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सोमवार, 30 मार्च 2015

हमारे जीवन की हैं चार गतियाँ

हमारे जीवन की हैं चार गतियाँ 


यज्ञ अपने आप में एक व्यवस्था का नाम है। किसी याज्ञिक परिवार में यज्ञ करते समय जितनी सुंदर व्यवस्था से या अव्यवस्था से लोग बैठे हों, उसे देखकर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ये लोग परिवार में कैसी व्यवस्था को लागू करके रहते हैं। ‘सूय्र्याचन्द्रमसाविव’ का आदर्श यदि किसी परिवार ने अपना लिया है तो कोई किसी के कार्य में हस्तक्षेप नही करता है, और अपने-अपने मर्यादा पथ में सब शांति से भ्रमण करते हैं-अर्थात अपने-अपने कार्यों का संपादन करते रहते हैं, सर्वथा वैसे ही जैसे सूर्य और चंद्रमा अपने-अपने मर्यादा पथ में भ्रमण करते हैं। ऐसा याज्ञिक परिवार यज्ञ पर भी शांति से बैठता है। पर जहां एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति लोगों की होती है, वहां यज्ञ पर भी लोग ब्रह्मा के नेतृत्व में न चलकर यज्ञ की मर्यादा को तोड़ते रहते हैं। विपरीत दिशा में बैठा व्यक्ति याज्ञिक व्यक्ति के कार्य घृतादि डालने में कमी निकालेगा, तो दूसरी ओर से कोई मंत्रोच्चारण में कमी निकालेगा, तो तीसरी ओर से कोई समिधाओं के रखने-रखाने या घृत व सामग्री आदि के कार्यों में नियत व्यक्ति के अधिकार में हस्तक्षेप करेगा। ऐसे व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन में भी किसी दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप करने के अभ्यासी होते हैं।

यज्ञ में हम जब जल प्रसेचन करते हैं तो उस समय भी कई बार याज्ञिकों को जल प्रसेचन को लेकर गलती करते देखा जाता है। कुछ लोग चम्मच से जल लेकर फटाफट मंत्रोच्चारण करते हुए नियत दिशाओं में यज्ञ कुण्ड के बाहर जल छिडक़ते चले जाते हैं। उनकी शीघ्रता बताती है कि वह केवल याज्ञिक औपचारिकता की पूर्ति कर रहे हैं, उनके भीतर यज्ञ के लिए कोई श्रद्घाभावना नही है, जबकि यज्ञ का मूल श्रद्घा है। इसी प्रकार कुछ लोग जल को एक साथ एक स्थान पर पहले पूरब में फिर पश्चिम में और उसके पश्चात उत्तर में फिर यज्ञ कुण्ड के चारों ओर डाल देते हैं। जल प्रसेचन की यह विधि और प्रक्रिया भी दोषपूर्ण है।

वास्तव में मनुष्य स्वयं एक यज्ञ है, जिसका शरीर एक कुण्ड है और उस कुण्ड में आत्मा एक ज्योति है। इस आत्मा रूपी ज्योति को निरंतर चमकाये रखने के लिए ही यज्ञ किया जाता है। अर्थात यज्ञ आत्मा के आसपास एकत्र हो गये मलादि दोषों को जलाकर नित्य प्रति भस्म करने की एक पावन परंपरा है।

ऋषि-महर्षियों की मान्यता रही है कि मनुष्य जीवन की चार गतियां हो सकती हैं। पहली गति है-अंधकार से प्रकाश की ओर  चलना। अंधकार से  प्रकाश की ओर चलना व्यक्ति को अपना जीवन ध्येय सुनिश्चित करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य जीवन की यह सर्वोत्तम गति है। ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’ में उपनिषद का ऋषि इसी उत्तम गति के अपनाने के लिए मानव समाज को प्रेरित करता है। इसके पश्चात दूसरा मार्ग है-प्रकाश से अंधकार में चलना। यह पहले मार्ग का विपरीत मार्ग है। संसार में ऐसे लोग भी होते हैं जो पहले अच्छे मार्ग पर चलते रहे-परंतु किसी भी कारण से कालांतर में मार्ग भटक गये और प्रकाश से अंधकार की ओर चले गये। पहले बीड़ी, सिगरेट, शराब आदि का सेवन  नही करते थे, परंतु कुसंगति के कारण कालांतर में करने लगे-और फिर सुधर नही पाये।

इसके पश्चात तीसरा मार्ग है- प्रकाश से प्रकाश में चलते रहना। ऐसे लोग भी संसार भी होते हैं जो शुभकार्यों में लगे रहते हैं और प्रकाशोपासक बने रहकर ही जीवन को व्यतीत कर देते हैं, ऐसी पुण्यात्माएं संसार में मनुष्य के रूप में महात्मा कहलाती हैं, और संसार के लोगों के लिए जीवन पुष्प बिखेरती चलती हैं। ये महान आत्माएं जिन लोगों के जीवन में अंधकार होता है, उनके जीवन से अंधकार को मिटाकर प्रकाश भरती चलती हैं। संसार को सन्मार्ग पर चलाने के लिए प्रेरित करने वाली ये दिव्यात्माएं अपने सत्कार्यों से जाने के पश्चात भी लोगों का मार्गदर्शन करती रहती हैं।

चौथी गति है-अंधकार से अंधकार में चलना। ऐसे लोग भी संसार में होते हैं, जो दुष्टता के कार्यों से जीवन का आरंभ करते हैं और   उन्हीं में  लगे रहकर जीवन पार कर देते हैं। ये दुष्टात्माएं संसार में विध्वंस का खेल खेलती हैं, और शांति प्रिय लोगों के जीवन को भी समाप्त करने या उनमें अशांति का विष घोलने में इन्हें कोई आपत्ति नही होती।

यज्ञ में जब हम जल प्रसेचन करते हैं, तो उसमें हमें यही बताया जाता है कि हम हर स्थिति परिस्थिति में प्रकाश के पुजारी बनें। जल शांति और शीतलता का प्रतीक है, शांति व्यवस्था का दूसरा  नाम है, और शीतलता हमारी विवेकशक्ति को बढ़ाती है। इस प्रकार जल प्रसेचन का अर्थ है कि हम शांतिपूर्वक विवेकशक्ति के उपासक बनें। मेधाशक्ति वाले हों। कहा भी गया है-‘‘बुद्घिर्यस्य बलं तस्य’’ अर्थात जिसके पास बुद्घि है, बल उसी के पास है। अपने बुद्घि बल से ए.पी.जे. कलाम जैसे लोग देवता की श्रेणी में पहुंच जाते हैं और उनके बुद्घिबल के सामने लोग झुकते हैं। इसलिए शांतिपूर्वक विवेक शक्ति बढ़ाकर प्रकाशोपासक होकर हम अपने जीवन में प्रकाश करें-यह जल प्रसेचन का अर्थ है। प्रसेचन का अर्थ सींचना है-छिडक़ना नही। इसलिए जल को यज्ञ कुण्ड के बाहर फेंककर छिडक़ना नही है अपितु यज्ञ कुण्ड को सींचना है, उसी में जल प्रसेचन करना है।

हमारे लिए पूर्व दिशा प्रकाश की दिशा है, इसी प्रकार उत्तर की दिशा भी प्रकाश की दिशा है। इसी दिशा में सप्तऋषि मण्डल तथा धु्रव तारा स्थित होते हैं। दक्षिण की दिशा घोर अंधकार की दिशा है, जबकि यज्ञ कुण्ड में पश्चिम की दिशा का एक कोना दक्षिण के घोर अंधकार से तथा दूसरा उत्तर के प्रकाश से जुड़ा है, पर फिर भी पश्चिम को अंधकार की दिशा ही माना जाता है।

अब जब हम पूर्व दिशा में ‘ओ३म् अदिते अनुमन्यस्व’ से जल प्रसेचन करते हैं तो जल को पूरब दिशा के दक्षिणी कोने से उत्तर की ओर डालना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि अंधकार से प्रकाश की ओर चलना। इससे जीवन की एक गति पूर्ण होती है, जो हमें हमारे जीवन ध्येय के प्रति समर्पित करती है। हमारी संस्कृति का मूलाधार है अंधकार से प्रकाश की ओर चलना। इसलिए हमारे जल प्रसेचन की क्रिया में भी पहले यही कहा जाता है कि हम अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। दूसरी बार हम यज्ञ कुण्ड की पश्चिम दिशा में ‘अनुमते अनुमन्यस्व’ से जल प्रसेचन करते हैं। यहां भी हम दक्षिण से उत्तर की ओर चलते हैं। बात साफ है कि यहां भी हम अंधकार (दक्षिण) से प्रकाश  (उत्तर) की ओर बढ़ रहे हैं। इसी प्रकार उत्तर में भी पश्चिम (अंधकार) से पूरब (प्रकाश) की ओर चलते हैं। अब चौथी बार हम केवल दक्षिण में जल नही डालते, क्योंकि हमें अंधकार से अंधकार में नही रहना है। इस बार हम पूरब दिशा में यज्ञ कुण्ड के मध्य से आरंभ कर दक्षिण की ओर बढ़ते हैं और पश्चिम से उत्तर होते हुए पूरब के उसी मध्य बिन्दु पर आ जाते हैं जहां से जल प्रसेचन प्रारंभ किया था। इसका अभिप्राय है कि हमें जीवन में प्रकाश से प्रकाश में ही रहना है। हमें किसी भी स्थिति में दक्षिण के घोर अंधकार का उपासक नही बनना है। यदि चूकें कहीं हो भी गयीं हैं तो पूरब के प्रकाश को पकडक़र उसी के सहारे दक्षिण (अंधकार काल) से निकलकर पुन: उसी मार्ग पर आ जावें, जहां से मार्ग भटके थे। किन्हीं कारणों से बीड़ी, सिगरेट, मद्यमांस अण्डे आदि का सेवन करने,  जुआ खेलने या अन्य प्रकार के दुव्र्यसन हमारे भीतर प्रवेश कर भी गये हैं तो उन्हें छोडऩे के लिए संकल्पित होकर पूरब से यात्रा प्रारंभ की और पूरब में ही आ गये। मानो दुर्गुणों को छोड़ते जाने के संकल्प का पुन: नवीनीकरण हो गया। इसी को कहते हैं-‘यद भद्रं तन्नासुव’।

किसी कवि ने कहा है-‘‘कवि करोति काव्यानि रसं जानाति पंडित:’’ अर्थात कवि कविता लिखता है और पंडित अर्थात सुधीजन उसका आनंद लूटते हैं। इसी बात को यज्ञ के जल प्रसेचन की प्रक्रिया से सीखा जाता है-विद्वानों ने, कवियों ने हमारे लिए जल प्रसेचन की व्यवस्था करके मानो एक कविता लिख दी है उसका आनंद लूटना हमारे वश में है। हम उसे लूटें और जितना चाहें लूटें। इस लूट से लाभ ही लाभ होगा। कहीं भी किसी को तनिक भी कष्ट नही होगा, अपितु आनंद बढ़ता जाएगा, जीवन पुष्प कभी मुरझाएगा नही। विवेकशाक्ति का दीपक कभी बुझेगा नही। हम औपचारिकता से निकलें और श्रद्घा के साथ यज्ञ करें, हमारे हृदय के आनंद में वृद्घि होती जाएगी। जल प्रसेचन का यही याज्ञिक अर्थ है।

रविवार, 16 नवंबर 2014

‘आयुष्काम (महामृत्युंजय) यज्ञ और हम’

‘आयुष्काम (महामृत्युंजय) यज्ञ और हम’


सभी प्राणियों को ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर सत्य, चेतन, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वान्तरयामी, सर्वातिसूक्ष्म, नित्य, अनादि, अजन्मा, अमर, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है। जीवात्मा सत्य, चेतन, अल्पज्ञ, एकदेशी, आकार रहित, सूक्ष्म, जन्म व मरण धर्मा, कर्मों को करने वाला व उनके फलों को भोगने वाला आदि स्वरूप वाला है। संसार में एक तीसरा एवं अन्तिम पदार्थ प्रकृति है। इसकी दो अवस्थायें हैं एक कारण प्रकृति और दूसरी कार्य प्रकृति। कार्य प्रकृति यह हमारी सृष्टि वा ब्रह्माण्ड है। मूल अर्थात् कारण प्रकृति भी सूक्ष्म व जड़ तत्व है जिसमें ईश्वर व जीवात्मा की तरह किसी प्रकार की संवेदना नहीं होती।


जीवात्मायें अनन्त संख्या में हमारे इस ब्रह्माण्ड में हैं। इनका स्वरूप जन्म को धारण करना व मृत्यु को प्राप्त करना है। मनुष्य जीवन में यह जिन कर्मों को करता है उनमें जो क्रियमाण कर्म होते हैं उसका फल उसको इसी जन्म में मिल जाता है। कुछ संचित कर्म होते हैं जिनका फल भोगना शेष रहता है जो जीवात्मा को पुनर्जन्म प्राप्त कर अगले जन्म में भोगने होते हैं। कर्मानुसार ही जीवों को मनुष्य व इतर पशु, पक्षी आदि योनियां प्राप्त होती हैं। मनुष्य योनि कर्म व भोग योनि दोनो है तथा इतर सभी पशु व पक्षी योनियां केवल भोग योनियां है। यह पशु पक्षी योनियां एक प्रकार से ईश्वर की जेल है जिसमें अनुचित, अधर्म अथवा पाप कर्मों के फलों को भोगा जाता है।



हम, सभी स्त्री व पुरूष, अत्यन्त भाग्यशाली हैं जिन्हें ईश्वर की कृपा, दया तथा हमारे पूर्व जन्म के संचित कर्मों अथवा प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य योनि प्राप्त हुई। इसका कारण है कि मनुष्य योनि सुख विशेष से परिपूर्ण हैं तथा इसमें दुख कम हैं जबकि इतर योनियों में सुख तो हैं परन्तु सुख विशेष नहीं है और दुःख अधिक हैं। वह उन्नति नहीं कर सकते हैं जिस प्रकार से मनुष्य योनि में हुआ करती है। हमें मनुष्य जन्म ईश्वर से प्राप्त हुआ है। यह क्यों प्राप्त हुआ? इसका या तो हमें ज्ञान नहीं है या हम उसे भूले हुए हैं। पहला कारण व उद्देश्य तो यह है कि हमें पूर्व जन्मों के अवशिष्ट कर्मों अर्थात् अपने प्रारब्ध के अच्छे व बुरे कर्मों के फलों के अनुरूप सुख व दुःखों को भोगना है। दूसरा कारण व उद्देश्य अधिक से अधिक अच्छे कर्म यथा, ईश्वर भाक्ति अर्थात् उसकी ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने के साथ यज्ञ-अग्निहोत्र, सेवा, परोपकार, दान आदि पुण्य कर्मों को करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें अपना ज्ञान भी अधिक से अधिक बढ़ाना होगा अन्यथा न तो हम अच्छे कर्म ही कर पायेंगे जिसका कारण हमारा यह जीवन व मृत्यु के बाद का भावी जीवन भी दुःखों से पूर्ण होगा। ज्ञान की वृद्धि केवल आजकल की स्कूली शिक्षा से सम्भव नहीं है। यह यथार्थ ज्ञान व विद्या वेदों व वैदिक साहित्य के अध्ययन से प्राप्त होती हैं जिनमें जहां वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति आदि ग्रन्थ हैं वहीं सरलतम व अपरिहार्य ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश, आर्याभिविनय, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, व्यवहारभानु, संस्कार विधि आदि भी हैं। इन ग्रन्थों के अध्ययन से हमें अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य पता चलता है। वह क्या है, वह है धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है जो विचारणीय है। यह जीवात्मा की ऐसी अवस्था है जिसमें जीवन जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मुक्त हो जाता है। परमात्मा के सान्निध्य में रहता है और 31 नील 10 खरब व 40 अरब वर्षों (3,11,04,000 मिलियन वर्ष) की अवधि तक सुखों व आनन्द को भोगता है। इसको विस्तार से जानने के लिए सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन करना चाहिये।



ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का ज्ञान दिया और उसके माध्यम से यज्ञ-अग्निहोत्र करने की प्रेरणा और आज्ञा दी। ईश्वर हमारा माता-पिता, आचार्य, राजा व न्यायाधीश है। उसकी आज्ञा का पालन करना हमारा परम कर्तव्य है। हम सब मनुष्य, स्त्री व पुरूष वा गृहस्थी, यज्ञ क्यों करें? इसलिए की इससे वायु शुद्ध होती है। शुद्ध वायु में श्वांस लेने से हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है, हम बीमार नहीं पड़ते और असाध्य रोगों से बचे रहते हैं। हमारे यज्ञ करने से जो वायु शुद्ध होती है उसका लाभ सभी प्राणियों को होता है। दूसरा लाभ यह भी है कि यज्ञ करने से आवश्यकता व इच्छानुसार वर्षा होती है और हमारी वनस्पतियां व ओषधियां पुष्ट व अधिक प्रभावशाली होकर हमारे जीवन व स्वास्थ्य के अनुकूल होती हैं। यज्ञ करने से 3 लाभ यह भी होते हैं कि यज्ञ में उपस्थित विद्वानों जो कि देव कहलाते हैं, उनका सत्कार किया जाता है व उनके अनुभव व ज्ञान से परिपूर्ण उपदेशामृत श्रवण करने का अवसर मिलता है। यज्ञ करना एक प्रकार का उत्कृष्ट दान है। हम जो पदार्थ यज्ञ में आहुत करते हैं और जो दक्षिणा पुरोहित व विद्वानों को देते हैं उससे यज्ञ की परम्परा जारी रहती है जिससे हमें उसका पुण्य लाभ मिलता है। यज्ञ में वेद मन्त्रों का उच्चारण होता है जिसमें हमारे जीवन के सुखों की प्राप्ति, धन ऐश्वर्य की वृद्धि, यश व कीर्ति की प्राप्ति, ईश्वर आज्ञा के पालन से पुण्यों की प्राप्ति जिससे प्रारब्ध बनता है और जो हमारे परजन्म में लाभ देने के साथ हमारे मोक्ष रूपी अभीष्ट व उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ हमें मोक्ष के निकट ले जाता है। हमारे आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम तथा श्री योगेश्वर कृष्ण सहित महर्षि दयानन्द भी यज्ञ करते कराते रहे हैं। महर्षि दयानन्द ने आदि ऋषि व राजा मनु का उल्लेख कर प्रत्येक गृहस्थी के लिए प्रातः सायं ईश्वरोपासना-ब्रह्मयज्ञ-सन्ध्या व दैनिक अग्निहोत्र को अनिवार्य कर्तव्य बताया है। हम ऋषि-मुनियों व विद्वान पूर्वजों की सन्ततियां हैं। हमें अपने इन पूर्वजों का अनुकरण व अनुसरण करना है तभी हम उनके योग्य उत्तराधिकारी कहे जा सकते हैं। यह सब लाभ यज्ञ व अग्निहोत्र करने से होते हैं। अन्य बातों को छोड़ते हुए अपने अनुभव के आधार पर हम यह भी कहना चाहते हैं कि यज्ञ करने से अभीष्ट की प्राप्ति व सिद्धि होती है। उदाहरणार्थ यदि हम रोग मुक्ति, सुख प्राप्ति व लम्बी आयु के लिए यज्ञ करते हैं तो हमारे कर्म व भावना के अनुरूप ईश्वर से हमें हमारी प्रार्थना व पात्रता के अनुसार फल मिलता है अर्थात् हमारी सभी सात्विक इच्छायें पूरी होती हैं और प्रार्थना से भी कई बार अधिक पदार्थों की प्राप्ति होती है। इसके लिए अध्ययन व अखण्ड ईश्वर विश्वास की आवश्यकता है।

मृत्युंजय मन्त्र ‘त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।’ में कहा गया है कि हम आत्मा और शरीर को बढ़ानेवाले तथा तीनों कालों, भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता परमेश्वर की प्रतिदिन अच्छी प्रकार वेद विधि से उपासना करें। जैसे लता से जुड़ा हुआ खरबूजा पककर सुगन्धित एवं मधुर स्वाद वाला होकर बेल से स्वतः छूट जाता है वैसे ही हे परमेश्वर ! हम यशस्वी जीवनवाले होकर जन्म-मरण के बन्धन से छूटकर आपकी कृपा से मोक्ष को प्राप्त करें। यह मन्त्र ईश्वर ने ही रचा है और हमें इस आशय से प्रदान किया कि हम ईश्वर से इसके द्वारा प्रार्थना करें और स्वस्थ जीवन के आयुर्वेद आदि ग्रन्थों में दिए गये सभी नियमों का पालन करते हुए ईश्वर स्तुति-प्रार्थना-उपासना को करके बन्धनों से छूट कर मुक्ति को प्राप्त हों। हम शिक्षित बन्धुओं से अनुरोध करते हैं कि वह यज्ञ विज्ञान को जानकर उससे लाभ उठायें।