गुरुवार, 9 जनवरी 2014

भारतीय - संस्कृति में समाज , राष्ट्र और मानवाधिकार

भारतीय-संस्कृति में समाज, राष्ट्र और मानवाधिकार

अमेरिका ब्रिटेन और फ्रांस जैसे विकसित राष्ट्रों सहित विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों का आकर्षण अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहा है। बताया जा रहा है कि अमेरिका के समाज में वहां की कुल आबादी का 24 प्रतिशत भाग भारत और भारत की संस्कृति राम और कृष्ण के प्रति श्रद्धा रखने वाला बन गया है। इसका कारण भारत की समष्टिवादी संस्कृति ही नही है अपितु भारतीय संस्कृति में मिलने वाला वह मधु रस है जिसे लोग शांति के नाम से जानते हैं। इस शांति के लिए यूरोप और अमेरिका सहित सारा संसार ही तड़प और तरस रहा है। वह प्यासे मृग की भांति भारतवर्ष की ओर देख रहा है कि उसे भी शांति की दो बूंदें मिल जाएं। जिन्हें भारतीय लोग सभ्य, विकसित और मानवाधिकारों का संरक्षक मान रहे हैं उनकी भीतरी स्थिति कितनी खोखली है, यह इसी बात से सिद्ध हो जाता है कि यह शांति के लिए आज भी भारत की ओर टकटकी लगा रहे हैं। उन्हें ज्ञात है कि संसार में जब कभी भी धर्ममेघ उठेगा तो वह भारत से ही उठेगा और उस धर्म मेघ से रस टपकेगा वह शांति के सिवाय और कुछ नही होगा। जिसे ईसाई और इस्लाम वाले पिछली कितनी ही सदियों से आमीन और अमन कहकर पुकारते चलते आये हैं वह आमाीन और अमन शांति भारत के चमन में हैं।

उपभोक्तावाद में शाति नही आजकल सारा संसार उपभोक्तावाद की चपेट में है। राजनीति में नेता ग्राहक है मतदाता माल है और वोट मूल्य है। कहने का अभिप्राय है कि राजनीति के बाजार में नेता और मतदाता के मध्य वोट खड़ी है। उसी के लिए मारामारी है। इस वोट का जन्म तो हुआ था मतदाता को स्वामी बनाने के लिए लेकिन यह मतदाता का मूल्य बन गयी है। राजनीति के प्रति और मतदान के प्रति लोगों में निराशा का जो भाव देखने को मिल रहा है उसका कारण यही है कि मतदाता का वोट उसका मूल्य बना दिया गया है। देश का अधिकांश मतदाता अशिक्षित है जिसके वोट को हमारे नेता नोट से या शराब से खरीद लेते हैं। जब माल बाजार में हो और उसके क्रेता विक्रेता भी हों और ये क्रेता विके्रता एक दूसरे से अधिक से अधिक लाभ उठाना चाह रहे हों तो ऐसी व्यवस्था को ही उपभोक्तावाद कहा जाता है। आज नेता मतदाता से और मतदाता नेता से लाभ उठाने की युक्ति में लगे रहते हैं। नेता का दृष्टिकोण चुनाव जीतना और मौज मस्ती करना है। अगले चुनाव के लिए धन एकत्र करना है। जबकि मतदाता का उद्देश्य नेता से कुछ अपने कार्य निकालना है या जाति, बिरादरी, नाती, रिश्तेदारी का संबंध निभाना है। जो लोग इन बातों से प्रभावित नही हो पाते वो नेताजी से शराब और नोट का आकर्षण पाल लेते हैं। राष्ट्रहित दोनों के ही मध्य नही हैं।

बाजार में आप आईए वहां ग्राहक और व्यापारी के मध्य नोट है। वस्तु कम से कम, मात्रा और गुणवत्ता अति न्यून हो और नोट पर्याप्त मिलें यह तो व्यापारी का दृष्टिकोण रहता है और वस्तु मात्रा और गुणवत्ता में उत्तम हो परंतु नोट कम से कम हों यह सोच ग्राहक की रहती है। वहां भी नैतिकता का उसी प्रकार अभाव है जिस प्रकार राजनीति में है। राजनीति में राष्ट्रचिंतन नही है तो व्यापारी और ग्राहक के मध्य समाज चिंतन नही है।

इसी प्रकार छात्र और अध्यापक के संबंध में कहा जा सकता है। वहां इन दोनों के मध्य ‘ट्यूशन' आ गया है। जिससे गुरू के प्रति श्रद्धा और शिष्य के प्रति स्नेह का भाव समाप्त हो गया है। श्रद्धा और स्नेह के सम्मिश्रण से राष्ट्र का भविष्य तैयार होताा है। इस प्रकार स्कूलों में भविष्य चिंतन नही है। छात्र और अध्यापक के मध्य अध्यापक की नीयत का खोट कुंडली मारे बैठा है। यह वोट, नोट और खोट भारतीय समाज का कोढ बन गया है। जिस शांति की बात हमने लेख के प्रारंभ में उठाई है वह हमें मिलेगी नेता के राष्ट्र चिंतन से, व्यापारी और ग्राहक के समाज चिंतन से, गुरू के प्रति छात्र की श्रद्धा से एवं छात्र के प्रति गुरू के स्नेहभाव से निर्मित भविष्य चिंतन के भाव से। क्योंकि राष्ट्रचिंतन, समाज चिंतन और भविष्य चिंतन ही इन सबका पवित्र कर्त्तव्य है, अर्थात धर्म है।

इस प्रकार सिद्ध हुआ कि शांति के मूल में भी धर्म खड़ा है। यह धर्म ही तत्व है जो भारतीय ऋषियों ने मानवाधिकारों का सुरक्षा कवच बनाकर समाज को ओढाया। यदि विदेशी लोग हमारी ओर आकर्षित हो रहे हैं तो उसका कारण भारतीय धर्म ही है। वह हमारे धर्म को अंगीकृत करना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि भारत का धर्म समझा जाए और उसे स्वीकार किया जाए।

क्या है भारतीय धर्म? तिलक जनेऊ, लाल स्वापी और हाथ में कमंडल ले लेना और प्रात:काल उठकर गंगा में या किसी अन्य नदी में जाकर राधे-राधे, सियाराम जपते जपते या ओ३म-ओ३म कहकर डुबकी लगा लेना भारतीय धर्म नही है। धर्म राष्ट्रवादी भी होता है और मानवतावादी भी। ईसाईयत को यदि हम लें तो इसमें राष्ट्रवाद तो है पर मानवतावाद नही है। यही स्थिति इस्लाम के विषय में है। सम्प्रदाय राष्ट्र की जनता को रियाया समझता है परंतु धर्म उसे प्रजा मानता है और उसके कल्याण को शासक का सबसे पवित्र कर्त्तव्य मानता है। यह गुण हिंदुत्व का है। क्योंकि यह राष्ट्रवादी भी है एवं मानवतावादी भी है। यह राष्ट्रवाद और मानवतावाद ही भारतीय धर्म है। जो कि संसार के लिए सदा ही कौतूहल और जिज्ञासा का विषय रहा है। यह भारत का धर्म ही है जो समय आने पर मानवता के हित में राष्ट्रवाद को भी कई बार भूल जाता है। ताजा उदाहरण पंडित नेहरू का है, जो अपने मानवतावाद के समक्ष राष्ट्रवाद को भूल गये। नेहरू जी आलोचना के पात्र हो सकते हैं। हमारी लेखनी भी उन निशाना साध सकती है परंतु नेहरू जी कतई गलत नही थे। उनसे गलती यह हो रही थी कि वह भारतीय धर्म के एकांगी तत्व मानवतावाद को ही अपनाने की भूल कर रहे थे। जबकि भारत के शत्रु सदा राष्ट्रवाद को ही अपना धर्म मानते आए हैं। लड़ाई इसी बात की है कि भारत का मानवतावाद बड़ा या उनका राष्ट्रवाद बड़ा है। उनका राष्ट्रवाद सम्प्रदायवाद का समानार्थक है।

भारतीय नेतृत्व को चाहिए कि वह राष्ट्रवाद और मानवतावाद में उचित समन्वय स्थापित करे और नेहरू जी की गलती की पुनरावृत्ति को रोके। जबकि विश्व को चाहिए कि वह भारत के मानवतावाद का अपने राष्ट्रवाद के साथ उचित सामंजस्य स्थापित करे। विश्व में शांति स्वयं ही स्थापित हो जाएगी। इसी शांति में से जन्म लेंगे मानव के शाश्वत शांति प्रदायक मौलिक अधिकार। यही है भारतीय धर्म की ‘सत्यमेव जयते’ की महान परंपरा। जिसे समझना सरल नही है। परंतु जिन्होंने इसे समझ लिया वह इसके दीवाने होकर रह जाते हैं। आज के विश्व को भारतीय संस्कृति के इस उज्जवल पक्ष पर सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर चिंतन करना चाहिए। विश्व शांति की स्थापनार्थ यह नितांत आवश्यक है।

‘युद्ध मानव की हार है । विश्व शांति की स्थापना के नाम पर ही आज तक युद्ध होते रहे हैं। हर युद्घोन्मादी शासक ने जनता का यह कहकर ही मूर्ख बनाया है कि उसके द्वारा जो युद्ध किया जा रहा है वह शांति की स्थापनार्थ किया जा रहा है। साथ ही यह भी कि इस युद्ध के पश्चात भविष्य में कोई अन्य युद्ध नही होगा। सिकंदर से लेकर नादिरशाह तक हर आक्रमणकारी ने अपनी सेना को ऐसी ही बातें समझा कर या ओजस्वी भाषण देकर उसे युद्घोन्मादी बनाया। लेकिन युद्ध नही थमे। एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा युद्ध होता रहा। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नही है, अपितु यह समस्या का उफान है। शक्ति और सत्ता का मद ढीला होते ही यह उफान ढीला पड़ जाता है। समय आने पर पतीली में उबल रहे दूध की भांति पुन: उफान पर आता है। क्योंकि मानव के अहंकार की अग्नि इसके नीचे निरंतर जलती रहती है। मानव का अंतर्मन भीतर से शांति की पुकार कर रहा है, उसकी खोज में लगा रहना चाहता है, जबकि बाहर वह युद्ध की भाषा बोलता है। मानव जो चाहता है वह उसे मिल नही रहा और जिसे नही चाहता वह उसे मिल रहा है। इस प्रकार युद्ध मानव की खोज नही है, खोज का विषय भी नही है। यह तो एक दुर्घटना है जो उसे दुर्भाग्य से मिल जाती है। जिससे वह बचकर निकलना चाहता है पर बच नही पाता। इसलिए युद्ध मानव की हार है, जीत नहीं। क्योंकि युद्ध से मानव के अधिकारों का हनन होता है। मानवाधिकारों की सुरक्षा युद्ध से कभी भी संभव नही है। आज अमेरिका विश्वशांति के लिए युद्ध की भाषा बोल रहा है। चीन की अपनी साम्राज्यवादी नीति है परंतु उसके पीछे भी वह विश्व शांति की स्थापना को ही अपना मुख्य उद्देश्य मानता है।

नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस की अग्नि परीक्षा

नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस की अग्नि परीक्षा

नेता जी सुभाष को अनेक अग्नि परीक्षाओं में से गुजरना पड़ा था। एक बार उन्होंने भारत के सबसे बड़े राजनीतिक नेता महात्मा गांधी तक को चुनौती दी थी। उनकी इच्छा के विरुद्ध डॉ. पट्टाभिसीतारामैया के मुकाबले में चुनाव लड़ा था और चुनाव जीत गये थे। हाथी ने हिमालय को परे धकेल दिया था। जन साधारण के मानस पर सुभाष के छाये रहने के बाद भी कांग्रेस संगठन पर गांधी भक्तों की जकड़ पक्की थी। जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि नेता सुभाष के नेतृत्व को सहन नहीं कर पा रहे थे। रामगढ़ कांग्रेस के बाद एक वर्ष तो उन्होंने जैसे-तैसे सुभाष बाबू को सह लिया था, पर त्रिपुरा कांग्रेस में उन्होंने खुल्लमखुल्ला विद्रोह कर दिया। गांधी जी समेत सभी ने कांग्रेस कार्यसमिति में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया।

पद तभी तक, जब तक आदर से मिले- सुभाष के लिए यह अग्नि परीक्षा की घड़ी थी। अन्त में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया, जिससे कांग्रेस में एकता बनी रहे और स्वाधीनता आन्दोलन में कोई बाधा न पड़े। इस संघर्ष में सुभाष आग की लपट की तरह दमकते रहे, प्रतिद्वन्दियों के हिस्से में केवल राख की कालिमा ही आई।

ईर्ष्या भुजंगिनी- निःसन्देह वे सभी त्यागी, तपस्वी, बलिदानी देशभक्त थे, परन्तु वे अपने सिवाय अन्य किसी को ऐसा देशभक्त नहीं देखना चाहते थे, जो उनसे बढ़कर हो। यही विडम्बना है! विद्वान किसी को अपने से बड़ा विद्वान्‌ नहीं देखना चाहता, वीतराग संन्यासी महात्मी किसी को अपने से बड़ा वीतराग नहीं देखना चाहता। बलिदानी अपने से बड़े बलिदानी से खार खाता है। जो खार न खाये, वह देवता होता है।

सुभाष की दूसरी अग्निपरीक्षा तब हुई, जब वह न जाने किसी धुन में कालकोठरी (ब्लैकहोल) स्मारक को हटाने के लिए सत्याग्रह कर बैठे। सरकार ने अच्छा बहाना पाकर उन्हें जेल में डाल दिया।

महापलायन- सुभाष ने कहा कि मैं कुछ व्रत अनुष्ठान करना चाहता हूँ, इसलिए कुछ दिन बिलकुल एकान्त में रहूंगा, किसी से भी मिलूंगा नहीं। उनका भोजन पर्दे के नीचे से उनके कमरे के दरवाजे पर रख दिया जाता था और बाद में जूठे बर्तन वहीं से उठा लिये जाते थे। इस तरह दो-तीन सप्ताह बीत गये।

मौलवी जियाउद्दीन- इस अवधि में हुआ यह कि उनकी दाढ़ी बढ़ गई। उनकी शक्ल बदल गई। एक रात वह मुसलमान मौलवी का वेश बनाकर बाहर निकल गये। पुलिस और गुप्तचर धोखा खा गये। कलकत्ते से 120 किलोमीटर कार से जाने के बाद एक छोटे से स्टेशन से उन्होंने पेशावर जाने वाली गाड़ी पकड़ी। उस समय के सैकंड क्लास के डिब्बे में वह जियाउद्दीन नाम से मौलवी के भेष में बैठे रहे। एक गुलूबन्द से उन्होंने अपना चेहरा काफी कुछ ढक रखा था। गले में कष्ट है, ऐसा दिखाकर वह बातचीत को टाल देेते थे।

नया हनुमान भगतराम- पेशावर स्टेशन पर उन्हें लेने के लिए एक आदमी आया हुआ था। अन्य किसी ने उन्हें पहचाना नहीं। भगतराम नामक एक साहसी, सूझबूझ वाले युवक के साथ वह पेशावर से काबुल गये। तब तक कलकत्ते से उनके गायब होने का समाचार रेडियो पर प्रसारित हो चुका था और सारे भारत की पुलिस उनकी खोज में थी। प्रति पल पकड़े जाने का खतरा था। ऐसी दशा में डेढ़ महीने उन्हें काबुल में रहना पड़ा। अन्त में एक दिन मार्च 1942 में बर्लिन रेडियो से उनकी आवाज सुनाई पड़ी- ""मैं सुभाष चन्द्र बोस बर्लिन से बोल रहा हूँ।'' भारतीय जनता सुनकर आनन्द से पागल हो उठी। अंग्रेज और कांग्रेसी मन मसोसकर रह गये। सुभाष फिर आगे निकल गया था।

सिंगापुर में- सुभाष की सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा सिंगापुर में हुई। जापानियों ने सिंगापुर पर कब्जा करते समय जो युद्धबन्दी बनाये थे, उनमें 45000 भारतीय सैनिक भी थे। प्रसिद्ध भारतीय क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस ने उन्हें अपने पक्ष में करके एक आजाद हिन्द फौज बनानी चाही थी। पर इस कार्य में उन्हें यथेष्ट सफलता नहीं मिली थी। उधर सुभाष ने जर्मनी में एक आजाद हिन्द फौज बनाने का यत्न किया था। वहॉं लीबिया और मिस्त्र की लड़ाइयों में पकड़े गये भारतीय सैनिक जर्मनों के कब्जे में थे। बाद में यह उचित समझा गया कि सुभाष पनडुब्बी से जापान जायें और वहॉं आजाद हिन्द फौज बनाकर भारत को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने का यत्न करें।

नमकहलाल युद्धबन्दी- सुभाष सिंगापुर पहुंचे। वहॉं उन्होंने भारतीय युद्धबन्दियों से बात की। ये इंग्लैड के राजा के प्रति निष्ठा की शपथ से बंधे हुए लोग थे। ये जिसका अन्न खाया है, उसके लिए खून बहाने को उद्यत लोग थे। भारत की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन करने वालों को ये बागी और गद्दार समझते थे। यदि इनके हाथ में हथियार होते, तो अफसर का आदेश होते ही ये बागी सुभाष की गोली से उड़ा देने में एक क्षण का विलम्ब न करते। और अफसर, गोली मारने का आदेश देने से पहले एक पल सोचते तक नहीं। "आल इंडिया रेडियो' दिन-रात सुभाष को बागी और गद्दार कह-कहकर कोसता था।

नेहरू जी का ऐलान- इन सैनिकों का ही क्या दोष था, जब जवाहरलाल नेहरू तक ने घोषणा की थी, ""यदि सुभाष ने जापानी सेना की सहायता से भारत पर आक्रमण किया, तो मैं तलवार लेकर उससे लडूंगा।''
बेचारे नेहरू जी! तलवार उन्होंने देखी अवश्य होगी, परन्तु यह उन्हें पता नहीं होगा कि उसे पकड़ा किधर से जाता है और चलाया कैसे जाता है? फिर वे कांगे्रस के सदस्य होने के नाते अहिंसा की शपथ से बंधे थे। गांधी जी की अहिंसा की शपथ से- ""कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल उसके आगे कर दो। पलटकर प्रहार करने का विचार भी मन में मत लाओ।'" यह उनका सौभाग्य था कि कभी किसी ने उन्हें थप्पड़ नहीं मारा। इसलिए यह पता नहीं चल सका कि वे अहिंसा व्रत पर कितने दृढ़ हैं। फिर, उनकी वह अहिंसा केवल अंग्रेजों के लिए थी। सरकार के सुर में सुर मिलाकर अनेक कांग्रेसी नेता चिल्ला रहे थे- "सुभाष बागी है, सुभाष देशद्रोही है।' यह शोर इतना मचा कि आखिर गांधी जी को कहना पड़ा- ""सुभाष की देशभक्ति में कोई सन्देह नहीं है। वह हममें से किसी से भी कम देशभक्त नहीं है। पर उसका लड़ने का तरीका गलत है।''

युद्धबन्दियों का विकट रुख- सिंगापुर के भारतीय युद्धबन्दियों का रवैया इससे कहीं अधिक उग्र था। अफसरों ने देहरादून और सैंडहर्स्ट की रक्षा अकादमियों में शिक्षा पाई थी। अंग्रेजों की कृपा से वे वैभव और प्रभुत्व का जीवन बिता रहे थे। अब बदकिस्मती से वे युद्धबन्दी थे, परन्तु भारतीय वीरों की परम्परा उनके खून में थी- ""कट जाये, सिर न झुकना...।'"

फिर शपथ भंग! राजद्रोह! यह तो सपने में भी सोचने की बात नहीं थी। उन्होंने सुभाष से मिलने और बात करने से ही इन्कार कर दिया। सुभाष को उन्होंने अपने स्तर का ही नहीं माना। सुभाष को अपनी दशा उस हिरन सी लगी, जो अपने सींगों से पहाड़ के टीले को उखाड़ना चाह रहा हो।

सैनिक समझदार- वह साधारण सैनिकों से मिले और उन्हें अपनी बात समझाई- ""तुम कहते हो कि तुमने अंग्रेजों का अन्न खाया है? वह अन्न अंग्रेजों का नहीं था। वह भारत का अन्न था। वह इंग्लैंड में नहीं उपजा था। वह पंजाब, हरियाणा और गंगा जमना के मैदानों में उपजा था। तुम्हारी निष्ठा भारत के प्रति होनी चाहिए। तुम्हारा देश भारत है। खून बहाना है, तो उसकी आजादी के लिए बहाओ।''
सैनिकों को सुभाष की बात समझ आ गई। उन्होंने अफसरों को समझाया कि आप लोग नेता जी से बात तो करें।

असली सिक्का "खन्‌ खन्‌' बजता है। सुभाष खरा सोना था, बाहर-भीतर एक। उसकी वाणी में सत्य का बल था। शासक की कैद से भागकर जान हथेली पर लिये परदेस में मारा-मारा फिर रहा था। सबको पता था कि उसने आई.सी.एस. की ठाठ की नौकरी को लात मार दी थी। नहीं तो शायद यह आज उन पर ही हुक्म चलाता होता।

किसकी शपथ ? कैसी शपथ- युद्धबन्दी अफसरों ने सुभाष से बात की, तो आग की तपन उन्हें लगी। सुभाष की यह बात उन्हें समझ आ गई कि कोई भी अन्यायपूर्ण, अधर्मपूर्ण शपथ पालने योग्य शपथ नहीं है। अपने देश पर किसी विदेशी का शासन बनाये रखने की शपथ न्यायपूर्ण शपथ नहीं हो सकती। अपनी मातृभूमि की दासता के बंधनों को काट डालना ही सबसे बड़ा धर्म है।

एक बार बांध टूटा, तो सारा ही जल प्रवाह उमड़ पड़ा। मेजर जनरल शाहनवाज, सहगल, गुरदयाल सिंह ढिल्लों, कर्नल दारा और गिलानी, दौड़-दौड़कर आजाद हिन्द फौज में सम्मिलित हो गये। वे सुभाष के जितना निकट आते गये, हिमालय के शिखर की भांति वह उन्हें अपने से अधिक और अधिक ऊंचे लगते गये। जब कोहिमा के मोर्चे पर युद्ध शुरू हुआ, तब आजाद हिन्द फौज के हर सैनिक और अफसर ने स्वयं को धन्य माना कि उसे नेताजी सुभाष के नेतृत्व में मातृभूमि की सच्ची सेवा करने का अवसर मिला।

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

दर्शनों और ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद-महिमा

दर्शनों और ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद-महिमा

दर्शनकारों ने मुक्तकण्ठ से वेद की महिमा वर्णित की है। वैशेषिकदर्शन में गया कहा है-

                तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ।। वैशोषिक. 10.1.3

ईश्वर द्वारा उपदिष्ट होने से वेद स्वतः प्रमाण हैं।

                बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे। वैशेषिक. 6.1.1

वेद की वाक्य-रचना बुद्धिपूर्वक है। उसमें  सृष्टिक्रम-विरुद्ध गपोड़े और असम्भव बातें नहीं हैं। अतः वह ईश्वरीय ज्ञान है।

सांख्यकार महर्षि कपिल को कुछ लोग भ्रान्ति से नास्तिक समझते हैं। वस्तुतः वे नास्तिक थे नहीं। महर्षि कपिल ने भी वेद को स्वतः प्रमाण माना है-

                न पौरुषेयत्वं तत्कर्तुः पुरुषस्याभावात् ।। सांख्य. 5.46

वेद पौरुषेय (पुरुषकृत) नहीं हैं। क्योेंकि उनका रचयिता कोई पुरुष नहीं है। जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति होने से समस्त विद्याओं के भण्डार वेद की रचना में असमर्थ है। वेद मनुष्य की रचना न होने से उनका अपौरुषेयत्व सिद्ध ही है।

निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतःप्रामाण्यम् ।। सांख्य. 5.51

वेद अपौरुषेयशक्ति से, जगदीश्वर की निज शक्ति से अभिव्यक्त होने के कारण स्वतः प्रमाण हैं।

मन्त्र और आयुर्वेद के प्रमाण के समान आप्तजनों के वाक्यों के प्रामाणिक होने से वेद की भी प्रामाणिकता है। परमेश्वर परम-आप्त है तथा वेद असत्य, परस्पर विरोध और सृष्टिक्रम के विरुद्ध बातों से रहित है। अतः वेद परम-प्रमाण है।

योगदर्शनकार महर्षि पतञ्जलि का कथन है-

    स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् । योग. 1.26

वह ईश्वर नित्य वेद-ज्ञान को देने के कारण सब पूर्वज गुरुओं का भी गुरु है। अन्य गुरु काल के मुख में चले जाते हैं। परन्तु वह काल के बन्धन से रहित है।

वेदान्तदर्शन में वेद का गौरव निम्न शब्दों में प्रकट किया गया है-

                शास्त्रयोनित्वात् । वेदान्त. 1.1.3

ईश्वर शास्त्र=वेद का कारण है। अर्थात्‌ वेदज्ञान ईश्वर-प्रदत्त है। इस सूत्र पर शङ्कराचार्य का भाष्य पठनीय है। यहॉं उसका हिन्दी रूपान्तर दिया जा रहा है-

""ऋग्वेदादि जो चारों वेद हैं, वे अनेक विद्याओं से युक्त हैं। सूर्यादि के समान सब सत्यार्थों का प्रकाश करने वाले हैं। उनको बनाने वाला सर्वज्ञत्वादि गुणों से युक्त सर्वज्ञ-ब्रह्म ही है। क्योंकि ब्रह्म से भिन्न कोई जीव सर्वगुणयुक्त इन वेदों की रचना कर सके, ऐसा सम्भव नहीं है।''

                एक अन्य सूत्र में कहा गया है-

                अत एव च नित्यत्वम् । वेदान्त. 1.3.29

इसी कारण से (परमात्मा से वेद की उत्पत्ति हुई है) वेद नित्य हैं। मीमांसा शास्त्र के कर्त्ता जैमिनि ने तो धर्म का लक्षण ही इस प्रकार किया है-

                चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।। मीमांसा. 1.1.3

जिसके लिए वेद की आज्ञा हो वह धर्म और जो वेदविरुद्ध हो वह अधर्म है।

एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं-

नित्यस्तु स्याद्दर्शनस्य परार्थत्वात् ।। 1.3.18

शब्द नित्य है, नाशरहित है। क्योंकि उच्चारण क्रिया से जो शब्द का श्रवण होता है वह अर्थ ज्ञान के लिए ही है। यदि शब्द अनित्य होता तो अर्थ का ज्ञान न हो सकता।

इस प्रकार समस्त शास्त्र एक स्वर से वेद के गौरव, नित्यता और स्वतः प्रमाणता का वर्णन करते हैं।

ब्राह्मणग्रन्थों में अनेक स्थानों पर वेद के महत्व का प्रदर्शन करने वाले स्थल उपलब्ध होते हैं। यहॉं तैत्तिरीयब्राह्मण 3.10.11.3 की एक आख्यायिका दी जा रही है-

""महर्षि भरद्वाज ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए 300 वर्ष पर्यन्त वेदों का गहन एवं गम्भीर अध्ययन किया। इस प्रकार निष्ठापूर्वक वेदों का अध्ययन करते-करते जब भरद्वाज अत्यन्त वृद्ध हो गये, तो इन्द्र ने उनके पास आकर कहा- "यदि आपको सौ वर्ष की आयु और मिले तो आप क्या करेंगे?' भरद्वाज ने उत्तर दिया कि मैं उस आयु को भी ब्रह्मचर्य-पालन करते हुए वेदाध्ययन में ही व्यतीत करूँगा। तब इन्द्र ने पर्वत के समान तीन ज्ञान-राशिरूप वेदों को दिखाया और प्रत्येक राशि में से मुट्‌ठी भरकर भरद्वाज से कहा कि ये वेद इस प्रकार ज्ञान की राशि या पर्वत के समान हैं। इनके ज्ञान का कहीं अन्त नहीं है। अनन्ता वै वेदाः। वेद तो अनन्त हैं। यद्यपि आपने 300 वर्ष तक वेद का अध्ययन किया है, तथापि आपको सम्पूर्ण ज्ञान का अन्त प्राप्त नहीं हुआ। 300 वर्ष में इस अनन्त ज्ञान-राशि से आपने तीन मुट्ठी ज्ञान प्राप्त किया है।''

पुरातन भारत में स्त्रियों को सैनिक शिक्षा

पुरातन भारत में स्त्रियों को सैनिक शिक्षा

यह बात सर्वविदित है कि जहां पर नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। नारी की भारत के घर घर में किस तरह से पूजा और कैसा सम्मान किया जा रहा है, यह सर्वविदित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे सदैव ही पुरूष के संरक्षण की आवश्यकता का अनुभव इस गंभीरता से कराया जाता है कि वह पुरूष की केवल परछाई मात्र बनकर रह गयी। वास्तव में नारी संरक्षण को उसके चरित्र व कौमार्य से इस तरह जोड़ दिया गया मानों यदि वह पुरूष के अधीन नही रही तो उसका कौमार्य भंग हो सकता है या चरित्र हनन हो सकता है। आज नारी की अस्मिता लोगों को भयावह समस्या की तरह लगती है। आज के भारतीय समाज में नारी के चारों ओर का घेरा इतना तंग है कि वह यदि घर से बाहर भी निकलती है, राह पर चलती है तो सोचती है कि कैसे बचकर निकला जाए? क्या यही दृश्य प्राचीन भारत में भी था? उत्तर है नही, उस काल की नारी रात्रि में भी स्वच्छंद विचरण करती थी। आज की अबला नारी वैदिक काल में शक्तिरूपा समझी जाती थी। उस काल के सभी देवी देवता शस्त्रधारी वर्णित है। किंतु देवियां पुरूषों की अपेक्षा अधिक शस्त्र धारण किया करती थीं। देवताओं के चार या अधिक से अधिक छह हाथ होते थे और उनमें उतने ही शस्त्रास्त्र भी होते थे। वहीं देवियों के अठारह या इक्कीस शस्त्रधारी हाथों का वर्णन मिलता है। देवों की अपेक्षा देवियों के पास अधिक संहारक शस्त्र अस्त्र हैं। इसका तात्पर्य यही है कि राष्ट्र में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों की रक्षा अधिक होनी चाहिए। अत: उनके पास अपनी रक्षा के लिए अधिक शक्ति व साधन होना आवश्यक है। पुरूषों की रक्षा समाज में आवश्यक है किंतु नारियों को असामाजिक तत्वों से रक्षा की अधिक आवश्यकता है। अत: स्वसंरक्षण की शिक्षा समाज की आवश्यकता होती थी। वेदों में गणेश देवता भी स्त्रियों के दल बनाये गये थे और उनके द्वारा राष्ट्रकार्य करवाया गया थ। ऋग्वेद में राजकुमारी विश्पला का वर्णनआता है कि उसने किस वीरता से अपने पिता के राज्य की रक्षा की।
राजकुमारी विश्पला खेल नामक राजा की पुत्री थी। संभवत: वह अफगानिस्तान का कोई राजा था। क्योंकि आज भी पठानों में झाकाखेल ईसाखेल आदि नाम देखे जा सकते हैं। वैदिककाल में खेल नामक ऐसा ही एक राजा था। एक बार शत्रुओं द्वारा उसके राज्य पर आक्रमण करने पर राजा के सेनापति ने सेना सहित शत्रुओं पर आक्रमण कर दिया, किंतु शत्रु बहुत शक्तिशाली था। अत: सेनापति हार गया और सारी सेना नष्ट हो गयी, अत: राजा का चिंतित होना स्वाभाविक था।
हार के समाचार के समय राजकुमारी विश्पला वहीं खड़ी थी उसने अपने पिता को सांत्वना दी कि सेना लेकर शत्रुओं पर आक्रमण करेगी। राजा की स्वीकृति मिलने पर विश्पला सेना एकत्रित कर शत्रुओं पर टूट पड़ी। शत्रु विश्पला से अधिक शक्तिशाली सिद्घ हुए और उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी। उसे घायलावस्था में रणभूमि से वापस लौटा देखकर राजा और भी दुखी हो जाता है। तब विश्पला पिता को सांत्वना देती है और अनुरोध करती है कि वे उसकी टांग वैद्यों से ठीक करवा दें ताकि वह फिर से खड़ी होने योग्य पर शत्रुओं पर आक्रमण कर सकें। इस पर राजा अपने वैद्य को बुलवाकर अपनी कन्या का उपचार करवाता है। खेल राजा के वैद्य ने विश्पला की टूटी हुई टांग काट डाली, घाव ठीक किया तथा उस कटी हुई टांग के स्थान पर लोहे की टांग लगवाकर उसे युद्घ में जाने के योग्य बना दिया। इसका वर्णन ऋग्वेद में इस प्रकार है-जंघा आयसीं विश्पलायै अधत्तम। (ऋ 1.116.15)
विश्पला के लोहे की टांग बिठलायी और विश्पला ने शत्रु पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की। ऋग्वेद का यह मंत्र इस बात का साक्षी है कि वेदकालीन चिकित्सा शास्त्र कितना बढ़ा चढ़ा था।
नारियों को स्वसंरक्षण की शिक्षा
राजा खेल की पुत्री विश्पला वैदिक कालीन नारियों की वीरता का प्रमाण प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त रामायण काल में दशरथ की पत्नी कैकेयी भी युद्घ में अपने पति की सहायता किया करती थी। काली, चण्डी, चामुण्डा आदि देवियां महान सेना लेकर असुर सेना पर आक्रमण करती थीं। महिषासुर जैसे राक्षसों का वध किया करती थीं। गणपति काशीराज के राज्य में स्त्रियों के दल तैयार किये जाते थे और वे दल उत्तम कार्य करते थे। जब पुरूषों के दल हार जाते थे, तब इन स्त्रियों के दल विजयी होते थे।
इस प्रकार पता चलता कि वैदिक कालीन नारियां सेनापति का कार्यभार सफलतापूर्वक संचालित करती थीं। ये नारियां अपने दल तैयार करती थीं, युद्घ करती थीं और शत्रुओं का दमन करती थीं। इन स्त्रियों ने दुर्जेय राक्षसों और दानवों का सफलतापूर्वक संहार किया था। ये सब कार्य बिना पूर्व तैयारी के संभव नही हो सकते थे। इसके लिए विशेष सैन्य प्रशिक्षण और युद्घ कौशल की आवश्यकता थी जो एक दिन में नही हो सकता था। अत: यह तथ्य प्रामाणिक है कि वैदिक कालीन नारियों को इस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता था कि वे अपनी रक्षा कर सकें व समय आने पर राष्ट्र की रक्षा में सहयोग भी कर सकें। यह सब बुद्घ पूर्वकाल में होता था। उस समय की नारियां अट्ठाइस-अट्ठाइस तरह के शस्त्रास्त्रों का कुशलतापूर्वक संचालन कर लेती थीं। आज के देवी देवताओं के चित्रों में ऐसे चित्र सौभाग्य से ही मिलते हैं। किसी देवी के अ_ाइस हाथों को मानने की अपेक्षा यह मानना युक्तिसंगत होगा कि वे अट्ठाइस तरह के शस्त्रास्त्रों का उपयोग कर सकती थीं। अत: नारियों के पास विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्रों का होना और उनका उपयोग यही प्रमाणित करता है कि प्राचीनकाल में नारियों को स्वसंरक्षण की शिक्षा दी जाती थी। वैदिक काल में गार्गी, लोपामुद्रा, वाचक्नवी, वागम्भृणी आदि नारियां ब्रह्ज्ञान में परिपूर्ण हो गयीं थी तथा विश्पला आदि स्त्रियां युद्घ विद्या में पारंगत थीं। जो समय पडऩे पर सेना का संचालन अभूतपूर्व कौशल से करती थीं। भारत में विश्पला, काली, चामुण्डा जैसी वीर नारियों का आज का पूजा बहुसंख्यक समाज आदर करता है उनकी पूजा भी करता है। किंतु यह लज्जा का विषय है कि हिंदू बहुसंख्यक समाज इन नारियों की देवी के रूप में पूजा तो अवश्य करता है किंतु इनके वीरोचित कार्य से आज भी पूर्णत: अनभिज्ञ है। यही कारण है कि नारी की पूजा करने वाले हाथों की आज नारी का अपमान और चरित्र हनन हो रहा है।
नारी वीरा है, पुरंधी है, शक्ति है-
वर्तामान की नारी जिसे अबला समझा जाता है। प्राचीनकाल में शक्तिरूपा थी। काली, चामुण्डा, दुर्गा जैसी देवी नारियों के लिए वेदों में स्तुति की गयी है-
या देवी सर्वभूतेषु कालीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
वैदिक काल में पुत्र को वीर व पुत्री को वीरा कहते थे। ये शब्द अपनी संतानों को पराक्रमी व साहसी बनाने का संकेत देते हैं।
प्राचीन भारत में शिक्षा का पाठ्यक्रम ही इस प्रकार का होता था कि लड़का वीर व कन्या वीरा बनती थी। अन्यथा नारी शक्तिरूपा किस प्रकार बन सकती थी? इस प्रकार की शिक्षा के अभाव में बच्चे स्वत: ही पराक्रमी नही बन सकते।
संस्कृत में नारीके लिए पुरूंध्री, पुरंध्री, पुरंधि इन शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस शब्द की व्युत्पत्ति पुरं धारयति इस प्रकार होती है। पुरं का अर्थ होता है नगर नगर को धारण करने वाली या नगर की रक्षा करने वाली। इस शब्द का मौलिक अर्थ नगर को धारण करने वाली है, पर आज इसका अर्थ घर को धारण करने वाली के अर्थ में लिया जाता है। पुर अथवा पुरी शब्द महानगरियों का वाचक है। ऐसी महानगरियों की रक्षा प्राचीनकाल में स्त्रियां करती थीं। नारियों द्वारा किये जाने वाले इस कार्य से यह प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में देश या राज्य की रक्षा का कार्य पुरूष किया करते होंगे तथा नगर रक्षा का कार्य पुरूष किया करते होंगे तथा नगररक्षा का कार्य स्त्रियां करती रही होंगी। इस काल में यह भी पद्घति थी कि स्त्रियों को शस्त्रास्त्र विद्या सिखाकर समय पडऩे पर सेनापति के पद पर नियुक्त किया जाता था, तब स्त्रियां आह्वान भी करती थीं कि जो मुझे हराएगा मेरा पति होगा।
महिषासुर ने भवानी को अपनी पत्नी बनाने के लिए संदेश भेजा, तो उसने महिषासुर से कहा कि युद्घ में जो मुझे पराजित करेगा, वही मेरा पति होगा। यह संदेश कितना वीरता पूर्ण है। इसी वीरकुमारी भवानी ने राक्षसों का भयंकर संहार किया। इस तरह का वीरता पूर्ण उत्तर देने वाली नारियां अबला हो ही नही सकतीं।
जन्म से वीरा तरूणावस्था में पुरं-धि विवाहिता होने पर शक्ति इस प्रकार उनके नाम सार्थक होते थे। जब वह नेतृत्व करने में समर्थ होती थीं, तब उनका नाम नारी होता था। इन नामों के अर्थ पर दृष्टि डाली जाए तो यह प्रमाणित होता है कि तत्कालीन नारियां अबला नही थीं वे सचमुच सबला और शक्ति थीं। जीवित राष्ट्र में नारी का इसी प्रकार शक्तिरूपा होना आवश्यक है। यदि नारी ही निर्बल या अबला हो तो उसकी संतति भला वीर कैसे हो सकती है।
स्त्रियों को प्राचीनकाल में आर्या भी कहा जाता था, तो फिर ये आर्याएं अब ला किस प्रकार हो सकती हैं? नारियों में शक्ति का अपरिचित स्रोत है। भगवान शंकर जैसे महान पराक्रमी देव भी शक्तिरूपा पार्वती के बिना कुछ न ही कर सकते।
प्राचीन भारत में नारी का उपनयन संस्कार
प्राचीन भारत में शक्ति व नारी एक दूसरे के पर्याय माने जाते थे-ब्रह्मचर्येण कन्य युवानं विन्दते पतिम (अथर्व)
अर्थात ब्रह्मचर्य का पालन करके कन्या तरूण पति को प्राप्त करती है। इसमें स्त्रियों के लिए ब्रह्मचर्य का विधान है। वैदिक काल में नारियों का उपनयन भी होता था, उन्हें भी मेखला धारण तथा दण्ड धारण करना पड़ता था। आज भी स्त्रियां कमरपट्टा बांधती हैं, पर वह स्वर्ण का होने के कारण केवल शोभादायक ही होता है। परंतु आज स्त्रियों का उपनयन नही किया जाता। पारसियों का धर्म भी हिंदू धर्म की तरह ही है। उनकी स्त्रियां भी यज्ञोपवीत धारण करती हैं। पर हमने यह प्रथा बंद कर दी है और स्त्रियों के यज्ञापवीत का भार भी पुरूषों के कंधों पर डाल दिया है। इस प्रकार जो नारियां शक्तिस्वरूपा थीं वे अबला बनकर रह गयीं।
विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति का अतीत इतना गौरवशाली रहा है, उस संस्कृति का वर्तमान और भी उच्च व महान होना चाहिए पर ऐसा नही हो सका। आज नारी की पूजा क्या नारी का सम्मान भी एक मजाक का विषय बनकर रह गया है।
जिस संस्कृति में नारी का सम्मान न हो वह संस्कृति अपने पतन की ओर स्वत: ही अग्रसर हो जाती है। भारतीय समाज में नारी की जिस तरह से अवमानना व अपमान हो रहा है, जिस तरह से दहेज के लिए लड़कियों को जलाया जा रहा है। वह नारी समाज की सड़ी गली व्यवस्था को ललकारती हैं, उनका जिस तरह से अपमान पुरूषों द्वारा किया जाता है, उस समाज और संस्कृति को महान कदापि नही समझा जाना चाहिए। कोई आश्चर्य नही जब इस संस्कृति के गौरवशाली अतीत के चिन्ह भी शेष न रहें। अच्छा यही होगा कि जिस भारतीय संस्कृति की नारियां शक्तिरूपा रही हैं, उन्हें पुन: ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे वे शक्तिस्वरूपा बन सकें।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

भारतीय गौरव का प्रतीक विक्रमी संवत्‌

भारतीय गौरव का प्रतीक विक्रमी संवत्‌

वर्ष प्रतिपदा उत्सव अर्थात् नववर्ष हम सबके लिए बहुत महत्व रखता है। हिन्दू समाज पर काले बादलों एवं अत्याचारों की आंधी के रूप में उमड़े शक-हूणों पर विजय प्राप्त करने वाले प्रजापालक, स्वर्णयुग निर्माता न्यायशील, परोपकारी सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की महान विजय के उपलक्ष्य में विक्रमी संवत्‌ का शुभारम्भ हुआ। जन-जन के हृदय में वास करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्म (नवमी) एवं राजतिलक दिवस, सेवा मार्ग को प्राणपण से आजीवन निभाने वाले शक्ति के प्रतीक रामभक्त वीर हनुमान जी का जन्मदिवस, सत्य-दया और अहिंसा के अग्रदूत भगवान महावीर का जन्म-दिवस, महान सिख गुरु परम्परा द्वितीय पातशाही श्री गुरु अंगददेव जी का जन्म दिवस, अत्याचारी मुगल शासकों के आतंक एवं अत्याचारों से मुक्त करवाने हेतु हिन्दू समाज को निर्भय बनाने तथा उसकी सुरक्षा के लिए हिन्दू के खड़्‌गहस्त स्वरूप खालसा के सृजनकर्ता श्री गुरु गोविन्दसिंह जी महाराज द्वारा खालसा पंथ की स्थापना, नामधारी सतगुरु बाबा रामसिंह जी द्वारा स्वतन्त्रता के लिए जनजागरण के रूप में कूका आंदोलन का शुभारम्भ, भारत की स्वतन्त्रता के लिए बलिदान होने वाले क्रान्तिकारी वीर सेनानी तात्या टोपे तथा अत्याचारी अंग्रेज को भारत से बाहर निकाल फेंकने का निश्चय लेकर सशस्त्र क्रान्ति करने वाले चाफेकर बन्धुओं का फांसी पर्व, अछूतों को गले लगाने वाले स्वतन्त्रता के उद्‌घोषक पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराने वाले वेदों के पुनरुद्धारक महर्षि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती द्वारा आर्यसमाज की स्थापना, भारत को अद्वितीय संगठन शक्ति देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार जी का जन्म, स्वतन्त्रता संग्राम में जूझ रहे जलियांवाला बाग के असंख्य बलिदानी वीर जलियांवाला बाग कांड के सूत्रधार क्रूर डायर को ठिकाने लगाने वाले शहीद उधम सिंह की प्रेरक स्मृति नवरात्रों में पूजा योग्य मॉं दुर्गा, मॉं काली, मॉं अन्नपूर्णा देवी एवं ज्ञानदायिनी, वीणावादिनी मॉं सरस्वती की वन्दना यह सब इस कालखण्ड की उपलब्धियां एवं प्रेरणाएं हैं।

पाश्चात्य संस्कारों का प्रभाव क्यों? इन इक्कीस दिनों की छोटी-सी अवधि में घटित यह सारे पर्व सामने आने के बाद हम स्वतन्त्र भारतवासी यह अनुभव कर सकते हैं कि भारतीय नववर्ष के प्रथम तीन सप्ताह हमारे राष्ट्र जीवन में कितना महत्व लिए हुए हैं। हम भारतीयों ने पाश्चात्य सभ्यता में रंगकर ऐसा लगता है, जैसे हमने स्वत्व ही खो दिया हो। विश्व में अपनी भी एक विशिष्ट पहचान है, अपना भी कोई विशिष्ट राष्ट्र है और राष्ट्र जीवन है, अपना भी कोई संवत्‌-वर्ष है। यह सब हम भूल गए से लगते हैं।

आज हमने ईसवी सन्‌ को ही अपने दैनन्दिन आचरण में मान्यता दे डाली है। जबकि अपना विक्रमी संवत्‌, जो कि ईसवी सन की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठता, प्राचीनता एवं विशिष्टता लिए हुए है तथा शास्त्रसम्मत और वैज्ञानिक आधार पर आधारित है।

प्रेरणा- हर नया वर्ष हर प्राणी के जीवन में और प्रत्येक समाज के जीवन में नई उमंग व कल्पनाएं लेकर उतरता है। लेकिन यदि उक्त पर्व के साथ अपनापन न हो, तो प्रेरणा मृतप्राय हो
जाती है।

ईस्वी सन जब प्रथम जनवरी से शुरू होता है,तो उसमें हम भारतीयों के लिए उत्साह एवं प्रेरणा देने के लिए क्या है? हम भारतीयों का अपना एक संवत्‌ है, जिसे हम विक्रमी संवत्‌ कहते हैं और इस संवत्‌ के साथ अनेक महान शानदार प्रेरक घटनाएँ एवं महापुरुष जुड़े हुए हैं। उन प्रेरक घटनाओं एवं अनेक महापुरुषों, विशिष्ट पुरुषों के जन्म दिवस इस विक्रमी संवत्‌ के साथ जुड़े होने के कारण इसका महात्म्य प्रकट होता है। उस पर हम सब भारतीय लोग गर्व कर सकते हैं। विश्वभर में यह पता चलना चाहिए कि भारतीयों का भी कोई अपना संवत्‌ है तथा इस संवत का नाम विक्रमी संवत्‌ है।

नववर्ष उत्सव कैसे मनाएं- चैत्र प्रतिपदा की प्रभात में सूर्योदय से एक घंटा पूर्व जागकर नित्यकर्म से निवृत्त हो अपने माता-पिता एवं गुरुजनों को प्रणाम कर आशीर्वाद ले। अपने इष्टदेवों की पूजा-अर्चना कर वातावरण शुद्धि के लिए हवन-यज्ञ धूप-दीप करके घट स्थापना करें और शक्ति अनुसार दान-पुण्य कर प्रसाद वितरण के साथ अधिकाधिक लोगों को नववर्ष की बधाई दें। अपने घरों, दुकानों, कार्यालयों को महापुरुषों के चित्रों से सुसज्जित कर भारतीय संस्कृति के प्रतीक भगवां ध्वज फहराएं। सम्भव हो तो सामूहिक स्तर पर उत्सव आयोजित कर संगीत, भजन, कीर्तन अथवा वीरगाथाओं का स्मरण करें।

भारतीय गौरव का प्रतीक विक्रमी संवत्‌

भारतीय गौरव का प्रतीक विक्रमी संवत्‌

वर्ष प्रतिपदा उत्सव अर्थात् नववर्ष हम सबके लिए बहुत महत्व रखता है। हिन्दू समाज पर काले बादलों एवं अत्याचारों की आंधी के रूप में उमड़े शक-हूणों पर विजय प्राप्त करने वाले प्रजापालक, स्वर्णयुग निर्माता न्यायशील, परोपकारी सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की महान विजय के उपलक्ष्य में विक्रमी संवत्‌ का शुभारम्भ हुआ। जन-जन के हृदय में वास करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्म (नवमी) एवं राजतिलक दिवस, सेवा मार्ग को प्राणपण से आजीवन निभाने वाले शक्ति के प्रतीक रामभक्त वीर हनुमान जी का जन्मदिवस, सत्य-दया और अहिंसा के अग्रदूत भगवान महावीर का जन्म-दिवस, महान सिख गुरु परम्परा द्वितीय पातशाही श्री गुरु अंगददेव जी का जन्म दिवस, अत्याचारी मुगल शासकों के आतंक एवं अत्याचारों से मुक्त करवाने हेतु हिन्दू समाज को निर्भय बनाने तथा उसकी सुरक्षा के लिए हिन्दू के खड़्‌गहस्त स्वरूप खालसा के सृजनकर्ता श्री गुरु गोविन्दसिंह जी महाराज द्वारा खालसा पंथ की स्थापना, नामधारी सतगुरु बाबा रामसिंह जी द्वारा स्वतन्त्रता के लिए जनजागरण के रूप में कूका आंदोलन का शुभारम्भ, भारत की स्वतन्त्रता के लिए बलिदान होने वाले क्रान्तिकारी वीर सेनानी तात्या टोपे तथा अत्याचारी अंग्रेज को भारत से बाहर निकाल फेंकने का निश्चय लेकर सशस्त्र क्रान्ति करने वाले चाफेकर बन्धुओं का फांसी पर्व, अछूतों को गले लगाने वाले स्वतन्त्रता के उद्‌घोषक पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराने वाले वेदों के पुनरुद्धारक महर्षि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती द्वारा आर्यसमाज की स्थापना, भारत को अद्वितीय संगठन शक्ति देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराम बलिराम हेडगेवार जी का जन्म, स्वतन्त्रता संग्राम में जूझ रहे जलियांवाला बाग के असंख्य बलिदानी वीर जलियांवाला बाग कांड के सूत्रधार क्रूर डायर को ठिकाने लगाने वाले शहीद उधम सिंह की प्रेरक स्मृति नवरात्रों में पूजा योग्य मॉं दुर्गा, मॉं काली, मॉं अन्नपूर्णा देवी एवं ज्ञानदायिनी, वीणावादिनी मॉं सरस्वती की वन्दना यह सब इस कालखण्ड की उपलब्धियां एवं प्रेरणाएं हैं।

पाश्चात्य संस्कारों का प्रभाव क्यों? इन इक्कीस दिनों की छोटी-सी अवधि में घटित यह सारे पर्व सामने आने के बाद हम स्वतन्त्र भारतवासी यह अनुभव कर सकते हैं कि भारतीय नववर्ष के प्रथम तीन सप्ताह हमारे राष्ट्र जीवन में कितना महत्व लिए हुए हैं। हम भारतीयों ने पाश्चात्य सभ्यता में रंगकर ऐसा लगता है, जैसे हमने स्वत्व ही खो दिया हो। विश्व में अपनी भी एक विशिष्ट पहचान है, अपना भी कोई विशिष्ट राष्ट्र है और राष्ट्र जीवन है, अपना भी कोई संवत्‌-वर्ष है। यह सब हम भूल गए से लगते हैं।

आज हमने ईसवी सन्‌ को ही अपने दैनन्दिन आचरण में मान्यता दे डाली है। जबकि अपना विक्रमी संवत्‌, जो कि ईसवी सन की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठता, प्राचीनता एवं विशिष्टता लिए हुए है तथा शास्त्रसम्मत और वैज्ञानिक आधार पर आधारित है।

प्रेरणा- हर नया वर्ष हर प्राणी के जीवन में और प्रत्येक समाज के जीवन में नई उमंग व कल्पनाएं लेकर उतरता है। लेकिन यदि उक्त पर्व के साथ अपनापन न हो, तो प्रेरणा मृतप्राय हो
जाती है।

ईस्वी सन जब प्रथम जनवरी से शुरू होता है,तो उसमें हम भारतीयों के लिए उत्साह एवं प्रेरणा देने के लिए क्या है? हम भारतीयों का अपना एक संवत्‌ है, जिसे हम विक्रमी संवत्‌ कहते हैं और इस संवत्‌ के साथ अनेक महान शानदार प्रेरक घटनाएँ एवं महापुरुष जुड़े हुए हैं। उन प्रेरक घटनाओं एवं अनेक महापुरुषों, विशिष्ट पुरुषों के जन्म दिवस इस विक्रमी संवत्‌ के साथ जुड़े होने के कारण इसका महात्म्य प्रकट होता है। उस पर हम सब भारतीय लोग गर्व कर सकते हैं। विश्वभर में यह पता चलना चाहिए कि भारतीयों का भी कोई अपना संवत्‌ है तथा इस संवत का नाम विक्रमी संवत्‌ है।

नववर्ष उत्सव कैसे मनाएं- चैत्र प्रतिपदा की प्रभात में सूर्योदय से एक घंटा पूर्व जागकर नित्यकर्म से निवृत्त हो अपने माता-पिता एवं गुरुजनों को प्रणाम कर आशीर्वाद ले। अपने इष्टदेवों की पूजा-अर्चना कर वातावरण शुद्धि के लिए हवन-यज्ञ धूप-दीप करके घट स्थापना करें और शक्ति अनुसार दान-पुण्य कर प्रसाद वितरण के साथ अधिकाधिक लोगों को नववर्ष की बधाई दें। अपने घरों, दुकानों, कार्यालयों को महापुरुषों के चित्रों से सुसज्जित कर भारतीय संस्कृति के प्रतीक भगवां ध्वज फहराएं। सम्भव हो तो सामूहिक स्तर पर उत्सव आयोजित कर संगीत, भजन, कीर्तन अथवा वीरगाथाओं का स्मरण करें।