शनिवार, 9 अगस्त 2014

'काम' या 'सेक्स' की भारतीयों की दृष्टि में महत्ता

 'काम' या 'सेक्स' की भारतीयों की दृष्टि में महत्ता 
नारी की गूढ़ता और पुरूष की स्वाभाविक गंभीरता एवं उच्छंखलता के मध्य उनके यौनागों की बनावट एवं तज्जन्य उसकी अनुभूतियों में कहीं कोई संबंध तो नहीं। इस प्रश्न ने मेरे मन को अनेक बार मथा है। मैं समझता हूं कि भारत संवभत: पहला देश और ''हिन्दू'' पहली संस्कृति रही होगी जिसने ''काम'' सेक्स को देवता कहा और इस विषय पर विस्तृत शोध ग्रंथो की रचना की। इसकी चर्चा यहां हमारा उद्देश्य नहीं है किन्तु 'काम' या 'सेक्स' की भारतीयों की दृष्टि में महत्ता को स्पष्ट करना चाहूंगा।

आचार्य वात्सात्यन ने अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में लिखा है - ''धर्मार्थकमेभ्य नम:'' अर्थात धर्म अर्थ और काम को नमस्कार है।'' 'धर्म' की वैशेषिक दर्शन की परिभाषा देखें - ''यतोsभ्यदुय नि:श्रेयस सिध्दिस: धर्म:।'' अर्थात इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण करने वाला तत्व ही धर्म है इस लोक में अर्थात भौतिक संसार में सुख क्या है ?

चाणक्य का कथन है -

''भोज्यं भोजन शक्तिष्च रतिषक्तिर्वरागंनां
विभवो दान शक्तिष्च नाल्पस्यतपस: कलम॥''
अर्थात भोज्य पदार्थ और भोजन करने शक्ति, रति अर्थात सैक्स शक्ति एवं सुन्दर स्त्री का मिलना, वैभव और दानशक्ति का प्राप्त होना 'कम तपस्या' का फल नहीं है। (चा0नी0अ02/2)

स्पष्ट है कि भारतीय हिन्दू परम्परा में ''स्त्री और सेक्स'' सांसारिक सुखों का आधार है। 'काम' या सैक्स को लेकर कतिपय अन्य उदाहरण देखें -

कामो जज्ञे प्रथमे (अथर्ववेद - 9/12/19) कामस्तेदग्रे समवर्तत (अथर्ववेद - 19/15/17) (ऋग्वेद 10/12/18)

वृहदारव्यक में विषय-सुख की अनुभूति के लिए मिथनु अर्थात स्त्री पुरूष जोड़े की अनिवार्यता को वाणी दी गई है - ''स नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते। स द्वितीयमैच्छत।''

अर्थात किसी का अकेले में मन नहीं लगता ब्रहमा का भी नहीं। रमण के लिए उसे दूसरे की चाहना होती है।

मानव मन की मूलवासनाओं अथवा प्रवृत्तियों को हमारे आचार्यों ने इस प्रकार चिन्हित किया - ''वित्तैषणा, पुत्रषवणा तथ लोकेषणा'' इनको वर्गो में रखते हुए इनके मूल में ''आनन्द के उपभोग'' की प्रवृत्ति को माना है - ब्रहदारण्यक उपनिषद का कथन है - ''सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम्'' अर्थात सभी सुख एकमात्र ''उपस्थ'' (योनिक एवं लिंग) के आधीन हैं। (उपस्थ - योनि एवं लिंग संस्कृत हिन्दी शब्द कोष - वा0शि0आप्टे - पृ0 213)

[इस चर्चा से यह भारतीय हिन्दू दृष्टिकोण स्वत: स्पष्ट है कि भौतिक सुखों के केन्द्र में है - ''नारी और यौन सुख अर्थात सेक्स है। इस प्रकार ''हिन्दू नारी विमर्श'' के लिए नारी की यौन संतुष्टि, उसके यौनाधिकार और उसकी संतानोत्पत्ति का अधिकार केन्द्र में आ जाता है। वेदों, उपनिषदों, आरण्यकों एवं नीति ग्रंथो में इसकी चर्चा है। अथर्ववेद में तो इस पर विस्तृत चर्चा देखी जा सकती है जिसे इस चार्ट से समझ सकते हैं। ]

यह कुछ उदाहरण हैं। ऐसे अनेकों काण्ड और सूक्त प्रस्तुत किया जा सकते हैं। हमारी परम्परा में ''वेदों'' को ''ज्ञान'' का ''इनसाइक्लोपीडिया'' माना गया है। मनु कहते हैं - वेदो अखिलोs धर्म ज्ञान मूलम''।

उपरोक्त उदाहरणों एवं चर्चा से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हमने ''सहचर्य'' जीवन की अनिवार्यता को कितना महत्व दिया और उस पर कितना विशद मनन एवं अध्ययन किया। प्रसंगत: यह चर्चा यहां यह भी समझने के लिए पर्याप्त है कि क्यों भारत में ही और हिन्दुओं द्वारा ही यौन रत् मूर्तियों के मन्दिर बनाये गए और क्यों ''कामसूत्र'' जैसी रचना का सृजन हमारे ही देश में हुआ। प्रसंगत: बता दूं कि महर्षि वात्सायन अपनी परम्परा के अकेले ऋषि नहीं है - ''इस परम्परा में भगवान ब्रहमा, बृहस्पति, महादेव के गण नन्दी, महर्षि उददालक पुत्र श्वेतकेतु, ब्रभु के पुत्र, पाटलिपुत्र के आचार्य दत्तक, आचार्य सुवर्णनाम्, आचार्य घोटकमुख, गोनर्दीय, गोणिका पुत्र, आचार्य कुचुमार आदि। प्रारम्भ में यह ग्रंथ एक लाख अध्यायों वाला था।''

यद्यपि सुधी जन इसे विषयान्तर मान सकते हैं तदापि हिन्दुओं में कामशास्त्र (सैक्स को एक विषय के रूप में मानना) की महत्ता, परम्परा एवं विशाल साहित्य का अनुमान लगाने के लिए यह जानकारी आवश्यक है।

इतनी व्यापक चर्चा के बाद यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि ''हिन्दू नारी विमर्ष के केन्द्र में ''नारी की दैहिक एवं भावात्मक संतुष्टि'' है। हमारा नारी विमर्श कैसे नारी की यौन संतुष्टि एवं संतान प्राप्ति (विशेषत: पुत्र) की उसकी इच्छा को लेकर केन्द्रित है। इसे आगे के प्रसंग से समझना चाहिए।

इस चर्चा से उन लोगों को उत्तर मिल जाना चाहिए जो यह मानते हैं कि - ''कामसूत्र की व्याख्या भारत में हुई। अजन्ता एलोरा तथा खजुराहों की जगहों में मूर्तिकला के विभिन्न यौनिक स्वरूप मिलते हैं। पर वैदिक संस्कृति का स्त्रीविरोध सैमेटिक धर्मों के व्यापन के दौरान भी बरकरार रहा।'' (स्त्री - यौनिकता बनाम अध्यात्मिकता : प्रमीला, के.पी. - अ0 4 पृ0 38) प्रमीला के.पी. जैसी नारीवादी चिन्तकों ने स्त्री-पुरूष सहचारी जीवन में आधुनिक नारी-विमर्श के सन्दर्भ में तमाम प्रश्न उठाये हैं। जिनके उत्तर स्वाभाविक रूप से इस लेख में मिल सकते हैं। जैसे उनका कथन है - ''मानव अधिकारों के नियमों की बावजूद व्यक्तिगत यौनिक चयन और प्रेम के साहस को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। क्यों ?'' (इसी पु0 के इसी अ0 के पृ0 44 से) यदि आधुनिक युग की एक नारीवादी विचारिका की यह पीड़ा है तो आप समझ सकते हैं कि आधुनिक पाश्चात्य-वादी ''नारी समानता'' के घाव कितने गहरे हैं।

हम सहचारी जीवन की यौनानुभूतियों की ओर चलते हैं। प्रमीला - के.पी. कामसूत्र के हवाले से लिखती हैं - ''विपरीत में कामसूत्र के अनुसार, यौनिक क्रिया में वह परम साथीवन का निभाव उपलब्ध होता है। उसके एहसास में युग्म एक स्पर्षमात्र से खुश रहते हैं। बताया जाता है कि मानव-शरीर इस तरह बनाया गया है कि उसमें यौनावयव ही नहीं किसी भी पोर में एक बार छूनेमात्र से एक नजर डाल देने मात्र से प्रेम की अथाह संवेदना जाग्रत होती है। पर यह नौबत सच्चे प्रेमियों को ही हासिल है।''

प्रोमिला जी सही जगह पर इस प्रसंग का पटाक्षेप करती हैं। वस्तुत: यौन जीवन में प्रेम के अतिरिक्त यौन उत्तेजना को पैदा करने, उसे बनाये रखने एवं सफल यौन व्यवहार एवं चरमसंतुष्टि प्रदान करने वाले संबंधों के लिए कामकला के ज्ञान की आवश्यकता होती है। स्त्री के लिए इसका विशेष महत्व होता है। ऐस वस्तुत: उसकी विशेष प्रकार की शरीर रचना के कारण होती है। कामग्रंथो यथा कामसूत्र, अनंगरंग, रतिरहस्य आदि में इसकी विशद चर्चा की गई है।

हमारा विषय कामशास्त्रीय चर्चा नहीं है किंतु यह प्रासंगिक होगा कि स्त्री के कामसुख की चर्चा कामशास्त्रीय दृष्टि से कर ली जाए। वात्सायन कृत कामसूत्र के ''सांप्रयोगिक नामक द्वितीय अधिकरण के रत-अवस्थापन'' नामक अध्याय में इस विषय पर कामशास्त्र के विभिन्न शास्त्रीय विद्वानों के मतों की चर्चा की गई है। किंतु ''कामसुख'' की व्यापकता की दृष्टि से आचार्य बाभ्रव्य के शिष्यों का मत अधिक स्वीकार्य प्रतीत होता है - ''आचार्य वाभ्रव्य के शिष्यों की मान्यता है - पुरूष के स्खलन के समय आनन्द मिलता है और उसके उपरान्त समाप्त हो जाता है। किन्तु स्त्री को संभाग में प्रवृत्त होते ही संभोगकाल तक और उसकी समाप्ति पर निरन्तर आनन्द की अनुभूति होती है। यदि भोग में उसे आनन्द न आता होता तो उसकी भोगेच्छा जाग्रत ही नही होती और यदि भोगेच्छा न होती तो वह कभी गर्भधारण नही कर पाती। उसका गर्भ स्थिर नही रह पाता।'' अन्तिम वाक्य से सहमति नहीं भी हो सकती है किंतु पूर्वार्ध से आचार्य बाभ्रव्य सहित वात्सायन भी सहमत नजर आते हैं।'' इसी विषय पर श्री काल्याणमल्ल विरचित अनगरंग अनुवादक श्री डा0 रामसागर त्रिपाठी का मत जानना भी समीचीन होगा। कल्याणमल्ल दो महत्वपूर्ण बात करते हैं। वह स्त्री और पुरूष के यौनसुख में आनन्द के स्वरूप और काल की दृष्टि से भेद स्वीकार नही करते हैं। स्त्री इस क्रिया में आधार है और पुरूष कर्ता है। पुरूष भोक्ता है अर्थात वह इस बात से प्रसन्न है कि उसने अमुक महिला को भोगा है और महिला इस बात से प्रसन्न है कि वह अमुक पुरूष द्वारा भोगी गई है। इस प्रकार स्त्री पुरूष में उपाय तथा अभिमान में भेद होता है। अस्तु:! इस विषय पर और चर्चा न करके यह स्वीकारणीय तथ्य है कि - ''यौन क्रिया में पुरूष को सुख की प्राप्ति स्खलन पर होती है उसके लिए शेष कार्य यहां तक पहुंचने की दौड़मात्र है जबकि स्त्री प्रथम प्रहार से आनन्दित होती है और अन्तिम् बिन्दु पर चरमानन्द को प्राप्त करती है।'' वार्ता करने पर कुछ महिलाओं ने इस तथ्य की पुष्टि की है किंतु शालीनता साक्ष्य के प्रकटीकरण की सहमति नहीं देती।

अब जरा इस बात पर ध्यान दें कि यदि नारी असंतुष्ट छूट जाए तो क्या होता है। मेरा मानना है कि वह शनै: शनै: इस प्रवृत्ति को दबाये रखने की आदत डाल लेती हैं इसके कारण उसका शरीर और भावजगत अनेक प्रतिक्रियायें उत्पन्न करता है जिसमे उसकी यह गूढ़ प्रवृत्ति भी शामिल है। जो स्वंय के अन्तरमन को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं देती। हिन्दू नारी विमर्श का मूल आधार उसके शरीरगत और भावगत यौनानुभूतियों का वैषम्य है। इसे किस प्रकार हिन्दू नारी विषयक वैदिक चिंतन अभिव्यक्त करता है। उन्हें इन शीर्षकों में देखना उचित होगा।

वर चयन की स्वतंत्रता एवं विवाह :- यदि वैदिक साहित्य का अनुशीलन किया जाए तो यह स्वत: स्पष्ट हो जायेगा कि स्त्रियों को वर-चयन में स्वतंत्रता प्राप्त थी। डा0 राजबली पाण्डेय अपनी पुस्तक हिन्दू संस्कार के अध्याय आठ ''विवाह संस्कार'' में विवाह के उद्भव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं - ''प्रसवावस्था के कठिन समय में अपने व असहाय शिशु के समुचित संरक्षण के लिए स्त्री का चिन्तित होना स्वाभाविक ही था। जिसने उसे स्थायी जीवन सहयोगी चुनने के लिए प्रेरित किया। इस चुनाव में वह अत्यन्त सतर्क थी तथा किसी पुरूष को अपने आत्म समर्पण के पूर्व उसकी योग्यता, क्षमता व सामर्थ्य का विचार तथा सावधानीपूर्वक अन्तिम निष्कर्ष पर पहुंचना उसके लिए अत्यन्त आवश्यक था।'' इस विषय को महाभारत में वर्णित ''प्राग् विवाह स्थिति से भी समझा जा सकता है, ''अनावृता: किल् पुरा स्त्रिय: आसन वरानने कामाचार: विहारिण्य: स्वतंत्राश्चारूहासिनि॥ 1.128

अर्थात अति प्राचीन काल में स्त्रियां स्वतंत्र तथा अनावृत थीं और वे किसी भी पुरूष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित कर सकती थी।''
इस स्थिति से समझौता कर उन्होने विवाह संस्था को स्वीकार किया होगा तो यह तो संभव नही कि पूर्णत: पुंस आधिपत्य स्वीकार कर लिया हो अर्थात पुरूष जिससे चाहें विवाह कर ले और स्त्री की इच्छा का कोई सम्मान न हो। वर चयन की स्वतंत्रता के समर्थन में यह तर्क भी दिया जा सकता है कि ''औछालकि पुत्र श्वेतकेतु'' को विवाह संस्था की स्थापना का श्रेय जाता है और यह कि इन महर्षि की गणना ''कामशास्त्र'' के श्रेष्ठ आचार्यों में की जाती है। अत: विवाह संस्था की स्थापना करते समय इस ऋषि ने स्त्री की यौन प्रवृत्तियों का ध्यान न रखा हो, यह संभव नही।

एक अन्य उदाहरण के रूप में इस पुराकथा को प्रमाणरूप ग्रहण किया जा सकता है। - ''मद्रदेश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत रूपवती थी। उसने अपने लिए स्वंय पर खोजना प्रारम्भ किया और अन्त में शाल्व नरेश सत्यवान का चयन कर विवाह किया।'' यह वही सावित्री है जिसने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे और हिन्दू मानस में जो सती सावित्री के नाम से प्रसिध्द हुई। डा0 राधा कुमुद मुखर्जी ''हिन्दू सभ्यता'' अध्याय 7 भारत में ऋग्वेदीय ''आर्य - समाज - विवाह और परिवार'' पृ0 91 में यह स्वीकार करते हैं कि - ''विवाह में वर वधू को स्वंयवर की अनुमति थी (10/27/12 ऋग्वेद) गुप्त काल में ''कौमुदी महोत्सव'' मनाये जाने के प्रमाण मिलते हैं कौमुदी महोत्सव वस्तुत: मदनोत्सव या कामदेव की पूजा का ही उत्सव था। ऐसे उत्सव जहां बच्चो, प्रौढ़ो तथा वृध्दों के लिए सामान्य मनोरंजन ही प्रदान करते हैं वही युवक-युवतियों के लिए पारस्परिक चयन की स्वतंत्रता प्रदान करते थे। आज भी ''बसन्त पंचमी'' का त्यौहार मनाया जाता है जो कामदेव की पूजा ही है। ''बसन्तपंचमी'' से होली का महोत्सव या फाल्गुनी मस्ती और हंसी ठिठोली छा जाती है। इस मदनोत्सव का समापन ''होलिका दाह'' पर होता है और होली के पश्चात ''नवदुर्गो'' के पश्चात लगनों से विवाह कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं।

विवाह :- वैदिक परम्परा में पत्नी को जो स्थान प्राप्त था उससे ही विवाह के महत्व को समझा जा सकता है।

''जायेदस्तम् मघवनत्सेदु योनिस्तदित त्वा युक्ता हस्यो वहन्तु। यदा कदा च सुनवाम् सोममग्निष्टवा द्रतो धन्वात्यछा।(ऋ 3.83.4)। भावार्थ यह है कि पत्नी ही घर होती है। वहीं घर में सब लोगो का आश्रय स्थान है। स्त्री के कारण ही परिवार का संगठन होता है। ऋग्वेद का ही मंत्र संख्या 3.53.6 भी स्त्री (पत्नी) का ऐसे ही गौरवान्वित करता है। ऋग्वेद के इन मंत्रो में आधुनिक नारी जिस अस्तित्व और अस्मिता के संकट से गुजर रही है शायद उसका समाधान मिल जाए। अस्तित्व संकट कार्य है। संकट प्रोमिला के.पी. के शब्दो में देखिए - ''वरजीनिया वुल्फ'' ने अपने कमरे को लेकर जो बाते बताई थीं : उसकी पूरी संभावनाएं कम से कम आज की मध्यवर्गीय औरत के पास हैं। पर उसने अपनी रसोई को छोड़ दिया : उसे उपभोगवादी सामग्री के हवाले कर दिया। घरेलू जगह में भी ऐसे अनेक कोने थे जो स्त्रियों के अपने थे। - पर हड़बड़ी में जगह ही खोने की नौबत उभर आई।'' यह है आधुनिकता के दंभ में छिपा आधुनिक नारी का दर्द। किंतु वैदिक ऋषि तो कहता है ''जायेदस्तम्'' पत्नी ही घर है। कोना नहीं सारा आवास ही आपकी कृपा के आश्रित हैं। श्रीमति प्रोमिला के.पी. का यह आरोप कि भारत में वात्स्यायन के पश्चात से हिन्दू धर्म भी मनुवादी रास्ते पर चला अर्थात यौनिकता या देह को हेय मानने का रास्ता। यह आरोप सर्वथा गलत है मनु विवाह के संबंध में कहते हैं - सुंख चेहेच्छता नित्यं योsधार्यों दुर्बलेन्द्रियौ: अर्थात दुर्बलेन्द्रिय व्यक्ति ग्रहस्थाश्रम को धारण नही कर सकता।'' (मनु. स्मृति 3-99-79) स्पष्ट है कि यह कथन स्त्री पुरूष की यौनिकता को ध्यान में रखकर ही कहा गया होगा। आइये, इस तथ्य का परीक्षण वैदिक मनीषियों द्वारा स्वीकार्य विवाह पध्दतियों के अनुशीलन से किया जाए।

वैसे तो आठ विवाह स्वीकार किए गए है - चार प्रशस्त या श्रेष्ठ और चार अप्रशस्त या निष्कृष्ट। यहां पर हम उन्हीं प्रकारों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे जिसमें स्त्री के स्त्रीत्व की मर्यादा का सबसे अधिक ध्यान रखा गया हो। विवाह पध्दतियों में ''पिशाच विवाह'' को मैं प्रथम स्थान पर रखना चाहूंगा।

पिषाच विवाह :- ''सुप्तां, मत्तां, प्रमत्तां व रहो यत्रोपगच्छति। सा पापिष्ठो विवाहानां पैशाचाष्टमोsधम: मत। प्रमत्त, अथवा सेती हुई कन्या से मैथुन करना। (म.स्मृ.3.24) ही पिशाच विवाह है।'' वस्तुत: यह विवाह उस कन्या को विवाह, गृहस्थ जीवन, संतानोत्पति और सामाजिक वैधता का अधिकार देता है जिसके साथ बलात्कार किया गया हो। यद्यपि प्रत्येक स्थिति में ऐसा संभव नही होता होगा तो उसके लिए दण्ड संहिताओं मे अलग से विधान है - जिनका अध्ययन एक अलग विषय है। किंतु जिस नारी और विशेषत: कन्या से या अविवाहिता से, बलात्कार किया गया हो उसकी पीड़ा वही स्त्री ही समझ सकती है। प्राय: ऐसी स्थिति में लड़कियों को चुप रहने या आत्महत्या करते ही देखा गया है। आधुनिक राज्य और उनके दण्ड विधान इस दिशा में दोषी को दण्ड (जो त्रृटिपूर्ण व्यवस्था में प्राय: नहीं हो पाता) और पीड़िता को कुछ रूपयों का अनुतोष प्रदान करता है। ''बलात्कार'' के बदले ''अनुतोष'' की स्थिति क्या दयनीय और मजाकिया नहीं लगती ? इस व्यवस्था से उत्पन्न क्षोभ देखिए कि अभी हाल ही समाचार पत्रों की सुर्खियां बना यह समाचार कि एक निचली अदालत की जज ने बलात्कार के वाद में निर्णय देते हुए यह सुझावात्मक टिप्पणी की - ''कि बलात्कारियों को इंजेक्शन द्वारा नपुसंक बना देना चाहिए।''

इससे यह तो स्पष्ट है कि तमाम महिला संगठनों और बड़े-बड़े कानूनो व दावों के बाद भी बलात्कार से पीड़िता ''नारी के हक'' में कुछ भी नहीं कर पाता। ''पिशाच विवाह'' कम से कम निम्न वर्गीय महिलाओं जैसे खेतिहर, मजदूर, वनवासी, खदानों में काम करने वाली, श्रीमती के घरो में काम करने सेविकाओं को आदि यौन शोषण के विरूध्द सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और नारी के अधिकार प्रदान करता है। जो आधुनिक समाज भी देने में सक्षम नहीं है। इसके पीछे निश्चय ही राज्य की सहमति और शक्ति रही होगी क्योंकि उसके बिना ''बलात्कृता नारी'' को ''विवाह'' की सुरक्षा प्रदान कर पाना संभव ही नहीं। यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन हिन्दू समाज में ''बहुपत्नी प्रथा'' स्वीकार्य थी। अत: ऐसे विवाह के लिए बाध्य किए गए पुरूष को अन्य पत्यिों का चयन करने में और पुन: पूर्ववत् हरकत करने में, दोनो ही स्थितियों में विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा।

राक्षस विवाह :- मनु ने इसके लक्षण में कहा है -

''हत्वा, छित्वा, च भित्वा च क्रोशन्तीं, रूदतीं गृहात्
प्रसध्यं कन्यां हरतो, राक्षसो विधिरूच्यते।'' (मनु-3.33)
अर्थात रोती, पीटती हुई कन्या का उसके संबंधियों को मारकर या क्षत विक्षत कर बलपूर्वक हरण कर विवाह करना ''राक्षस'' प्रकार का विवाह कहा जाता था।

मैं इस पध्दति को ''नारी'' की सामाजिक स्वीकार्यता और सम्मान से जोड़कर क्यों देखता हूं : उसका कारण है। पहली बात यह विवाह ''अपहरण और बलात्कार नही हैं।'' अपितु इसमें विवाह पूर्व ''प्रेम'' का स्थायी भाव पुष्पित होता है। ऐसा कतिपय विद्वान स्वीकार करते हैं। भगवान कृष्ण और रूक्मणी तथा पृथ्वीराज चौहान और संयुक्ता के विवाह को उदाहरण में रख सकते हैं। जहां ''राक्षस विवाह'' हुआ है और विवाहपूर्व ''प्रेम'' का स्थायी भाव विद्यमान है। यद्यपि इसके विरूध्द भी उदाहरण दिए जा सकते है किंतु बहुमान्य तथ्य विवाह पूर्व प्रेम का स्थायी भाव ही है।

अब मैं अपना मत रखता हूं कि यह नारी के ''सम्मान'' से कैसे संबंधित है। सामान्यत: यह विवाह राजन्यों या क्षत्रियों कुलों में सम्मानित माना गया। विवाह पूर्व ''प्रेम'' की स्थिति में एक अन्य उपाय ''गान्धर्व विवाह'' था (असुर विवाह भी) किंतु चोरी छिपे विवाह करने में वीर ''स्त्री-पुरूषों'' का सामाजिक अपमान था तो इस तरह ''राक्षस'' प्रकार के विवाह में दोनो पक्षों से निकट संबंधियों के युध्द में मारे जाने का भय था। ऐसी स्थिति में इन हत्याओं का सामाजिक कलंक नववधू को ही ढोना था। उल्लेखनीय है कि आज भी यदि नववधू के आगमन के पश्चात परिवार में कोई दुर्घटना हो जाए तो अशिक्षित परिवारों की तो छोड़िए शिक्षित परिवारों में भी इसका दोष ''नवागन्तुका'' के सिर पर ही थोप देते हैं। ऐसी स्थिति से ''कन्या'' को बचाने व युगल के ''प्रेम'' को सर्वोच्च सम्मान देते हुए ''राक्षस विवाह'' को न केवल स्वीकार किया गया अपितु क्षत्रियों के लिए सर्वाधिक प्रतिष्ठित विवाह पध्दतियों में रखा गया। स्पष्ट है कि राक्षस विवाह का विधान नारी की प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान को बनाये रखने और विवाह पूर्व युगल के प्रेम को सामाजिक स्वीकरोक्ति का ही प्रकार है।

गान्धर्व विवाह :- यह संभवत: विवाह संस्था के जन्म से भी पूर्व से विद्यमान विवाह पध्दति है जिसे बाद में सभ्य समाज ने सामाजिक स्वीकरोक्ति प्रदान की है। मनु की गान्धर्व विवाह की परिभाषा देखें -
''इच्छायाsन्योन्यसंयोग: कन्यायाश्च वरस्य च
गान्धर्वस्य तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसंभव:।'' (मनु 3.32)
अर्थात कन्या और वर पारस्परिक इच्छा से कामुकता के वशीभूत होकर संभोग करते हैं। ऐसे स्वेच्छापूर्वक विवाह को गान्धर्व विवाह कहा जाता है।'' यह परिभाषा बहुलत: स्वीकार्य है।

इस विवाह में विवाह पूर्व कामुकता के वशीभूत स्वेच्छया किए गए संभोग को सामाजिक स्वीकृति से विवाह में बदल दिया गया है। इसमें न केवल नारी के सम्मान और गरिमा की रक्षा हुई है अपितु विवाह पूर्व जो बीज नारी के गर्भाशय में स्थापित हुआ है। उसकी भी मर्यादा और सामाजिक सम्मान का संरक्षण हुआ।

उपरोक्त के अतिरिक्त प्राजापत्य विवाह जिसे प्रशस्त विवाह श्रेणियों में माना गया है। को भी मैं नारी के सम्मान और गरिमा को महत्व प्रदान करने वाला विवाह मानता हूँ।

प्राजापात्य विवाह :- मनु की परिभाषा देखिए :-
''सहोभौ चरतां धर्मीमति वाचानुभाटय च
कन्याप्रदानमभ्यचर्य प्राजापत्यो विधि स्मृत:।''
अर्थात ''विवाह का वह प्रकार जिसमें तुम दोनों धर्म का साथ-साथ आचरण करो'' ऐसा आदेश दिया जाता है।'' इसमें विशेष बात यह है कि वर स्वंय वधू के पिता के पास प्रार्थी के रूप में आता था और पिता उसकी योग्यता पर विचार कर उस वर के साथ पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न कर देता था।'' वर का स्वंय वधू के पिता के पास प्रार्थी के रूप में आना वर-वधू का परस्पर पूर्व परिचय आकर्षण, एवं प्रेम सिध्द करता है और वधू के पिता द्वारा योग्यता के परीक्षणोपरान्त विवाह सम्पन्न करना पिता के दायित्व और कन्या के परिचय एवं प्रेम के बीच अद्भुत समन्वय का उदाहरण है।

उपरोक्त विवाह प्रकारों पर चर्चा करते हुए हम यह समझ सकते हैं कि वैदिक हिन्दू व्यवस्था द्वारा सुविचारित ''नारी विमर्श'' कितना आधुनिक और नारी की यौन स्वतंत्रता एवं सामाजिक मर्यादा के बीच कितना अद्भुत सामंजस्य स्थापित करता है।

आधुनिक सहचारी जीवन का चिन्त्य विषय स्त्री-पुरूष मित्रता और नारी की यौन स्वतंत्रता आदि कितना आधुनिक है। इसको यदि हिन्दू सभ्यता के परम्परागत साहित्य के द्वारा देखने का प्रयास करें तो स्थिति स्वत: स्पष्ट हो जायेगी।

सभ्यता के शैशव काल में युवक तथा युवतियां बिना किसी शक्ति अथवा छल के स्वंय परस्पर आकर्षित होते रहेंगे। ऋग्वेद 10.27.17 के अनुसार - ''वही वही वधु भ्रदा कहलाती है जो सुन्दर वेश-भूषा से अलंकृत होकर जनसमुदाय में अपने पति (मित्र) का वरण करती है।'' युवा लड़कियां ग्राम-जीवन अथवा अन्य अनेक उत्सवों व मेलों में जहां उनका स्वतंत्र चुनाव तथा परस्पर आकर्षण उनके संबंधियों को अवांछित न लगे इस प्रकार से एक दूसरे के सहवास का अनुभव कर चुके हो अथर्ववेद का मंत्र देखें :-

आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सहनो मगेन्
जृष्टावरेषु समनेषु वल्गुरोयां पत्या सौभगत्वमस्यै। अथर्ववेद 2.36

इस मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि - ''प्राय: माता-पिता पुत्री को अपने प्रेमी (भावी पति) के चयन के लिए स्वतंत्र छोड़ देते थे और प्रेम प्रसंग में आगे बढ़ने के लिए उन्हें प्रत्यक्षत: प्रोत्साहित करते थे। ऋ.वे. 6.30.6 के अनुशीलन से ऐसा विदित होता है कि कन्या की माता उस समय का विचार करती रहती थी जब कन्या का विकसित यौवन (पतिवेदन) उसके लिए पति प्राप्त करने मे सफलता प्राप्त कर लेगा। यह पूर्णत: पवित्र व आनन्द का अवसर था जिसमें न तो किसी प्रकार कलुष था और न अस्वाभाविकता।

अन्त में महाभारत के निम्न उध्दरण को प्रस्तुत करना चाहूंगा -
''सकामाया: सकामेन निर्मन्त्र: श्रेष्ठ उच्यते।'' (म.भा. 4.94.60)
अर्थात् सकामा स्त्री का सकाम पुरूष के साथ विवाह भले ही धार्मिक क्रिया व संस्कार से रहित क्यो न हो, सर्वोत्त्म है।''

डा0 राजबली पाण्डेय कृत हिन्दू संस्कार - विवाह संस्कार से ''गृहीत उक्त सन्दर्भ से यह भलीभांति समझ में आ सकता है कि स्त्री को ''यौन स्वतंत्रता'' हिन्दू/वैदिक समाज के लिए महत्वपूर्ण रहा है। महाभारत के उपरोक्त श्लोक में ''सकामा'' शब्द पर बल देना भी यही स्पष्ट करता है कि यदि कामातुरा नारी कामातुर पुरूष से संबंध बना ले तो किसी विधि विधान के बिना भी वह ''सर्वोत्तम'' विवाह है। महाभारतकार ''श्रेष्ठ'' शब्द का उच्चारण कर रहे हैं। स्पष्ट है कि स्त्री की ''यौन संतुष्टि'' का भाव हमारे सामाजिक सहचारी जीवन की व्यवस्था करते समय नीतिकारों के मन में कितना गहरा बैठा हुआ है। 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

मस्जिद में औरतों पर पाबन्दी क्यों ?

मस्जिद में औरतों पर पाबन्दी क्यों ?


विश्व में जितने भी बड़े धर्म है , सभी में उनके उपासना गृहों में पुरुषों के साथ स्त्रियों प्रवेश करने की अनुमति दी गयी है . जसे मंदिरों में अक्सर हिन्दू पुरुष अपनी पत्नियों और माता बहिनों के साथ पूजा और दर्शन के लिए जाते है . गुरुद्वारों में भी पुरुष -स्त्री साथ ही अरदास करते है . और चर्च में भी ऐसा ही होता है ,लेकिन कभी किसी ने इस बात पर गौर किया है कि पुरषों के साथ औरतें दरगाहों में तो जा सकती हैं ,लेकिन मस्जिदों में उनके प्रवेश पर पाबन्दी क्यों है .जबकि इस्लाम पुरुष और स्त्री की समानता का दावा करता है ‘इस प्रश्न का उत्तर हमें खुद कुरान और हदीसों से मिल जाता है .जिस पर संक्षिप्त में जानकारी दी जारही है .

1-मस्जिदें आतंकियों का अड्डा हैं
यदि हम विश्व दुसरे देशों के साथ होने वाली इस्लामी जिहादी आतंकी घटनाओं का विश्लेषण करें तो हमें पता चलेगा की जैसे जैसे आतंकवादी अपनी नयी नयी रणनीति बदलते जाते है ,वैसे वैसे ही मस्जिदों की निर्माण शैली में भी परिवर्तन होता रहता है , यदि आप सौ दो साल पहिले की किसी मस्जिद को देखें पाएंगे कि उसमे चारों तरफ ऊंची दीवार , मीनारें , गुम्बद और बीच में पानी का एक हौज होगा , और एक तरफ मिम्बर होगा जिस पर से इमाम खुतबा देता है .
लेकिन आजकल जो मस्जिदें बन रही हैं , उनके साथ दुकानें , रहने के लिए सर्व सुविधा युक्त कमरे और तहखानों के साथ भूमिगत सुरंगे भी बनायीं जाती है . जिस से गुप्त रूप से निकल भागने से आसानी हो .ऐसी ही मस्जिदों के तहखानों में हथियार छुपाये जाते हैं , जो दंगों के समय निकालकर प्रयोग किये जाते है . यही नहीं इन्हीं गुप्त सुरंगोंसे आतंकी आसानी से भाग जाते हैं .जबलपुर दंगों में ऐसी मस्जिदों से हथियार बरामद हुए थे. चूँकि मुसलमान जो भी आतंकी कार्यवाही करते हैं उसकी प्रेरणा कुरान से लेते हैं .और उसी की प्रेरणा से मस्जिदों में हथियार भी छुपाते रहते हैं , जैसे कुरान में कहा है ,

“और लोगों ने मस्जिदें इसलिए बना रखी हैं , कि वहां से लोगों को हानि पहुंचाएं ,और आपस में फूट डालें .और अपने विरोधियों पर घात लगाने की योजनायें बनाने का स्थल बनायें ” सूरा – तौबा 9 :107

2-औरतें घर में नमाज क्यों पढ़ें
इसके सिर्फ दो ही कारण हो सकते हैं , एक तो यह की मुहम्मद एक चालाक व्यक्ति था , उसे पता था कि मस्जिदें फसाद जी जड़ होती हैं . और दंगों में अक्सर औरतें ही निशाना बनायीं जाती है . और बलात्कार करना जिहाद का एक प्रमुख हथियार है . मुहम्मद को दर था कि यदि औरतें मस्जिद जाएँगी तो वापसी में खुद मुस्लमान ही उनके साथ बलात्कार कर सकते है , इस लिए उसने यह हदीस सुना दी थी .
“अब्दल्लाह बिन मसूद ने कहा कि रसूल का आदेश है ,औरतों के यही उचित है कि वह यातो अपने घर के आँगन में नमाज पढ़ें , या घर के इसी एकांत कमरे में नमाज पढ़ा करें ” सुन्नन अबू दाउद-जिल्द 1 किताब 204 हदीस 570

3-औरतों की बुद्धि अधूरी होती है
दूसरा कारण यह है कि मुहम्मद की सभी औरतें मुर्ख और अनपढ़ थीं , उसी कि नक़ल करके मुसलमान औरतों को शिक्षा देने के घोर विरोधी है , उनको डर लगा रहता है कि अगर औरतें पढ़ जाएँगी तो इस्लाम कि पोल खुल जाएगी .अक्सर जब औरतें पकड़ी जाती है तो वह जल्दी से राज उगल देती है .इसलिए अक्सर मुसलमान गैर मुस्लिम लड़की को फसाते है
” सईदुल खुदरी ने कहा कि रसूल ने कहा है औरतों दर्जा पुरुषों से आधा होता है ,क्योंकि उनकी बुद्धि पुरुषों से आधी होती है “बुखारी -जिल्द 3 किताब 48 हदीस 826

4-औरतें चुगलखोर होती हैं

दुनिया के सारे मुसलमान किसी न किसी अपराध में संलग्न रहते हैं . और मस्जिदों के इमाम बुखारी जैसे मुल्ले उनको उकसाते रहते हैं . सब जानते है कि अक्सर औरतें अपने दिल कि बातों को देर तक नहीं छुपा सकती है ,जिस से मुसलमानों को पकडे जाने का खतरा बना रहता है .इसलिए वह औरतों को मस्जिदों में नहीं जाने देते हैं
“सईदुल खुदरी ने कहा कि एक बार जब रसूल नमाज पढ़ चुके और मुसल्ला उठा कर एक खुतबा ( व्याख्यान ) सुनाया और कहा मैंने आज तक औरतों से अधिक बुद्धि में कमजोर किसी को नहीं देखा . क्योंकि उनके पेटों में कोई बात नहीं पचती है .यानि वह गुप्त बातें उगल देती हैं “बुखारी -जिल्द 2 किताब 24 हदीस 54
इसी विषय में जकारिया नायक ने बड़ी मक्कारी से कहा है कि केवल भारत में औरतों को मस्जिद में जाने पर पाबन्दी है . और दुसरे इस्लामी देशों में ऐसा नहीं है . लेकिन वास्तविकता तो यह्हाई कि जहाँ मुस्लिम औरतें जिहाद करती हैं उन देशों में औरतें मस्जिद में जा सकती है , और जब भारत में भी मुस्लिम आतंकी औरतों की संख्या अधिक हो जाएगी , यहाँ भी औरतें मस्जिदों में जाने लगेंगी . क्योंकि फिर छुपाने की कोई बात नहीं रहेगी .

नास्तिक कैसे होते हैं ?

नास्तिक कैसे होते हैं ?


सामान्यतः जो व्यक्ति ईश्वर , परलोक ,और कर्म फल के नियम पर विश्वास नहीं करता उसे नास्तिक कहा जाता .चूँकि बौद्ध और जैन ईश्वर को नहीं मानते इसलिए अज्ञानवश हिन्दू उनको नास्तिक कह देते हैं .

यद्यपि बौद्ध और जैन कर्म के सिद्धांत को मानते हैं .और पाप पुण्य पर विश्वास करते हैं .लेकिन जो लोग निरंकुश होकर सिर्फ भौतिकतावाद और अपना सुख और स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं , वास्तव में वही नास्तिक होते हैं .ऐसे लोगों मान्यता एक प्रसिद्द कहावत से समझी जा सकती है ,
” लूटो खाओ मस्ती में , आग लगे बस्ती में “
ऐसे लोग सभी मर्यादाएं , परंपरा ,नियम और लोक लज्जा की परवाह नहीं करते .भले देश और समाज बर्बाद हो जाये .भगवान बुद्ध और महावीर के समय ऐसे ही विचार रखने वाला एक व्यक्ति चार्वाक था , जिसके लाखों अनुयायी हो गए थे , उसके विचारों को ही चार्वाक दर्शन कहा जाता है .
1-चार्वाक दर्शन
चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदबाह्य भी कहा जाता है।
वेदवाह्य दर्शन छ: हैं- चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक, और आर्हत। इन सभी में वेद से असम्मत सिद्धान्तों का प्रतिपादन है।
चार्वाक प्राचीन भारत के एक अनीश्वरवादी और नास्तिक तार्किक थे। ये नास्तिक मत के प्रवर्तक वृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। बृहस्पति और चार्वाक कब हुए इसका कुछ भी पता नहीं है। बृहस्पति को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रन्थ में अर्थशास्त्र में भी उल्लेख किया है .”सर्वदर्शनसंग्रह “में चार्वाक का मत दिया हुआ मिलता है  पद्मपुराण में लिखा है कि असुरों को बहकाने के लिये बृहस्पति ने वेदविरुद्ध मत प्रकट किया था
2-भोगवाद ही नास्तिकता है 
भोगवाद ,चरम स्वार्थपरायण मानसिकता और अय्याशी ही नास्तिक होने की निशानी है , चाहे ऐसे व्यक्ति किसी भी धर्म से सम्बंधित हों .चार्वाक की उस समय कही गयी बातें आजकल के लोगों पर सटीक बैठती हैं ,चार्वाक ने कहा था ,
न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पार्लौकिकः 
नैव वर्नाश्रमादीनाम क्रियश्चफल्देयिका .
अर्थ -न कोई स्वर्ग है ,न उस् जैसा लोक है .और न आत्मा ही पारलौकिक वस्तु है .और अपने किये गए सभी भले बुरे कर्मों का भी कोई फल नहीं मिलता अर्थात सभी बेकार हो जाते हैं .
यावत् जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः .
अर्थात-जब तक जियो मौज से जियो और कर्ज लेकर घी पियो मतलब मौज मस्ती करो
कैसी चिंता, शरीर के भस्म हो जाने के बाद फिर वह वापस थोड़े ही आती है।
“पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावतपतति भूतले , पुनरुथ्याय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते .
अर्थ -पियो ,पियो खूब शराब पियो ,यहाँ तक कि लुढ़क कर जमीन पर गिर जाओ . और होश में आकर फिर से पियों .क्योंकि फिरसे जन्म नही होने वाला .
वेद शाश्त्र पुराणानि सामान्य गाणिका इव, मातृयोनि परित्यज विहरेत सर्व योनिषु .
अर्थ -वेद , और सभी शास्त्र और पुराण तो वेश्या की तरह हैं .तुम सिर्फ अपनी माँ को छोड़कर सभी के साथ सहवास कर सकते हो .
3-यूनानी नास्तिक 
भारत की तरह यूनान (Greece ) भी एक प्राचीन देश है ,और वहां की संस्कृति भी काफी समृद्ध थी .वहां भी नास्तिक लोगों का एक बहुत बड़ा समुदाय था .जिसे एपिक्युरियनिस्म (Epicureanism)कहा जाता है .जिसे ईसा पूर्व 307 में एपिक्युरस (Epicurus)नामके एक व्यक्ति ने स्थापित किया था .ग्रीक भाषा में ऐसे विचार को “एटारेक्सिया (Ataraxia Aταραξία )भी कहा जाता है .इसका अर्थ उन्माद , मस्ती ,मुक्त होता है .इस दर्शन (Philosophy ) का उद्देश्य मनुष्य को हर प्रकार के नियमों , मर्यादाओं .और सामाजिक . कानूनी बंधनों से मुक्त कराना था .ऐसे लोग उन सभी रिश्ते की महिलाओं से सहवास करते थे . जिनसे शारीरिक सम्बन्ध बनाना पाप और अपराध समझा जाता था .
ऐसे लोग जीवन को क्षणभंगुर मानते थे .और मानते थे कि जब तक दम में दम है हर प्रकार का सुख भोगते रहो .क्योंकि फिर मौका नहीं मिलेगा .जब इन लोगों को स्वादिष्ट भोजन मिल जाता था तो यह लोग इतना खा लेते थे कि इनके पेट में साँस लेने की जगह भी नहीं रहती थी . तब यह लोग उलटी करके पेट खाली कर लेते थे .स्वाद लेने के लिए फिर से खाने लगते थे .
4-असली नास्तिक सेकुलर 
सेकुलर प्राणियों की एक ऐसी प्रजाति है ,अनेकों प्राणियों गुण पाए जाते हैं .गिरगिट की तरह रंग बदलना , लोमड़ी की तरह मक्कारी ,कुत्तों की तरह अपने ही लोगों पर भोंकना ,अजगर की तरह दूसरों का माल हड़प कर लेना .और सांप की तरह धोके से डस लेना .इसलिए ऐसे प्राणी को मनुष्य समझना बड़ी भारी भूल होगी . ऐसे लोग पाखंड और ढोंग के साक्षात अवतार होते हैं .दिखावे के लिए ऐसे लोग सभी धर्मों को मानने का नाटक करते हैं, लेकिन वास्तव में इनको धर्म या ईश्वर से कोई मतलब नहीं होता . अपने स्वार्थ के लिए यह लोग ईश्वर को भी बेच सकते हैं .ना यह किसी को अपना सगा मानते है .और न कोई बुद्धिमान इनको अपना सगा मानने की भूल करे .
वास्तव में आजकल के सेकुलर ही नास्तिक हैं .





सोमवार, 17 मार्च 2014

होली

गौरवमयी भारतवर्ष की तरफ से शुभ होली 
होली 


होली भारत का प्रमुख त्योहार है। होली जहाँ एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक है, वहीं रंगों का भी त्योहार है। बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। इसमें जातिभेद-वर्णभेद का कोई स्थान नहीं होता। इस अवसर पर लकड़ियों तथा कंडों आदि का ढेर लगाकर होलिकापूजन किया जाता है फिर उसमें आग लगायी जाती है। पूजन के समय मंत्र उच्चारण किया जाता है।
प्रचलित मान्यता के अनुसार यह त्योहार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्मृति में मनाया जाता है। पुराणों में वर्णित है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य अग्नि स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्निस्नान करने को कहा। उसने समझा कि ऐसा करने से प्रह्लाद अग्नि में जल जाएगा तथा होलिका बच जाएगी। होलिका ने ऐसा ही किया, किंतु होलिका जल गयी, प्रह्लाद बच गये। होलिका को यह स्मरण ही नहीं रहा कि अग्नि स्नान वह अकेले ही कर सकती है। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी।
यह बहुत प्राचीन उत्सव है। इसका आरम्भिक शब्दरूप होलाका था। जैमिनि, 1।3।15-16 के अनुसार  भारत में पूर्वी भागों में यह शब्द प्रचलित था। जैमिनि एवं शबर का कथन है कि 'होलाका' सभी आर्यो द्वारा सम्पादित होना चाहिए।काठकगृह्य  73,1 में एक सूत्र है 'राका होला के', जिसकी व्याख्या टीकाकार देवपाल ने यों की है- 'होला एक कर्म-विशेष है जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए सम्पादित होता है, उस कृत्य में राका (पूर्णचन्द्र)  देवता है।' राका होलाके। काठकगृह्य (73।1)।' इस पर देवपाल की टीका यों है: 'होला कर्मविशेष: सौभाग्याय स्त्रीणां प्रातरनुष्ठीयते। तत्र होला के राका देवता। यास्ते राके सुभतय इत्यादि। अन्य टीकाकारों ने इसकी व्याख्या अन्य रूपों में की है। 'होलाका' उन बीस क्रीड़ाओं में एक है जो सम्पूर्ण भारत में प्रचलित हैं। इसका उल्लेख वात्स्यायन के कामसूत्र , 1।4।42  में भी हुआ है जिसका अर्थ टीकाकार जयमंगल ने किया है। फाल्गुन की पूर्णिमा पर लोग श्रृंग से एक-दूसरे पर रंगीन जल छोड़ते हैं और सुगंधित चूर्ण बिखेरते हैं। हेमाद्रि  ने काल, पृ. 106 बृहद्यम का एक श्लोक उद्भृत किया है। जिसमें होलिका-पूर्णिमा को हुताशनी अर्थात आलकज की भाँति  कहा गया है। लिंग पुराण में आया है- 'फाल्गुन पूर्णिमा को 'फाल्गुनिका' कहा जाता है, यह बाल-क्रीड़ाओं से पूर्ण है और लोगों को विभूति, ऐश्वर्य देने वाली है।'वराह पुराण में आया है कि यह 'पटवास-विलासिनी'  अर्थात  चूर्ण से युक्त क्रीड़ाओं वाली है। (लिंगपुराणे। फाल्गुने पौर्णमासी च सदा बालविकासिनी। ज्ञेया फाल्गुनिका सा च ज्ञेया लोकर्विभूतये।। 
वाराहपुराणे। फाल्गुने पौर्णिमास्यां तु पटवासविलासिनी। ज्ञेया सा फाल्गुनी लोके कार्या लोकसमृद्धये॥ हेमाद्रि (काल, पृ. 642)। 
इसमें प्रथम का.वि. (पृ. 352) में भी आया है जिसका अर्थ इस प्रकार है-बालवज्जनविलासिन्यामित्यर्थ:)

जैमिनि एवं काठकगृह्य में वर्णित होने के कारण यह कहा जा सकता है कि ईसा की कई शताब्दियों पूर्व से 'होलाका' का उत्सव प्रचलित था। कामसूत्र एवंभविष्योत्तर पुराण इसे वसन्त से संयुक्त करते हैं, अत: यह उत्सव पूर्णिमान्त गणना के अनुसार वर्ष के अन्त में होता था। अत: होलिका हेमन्त या पतझड़ के अन्त की सूचक है और वसन्त की कामप्रेममय लीलाओं की द्योतक है। मस्ती भरे गाने, नृत्य एवं संगीत वसन्तागमन के उल्लासपूर्ण क्षणों के परिचायक हैं। वसन्त की आनन्दाभिव्यक्ति रंगीन जल एवं लाल रंगअबीर-गुलाल के पारस्परिक आदान-प्रदान से प्रकट होती है। कुछ प्रदेशों में यहरंग युक्त वातावरण 'होलिका के दिन' ही होता है, किन्तु दक्षिण में यह होलिका के पाँचवें दिन (रंग-पंचमी) मनायी जाती है। कहीं-कहीं रंगों के खेल पहले से आरम्भ कर दिये जाते हैं और बहुत दिनों तक चलते रहते हैं; होलिका के पूर्व ही 'पहुनई' में आये हुए लोग एक-दूसरे पर पंक (कीचड़) भी फेंकते हैं। (  वर्षकृत्यदीपक (पृ0 301) में निम्न श्लोक आये हैं- 
'प्रभाते बिमले जाते ह्यंगे भस्म च कारयेत्। सर्वागे च ललाटे च क्रीडितव्यं पिशाचवत्॥
सिन्दरै: कुंकुमैश्चैव धूलिभिर्धूसरो भवेत्। गीतं वाद्यं च नृत्यं च कृर्याद्रथ्योपसर्पणम् ॥ 
ब्राह्मणै: क्षत्रियैर्वैश्यै: शूद्रैश्चान्यैश्च जातिभि:। एकीभूय प्रकर्तव्या क्रीडा या फाल्गुने सदा। बालकै: वह गन्तव्यं फाल्गुन्यां च युधिष्ठिर ॥')  कही-कहीं दो-तीन दिनों तक मिट्टी, पंक, रंग, गान आदि से लोग मतवाले होकर दल बना कर होली का हुड़दंग मचाते हैं, सड़कें लाल हो जाती हैं। वास्तव में यह उत्सव प्रेम करने से सम्बन्धित है, किन्तु शिष्टजनों की नारियाँ इन दिनों बाहर नहीं निकल पातीं, क्योंकि उन्हें भय रहता है कि लोग भद्दी गालियाँ न दे बैठें। श्री गुप्ते ने अपने लेख  हिन्दू हॉलीडेज एवं सेरीमनीज'(पृ. 92  में प्रकट किया है कि यह उत्सव ईजिप्ट, मिस्र या ग्रीस, यूनान से लिया गया है। किन्तु यह भ्रामक दृष्टिकोण है। लगता है, उन्होंने भारतीय प्राचीन ग्रन्थों का अवलोकन नहीं किया है, दूसरे, वे इस विषय में भी निश्चित नहीं हैं कि इस उत्सव का उद्गम मिस्त्र से है या यूनान से। उनकी धारणा को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए।

हेमाद्रि ने  व्रत, भाग 2, पृ0 174-19 भविष्योत्तर , 132।1।51 से उद्धरण देकर एक कथा दी है। युधिष्ठिर ने कृष्ण से पूछा कि फाल्गुन-पूर्णिमा को प्रत्येक गाँव एवं नगर में एक उत्सव क्यों होता है, प्रत्येक घर में बच्चे क्यों क्रीड़ामय हो जाते हैं और 'होलाका' क्यों जलाते हैं, उसमें किस देवता की पूजा होती है, किसने इस उत्सव का प्रचार किया, इसमें क्या होता है और यह 'अडाडा' क्यों कही जाती है।
प्रह्लाद को गोद में बिठाकर बैठी होलिका
कृष्ण ने युधिष्ठिर से राजा रघु के विषय में एक किंवदन्ती कही। राजा रघु के पास लोग यह कहने के लिए गये कि 'ढोण्ढा' नामक एक राक्षसी है जिसे शिवने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र शस्त्र या जाड़ा या गर्मी या वर्षा से मर सकती है, किन्तु शिव ने इतना कह दिया है कि वह क्रीड़ायुक्त बच्चों से भय खा सकती है। पुरोहित ने यह भी बताया कि फाल्गुन की पूर्णिमा को जाड़े की ऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतुका आगमन होता है, तब लोग हँसें एवं आनन्द मनायें, बच्चे लकड़ी के टुकड़े लेकर बाहर प्रसन्नतापूर्वक निकल पड़ें, लकड़ियाँ एवं घास एकत्र करें, रक्षोघ्नमन्त्रों के साथ उसमें आग लगायें, तालियाँ बजायें, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें, हँसें और प्रचलित भाषा में भद्दे एवं अश्लील गाने गायें, इसी शोरगुल एवं अट्टहास से तथा होम से वह राक्षसी मरेगी। जब राजा ने यह सब किया तो राक्षसी मर गयी और वह दिन 'अडाडा' या 'होलिका' कहा गया। आगे आया है कि दूसरे दिन चैत्र की प्रतिपदा पर लोगों को होलिकाभस्म को प्रणाम करना चाहिए, मन्त्रोच्चारण करना चाहिए, घर के प्रांगण में वर्गाकार स्थल के मध्य में काम-पूजा करनी चाहिए। काम-प्रतिमा पर सुन्दर नारी द्वारा चन्दन-लेप लगाना चाहिए और पूजा करने वाले को चन्दन-लेप से मिश्रित आम्र-बौर खाना चाहिए। इसके उपरान्त यथाशक्ति ब्राह्मणों, भाटों आदि को दान देना चाहिए और 'काम देवता मुझ पर प्रसन्न हों' ऐसा कहना चाहिए। इसके आगे पुराण में आया है- 'जब शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि पर पतझड़ समाप्त हो जाता है और वसन्त ऋतु का प्रात: आगमन होता है तो जो व्यक्ति चन्दन-लेप के साथ आम्र-मंजरी खाता है वह आनन्द से रहता है।' (पुस्तक- धर्मशास्त्र का इतिहास-4 | लेखक- पांडुरंग वामन काणे | प्रकाशक- उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान)

होलिका दहन पूर्ण चंद्रमा (फाल्गुन पूर्णिमा) के दिन ही प्रारंभ होता है। इस दिन सायंकाल को होली जलाई जाती है। इसके एक माह पूर्व अर्थात् माघ पूर्णिमा को 'एरंड' या गूलर वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है, और उस पर लकड़ियाँ, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात या सायंकाल इसे जलाया जाता है। परंपरा के अनुसार सभी लोग अलाव के चारों ओर एकत्रित होते हैं।
राधा-कृष्ण की छवि में ब्रजवासी, बरसाना
इसी 'अलाव को होली' कहा जाता है। होली की अग्नि में सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ व सूखी लकड़ियाँ डाली जाती हैं तथा लोग इसी अग्नि के चारों ओर नृत्य व संगीत का आनन्द लेते हैं।

होली और राधा-कृष्ण की कथा

भगवान श्रीकृष्ण तो सांवले थे, परंतु उनकी आत्मिक सखी राधा गौरवर्ण की थी। इसलिए बालकृष्ण प्रकृति के इस अन्याय की शिकायत अपनी माँ यशोदा से करते तथा इसका कारण जानने का प्रयत्न करते। एक दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को यह सुझाव दिया कि वे राधा के मुख पर वही रंग लगा दें, जिसकी उन्हें इच्छा हो। नटखट श्रीकृष्ण यही कार्य करने चल पड़े। आप चित्रों व अन्य भक्ति आकृतियों में श्रीकृष्ण के इसी कृत्य को जिसमें वे राधा व अन्य गोपियों पर रंग डाल रहे हैं, देख सकते हैं। यह प्रेममयी शरारत शीघ्र ही लोगों में प्रचलित हो गई तथा होली की परंपरा के रूप में स्थापित हुई। इसी ऋतु में लोग राधा व कृष्ण के चित्रों को सजाकर सड़कों पर घूमते हैं। मथुरा की होली का विशेष महत्त्व है, क्योंकि मथुरा में ही तो कृष्ण का जन्म हुआ था।
होली और ढूंढी की कथा 
भविष्यपुराण में वर्णित है कि सत्ययुग में राजा रघु के राज्य में माली नामक दैत्य की पुत्री ढोंढा या धुंधी थी। उसने शिव की उग्र तपस्या की। शिव ने वर माँगने को कहा। उसने वर माँगा- प्रभो! देवता, दैत्य, मनुष्य आदि मुझे मार न सकें तथा अस्त्र-शस्त्र आदि से भी मेरा वध न हो। साथ ही दिन में, रात्रि, में शीतकाल में, उष्णकाल तथा वर्षाकाल में, भीतर-बाहर कहीं भी मुझे किसी से भय नहीं हो।' शिव ने तथास्तु कहा तथा यह भी चेतावनी दी कि तुम्हें उन्मत्त बालकों से भय होगा। वही ढोंढा नामक राक्षसी बालकों व प्रजा को पीड़ित करने लगी। 'अडाडा' मंत्र का उच्चारण करने पर वह शांत हो जाती थी। इसी से उसे 'अडाडा' भी कहते हैं। इस प्रकार भगवान शिव के अभिशाप वश वह ग्रामीण बालकों की शरारत, गालियों व चिल्लाने के आगे विवश थी। ऐसा विश्वास किया जाता है कि होली के दिन ही सभी बालकों ने अपनी एकता के बल पर आगे बढ़कर धुंधी को गाँव से बाहर धकेला था। वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए तथा चालाकी से उसकी ओर बढ़ते ही गये। यही कारण है कि इस दिन नवयुवक कुछ अशिष्ट भाषा में हँसी मजाक कर लेते हैं, परंतु कोई उनकी बात का बुरा नहीं मानता।
होली की प्राचीन कथाएं 
  • एक कहानी यह भी है कि कंस के निर्देश पर जब राक्षसी पूतना श्रीकृष्ण को मारने के लिए उनको विषपूर्ण दुग्धपान कराना शुरू किया लेकिन श्रीकृष्ण ने दूध पीते-पीते उसे ही मार डाला। कहते हैं कि उसका शरीर भी लुप्त हो गया तो गाँव वालों ने पूतना का पुतला बना कर दहन किया और खुशियाँ मनायी। तभी से मथुरा मे होली मनाने की परंपरा है।
  • एक अन्य मुख्य धारणा है कि हिमालय पुत्री पार्वती भगवान शंकर से विवाह करना चाहती थी। चूँकि शंकर जी तपस्या में लीन थे इसलिए कामदेवपार्वती की मदद के लिए आए। कामदेव ने अपना प्रेमबाण चलाया जिससे भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई। शिवशंकर ने क्रोध में आकर अपनी तीसरा नेत्र खोल दिया। जिससे भगवान शिव की क्रोधाग्नि में जलकर कामदेव भस्म हो गए। फिर शंकर जी की नज़र पार्वती जी पर गई। शिवजी ने पार्वती जी को अपनी पत्नी बना लिया और शिव जी को पति के रूप में पाने की पार्वती जी की आराधना सफल हो गई। होली के अग्नि में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर सच्चे प्रेम के विजय के रूप में यह त्योहार विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
  • मनुस्मृति में इसी दिन मनु के जन्म का उल्लेख है। कहा जाता है मनु ही इस पृथ्वी पर आने वाले सर्वप्रथम मानव थे। इसी दिन 'नर-नारायण' के जन्म का भी वर्णन है जिन्हें भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है।सतयुग में भविष्योतरापूरन नगर में छोटे से लेकर बड़ों को सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियाँ लग गई। वहाँ के लोग द्युँधा नाम की राक्षसी का प्रभाव मान रहे थे। इससे रक्षा के लिए वे लोग आग के पास रहते थे। सामान्य तौर पर मौसम परिवर्तन के समय लोगों को इस तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं, जिसमें अग्नि राहत पहुँचाती है। ‘शामी’ का पेड़ जिसे अग्नि-शक्ति का प्रतीक माना गया था, उसे जलाया गया और अगले दिन सत्ययुगीन राजा रघु ने होली मनायी।
इस तरह देखते हैं कि होली विभिन्न युगों में तरह-तरह से और अनेक नामों से मनायी गयी और आज भी मनाई जा रही है। इस तरह कह सकते हैं कि असत्य पर सत्य की या बुराई पर अच्छाई पर जीत की खुशी के रूप में होली मनायी जाती है। इसके रंगों में रंग कर हम तमाम खुशियों को आत्मसात कर लेते हैं।

साहित्य में होली की झलक

संस्कृत शब्द 'होलक्का' से होली शब्द का जन्म हुआ है। वैदिक युग में 'होलक्का' को ऐसा अन्न माना जाता था, जो देवों का मुख्य रूप से खाद्य-पदार्थ था। बंगाल में होली को डोल यात्रा या झूलन पर्व,दक्षिण भारत में कामथनम, मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ में ’गोल बढ़ेदो’ नाम से उत्सव मनाया जाता है और उत्तरांचल में लोक संगीत व शास्त्रीय संगीत की प्रधानता है। 'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली', 'कुमार सम्भव' सभी में रंग का वर्णन आया है। कालिदास रचित 'ऋतुसंहार' में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। 'भारवि', 'माघ' जैसे संस्कृत कवियों ने भी वसन्त और होली पर्व का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है। 'पृथ्वीराज रासो' में होली का वर्णन है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली को लेकर कई मस्ती भरे पद लिखे हैं जिनमें प्रकृति और धरती माता के होली खेलने के भावों को प्रकट किया गया है। 

होली बसंत व प्रेम-प्रणव का पर्व है तथा धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है। यह रंगों का, हास-परिहास का भी पर्व है। यह वह त्योहार है, जिसमें लोग 'क्या करना है, तथा क्या नहीं करना' के जाल से अलग होकर स्वयं को स्वतंत्र महसूस करते हैं। यह वह पर्व है, जिसमें आप पूर्ण रूप से स्वच्छंद हो, अपनी पसंद का कार्य करते हैं, चाहे यह किसी को छेड़ना हो या अज़नबी के साथ भी थोड़ी शरारत करनी हो। इन सबका सर्वोत्तम रूप यह है कि सभी कटुता, क्रोध व निरादर बुरा न मानो होली है की ऊँची ध्वनि में डूबकर घुल-मिल जाता है।बुरा न मानो होली है की करतल ध्वनि होली की लंबी परम्परा का अभिन्न अंग है।



 हेमन्त या पतझड़ के अन्त की सूचक , वसन्त की कामप्रेममय लीलाओं की द्योतक, वसन्तागमन के उल्लासपूर्ण क्षणों का  परिचायक , वसन्त की आनन्दाभिव्यक्ति रंगीन जल एवं लाल रंग, अबीर-गुलाल के पारस्परिक आदान-प्रदान से प्रकट होने वाली प्रसन्नता का प्रतीक होली की हार्दिक मंगलमय शुभ कामनाएं और अनंत बधाई !