शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

मैक्समूलर द्वारा ही वेद भाष्य क्यों

मैक्समूलर द्वारा ही वेद भाष्य क्यों?
इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने से पहले, यह जान लेना उपयोगी होगा कि यह मैक्समूलर कौन था? जर्मन फ्रेडरिक मैक्समूलर का जन्म ६ दिसम्बर १८२३ को डेसो नगर में हुआ।उसके पिता विलहेल्म म्यूलर (१७९४-१८२७) एक पुस्तकालयाध्यक्ष थे। उसने १८४१ में निकालाई स्कूल लिपिजिग से, हाईस्कूल और अठारह महीनों से भी कम समय में सितम्बर १८४३ को 'भाषा विज्ञान' में लिपिजिग विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की (चौधरी, पृ. ३३)। उसे अध्यापक हरमैन ब्रोरवोस (१८०६-१८७७) ने उसे और अधिक संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा दी। परंतु उसके वैदिक या लौकिक संस्कृत के उच्च ज्ञान प्राप्त करने के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं।
अप्रैल १८४४ में, वह फ्रान्ज़ बाप से तुलनात्मक व्याकरण एवं भाषाविज्ञान और फ्रेड्रिक श्लेगल से दर्शन शास्त्र पढ़ने के लिए बर्लिन विश्वविद्यालय गया तथा १० मार्च १८४५ को पेरिस में प्रोफेसर यूगोन बर्नोफ (चौधरी, पृ. ४५) के पास ऋग्वेद पढ़ने गया। यहाँ उसने बर्नोफ के सायण भाष्य आधारित वेद पर व्याखयान सुने। उसे यहाँ फ्रेन्च भाषा न आने के कारण कठिनाई रही तथा जीविका के लिए प्राच्यविदों के लिए संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों का, मिलान करता था (चौधरी, पृ. ४७)। इधर इसी समय इंग्लैंड में प्रो. एच.एच. विल्सन को एक युवा संस्कृत विद्वान की आवश्यकता थी, और बर्नोफ ने इसके लिए मैक्समूलर का नाम सुझाया। बेरोन जे. बान बुनसन, जोलंदन में पू्रशियन मिनिस्टर तथा प्रभावशाली व्यक्ति था, ने मैक्समूलर को पिता समान संरक्षण दिया। उसने 'क्रिश्चियनिटी एण्ड मैनकाइंड' पुस्तक भी लिखी थी। उसके सहयोग से मूलन जून १८४५ को लंदन पहुँच गया तथा जीवन भर विभिन्न पदों पर ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी से जुड़ा रहा, जहाँ उसने विशाल साहित्य लिखा।

मैक्समूलर द्वारा रचित साहित्य

   वर्ष             पुस्तक का नाम

१८४४ हितोपदेश (जर्मन भाषा में अनुवाद)
१८४७ मेघदूत (कविता में जर्मन भाषा में अनुवाद)
१८४७
बंगाली का भारत की जनजातीय भाषाओं से सम्बन्ध
१८४९-७३ ऋग्वेद एण्ड सायणाज़ कमेंट्री
१८५३ ऐसेज ऑन टुरानियन लेंग्वेज़िज़
१८५३  ऐसेज़ ऑन इन्डियन लौजिक
१८५४
प्रपोजल फॉर ऐ यूनीफार्म मिशनरी एल्फाबेट
१८५४ लेंग्वेज् ऑफ दी सीट ऑफ पॉवर
१८५६ ऐसेज ऑन कम्पेरेटिव माईथोलोजी
१८५७ ड्‌यश्चेलीबे (१४ वाँ संस्करण, १९०१, जरमन में)
१८५७ बुद्धिस्ट पिलग्रिम्स
१८५९ जर्मन क्लासिक्स
१८५९ दी हिस्ट्री ऑफ ऐंशिएन्ट संस्कृत लिटरेचर
१८६१ लेक्चरर्स ऑन दी साइंस ऑफ लैंग्वेज, खंड (१४ वाँ संस्करण, १८८६)
१८६२  ऐंशिएन्ट हिन्दू ऐस्ट्रोनौमी
१८६४ लेक्चर्स ऑन दी साइंसऑफ लैंग्वेज, खंड-२
१८६६ हितोपदेश टैसट्‌स-नोट्‌स
१८६६ संस्कृत ग्रामर
१८६७-७५ चिप्स फ्रॉम ए जर्मन वर्कशॉप, (४ खंड)
१८६८ स्टे्रटिफिकेशन ऑफ लैंग्वेज
१८६९ ऋग्वेद ट्रान्सलेखन (खंड १)
१८६९ श्रग्वेद प्रातिशाक्य
१८७०    धम्मपद अनुवाद
१८७१ लैटर्स ऑन वार
१८७३ ऋग्वेद इन संहिता एण्ड पद टैक्स्‌टस
१८७३ डारविन्स फिलॉसफी ऑफ लैंग्वेज़
१८७३ इन्ट्रोडक्शन टू सांइस ऑफ रिजीजन
१८७५ जे.बी. वासडोव (जर्मन में)
१८७५ शिलर्स ब्रीफवेचलन (जर्मन में)
१८७६ ऑन स्पैलिंग
१९७६ में यूनीवर्सिटी से अवकाश प्राप्ति के बाद 
१८७८  हिबर्ट लेक्चर्स
१८७९ उपनिषद्‌स ट्रान्सलेशन
१८८१ सेलेक्टिड ऐसैज़
१८८१ कान्ट्‌स क्रिटिक, ट्रान्सलेशन
१८८२ इन्डिया, व्हाट केन इट टीच अस! (सात लेक्चर्स)
१८८४ बायोग्राफिकल ऐसेज़
१८८७ साइंस ऑफ थॉट
१८८७  ला कारिटा ऑफ ऐंड़िया डेल सारटो
१८८८  बायोग्राफीज ऑफ वर्ड्‌स
१८८८  साइंस ऑफ थॉट, (तीन लेक्चर्स)
१८८८-९२ ग्रिफोर्ड लेक्चर्स (तीन)
१८८९ साइंस ऑफ लैंग्वेज (तीन लेक्चर्स)
१८९०-९२ ऋग्वेद (न्यू एडीशन)
१८९३ आपस्तम्ब सूत्र (अनुवाद)
१८९४  चिप्स फ्रॉम ए जरमन वर्कशॉप (४ खंड रिवाइज्ड)
१८९७  साइंस ऑफ माइथोलौजी (२ खंड)
१८९८ औल्ड लैंगसिने (खंड १, जर्मन में)
१८९८ रामकृष्ण
१८९९ औल्ड लैंग सिने (खंड-२, जर्मन में)
१८९९ सिक्स सिस्टम्स ऑफ इंडियन फिलॉसफी
१८९९ डास फरडेवुली (जर्मन में)
१९०० ट्रान्सवाल वार
१९०१
ऑटोबायोग्राफी एण्ड लास्ट ऐसेज़
(२ खंड- मरणोपरान्त प्रकाशित)

   

अब प्रश्न उठता है कि ब्रिटिश सरकार को वेद भाष्य, वह भी मैक्समूलर द्वारा ही कराने की आवश्यकता क्यों हुई?
वे कौन सी परिस्थियाँ और विवशताऐं थीं जिनके कारण ब्रिटिश शासकों और ईस्ट इंडिया कम्पन को १८४७ में ऋग्वेद के अंग्रेजी में भाष्य कराने की आवश्यकता हुई?

1. वे कौन सी परिस्थितियाँ और विवशताएँ थी जिनके कारण ब्रिटिश शासकों और ईस्ट इंडिया कम्पनी को १८४७ में ऋग्वेद के अंग्रेजी में भाष्य कराने की आवपश्यकता हुई ?

2. क्या उस समय ऋग्वेद के, सायण के अलावा, अन्य विद्वानों के भाष्य नहीं थे?

3. मैक्समूलर जैसे संस्कृत और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में अल्पज्ञ को, ऋग्वेद जैसे रहस्यमय और जटिल ग्रंथ का अनुवाद करने को क्यों चुना गया? जबकि ऑक्सफोर्ड एवं जर्मनी में अनेक अधिक विद्वान उपलब्ध थे।

4. ब्रिटिश सरकार ने मैक्समूलर और उसके भाष्य का इतना व्यापक प्रचार क्यों किया? उसे हिन्दुओं और हिन्दू धर्म शास्त्रों का परम हितैषी और वेदां का महान विद्वान कहकर इतना मान-सम्मान और खयाति क्यों दी?

इन प्रश्नों का उत्तर निम्नलिखित तथ्यों एवं परिस्थितियोंके आधार पर ढूँढा जा सकता हैः

(1) ऋग्वेद एक विशाल गं्रथ है। इसमें दस मंडल, १०२८ सूत्र, १०५८० मंत्र और प्राचीन वैदिक संस्कृत के लगभग १५३८२६ शब्द हैं। इसके अंग्रेजी में अनुवाद, सम्पादन और प्रकाशन करने के लिए एक सक्रिय विद्वान को कम से कम ८-१० वर्ष तक लगेंगे। अतः उन्हें एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो इस कार्य के लिए इतना समय लगा सके, भले ही वह किसी वरिष्ठ व्यक्ति की अपेक्षा कम योग्यता वाला हो।

(2) वह व्यक्ति गैर-ब्रिटिश हो क्योंकि उस समय भारत में ब्रिटिशों के विरूद्ध भारी आक्रोश, असंतोष और विरोध था।

(3) वह व्यक्ति ब्रिटिश, ईसाई मिशनों, मिशनरियों, कूटनीतिज्ञों और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की नीतियों और योजनाओं के अनुसार ऋग्वेद का अंग्रेजी में भाष्य करने को तैयार हो।

अब मैक्समूलर की योग्यताओं को ऊपर लिखीं शर्तों और परिस्थितियों की दृष्टि से देखिएः

(१) निश्चय ही प्रो. विल्सन मैक्समूलर की अपेक्षा कहीं अधिक योग्य था। लेकिन सर्व प्रथम तो वह काफी अधिक आयु (६० वर्ष) का था; दूसरे वह एक अंग्रेज था, और उस कौम का था, जो पहले ही भारत को गुलाम बना चुकी थी और अब उसके लोगों-हिन्दुओं को ईसाई बनाना चाहता थाऔर तीसरे वह पहले से ही संस्कृत-प्रोफेसर की बोडन येचर पर आसीन था। इसलिए किसी ने भी इस संभावना को नहीं माना कि इस पद पर रहते हुए प्रोफेसर विलसन वेदभाष्य के लिए पर्याप्त समय निकाल सकेंगे। एक दूसरे अंग्रेज संस्कृत विद्वान जोन म्यूर था जो पहले से ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेवा में था। उसके पास इस कार्य के लिए समय नहीं था।

इनके अलावा गैर-ब्रिटिश में से पैरिकस में यूगौन बर्नोफ पहले से ही प्रोफेसर था और इस काय्र के लिए काफी बड़ी उम्र का भी था। जर्मनी में उस समय फ्रांज बॉप (१७९१-१८६७) पहले से ही 'औरियंटल और जर्मन फिलोसफी' को प्रोफेसर था एवं ५६ वर्ष का था। इसी प्रकार मैक्समूलर आ संस्कृत शिक्षक फ्रेडरिक अर्नोल्ड ब्रोरवौस (१८०६-१८७७) लिपिजिग विश्वविद्यालय में संस्कृत का प्रोफेसर था तथा ओटो बोथलिंग (१८१५-१९०४) सेन्टपीटर्सबर्ग में प्रोफेसर था। इन विद्वानों के अलावा रुडोल्फ वॉन रॉथ (१८२१-१८८१) और थ्योडोर गोल्डस्टकर (१८२१-१८७२) मैक्समूलर के समकालीन थे फलस्वरूप इनमें से कोई भी कंपनी द्वारा नहीं चुना गया।

इन सब कारणों के फलस्वरूप प्रतिस्पर्धा के मैदान में केवल मैक्समूलर ही रह गया। अन्त में ईस्ट इंडिया कम्पनी केडाइरेक्टरों ने अपने उद्‌देश्य की पूर्ति के लिए मैक्समूलर को चुना। इन कारणों के अलावा, मैक्समूलर को एक मन पसंद नौकरी की अत्यंत
आवश्यकता थी। साथ ही मैक्समूलर भी एक कट्‌टर ईसाई था जो कि क्राइस्ट के लिए, अपनी अन्तरात्मा के विरूद्ध मन मसोस कर भी, किसी हद तक जाने को तैयार हो सकता था।

कम्पनी द्वारा चयन पर असीम प्रसन्नता

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने, १५ अप्रैल १८४७ को, अपनी नीतियों और योजनाओं के अनुसार मैक्समूलर द्वारा ऋग्वेद का अंग्रेजी में भाष्य कराने का निर्णय लिया। इस निर्णय के दूसरे ही दिन मैक्समूलर ने अपनी माँ को एक पत्र लिखा जिससे उसकी प्रसन्नता और उत्तेजना प्रगट होती हैः

"April 15, 1847-5, Newman's Row, Lincoln Inn, Fields-At last the long conflict is decided, and I have carried off, so to speak, the prize ! I can yet hardly believe that I have at last got what I have struggled for so long, entire independence, and I am filled with the thought of how much more I have gained than I deserved I am to hand over to the Company, ready for the press, fifty sheets each year-the same I had promised to Samter in Germany; for this I have asked £ 200 a year, £ 4 a sheet. They have been considering the matter since December, and it was. only yesterday that it was officially settled. I have to read the corrections, and shall have plenty of time left to devote to my studies As the work will be above 400 sheets, I have a certain position for the next eight years and the work is really so light I could take another post with it. This, in fact, has been already offered to me, i.e. a place as librarian at the British Museum with £150 a year. But on Bunsen's advice I have refused this and now what do you say, dearest mother? Is it not more than I could have ever expected ? But only think, I had not a penny left, and that in spite of even) effort to make a little money. I should have had to return to Germany had not Bunsen stood by me and helped by word and deed." 

(LLMM, Vol. 1, pp. 60-61)

अर्थात्‌ ''१५ अप्रैल १८४७, न्यूमैनस रौ, लिंकन इन, फील्डस; आखिर में उस लम्बे संघर्ष पर फैसला हो गया और मैंने बाजी मार दी यानी मुझे पुरस्कार मिल गया।मुझे अब भी यकीन नहीं होता ेि अंत में मुझे वह सब मिल गया जिसके कलिए मैंने लंबे समय से संघर्ष किया, संपूर्ण आजादी और मेरा मन इस विचार से भर गया है कि मुझे उससे कितना ज्यादा मिला है, जितने के लिए मैं योग्य हूँ........ मुझे कम्पनी को प्रेस के लिए तैयार पचास शीटें प्रति वर्ष देनी होंगी.......... इसके लिए मैंने दो सौ पौंड प्रतिवर्ष मांगे थे यानी चार पौंड प्रति शीट। वे इस विषय पर दिसम्बर (१८४६) से विचार कर हे थे और केवल कल ही मुझे आधिकारिक रूप से पता चला है कि मामला (मेरे पक्ष में) तय हो गया है। मुझे गलतियों को पढ़कर सुधारना है। अतः मेरे पास अपने अध्ययन के लिए पर्याप्त समय बचेगा........ क्योंकि सारा काम ४०० शीटों से अधिक का होगा। अतः मुझे अगले आठ वर्षों तक के लिए निश्चित काम मिल गया है और वास्तव में कार्य इतना हल्का है कि इसके साथ में एक और पद संभाल सकता हूँ और ब्रिटिश म्यूजियम में लायब्रेरियन का पद एक सौ पचास पौंड प्रति वर्ष का मुझे मिल भी गया है। लेकिन बुनसन के परामर्श पर मैंने वह काम अस्वीकार कर दिया है......... मेरी सबसे प्यारी माँ, अब तुम इस पर क्या कहती हो? .........लेकिन जरा सोचोमेरे पास एक पैनी भी नहीं बची थी, वह भी जरा-सा भी धन कमाने के हर संभव प्रयास करने पर भी। यदि बुनसन मेरे साथ वचन  और कर्म से खड़ा न होता और सहायता न करता तो मुझे विवश होकर जर्मनी लौटना पड़ता।
(जी.प. खंड १, पृ. ६०-६१)।

उपरोक्त पत्र से सुस्पष्ट है कि मैक्समूलर स्वंय मानता है कि (१) उसे अपनी योग्यता और आशा से कहीं अधिक मिला है; (२) ऋग्वेद का भाष्य एक हल्का-फुल्का काम है। क्योंकि शायद उसने विचारा हो कि उसके भाष्य को जाँचने और मूल्यांकन करने वाला कोई अन्य नहीं है, इसलिए उसका लिखा सब कुछ स्वीकार्य होगा। लेकिन स्टुअर्ट पिगौट के अनुसार

"The Rigveda is a curious document…… The language is elaborated and self consciously literary, and the composition, based on syllabic verse­form is often

extremely complicated-it is a laborious and complicated anthology."     

(Prehistoric India, pp. 256-68)

अर्थात्‌ ''ऋग्वेद एक रहस्यमय ग्रंथ है........ इसकी भाषा परिष्कृत, विवेकपूर्ण एवं साहित्यिक है और उसकी रचना छन्दमयी होने के कारण अक्सर अत्यन्त जटिल है''

(प्रीहिस्टोरिक इंडिया, पृ. २५६-६८)

केवल पिगौट ही नहीं बल्किप्राचीन काल से अब तक सभी प्राच्य विद्‌ इस बात पर सहमत हैं कि ऋग्वेद की संविरचना अत्यंत पेचीदा है और इसके शुद्ध अनुवाद के लिए वैदिक व्याकरण और प्राचीन भारतीय परम्पराओं के ज्ञान सहित वैदिक संस्कृत भाषा के गहन अध्ययन की आवश्यकता है जबकि विद्वत्ता मैक्समूलर के पास कभी भी नहीं थी। लेकिन मैक्समूलर जैसे ढोंगी व धोखेबाज अनुवादक और छद्‌मवेशी लेखक के लिए यह काम निश्चय ही हल्का-फुल्का हो सकता है।

यूरोप में संस्कृत साहित्य में रूचि क्यों ?

यूरोप में संस्कृत साहित्य में रुचि क्यों ?

यूरोप में सोलहवीं सदी तक संस्कृत साहित्य के प्रति कोई रुचि न थी। सत्रहवीं सदी के मध्य में हेनरिथ रॉथ(१६२०-१६६८) नामक जर्मन जैसुआइट पादरी आगरा आया और मिशनरी कार्य के लिए सबसे पहले उसे संस्कृत सीखी एवं १६६२ में संस्कृत व्याकरण पर पुस्तक लिखी। यहाँ संस्कृत साहित्य के प्रति तीव्र जिज्ञासा और वैचारिक उत्कंठा अठाहरवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारत में धार्मिक और राजनैतिक कारणों से उत्पन्न हुई। १७५७ में पलासी के युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजों का राज्य स्थापित हो गया। तब गवर्नर वारेन हेस्टिंग्ज ने प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से भारतीयों के रीति रिवाज और धार्मिक आस्था जानने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को संस्कृत सीखने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप यहाँ कॉलेज खोले गए और १७८४ में कलकत्ते में 'एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल' की स्थापना की गई। चार्ल्स बिल्किन्स पहला अंग्रेज अधिकारी था जिसने बनारस में संस्कृत भाषा सीखी और १७८५ में श्री मद्‌भागवद्‌ गीता, १७८७ में हितोपदेश और १७९५ में महाभारत के शाकुन्तलोपखयान का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया। जब १७६३ में विलियम जोन्स को ब्रिटिश सेटिलमेंट का मुखय न्यायाधीश नियुक्त किया गया तो उसने संस्कृत सीखी और १७८९ में महाकवि कालीदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम्‌ और १७९४ में मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसी समय (१८०२) दाराशिकोह के फारसी में, उपनिषदों का फ्रेंच लेखक एन्क्वेरिल डू पेरोन (१७२१-१८०५) द्वारा किया गया लेटिन अनुवाद प्रकाशित हुआ। इन साहित्यिक और दार्शनिक ग्रंथों ने यूरोप, और विशेषकर जर्मनी में, संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रति अभूतपूर्व जागृति एवं जिज्ञासा पैदा कर दी।

आगस्त विलहेम श्लेगल, (बोन यूनीवर्सिटी) जर्मनी, में पहला संस्कृत प्रोफेसर नियुक्त हुआ और उसका छोटा भाई फ्रेडरिक श्लेगल दोनों ही भारतीय दर्शन व साहित्य के अनन्य प्रशंसक थे। एक दूसरे जर्मन संस्कृत विद्वान विल्हेम हम्बोल्ड और ऑगस्ट श्लेगल ने मिलकर भगवद्‌ गीता का जर्मन में भाष्य प्रकाशित किया। तीसरे प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक अर्थर शोपेन७हावर ने उपनिषदों को ''मानव बुद्धिमत्ता की सर्वोत्तम कृति एवं 'अतिमानवीय चिन्तन' कहा। उसने आगे लिखा'' "It is the most satisfying and elevating reading of Upanishads which is possible in the world: it has been the solace of my life and will be the solace of my death."  अर्थात्‌ जीवन में इनका (उपनिषदों का) पढ़ना अत्यंत संतोषजनक और प्रेरणादायक है।ये मेरे जीवन में सान्तवनादायी हैं और मृत्यु में भी सान्त्वनाकारी रहेंगे।

संस्कृत अध्ययन के विभिन्न उद्‌देश्य

इतने प्रेरणादायक उद्‌गारों को पढ़कर १९वीं सदी के जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन आदि देशों के अनेक विद्वानों ने भारत के प्राचीन संस्कृत साहित्य के अध्ययन एवं शोध् में अपना सारा जीवन लगा दिया। परंतु इन विद्वानों के अध्ययन और लेखन के उद्‌देश्य विभिन्न थे। इन्हें मुखयतया तीन वर्गों में बांटा जा सकता हैः १. भारतीय धर्मशास्त्र, दर्शन और साहित्य के निष्पक्ष जिज्ञासु , २. अधिकांशतः ईसाई मिशनरी वर्ग और ३. धर्म एवं राजनीति से प्रेरित ब्रिटिश वर्ग और भारत में उनके प्रशासक और मिशनरी वर्ग।

पहले वर्ग के लोगों ने भारतीय साहित्य को भाषा विज्ञान द्वारा निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक दृष्टि से देखा और दार्शनिक विचारों को प्रेरणादायक माना इस वर्ग में मुखयतया ऑगस्त श्लेगल (१७६७-१८४५), फ्रेडरिक श्ेलगल (१७७२-१८२९), फ्रान्ज बाप (१७९१-१८६७), रूडोल्क रॉथ (१८२१-१८९५) हरमैन ब्रोरवोस (१८०६-१९०७) थ्योडर बेनफे (१८०९-१८८१) आदि मुखय थे। दूसरे वर्ग के विद्वानों ने मिशनरी भावना से प्रेरित होकर वैदिक देवतावाद का तुलनात्मक गाथावाद, विकासवाद और मानवइतिहास की दृष्टि से पक्षपातपूर्ण अनुवाद कर विशाल साहित्य लिखा। इनमें ओल्डन वर्ग (१८५४-१९२०), अलब्रेट वेबर (१८२५-१९०१), फ्रेडरिक रोजन (१८०५-१८३७), अलफ्रेड लुडविग (१८३२-१९१२), जार्ज बुहलर (१८३७-१८९८), ज्युलियस जौली (१८४९-१९३२), ओटोवॉन बोथलिंगम (१८१५-१९०४), मौरिस विंटरनिट्‌स (१८६३-१९३७), अर्नेस्ट कुहन (१८४६-१९२०) आदि थे। तीसरे वर्ग में ब्रिटेन में एच.एच. विल्सन (१७८६-१८६०), फ्रेडरिक मैक्समूलर (१८२३-१९००), मौनियर विलियम्स, अर्थन ऐंथोनी मैक्डोनल (१८५४-१९३०, ए.बी. कीथ (१८७९-१९४४) आदि थे। भारत में प्रशासन से जुड़े विद्वानों में चार्ल्स विलसन, विलियम जोन्स (१७४६-१७९४), कॉलब्रुक (१७६५-१८३६), स्टीवेंसन, ग्रिफिथ आदि मुखय थे।

(Agnes- German Indologists. pp.1-151)
ब्रिटेन के विद्वानों ने अपने राजनैतिक और मिशनरी हितों की दृष्टि से तुलनात्मक भाषावाद, गाथावाद, मानव ऐतिहासिकता एवं अन्य अनेक नवीन वादों की कल्पनाऐं कीं। १८४६ में, ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में, मैक्समूलर के आने के बाद ब्रिटेन का, हिन्दू धर्म शास्त्र संबंधी समस्त साहित्य, असंगत क्यों न हो। मगर गैर-ब्रिटिश लेखकों ने या तो ईसाई मिशनरी भावना से या वेदादि केमौलिक ज्ञान के अभाव से या संस्कृत को यूरोपीय भषाओं से सम्बन्धित करने के दुराग्रह के कारण विभिन्न अर्थ किए। ये सभी ब्रिटेन की तरह पक्षपाती नहीं थे। मगर तना अवश्य है कि सभी पाश्चात्य विद्वान भलीभांति जानते थे कि वेद, भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के मूल आधार हैं और इनकी समुचित व्याखया निरुक्त व पाणिनि व्याकरण के आधार पर ही हो सकती है। परन्तु किसी भी पाश्चातय विद्वान ने भारतीय वेद भाष्य पद्धति को नहीं अपनाया जिसका कि इसी समय में महर्षि दयानन्द सरस्वती (१८२५-१८८२) ने अपने वदे भाष्यों में प्रयोग कर उदाहरण प्रस्तुत किया था। भारतीय प्राचीन परम्परा इसी शैली को प्रामाणिक मानती है।

इंग्लैंड में संस्कृत शिक्षा के लिए बोडेन चेयर की स्थापना

१८१० ए.डी. तक, इंग्लैंड में संस्कृत शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। सबसे पहले इंग्लैंड में, १८११ में ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में संस्कृत भाषा की शिक्षा के लिए व्यवस्था की गई। इसके लिए एक कट्‌टर ईसाई सामने आया। वह था कर्नल जोसेफ बोडन जो कि ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में बम्बई में लेफ्टिनेंट-कर्नल रहा था। इसने अवकाश ग्रहण करने के बाद, अपनी समस्त सम्पत्ति, जो उस समय लगभग पच्चीसहजार पौंड थी, की वसीयत ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत-प्रोफेसर के एक पद की स्थापना के किए कर दी; और विश्वविद्यालय ने भी कृतज्ञता स्वरूप इसना नाम 'बोडेन चेयर ऑफ संस्कृत रख दिया।

बोडेन चेयर का उद्‌देश्य

बोडेन चेयर का उद्‌देश्य, भारत के गुरुकुलों की तरह, केवल साहित्यिक दृष्टि से संस्कृत भाषा का पढ़ना-पढ़ाना नहीं था, बल्कि ब्रिटेन के राजैतिक और ईसाई मिशनरियों के धार्मिक हितों की पूर्ति के लिए था। कर्नल बोडेन ने अपनी वसीयत, जो कि १५ अगस्त १८११ को कैंटरबरी, यू.के. के न्यायालय में रजिस्टर्ड की गई, उसके मुखय अंश और उद्‌देश्य इस प्रकार हैं:

"I do hereby give and bequeath all and singular my said residuary estate and effects with the accumulations thereof if any and the stocks nmds and securities whereon the same shall have been laid out and invested tmto the University of Oxford to be by that Body appropnated in and towards the erection and endowment of a Professorship in the Sanskrit Language at or in any or either of the Colleges in the said University being of opinion that a more general and critical knowledge of that language will be a means of enabling my Countrymen to proceed in the conversion of Natives of India to the Christian Religion by disseminating a knowlidge of the Sacred Scriptures amongst them 1ill:.0re effectually than all other means whatsoever."
(Bharti, pp. 249-50)

अर्थात्‌ ''मैं अपनी समस्त ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को दान देता हूँ। वे इसे विश्वविद्यालय या किसी कॉलेज में, जहाँ वे उचित समझें प्रयोग करें ताकि उसके देश(इंग्लैंड) वासियों को संस्कृत भाषा का समुचित ज्ञान हो सके, जो भारत के मूल निवासियों के धर्मग्रंथों को समझने और उनके ईसाईयत में धर्मान्तरण में सहायक हो सकें।''
(भारती पृ. २४९-२५०)

इस प्रकार १८११ में, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत चेयर की स्थापना हो तो गई थी लेकिन उस समय इसके लिए कोई मनचाहा व्यक्ति न मिल सका। बोडेन चेयर पर प्रतिष्ठित होने वालो सबसे पहला व्यक्ति एच.एच. विलसन (१७८६-१८६०) था। वह भारत में मेडीकल प्रोफेशन के एक सदस्य के रूप में, १८०८ में आया तथा १८३२ तक यहाँ रहा। भारत निवास के इस काल में उसने संस्कृत भाषा सीखी, इस आशा और उद्‌देश्य से कि शायदयह भाषा ज्ञान उसे हिन्दू धर्म शास्त्राों को समझने और आवश्यकता होने पर विकृत आर्थ करने और भारतीयों को ईसाईयत में धर्मान्तरित करने में सहायक हो सके। इस संस्कृत ाान के आधार पर ही विलसन को, १८३२ में, ऑक्सफोर्ड विश्व विद्यालय में संस्कृत की बोडेन चेयर का प्रथम अधिष्ठाता बनाया गया। यहाँ उसने सबसे पहले मिशनरियों के लिए ''दी रिलीजन एण्ड फिलोसोफिकल सिस्टम ऑफ दी हिन्दूज'' नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तके के लिखने के उद्‌देश्य के विषय में उसने कहाः 

"These lectures were written to help candidates for a prize of £ 200/= given by John Muir, a well known Haileybury (where candidates were prepared for Indian Civil Services) man and great Sanskrit scholar, for the best refutation of the Hindu Religious Systems."   (Bharti, p.9)

अर्थात्‌ ''यह लेखमाला उन व्यक्तियों की सहायता के लिए लिखी गई हैं जो कि म्यू द्वारा स्थापित दो सौं पौंड के पुरस्कार के लिए प्रत्याशी हों और जो हिन्दू धर्म ग्रन्थों का सर्वोत्तम प्रकार से खंडन कर सकें।'' 
(भारती, पृ. ९)

बोडेन चेयर का दूसरा अधिष्ठाता

१८६० में, प्रो. विलसन के निधन के बाद,बोडेन चेयर का दूसरा अधिष्ठाता मौनियर विलियम्स हुआ। १८१९ में बम्बई में जन्मा मौनियर एक कट्‌टर ईसाई था। यह हिन्दू धर्म को नष्ट करने को और भी अधिक वचनबद्ध था जैसाकि उसने अपनी पुस्तक 'ए संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी' की भूमिका में लिखाः

"In explanation I must draw attention to the fact that I am only the second occupant of the Boden Chair, and that its founder, Col. Boden, stated most explicitly in his will (dated August 15, 1811) that the special object of his munificent bequest was to promote the translation of the Scripture in Sanskrit so as to enable his countrymen to procet'd in the conversion of the natives of India to the Christian religion."

"It was on this account that, when my distinguished predecessor and teacher, Professor H. H. Wilson, was a candidate for the Chair in 1832, his lexicographical labours were put forward as his principal claim to election."

"Surely it" need not be thought surprising, if following in the footsteps of my venerated master, I have made it the chief aim of my professional life to provide facilities for the translation of the Sacred Scriptures in Sanskrit and for the promotion of a better knowledge of the religions and customs of India, as the best key to a knowledge of the religious needs of our great Eastern Dependency. My very first public lecture delivered after my election in 1860 was on "The Study of Sanskrit in Relation to Missionary Work in India" (published in 1861).  (Pref.  to the New Edition of Sanskrit­ English Dictionary by M.M. Williams pp.IX-X)

अर्थात्‌ ''मैं, इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि मैं तो केवल बोडेन-चेयर का दूसरा अधिष्ठाता हूँ और उसके संस्थापक कर्नल बोडेन ने अपनी वसीयत (१५ अगस्त १८११) में सबसे अधिक स्पष्टता के साथ लिखा है कि उसकी वसीयत का विशेष उद्‌देश्य संस्कृत धर्मशास्त्रों का अनुवाद करना है ताकि उसके देश (इंग्लैंड) वासी भारत के मूल निवासियों का ईसाईयत में धर्मान्तरित करने के योग्य हो सकें।'' ''इस ही कारण जब मेरे शिक्षक और सुप्रसिद्ध पूर्व अधिकारी प्रो.एच.एच. विलसन, जो कि १८३२ में इस चेयर के प्रत्याशी थे, तो उनकेलेखन कार्य के कारण उनको उस पद के मुखय दावेदार के रूप में प्रस्तुत किया गया था।'' ''निश्चय ही इसे आश्चर्यजनक न समझा जाए कि यदि मेरे श्रद्धेय गुरूजी के चरण चिन्हों पर चलते हुए मैंने अपने व्यवसायिक जीवन का मुखय उद्‌देश्य भारतीयों के धर्म ग्रंथों का अंग्रेजी में भाष्य करने के लिए सुविधा प्रदान करना है तथा भारत के धर्मों और रीतिरिवाजों की अच्छी जानकारी को बढ़ावा देना है।''

''१८६० में, बोडेन चेयर के लिए चुने जाने के बाद अपनी पुस्तक ''दी स्टडी ऑफ संस्कृत इन रिलेशन टू मिशनरी वर्क इन इंडिया'' (१८६१)'' इसमें उसने एक मिशनरी की तरह स्पष्ट कहाः

"When the walls of the mighty fortress of Hinduism are encircled, undermined and finally stormed by the soldiers of the Cross, the victory to Christianity must be signal and complete."

(p.262)

अर्थात्‌ ''जब हिन्दू धर्म के मजबूत किलों की दीवारों को घेरा जाएगा, उन पर सुरंगे बिछाई जाऐंगी और अंत में ईसामसीह के सैनिकों द्वारा उन पर धावा बोला जाएगा तो ईसाईयत की विजय अन्तिम और पूरी तरह होगी''

(वही पृ. २६२)

इन उपरोक्तियों से सुस्पष्ट है कि बोडेन चेयर के दोनोंअधिष्ठाताओं ने संस्कृत शिक्षा के नाम पर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अपने अधिकारिक पद का ईसाईयत के हितों के लिए पूरी तरह से दुरुपयोग किया। उन्होंने प्राच्यविद्याओं के शोध की आड़ में अपने मिशनरी उद्‌देश्यों की पूर्ति के लिए लगातार प्रयास किया।

मैक्समूलर ने भी १८४७ से ही बोडेन चेयर के उद्‌देश्य की पूर्ति के लिए अथाह परिश्रम किया; ऋग्वेद का विकृत भाष्य और बोडेन चेयर पाने के लिए चुनाव भी लड़ा। मगर अंग्रेज मोनियर विलियम्स के पक्ष में ८८३ वोटों के विरुद्ध, ६१० वोट पाने के कारण वह हार गया (मिश्रा, पृ. १६) क्योंकि वह एक गैर-ब्रिटिश था। इस संदर्भ में ऐन्साईक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (रंव. XVII पृ. ९२७) बतलाता हैः

''मैक्समूलर के जीवन की यह एक बहुत बड़ी निराशा थी जिसका उसके ऊपर बहुत समय तक प्रभाव रहा।'' मगर फिर भी वह हिन्दू धर्म शास्त्रों के विकृतीकरण और भारतीय धार्मिक नेताओं का ईसाईयत में धर्मान्तरण के लिए प्रयास करता रहा।