रविवार, 15 दिसंबर 2013

शरीयत के बहाने सेक्सियत की छूट

शरीयत के बहाने सेक्सियत की छूट

इस समय दुनिया में जितने भी मुस्लिम देश हैं ,उनमे अधिकाँश ने अपने यहाँ शरीयत का कानून लागू कर रखा है .चूकी सऊदी अरब इस्लाम का जन्म स्थान है ,इसलिए बाक़ी देश उसका अनुसरण करते हैं .मुसलमान कहते हैं कि शरीयत खुदा का कानून है .और इसमे किसी तरह का संशोधन या बदलाव नहीं हो सकता है .शरीयत के मुताबिक़ बिना शादी के शारीरिक सम्बन्ध बनाना ज़िना अर्थात व्यभिचार माना जाता है .और इसकी सजा रज्म है .यानी पत्थर मार कर जान ले लेना .जादातर औरतें ही इस कानून में फस जाती हैं .क्योंकि उनके लिए शरीयत में तरह तरह के नियम बना रखे हैं .सिर्फ ज़रा सी भूल हो जाने पर भी मौत की सजा या कोड़े की सजा मिल जाती है

लेकिन इतने सख्त कानून होने के बावजूद उलेमा शरीयत में रास्ता निकाल लेते है .कुछ वर्ष पाहिले उलेमाओं ने यही किया था .उस समय सऊदी अरब भी मंदी की चपेट में था .अरब में शादियाँ काफी खर्चीली होती हैं .और रिवाज के मुताबिक़ दूल्हे को दहेज़ देना पड़ता है .जो करोड़ों रियाल होता है .अरब की सरकार ने मंदी से बचने और फालतू खर्च रोकने के लिए एक उपाय किया .और सारे उलेमाओं की राय ली .उलेमाओं ने मिस्यार निकाह को जायज घोषित कर दिया ..और सरकार ने १६ अगस्त २००६ को मिस्यार निकाह करने की अनुमती देदी .

उलेमाओं ने सूरा बकरा २:२३५ का हवाला दिया और मिस्यार निकाह को जायज और हलाल बता दिया .और कहा कि इस्लाम के इब्तदाई दौर में जब मुसलमान जेहादी दुसरे देशों या शहरों में लूट के लिए महीनों तक घरों से दूर रहते थे ,तो वे अपनी सेक्स की प्यास बुझाने के लिए एक प्रकार की टेम्पररी शादी कर लेते थे .जिसे मिस्यार निकाह कहा जाता था.धीमे धीमे मिस्यार का रिवाज ख़त्म हो गया ,लेकिन अरब सरकार के कहने पर उलेमाओं ने इसे फिर से चालू कर दिया .मिस्यार का पूरा विवरण इस प्रकार है -

१-मिस्यार एक प्रकार का कोंट्राक्टहै.जिसमे पुरुष और महिला जब चाहें सेक्स कर सकते हैं .

२-मिस्यार में जरूरी नहीं है कि पुरुष और महिला एक ही घर या शहर में रहें ,वे आते जाते रह सकते हैं .

३-मिस्यार में तलाक देने पर मेहर नही देना पड़ता है.

४-मिस्यार में चार पत्नियों से जादा पत्नियां रखने की पाबंदी नहींहै .

५- मिस्यार में पति की पत्नी के प्रती कोई जिमीदारी नहीं होगी .

६- तलाक देने पर इद्दत का पालन जरूरी नहीं होगा

७- मिस्यार में किसी तरह का लिखित इकरार नहीं होता है .

८- यदि पुरुष चाहे तो मिस्यार निकाह के वक्त औरत को खुछ धन दे सकता है .और बीच बीच में भी खर्चा दे सकता है

औरतें भी मिस्यार निकाह कर सकती है .लेकिन पैसा न होने के कारण मर्द ही मिस्यार कर रहे है .दुनिया भर में ऎसीहजारों साइटें खुल गयी है जिन में मिस्यार के विज्ञापन दिए जाते हैं.गरीब मुस्लिम देश जैसे बंगला देश ,भारत के कई जिलों में दलाल घूमते रहते हैं .जो गरीब मुस्लिम माँ बाप को बहका कर अरब भेज रहे हैं .और रुपया कमा रहे हैं .

मुस्लिम लड़किओं को सावधान रहने की जरूरत है .कहीं उनके ही रिश्तेदार उमरा के बहाने या नौकरी के बहाने मिस्यार न करवा दें.

आखिर जन्नत की हकीकत क्या है ?

आखिर जन्नत की हकीकत क्या है ?

विश्व के लगभग सभी धर्मों में स्वर्ग और नर्कके बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है.इन में सभी धर्मों की बातों में काफी समानता पायी जाती है.
लेकिन स्वर्ग या जन्नत के बारे में इस्लामी ग्रंथों में जो बातें लिखी गयी हैं वह सिर्फ पुरुषों को रिझाने वाली बातें हैं और इसी उद्देश्य से लिखी गई हैं .जैसे मरने के बाद जन्नत में खूबसूरत जवान हूरें मिलेंगी ,जो कभी बूढ़ी नहीं होंगी .उनकी उम्र हमेशा १४-१५ साल की रहेगी.जन्नत वाले किसी भी हूर से शारीरिक सम्बन्ध बना सकेंगे.कुरआन में एक और ख़ास बात बतायी गयी है कि जन्नत में हूरों के अलावा सुन्दर लडके भी होंगे ,जिन्हें गिलमा कहा गया है .

शायद ऐसा इसलिए कहा गया होगा कि अरब और ईरान में समलैंगिक सेक्स आम बात है. आज भी पाकिस्तान में पुरुष वेश्यावृत्ति होती है .

इसलिए अक्सर जन्नत के मजे लूटने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.लोगों ने जन्नत के लालच में दुनिया को जहन्नुम बना रखा है .इस जन्नत के लालच और जहन्नुम का दर दिखा कर सभी धर्म गुरुओं की दुकानें चल रही हैं .भोले भाले लोग जन्नत के लालच में मरान्ने मारने को तैयार हो जाते हैं ,यहाँ तक खुद आत्मघाती बम भी बन जाते हैं.

पाहिले शुरुआती दौर में तो मुसलमान हमलावर लोगों को तलवार के जोर पर मुसलमान बनाते थे.लेकिन जब खुद मुसलाम्मानों में आपस में युद्ध होने लगे तो मुआसलामानों के एक गिरोह इस्माइली लोगों ने नया रास्ता अख्तियार किया .जिस से बिना खून खराबा के आसानी से आसपास के लोगोंको मुसलमान बनाता जा सके.
नाजिरी इस्मायीलिओं के मुजाहिद और धर्म गुरु "हसन बिन सब्बाह "सन-१०९०--११२४ ने जब मिस्र में अपनी धार्मिक शिक्षा पुरीकर चकी तो वह सन १०८१ में इरान के इस्फ़हान शहर चला गया .और इरान के कजवीन प्रान्त में प्रचार करने लगा.वहां एक किला था जिसे अलामुंत कहा जाता है.यह किला तेहरान से १०० कि मी दूर,केस्पियन सागर के पास है .उस समय किले का मालिक सुलतान मालिक शाह था.उनदिनों चारों तरफ युद्ध होते रहते थे.कभी सल्जूकी कभी फातमी आपस में लड़ते थे.इसलिए सुलतान ने किले की रक्षा के लिए अलवीखानदान के एक व्यक्ती कमरुद्दीन खुराशाह को नियुक्त कर दिया था.उनदिन किला खाली पडा था..हसन बिन सब्बाह ने किला तीन हजार दीनार में खरीद लिया.
हसन को वह किला उपयोगी लगा ,क्यों कि किला सीरिया और तेहरान के मार्ग पर था .जिसपर काफिलों से व्यापार होता था.

किला एक सपाट फिसलन वाली पहाडी पर है .किले की ऊंचाई ८४० मीटर है .लेकिन वहां पानी के सोते हैं.किले की लम्बाई ४०० मीटर और चौडाई ३० मीटर है..इसके बाब हसन ने अपने लोगों और कुछ गाँव के लोगों के साथ मिलकर काफिले वालों से टेक्स लेना शुरू करदिया. इससे हसन को काफी दौलत मिली.उसके बाद हसन ने किले में तहखाने और सुरंगें भी बनवा लीं.जब किला हराभरा हो गया तो ,हसन ने किले में एक नकली जन्नत भी बनाली.जैसा कुरआन में कहा गया है,हसन आसपास के गाँव से अपने आदमियों द्वारा सुन्दर ,और कुंवारी जवान लडकियां उठावा लेताथा. और लड़किओं को अपनी जन्नत के तहखानों में कैद कर लेता था.हसन ने इस नकली जन्नत में एक नहर भी बनवाई थी ,जिसमे हमेशा शराब बहती रहती थी.किले वह सब सामान थे जो कुरआनमें जन्नत के बारे में लिखे हैं.

फिरजब हसन के लोग आसपास के गाँव में धर्म प्रचार करने जाते तो लोगों को विश्वास में लेकर उन्हें हशीस पिलाकर बेहोश कर देते थे.और जब लोग बेहोश हो जाते तो उनको उठाकर किले में ले जाते थे .उनसे कहते कि अल्लाह तुम से खुश है ,अब तुम जन्नत में रहो.लोग कुछ दिनों तक यह नादान लोग खूब अय्याशी करते और समझते थे कि वे जन्नत में हैं.फिर कुछ दिनों मौजा मस्ती करवाने के बाद लोगों दोबारा हशीश पिलाकर वापिस गाँव छोड़ दिया जाता .एक बार जन्नत का चस्का लग जाने के बाद लोग फिर से जन्नत की इच्छा करने लगते तो ,उनसे कहा जाता कि अगर फिर से जन्नत में जाना चाहते हो तो हमारा हुक्म मानो .लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे.ऐसे लोगों को हसिसीन कहा जाता है .मार्को पोलो ने इसका अपने विवरणों में उल्लेख किया है आज भी लोग जन्नत के लालच में निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं.

यह जन्नत बहुत समय तक बनी रही.जब हलाकू खान ने १५ दिसंबर १२५६ को इस किले पर हमला किया तो किले के सूबे दार ने बिना युद्ध के किला हलाकू के हवाले कर दिया.जब हलाकू किले के अन्दर गया तो देखा वहां सिर्फ अधनंगी औरतें ही थी.हलाकू ने उन लडाकिन से पूछा तुम कौन हो ,तो वह वह बोलीं "अना मलाकुन"यानी हम हूरें हैं.

यह किला आज भी सीरिया और ईरान की सीमा के पास है .सन २००४ के भूकंप में किले को थोडासा नुकसान हो गया .लेकिन आज बी लोग इस किले को देखने जाते हैं .और जन्नत की हकीकत समाज जाते हैं कि जैसे यह जन्नत झूठी है वैसे ही कुरआन में बतायी गयी जन्नत भी झूठ होगी.

यह लेख पाकिस्तान से प्रकाशित पुस्तक "इस्माईली मुशाहीर "के आधार पर लिखा गया है.प्रकाशक अब्बासी लीथो आर्ट .लयाकत रोड -कराची

इस्लाम और कुरआन :शराब का गुणगान

इस्लाम और कुरआन :शराब का गुणगान

दुनिया की सभी साहित्य और धर्म में शराब के बारे में कुछ न कुछ जरूर लिखा गया है .शराब बनाने और पीनेपिलाने का रिवाज हरेक देश में हजारों सालों से हो रहा है .मगर इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म है ,जो शराब को हराम बता कर खुद को सबसे श्रेष्ठ बताता है .यदि हम फारसी और उर्दू काव्य पढ़ें तो देखेंगे कि उनमें सिवाय शराब ,जाम ,साकी,पैमाने ,मयखाना जैसे विषय के अलावा कुछ नहीं मिलेगा .

अरब में भी शराब पीने और बनाने का रिवाज इस्लाम के पाहिले से था.धनवान अरब सीरिया और रोम से मंहगी शराब मंगवाते थे.जो उत्तम दर्जे की मानी जाती थी .सीरिया में बड़े बड़े अंगूर के बाग़ (wine yard )थे जिससे शराब बनाती थी .जब मुहम्मद बारह साल का हो गया था तो उसे उसके चाचा अबूतालिब अपने साथ व्यापार के लिए सीरिया ले जाया करते थे .वहां मुहम्मद ने शराब बनाने का तरीका ,और उसमे डालने वाले मसालों ,और शराब के बर्तनों ,के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली थी .यह जानकारी उसे कुरआन में जन्नत का वर्णन करने में काम आगयी .जब वह कुरआन बनाने लगा .मुहम्मद ने देखा था कि लोग शराब के लिए कुछ भी कर सकते हैं .इसलिए मुहम्मद ने सोचा कि अगर लोगों को शराब का लालच दिया जाए तो वे मुसलमान बन जायेंगे.

पहिले इस्लाम में शराब हराम नहीं थी .खुद कुरआन में शराब को अल्लाह की नेमत कहता है.-

1 -शराब बनाना रोजगार है .

"हम तुम्हें खजूरों ,अंगूर और फलों से बनी एक तेज शराब (strong wine )भी पिलाते हैं ,जिस से तुम नशा भी करते हो .और लोगों को पिलाकर अपनी रोजी भी भी कमाते हो.बुद्धीमान लोगों के लिए यह इशारा है .सूरा -अन नहल 16 :67

उस समय अरब के जादातर लोग शराब पीते थे .इनमे मुहमद के बड़े बड़े सहाबी भी थे .इनके बारे में हम पहिले ही लिख चुके हैं .लेकिन कई लोग ऐसे भी थे जो शराब पीकर मस्जिद में भी चले जाते थे और हंगामा करते थे .इस लिए उन्हें रोका गया था .-

2 -शराब पीकर मस्जिद में नहीं जाओ .

"हे ईमान वालो जब तुम नशे में हो तो मस्जिद में न जाओ ,जब तक तुम्हें यह पता नहीं हो जाए कि तुम क्या कहते हो .सूरा -निसा 4 :43

बाद में शराब के बारे में यही कहा गया कि ,यदि हो सके तो शराब नहीं पियो .अगर तुम सफल हो सको.

3 -शराब सशर्त मना की गयी है -

"हे ईमान वालो ,यह शराबखाने ,जुआ ,और बुतों के स्थान शैतान की जगह हैं ,इनसे बचो ,यदि सफल हो सको .सूरा -मायदा 5 :90

4 -शराब के पैमाने और बर्तन


"बर्तन शीशे के और चांदी के होंगे ,और नाप कर ,या अंदाज से पिलाई जायेगी -सूरा अद दहर 76 :15

4 -बाहर से शराब लायी जायेगी .

"उन्हें खालिस शराब पिलायी जायेगी जो सीलबंद होगी -सूरा अत ततफीफ 83 :25

5 -शराब की अभिलाषा करें

"इस मुहरबंद शराब की लोगों को बढ़ चढ़ कर अभिलाषा करना चाहिए और पीना चाहिए -सूरा अत तत फीफ 83 :26

6 -पियक्कड़ों को नशा नहीं होगा .

"उनके लिए निथरी शराब के प्याले भर कर घुमाए जायेंगे ,उसमे कोई खराबी नहीं होगी सूरा -अस सफ्फात 37 :45 -47

7 -शुद्ध शराब मिलेगी

"उनको शुद्ध शराब पिलाई जाएगी सूरा अद दहर 76 :21

8 -दो प्रकार के प्याले होंगे

"आबखोरे ,और आफ़ताबे लिए निथरी शराब से भरे प्याले होंगे .सूरा अल वाकिया 56 :18

यानी दो तरह के बर्तन होंगे ,टोंटी वाले और बिना टोंटी के .

9 -शराब की नहरें होंगी .

"जन्नत का हल यह है की वहां शराब की नदियाँ बहा दी जाएँगी .सूरा मुहमद 47 :13

इस बयानसे शायद ही कोई व्यक्ति मानेगा कि इस्लाम में शराब हराम है .बल्कि ऐसा लगता है .जैसे अल्लाह शराब का धंदा करता है .या उसने कोई बार BAR खोल रखी है .और कुरआन में उसका विज्ञापन कर दिया हो .


हम शराब के पक्षधर नहीं हैं पर ,मुसलमानों से यही कहते हैं कि -

"कोई गुनाह न करते ,शराब ही पीते ,

जजिया :मुहम्मदी जबरदस्ती !!

जजिया :मुहम्मदी जबरदस्ती !!

विश्व में अरब एकमात्र देश है ,जहाँइस्लाम से पूर्व कोई राजा या शासक नहीं था .अरब ले लोग यातो अपने ऊंट किराये पर देकर सामान पंहुचाते थे ,या काफिलों को लूट कर गुजारा करते थे .मुहमद के पूर्वज भी यही करते थे .मुहम्मद अरबों की यह आदत जानता था .इसलिए जब उसने खुद को रसूल घोषित किया तो ,तो अरब के लुटेरों ने उसे अपना सरदार बना लिया .और जिहाद के नाम से लूट करने लगे .

मुहम्मद चाहता था कि कोई ऐसा उपाय किया जाये जिस से नियमित कमी होती रहे .इसलिए उसने अपने शातिर दिमाग से "जजिया "का अविष्कार कर लिया ,और कुरान में लिख दिया "जो इस्लाम को अपना धर्म नहीं मानते ,उन से इतना लड़ो ,के वह अपमानित होकर जजिया देने पर विवश हो जाएँ "

सूरा -तौबा 9 :29 .

जजियाجزية का अर्थ फिरौती Extortion Money .रंगदारी ,हफ्ता या poll tax है .जो गैर मुस्लिमों से लिया जाता है .और जिन लोगों पर जजिया का नियम लागू होता है उनको "ذِمّي जिम्मी "कहा जाता है .अर्थात सभी गैर मुस्लिम जिम्मी है .मुहम्मद इतना धूर्त था क़ि उसने जजिया की कोई दर निश्चित नहीं की थी .ताकि मुसलमान मनमाना जजिया वसूल कर सकें .मुहम्मद जजिया से अपना घर भरना ,और लोगों को मुसलमान बननेपर मजबूर करना चाहता था .फिर मुहम्मद की मौत के बाद भी मुस्लिम बादशाहों ने यही नीति अपनाई थी मुहम्मद गैर मुस्लिमों से झूठ कहता था कि हम जजिया के धन से तुम्हें सुरक्षा प्रदान करेंगे ,लेकिन मुहम्मद उस धन को अपने निजी कामों ,जैसे अपनी शादियों ,हथियार खरीदने ,और दावतें करने में खर्च कर देता था .उसके लोग बीमार ,गरीब ,और स्त्रियों को भी नहीं छोड़ते थे .और जो जजिया नहीं दे सकता था उसकी औरतें उठा लेते थे .यहांतक क़त्ल भी कर देते थे .जजिया तो एक बहाना था .मुहम्मद लोगों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर करना चाहता था .जैसा मुसलमानों ने भारत में किया था .

जजिया के बारे में हदीसों और इतिहास में यह लिखा है -

1 -जजिया क्यों

"उम्मर खत्ताब ने कहा कि,जिम्मियों से जोभी जजिया लिया जाता है ,वह उनकी भलाई में खर्च किया जाता है "

बुखारी -जिल्द 2 किताब 23 हदीस 475

"उमरने कहा कि जजिया गैर मुस्लिमों की हिफाजत के लिए लिया जाता है "अबू दाऊद-किताब 19 हदीस 2955

"अबू आफाक ने कहा की ,रसूल ने कहा कि,जजिया मूर्ख जिम्मियों को सबक सिखाने के लिए वसूला जाता है ,ताकि वस् समझ जाएँ कि अब उनकी जान हमारे हाथों में है "बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 256

2 -फिरौती के लिए

"रसूल ने दूबह के शाहजादे उकैगिर को पकड़वा लिया और कैद कर लिया .रसूल ने उसे तभी छोड़ा ,जब उसके लोगों ने जजिया की पूरी रकम चूका दी थी "अबू दाउद-किताब 11 हदीस 1301

"रसूल ने उमर इब्न अब्दुल अजीज को को तभी छोड़ा था ,जब उसने जजिया की रकम चूका दी थी ,और इस्लाम कबूल किया था "

मुवत्ता-जिल्द 17 किताब 24 हदीस 46

"एक सीरियन किसान हिशाम बिन हाकिम रस्ते से जा रहा था ,तभी रसूल ने उसे पड़ाव लिया .और उस से जजिया की मांग की .जब उसने इंकार किया तो रसूल ने उसे तपती हुई गर्म रेत पर खड़ा कर दिया .शाम को जब एक ईसाई ने उसके बदले जजिया चूका दिया तो रसूल ने हिश्शाम को छोड़ दिया ."

सही मुस्लिम -किताब 30 हदीस 6328 और 6330

3 -निजी लाभ के लिए जजिया

"उमर खत्ताब जजिया के तौर पर एक जवान ऊंट लेकर आये ,और उसे काट कर गोश्त पकाया .फिर रसूल और उनकी औरतों ने फलों के साथ गोश्त को प्लेट में रखकर खाया .इसके बाद रसूल के साथियों ने खाया "मुवत्ता-जिल्द 17 किताब 24 हदीस 45

"अबू हुरैरा ने कहा कि जब रसूल ने आयशा के साथ शादी की थी ,तो शादी खर्चा निकालने के लिए ,मदीना और आसपास के यहूदियों और ईसाइयों से जबरन जजिया वसूल किया था "बुखारी -जिल्द 5 किताब 58 हदीस 234

4 -लोगों को दबाने के लिए

"अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल का आदेश था कि ,तुम जिम्मियों से इतना अधिक जजिया वसूल करो ,जिस से वह जैसे तैसे जिन्दा रह सकें ,और उनकी संख्या न बढ़ सके "बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 288

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने खा ,तुम जिम्मियों से इतना अधिक जजिया वसूल करो कि,वह हमेशा कर्ज से दबे रहें ,कहीं ऐसा न हो कि वह इतने सरकश हो जाये कि ,जजिया देना ही बंद कर दें "बुखारी -जिल्द ४ किताब 53 हदीस 404

5 -इस्लाम फ़ैलाने के लिए

"अबू मूसा ने कहा कि रसूल ने कहा कि, अल्लाह ने मुझे विजय प्राप्त की है ,और सारे जिम्मियों को मेरे अधीन कर दिया है .इस लिए मुझे अधिकार है कि मैं जिम्मियों से जजिया वसूल कर सकूँ .और इस्लाम को मजबूती प्रदान करूँ "बुखारी -जिल्द 4 किताब 85 हदीस 220

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल नेअपने सैनिकों से कहा कि अगर गैर मुस्लिम इस्लाम कबूल करते ,या जजिया नहीं देते तो ,उनसे युद्ध करके उनको इसके लिए विवश कर दो "सही मुस्लिम -किताब 19 हदीस 4294

6 -हथियार खरीदने के लिए

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल को हथियारों के लिए धन कि जरुरत थी .इसलिए वह बहरैन पर हमला करके हमें जजिया वसूल करने के लिए ले गए .और हमने वहां के जिम्मियों से जबरन जजिया वसूला ,और हथियार ख़रीदे "सही मुस्लिम -किताब 42 हदीस 7065

7 -वसूली का तरीका

"रसूल ने मुहमद अल मुगीरा से कहा ,जाओ जहाँ भी गैर मुसिम मिलें उससे जजिया मांगो ,यदि वह जजिया नहीं दें तो उनसे युद्ध करो .और यहाँ तक लड़ो के वह जजिया देने और अलह कि इबादत करने पर मजबूर हो जाएँ "बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 386

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने अबू उबैदा बिन अब्दुल्लाह को जजिया वसूल करने को भेजा ,उसने लोगों से कहा कि ,सब अपने घरों से बहार आ जाएँ ,और जिस के पास जो कुछ हो वह रसूल के लिए दे दें .डर के मारे लोगों ने बर्तन भी दे दिए "बुखारी जिल्द 7 किताब 76 हदीस 437

8 -मृतकों से भी जजिया

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,अगर की जिम्मी बिना जजिया चुकाए ही मर जाये ,तो उसके घर के लोगों से दोगुना जजिया वसूल करो ."बुखारी -जिल्द 9 किताब 83 हदीस 17 .और बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 268

9 -बलात्कार से जजिया वसूलो

"एक गरीब औरत ने रसूल से निवेदन किया कि ,उसका पति बीमार है ,इसलिए असूल करने वाले से जजिया कुछ कम करने को कहें .लें उस अधकारी ने उस औरत से बलात्कार कर दिया .रसूल ने कहा तुमने उचित ढंग से जजिया वसूल किया है "बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 46

"उमरने कहा कि रसूल ने कहा है ,कि जिम्मी चाहे मौत के बिस्तर पर पड़ा हो ,उससे इतना जजिया वसूल करो कि वह बिस्तर से कभी उठ नहीं सके "बुखारी -जिल्द 2 किताब 23 हदीस 475

10 -जिम्मी कि हत्या गुनाह नहीं

"अबू मूसा ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,यदि जजिया वसूल करते समय किसी जिमी कि हत्या भी कर दी जाये तो ,वसूल करने वाला अपराधी नहीं माना जायेगा .कुसूर सिर्फ जिमी का माना जायेगा "बुखारी -जिल्द 1 किताब 3 हदीस 111

11 -जजिया कब हटेगा

"अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,जजिया की बदौलत एक ऐसा समय आयेगा की ,सरे धर्म नष्ट हो जायेंगे ,और सिर्फ इस्लाम ही बाक़ी रहेगा .इसके बाद जजिया की कोई जरुरत नहीं रहेगी "अबू दाऊद-किताब 37 हदीस 4310

12 -जजिया की दरें

"उमर खत्ताब उन जगहों से प्रति व्यक्ति चार दीनार जजिया लेते थे जहाँ सोने के सिक्के चलते थे .और जहाँ चंडी के सिक्के चलते थे वहां से 40 दिरहम वसूल करते थे "मुवत्ता-जिल्द 17 किताब 24 हदीस 44

"रसूल ने कहा कि,जिम्मी के पास सिक्के नहीं हों ,औए वस् सलाम करके कुछ और देना चाहे तो उसके बर्तन और खाने का अनाज लेलो ,चाहे उसके पास खाने को कुछ नहीं बचे "बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 388

13 -धमकी भरे पत्र भेजो

"अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने लोगों को पत्र भेजे थे ,जिनमे जजिया कि मांग की गयी थी .रसूल ने एक अमीर एला( aila )पत्रको भेजकर धमकाया था कि ,अगर वह नियमित जजिया नहीं देगा तो उसके लोग सुरक्षित नहीं रहेंगे "बुखारी -जिल्द 2 किताब 24 हदीस 559

14 -जजिया किन से लिया जाये

"उमर खत्ताब पाहिले तो पारसियों से जजिया नहीं लेता था .लेकिन जब रसूल को पता चला तो वह बोले कि ,जो भी अल्लाह के आलावा और किसी कि इबादत करते हैं , और रसूल पर ईमान नहीं रखते उन सब से जजिया जरुर लिया करो "बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 384

भारत में जितने भी मुस्लिम शासक हुए हैं सभी ने हिन्दुओं का खून चूसा है .और मनमाने टेक्स वसूल किये है .जब दिल्ली की गद्दी पर खिलजियों की हुकूमत हुई तो अला उद्दीन खिलजीعلاوؤالدّين خلجي (1296 -1316 ) ने अपने काजी अता उल मुल्क से पूछा कि मैं हिन्दुओं से कैसा व्यवहार करूँ .काजी बोला तुम हिन्दुओं को सिर्फ नजराना और शुकराना देने वाला समझो .यानि जब कोई हिन्दू किसी मुस्लिम पदाधिकारी के सामने जाये तो उसे नजराना के रूप में कुछ धन दे .और जब और जब अधिकारी जाने लगे तब भी शुकराना के तौर पर कुछ धन फिर से दे .अगर मुस्लिम अधिकारी हिन्दू से चांदी का सिक्का मांगे तो हिन्दू उसे सोने का सिक्का देकर उसे खुश करे .यदि अधिकारी थूकना चाहे ,तो हिन्दू अपना मुंह खोल दे ,और उसे मुंह में थूकने दे खिलजी बोला काजी तुझे इस्लाम का पूरा ज्ञान है

(तारीखे फिरोजशाही -जिया उद्दीन बरनी )

इसी तरह शेख हमदानी ने अपनी किताब "जखिरतुल मुल्क "में लिखा है औरंगजेब ने जब 1679 में जजिया लागु किया तो ,आदेश दिया कि हिन्दू कोई नया बुतखाना नहीं बना सकते और न उसकी मरम्मत कर सकतेहैं .अगर हिन्दू किसी सम्बन्धी कि मौत पर जोर जोर से रोयेंगे तो जुरमाना लगेगा .शंख बजने ,घंटा बजने पर भी टेक्स लगेगा .अगर हिन्दू जजिया नहीं दे सकें तो उनके मंदिरों को तोड़कर जजिया वसूला जायेगा ,या उनकी लड़कियों को कनीज बना लिया जायेगा .मुसलमान इसी लिए औरंगजेब की तारीफ करते हैं .वह मुसल्लामानों का आदर्श है.

मुसलमानों ने इसी जजिया की ताकत से कई देश मुसलमान बना दिए है .इरान में सन 1884 और ट्युनिसिया और अल्जीरिया में सन 1855 तक जजिया लिया जाता था .इसके कारण वहां के गर मुस्लिम यातो पलायन कर गए या विवश होकर मुसलमान बन गए .यही मुहम्मद चाहता .जिहाद की तरह जजिया भी मुसलमानों का एक आतंक ही है .तालिबानों ने सिक्खों से सन 16 अप्रेल 2009 को 2 करोड़ और 28 जून 2010 सीखो और हिन्दुओं से 6 करोड़ रूपया जजिया वसूल किया था .और सिखों ने चूका दिया था

अगर पंजाब के हिन्दू सिख मिलकर केवल पांच सौ प्रमुख मुले मौलवियों को पकड़ लेते और तालिबानों से कहते या तो अफागानितन के सिखों का जजिया माफ़ करो ,या फिर हम दूसरी तरह से जजिया चूका देंगे .अफसोस कि सिखों कि तलवार म्यान से बाहर नहीं निकली .

सिक्खों को पता होना चाहियेथा कि अगर तालिबानों के पास हजारों सिक्ख हैं ,तो पंजाब में लाखों मुसलमान मौजूद है

इसी तरह हमें कश्मीरियों से झंडा चढाने की इजाजत मांगने क्या जरूरत है .अगर हम कश्मीर के सामान को पजाब के आगे नहीं जाने दें तो ,कश्मीरी अलगाववादी भूखे मर जायेंगे .