत से संचालित हैं, आज के विश्व ने करोड़ों अरबों डालर खर्च किये और एक हमारा ऋषि था कि जिसने एक वट वृक्ष के बीज से ही श्वेतकेतु को समझा दिया कि अणुवाद क्या है? और यह कैसे समस्त चराचर जगत का मूल आधार है।
मंजुल का संस्कृत संस्कृत प्रेम और उससे बनी उसकी सफलता की कहानी बहुत कुछ कह रही है। इस ‘बहुत कुछ’ को दीवार पर लिखी इबारत की तरह पढऩे में भी अक्षम है, और हमारे ऋषि ने श्वेतकेतु के द्वारा बीज में ‘कुछ भी न देखने’ की बात सुनकर भी उसे पढ़ा दिया कि कुछ भी नही देखने का अर्थ क्या है? परायी शिक्षा पद्घति पर चलकर अपनी चाल को भूल जाना और मौलिक शिक्षा पद्घति के बीच का अंतर है ये। इसे पाटना आज की सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए। यदि हम अपने मौलिक चिंतन से भटकने से नही तो सब कुछ खो बैठेंगे। जबकि भारत जैसे सत्य सनातन राष्ट्र के लिए खोना नही, सदा पाना ही श्रेयस्कर है। तभी इसके सनातन धर्म की सनातनता अक्षुण्ण रह सकती है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल कारण व आर्य समाज का योगदान

                                                                 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल कारण व आर्य समाज का योगदान

1857 में प्रथम बार भारतीय क्रान्तिकारी वीरो ने अंग्रेज शासकों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी | इस संग्राम का नाम किसी ने गदर,किसी ने विद्रोह तथा किसी ने धार्मिक युद्ध कहा है | मेरे विचार से इसे धर्म युद्ध अथवा विद्रोह कहना उन असंख्य अमर हुतात्माओ के प्रति अन्याय है जिन्होंने माँ भारती को स्वतंत्र करने के लिए अपना सर्वस्य अर्पण कर दिया | इस युद्ध का वास्तविक नामकरण “प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम” होना चाहिए, क्योंकि यह भारत की स्वतंत्रता के लिए यह प्रथम युद्ध था |
इस क्रांति का मूल कारण वास्तव में धार्मिक और राजनीतिक दोनों ही थे | क्योंकि धर्म और राजनीति परस्पर सम्बन्ध है, धर्म को राजनीति से पृथक समझना भूल है | उस समय भरत में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अधिकारी मनचाहे भीषण अत्याचार भारतीय जनता पर करते थे | उनके भयंकर अत्याचारों से भारतीय जनता और सैनिक खुब्ध हो गये थे | अंग्रज शासकों के अनेक असहाय अत्याचारों के कारण सैनिको की क्रोधाग्नि ने इतना भयंकर रूप धारण कर लिया था, की इन अत्याचारों का बदला लेने के लिए उतावले हो रहे थे | सर्व साधरण जनों में प्रतिकार की भावना जाग उठी थी |
सान 1853 में अंग्रेज कंपनी ने भारतीय सेना के लिए एक नये ढंग के कारतूस प्रचलित किया | तथा भारत के अनेक स्थानों में इन कारतूसों को तैयार करने हेतु कारखाने खोले | इन नये कारतूसों को दातों से काटना पड़ता था | इसे अजमाने के लिए मात्र एक दो पलटनो में प्रचलित किये गये | वास्तविकता का ज्ञान न होने के कारण सैनिको ने कारतूसों को दातों से काटना स्वीकार कर लिया | अब शनैःशनैः इन कारतूसों का प्रयोग बढ़ता चला गया |
बैरकपुर छावनी का एक ब्राह्मण सिपाही लोटा भरकर अपनी बैरक की ओर जा रहा था | रास्ते में एक हरिजन सिपाही ने पानी पीने हेतु ब्राह्मण सिपाही से लोटा माँगा, तो प्रचलित प्रथानुसार उसने लोटा देने से इंकार कर दिया | जब हरिजन ने कहा मुझे एक सन्यासी ओधड़ बाबा द्वारा पता चला है, क्या तुम्हे मालूम नहीं की तुमहे अपने दातों से जो कारतूस काटने पड़ेंगे उसमे गाय तथा सूअर की चर्बी लगी होगी |
इतना सुनकर ब्राह्मण सैनिक क्रुद्ध हुआ, छावनी में पहुच कर दुसरे सैनिकों को यह दुखद वृतांत सुनाया वह भी गुस्से से लाल हो गये | वह परस्पर एक दुसरे से कहने लगे –अंग्रेज सरकार जान बूझकर हम भारतीयों का धर्म भ्रष्ट करना चाहती है |
उन सैनिको ने अपने अफसरो से पूछा तो उन्होंने मना करते हुये कहा कि यह सर्वथा झूठी अफ़वाह है | नये कारतूसों में इसप्रकार की कोई वस्तु नहीं | सैनिक अफसरों के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए और बैरकपुर के कारतूस कारखाने में काम करने वाले भारतीय कर्मचारी कारतूस निर्माताओ से पूछा | जब सच्चाई का पता लगा बैरकपुर के सैनिको ने यह सुचना समस्त भारत में फैला दी | बंगाल से पेशावर और महाराष्ट्र तक इस विषय में हज़ारों पत्र भेजे गये | नये कारतूसों का वृत्तान्त बिजली की भांति प्रत्येक भारतीय सैनिको के कानो तक पहुच गया | प्रत्येक हिन्दू व मुसलमान सैनिको ने अंग्रेजों से इस अन्याय का बदला लेने को बेचैन हो उठे |
सर, जान व कर्नल तकर ने 1853 में लिखाया नये कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगाई जाती थी | फरवरी 1857 में बैरकपुर केंट की 19 नम्बर पलटनो को आदेश दिया कारतूस मुख से काटने का, तो 19 नम्बर पलटनो ने मना कर दिया अंग्रेजो ने वर्मा से गोरी पलटन मंग्वाली और भारतीय सैनिको को परेड मैदान में बुलवा कर हथियार रखवा कर दण्ड देना चाहते थे | भारतीय सिपाहियों ने चुपचाप हथियार रखने की अपेक्षा तुरंत क्रांति करने का विचार किया | जबकि 31 मई को क्रांति के लिए भारतीयों ने निर्धारित किया था |
जब अंग्रेजों ने हथियार रखने को कहा तो भारत माँ का लाल ब्राह्मण घराने का सिपाही महान क्रन्तिकारी देशभक्त, धर्म परायण-मंगलपांडे बन्दुक लिए कूद पड़े और चिल्ला कर शेष सिपाहियों को अंग्रेजों के विरुद्ध धर्म यूद्ध करने के लिए आमंत्रित करने लगे | एक अंग्रेज अफसर ह्यूसन ने अन्य सिपाहियों से पांडे को गिरफ्तार करने की आज्ञा दी, किन्तु भारतीय कोई भी सिपाही आज्ञा का पालन नहीं किया | अब तक मंगलपांडे ने अपनी बन्दूक से उस अंग्रेज अफसर को ढेर कर दिया | फिर दूसरा अफसर लेफ्टिनेंट अपने घोड़े पर आगे लपका जिसका नाम बाघ था, मंगलपांडे ने इस पर भी गोली चलाई | वह अपने घोड़े के साथ जख्मी हो कर गिर पड़ा | मंगल पांडे अपनी बन्दुक में गोली डाल रहे थे, कि उस बाघ ने अपनी पिस्तौल से गोली चलाई पांडे बच गये | और तलवार से उस अंग्रेज बाघ को समाप्त कर दिया | अब कर्नल ह्वीलर ने पांडे को पकड़ने का आदेश दिया | सिपाहियों ने मना किया | कर्नल घबराकर जनरल के बंगले पर पंहुचा, वहां से जनरल हायर ने अपने साथ गोरी पलटनो को लेकर आगे बढ़े देखा मंगलपांडे ने स्वयं अपनी छाती पर गोली चलाई, जख्मी हो कर गिर पड़े पकड़ लिया गया और मंगलपांडे को 8 अप्रैल 1857 में फाँसी दी गई |
19 और 34 नंबर पलटनों को नौकरी से निकाल दिया गया तथा 34 नंबर के पलटन सूबेदार को भी फाँसी दी गई | यह घटना भारत भर में फैल गई | इसी अप्रैल 57 में अंग्रेजों के बंगलो में लखनऊ, मेरठ, अम्बाला आदि स्थानों में आग लगा दी गई | किन्तु यह सब निश्चित समय से पूर्व ही हो गया | जब की बाबा ओधड़ दास नामी सन्यासी ने कहा था अभी समय नहीं आया है तुम्हे धैर्य से काम लेना है और 100 वर्ष तक प्रयास करना होगा बाबा ओधड़ दास वही सन्यासी है जिन्होंने सैनिकों को कहा था करतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगाई जा रही है | महर्षी दयानन्द की जीवन चरित्र को देखा जाए तो ज्ञात होगा की 1855 से 1857 तक के अपने कृयाकलापों का उल्लेख नही किया अज्ञात काल के नाम से कुछ विद्वानों ने माना है | हम सब जानते है की स्वाधीनता के लिए देश व्यापी जो सशस्त्र क्रांति हुई वह सन 1857 में हुई थी | लोगो को क्रांति का सन्देश देने वाले, क्रांति के यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए जन, जन, को अनुप्रेरित और उत्प्रेरित करने वाले दयानन्द सरीखा महामानव इस अवसर पर मौन धारण कर ले, यह सच पूछिए तो आश्चर्य का विषय है |
क्योंकी 57 की क्रांति में मुख्य रूप से चार सन्यासी का नाम लिया गया है जो अपने चिन्हों को राजा, महाराजा, नवाब, बादशाहों से लेकर सैनिको तक पहुचाया जिसकी भूमिका दंडी स्वामी विरजानंद ने निभाई थी गुरु पूर्णानंद का भी नाम उसी भूमिका में है | तथा इन्होने ही अपना चिह्न ओरों तक पहुचने की योजना बनाई | और मुख्य चिह्न कमल के फुल और रोटी थी | बाबा ओधड़ दास और कोई नहीं था वही स्वामी दयानन्द थे | जिन्होंने फुल और रोटी को फौजी पलटनो में जो इस संगठन में सम्मलित थे घुमाया करते थे | रोटी ज्यादातर गाँव में घुमाया जाता था | जिस व्यक्ति को देता था वह अपना कर्तव्य समझकर उस रोटी में से थोड़ी सी तोड़ कर खाता, फिर दुसरो को पहुँचाता था | रोटी ख़त्म हुई की दूसरी रोटी बना कर इसी प्रकार घुमाया जाता था | इसका अर्थ होता था की उस गाँवमें क्रांतियुद्ध में भाग लेने वाले लोग है | यह चमत्कार थोड़े ही दिनों में भारत भर फैल गया | रोटी इस गंभीर अर्थ की सूचक थी, की विदेशी अत्याचारी अंग्रेजों का जहां भी शासन उसे उखाड़ फेका जाये | या तो अंग्रेजों को भारत देश से निकलने के लिए स्वतंत्रता युद्ध में सम्मलित होना चाहिए |
इस प्रकार नाना साहब पेशवा को ऋषि दयानन्द अपनी योजना में सम्मलित किया | क्रांति का सूत्रधार वह होता है जो उसकी चिंगारी को शोलो का रूप प्रदान करने के लिए ईंधन जुटाता है | छावनी में महर्षि को जाने से इसलिए नहीं रोका गया क्योंकि उन्हें भी अंग्रेजों ने ओरों की तरह एक सामान्य साधू समझा | पहले दो चार बार महर्षि सिपाहियों को वेद का महत्व समझाते रहे दयानन्द तो मानो इसी तलाश में थे, जो अपनी ओजस्वी वाणी में राष्ट्रभक्ति की धारा प्रवाहित करनी शुरू करदी, सिपाहियों की भुजाएँ फड़क उठी |
इन्ही दिनों बिहार-जगदीश पुर के 80 वर्षीय राजा कुंवर सिंह के बारे में ज्ञात हुआ ,जो कुंवर सिंह अपनी रियासत और राज्य को बचाने को अंग्रेजों से खार खाए बैठे थे, अंग्रेजों का मिटटी पलीद करने को मौके की ताक में थे | कुंवर सिंह स्वयं महर्षि से बिहार की सीमा पर मिलने आये | ऋषि द्यानानंद राजा कुंवर सिंह को- बिठुर में धुंधूपंत (नाना साहब) पेशवा के साथ संपर्क स्थपित कराते हुए क्रांति हेतु तैयार रहने को कहा |
नाना साहब बिठुर के गोद लिए हुये शासक थे, पर अंग्रेज सरकार उन्हें शासक मानने को तैयार नहीं थी | जिस तरह महर्षि क्रांति का अलख जगाते स्थान –स्थान –पर घूम रहे थे, उसी प्रकार असंतोष की आगमें दग्ध होता नाना साहब भी घूम रहे थे | महर्षि, नानासाहब पेशवा तथा लक्षमी बाई, दामोदर राव, तात्याटोपे, सेनापति व राजा कुंवरसिंह आदि को आवश्यक आदेश, व उपदेश देकर दिल्ली पहुंचे |
कुछ दिन दिल्ली निवास कर दयानन्द, मेरठ, कानपूर, इलहाबाद, फारुखाबाद के गंगा के तट पर रहकर प्राचार कार्य करते रहे, उन्हें कोई अंग्रेज समझ ही नहीं पाए की यह सन्यासी बागी है | 11 मई 1857 महर्षि के आदेश के विपरीत क्रान्तिकारियो ने एक गज़ब काण्ड कर डाला | कानपूर में सैकड़ों अंग्रेज स्त्रियों व बच्चों को मौत के घाट उतार डाले |
क्रांति का आरम्भ बड़ा ही सफल रहा ऐसी आशा वलवती हो गई थी की भारत से विदेशियों की सत्ता समाप्त हो जाएगी | किन्तु मेरठ कांड के बाद यत्र तत्र क्रांतिकारियों की पराजय होने लगी |
उधर झासी की रानी लक्ष्मी बाई काफ़ी समय तक अंग्रेजों के साथ युद्ध करते-करते शहीद हुई | नाना साहब और तात्याटोपे बच निकले अंग्रजो ने उनकी गिरफ्तारियों की इनाम रख दिया | नाना साहब ऋषि दयानन्द से सन्यास की दीक्षा ली |
इस के विफल होने पर महर्षि ने भारत की तात्कालिक परिस्थिति के अनुसार अपना मार्ग बदल लिया | अब भाषा व लेख के द्वारा स्राव विध क्रांति प्रारंभ की | दयानन्द ही वह पहला भारतीय था जिसने अंग्रेजों के साम्राज्य में सर्वप्रथम स्वदेशी राज्य की मांग की थी | वह अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है कोई कितना ही करे जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरी उत्तम होता है अथवा मत मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का पक्षपात शून्य प्रजा पर पिता, माता के समान, कृपा, न्याय एवं दया के साथ भी विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं होता |
स्वामी जी आर्याभिनय में लिखते है अन्य देशवासी राजा हमारे देश में न हो हम लोग पराधीन कभी न रहो | इससे पता लगता है की महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की क्या भावना थी| राष्ट्र के संगठन के लिए जाती पाँति के झंझटों को मिटाकर एक धर्म एक भाषा समान वेशभूषा तथा खान पान का प्रचार किया | दयानन्द स्वयं गुजरती तथा संस्कृत के उद्भट विद्वान् होते हुए भी हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की घोषणा की | जबकि बंगाल के बंकिम चन्द्र तथा रविन्द्र नाथ व महाराष्ट्र के विष्णु शास्त्री चिपलूणकर आदि प्रसिद्ध लेखकों ने अपनी रचनाये प्रान्तीय भाषा में ही की थी |
दीर्घ कालीन दासता के कारण भारत वासी अपने प्राचीन गौरव को भूल गये थे | दयानन्द ने उनके प्राचीन गौरव को तथा वैभव का वास्तविक दर्शन करवाया और सप्रमाण सिद्ध किया कि, हम किसिके दास नहीं, अपितु विश्वगुरु हैं | इस प्रकार भारत भूमि को इस योग्य बनाया कि, जिसमे स्वराज्य, पादप विकसित, पुष्पित और फ्लाग्रही हो सके | जैसा 1857 के क्रांति का जन्म दाता गुरु विरजानंद –महर्षि दयानन्द-और उनके शिष्य ही हैं | विदेशों में भारत के लिए जितने क्रांतिकारियां हुए, वह द्यानन्द्के प्रमुख शिष्य पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा के कारण ही हुए | श्याम जी को विदेश में जानेकी प्रेरणा दयानन्द ने ही दी थी | श्यामजी कृष्ण वर्मा क्रांति कारियों के आदि गुरु थे | प्रशिद्ध क्रन्तिकारी विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, भाई परमानन्द, सेनापति बापट, विपिनचंद्रपाल, मदनलालधींगडा, मेडमकामा, सायाजी राय गायकवाड, आदि सभी क्रांतिकारी इनके शिष्य ही थे | इंग्लॅण्ड में रहकर भारतीय जितने भी क्रांतिकारी हुए, वह सब श्यामजीकृष्ण वर्मा के निजी ख़रीदे गये मकान जो इण्डिया हॉउस के नाम से था, वही रहकर सभीने क्रांतिके पाठ पढ़े थे |
अमरीका में जो क्रांति भारतीय स्वाधीनता के लिए हुई, वह देवता स्वरूप भाई परमानन्द के सदउद्योग का फल है | जिन्होंने आजीवन आर्य समाज का प्राचार्य किया और स्वाधीनता के लिए संघर्ष करते रहे |
पंजाब में श्री जयचन्द्र विद्यालंकार क्रांतिकारियों के प्रेरणा श्रोत थे जो D.A.V कॉलेज लाहोर के इतिहास और राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर थे सरदार भगत सिंह और उनके क्रन्तिकारी साथी उनसे राजनीति की शिक्षा लिया करते थे | सरदार भगत सिंह का जन्म भी आर्यसमाजी परिवार में हुआ था उनके दादा सरदार अर्जुन सिंह पिता श्री किशन सिंह आर्यसमाजी ही थे | भगत सिंह का उपनयन संस्कार आर्य समाज के महोपदेशक लोकनाथ तर्क वाचस्पति ने की थी भगत सिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह जी जो पिछले दिनों फरीदाबाद में रहते थे गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मेरे रहते हुए भी कई बार स्वामी शक्तिवेश जी ने अपने गुरकुल नें उन्हें बुलाया | जो गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ क्रांतिकारियों का गड़ था आज भी गुफा बने हुए है जहा क्रन्तिकारी आकर शरण लेते थे इसी गुरकुल में मुझे भी रहने का सौभग्य प्राप्त है | इस प्रकार गुरकुल और आर्यसमाज कर्तिकरियो का शरण गाह रहा है भारत भर उन दिनों जहा-जहा आर्यसमाज था उन्ही आर्यसमाज में क्रातिकारी आकर शरण लेते थे |
एक अंगरेज अधिकारी सांडर्स को मार कर भगत सिंह कलकत्ता पहुचें आर्य समाज 19 विधान सरणी जा कर ठहरे थे, भगत सिंह उस आर्य समाज से चलते समय अपनी थाली सेवक तुलसी राम को सोंपते हुए कहा था कोई क्रन्तिकारी आये तो इसी थाली में उसे भोजन करा देना | कारण क्रांति की बिगुल बंगाल के धरती से ही बजी थी भगत सिंह कलकत्ता से दिल्ली आकर वीर अर्जुन पत्रिका कार्यालय में स्वामी श्रधानंद व पंडित इंद्र विद्या वाचस्पति के पास ठहरे क्योंकी उस समय ऐसे लोगो को ठहराने का साहस केवल देशभक्त आर्यसमाजी ही किया करते थे कारण आर्यसमाज को छोड़ कर क्रांतिकारियों को ठहर ने के लिए या ठहेराने के लिए और किसी संस्था का उल्लेख नहीं है | मिस्टर गाँधी जब अफ्रीका से लौट कर आये तो उन्हें ठहराने की हिम्मत लाला मुंशीराम (स्वामीश्रद्धा) ने ही गुरुकुल कांगड़ी में की थी |
राजस्थान के क्रन्तिकारी कुवर प्रताप सिंह बारहट D.A.V. स्कूल के छात्र थे उनके पिता श्री कृष्ण सिंह बारहट ऋषि दयानन्द के अनन्य भक्त थे राम प्रसाद बिस्मिल भी अपना घर वार त्याग दिया किन्तु आर्य समाज के सिपाही बने रहे| जिस रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने मित्र अशफ़ाक खुल्ला खान को आर्य समाज शाजहापुर से जोड़ा और दोनों लोग आर्य समाज शाजहाँ पुर के कार्यकर्ता थे | रामप्रसाद बिस्मिल ने रोशन सिंह और शचीन्द्र नाथ सान्याल को भी आर्य समाज से जोड़े जो बंगाल के थे | हेदराबाद निजाम के विरुद्ध सात्याग्रह चलाकर जनता के हितो की रक्षा केवल आर्यसमजी ही कर पाए थे |
अमृतसर में कोंग्रेस का अधिवेशन मात्र आर्य समाजी नेता स्वामी श्रद्धानन्द ने ही कराई थी | पंजाब केसरी लाला लाजपत राय प्रसिद्ध आर्य नेता व देश भक्त थे | देशभक्ति किसी से तिरोहित नहीं | इसी प्रकार अनेक उदाहरण हमे मिलते है | जिस से यह सिद्ध होता है की देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में आर्यसमाज ने बड़ चड़ कर हिस्सा लिया तथा नेत्रित्व भी किया | स्वदेशी प्राचार विदेशी वस्तुओं का वहिष्कार-अछुत्तोद्धार-शुद्धि प्रचार -गोरक्षा आन्दोलन- शिक्षाप्रचार -स्त्री शिक्षा-विधवा विवाह-बाल विवाह विरोध सभी श्रेष्ठ कार्यो में आर्य समाज अग्रणी रहा है |
बंगाल में क्रन्तिकारीयों की जो कड़ी है एक मोटी पुस्तक बन जाएगी जिसमे कुछ नामो को लिख रहा हूँ | चित्तरंजन दास–रासबिहारी बोस–खुदीराम बोस–शचीन्द्रनाथ सान्याल–नलिनीकांत बाकची- मातोंगिनी हाजरा –बटुकेश्वर दत्त –बाघा जतीन –विनय–बादोल –दिनेश –सुरेन्द्रनाथ बनर्जी–कानाईलाल दत्त –राजेंद्र लाहीडी –सुरेशचन्द्र भट्टाचार्ज–सत्येन्द्रनाथ बोसू –सुभाषचंद्र बोस –जोतिन्द्रो नाथ दास –जोतिन्द्रो नाथ मुखर्जी –हज़ार से ज्यादा लोगों के नाम है |

युग धर्म के अनुसार परिवर्तन अवश्यम्भावी

युग धर्म के अनुसार परिवर्तन अवश्यम्भावी 


धर्म बन जाया करता है। जब भारत वर्ष में शांति का काल था, सर्वत्र उन्नति और आत्मविकास की बातें होती थीं तो यही देश जीवेम् शरद: शतं-का उपासक था। तब यहां शतायु होने का आशीर्वाद मिलता भी था और दिया भी जाता था। परंतु जब परिस्थितियों ने करवट ली और हर क्षण देशधर्म के लिए बलिदानियों और बलिदानों की आवश्यकता अनुभव होने लगी, तो इस देश का युग धर्म परिवर्तित हो गया। ‘आल्हा’ के रचयिता ने तब इस शतायु होने के आशीर्वाद को लेने-देने वाले राष्ट्र के लिए कह दिया कि-‘‘तीस वर्ष तक क्षत्रिय जीवे, आगे जीने को धिक्कार।’’
इसका अभिप्राय था कि वह यौवन उस समय व्यर्थ ही माना जाता था जो तीस वर्ष तक जीवन जीने के उपरांत भी देश धर्म के काम नही आया हो। बात स्पष्ट थी कि अपना यौवन देश धर्म पर न्यौछावर करना उस समय के हर हिंदू वीर का राष्ट्रधर्म था। आज हम ‘इजराइल’ की देशभक्ति का उदाहरण तो देते हैं, परंतु हमने इतिहास में अपने लिए कभी झांक कर नही देखा कि हमने अपने अस्तित्व की रक्षार्थ कितना गौरवमयी संघर्ष किया है? देश धर्म के लिए सांस्कृतिक मूल्यों में यथावश्यक संशोधन कर लिया और जीवन की शताधिक होने की कामना को तीस वर्ष तक सीमित कर लिया… वह भी इस शर्त पर कि यदि यह जीवन तीस वर्ष तक देश धर्म के काम नही आया तो धिक्कार है। ‘आल्हा’ का कवि युगधर्म को भी स्पष्ट कर रहा है और कविधर्म का निर्वाह भी कर रहा है। दोनों ही बातें अनुकरणीय हैं।
तनिक कल्पना करो कि जिस देश का यौवन शास्त्रार्थ के लिए तैयार होकर आत्मा को जीवन मरण के चक्र से मुक्त कराने की युक्ति और उपाय खोजा करता था, उसका यौवन केवल अब देश की मुक्ति के उपायों में लग गया, केवल इसलिए कि यदि देश मुक्त हो गया तो जीवन्मुक्त होने की साधना तो तब भी कर लेंगे। जिस देश की बहनें अपने भाई के, पत्नी अपने पति के, और माता अपने पुत्र के चिरायुष्य की कामनाएं किया करती थीं उसी देश की बहनें अपने भाई को, पत्नी अपने पति को और मां अपने पुत्र को शत्रु से युद्ध करने के लिए सहर्ष भेजने लगीं और वो भी इस शर्त पर कि पराजित होकर तो लौटना ही नही है। चाहे जीवन ना रहे, पर पराजय का अभिशाप लेकर मत लौटना। ऐसी कामना वाला देश भला कायरों का देश कैसे हो सकता है? ऐसे देश के विजय, वीरता और वैभव को निरी कायरता कहकर और कलंकित ना किया जाए, तो ही अच्छा है।
बन गये भाग्यविधाता
किसी कवि ने कितना अच्छा चित्रण किया है :-
ग्राम ग्राम से निकल निकलकर
ऐसे युवक चले दल के दल।
अपने शयनागार बंद कर,
दिये नवोढ़ाओं ने तत्क्षण।
बांध दिये पतियों की कटि में,
असिकलाईयों में रण कंकण।
मां ने कहा दूध की मेरे,
लज्जा रखना रण में हे सुत।
प्रिये ने कहा लौटना घर को
आर्य पुत्र तुम विजयश्री युत।।
ग्राम ग्राम से निकल निकलकर
ऐसे युवक चले दल के दल।।
युवकों के ये दल के दल थे भारत भाग्य विधाता। पर दुर्भाग्य इस देश का कि जो इस देश के भाग्य के विनाशक थे उन्हें आज तक यहनं ‘भाग्यविधाता’ कहकर महिमामंडित किया जा रहा है।
भारत के इन वास्तविक भाग्यविधाताओं ने रजिया सुल्ताना के पश्चात छह वर्षों में गुलामवंश के निर्बल शासकों के काल में अपनी शक्ति का संचय करते हुए अपने लक्ष्य को बेधने का हरसंभव प्रयास किया।
रजिया के दुर्बल उत्तराधिकारी
रजिया सुल्ताना के पश्चात दासवंश के अगले शासक के रूप में मुइजुद्दीन बहरामशाह ने गद्दी संभाली। इसने लगभग दो वर्ष तक शासन किया। कुचक्रों और षडय़ंत्रों के जाल में फंसकर यह शासक शीघ्र ही परलोक चला गया। तब इजुद्दीन किशलू खां कुछ समय के लिए सुल्तान बना। पर वह भी अति दुर्बल शासक सिद्घ हुआ तो उसके पश्चात अलाउद्दीन मसऊद शाह (1242-46) गद्दी पर बैठा। ये सारे के सारे ही दरबारी षडयंत्रों के शिकार बने और बिना किसी अपनी विशेष पहचान के ही संसार से चले गये या पदच्युत कर दिये गये।
तेज हुआ स्वतंत्रता संघर्ष
इस काल के लिए डा. शाहिद अपनी पुस्तक ‘भारत में तुर्क एवं गुलाम वंश का इतिहास’ में हमें बताते हैं कि कटेहर तथा बिहार में राजपूतों ने विद्रोह (स्वतंत्रता आंदोलन) तेज कर दिया और बिहार में राजपूतों का स्वतंत्र राज्य बन गया।’’
इस उद्धरण में स्वतंत्र राज्य बन गया इस शब्दावली पर ध्यान देने की आवश्यकता है। थोड़ा सा गंभीरता से विचारने पर पता चलता है कि इस प्रकार की शब्दावली कोई भी लेखक तभी अपनाता है, जब विद्रोह का अंतिम लक्ष्य स्वतंत्र राज्य की स्थापना करना ही होता है। सल्तनत काल का हर मुस्लिम लेखक यद्यपि बड़ी सावधानी से लिखता है और वह नही चाहता कि उसकी लेखनी से हिंदुओं की वास्तविकता कहीं स्पष्ट हो, परंतु इसके उपरांत भी सच तो स्पष्ट हो ही जाता है। ऐसे ही तत्कालीन लेखकों के संदर्भों को अपनी लेखनी का आधार बनाकर डा. शाहिद आगे लिखते हैं-‘मसऊद के शासन काल की एक महत्वपूर्ण घटना 1243 ई. में जाजनगर के राय द्वारा बंगाल पर आक्रमण था। इस आक्रमण से बंगाल में बड़ी गड़बड़ी फेेल गयी। इसलिए 1244 ई. में मलिक तुगरिल पूर्वीय प्रांतों में शांति स्थापित करने के लिए नियुक्त किया गया। यद्यपि आरंभ में तुगरिल को पराजित होना पड़ा, परंतु जब अवध से उसकी सहायता के लिए कुछ और सेना भेज दी गयी, तब वह विपक्षियों को भगा सका।’’
डा. शाहिद जिस बात को यहां बता रहे हैं वो ये है कि जाजनगर के राय द्वारा भी तुर्क सुल्तान को कड़ी चुनौती दी गयी और उसके विद्रोही दृष्टिकोण ने स्पष्ट कर दिया कि कभी भी कुछ भी संभव है। राय के विद्रोही रूप को शांत करने में ही सुल्तान को कठोर संघर्ष करना पड़ा था।
दोआब में स्वतंत्रता संघर्ष
इसी समय उत्तर प्रदेश के गंगा यमुना के दोआब में भी स्वतंत्रता आंदोलन ने गति पकड़ी ली थी। अलीगढ़ से 13 मील पूर्व की ओर जलाली और मैनपुरी से 28 मील दूर सिरसागंज और करहल सडक़ पर स्थित दतौली या दिहुली गांव हैं। यहां पर भी भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन छिड़ गया था। जिसके विषय में हमें ‘तबकाते नासिरी’ से साक्षी मिलती है कि इन दोनों स्थानों पर हुए विद्रोह को शांत करने के लिए 1244-45 ई. में उलुग खां (बलबन) ने प्रस्थान किया। उसने भारत के इस आंचल के इन स्वतंत्रता सेनानियों को वहां पहुंचकर कठोर दण्ड दिया था।
परंतु हिंदू वीरों का उत्साह देखिए कि उन्होंने भी हार नही मानी और बलबन के दिल्ली लौटते ही कुछ कालोपरांत ही विद्रोह का झण्डा पुन: फहरा दिया। तब अगले वर्ष ही बलबन को सुल्तान अलाउद्दीन मसऊद शाह की ओर से एक बड़ी सेना लेकर पुन: इन विद्रोहियों को पाठ पढ़ाने के लिए चलना पड़ा। तब कन्नौज के तलसन्दा नामक गांव में विद्रोहियों ने एक किले में स्वयं को बंद कर लिया। दो दिन तक उन्हें तुर्क सेना से लोहा लेना पड़ा। परंतु अंत में बलबन सफल हो गया। यह घटना 1248 ई. की है। उस किले पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। जिसमें अनेकों हिंदू वीरों को अपने प्राणोत्सर्ग करने पड़े। हम अपने वीरों के प्राणोत्सर्ग को स्वतंत्रता की देवी की प्यास बुझाने वाला एक स्तवनीय कार्य ही मानते हैं। इसलिए उनके प्राणोत्सर्ग को उनकी दुर्बलता न मानकर उसे उनके बलिदानी स्वभाव का परिचायक ही माना जाना चाहिए। दिल्ली की सल्तनत के इस काल में 1246 ई. में गद्दी पर नासिरूद्दीन महमूद बैठा। इसका जन्म 1228 ई. में हुआ था। वह इल्तुतमिश का ही एक पुत्र था। इस सुल्तान ने 20 वर्ष तक राज्य किया। जिससे लगता है कि जैसे सल्तनत को जीवन दान मिला, या भारत में अपने स्थायित्व का अवसर मिला, परंतु यह एक भ्रांति ही है, क्योंकि हिंदू प्रतिरोध इन बीस वर्षों में भी शांत नही हो सका, अपितु वह अशांत ही रहा और स्थान-स्थान पर अपनी सुदृढ़ उपस्थिति की अनुभूति कराता रहा।
हिंदू वीर दलकी मलकी का संघर्ष
जिस समय दास वंश अपनी रक्तिम और षड्यंत्रकारी राजनीति की दलदल में फंसा अस्थमा रोग से पीड़ित हो रहा था और नित नये सुल्तान उसके रोग के उपचारक बनकर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हो रहे थे, उसी समय कलिंजर तथा कड़ा के बीच के प्रदेश के शासक दलकी मलकी ने अपनी शक्ति में पर्याप्त वृद्धि कर ली थी। ‘तबकाते नासिरी’ का लेखक इसे दलकी मलकी लिखता है, जबकि अतहर अब्बास रिजवी इसको दलकी ओमलकी पढ़ते हैं। एडवर्ड थॉमस के विचार से यह चंदेल राजा त्रलोक्य मल्ल का दूसरा नाम है। परंतु हमें यहां इस राजा के नाम या वंश के विषय में चर्चा नहीं करनी है। यहां चर्चा का विषय है केवल उसकी वीरता जिसने तत्कालीन विदेशी सत्ता को हिलाने या नाकों चने चबाने का कार्य किया था।
दलकी मलकी ने उत्तर प्रदेश के दक्षिणी और मध्य प्रदेश के उत्तरी भागों के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर अपना शक्तिशाली राज्य स्थापित कर लिया था।
दलकी मलकी यह जानता था कि इस प्रकार के शक्तिशाली राज्य की स्थापना करने का परिणाम क्या होगा? कदाचित वह यह भी जानता होगा कि परिणाम केवल इस्लामी सत्ता से संघर्ष तक ही सीमित ना रहेगा, अपितु यह आत्मबलिदान तक भी जा सकता है। उधर तुर्क शासक भी यह जानते थे कि हिंदुस्तान में किसी भी भारतीय शासक का उभरना या शक्तिशाली होना उनके लिए कितना घातक सिद्घ हो सकता है? इसलिए तुर्क शासक नासिरूद्दीन महमूद ने अपने विश्वसनीय सेनापति उलुग खान (बलबन) के नेतृत्व में एक विशाल सेना इस हिंदूवीर को पाठ पढ़ाने के लिए भेज दी।
‘तबकाते नासिरी’ का लेखक हमें बताता है कि उलुग खान के इस क्षेत्र में पहुंचने पर इस हिंदू राजा ने मुस्लिम सेना का जमकर प्रतिरोध किया, फलस्वरूप प्रात: से सांय तक चलने वाले दोनों पक्षों के घोर संघर्ष में मुसलमानों को कोई सफलता नही मिल सकी।
मुस्लिम सेना के लिए यहां अत्यंत कड़ी परीक्षा का काल था। उसके लिए दलकी मलकी एक चुनौती बन गया था कि जिसका वह समाधान तो खोजना चाहती थी, परंतु समाधान मिल नही रहा था।
दलकी मलकी ने इस स्थिति में रहकर भी रात्रि में मुस्लिम सेना की आंखों में धूल झोंककर ऊंची पहाड़ियों में जाकर छिप जाना उचित माना। मिनहाज का कथन है कि रात्रि में राजा उस स्थान के पीछे हटकर पहाड़ी पर भागकर एक सुरक्षित एवं दुर्गम स्थान पर चला गया, जहां पर मुसलमानी सेना का पहुंचना असंभव हो गया। राजा ने अपने आपको और अपनी सेना को सुरक्षित कर लिया, पर उसकी प्रजा ने अपने स्तर पर हार नही मानी, उसका प्रतिरोध निरंतर जारी रहा। राजा और उसकी सेना का अपराजित होकर छिप जाना और प्रजा का इस प्रकार विद्रोही बने रहना मुस्लिम शासकों के लिए बड़ी अदभुत पहेली बन गयी थी। वे लोग इस पहेली का कोई समाधान भी नही खोज पाये थे। तब कहा जाता है कि उलुग खान ने अपनी सेना में उत्साह भरने के लिए इस्लाम के ब्रहमास्त्र ‘जेहाद’ का आश्रय लिया। जिससे उसके सैनिकों ने दूने उत्साह से संघर्ष किया और दलकी मलकी की प्रजा पर विजय प्राप्त की। बलबन को 1500 घोड़े और बड़ी धन संपत्ति प्राप्त हुई। मिनहाज का कथन है कि दलकी मलकी के परिजनों को भी यहां मुस्लिम सेना ने बंदी बना लिया था। यहां पर एक आशंका उत्पन्न हो सकती है कि राजा दलकी मलकी स्वयं भयभीत हो गया, और वह स्वेच्छा से युद्धक्षेत्र से भाग गया। परंतु इस आशंका के साथ-साथ कुछ अन्य बातों पर भी विचार किया जाना उचित और अपेक्षित है। जैसे राजग दलकी मलकी अपनी सेना सहित पीछे हटा तो वह उस समय हटा जब उसकी सेना को विजय मिल रही थी, इस बात को किसी भी मुस्लिम लेखक ने अस्वीकार नही किया है। दूसरे वह जहां जिस सुरक्षित स्थल पर जाकर छिपा, वहां तक उसका पीछा करने का साहस या उसे खोज निकालने का प्रयास बलबन ने नही किया। क्योंकि वह जानता था कि पहाड़ी के दुर्गम स्थलों पर जाने का परिणाम क्या होगा? कदाचित राजा इसी सोच के साथ आगे पहाडिय़ों में जा छिपा होगा कि तुझे और तेरी सेना को खोजते हुए जब शत्रु पहाडिय़ों में पहुंच जाए, तो उसको वहीं घेरकर समाप्त कर दिया जाए। राजा की यह रणनीति सफल नहीं हो सकी और शत्रु ने नीचे रहकर ही राजा की प्रजा के साथ संघर्ष कर अपनी ‘जीत’ का ध्वजदण्ड गाड़ दिया। तब प्रजा को राजा की रणनीति से जो क्षति पहुंची थी, उसे लेकर राजा स्वाभाविक रूप से दुखी हुआ होगा, तब उसने नीचे आकर राज कार्य को पुन: संभालना उचित नही समझा हो-यह भी संभव है। इन बातों का कोई ठोस प्रमाण तो हमारे पास नही है, परंतु इतना निश्चित है कि राजा ने अपने भुजबल से विदेशी सत्ता को हिला अवश्य दिया। बलबन युद्घ से घबराकर चुप चला आया। यद्यपि इस हिंदूवीर शासक की शक्ति को इस युद्घ में आघात लगा। पर यह भी स्मरण रखने की बात है कि राजा तो ‘आघात’ के लिए पहले से ही तत्पर था, लेकिन बलबन को जो आघात लगा, (अपमानित सा होकर उसे लौटना पड़ा) उसके लिए वह संभवत: पहले से तैयार नही था। एक दिन के युद्ध से ही उसे दलकी मलकी के दलबल और भुजबल का अनुभव हो गया था।